Hindi Essay Writing – भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव (Impact of Increasing Crude Oil Prices on Indian Economy)

 
भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव पर निबंध
 
इस लेख में हम भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का प्रभाव पर निबंध लिखेंगे | क्रूड ऑयल क्या है? भारत किन देशों से क्रूड ऑयल का आयात करता है? क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ने के कारण, क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का भारत पर प्रभाव के बारे में जानेगे |
 
पिछले कुछ दिनों से लगातार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ रहे हैं। कुछ कुछ राज्यों में तो पेट्रोल के दाम 110 रुपए तक हो गए जो निश्चित ही आम आदमी की परेशानी बढ़ाए है। 
 
अंत में, अभी कुछ दिनों पहले हमारे देश के प्रधानमंत्री जी ने पेट्रोल और डीजल से केंद्रीय कर को हटा दिया जिससे पेट्रोल और डीजल के दामो में कुछ राहत आई, लेकिन क्या आपको सच में पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों के पीछे का कारण पता है? अगर नही पता तो इस लेख में पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों के पीछे का कारण और इससे भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर भी चर्चा करेगे। 
 


संकेत बिंदु (Contents)

 

  • प्रस्तावना
  • क्रूड ऑयल क्या है?
  • भारत किन देशों से क्रूड ऑयल का आयात करता है?
  • क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ने के कारण
  • क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का भारत पर प्रभाव
  • उपसंहार

 

प्रस्तावना

 
पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों ने देश में हाहाकार मचा कर रखा है। लोग पेट्रोल डीजल के बढ़ते दामों के लिए रूस यूक्रेन युद्ध को दोषी ठहरा रहें, हालांकि यह बात आंशिक रूप से सत्य है क्योंकि बीते साल भी पेट्रोल डीजल के दाम ऐसे ही बढ़े थे तब कोई रूस यूक्रेन युद्ध नहीं था। 
 
चलिए एक बार दुनिया के शीर्ष क्रूड ऑयल उत्पादक देशों पर नजर डालते हैं। 
 
crude oil production
 
इन आंकड़ों के अनुसार, दुनिया में शीर्ष क्रूड ऑयल उत्पादक देशों में पहले स्थान पर रूस आता है, जो इस वक्त यूक्रेन के साथ युद्ध कर रहा है और यूरोपीय देशों का प्रतिबंध झेल रहा है। 
 
हालांकि, भारत ने रूस पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया न ही रूस से अपनी वर्षों पुरानी मित्रता को कम किया है, लेकिन सवाल अब यह उठता है कि क्या रूस प्रतिबंध लगाए जाने के कारण अपने सारे खर्चे क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ाकर ही निकल रहा क्या? 
 
तो ये अनुमान गलत है क्योंकि प्राप्त रिपोर्ट्स के अनुसार, रूस भारत को कुछ कम दामों में क्रूड ऑयल की आपूर्ति कर रहा तो आखिर इन बढ़ते दामों की वजह क्या है? 
 
चलिए आगे के लेख में देखते हैं। 
 

क्रूड ऑयल क्या है

 
कच्चा तेल पृथ्वी की सबसे व्यापक रूप से उपयोग की जाने वाली और कारोबार की जाने वाली वस्तु है। कच्चा तेल एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पेट्रोलियम उत्पाद है जो जमे हाइड्रोकार्बन और अन्य कार्बनिक पदार्थों से बना होता है। यह एक प्रकार का जीवाश्म ईंधन, कच्चे तेल को गैसोलीन, डीजल और पेट्रोकेमिकल्स के विभिन्न अन्य रूपों सहित प्रयोग करने योग्य उत्पादों का उत्पादन करने के लिए परिष्कृत किया जाता है।  एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है, जिसका अर्थ है कि “इसे स्वाभाविक रूप से उस दर से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है जिस दर से हम इसका उपभोग करते हैं और इसलिए, एक सीमित संसाधन है।”
 
