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Akbari Lota Class 8 Chapter 14 Summary, Explanation, Question Answers

Akbari Lota ‘अकबरी लोटा’ Summary, Explanation, Question and Answers

 

कक्षा 8

पाठ 14 

“अकबरी लोटा”

akbari lota

लेखक – अन्नपूर्णानन्द वर्मा

जन्म – 21 सितंबर 1895 (काशी, उत्तर प्रदेश)

मृत्यु – 04 दिसंबर 1962 

 

पाठ प्रवेश –

अन्नपूर्णानन्द की कहानी “अकबरी लोटा” एक हास्य पूर्ण कहानी है। लेखक ने कहानी को बहुत ही रोचंक तरीके से प्रस्तुत किया गया है और साथ के साथ बताया गया है कि परेशानी के समय में परेशान न होकर समझदारी से किस तरह से एक समस्या का हल निकाला जा सकता है और दूसरी बात इस कहानी में यह भी बताया गया है कि एक सच्चा मित्र ही मित्र के काम आता है और उसके लिए बहुत कुछ कर गुजर जाता है। कहानी के माध्यम से लेखक हमें सीख देना चाहता है कि सही वक़्त पर सही समझ का उपयोग करना कितना जरुरी है। इस कहानी के मुख्य पात्र हैं – लाला झाऊलाल और उनके मित्र पंड़ित बिलवासी मिश्र जी। 

 

अकबरी लोटा – व्याख्या –

लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं थी। काशी के ठठेरी बाजार में मकान था। नीचे की दुकानों से एक सौ रुपये मासिक के करीब किराया उतर आता था। अच्छा खाते थे, अच्छा पहनते थे, पर ढ़ाई सौ रुपये तो एक साथ आँख सेंकने के लिए भी न मिलते थे।

मासिक – महीने

लेखक कहते हैं कि लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी। अच्छे खाते पीते परिवार से थे और व्यवसाय भी अच्छा खासा चल रहा था। काशी के ठठेरी बाजार में मकान था। मकान के नीचे बनी दुकानों से महीने के करीब एक सौ रुपये किराया आ जाता था। अर्थात् उन्हें किसी तरह की कमी नहीं थी अच्छा व्यवसाय था, अच्छा बड़ा मकान था, और मकान की दुकानों का एक सौ रुपये के करीब किराया भी आ जाता था तो गुजरा अच्छे से हो जाता था। परन्तु फिर भी एक साथ ढ़ाई सौ रूपए होना बहुत बड़ी बात थी। 

इसलिए जब उनकी पत्नी ने एक दिन एकाएक ढाई सौ रुपये की माँग पेश की, तब उनका जी एक बार जोर से सनसनाया और फिर बैठ गया। उनकी यह दशा देखकर पत्नी ने कहा- ‘डरिए मत, आप देने में असमर्थ हों तो मैं अपने भाई से माँग लूँ?’

ढाई सौ – 250

लेखक ने पहले ही कहा है कि एक साथ ढाई सौ रूपए होना कठिन होता है इसलिए जब लाला झाऊलाल की पत्नी ने एक दिन अचानक ढाई सौ रुपये की माँग उनके सामने जाहिर की तब लाला झाऊलाल का दिल ही घबरा गया और उनका दिल भी बैठ गया। उनकी यह दशा देखकर उनकी पत्नी ने कहा कि अगर लाला झाऊलाल अपनी पत्नी को पैसे नहीं दे सकते हैं, तोवह अपने भाई से माँग लेगी।

लाला झाऊलाल तिलमिला उठे। उन्होंने रोब के साथ कहा- ’अजी हटो, ढाई सौ रुपये के लिए भाई से भीख माँगोगी, मुझसे ले लेना।’ लेकिन मुझे इसी जिंदगी में चाहिए।’ अजी इसी सप्ताह में ले लेना। ’सप्ताह से आपका तात्पर्य सात दिन से है या सात वर्ष से?’ लाला झाऊलाल ने रोब के साथ खड़े होते हुए कहा-’आज से सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना।’

