
CBSE Class 12 Hindi Chapter 2 “Patang”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Aroh Bhag 2 Book
इस पोस्ट में हम आपके लिए CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag 2 Book के Chapter 2 में आलोक धन्वा द्वारा रचित कविता पतंग का पाठ सार, व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं। यह सारांश और व्याख्या आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे आप जान सकते हैं कि इस कविता का विषय क्या है। इसे पढ़कर आपको को मदद मिलेगी ताकि आप इस कविता के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। Alok Dhanwa Poem Patang Summary, Explanation, Difficult word meanings of CBSE Class 12 Hindi Aroh Bhag-2 Chapter 2.
- कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक, पाठ 2 ‘पतंग’ पाठ का साराँश अपने शब्दों में लिखिए।
- Patang Explanation
- ‘पतंग’ पाठ में शरद ऋतु का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
- हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ में “सबसे तेज बौछारें गई भादो गया” से कवि का क्या आशय है?
- कक्षा 12, हिंदी- आरोह, भाग-2 पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ में सबसे तेज बौछारें कब गई?
- कक्षा 12 की हिंदी की पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में लाल सवेरा को कैसे कहा गया है?
- कक्षा 12 की हिंदी की पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में भादो किसका प्रतीक है?
- कक्षा 12 के हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में किसका सुंदर चित्रण किया गया है?
- कक्षा 12, हिंदी- आरोह, भाग-2 पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ के अनुसार दुनिया की सबसे रंगीन और हल्की चीज क्या है?
- कक्षा 12, हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में कवि ने बच्चों की तुलना किससे की है और क्यों?
- कक्षा 12, हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक पाठ 2 ‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने बाल मनोविज्ञान का चित्रण कैसे किया है?
- ‘पतंग’ पाठ के आधार पर बताइए कि बच्चों को कपास की तरह कोमल और उनके पैरों को बेचैन क्यों कहा गया है?
- कक्षा 12, हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक पाठ 2 ‘पतंग’ में पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ बच्चों को कैसे थाम लेती हैं?
- जब पतंग सामने हो तो छत पर दौड़ते हुए क्या बच्चों को छत कठोर लगती है?
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कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक, पाठ 2 ‘पतंग’ पाठ का साराँश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
कक्षा 12 हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक, पाठ 2 ‘पतंग’ कविता का मूल भाव क्या है?
उत्तर-
कक्षा 12, हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक, पाठ 2 ‘पतंग’ कविता का मूल भाव
- कविता का परिचय- ‘पतंग’ कविता आलोक धन्वा के एकमात्र काव्य-संग्रह का हिस्सा है। यह एक लंबी कविता है, जिसका तीसरा भाग पाठ्यपुस्तक में संकलित है। इस कविता में पतंग के माध्यम से बच्चों की इच्छाओं, उमंगों और कल्पनाओं का अत्यंत सुंदर चित्रण किया गया है।
- ऋतुओं का परिवर्तन और शरद का आगमन- इस कविता में कवि बताते हैं कि सावन और भादो की वर्षा समाप्त हो चुकी है। इन महीनों में आकाश बादलों से ढका रहता है, परंतु शरद ऋतु के आते ही आकाश साफ, स्वच्छ और निर्मल हो जाता है। सुबह की लालिमा कवि को खरगोश की आँखों जैसी लाल दिखाई देती है। शरद कई ऋतुओं (पुलों) को पार करके आती है।
- शरद ऋतु का मानवीकरण- कवि ने शरद ऋतु को एक बालक के रूप में प्रस्तुत किया है। वह अपने चमकीले संकेतों से बच्चों को पतंग उड़ाने के लिए बुलाती है। शरद आकाश को मुलायम बना देती है, ताकि बच्चों की पतंगें आसानी से ऊँचाइयों तक उड़ सकें।
