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Pani ki Kahani Class 8 Chapter 16 Summary, Explanation, Question Answers

Pani ki Kahani ‘पानी की कहानी’ Summary, Explanation, Question and Answers

 

कक्षा 8 पाठ 16

“पानी की कहानी”

लेखक – रामचंद्र तिवारी

pani ki kahani

 

पाठ प्रवेश –

लेखक रामचंद्र तिवारी इस लेख में ओस की बूँद को ज़रिया बनाया है कि किस तरह से पानी का रूप होता है? उसकी किस तरह से रचना होती है? उनमें कौन-कौन से तत्व शामिल होते हैं? यही सब पाठ में बताया गया है। पानी के जीवन का एक चक्र होता है। समुद्र का पानी सूर्य की किरणों से गर्म होकर भाप बनता है। और भाप बादल बन जाता है। यही सब क्रिया के बारे में आप विज्ञान के अध्यायों में पढ़ते हैं कि पानी के जीवन का एक चक्र होता है। किस तरह से समुद्र का पानी भाप बनकर सूर्य की गर्मी के कारण गर्म होकर भाप बन जाता है? और वाष्प बादल बन जाता है। ऊपर आसमान में जाकर काफी ऊँचाई पर पहुँच जाने पर वह बादल का रूप ले लेता है। और जब बादल बरसते है तो कुछ पानी धरती में रिस जाने के कारण उसमें चला जाता है और कुछ नदी-नालों में बह जाता है। नदियों का पानी फिर समुद्र में मिल जाता है। इस प्रकार पानी का यह चक्र चलता रहता है। किस तरह से पानी सूर्य की गर्मी के कारण वाष्प बन गया, फिर बादल बन गया, बादल के अंदर जब ज्यादा मात्रा में इकट्ठा हो जाता है तो फिर वह वर्षा बनकर धरती पर बरस पड़ता है और पानी कहाँ-कहाँ गुजरता है? कभी वह नदियों में मिल जाता है, फिर समुद्र में मिल जाता है, इस तरह से यह पानी का चक्र चलता रहता है।

 

पानी की कहानी – व्याख्या –

मैं आगे बढ़ा ही था कि बेर की झाड़ी पर से मोती-सी एक बूँद मेरे हाथ पर आ पड़ी। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि ओस की बूँद मेरी कलाई पर से सरक कर हथेली पर आ गई।

आश्चर्य का ठिकाना न रहा – हैरानी का अंत न होना

कलाई – हाथ का अगला हिस्सा

लेखक कहते हैं कि किसी काम से वह रास्ते पर जा रहे थे कि बेर की झाड़ी पर से मोती-सी एक बूँद लेखक के हाथों पर आ पड़ी। तो जब लेखक ने देखा कि ओंस की बूँद उनकी कलाई पर आकर गिर गई है और कलाई से सरक कर हथेली पर आ गई है तो ओंस की इस बूँद को देखकर वो हैरान हो उठे कि कोई बूँद पेड़ पर से आकर उनके हाथ पर कैसे गिर सकती है, यह जानने के लिए उनकी जिज्ञासा जाग उठी।

मेरी दृष्टि पड़ते ही वह ठहर गई। थोड़ी देर में मुझे सितार के तारों की-सी झंकार सुनाई देने लगी। मैंने सोचा कि कोई बजा रहा होगा। चारों ओर देखा। कोई नहीं।

दृष्टि – नज़र

जैसे ही लेखक की नज़र ओंस की बूंद पर पड़ी वह ठहर गई। थोड़ी देर में लेखक को सितार के तारों की तरह कुछ संगीत सा सुनाई देने लगा। लेखक ने सोचा कि कोई सितार बजा रहा होगा। उन्होंने चारों ओर देखा पर वहाँ कोई नहीं था जो सितार बजा रहा हो।

फिर अनुभव हुआ कि यह स्वर मेरी हथेली से निकल रहा है। ध्यान से देखने पर मालूम हुआ कि बूँद के दो कण हो गए हैं और वे दोनों हिल-हिलकर यह स्वर उत्पन्न कर रहे हैं मानो बोल रहे हों।

स्वर – आवाज

कण – बहुत छोटा अंश

लेखक को यह एहसास हुआ कि यह आवाज उन्हीं की हथेली से निकल रही है। ध्यान से देखने पर लेखक को मालूम हुआ कि जो उनकी हथेली पर एक बूँद गिरी थी अब वह दो हिस्से में बँट  गई थी, और वे दोनों हिल-हिलकर ऐसी आवाज पैदा कर रही थी, ऐसा लग रहा था दोंनो बूँदे आपस में बातचीत कर रही हो।

उसी सुरीली आवाज़ में मैंने सुना- “सुनो, सुनो…’’ मैं चुप था।

फिर आवाज़ आई, “सुनो, सुनो।’’

अब मुझसे न रहा गया। मेरे मुख से निकल गया, “कहो, कहो।’’

सुरीली – मधुर ध्वनि

मुख – मुँह

अब लेखक को यह एहसास हुआ कि दो बूंदे मधुर ध्वनि में आपस में बातचीत कर रही हैं, उन्हें लग रहा था जैसे वो बूंदें उनसे कुछ कहना चाह रही है क्योंकि उन्हें सुनो, सुनो ऐसी आवाज आई, लेकिन लेखक ने कुछ नहीं कहा। फिर लेखक को दोबारा आवाज आई, सुनो, सुनो। अब लेखक से न रहा गया। अब उत्सुकता वश लेखक के मुँह से निकल गया, कहो, कहो। 

ओस की बूँद मानो प्रसन्नता से हिली और बोली- ’’मैं ओस हूँ।’’

“जानता हूँ’’- मैंने कहा।

“लोग मुझे पानी कहते हैं, जल भी।’’

“मालूम है।’’

“मैं बेर के पेड़ में से आई हूँ।’’

मालूम – जानना

लेखक ने जैसे ही ओंस की बूंद से बात करने लगा ओस की बूँद मानो खुशी से हिली और बोली कि वह एक ओंस है। लेखक ने कहा कि उन्हें पता है कि वह ओंस है। ओंस ने आगे कहा कि लोग उसके इस रूप को पानी के नाम से भी जानते हैं और जल के नाम से भी। यह जानकारी ओंस ने जब लेखक को दी तो लेखक ने कहा कि उन्हें यह भी पहले से ही पता है। अब ओस की बूँद अपने बारे में बताती है कि वह लेखक की हथेली पर बेर के पेड़ से आई है।

“झूठी,’’ मैंने कहा और सोचा, ‘बेर के पेड़ से क्या पानी का फव्वारा निकलता है?’ 

बूँद फिर हिली। मानो मेरे अविश्वास से उसे दुख हुआ हो। 

“सुनो मैं इस पेड़़ के पास की भूमि में बहुत दिनों से इधर-उधर घूम रही थी। मैं कणों का हृदय टटोलती फिरती थी कि एकाएक पकड़ी गई।’’

फव्वारा – पानी की ऊँची धारा

भूमि – धरती

टटोलती – ढूंढती

एकाएक – अचानक

जब ओंस की बूंद ने लेखक को बताया कि वह बेर की झाड़ी से उसके हाथ पर आई है तो लेखक ने उससे कहा कि वह झूठी है क्योंकि बेर के पेड़ पर कोई पानी की ऊँची धार नहीं है जो वह वहाँ थी और लेखक के हाथ पर आ गिरी। बूँद फिर हिली क्योंकि उसे लगा की लेखक को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ तो उसे इस बात का दुख भी हुआ। बूंद ने फिर कहा कि वह इस पेड़़ के पास की भूमि में बहुत दिनों से इधर-उधर घूम रही थी और कणों का हृदय जो टटोलती हुई ईधर-उधर फिर रही थी कि अचानक पकड़ी गई। 

“कैसे,’’ मैंने पूछा।

“वह जो पेड़ तुम देखते हो न! वह ऊपर ही इतना बड़ा नहीं है, पृथ्वी में भी लगभग इतना ही बड़ा है। उसकी बड़ी जड़ें, छोटी जड़ें और जड़ों के रोएँ हैं। वे रोएँ बड़े निर्दयी होते हैं।