तेल और इसके डेरिवेटिव वैश्विक परिवहन को जारी रखने और विकासशील देशों में खाना पकाने और हीटिंग के लिए उपयोग किए जाते हैं। चूंकि यह दुनिया अभी भी कच्चे तेल पर निर्भर है और दुनिया के लगभग हर देश की आर्थिक विकास की दर इसकी कीमत से बहुत अधिक प्रभावित होती है। चूंकि हम परिवहन, रसायन और विनिर्माण के लिए पेट्रोलियम उत्पादों पर निर्भर हैं इसलिए तेल की कीमत में परिवर्तन देश की आर्थिक विकास की दर को निश्चित रूप से प्रभावित कर सकता है। 
 
कच्चा तेल आमतौर पर ड्रिलिंग के माध्यम से प्राप्त किया जाता है, जहां यह आमतौर पर अन्य संसाधनों के साथ पाया जाता है, जैसे कि प्राकृतिक गैस और खारा पानी। 

भारत किन देशों से क्रूड ऑयल का आयात करता है?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है। भारत अपनी आवश्यकता का 80% से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है और उसमें से 60% से अधिक ओपेक से आयात करता है। हाल ही में इराक भारत को तेल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है, इसके बाद सऊदी अरब, ईरान और कुवैत, वेनेजुएला, नाइजीरिया आदि हैं। 
 
भारत अपना 85 प्रतिशत तेल 40 से अधिक देशों से आयात करता है। अधिकांश आपूर्ति मध्य पूर्व और अमेरिका से आती है।  ध्यान देने योग्य बात ये है कि भारत अपनी आपूर्ति का केवल 2% रूस से आयात करता है।
 
भारत ने स्वदेशी कच्चे तेल के उत्पादन से 35 मिलियन टन से अधिक पेट्रोलियम उत्पादों का उत्पादन किया जबकि पेट्रोलियम उत्पादों की खपत 200 मिलियन टन से अधिक है।  
 
इसी तरह, भारत ने लगभग 60 बीसीएम की खपत के मुकाबले स्थानीय स्तर पर 30 बीसीएम प्राकृतिक गैस का उत्पादन किया। एलएनजी की कीमत वैश्विक बाजारों में मौजूदा कच्चे तेल की कीमत से जुड़ी हुई है।
 
भारत पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है – जो इसके कुल निर्यात का 13% से अधिक है। भारत 100 से अधिक देशों को पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करता है। 
 
indias oil import
 

ओपेक क्या है

 
ओपेक की स्थापना 1960 में अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों के समन्वय और सदस्य राज्यों को तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए की गई थी। ओपेक एक प्रकार की आर्गेनाइजेशन है जिसका उद्देश्य विश्व बाजार पर तेल की कीमत निर्धारित करने के प्रयास में तेल की आपूर्ति का प्रबंधन करना है। 
 
ओपेक की स्थापना हो ऐसे उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हुई थी जो उत्पादक और क्रय करने वाले दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकते हैं।  
 

ओपेक में कौन कौन से देश आते हैं

 
ओपेक से संबंधित देशों में ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला (पांच संस्थापक देश), और अल्जीरिया, अंगोला, कांगो, इक्वेटोरियल गिनी, गैबॉन, लीबिया, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। 
 

क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ने के कारण

 
क्रूड ऑयल की कीमतों में लगातार वृद्धि के निम्न कारण हो सकते हैं। 
 

सीमित आपूर्ति

 

  • प्रमुख तेल उत्पादक देशों ने कोविद -19 महामारी के कारण मांग में तेज गिरावट के बीच पिछले साल तेल उत्पादन में कटौती की थी। 
  • सऊदी अरब ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों (ओपेक) और उसके सहयोगियों के संगठन के अन्य सदस्यों द्वारा कटौती के बाद फरवरी और मार्च 2020 में अतिरिक्त आपूर्ति में कटौती का वादा किया। 
  • जनवरी 2021 की शुरुआत में, ओपेक और रूस (ओपेक+ के रूप में) कीमतों में वृद्धि के लिए तेल उत्पादन में कटौती करने के लिए सहमत हुए। 
  • दशकों से, पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक) ने कच्चे तेल की आपूर्ति को सीमित करके वैश्विक तेल की कीमतों को प्रभावित करने का प्रयास किया है। 
  • महाद्वीपीय संयुक्त राज्य अमेरिका में शेल आपूर्ति के विकास ने हाल के वर्षों में ओपेक की मूल्य-निर्धारण शक्ति को कमजोर कर दिया है, लेकिन ओपेक+ अंब्रेला के तहत रूस और अन्य निर्यातकों के साथ ओपेक के गठबंधन द्वारा इसे मजबूत किया गया है। 
  • ओपेक+ के हर निर्णय को सरकारों, तेल कंपनियों और सट्टेबाजों द्वारा बारीकी से देखा जाता है। 