रोब – अकड़

लेखक कहते हैं कि जब लाला झाऊलाल की पत्नी ने अपने भाई से पैसे माँगने की बात कही तो लाला झाऊलाल क्रोधित हो उठे कि उनके होते हुए उनकी पत्नी अपने भाई से पैसे माँगेगी, यह बात उन्हें जरा सा भी मंजूर नहीं थी। उन्होंने अकड़ के साथ कहा कि ढाई सौ रुपये के लिए भाई से भीख माँगोगी क्या? वह ढाई सौ रुपये का इंतजाम कर देगा। लेकिन उनकी पत्नी ने कहा कि उसे ये रूपए इसी जिंदगी में चाहिए। इस पर लाला झाऊलाल ने कहा कि वह इसी सप्ताह में उसे रूपए दे देगा। इस पर उनकी पत्नी ने उन्हें टोकते हुए कहा कि उनका सप्ताह कहने का अभिप्राय सात दिन से है या सात वर्ष से? तो लाला झाऊलाल गुस्से के साथ खड़े होते हुए बोले कि आज से गिन कर सातवें दिन मुझसे ढाई सौ रुपये ले लेना। 

लेकिन जब चार दिन ज्यों-त्यों में यों ही बीत गए और रुपयों का कोई प्रबंध न हो सका तब उन्हें चिंता होने लगी। प्रश्न अपनी प्रतिष्ठा का था, अपने ही घर में अपनी साख का था। देने का पक्का वादा करके अगर अब दे न सके तो अपने मन में वह क्या सोचेगी?

प्रतिष्ठा – इज्जत

लेखक कहता है कि सात दिन बाद रूपए लेने के लिए तो लाला झाऊलाल ने बोल दिया था लेकिन जब चार दिन का समय ऐसे ही बिना रुपयों के प्रबंध के बीत गया तो झाऊलाल को चिंता होने लगी कि उन्होंने अपनी पत्नी को पैसे देने का वादा तो कर दिया अगर नहीं दे पाए तो क्या होगा? अब प्रश्न उनकी अपनी प्रतिष्ठा का था, इज्जत का था। अपने ही घर में इज्जत दाव पर लगी थी। वे सोचने लगे कि देने का पक्का वादा करके अगर अब दे न सके तो उनकी पत्नी अपने मन में उनके बारे में न जाने क्या सोचेगी? 

उसकी नज़रों में उसका क्या मूल्य रह जाएगा? अपनी वाहवाही की सैकड़ों गाथाएँ सुना चुके थे। अब जो एक काम पडा़ तो चारों खाने चित्त हो रहे। यह पहली बार उसने मुँह खोलकर कुछ रुपयों का सवाल किया था। इस समय अगर दुम दबाकर निकल भागते हैं तो फिर उसे क्या मुँह दिखलाएँगे?

गाथाएँ – कहानियाँ

दुम – पूंछ

लाला झाऊलाल सोच रहे थे कि अगर उन्होंने अपनी पत्नी को पैसे नहीं दिए तो उसकी नज़रों में उनका क्या मूल्य रह जाएगा? उन्होंने अपनी पत्नी ने सामने अपनी तारीफों की सैकड़ों कहानियाँ सुना रखी थी। अब उन्हें डर था कि कहीं उनकी कही हुई बातें झूठी साबित न हो जाए। वह यह न सोचे कि अब जो एक काम पडा़ है तो लाला झाऊलाल पूरी तरह से हार गए है। उनकी पत्नी ने पहली बार अपनी इच्छा जाहिर की थी कि उसे कुछ रुपये चाहिए। इस समय अगर किसी तरह पत्नी को न कह कर बच निकलते तो वे उसके बाद अपनी पत्नी को क्या मुँह दिखाते?

खैर, एक दिन और बीता। पाँचवें दिन घबराकर उन्होंने पं. बिलवासी मिश्र को अपनी विपदा सुनाई। संयोग कुछ ऐसा बिगड़ा था कि बिलवासी जी भी उस समय बिलकुल खुक्ख थे। उन्हानें कहा- “मेरे पास हैं तो नहीं पर मैं कहीं से माँग-जाँच कर लाने की कोशिश करूँगा और अगर मिल गया तो कल शाम को तुमसे मकान पर मिलूँगा।”

विपदा – मुसीबत

खुक्ख – खाली हाथ

लेखक कहते हैं कि एक दिन और बीता गया। लेकिन पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया। पाँचवें दिन परेशान हो कर उन्होंने अपनी सारी कहानी अपने मित्र पं- बिलवासी मिश्र को सुनाई। लाला झाऊलाल की किस्मत इतनी ख़राब थी कि उस समय उनके मित्र बिलवासी जी के पास भी उतना पैसा नहीं था जितने की वह माँग कर रहे थे। परन्तु लाला झाऊलाल के मित्र  ने उन्हें तसल्ली देते हुए कहा कि उनके पास तो इस समय तो उनके पास उतने पैसे नहीं है जीतने की लाला झाऊलाल माँग कर रहे थे, परन्तु उन्होंने कहा कि मित्र होने के नाते उनकी मदद करने के लिए किसी से माँग कर लाने की कोशिश करेंगे और अगर पैसों का इंतज़ाम हो गया तो कल शाम तक वे लाला झाऊलाल को जरूर दे देंगे। 