- बच्चों की कल्पनाएँ और पतंग- शरद ऋतु में केवल पतंगें ही नहीं उड़तीं, बल्कि बच्चों की कल्पनाएँ और सपने भी आकाश में उड़ते हैं। बच्चे पतंग के सहारे अपनी भावनाओं और इच्छाओं को ऊँचाइयों तक पहुँचा देते हैं।
- बच्चों की निर्मलता और कोमलता- कवि बच्चों की तुलना कपास से करते हैं। जैसे कपास सफेद, मुलायम और शुद्ध होती है, वैसे ही बच्चे भी जन्म से निर्मल, कोमल और पवित्र भावनाएँ लेकर आते हैं। उनका मन स्वच्छ और निष्कलंक होता है।
- उत्साह, रोमांच और जोखिम- पतंग उड़ाते समय बच्चे अत्यंत उत्साहित हो जाते हैं। वे चारों दिशाओं में दौड़ते हैं, मानो ढोल-नगाड़ों पर नाच रहे हों। कभी-कभी वे ऊँची छतों के किनारों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ गिरने का खतरा रहता है। फिर भी उनके शरीर का लचीलापन उन्हें बचा लेता है।
- निडरता और आत्मविश्वास- यदि बच्चे गिर भी जाते हैं और अधिक चोट नहीं लगती, तो वे और अधिक निडर हो जाते हैं। उनके मन से डर समाप्त हो जाता है और उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। वे दोगुने उत्साह और साहस के साथ फिर से पतंग उड़ाने लगते हैं।
- बचपन की ऊर्जा और जीवन का उत्सव- बच्चों का जोश और ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि ऐसा प्रतीत होता है मानो उनके पैरों के चारों ओर पृथ्वी और भी तेज़ी से घूम रही हो। इस प्रकार कविता में बचपन की उमंग, साहस और स्वतंत्रता का उत्सव मनाया गया है।
पतंग कविता की व्याख्या (Patang Explanation)
काव्यांश 1 –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादों गया
सवेरा हुआ
ख़रगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर–ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
कठिन शब्द –
बौछार – झड़ी, हवा के झोंके से तिरछी होकर गिरने वाली बूँदे
भादों – भाद्र मास, सावन के बाद आने वाला महीना
सवेरा – सुबह, प्रातःकाल, प्रभात
शरद – पतझड़
पुल – सेतु
चमकीला – चमकदार
इशारा – संकेत
पतंग – कनकैया
झुंड – भीड़, दल, जमघट
व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि सावन के महीने में आने वाली तेज़ बारिशें भी चली गई हैं और भादो का महीना भी बीत गया है। कवि कहता है कि अंधेरी रात बीत गई है और सुहानी सुबह हो गयी हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि सावन और भादो के महीनों में आसमान में बादल छाये रहते हैं। लेकिन शरद ऋतु के आते ही आसमान एकदम साफ, स्वच्छ व निर्मल हो जाता हैं। इसी कारण कवि सवेरा होने की बात करता है। शरद ऋतु की सुबह का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि शरद ऋतु की सुबह आकाश में जो लालिमा होती है उसको देखकर कवि को प्रतीत हो रहा है जैसे वो खरगोश की लाल–लाल आंखें हों कहने का तात्पर्य यह है कि शरद ऋतु में सुबह के समय आकाश में छाई हुई लालिमा कवि को खरगोश की आँखों की भांति लाल दिखाई दे रही हैं।
कवि कहता है कि शरद ऋतु कई पुलों को पार करते हुए आई है अर्थात पिछले साल की शरद ऋतु के जाने से इस साल की शरद ऋतु के आने तक कई ऋतुएँ बीती हैं, इन्हीं ऋतुओं को कवि ने पुल का नाम दिया है।
कवि कहता है कि ऐसा प्रतीत होता है कि शरद ऋतु में दोपहर का समय किसी चमकीली साइकिल पर सवार होकर तेज़ी से गुज़र रहा हो और ज़ोर–ज़ोर से घंटी बजाते हुए बच्चों को इशारे से पतंग उड़ाने के लिए बुला रहा हो। कहने का तात्पर्य यह है कि शरद ऋतु में मौसम एकदम सुहाना हो जाता है जिसे देखकर बच्चों के समूह पतंग उड़ाने के लिए अपने घरों से बाहर निकल आते हैं।
‘पतंग’ कविता के काव्यांश पर आधारित कुछ प्रश्न –
प्रश्न – ‘पतंग’ पाठ में शरद ऋतु का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
अथवा
कक्षा 12, हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ में शरद ऋतु के आगमन का कवि ने किस रूप में वर्णन किया है?
