Hindi Essay Writing – वेस्ट नील वायरस (West Nile Virus) 

 
वेस्ट नील वायरस पर निबंध
 
इस लेख में हम वेस्ट नील वायरस पर निबंध लिखेंगे | वेस्ट नील वायरस क्या हैं, वायरस के प्रकार, वायरस की उत्पत्ति, वायरस के लक्षण, वायरस से बचाव या उपचार के उपाय के बारे में जानेगे |
 


वायरस क्या होते हैं 

 
‘वायरस’ या ‘विषाणु’ ऐसे सूक्ष्मजीव होते है, जो जीवित कोशिकाओं के भीतर ही अपना विकास एवं प्रजनन करते है। ‘विषाणु’ स्वयं को जीवित रखने एवं अपनी प्रतिकृति तैयार करने हेतु जीवित कोशिकाओं पर आक्रमण करते हैं।
 
विषाणु की खोज वर्ष 1892 में रूस के वैज्ञानिक दमित्री इवानोवास्की ने की थी। इवानोवास्की  ने अपने प्रयोग में यह पाया कि वायरस की प्रकृति सजीव और निर्जीव दोनों प्रकार की होती हैं |  इसी कारण इन्हें सजीव और निर्जीव की कड़ी भी कहा जाता हैं|
 
विषाणु के निर्जीव होने के लक्षण 

  1. ये कोशा रूप में नहीं होते हैं |
  2. इनको क्रिस्टल बनाकर निर्जीव पदार्थो की भांति बोतलों में भरकर वर्षों तक रखा जा सकता हैं |

 
विषाणु के  सजीव जैसे लक्षण 

  1. इनके न्यूक्लिक अम्ल का द्विगुणन होता हैं |
  2. किसी जीवित कोशिका में पहुँचते ही ये सक्रिय हो जाते हैं और एंजाइम का संश्लेष्ण करने लगते हैं |

 

वायरस के प्रकार

 
परपोषी प्रकृति के अनुसार वायरस मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं :-

  1. पादप विषाणु – इनका न्युक्लिक अम्ल में आर एन ए होता हैं |
  2. जंतु विषाणु  – इनमें डीएनए और आरएनए दोनों पाए जाते हैं |
  3. बैक्टेरियोफेज – इनमें केवल डीएनए पाया जाता हैं |

 
वायरस के वर्गीकरण में ‘इन्फ्लूएंजा वायरस’ RNA प्रकार के वायरस होते हैं तथा ये ‘ऑर्थोमिक्सोविरिद’ वर्ग से संबंधित होते हैं। इन्फ्लूएंजा वायरस के तीन वर्ग निम्नलिखित हैं:-

  1. इन्फ्लूएंज़ा वायरस A: यह एक संक्रामक वायरस है। ‘जंगली, जलीय, पशु-पक्षी’ इसके प्राकृतिक वाहक होते हैं। मनुष्यों में संचारित होने पर यह काफी घातक सिद्ध हो सकता है। 
  2. इन्फ्लूएंज़ा वायरस B: यह विशेष रूप से मनुष्यों को प्रभावित करता है तथा इन्फ्लुएन्ज़ा-A से कम सामान्य तथा कम घातक होता है।
  3.  इन्फ्लूएंज़ा वायरस C: यह सामान्यतः मनुष्यों, कुत्तों एवं सूअरों को प्रभावित करता है। यह इन्फ्लूएंजा के अन्य प्रकारों से कम घातक होता है तथा आमतौर पर केवल बच्चों में सामान्य रोग का कारण बनता है।

 

वेस्ट नील वायरस क्या हैं 

 
वेस्ट नील वायरस, फ्लेविवायरस से संबंधित है, जो सेंट लुइस इंसेफेलाइटिस, जापानी इंसेफेलाइटिस तथा पीत ज्वर पैदा करने के लिये भी ज़िम्मेदार है। यह एक मच्छर जनित, सिंगल स्ट्रैंडेड RNA वायरस है। 
 
वेस्ट नील वायरस क्युलेक्स प्रजाति के मच्छर के काटने से फैलता हैं |
 
जब मच्छर इस वायरस से संक्रमित किसी पक्षी को काटता हैं तो उससे ये वायरस मच्छर में आ जाता हैं, फिर जब वह संक्रमित मच्छर किसी मनुष्य को काटता हैं तो उससे ये वायरस उस मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाता हैं और व्यक्ति को बीमार करता हैं |  वैसे ये वायरस छूने से नहीं फैलता ; अभी तक किसी भी संक्रमित मनुष्य के संपर्क से  इसके संक्रमण का कोई मामला सामने नहीं आया हैं |
 