 

मांग में लगातार वृद्धि

 

  • कोविड -19 के लिए टीकों के उत्पादन और रोलआउट और पिछले साल कोविड लॉकडाउन के बाद बढ़ती खपत ने अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की मांगों में अपूर्व वृद्धि की है। 

 

भू-राजनीतिक कारण

 

  • रूस और यूक्रेन के बीच भू-राजनीतिक तनाव बढ़ गया है, जो दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। जनवरी में, यूएई में तेल के खजानों पर ड्रोन हमले हुए। 

 

रूस और यूक्रेन के बीच के युद्ध की क्रूड ऑयल की कीमतों में वृद्धि की क्या भूमिका है

 
रूस ईंधन के शीर्ष तीन आपूर्तिकर्ताओं में से एक है। भारत रूस से लगभग 1 बिलियन डॉलर का तेल खरीदता है, हालांकि इसका तेल आयात बिल $ 82 बिलियन (2021 की तुलना) से अधिक है।  
 
भारत 2020 से कतर से अपनी प्राकृतिक गैस का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है। दोनों देशों के बीच संकट से गैस की आपूर्ति में कमी आई है, जिससे गैस की कीमतों में वृद्धि हुई है।  रूस पर आपूर्ति में व्यवधान और प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा की कीमतों में एक बड़ी बढ़ोतरी पैदा की है। 
 
भारत अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति और अंतर्राष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर है जो भारतीय उपभोक्ताओं को प्रभावित करता है, लेकिन भारत में गैस की कीमतों में वृद्धि के पीछे रूस पर प्रतिबंध एकमात्र कारण नहीं है। 
 
छह अन्य मुख्य कारक हैं जो भारत में गैस की कीमतों में वृद्धि करने में मुख्य भूमिका निभाए हैं

  • यूक्रेन के आक्रमण के बाद रूस पर प्रतिबंध।
  • अमेरिकी भंडार और अन्य देशों से कच्चे तेल की आपूर्ति।
  • चीन में लॉकडाउन।
  • ओपेक देशों के कच्चे तेल उत्पादन में वृद्धि नहीं हुई है।
  • अमेरिका ने अपने कच्चे तेल के उत्पादन को नहीं बढ़ाया है।

 

भारत सरकार का दृष्टिकोण

 
भारत में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी अन्य देशों में कीमतों में बढ़ोतरी का 1/10वां हिस्सा है। अप्रैल 2021 से मार्च 2022 के बीच पेट्रोल (पेट्रोल) की कीमतों की तुलना करें तो अमेरिका में कीमतों में 51 फीसदी, कनाडा में 52 फीसदी, जर्मनी में 55 फीसदी, ब्रिटेन में 55 फीसदी, फ्रांस में 50 फीसदी की वृद्धि हुई है।  स्पेन 58 प्रतिशत लेकिन भारत में केवल 5 प्रतिशत। 
 

भारत में कच्चे तेल की कीमत कैसे तय की जाती है

 
भारत में हर रोज सुबह 06:00 बजे ईंधन दरों को संशोधित किया जाता है। इसे गतिशील ईंधन मूल्य पद्धति कहा जाता है।
 

भारत में कच्चे तेल की कीमत कौन तय करता है

 
केंद्र सरकार पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के तहत पीपीएसी (पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल) द्वारा तय किए गए बेस प्राइस और कैप कीमतों के माध्यम से ईंधन की कीमतों को नियंत्रित करती है, जिस पर डीलर और ऑयल मार्केटिंग कंपनीज या ओएमसी एक-दूसरे के साथ सौदा करते हैं।
 
