
CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book Chapter 14 शिरीष के फूल Summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book के Chapter 14 शिरीष के फूल का पाठ सार लेकर आए हैं। यह सारांश आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे आप जान सकते हैं कि इस कहानी का विषय क्या है। इसे पढ़कर आपको को मदद मिलेगी ताकि आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। Shireesh Ke Phool Summary of CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag-2 Chapter 14
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प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ 14 ‘शिरीष के फूल’ का सारांश क्या है?
अथवा
कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ 14 ‘शिरीष के फूल’ के महत्वपूर्ण बिंदु क्या हैं?
उत्तर- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ 14 ‘शिरीष के फूल’ का सारांश-
- शिरीष के फूल का संदेश- “शिरीष के फूल” लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखा गया एक निबंध है। इस निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जिस प्रकार शिरीष का फूल आँधी, लू और भयंकर गर्मी जैसी विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी कोमलता और सुंदरता बनाए रखता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य और संयम बनाए रखते हुए आगे बढ़ते रहना चाहिए। शिरीष का फूल हमें निरंतर संघर्ष करने की प्रेरणा देता है।
- जेठ की तपती गर्मी में खिला शिरीष- लेखक इस निबंध को जेठ की भीषण गर्मी में शिरीष के पेड़ों के समूह के बीच बैठकर लिख रहे हैं, जो ऊपर से नीचे तक फूलों से लदे हुए हैं। सामान्यतः इतनी गर्मी में बहुत कम फूल खिलते हैं। अमलतास जैसे कुछ फूल अवश्य खिलते हैं, परंतु वे केवल 15–20 दिनों तक ही रहते हैं, जैसे बसंत में पलाश के फूल। जबकि शिरीष के फूल बसंत के प्रारंभ से लेकर आषाढ़ तक लंबे समय तक खिले रहते हैं।
- शिरीष- एक कालजयी अवधूत- लेखक ने शिरीष को “कालजयी अवधूत” कहा है। “कालजयी” अर्थात जिसने समय पर विजय पा ली हो और “अवधूत” अर्थात ऐसा सन्यासी जिसे सुख-दुख का कोई प्रभाव न पड़ता हो। शिरीष का फूल भी भीषण गर्मी, उमस और वर्षा के बीच समान रूप से खिला रहता है। वह हर परिस्थिति में प्रसन्न और सरस बना रहता है और हमें विपरीत परिस्थितियों में भी मस्ती के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
- शिरीष के वृक्ष और झूले की कल्पना- शिरीष के वृक्ष बड़े और छायादार होते हैं। पुराने समय में इन्हें शुभ मानकर बाग-बगीचों में लगाया जाता था। वात्स्यायन के अनुसार झूला घने और छायादार वृक्षों जैसे बकुल के पेड़ों में लगाया जाना चाहिए। लेकिन लेखक का मानना है कि शिरीष के पेड़ भी झूला झूलने के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, क्योंकि झूला झूलने वाले बच्चों और किशोरियों का वजन अधिक नहीं होता।
- शिरीष की कोमलता और उसके मजबूत फल- संस्कृत साहित्य में शिरीष के फूल को अत्यंत कोमल माना गया है। कालिदास ने कहा है कि शिरीष के फूल केवल भौंरों के पैरों का दबाव सह सकते हैं, पक्षियों का नहीं। लेखक इस विचार का विरोध नहीं करते, पर बताते हैं कि शिरीष के फल बहुत मजबूत होते हैं। वे डालियों से इतनी मजबूती से चिपके रहते हैं कि नए फल आने पर भी आसानी से नहीं गिरते और सूखकर भी खड़खड़ाते रहते हैं।
- पुराने फलों के माध्यम से नेताओं पर व्यंग्य- शिरीष के पुराने फलों को देखकर लेखक को उन नेताओं की याद आती है जो बदलते समय को नहीं पहचानते और अपने पद से चिपके रहते हैं। वे तब तक अपना स्थान नहीं छोड़ते जब तक नई पीढ़ी उन्हें धक्का देकर हटाने के लिए मजबूर न कर दे। लेखक के अनुसार पुरानी पीढ़ी को समय रहते नई पीढ़ी के लिए स्थान छोड़ देना चाहिए।
- जीवन का सत्य और समय का संघर्ष- लेखक बताते हैं कि वृद्धावस्था और मृत्यु जीवन के अटल सत्य हैं। जैसे शिरीष का फल जब खिलता है तो उसका झड़ना भी निश्चित होता है। मृत्यु के देवता निरंतर अपना कार्य करते रहते हैं। जो कमजोर हैं वे समाप्त हो जाते हैं और जिनमें जीवन शक्ति होती है वे कुछ समय तक टिके रहते हैं। जीवन में समय के साथ संघर्ष चलता रहता है।
- शिरीष का सन्यासी जैसा स्वभाव- लेखक शिरीष को एक सन्यासी के समान मानते हैं। उसे न सुख की चिंता है और न दुख की। भयंकर गर्मी और लू के बीच भी वह अपने लिए जीवन-रस ढूंढ़ लेता है और अपनी मस्ती में मस्त रहता है। एक वनस्पति शास्त्री के अनुसार वह वायुमंडल से अपना रस खींचता है, इसलिए इतनी कठिन परिस्थितियों में भी वह खिलता रहता है।
- सच्चे कवि का स्वरूप- लेखक शिरीष की तुलना संतों और कवियों से करते हैं। वे कबीर और कालिदास को शिरीष की तरह मस्त और फक्कड़ मानते हैं। उनके अनुसार सच्चा कवि वही है जो अनासक्त योगी की तरह शांत और स्थिर हो। सुमित्रानंदन पंत और रबीन्द्रनाथ टैगोर में भी ऐसी ही प्रकृति दिखाई देती है।
- कालिदास और सौंदर्य की अनुभूति- कालिदास ने शकुंतला के सौंदर्य का वर्णन किया है, पर लेखक मानते हैं कि वह केवल बाहरी सौंदर्य नहीं बल्कि कालिदास के हृदय की सुंदरता है। जब राजा दुष्यंत ने शकुंतला का चित्र बनाया तो उन्हें उसमें कमी महसूस हुई, क्योंकि वे शकुंतला के कानों में शिरीष का फूल लगाना भूल गए थे। इससे स्पष्ट होता है कि कालिदास सौंदर्य के आंतरिक रूप को पहचानने में समर्थ थे।
- गांधीजी और शिरीष की समानता- अंत में लेखक कहते हैं कि आज देश में चारों ओर हिंसा, लूटपाट और अशांति का वातावरण है। ऐसे समय में भी स्थिर और शांत रहना कठिन है, पर शिरीष ऐसा कर सकता है। महात्मा गाँधी भी ऐसे ही आत्मबल वाले सन्यासी थे, जिन्होंने अपने आत्मबल से अँग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन चलाए और देश की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेखक को आज ऐसे ही आदर्शों की कमी महसूस होती है।
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