जड़ें – मूल

रोएँ – रेशेदार जड़

निर्दयी – जिनमें दया न हो

बूंद के पकड़े जाने की बात सुनकर लेखक ने इसका कारण पूछा तो ओस की बूँद कहती है कि यह जो पेड़ लेखक देख रहा है, वह ऊपर से जितना बड़ा नजर आता है, वह उतना ही जमींन के अन्दर भी है। उसकी बड़ी जड़ें, छोटी जड़ें जमींन के अन्दर दूर तक फैली होती है और जड़ों के रोएँ हैं। वे रोएँ बड़े निर्दयी होते हैं। जिनमें बिलकुल भी दया नहीं होती। 

मुझ जैसे असंख्य जल-कणों को वे बलपूर्वक पृथ्वी में से खींच लेते हैं। कुछ को तो पेड़ एकदम खा जाते हैं और अधिकांश का सब कुछ छीनकर उन्हें बाहर निकाल देते हैं।’’ क्रोध और घृणा से उसका शरीर काँप उठा।

असंख्य – बहुत सारे

बलपूर्वक – मजबूर करना

अधिकांश – ज्यादातर

क्रोध – गुस्सा

घृणा – नफरत

बून्द लेखक से कहती है कि उसके जैसे बहुत सारे जल-कणों को वे रोएँ बलपूर्वक पृथ्वी में से खींच लेते हैं। कुछ को तो पेड़ एकदम खा जाते हैं और ज्यादातर पानी के जो कण हैं वो अपने असस्तिव को खो देते है और उनका सब कुछ छीन जाता है और पेड़ के द्वारा उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, यानी के वह अपना रूप खो देते हैं। लेखक कहते हैं कि जब ओंस की बून्द ये सब बता रही थी तब उसका शरीर क्रोध और घृणा से काँप रहा था।

“तुम क्या समझते हो कि वे इतने बडे़ यों ही खड़े हैं। उन्हें इतना बड़ा बनाने के लिए मेरे असंख्य बंधुओं ने अपने प्राण-नाश किए हैं।’’ मैं बड़े ध्यान से उसकी कहानी सुन रहा था।

असंख्य – बहुत सारे

बंधुओं – भाइयों/साथी

प्राण-नाश – मारे गए

बून्द ने आगे लेखक को बताया कि वह क्या समझता है कि ये पेड़ ऐसे ही इतने बड़े हो गए। इन्हें इतना बड़ा बनाने के लिए उसके बहुत सारे बंधुओं ने अपने प्राण-नाश किए हैं अर्थात् पेड़ को पनपने के लिए पानी की जरूरत होती है, इस तरह से ओस पेड़ के बारे में बताती है कि पेड़ों का जो विकास है, उसमें उन जल कणों का बहुत ही बड़ा योगदान है। लेखक कहते हैं कि यह कहानी इतनी रोचक होती जा रही थी कि वे उसे बहुत ही ध्यान से मन लगाकर सुन रहे थे।

“हाँ, तो मैं भूमि के खनिजों को अपने शरीर में घुलाकर आनंद से फिर रही थी कि दुर्भाग्यवश एक रोएँ से मेरा शरीर छू गया। मैं काँपी। दूर भागने का प्रयत्न किया परंतु वे पकड़कर छोड़ना नहीं जानते। मैं रोएँ में खींच ली गई।’’ 

“फिर क्या हुआ?’’ मैंने पूछा। मेरी उत्सुकता बढ़ चली थी।

भूमि – ज़मीन

खनिजों – पोशक तत्व

दुर्भाग्यवश – बुरी किस्मत

प्रयत्न – कोशिश

उत्सुकता – जिज्ञासा/जानने की इच्छा

बून्द लेखक को बताती है कि वह जमीन के पोषक तत्वों को अपने शरीर में घुलाकर खुशी-खुशी इधर-उधर घूम रही थी। उसकी बुरी किस्मत के कारण एक दिन वह एक रोएँ से टकारा गई। उसे घबराहाट हुई। उसने दूर भागने का प्रयत्न किया परंतु वे रोएँ पकड़कर छोड़ना नहीं जानते और वह रोएँ में खींच ली गई। अब लेखक की जिज्ञासा बढ़ चुकी थी, अब वह ओस की बूँद के बारे में और बहुत कुछ जानना चाहते थे, अतः उन्होंने ओस की बून्द से आगे पूछा कि उसके बाद उसके साथ क्या हुआ।

“मैं एक कोठरी में बंद कर दी गई। थोड़ी देर बाद ऐसा जान पड़ा कि कोई मुझे पीछे से धक्का दे रहा है और कोई मानो हाथ पकड़कर आगे को खींच रहा हो। मेरा एक भाई भी वहाँ लाया गया। उसके लिए स्थान बनाने के कारण मुझे दबाया जा रहा था।

कोठरी – छोटा कमरा

बून्द अपनी कहानी लेखक को बताते हुए कहती है कि उसे एक छोटी सी कोठरी जैसी जगह में बन्द कर दिया गया। थोड़ी देर बाद उसे ऐसा मालूम पड़ा, कि कोई उसे पीछे से धक्का दे रहा है, और कोई मानो हाथ पकड़कर आगे को खींच रहा हो। ओस कहती है कि उसका एक भाई भी वहाँ लाया गया। उस जल-कण को उसकी जगह देने के लिए ओस की बून्द को दबाया जा रहा था, उसे कुचला जा रहा था।

आगे एक और बूँद मेरा हाथ पकड़कर ऊपर खींच रही थी। मैं उन दोनों के बीच पिस चली।’’

“मैं लगभग तीन दिन तक यह साँसत भोगती रही। मैं पत्तों के नन्हें-नन्हें छेदों से होकर जैसे-तैसे जान बचाकर भागी। मैंने सोचा था कि पत्ते पर पहुँचते ही उड़ जाऊँगी।

साँसत – कष्ट

भोगती – सहन करना

बून्द आगे बताती है कि इसके बाद एक और बूँद मेरा हाथ पकड़कर ऊपर खींच रही थी। ओस को कोई पीछे से धक्का दे रहा था और कोई ऊपर खींच रहा था और ओस उन दोनों के बीच फंस गई थी। ओस की बून्द कहती है कि वह लगभग तीन दिनों तक यह कष्ट सहती रही। ओस की बूँद कहती है कि जब वह पेड़ की पत्तियों तक पहुँच गई, तो पत्तों के छोटे-छोटे छेदों से होते हुए किसी तरह जान बचाकर वह भाग गई।उसने सोचा था कि पत्ते पर पहुँचते ही उड़ जाएगी।

परंतु, बाहर निकलने पर ज्ञात हुआ कि रात होने वाली थी और सूर्य जो हमें उड़ने की शक्ति देते हैं, जा चुके हैं, और वायुमंडल में इतने जल कण उड़ रहे हैं कि मेरे लिए वहाँ स्थान नहीं है तो मैं अपने भाग्य पर भरोसा कर पत्तों पर ही सिकुड़ी पड़ी रही।

शक्ति – बल

वायुमंडल – पृथ्वी के चारों ओर का एक गोलकार आवरण 

भाग्य – किस्मत

भरोसा – विश्वास

सिकुड़ी – सिमटी

बून्द आगे कहती है कि जब वह अपनी जान बचा कर बाहर निकली तो उसे मालूम हुआ कि रात होने वाली थी और सूर्य भी अस्त हो चुका था, उड़ने की शक्ति बून्द को तभी मिल पाती है, जब सूर्य निकल आता है और उसकी ऊष्मा से वह वाष्प बनकर उड़ती है। बून्द लेखक को कहती है कि उस समय वायुमंडल में इतने जल कण उड़ रहे थे कि मेरे लिए वहाँ स्थान नहीं था, तो वह अपने भाग्य पर भरोसा करके पत्तों पर ही सिमट कर सुबह के इंतजार में पड़ी रही।

अभी जब तुम्हें देखा तो जान में जान आई और रक्षा पाने के लिए तुम्हारे हाथ पर कूद पड़ी।’’ इस दुख तथा भावपूर्ण कहानी का मुझ पर बडा़ प्रभाव पडा़। मैंने कहा- “जब तक तुम मेरे पास हो कोई पत्ता तुम्हें न छू सकेगा।’’