नोट: भारत में ईंधन की कीमतें दुनिया में सबसे अधिक करों में से एक हैं। 1 लीटर ईंधन की कीमत में औसतन 70% कर शामिल होता हैं। 
 

क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का भारत पर प्रभाव

 
भारत में क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों का निम्नलिखित प्रभाव पड़ेगा

  • तेल की कीमतों में वृद्धि से देश के आयात बिल में वृद्धि होगी, और भारत चालू खाते के घाटे (निर्यात की तुलना में वस्तुओं और सेवाओं के आयात की अधिकता) को और अधिक प्रभावित करेगा।
  • अनुमानों के अनुसार, कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर की वृद्धि से तेल का बिल प्रति वर्ष लगभग 1.6 बिलियन अमरीकी डॉलर बढ़ जाता है।
  • कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से मुद्रास्फीति का दबाव और भी बढ़ सकता है जो पिछले कुछ महीनों में हुआ है।
  • इससे मौद्रिक नीति समिति के लिए नीतिगत दरों को और कम करने के मौके कम हो जायेगे।
  • यदि तेल की कीमतों में वृद्धि जारी रहती है, तो सरकार को पेट्रोलियम और डीजल पर करों में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जैसा कि अभी कुछ दिनों पहले हुआ है। पेट्रोलियम और डीजल पर करों में कटौती से राजस्व का नुकसान हो सकता है और देश का वित्तीय संतुलन बिगड़ सकता है। 
  • कोरोना की वजह से पिछले दो वर्षों में विकास में मंदी के कारण कर राजस्व में कमी के कारण पहले से ही एक अनिश्चित वित्तीय स्थिति पैदा हो गई है।
  • गैस की कीमतों में वृद्धि ने परिवहन ईंधन के रूप में उपयोग की जाने वाली कंप्रेस्ड प्राकृतिक गैस (सीएनजी) और खाना पकाने के ईंधन के रूप में उपयोग की जाने वाली पाइप्ड प्राकृतिक गैस (पीएनजी) दोनों की कीमते भी उच्च गति से बढ़ सकती है।
  • कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से एलपीजी और केरोसिन पर सब्सिडी बढ़ने की भी उम्मीद है, जिससे सब्सिडी बिल में बढ़ोतरी होगी। 
  • तेल की कीमतों में औसतन 1.2 फीसदी की बढ़ोतरी से रुपये की कीमत में करीब 0.9 फीसदी की गिरावट आती है।

 

उपसंहार

 
भारत और दुनिया में हर दिन तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है।  तेल की कीमतों में यह तेजी का रुख आने वाले दिनों में भी जारी रहने की उम्मीद है। इससे देश के साथ-साथ देश की जनता की आर्थिक स्थिति भी खराब होगी।  इसके अलावा, भारत में ईंधन पर उच्च कर लोगों पर अत्यधिक लागत का बोझ डाल रहे हैं।  वह दिन दूर नहीं जब लोग ईंधन से चलने वाले वाहन का उपयोग करने के बजाय साइकिल का उपयोग करना चुनेंगे।  
 
ईंधन की कीमतों में वृद्धि भी लोगो की पेट्रोल डीजल चालित वाहनों पर निर्भरता कम होगी और हाइड्रोजन या इलेक्ट्रिक वाहनों पर निर्भरता बढ़ेगी जिससे हमारे पर्यावरण की रक्षा होगी और वायु प्रदूषण में कमी होगी।
 
भारत को अब क्रूड ऑयल के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर बनना होगा क्योंकि शीर्ष क्रूड ऑयल उत्पादक देश भी दुनिया की दोनो महाशक्तियां अर्थात अमेरिका और रूस के प्रभाव क्षेत्र में हैं तो हम इन देशों पर निर्भर नहीं रह सकते। 
 
भारत में कच्चे तेल के भंडार कम हैं और जितने भी भंडार हैं वो जनसंख्या के दबाव से कम पड़ रहे हैं हालत दिन पर दिन गंभीर ही होगे तो इस स्थिति में भारत को कच्चे तेल के विकल्पों के अधिक से अधिक इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए इससे पर्यावरण संरक्षण भी होगा और देश की आम जनता के जेब में भार भी नही पड़ेगा।