उत्तर- ‘पतंग’ पाठ में कवि आलोक धन्वा ने शरद ऋतु का अत्यंत सुंदर और जीवंत चित्रण किया है। कवि बताते हैं कि सावन की तेज वर्षा और भादो का महीना बीत जाने के बाद शरद ऋतु आती है। इसके आगमन से आकाश साफ, स्वच्छ और निर्मल हो जाता है।
कवि ने शरद की सुबह को ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा’ कहा है, जिससे आकाश की लालिमा का सुंदर चित्र उभरता है। उन्होंने शरद ऋतु को मानो एक चमकीली साइकिल पर सवार बताया है, जो तेज़ी से चलता हुआ और घंटी बजाता हुआ बच्चों को पतंग उड़ाने के लिए बुला रहा हो।
अर्थात शरद ऋतु का आगमन मौसम को सुहावना, उज्ज्वल और आनंदमय बना देता है, जिससे बच्चे उत्साहपूर्वक पतंग उड़ाने के लिए बाहर निकल आते हैं।
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प्रश्न – हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ में “सबसे तेज बौछारें गई भादो गया” से कवि का क्या आशय है?
उत्तर- ‘पतंग’ कविता में कवि “सबसे तेज़ बौछारें गई भादो गया” पंक्ति के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि सावन और भादो के महीने समाप्त हो चुके हैं। इन महीनों में होने वाली तेज वर्षा और बादलों का समय अब बीत गया है।
अर्थात वर्षा ऋतु समाप्त हो चुकी है और उसके बाद शरद ऋतु का आगमन हो गया है। अब आकाश साफ, स्वच्छ और निर्मल हो गया है तथा सुहानी सुबह हो चुकी है। इस पंक्ति के माध्यम से कवि वर्षा ऋतु के अंत और शरद ऋतु के आगमन का संकेत देते हैं।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी- आरोह, भाग-2 पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ में सबसे तेज बौछारें कब गई?
उत्तर- पतंग कविता के अनुसार सबसे तेज बौछारें सावन के महीने में आती हैं और वे सावन के समाप्त होने पर चली जाती हैं। कवि कहता है कि सावन की तेज बौछारें बीत गईं और भादो का महीना भी गुजर गया, तब शरद ऋतु का आगमन हुआ।
प्रश्न – कक्षा 12 की हिंदी की पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में लाल सवेरा को कैसे कहा गया है?
उत्तर- ‘पतंग’ कविता में लाल सवेरा को “ख़रगोश की आँखों जैसा” कहा गया है। कवि ने शरद ऋतु की सुबह के आकाश में फैली लालिमा की तुलना खरगोश की लाल-लाल आँखों से की है। अर्थात् शरद ऋतु की सुबह का सवेरा बहुत लाल और चमकीला दिखाई देता है, जो कवि को खरगोश की आँखों जैसा प्रतीत होता है।
प्रश्न – कक्षा 12 की हिंदी की पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में भादो किसका प्रतीक है?