वही शाम आज थी। हफते का अंतिम दिन। कल ढाई सौ रुपये या तो गिन देना है या सारी हेंकड़ी से हाथ धोना है। यह सच है कि कल रुपया न आने पर उनकी स्त्री उन्हें डामलफाँसी न कर देगी ’केवल जरा-सा हँस देगी। पर वह कैसी हँसी होगी, कल्पना मात्रा से झाऊलाल में मरोड़ पैदा हो जाती थी।

हेंकड़ी – अकड़

लेखक कहते हैं कि आज वही शाम थी जिसका लाला झाऊलाल ने अपनी पत्नी से वादा किया था। हफते का अंतिम दिन। लाला झाऊलाल सोच रहे थे कि कल ढाई सौ रुपये या तो पत्नी के हाथ में दे देने है या अपनी सारी अकड़ से हाथ धोना पडे़गा। यह सच है कि कल अगर लाला झाऊलाल ने अपनी पत्नी को रुपए न दिए तो उनकी पत्नी उन्हें कोई फाँसी तो नहीं देगी परन्तु उनकी असफलता पर केवल जरा-सा हँस देगी। वह कैसी हँसी होगी उसकी कल्पना मात्रा से झाऊलाल घबरा जाते थे। क्योंकि उन्होंने अपनी पत्नी से वादा किया था और वह अगर वह वादा पूरा नहीं कर पाएँ तो उनकी सारी हेकड़ी सारी की धारी की धारी रह जाएँगी।

आज शाम को पं. बिलवासी मिश्र को आना था। यदि न आए तो? या कहीं रुपये का प्रबंध वे न कर सके? इसी उधेड़-बुन में पड़े लाला झाऊलाल छत पर टहल रहे थे। कुछ प्यास मालूम हुई। उन्होंने नौकर को आवाज़ दी। नौकर नहीं था, खुद उनकी पत्नी पानी लेकर आईं।

उधेड़-बुन – फिक्र

लेखक कहते हैं कि आज शाम को लाला झाऊलाल के मित्र पं. बिलवासी मिश्र को आना था। लाला झाऊलाल उसका इंतजार कर रहे थे और सोच भी रहे थे अगर वह नहीं आया तो फिर क्या होगा या कहीं रुपये का प्रबंध वे न कर सके? तरह तरह के सवाल उनके दिमाग में आ रहे थे। इसी फ़िक्र में पड़े लाला झाऊलाल छत पर टहल रहे थे। वह बहुत ही चिंता में थे। ऐसी घबराट के कारण उन्हें प्यास लगी, उन्होंने नौकर को आवाज़ दी। नौकर नहीं था, खुद उनकी पत्नी पानी लेकर ऊपर छत पर चली आई।

वह पानी तो जरूर लाईं पर गिलास लाना भूल गई थीं। केवल लोटे में पानी लिए वह प्रकट हुईं। फिर लोटा भी संयोग से वह जो अपनी बेढ़ंगी सूरत के कारण लाला झाऊलाल को सदा से नापसंद था।

प्रकट – उपस्थित

बेढ़ंगी – बेकार

लेखक कहते हैं कि जब लाला झाऊलाल ने पानी लाने की लिए आवाज दी तो नौकर के बजाए उनकी पत्नी पानी लेकर आई लेकिन वह जल्दबाजी में गिलास लाना भूल गई, वह लोटा ही लेकर आ गई। उनकी पत्नी लोटा भी वह लाई जो लाला झाऊलाल को उसकी बिना ढंग की सूरत के कारण बिलकुल भी पंसद नहीं था।

था तो नया, साल दो साल का ही बना पर कुछ ऐसी गढ़न उस लोटे की थी कि उसका बाप डमरू, माँ चिलम रही हो। लाला ने लोटा ले लिया, बोले कुछ नहीं, अपनी पत्नी का अदब मानते थे। मानना ही चाहिए। इसी को सभ्यता कहते हैं। जो पति अपनी पत्नी का न हुआ, वह पति कैसा?