जान आई – निश्चिन्त होना

कूद – छलांग

भावपूर्ण – असरदार

प्रभाव – असर

ओस की बूँद लेखक को कह रही है कि जैसे ही उसने लेखक को देखा तो उसकी जान में जान आई वह निश्चित हो गई कि अब उसे कोई हानि नहीं हो सकती और अपनी रक्षा की खातिर वह लेखक के हाथ पर कूद पड़ी। जब लेखक ने ओस की बूँद की यह दुःख से भरी कहानी सुनी तो लेखक के मन पर इसका बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा। लेखक ने उसे आसवासन देते हैं कहा कि जब तक वह लेखक के पास है तब तक कोई भी उसे हानि नहीं पहुँचा सकता।

भैया, तुम्हें इसके लिए धन्यवाद है। मैं जब तक सूर्य न निकले तभी तक रक्षा चाहती हूँ। उनका दर्शन करते ही मुझमें उड़ने की शक्ति आ जाएगी। मेरा जीवन विचित्र घटनाओं से परिपूर्ण है। मैं उसकी कहानी तुम्हें सुनाऊँगी तो तुम्हारा हाथ तनिक भी न दुखेगा।

“अच्छा सुनाओ।’’

विचित्र – अनोखा

परिपूर्ण – भरा हुआ

तनिक – थोड़ा सा

जब लेखक ने ओस की बून्द को उसकी रक्षा करने का आश्वासन दिया तो बून्द ने लेखक का धन्यवाद किया और कहा कि वह केवल तब तक ही रक्षा चाहती है जब तक कि सूर्य न निकले क्योंकि सूर्य का दर्शन करते ही उसमें उड़ने की शक्ति आ जाएगी और वह उड़ जाएगी। बून्द लेखक को बताती है कि उसका जीवन बहुत ही विचित्र है, अनोखी घटनाओं से भरी हुई है। ओस की बूँद लेखक को कहानी सुनाने के बारे में कह रही है कि वह अपनी जीवन की कहानी के बारे में लेखक को बताएगी तो लेखक का हाथ थोड़ा सा भी नहीं दुखेगा या लेखक को बून्द को अपने हाथ में लेने में कोई कष्ट नहीं होगा। लेखक भी उत्साह पूर्वक बून्द के जीवन की घटनाओं को सुनने के लिए हामी भरता है। 

“बहुत दिन हुए, मेरे पुरखे हद्रजन (हाइट्रोजन) और ओषजन (ऑक्सीजन) नामक दो गैसें सूर्यमंडल में लपटों के रूप में विद्यमान (मौजूद) थीं।’’ 

“सूर्यमंडल अपने निश्चित मार्ग पर चक्कर काट रहा था। वे दिन थे जब हमारे ब्रह्मांड में उथल-पुथल हो रही थी। अनेक ग्रह और उपग्रह बन रहे थे।’’

 

पुरखे – पूर्वज

हद्रजन – हाइड्रोजन

ओषजन – ऑक्सीजन

सूर्यमंडल – सूर्य का घेरा

लपटों – दहकना/जलना

मार्ग – पथ

विद्यमान – मौजूद

ब्रह्मांड – सृष्टि 

उथल-पुथल – हलचल

ओस की बूँद लेखक को सृष्टि के निर्माण के समय से कहानी सुनाना शुरू करती है और ओस की बूँद कहती है कि उसके पूर्वज जहाँ से उसकी रचना हुई, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक दो गैसें सूर्य के घेरे में लपटों के रूप में मौजूद थी अर्थात् उस समय वह गैस के रूप में थी। सूर्यमंडल अपने निश्चित मार्ग पर चक्कर काट रहा था, वे दिन थे जब ब्रह्मांड में हलचल हो रही थी, बहुत कुछ निर्माण हो रहा था और बहुत कुछ नष्ट हो रहा था अर्थात् नए-नए ग्रहों का निर्माण शुरू हो चुका था। अनेक ग्रह और उपग्रह बन रहे थे अर्थात् ब्रह्मांड में हलचल हो रही थी और ग्रहों और उपग्रहों का निर्माण हो रहा था।

“ठहरो, क्या तुम्हारे पुरखे अब सूर्यमंडल में नहीं हैं?’’

“हैं, उनके वंशज अपनी भयावह लपटों से अब भी उनका मुख उज्ज्वल किए हुए हैं। हाँ, तो मेरे पुरखे बड़ी प्रसन्नता से सूर्य के धरातल पर नाचते रहते थे।

वंशज – वंशधर

भयावह – भयानक

उज्ज्वल – चमक

सूर्य के धरातल – सूर्य का तल

लेखक ने प्रश्न किया ओस की बूँद से प्रश्न किया कि क्या उसके पूर्वज अब सूर्यमंडल में मौजूद नहीं हैं। ओस कहती है कि जो उसके वशंधर है वे अपनी भयानक लपटों से अभी तब भी उनके मुख को उज्वलता प्रदान कर रहे हैं, चमक प्रदान कर रही है। ओस की बूँद कहती है कि उसके पुरखे बहुत ही खुशी से-प्रसन्नता से सूर्य के धरातल पर नाचते रहते थे।

एक दिन की बात है कि दूर एक प्रचंड प्रकाश-पिंड दिखाई पड़ा। उनकी आँखें चौंधियाने लगीं।

यह पिंड बड़ी तेज़ी से सूर्य की ओर बढ़ रहा था। ज्यों-ज्यों पास आता जाता था, उसका आकार बढ़ता जाता था। यह सूर्य से लाखों गुना बड़ा था।

प्रचंड – भयानक/तेज या बड़ा

प्रकाश-पिंड – आभा मंडल या उल्का

चौंधियाने – वह तेज चमक आँखों को सहन न हो

पिंड – गोला

बून्द लेखक को बताती है कि एक दिन की बात है ओस को बहुत दूर, बहुत तेज एक प्रकाश पिंड नजर आया। उनकी आँखों को उसकी चमक सहन नहीं हुई और ज्यादा रोशनी के वजह से आँखें बंद होने लगी। जब ओस की बूँद ने देखा कि एक प्रकाश पिंड बहुत ही तेज गति से उधर आ रहा है और बहुत ही तेजी से सूर्य की ओर बढ़ रहा है। ज्यों-ज्यों पास आता जाता था, उसका आकार बढ़ता जाता था क्योंकि चीजें दूर होती है तो छोटी नजर आती हैं और वह नजदीक नजर आता हुआ और भी बड़ा रूप दिखाई दे रहा था। यह जो गोला था प्रकाश पिंड का वह सूर्य से भी बहुत ही लाखों गुना बड़ा था।

उसकी महान आकर्षण-शक्ति से हमारा सूर्य काँप उठा। ऐसा ज्ञात हुआ कि उस ग्रहराज से टकराकर हमारा सूर्य चूर्ण हो जाएगा। वैसा न हुआ।

वह सूर्य से सहस्रों मील दूर से ही घूम चला, परंतु उसकी भीषण आकषर्ण-शक्ति के कारण सूर्य का एक भाग टूटकर उसके पीछे चला।

आकर्षण-शक्ति – खींचने की शक्ति

ज्ञात – जानकारी

ग्रहराज – उल्का

चूर्ण – चूरा

सहस्रों – हजार

भीषण – डरावनी

बून्द कहती है कि यह जो उल्का पिंड की महान आकर्षण-शक्ति थी उसके कारण हमारा सूर्य काँप उठा। ऐसा लग रहा था कि उस ग्रहराज से टकराकर हमारा सूर्य चूर-चूर हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ क्योंकि उसने सूर्य से हजारों मिल दूर से ही अपना रास्ता  बदल दिया, परंतु उसकी भीषण आकषर्ण-शक्ति के कारण सूर्य का एक भाग टूटकर उसके पीछे चल दिया।

सूर्य से टूटा हुआ भाग इतना भारी खिंचाव सँभाल न सका और कई टुकड़ों में टूट गया। उन्हीं में से एक टुकड़ा हमारी पृथ्वी है। यह प्रारंभ में एक बड़ा आग का गोला थी।’’

“ऐसा? परंतु उन लपटों से तुम पानी कैसे बनी।’’

खिंचाव – आकर्षण

ओस की बून्द आगे कहती है कि वह टुकड़ा जो सूर्य से टूटा था, वह इतना भारी इतना वजनदार था कि आकर्षण को सहन न कर सका, और कई टुकड़ों में टूट गया। अब जो सूर्य के टुकडे़ से अलग हुआ था उसी में से एक टुकड़ा हमारी पृथ्वी है। यह प्रारंभ में जब बन रही थी तब एक बड़ा आग का गोला थी। बून्द की बात सुनकर लेखक ने बून्द से प्रश्न किया कि जब वह लपटों के रूप थी, अग्नि के रूप में थी, तो वह पानी कैसे बनी?