उत्तर- पतंग कविता में भादो वर्षा ऋतु (बरसात के मौसम) का प्रतीक है। भादो का महीना सावन के बाद आता है और इस समय आकाश में बादल छाए रहते हैं तथा वर्षा होती है। कविता में भादो के बीत जाने का अर्थ है कि वर्षा ऋतु समाप्त हो गई है और अब शरद ऋतु का आगमन हो रहा है। अतः भादो यहाँ बरसात, बादलों और उदासी भरे मौसम का प्रतीक है, जिसके बाद स्वच्छ और निर्मल आकाश वाला सुहाना समय आता है।
काव्यांश 2 –
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके–
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला काग़ज़ उड़ सके–
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके–
कि शुरू हो सके सीटियों , किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़ुक दुनिया
कठिन शब्द –
मुलायम – कोमल
कमानी – लचीली एवं झुकाई गई लोहे की कीली, स्प्रिंग
किलकारियाँ – बच्चों का खुशी से चिल्लाना
नाज़ुक – कोमल, सुकुमार, मृदु
व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहता है कि शरद ऋतु में आकाश एकदम साफ, स्वच्छ और मौसम सुहाना हो जाता है और ऐसा निर्मल आकाश कवि को मुलायम प्रतीत होता है। कवि शरद ऋतु को बालक की संज्ञा देते हुए कहता है कि बालक शरद अपने चमकीले इशारों से बच्चों के समूह को पतंग उड़ाने के लिए बुलाता है। उसने आकाश को मुलायम बना दिया हैं ताकि बच्चों की पतंग आसमान में आसानी से बहुत ऊंची उड़ सके। ऐसा लगता है जैसे शरद ऋतु भी खुद यही चाहती हैं कि दुनिया की सबसे हल्की और रंगीन पतंग आसमान में ऊंची उड़ सके, दुनिया के सबसे पतले काग़ज़ और बाँस की सबसे पतली लचीली एवं झुकाई गई लोहे की कीली से बनी पतंग आसमान में ऊंची उड़ सके और पतंग उड़ाते, प्रसन्नता से इधर उधर भागते हुए, खुशियों से चिल्लाते हुए और खुशी से सीटियां बजाते हुए तितलियों की तरह कोमल बच्चों की एक नई दुनिया शुरू हो सके। कहने का तात्पर्य यह है कि शरद ऋतु में आसमान में पतंगों के साथ–साथ बच्चों की अपनी कल्पनाएं भी आसमान में उड़ती हैं।
‘पतंग’ कविता के काव्यांश पर आधारित कुछ प्रश्न –
प्रश्न -कक्षा 12 के हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में किसका सुंदर चित्रण किया गया है?
उत्तर- पतंग कविता में बच्चों के उत्साह, कल्पनाशीलता और बाल मनोविज्ञान का सुंदर चित्रण किया गया है। कवि ने पतंग उड़ाने के माध्यम से बच्चों की चंचलता, साहस, निडरता और उनकी कोमल भावनाओं को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। इसके साथ-साथ शरद ऋतु के स्वच्छ आकाश, प्रकृति की सुंदरता और बच्चों की आनंदमयी दुनिया का भी बहुत मनोहर चित्रण किया गया है।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी- आरोह, भाग-2 पुस्तक के पाठ 2 ‘पतंग’ के अनुसार दुनिया की सबसे रंगीन और हल्की चीज क्या है?
उत्तर- ‘पतंग’ पाठ के अनुसार दुनिया की सबसे रंगीन और हल्की चीज पतंग को कहा गया है।
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काव्यांश 3 –
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अक्सर
कठिन शब्द –
कपास – एक प्रसिद्ध पौधा जिसके फल से रूई निकलती है
बेचैन – व्याकुल, बेकल
बेसुध – अचेत, बेहोश
नरम – मुलायम, कोमल, मृदुल
मृदंग – तबला, ढोलक, तम्बूरा
लचीला – मुड़नेवाला
वेग – गति, संवेग, चाल, तेज़ी, रफ़्तार
अक्सर – प्रायः
व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि बच्चों की तुलना कपास से करते हुए कहते हैं कि जिस तरह कपास मुलायम, शुद्ध और सफेद होती हैं। ठीक उसी प्रकार बच्चे भी जन्म से ही अपने साथ निर्मलता, कोमलता लेकर आते हैं अर्थात बच्चों का मन व भावनाएं भी स्वच्छ, कोमल और पवित्र होती हैं। कवि कहते हैं कि जब बच्चे व्याकुलता के साथ पतंग के पीछे भागते हैं तो ऐसा लगता हैं जैसे कि पृथ्वी भी घूम–घूमकर उनके आस–पास आ रही है। कवि आगे कहते हैं कि बच्चे जब बेसुध होकर पतंग के पीछे भागते हैं तो उन्हें भागते हुए छत की कठोरता अर्थात कठोर जमीन का एहसास भी नहीं होता हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जब बच्चे पतंग को आकाश में उड़ता हुआ देखकर उसके पीछे भागते हैं तो उन्हें उस वक्त कठोर जमीन भी नरम ही महसूस होती हैं। पतंग उड़ाते हुए बच्चे इतने उत्साहित होते हैं कि वे चारों दिशाओं ने ऐसे दौड़ते–भागते हैं जैसे कोई ढोल–नगाड़ों पर झूमकर नाचता हो। दौड़ते हुए बच्चे इधर–उधर ऐसे भागते हैं जैसे किसी पेड़ की लचीली डाल हो। क्योंकि जिस तरह पेड़ की डाल लचीली होने के कारण जोर से खींचने पर भी वापिस अपनी जगह पर सही सलामत आ जाती है उसी प्रकार दौड़ते–भागते बच्चों का लचीला शरीर फुर्ती से इधर–उधर भागते हुए भी एक जगह से दूसरी जगह और फिर पुनः अपनी पहली वाली अवस्था में सुरक्षित आ जाता है।
‘पतंग’ कविता के काव्यांश पर आधारित कुछ प्रश्न –
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी के पाठ 2 ‘पतंग’ कविता में कवि ने बच्चों की तुलना किससे की है और क्यों?