उत्पत्ति 

 
वेस्ट नील वायरस का पहला मामला 1937 में युगांडा के वेस्ट नील जिले में एक महिला में पाया गया था | उस क्षेत्र के नाम पर इस वायरस का नाम वेस्ट नील वायरस पड़ा |
 
वेस्ट नील वायरस का गंभीर प्रकोप 1990 के दशक के मध्य में अफ्रीका महाद्वीप  के अल्जीरिया और रोमानिया देशों में  हुआ था | 
 
सन 1999 में जब वेस्ट नील वायरस संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क शहर में सामने आया,  उस वर्ष न्यूयार्क में 62 मनुष्य, 25 घोड़े और कई पक्षी इस वायरस से मारे गये थे | तब से कम से कम 48 राज्यों में सर्वे कर यह पाया गया था कि अमेरिका में यह वायरस मच्छरों से मनुष्यों में फैलने वाला वायरस है |
 
वैसे देखा जाए तो मच्छरों के काटने से कई तरह की बीमारियाँ होती हैं  और वैज्ञानिक द्रष्टि से देखा जाए तो वेस्ट नाइल वायरस रोग के संचरण के लिए जलवायु परिवर्तन कई महत्वपूर्ण कारकों में से एक है | 
 
जलवायु परिवर्तन से वेस्ट नाइल वायरस के मानव संपर्क का खतरा बढ़ जाता है।  
 
अध्ययनों से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े गर्म तापमान मच्छरों के विकास, काटने की दर और मच्छर के भीतर रोग के ऊष्मायन को तेज कर सकते हैं।  पक्षियों के प्रवास के समय और प्रजनन पैटर्न पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव भी लंबे समय में परिवर्तन में योगदान कर सकता है |
 
हल्की सर्दी का मौसम हो या भीषण सूखा,  ये सब वेस्ट नील वायरस के प्रकोप को प्रभावित करते हैं, साथ ही बरसात के मौसम में तो मच्छरों का प्रजनन कई गुना बढ़ जाता है और ये बरसात में नमी वाले स्थान मच्छरों के प्रजनन में महत्वपूर्ण योगदान देते है जिससे इनकी तादाद में लगातार वृध्दि होती हैं।
 
मानव द्वारा की गई लापरवाही से भी इस प्रकार के वायरस लगता बढ़ रहे हैं |
 
मच्छरों और मेजबान पक्षी प्रजातियों की मानव आबादी के निकट पाए जाने से भी ये वायरस तेजी से फैलता हैं |
 

लक्षण 

 

  • वेस्ट नील वायरस वायरस से संक्रमित कई लोगो में कोई विशेष लक्षण दिखाई नही देते हैं | 
  • वेस्ट नील वायरस वायरस से संक्रमित 80% संक्रमित लोगों में यह रोग स्पर्शोन्मुख अर्थात यह वायरस सम्पर्क से नहीं फैलता  है; शेष 20% मामलों में वेस्ट नील फीवर या गंभीर WNV बुखार, सिरदर्द, थकान, मतली, शरीर में दर्द, दाने और सूजन ग्रंथियों जैसे लक्षणों के साथ देखा जाता है। 
  • वेस्ट नील वायरस किसी भी उम्र से व्यक्ति को हो सकता हैं | 
  • 50 वर्ष से अधिक के लोगो में इस वायरस का खतरा अधिक होता हैं |
  • वेस्ट नील वायरस के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नही है |
  • गंभीर संक्रमण से वेस्ट नील इंसेफेलाइटिस या मेनिन्जाइटिस, वेस्ट नाइल पोलियोमाइलाइटिस, एक्यूट फ्लेसीड पैरालिसिस जैसे न्यूरोलॉजिकल रोग भी हो सकते हैं। 
  • इसके अलावा ‘गुइलेन-बैरे सिंड्रोम’ और रेडिकुलोपैथी की रिपोर्टो में यह बात सामने आई हैं कि – वेस्ट नील वायरस वाले 150 में से लगभग 1 व्यक्ति में इस बीमारी के अधिक गंभीर रूप में विकसित होने की संभावना होती है। 
  • गंभीर बीमारी से उबरने में कई सप्ताह या महीने लग सकते हैं। 
  • हमेशा के लिये तंत्रिका तंत्र की क्षति हो सकती है। 
  • सह-रुग्णता वाले व्यक्तियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी वाले व्यक्तियों (जैसे प्रत्यारोपण रोगियों) में यह वायरस घातक साबित हो सकता है।

 