“मुझे ठीक पता नहीं। हाँ, यह सही है कि हमारा ग्रह ठंडा होता चला गया और मुझे याद है कि अरबों वर्ष पहले मैं हद्रजन (हाइट्रोजन) और ओषजन (ऑक्सीजन) के रासायनिक क्रिया के कारण उत्पन्न हुई हूँ। उन्होंने आपस में मिलकर अपना प्रत्यक्ष अस्तित्व गँवा दिया है और मुझे उत्पन्न किया है।

रासायनिक क्रिया – दो कैमिक्लस का आपस में प्रतिक्रिया

उत्पन्न – पैदा

प्रत्यक्ष – सामने

अस्तित्व – वजूद या हस्ती

लेखक के पूछने पर की ओस की बून्द आग से पानी कैसे बनी? बून्द जवाब देती है कि उसे ठीक से याद नहीं है। लेकिन उसे इतना पता है कि यह ग्रह जो एक अग्नि का टुकड़ा था उसका ताप कम होता चला गया, वह ठंडा होता चला गया और उसे यह याद है कि अरबों वर्ष पहले ‘हाइड्रोजन’ और ’ऑक्सीजन’ के मिलने से वह पैदा हुई है। उन्होंने आपस में मिलकर अपना प्रत्यक्ष अस्तित्व गँवा दिया है और मुझे उत्पन्न किया है।

मैं उन दिनों भाप के रूप में पृथ्वी के चारों ओर घूमती फिरती थी। उसके बाद न जाने क्या हुआ? जब मुझे होश आया तो मैंने अपने को ठोस ब़र्फ के रूप में पाया। मेरा शरीर पहले भाप-रूप में था वह अब अत्यंत छोटा हो गया था। 

भाप – वाष्प या ऊष्मा

ठोस – जो दबाने से न दबता हो

अत्यंत – बहुत

आगे ओस की बूँद बताती है कि वह उन दिनों भाप के रूप में पृथ्वी के चारों ओर घूमती फिरती थी। उसके बाद न जाने क्या हुआ? जब उसे होश आया तो उसने अपने आप को ठोस बर्फ के रूप में पाया। बून्द बताती है कि उसका शरीर पहले भाप-रूप में था। अब वह सिकुड़ कर जैसा कि उसने बर्फ का रूप ले लिया था तो उसका रूप और आकार छोटा हो गया था। 

वह पहले से कोई सतरहवाँ भाग रह गया था। मैंने देखा मेरे चारों ओर मेरे असंख्य साथी ब़र्फ बने पड़े थे। जहाँ तक दृष्टि जाती थी ब़र्फ के अतिरिक्त कुछ दिखाई न पड़ता था। जिस समय हमारे ऊपर सूर्य की किरणें पड़ती थीं तो सौंदर्य बिखर पड़ता था। 

अतिरिक्त – अलावा

सौंदर्य – सुंदरता

बून्द बताती है कि जब वह भाप से बर्फ में बदली तो उसका शरीर पहले से कोई सतरहवाँ भाग रह गया था यानि सिकुड़कर छोटा हो गया था। उसने देखा उसके चारों ओर उसके असंख्य साथी बर्फ बने पड़े थे। जहाँ तक भी नजरें जाती थी, बर्फ के अतिरिक्त कुछ दिखाई न पड़ता था, चारों ओर बर्फ ही बर्फ नजर आ रही थी इसके अलावा और कुछ नहीं नजर आ रहा था। जैसे ही सूर्य की किरणें बर्फ बनी सभी बूंदों पर पड़ती थी तो प्रकृति में अलग ही तरह का सौंदर्य निखर जाता है यानि चमक आ जाती थी।

हमारे कितने साथी ऐसे भी थे जो बड़ी उत्सुकता से आँधी में ऊँचा उड़ने, उछलने-कूदने के लिए कमर कसे तैयार बैठे रहते थे।’’

“बड़े आनंद का समय रहा होगा वहाँ।’’

“बड़े आनंद का।’’ 

“कितने दिनों तक?’’

उत्सुकता – खुशी

कसे – उद्यत

आनंद – सुख

ओस की बूँद कहती है कि उसके जैसे बहुत सारी पानी की बुँदे जो बर्फ बानी पड़ी थी वे बहुत ही व्याकुल होकर उत्सुकता से आँधी में तेज हवा में ऊँचा उड़ने और उछलने-कूदने के लिए तैयार बैठी रहती थी। लेखक बून्द की बातें सुन कर कहता है कि उस समय उन्हें बहुत ही मजा आया होगा। ओस की बून्द भी हामी भरते हुए कहती है कि वह समय बहुत ख़ुशी वाला था। लेखक बून्द से प्रश्न पूछता है कि वह ख़ुशी का समय कितने दिनों रहा।

’’कई लाख वर्षों तक?’’ 

’’कई लाख!’’

’’हाँ, चौंको नहीं। मेरे जीवन में सौ-दो सौ वर्ष दाल में नमक के समान भी नहीं हैं।’’

मैंने ऐसे दीर्घजीवी से वार्तालाप करते जान अपने को धन्य माना और ओस की बूँद के प्रति मेरी श्रद्धा बढ़ चली। 

चौंको – हैरान होना

समान – बहुत थोड़ा

दीर्घजीवी – लंबे समय तक जीने वाला

वार्तालाप – बातचीत

श्रद्धा – सम्मान

जब लेखक ने ओस की बून्द से पूछा की वे ख़ुशी के दिन कब तक थे तो बून्द ने जवाब दिया कि कई लाख वर्षों तक। बून्द के इस जवाब ने लेखक को आश्चर्य में दाल दिया। बून्द ने जब देखा की लेखक उसकी बात पर हैरान हो गे है तो बून्द ने लेखक से कहा कि हैरान होने की बात नहीं है। उसके जीवन में सौ-दो सौ वर्ष दाल में नमक के समान भी नहीं है यानि यह जो उसका जीवन है यह बहुत ही थोड़ा सा जीवन है। लेखक ऐसे लंबे समय तक जीवन जीने वाले के साथ वार्तालाप करके अपने आप को धन्य मानता है और लेखक कहते हैं कि यह सब बात सुनकर उनकी जो भावना थी ओस की बूँद के प्रति बढ़ती चली गई। 

“हम शांति से बैठे एक दिन हवा से खेलने की कहानियाँ सुन रहे थे कि अचानक ऐसा अनुभव हुआ मानो हम सरक रहे हों। सबके मुख पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। अब क्या होगा?”

इतने दिन आनंद से काटने के पश्चात् अब दुख सहन करने का साहस हममें न था। 

सरक – खिसकना

हवाइयाँ उड़ने लगीं – भय

पश्चात् – बाद में

साहस – हिम्मत

ओस की बूँद अपनी कहानी आगे बढ़ाती है कि एक दिन की बात है चुपचाप शांति से बर्फ बनी बूंदें बैठ कर हवा में और हवा से खेलने की कहानियाँ सुन रहे थे कि अचानक उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो वे अपने जगह से हिल रहे हों या खिसक रहे हो। डर के कारण सबके होश उड़ने लगे कि अब उनके साथ क्या होने वाला है?यह सोचकर सबको घबराहट होने लगी। इतने दिनों तक जो सभी बर्फ बनी बूंदें आनंद से समय काट रही थी, अब दुख सहन करने का साहस उन में नहीं था। 

बहुत पता लगाने पर हमें ज्ञात हुआ कि हमारे भार से ही हमारे नीचे वाले भाई दबकर पानी हो गए हैं। उनका शरीर ठोसपन को छोड़ चुका है और उनके तरल पदार्थ शरीर पर हम फिसल चले हैं। मैं कई मास समुद्र में इधर-उधर घूमती रही। फिर एक दिन गर्म-धारा से भेंट हो गई।