उत्तर- पतंग कविता में कवि (आलोक धन्वा) ने बच्चों की तुलना कपास और पेड़ की लचीली डाल से की है। कवि बच्चों की तुलना कपास से इसलिए करते हैं क्योंकि कपास की तरह बच्चे भी जन्म से ही कोमल, निर्मल और पवित्र होते हैं। उनका मन स्वच्छ और भावनाएँ शुद्ध होती हैं।
इसके अतिरिक्त कवि ने बच्चों की तुलना पेड़ की लचीली डाल से की है, क्योंकि जिस प्रकार पेड़ की डाल लचीली होने के कारण झुककर भी फिर अपनी स्थिति में आ जाती है, उसी प्रकार बच्चों का शरीर भी लचीला और फुर्तीला होता है। वे दौड़ते-भागते हुए गिरने के बाद भी जल्दी संभल जाते हैं।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक पाठ 2 ‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने बाल मनोविज्ञान का चित्रण कैसे किया है?
उत्तर- ‘पतंग’ कविता में कवि ने बाल मनोविज्ञान का अत्यंत सुंदर और जीवंत चित्रण किया है। उन्होंने बच्चों के स्वभाव, उत्साह, कल्पनाशक्ति, निडरता और कोमलता को पतंग उड़ाने के माध्यम से व्यक्त किया है।
कवि बताते हैं कि बच्चे जन्म से ही कोमल और निर्मल होते हैं। वे पतंग उड़ाते समय अत्यंत उत्साहित और बेसुध होकर दौड़ते हैं। उनके भीतर असीम ऊर्जा और रोमांच भरा होता है। ऊँची छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँचकर भी वे डरते नहीं, बल्कि गिरकर संभल जाने पर और अधिक निडर हो जाते हैं।
प्रश्न – ‘पतंग’ पाठ के आधार पर बताइए कि बच्चों को कपास की तरह कोमल और उनके पैरों को बेचैन क्यों कहा गया है?