बचाव  या उपचार

 
अभी तक वेस्ट नील वायरस के लिये कोई उपचार/वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। टोनरोइनवेसिव दवा वेस्ट नील वायरस रोगियों को केवल सहायक उपचार प्रदान किया जा सकता है। वेस्ट नील वायरस से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि आप खुद को मच्छरों के काटने से बचाएं। 
 
मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए आप निम्नलिखित कदम उठा सकते हैं : –

  • कीट विकर्षक का प्रयोग करें |
  • लंबी बाजू की शर्ट और पैंट पहनें, कपड़ों और उपकरणों का उपचार करें 
  • और घर के अंदर और बाहर मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाएं।
  • घर के अंदर और बाहर मच्छरों को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाएं |
  • खिड़कियों और दरवाजों पर स्क्रीन का प्रयोग करें।  मच्छरों को बाहर रखने के लिए स्क्रीन में छेद की मरम्मत करें।
  • यदि उपलब्ध हो तो एयर कंडीशनिंग का प्रयोग करें।
  •  मच्छरों को पानी में या उसके पास अंडे देने से रोकने के उपाय करें |
  • सप्ताह में एक बार, टायर, बाल्टी, प्लांटर्स, खिलौने, पूल, बर्डबाथ, फ्लावरपॉट, या कचरा कंटेनर जैसे पानी रखने वाली वस्तुओं को खाली और साफ़ करें, पलट दें, ढक दें या बाहर फेंक दें।
  •  घर के अंदर और बाहर दोनों जगह पानी रखने वाले कंटेनरों की जाँच करें।

 
यदि इन सारी सावधानियों के बावजूद भी आपको वेस्ट नील वायरस संक्रमण हो जाता हैं तो शीघ्र अति शीघ्र डॉक्टर से सम्पर्क करें और इलाज करवाएं | 
 

अतिरिक्त उपाय

 
पक्षियों और घोड़ों में नए मामलों का पता लगाने के लिये एक सक्रिय पशु स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली की स्थापना अनिवार्य रूप से स्थापित की जानी चाहिये। 
 
चूँकि जानवरों में वेस्ट नील वायरस का प्रकोप मनुष्यों से पहले होता है, इसलिये पशु चिकित्सा और मानव सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों के लिये प्रारंभिक चेतावनी प्रदान करना आवश्यक है। 
 
यूरोपियन सेंटर फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने सुझाव दिया है कि यूरोपीय संघ द्वारा संभावित रक्तदाताओं का 28-दिवसीय रक्त दाता डिफरल या न्यूक्लिक एसिड परीक्षण, जो किसी प्रभावित क्षेत्र में गए हैं या रहते हैं, को लागू किया जाना चाहिये। 
 
इसके अलावा अंगों, ऊतकों और कोशिकाओं के दाताओं का वेस्ट नील वायरस संक्रमण परीक्षण किया जाना चाहिये, जो प्रभावित क्षेत्र में रह रहे हैं या वहाँ से लौट रहे हैं। 
 

भारत में वेस्ट नील वायरस

 
 हाल ही में 30 मई 2022 को केरल में 47 साल के व्यक्ति की वेस्ट नील वायरस से मौत हो गई है |  वेस्ट नील वायरस से केरल में तीन साल बाद कोई मौत हुई | इसके पहले 2019 में एक 6 साल के बच्चे की मौत भी इसी फीवर से हुई |
 
वेल्लोर और कोलार ज़िलों में क्रमशः 1977, 1978 और 1981 में एवं 2017 में पश्चिम बंगाल में  वेस्ट नील वायरस संक्रमण के गंभीर मामले सामने आए थे । 
 
 भारत के मुंबई शहर में, वेस्ट नील वायरस के खिलाफ पहली एंटीबॉडी सन 1952 में, मनुष्यों में पाए गए थे और तब से दक्षिणी, मध्य और पश्चिमी भारत में वायरस गतिविधियों की सूचना मिली थी । 
 
आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में क्यूलेक्स  मच्छरों से वेस्ट नील वायरस को अलग किया गया था 
 
महाराष्ट्र में वेस्ट नील वायरस को क्यूलेक्स क्विनक्वेफासियाटस मच्छरों से अलग किया गया था ।
 
 राजस्थान के उदयपुर जिले, महाराष्ट्र के बुलढाणा, मराठवाड़ा और खानदेश जिलों में महामारी के रूप में ज्वर की बीमारी और एन्सेफलाइटिस के मामले देखे गए थे ।
 
 इसके अलावा, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और असम से एकत्र किए गए मानव सीरम में वेस्ट नील वायरस को निष्क्रिय करने वाले एंटीबॉडी की उपस्थिति देखी गई  थी।
 