ज्ञात – जानकारी/मालूम

त्रल – पदार्थ

मास – महीने

बून्द कहती है कि जब वे सब अपनी जगह से खिसकने लगे तो इधर-उधर से उन्होंने जानकारी लेने की कोशिश की तो उन्हें पता चला कि उनके भार से ही उनके नीचे वाले भाई दबकर पानी हो गए हैं। उनका शरीर बर्फ के रूप को छोड़ चुका था और अब वह पिघलने लगे थे। अब ओस की बूँद कह रही है कि अब वे बहते जा रहे थे। वह कई महीने तक समुद्र में इधर-उधर घूमती रही। फिर एक दिन गर्म-धारा से भेंट हो गई। 

धारा के जलते अस्तिव को ठंडक पहुँचाने के लिए हमने उसकी गरमी सोखनी शुरू कर दी और इसके फलस्वरूप मैं पिघल पड़ी और पानी बनकर समुद्र में मिल गई। समुद्र का भाग बनकर मैंने जो दृश्य देखा वह वर्णनातीत है।

ठंडक – शीलतला

फलस्वरूप – उपरांत/उसके अलावा

दृश्य – नजारा

वर्णनातीत – जिसका वर्णन न किया जा सके

आगे बून्द कहती है कि जब उसकी मुलाक़ात गर्म धारा से हुई तो उस धारा के जलते अस्तिव को ठंडक पहुँचाने के लिए उन बर्फ बनी बूंदों ने उसकी गरमी सोखनी शुरू कर दी और इसके फलस्वरूप वह ओस की बून्द पिघल पड़ी और पानी बनकर समुद्र में मिल गई। बून्द कहती है कि समुद्र का भाग बनकर उसने जो दृश्य देखा वह बहुत ही अनोखा नजारा था, जिसका वर्णन करना बहुत कठिन है। 

मैं अभी तक समझती थी कि समुद्र में केवल मेरे बंधु-बांधवों का ही राज्य है, परंतु अब ज्ञात हुआ कि समुद्र में चहल-पहल वास्तव में दूसरे ही जीवों की है और उसमें निरा नमक भरा है। पहले-पहले समुद्र का खारापन मुझे बिलकुल नहीं भाया, जी मचलाने लगा। पर धीरे-धीरे सब सहन हो चला।

निरा – केवल

खारापन – नमक वाला पानी

भाया – अच्छा नहीं लगा

मचलाने – उल्टी होना

सहन – बर्दाष्त

बून्द लेखक से कहती है कि वह अभी तक यह समझती थी कि समुद्र में केवल बून्द और उसके बंधु-बांधवों का ही राज्य है। परंतु अब जब बून्द समुद्र में टहलने लगी तो उसे पता चला कि यह जो समुद्र में  हलचल हो रही है, सिर्फ उनकी वजह से नहीं बल्कि समुद्र में और भी जीव हैं, और भी प्राणीयों का वास है। बून्द ने यह भी बताया कि समुद्र में केवल नमक भरा है। पहले-पहले समुद्र का खारापन ओस की बूँद को जरा सा भी अच्छा नहीं लगा। उसका मन बिलकुल भी अच्छा नहीं हो रहा था। पर धीरे-धीरे बून्द को इन सबकी आदत हो गई।

एक दिन मेरे जी में आया कि मैं समुद्र के ऊपर तो बहुत घूम चुकी हूँ, भीतर चलकर भी देखना चाहिए कि क्या है? इस कार्य के लिए मैंने गहरे जाना प्रारंभ कर दिया। मार्ग में मैंने विचित्र-विचित्र जीव देखें। 

भीतर – अन्दर

प्रारंभ – शुरू 

मार्ग – रास्ते

विचित्र-विचित्र – अजीब-अजीब

जीव – पानी के जीव-जन्तु

ओस की बून्द लेखक को कहती है कि एक दिन उसके मन में आया कि वह समुद्र के ऊपर तो बहुत घूम चुकी है, भीतर चलकर भी देखना चाहिए कि समुद्र में और क्या-क्या है? इसके लिए उसने गहरे पानी में जाना शुरू कर दिया। मार्ग में उसने अजीबो-गरीबों जीव देखे।

मैंने अत्यंत धीरे-धीरे रेंगने वाले घोंघे, जालीदार मछलियाँ, कई-कई मन भारी कछुवे और हाथों वाली मछलियाँ देखीं। एक मछली ऐसी देखी जो मनुष्य से कई गुना लंबीं थी। उसके आठ हाथ थे। वह इन हाथों से अपने शिकार को जकड़़ लेती थी। 

अत्यंत – बहुत

जकड़़ – कैद

बून्द कहती है कि जब वह और नीचे समुद्र की गहराई में गई तो उन्हें वहाँ पर बहुत ही धीरे-धीरे रेंगने वाले घोंघे देखे, जो समुद्र में ही पाऐ जाते हैं। जालीदार मछलियाँ जिनके शरीर पर जाली दिखाई दे रही थी, बहुत ही बड़े-बड़े कछुए और ऐसी मछलियाँ देखी जिनको देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उनपर हाथ बने हुए हो। एक मछली ऐसी देखी जो मनुष्य से कई गुना लंबीं थी, मनुष्य के आकार से बहुत बड़ी और उसके आठ हाथ थे। ऐसा लग रहा था कि उसके हाथ अलग-अलग दिशाओं में निकले हुए हैं और वह भी संख्य में आठ थे। ऐसी मछलियाँ जोकि अपने शिकारों को अपने हाथों से ही जकड़कर उन्हें कैद कर लेती है पकड़ लेती हैं।

मैं और गहराई की खोज में किनारों से दूर गई तो मैंने एक ऐसी वस्तु देखी कि मैं चौंक पड़ी। अब तक समुद्र में अँधेरा था, सूर्य का प्रकाश कुछ ही भीतर तक पहुँच पाता था और बल लगाकर देखने के कारण मेरे नेत्र दुखने लगे थे।

चौंक – आश्चर्य

नेत्र – आँख

बून्द लेखक को बता रही थी कि वह और गहराई की खोज में किनारों से दूर निकल गई। किनारों से दूर हटकर और गहराई में उसने एक ऐसी वस्तु देखी कि वह  चौंक पड़ी। अब बून्द समुद्र में बहुत गहराई में चली गई थी, वहाँ पे भरपूर अँधेरा था क्योंकि सूर्य की किरणें पानी के भीतर ज्यादा गहरी तक नहीं पहुँचती और उसे देखने को परेशानी होने लगी थी और बल लगा कर देखने के कारण उसकी आँखे दुखने लगी थी। 

मैं सोच रही थी कि यहाँ पर जीवों को कैसे दिखाई पड़ता होगा कि सामने ऐसा जीव दिखाई पड़ा मानो कोई लालटेन लिए घूम रहा हो। यह एक अत्यंत सुंदर मछली थी। इसके शरीर से एक प्रकार की चमक निकलती थी जो इसे मार्ग दिखलाती थी।

लालटेन – कंदील/एक प्रकार का दीप

अत्यंत – बहुत

बून्द लेखक को कह रही थी कि वह इतने गहरे में आसानी से नहीं देख पा रही थी और सोच रही थी कि यहाँ पर जीवों को कैसे दिखाई पड़ता होगा। बून्द ये सोच ही रही थी कि तभी सामने ऐसा जीव दिखाई पड़ा मानो कोई लालटेन लिए घूम रहा हो। उसको देखकर ओस की बूँद को बहुत हैरानी हुई। यह एक अत्यंत सुंदर मछली थी। इसके शरीर से एक प्रकार की चमक निकलती थी, यही उसे आगे बढ़ने में मदद कर रहा था।

इसका प्रकाश देखकर कितनी छोटी-छोटी अनजान मछलियाँ इसके पास आ जाती थीं और यह जब भूखी होती थी तो पेट भर उनका भोजन करती थी।’’ 

’’विचित्र है!’’