उत्तर- पतंग कविता में कवि ने बच्चों को कपास की तरह कोमल इसलिए कहा है क्योंकि कपास मुलायम, स्वच्छ और शुद्ध होती है। उसी प्रकार बच्चे भी जन्म से ही निर्मलता, मासूमियत और कोमल हृदय लेकर आते हैं।
उनके पैरों को बेचैन इसलिए कहा गया है क्योंकि पतंग उड़ाते समय बच्चों के भीतर अपार उत्साह, रोमांच और ऊर्जा भर जाती है। वे पतंग के पीछे भागते-दौड़ते इतने मग्न हो जाते हैं कि उन्हें स्थिर रहना अच्छा नहीं लगता। उनकी यही चंचलता और ऊँचाइयों को छूने की ललक उनके पैरों को ‘बेचैन’ बनाती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो उनकी गति के साथ पृथ्वी भी तेजी से घूम रही हो।
काव्यांश 4 –
छतों के खतरनाक किनारों तक–
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ़ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ–साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास
कठिन शब्द –
खतरनाक – संकटमय, जोखिमभरा, जोखिम वाला
रोमांचित – जिसे रोमांच हो आया हो, पुलकित
थाम – विराम, रोक, अवरोध, पकड़
महज़ – केवल, निरा, सिर्फ़, मात्र
रंध्र – सूराख, छेद
निडर – भय–हीन
सुनहले – स्वर्णिम, सोने के रंग का, सोने का सा, पीला
व्याख्या – उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि बच्चे पतंग के पीछे दौड़ते–भागते ऊँचे छतों के जोखिमभरे किनारों तक पहुंच जाते हैं। दौड़ते हुए बच्चे उन छतों से गिर भी सकते हैं लेकिन पतंग उड़ाते समय उनके रोमांचित शरीर का लचीलापन ही उनको छतों से नीचे गिरने से बचाता हैं। किसी की भी धड़कन बढ़ा देने वाली ऊंचाईयों तक बच्चे पतंगों की डोर अपने हाथों में थाम कर पतंग उड़ाते हैं। और बच्चे सिर्फ एक धागे के सहारे उस पतंग को और अपने आप को संतुलित कर लेते हैं। अर्थात बच्चे अपने आप को भी उसी डोर के सहारे गिरने से बचा लेते हैं। कवि कहते हैं कि पतंग उड़ाते इन बच्चों को देखकर ऐसा लगता है जैसे पतंग के साथ–साथ वो भी खुद भी उड़ रहे हो। कहने का अभिप्राय यह है कि बच्चे अपनी कल्पनाओं व् भावनाओं को पतंग के सहारे ऊंचाइयों तक पहुंचा देते हैं।
आगे कवि कहते हैं कि पतंग उड़ाते हुए कभी – कभी ये बच्चे छतों के भयानक किनारों से नीचे गिर भी जाते हैं और लचीले शरीर के कारण ज्यादा चोट न लगने पर बच भी जाते हैं। इस तरह बच जाने से वे और भी ज्यादा भय–हीन हो जाते हैं अर्थात उनके अंदर आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है। उनके अंदर से गिरने का डर बिलकुल खत्म हो जाता हैं और वो अत्यधिक उत्साह, साहस व निडरता के साथ फिर से छत पर आकर पतंग उड़ाने लगते हैं। उनका यह दोगुना जोश देखकर फिर तो ऐसा लगने लगता है कि जैसे दौड़ते–भागते बच्चों के पैरों के चारों ओर पृथ्वी और अधिक तेजी से घूम रही हो।
‘पतंग’ कविता के काव्यांश पर आधारित कुछ प्रश्न –
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह भाग-2 पुस्तक पाठ 2 ‘पतंग’ में पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ बच्चों को कैसे थाम लेती हैं?
उत्तर- पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ बच्चों को केवल एक धागे के सहारे थाम लेती हैं। बच्चे जब ऊँची छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँच जाते हैं, तब पतंग की डोर उनके हाथ में रहती है। उसी डोर के सहारे वे पतंग को भी संभालते हैं और स्वयं को भी संतुलित कर लेते हैं। पतंग उड़ाते समय उनका रोमांच और उत्साह उन्हें गिरने से बचाता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पतंग के साथ-साथ स्वयं भी उड़ रहे हों और उसी डोर के सहारे ऊँचाइयों से जुड़े हुए हों।
प्रश्न – जब पतंग सामने हो तो छत पर दौड़ते हुए क्या बच्चों को छत कठोर लगती है?
उत्तर- पतंग कविता के अनुसार जब पतंग सामने होती है और बच्चे उसे उड़ाने के उत्साह में छत पर दौड़ते हैं, तब उन्हें छत कठोर नहीं लगती।
पतंग उड़ाते समय उनके शरीर में इतना रोमांच और उत्साह होता है कि वे छतों के खतरनाक किनारों तक पहुँच जाते हैं, फिर भी उन्हें भय या कठोरता का अनुभव नहीं होता। उनके रोमांचित और लचीले शरीर का उत्साह ही उन्हें गिरने से बचाता है। इसलिए उस समय बच्चों को छत की कठोरता का आभास नहीं होता।
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