केरल में तीव्र एन्सेफलाइटिस प्रकोप के दौरान वेस्ट नील वायरस के पूर्ण जीनोम अनुक्रम को 2013 में अलग कर दिया गया था। 
 
 तमिलनाडु में आंखों के संक्रमण के साथ  वेस्ट नील वायरस का संबंध 2010 की पहली छ: माही में  अद्रश्य वायरस नामक महामारी के रूप में, स्पष्ट रूप से स्थापित हो गया था। 
 

विश्व में वेस्ट नील वायरस

 
वेस्ट नील वायरस का पहला मामला 1937 में युगांडा के वेस्ट नील जिले में एक महिला में पाया गया था | 1953 में नील डेल्टा क्षेत्र में पक्षियों में इसकी पहचान की गई थी | 1997 से पहले वेस्ट नील वायरस को पक्षियों के लिए रोगजनक नहीं माना जाता था |
 
रूस की एक स्वास्थ नियामक संस्था “रोसपोत्रेब्नजोर” ने सर्दियों में वेस्ट नील वायरस के तेजी से फैलने की आशंका जताई हैं | रोसपोत्रेब्नजोर के अनुसार सर्द और नम वातावरण वेस्ट नील वायरस के प्रसार के लिए ज़िम्मेदार क्यूलेस मच्छरों के प्रजनन के लिए मुफीद माना जाता हैं जिससे कि मच्छरों की आबादी बढ़ने से वेस्ट नील वायरस के मामलों में उछाल आने की आशंका हैं |
 

उपसंहार 

 
चाहे कोरोना वायरस हो, चाहे वेस्ट नील वायरस, चाहे डेंगू, मलेरिया  इन सब वायरस ने हमारी मानवजाति को बहुत नुकसान पहुँचाया हैं लेकिन प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से देखा जाए तो इन वायरस की उत्पत्ति के ज़िम्मेदार हम मनुष्य ही हैं | हमने पर्यावरण को जितनी हानि पहुँचायी हैं, उस वजह से प्रकृति भी मनुष्यों पर कुपित हैं और ये उसका प्रकोप ही है जो ऐसे अद्रश्य वायरस के रूप में मानव सभ्यता का विनाश करने प्रकट हुआ हैं | कोरोना वायरस से जो त्रासदी हुई उसकी पूरी दुनिया गवाह हैं, लाखों लोगों ने अपनी जान गंवाई और करोड़ों लोग इस बीमारी की चपेट में आए | हर सदी में ऐसी महामारियाँ बार-बार आती रहेंगी, कारण – “मनुष्यों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का आवश्यकता से अधिक दोहन”  और जब तक मनुष्य प्रकृति की अहमियत नहीं समझ जाता तब तक ऐसी महामारियाँ बार-बार आती रहेंगी | 
 
ये महामारियां एक संकेत हैं कि प्रकृति के आगे मनुष्य कुछ भी नहीं, यदि प्रकृति चाहे तो एक बार में महाप्रलय ला सकती हैं और मानव जाति का अंत हो सकता हैं किन्तु वो हमें बार-बार चेतावनी देती हैं कि समय रहते सम्हल जाओ अन्यथा सदी का अंत सुनिश्चित हैं | अतः हमें समझना चाहिए कि प्रकृति हमारी गुलाम नहीं हम प्रकृति पर आश्रित हैं | यदि ये धरती, पेड़-पौधे, जीव-जंतु ही नहीं रहेंगे तो हमारे लिए जीना मुश्किल हो जाएगा | हमने ही अपनी सुविधाओं के लिए मशीनें बनाई, फैक्ट्रीयां डाली जिससे प्रदुषण हुआ और हमारा वातावरण दूषित हुआ | वनों की लगातार कटाई से वन्य पशु पक्षियों के आवास नष्ट हो गए, और इन सबके दुष्परिणाम महामारियो के रूप में  हमारे सामने हैं | 
 
हमने पर्यावरण का जो नुकसान किया हैं, हम उसकी भरपाई तो नहीं कर सकते किंतु आगे ऐसा होने से रोक सकते हैं – अधिक से अधिक वृक्ष लगाकर, प्रदुषण ना फैलाकर, प्राकृतिक संसाधनों का सीमित मात्रा में उपयोग करके, अपने स्तर पर किये गये इन छोट-छोटे प्रयासों से हम अपनी आने वाली पीढ़ी को बहुत कुछ दे सकते हैं और प्रकृति का शुक्रिया अदा कर सकते हैं |