’’जब मैं और नीचे समुद्र की गहरी तह में पहुँची तो देखा कि वहाँ भी जगंल है।

अनजान – जिसे जानते न हो

विचित्र – अजीब

बून्द कहती है उस प्रकाश फैलाने वाली मछली के पास बहुत सारी छोटी-छोटी अनजान मछलियाँ आ जाती थीं और जब यह प्रकाश देने वाली मछली भूखी होती थी तो पेट भर उन छोटी अनजान मछलियों का भोजन करती थी। यह सब देख कर बून्द बहुत ही हैरान थी। जब बून्द और नीचे समुद्र की गहरी में गई और तह में पहुँची तो उसने देखा कि वहाँ भी जगंल मौजूद है।

छोटे ठिंगने, मोटे पत्ते वाले पेड़ बहुतायत से उगे हुए हैं। वहाँ पर पहाडिय़ाँ हैं, घाटियाँ हैं। इन पहाड़ियों की गुफाओं में नाना प्रकार के जीव रहते हैं जो निपट अँधे तथा महा आलसी हैं। 

ठिंगने – नाटे

बहुतायत – अत्यधिक

निपट – पूरी तरह

महा – बहुत

आलसी – सुस्त

बून्द  समुद्र के जंगल के बारे में बताते हुए कहती है कि वहाँ पर कोई मोटे पत्ते वाले कोई छोट ठिंगने वाले आकार के पत्ते पेड़ पौधे उगे हुए हैं, समुद्र के तल में बहुत तरह-तरह के पेड़ पौधें  है। वहाँ पर भी अन्दर चटटाने हैं, पहाड़ियाँ हैं, घाटियाँ हैं जैसा कि मैदानी इलाकों में होता है। इन पहाड़ियों की गुफाओं में बहुत तरह-तरह के जीव रहते हैं, जोकि बहुत ही सुस्त है और अँधे हैं इस तरह के जीव समुद्र के अन्दर रहते हैं।

यह सब देखने में मुझे कई वर्ष लगे। जी में आया कि ऊपर लौट चलें। परंतु प्रयत्न करने पर जान पड़ा कि यह असंभव है।

प्रयत्न – प्रयास

असंभव – जो संभव न हो

बून्द लेखक को बताती है कि समुद्र के अन्दर झाँक कर देखने की इस क्रिया में उसे बहुत वर्ष लग गए। उसका ऐसा भी मन हुआ कि अब ऊपर चले जाएँ। परंतु कोशिश करने पर यह मालूम पड़ा कि यह आसान काम नहीं है। अब ओस की बूँद को समुद्र के ऊपरी तल पर जाना बहुत ही मुश्किल जान पड़ रहा था।

मेरे ऊपर पानी की कोई तीन मील मोटी तह थी। मैं भूमि में घुसकर जान बचाने की चेष्टा करने लगी। यह मेरे लिए कोई नयी बात न थी। करोड़ों जल-कण इसी भाँति अपनी जान बचाते हैं और समुद्र का जल नीचे धँसता जाता है।

तह – तल

चेष्टा – कोशिश

धँसता – घुसता

बून्द लेखक को आगे बताती है कि उसके लिए ऊपर जाना इसलिए कठिन था क्योंकि उसके ऊपर पानी की कोई तीन मील मोटी तह थी।  जिसे पार करना बहुत ही मुश्किल था। अब बून्द के पास एक मात्र उपाय था की जमींन के अन्दर जाकर अपनी जान बचाई जाय। यह उसके लिए कोई नयी बात नहीं थी, ऐसा वह पहले भी कर चुकी थी। करोड़ों जल-कण इसी भाँति अपनी जान बचाते हैं, अपनी रक्षा करते हैं और समुद्र के कुछ जल को वहाँ की जमींन सोंक लेती हैं।

मैं अपने दूसरे भाइयों के पीछे-पीछे चट्टान में घुस गई। कई वर्षों में कई मील मोटी चट्टान में घुसकर हम पृथ्वी के भीतर एक खोखले स्थान में निकले और एक स्थान पर इकट्ठा होकर हम लोगों ने सोचा कि क्या करना चाहिए।

चट्टान – पत्थर का बहुत बड़ा हिस्सा

खोखले – खाली

इकट्ठा – एकत्रित

बून्द आगे अपनी कहानी कहती है कि वहअपने दूसरे भाइयों के पीछे-पीछे चट्टान में घुस गई। कई वर्षों में कई मील मोटी चट्टान में घुसकर वे सभी कण पृथ्वी के भीतर एक खोखले स्थान में निकले। एक स्थान पर इकट्ठा होकर वे सभी बूंदें यह सोचने लगी कि अब आगे क्या करना चाहिए। 

कुछ की सम्मति में वहीं पड़ा रहना ठीक था। परंतु हममें कुछ उत्साही युवा भी थे। वे एक स्वर में बोले-हम खोज करेंगे, पृथ्वी के हृदय में घूम-घूम कर देखेंगे कि भीतर क्या छिपा हुआ है।’’

’’अब हम शोर मचाते हुए आगे बढ़े तो एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ ठोस वस्तु का नाम भी न था। 

सम्मति – राय

उत्साही युवा – बहादुर युवक

स्वर – आवाज़ 

बून्द कहती है कि जब वो और उसके साथी सोचने लगे कि आगे क्या करना चाहिए? तो कुछ के विचार यही थे कि वहीं पड़े रहना चाहिए, वहीं रूक जाना चाहिए। परन्तु उन जल कणों में कुछ बहादुर भी थे। उन्होंने एक स्वर में बोला कि वे खोज करेंगे। अब वे जमींन के अन्दर जाकर अन्दर घूसकर देखेंगे कि उस जमींन में अन्दर और-और क्या-क्या छुपा हुआ है। अब वे शोर मचाते हुए आगे बढ़े, अब वे ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ ठोस वस्तु का नाम भी नहीं था। सब कुछ तरल-ही-तरल था। 

बड़ी-बड़ी चट्टानें लाल-पीली पड़ी थीं। और नाना प्रकार की धातुएँ इधर-उधर बहने को उतावली हो रही थीं। इसी स्थान के आस-पास एक दुर्घटना होते-होते बची। हम लोग अपनी इस खोज से इतने प्रसन्न थे कि अंधा-धुँध बिना मार्ग देखे बढ़े जाते थे। इससे अचानक एक ऐसी जगह जा पहुँचे जहाँ तापक्रम बहुत ऊँचा था।

नाना प्रकार – कई तरह

उतावली – जल्दबाज़ी

अंधा-धुँध – लगातार

तापक्रम – तापमान

बून्द कहती है कि उन्होंने देखा कि वहाँ जो चट्टानें हैं वह लाल-पीली रंग की हो गई हैं, आग उगल रही हैं और बहुत प्रकार की धातुएँ जैसे आरायन, सोना, तांबा  इधर-उधर बह रही थी। इसी स्थान के आस-पास एक दुर्घटना होते-होते बची। उनके साथ कुछ ऐसा हुआ कि कुछ अशुभ हो सकता था। वे अपनी इस खोज से इतने प्रसन्न थे कि बिना मार्ग देखे बढ़े जाते थे। अचानक वे अब ऐसी जगह पहुँच गए थे जहाँ का तापमान बहुत ही बढ़ गया था। 

यह हमारे लिए असह्य था। हमारे अगुवा काँपे और देखते-देखते उनका शरीर ओषजन और हद्रजन में विभाजित हो गया। इस दुर्घटना से मेरे कान खड़े हो गए। मैं अपने और बुद्धिमान साथियों के साथ एक ओर निकल भागी। हम लोग अब एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ पृथ्वी का गर्भ रह-रहकर हिल रहा था।

असह्य – जो सहा न जा सके

अगुवा – आगे चलने वाला

विभाजित – बँटवारा

कान खड़े हो गए – सचेत होना

गर्भ – अन्दर

ओस की बूँद कुछ ऐसी जगह पर बहती-बहती पहुँची, जहाँ का तापमन बहुत अधिक था। जो उनके लिए सहन करना बहुत कठिन था। उनके आगे-आगे बहने वाले  जल-कण घबरा गए, देखते-देखते उनका शरीर ऑक्सीजन और हाइट्रोजन में विभाजित हो गया। इस दुर्घटना से बाकी के जल-कण सावधान हो गए। ओस की बून्द बताती है कि बाह कुछ बुद्धिमान साथियों के साथ एक ओर निकल भागी। अब वे एक ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ पृथ्वी का गर्भ रह-रहकर हिल रहा था, वहाँ से धरती हिल रही थी बहुत काँप रही थी।

हम बड़ी तेज़ी से बाहर फेंक दिए गए। हम ऊँचे आकाश में उड़ चले। इस दुर्घटना से हम चौंक पड़े थे। पीछे देखने से ज्ञात हुआ कि पृथ्वी फट गई है और उसमें धुँआ, रेत, पिघली धातुएँ तथा लपटें निकल रही हैं। यह दृश्य बड़ा ही शानदार था और इसे देखने की हमें बार-बार इच्छा होने लगी।’’ 

चौंक – हैरान

धातुएँ – खनिज पदार्थों से भरा हुआ

शानदार – बहुत सुन्दर

बून्द  बताती है कि जहाँ पर धरती हिल रही थी वहाँ से अचानक उन जल-कणों और ओस की बून्द को बड़ी तेज़ी से बाहर फेंक दिए गए, वे ऊँचे आकाश में उड़ चले। इस दुर्घटना से वे सभी हैरान हो गए थे। पीछे देखने पर उन्हें पता चला कि जो पृथ्वी में हलचल हो रही थी, उसकी वजह से पृथ्वी फट गई। उसमें दर्रार आ गई है और उसमें धुँआ, रेत, पिघली धातुएँ तथा लपटें निकल रही हैं। यह दृश्य बड़ा ही शानदार था, देखनें में यह बहुत सुन्दर लग रहा था क्योंकि चारों और अग्नि का प्रकाश फैला हुआ था और इसे देखने की उन्हें  बार-बार इच्छा होने लगी।

“मैं समझ गया। तुम ज्वालामुखी की बात कह रही हो।’’ 

“हाँ, तुम लोग उसे ज्वालामुखी कहते हो। अब जब हम ऊपर पहुँचे तो हमें एक और भाप का बड़ा दल मिला। हम गरजकर आपस में मिले और आगे बढ़े। पुरानी सहेली आँधी के भी हमें यहाँ दर्शन हुए। 

ज्वालामुखी – आग का दहकता हुआ गोला

दल – समूह

गरजकर – क्रोध में

दर्शन – दिखाई

जब बून्द ने धुँआ, रेत, पिघली धातुएँ तथा लपटें आदि का जिक्र किया तो लेखक समझ गया कि बून्द ज्वालामुखी की बात कर रही है। बून्द ने भी हामी भरते हुए कहा कि तुम लोग उसे ज्वालामुखी कहते हो। ओस की बूँद ने कहा कि अब जब वे ऊपर पहुँचे तो उन्हें एक और भाप का बड़ा दल मिला।वे सभी गरजकर आपस में मिले और आगे बढ़े। पुरानी सहेली आँधी के भी उन्हें यहाँ दर्शन हुए। 

वह हमें पीठ पर लादे कभी इधर ले जाती कभी उधर। वह दिन बड़े आनंद के थे। हम आकाश में स्वच्छंद किलोलें करते फिरते थे। 

बहुत से भाप जल-कणों के मिलने के कारण हम भारी हो चले और नीचे झुक आए और एक दिन बूँद बनकर नीचे कूद पड़े।’’

लादे – ढोना

स्वच्छंद – अपनी इच्छा

किलोलें – मस्ती

बून्द लेखक को कहती है कि उसकी अपनी पुरानी सहेली आँधी उसे मिली और अब वह उन्हें पीठ पर उठाकर कभी वह इधर ले जाती तो कभी उधर ले जाती। जिधर की हवा हो जाती वह उधर ही वह निकलते। वह दिन बड़े आनंद के थे। वे ऊपर आसमान में उड़ते फिरते थे। वे आकाश में स्वतंत्रता आजादी से मस्ती करते हुए उड़ते थे। बहुत से भाप जल-कणों के मिलने के कारण वे भारी हो चले और नीचे झुक आए और एक दिन बूँद बनकर नीचे कूद पड़े।

“मैं एक पहाड़ पर गिरी और अपने साथियों के साथ मैली-कुचैली हो एक ओर को बह चली। पहाड़ों में एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कूदने और किलकारी मारने में जो आनंद आया वह भूला नहीं जा सकता। हम एक बार बड़ी ऊँची शिखर पर से कूदे और नीचे एक चट्टान पर गिरे।

मैली-कुचैली – बहुत गन्दी

शिखर – चोटी

किलकारी – हँसने की आवाज़

बून्द लेखक से कहती है की जब वह बून्द बन कर आकाश से निचे कूदी तो वह एक पहाड़ पर गिरी। और अपने साथियों के साथ मैली-कुचैली हो एक ओर को बह चली। पहाड़ों में एक पत्थर से दूसरे पत्थर पर कूदने और हँसते-खेलते आगे बढ़ने में जो आनंद आया वह भूला नहीं जा सकता। वह ख़ुशी आज भी बून्द को याद है। उसके बाद बून्द और अन्य जल कण एक बार बड़ी ऊँचे शिखर पर से कूदे और नीचे एक चट्टान पर गिर पड़े। 

बेचारा पत्थर हमारे प्रहार से टूटकर खंडख् हो गया। यह जो तुम इतनी रेत देखते हो पत्थरों को चबा-चबा कर हमीं बनाते हैं। जिस समय हम मौज में आते हैं तो कठोर से कठोर वस्तु हमारा प्रहार सहन नहीं कर सकती। अपनी विजयों से उन्मत्त होकर हम लोग इधर-उधर बिखर गए। मेरी इच्छा बहुत दिनों से समतल भूमि देखने की थी इसलिए मैं एक छोटी धारा में मिल गई। 

प्रहार – वार या आघात

खंड-खंड – टुकड़े-टुकड़े

मौज – उमंग/मस्ती

प्रहार – मार

उन्मत्त – मतवाला

समतल – जिसका तल बराबर हो

ओस की बून्द लेखक को बताती है कि जब वो और उसके अन्य जल-कण साथी ऊँचे शिखर से एक साथ निचे चट्टान पर गिरे तो बेचारे पत्थर की दशा देखने लायक थी, वह उनकी चोट के प्रहार से टूटकर बिखर गया था, टुकड़े-टुकडे़ हो गया था। बून्द लेखक को कहती है कि यह जो इतनी रेत देखते हो यह पत्थरों को चबा-चबा कर वे जल-कण ही तो बनाते हैं। ओस की बूँद कहती है कि जब वे मौज में आते हैं तो कठोर से कठोर वस्तु उनका प्रहार सहन नहीं कर सकती, चट्टानों को तोड़-तोड़कर उसे रेत बना देती है और उनकी चोट को कठोर से कठोर वस्तु भी सहन नहीं कर सकती। अपनी विजयों से उन्मत्त होकर वे लोग इधर-उधर बिखर गए। ओस की बूँद का मन कर रहा था कि वह समतल भूमि देखे इसलिए वह आगे समतल इलाकों में जाने के लिए एक छोटी सी जल धारा में मिल गई।

सरिता के वे दिवस बड़े मज़े के थे। हम कभी भूमि को काटते, कभी पेड़ों को खोखला कर उन्हें गिरा देते। बहते-बहते मैं एक दिन एक नगर के पास पहुँची। मैंने देखा कि नदी के तट पर एक ऊँची मीनार में से कुछ काली-काली हवा निकल रही है। 

सरिता – नदी

दिवस – दिन

ऊँची मीनार – ऊँची इमारत

ओस की बून्द लेखक को कहती है कि जब वह नदी में बह कर जा रही थी, वो दिन उसके लिए बहुत ही खुशी के दिन थे। बून्द लेखक को अपनी नदी की अपनी यात्रा के बारे में बताते हुए कहती है कि वे कभी भूमि को काटते, कभी पेड़ों को खोखला कर उन्हें गिरा देते। बहते-बहते एक दिन बून्द एक नगर के पास पहुँची।  जब ओस की बूँद नगर में पहुँची तो उसने देखा कि शहर में एक ऊँची ईमारत है,जहाँ से गन्दी काली-काली हवा निकल रही थी।

मैं उत्सुक हो उसे देखने को क्या बढ़ी कि अपने हाथों दुर्भाग्य को न्यौता दिया। ज्यों ही मैं उसके पास पहुँची अपने और साथियों के साथ एक मोटे नल में खींच ली गई। कई दिनों तक मैं नल-नल घूमती फिरी।

उत्सुक – जिज्ञासा

दुर्भाग्य – भाग्य रहित

न्यौता – बुलावा

बून्द लेखक को कहती है कि वह बड़ी उत्सुकता से जानने की इच्छा लिए उसे देखने लिए बेचैन थी कि आखिर यह कौन सी जगह है और ऐसा जानने के लिए वह और उसके साथी आगे बड़े  और उसने अपने ही हाथों अपने दुर्भाग्य को बुलावा दिया। ज्यों ही वह उसके पास पहुँची, वह अपने साथियों के साथ एक मोटे नल में खींच ली गई। कई दिनों तक वह वहीं नल-नल इधर से उधर घूमती रही।

मैं प्रति क्षण उसमें से निकल भागने की चेष्टा में लगी रहती थी। भाग्य मेरे साथ था। बस, एक दिन रात के समय मैं ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ नल टूटा हुआ था। मैं तुरंत उसमें होकर निकल भागी और पृथ्वी में समा गई। अंदर ही अंदर घूमते-घूमते इस बेर के पेड़ के पास पहुँची।’’

प्रति क्षण – पल

चेष्टा – कोशिश

बून्द लेखक को कह रही थी कि वह हर क्षण उसमें से निकल भागने की कोशिश में लगी रहती थी क्योंकि यह बहुत ही भयानक सफर था, जिसमें वह फस गई थी। इसमें भाग्य भी ओस की बून्द के साथ था। एक दिन रात के समय में वह एक ऐसे स्थान पर पहुँची जहाँ का नल टूटा हुआ था। वह तुरंत उसमें होकर निकल भागी जैसा वह करना चाहती थी और उसे फिर से मौका मिला और पृथ्वी में समा गई। अंदर ही अंदर घूमते-घूमते वह इस बेर के पेड़ के पास पहुँची।

वह रुकी, सूर्य निकल आए थे। 

’’बस?’’ मैंने कहा। 

’’हाँ, मैं अब तुम्हारे पास नहीं ठहर सकती। सूर्य निकल आए हैं। तुम मुझे रोककर नहीं रख सकते।’’ वह ओस की बूँद धीरे-धीरे घटी और आँखों से ओझल हो गई।

ठहर – रूकना

ओझल – गायब

बेर के पेड़ तक की कहानी सूना कर ओस की बून्द रुकी गई, अब सूर्य उदय हो गया था। लेखक शायद और ज्यादा कुछ सुनना चाहता था तभी तो वो बून्द के चुप हो जाने पर बोल पड़ा की बस इतनी ही। बून्द ने हामी भरते हुए कहा की हाँ अब और ज्यादा वह लेखक के पास नहीं रुक सकती क्योंकि सूर्य निकल गया है अब उसमें उड़ने की शक्ति आ जाएँगी और वह वाष्प बनकर हवा में उड़ जाएँगी। ओस की बून्द लेखक से कहती है कि वह उसे रोककर नहीं रख सकता। अब ऐसा करना असभंव है। वह ओस की बूँद धीरे-धीरे घटी और देखते-देखते ही लेखक की हथेली से वह गायब हो गई।

 

पाठ सार –

“पानी की कहानी” में एक ओस की बून्द अपनी रक्षा के लिए बेर के पेड़ पर से लेखक की हथेली पर कूद जाती है और उसे अपनी कहानी सुनाना शुरू करती है। ओस की बूँद कहती है कि अरबों वर्ष पहले ‘हाइड्रोजन’ और ’ऑक्सीजन’ के मिलने से उसका जन्म हुआ। जब पृथ्वी का तापमान घटा तो वह बर्फ के रूप में बदल गई और जब बर्फ का सामना गर्म धारा से हुआ तो वह पिघल कर समुद्र के पानी में मिल गई। समुद्र की गहराई की यात्रा करने की इच्छा ने उसे समुद्र की गहराई में ले लिया। वहाँ से वह ऊपर ना आ सकी और वह वही वर्षों तक समुद्र की चट्टानों से होते हुए ज़मीन में सहारे ज्वालामुखी तक पहुँच गई। वह से उसे तेज गति के साथ भाप की स्थिति में आकाश में भेज दिया गया और वहाँ आँधी में मिल जाना पड़ा और जब बहुत से वाष्प कण मिल गए तो भार अधिक होने के कारण वे बारिश के रूप में पहाड़ पर आ गिरी। पहाड़ पर से अपने साथियों के साथ तेज़ी से एक ऊँची जगह से नीचे गिरी और नीचे पत्थर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। वहां से समतल भूमि की तलाश में नदी की धारा के साथ बहते हुए कभी मिट्टी का कटान किया, तो कभी पेड़ों की जड़ों को खोखला कर के उनको गिरा दिया। अपनी जिज्ञासा के कारण कारखाने के नलों में कई दिनों तक फसे रहने के बाद भाग्य के साथ देने पर एक टूटे नल से बाहर निकल कर वापिस भूमि द्वारा सोख लेने पर बेर के पेड़ तक पहुँच गई। बेर के पेड़ की जड़ों के रोएँ द्वारा खींच लेने पर कई दिनों तक वहीं फसे रहने पर पत्तों के छोटे-छोटे छेदों के द्वारा बाहर निकल गई। रात होने के कारण वहीं सुबह का इन्तजार करती रही और सुबह लेखक को देख कर अपनी रक्षा की खातिर उसकी हथेली पर कूद पड़ी और सूरज के निकलते ही वापिस भाप बन कर उड़ गई। 

 

प्रश्न अभ्यास –

प्रश्न 1 – लेखक को ओंस की बूँद कहाँ मिली?

उत्तर – सुबह काम पर जाते समय बेर के पेड़ पर से लेखक की हथेली पर एक बून्द गिरी। वही ओस की बून्द थी। 

प्रश्न 2 – ओंस की बूँद क्रोध और घृणा से क्यों काँप उठी?

उत्तर – ओंस की बूँद के अनुसार पेड़ की जड़ों के रोएँ बहुत निर्दयी होते हैं। वे बलपूर्वक जल-कणों को पृथ्वी में से खींच लेते हैं। कुछ को तो पेड़ एकदम खा जाते हैं और ज्यादातर पानी के जो कण हैं वो अपने असस्तिव को खो देते है और उनका सब कुछ छीन जाता है और पेड़ के द्वारा उन्हें बाहर निकाल दिया जाता है, यानी के वह अपना रूप खो देते हैं। यह सब बताते हुए ओंस की बून्द का शरीर क्रोध और घृणा से काँप रहा था।

प्रश्न 3  – हाइट्रोजन और ऑक्सीजन को पानी ने अपना पूर्वज/पुरखा क्यों कहा?

उत्तर – ओस की बून्द लेखक को बताती है कि अरबों वर्ष पहले ‘हाइड्रोजन’ और ’ऑक्सीजन’ के मिलने से वह पैदा हुई है। उन्होंने आपस में मिलकर अपना प्रत्यक्ष अस्तित्व गँवा दिया है और उसे उत्पन्न किया है। इसी कारण वह हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अपना पूर्वज/पुरखा कहती है। 

प्रश्न 4 – “पानी की कहानी” के आधार पर पानी के जन्म और जीवन-यात्रा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए?

उत्तर – “पानी की कहानी” के आधार पर पानी का जन्म अरबों वर्ष पहले ‘हाइड्रोजन’ और ‘ऑक्सीजन’ के मिलने से पानी का जन्म हुआ और तब से लेकर पानी की जीवन यात्रा बहुत ही विचित्र रही है। जन्म के बाद पानी ने ठोस रूप बर्फ का रूप लिया और गर्म धारा के द्वारा तरल रूप ले लिया। वहां से समुद्र के तल तक यात्रा कर के जमीन के द्वारा ज्वालामुखी तक पहुँच गया और वहां पर गर्मी के कारण वाष्प रूप ले लिया और आकाश में आंधी के साथ मिल गया। अधिक वाष्प कण हो जाने पर बारिश के रूप में वापिस पृथ्वी पर आ गया। वहाँ से नदियों के सहारे दोबारा जमीन द्वारा सोख लिया गया और पेड़ों द्वारा वाष्पीकरण से दोबारा भाप की स्थिति में आ कर वायुमंडल में घूमने लगा। 

प्रश्न 5 – कहानी के अंत और आरम्भ के हिस्से को स्वयं पढ़ कर देखिए और बताइए कि ओस की बूँद लेखक को आपबीती सुनाते हुए किसकी प्रतीक्षा कर रही थी?

उत्तर – ओस की बूँद लेखक को आपबीती सुनाते हुए सूर्य के निकलने की किसकी प्रतीक्षा कर रही थी, ताकि वह सूर्य की ऊष्मा से भाप बन कर उड़ सके। 

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