अदब – सम्मान

लेखक कहते हैं कि जिस लोटे में लाला झाऊलाल की पत्नी पानी आई थी वह वैसे तो नया ही था, साल या दो साल पहले ही बना होगा। परन्तु उस लोटे की बनावट कुछ इस तरह थी कि देखने पर लगता था कि उसका बाप डमरू, माँ चिलम रही होगी। लाला ने लोटा ले लिया, अपनी पत्नी का वह बहुत ही सम्मान करते थे, इस कारण वह कुछ नहीं बोले जबकि उन्हें वह लोटा एक आँख भी नहीं भाता था। हर पति को अपनी पत्नी का सम्मान करना चाहिए। इसी को सभ्यता कहते हैं। यह बात भी बिलकुल सही है कि जो पति अपनी पत्नी का न हुआ तो वह किसी और का कैसे हो सकता है। 

फिर उन्होंने यह भी सोचा कि लोटे में पानी दे, तब भी गनीमत है, अभी अगर चूँ कर देता हूँ तो बाल्टी में भोजन मिलेगा। तब क्या करना बाकी रह जाएगा?

लेखक कहते हैं कि अब लाला ने सोचा कि अभी उनकी पत्नी लोटे में पानी ले कर आई है, वही सही है, अगर अभी लाला ने कुछ भी बोला और उनकी पत्नी बुरा मान गई तो हो सकता है कि उन्हें बाल्टी में भोजन मिले। तब लाला क्या करेंगे? 

लाला अपना गुस्सा पीकर पानी पीने लगे। उस समय वे छत की मुँडेर के पास ही खड़े थे। जिन बुजुर्गों ने पानी पीने के संबंध में यह नियम बनाए थे कि खड़े-खड़े पानी न पियो, सोते समय पानी न पियो, दौड़ने के बाद पानी न पियो, उन्होंने पता नहीं कभी यह भी नियम बनाया या नहीं कि छत की मुँडेर के पास खड़े होकर पानी न पियो।

मुँडेर – किनारा

लेखक कहते हैं कि लाला ने अपने गुस्से को अन्दर ही अन्दर दबा लिया और वह पानी पीने लगे। उस समय वे छत के किनारे के पास ही खड़े थे। लेखक कहते हैं कि जिन बुजुर्गों ने पानी पीने के संबंध में यह नियम बनाए थे कि खड़े-खड़े पानी नहीं पीना चाहिए, सोते समय पानी नहीं पीना चाहिए, दौड़ने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए, उन्होंने पता नहीं कभी यह भी नियम बनाया या नहीं कि छत के किनारे के पास खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए। 

जान पड़ता है कि इस महत्वपूर्ण विषय पर उन लोगों ने कुछ नहीं कहा है। लाला झाऊलाल मुश्किल से दो-एक घूँट पी पाए होंगे कि न जाने कैसे उनका हाथ हिल उठा और लोटा छूट गया। लोटे ने दाएँ देखा न बाएँ, वह नीचे गली की ओर चल पड़ा।

लेखक कहते हैं कि ऐसा मालूम होता है कि किसी बड़े बुजुर्ग ने कभी नहीं कहा कि छतके किनारे के पास खड़े होकर पानी नहीं पीना चाहिए। इस महत्वपूर्ण विषय पर किसी ने ध्यान नहीं दिया होगा। लाला झाऊलाल मुश्किल से दो-एक घूँट पी पाए होंगे कि न जाने कैसे उनका हाथ हिल गया और लोटा उनके हाथ से छूट गया। लोटा इस तरह गिरा कि वह इधर-उधर टकराने के बजाए सीधा गली की और चल पड़ा। 

अपने वेग में उल्का को लजाता हुआ वह आँखों से ओझल हो गया। किसी जमाने में न्यूटन नाम के किसी खुराफाती ने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति नाम की एक चीज ईजाद की थी। कहना न होगा कि यह सारी शक्ति इस समय लोटे के पक्ष में थी। लाला को काटो तो बदन में खून नहीं। ए चलती हुई गली में ऊँचे तिमंजले से भरे हुए लोटे का गिरना हँसी-खेल नहीं।

वेग – गति

ओझल – गायब

ईजाद – खोज

लेखक कहते हैं कि वह लोटा उस गति से निचे गली की और गया जिस गति से आसमान में उल्का पिंड नजर आते हैं और उसी तेज गति से वह लोटा नजरों के सामने से गायब हो गया। लेखक  कि किसी जमाने में न्यूटन नाम के खुराफाती विज्ञानिक ने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति जिसे हम ग्रेवटिव कहते हैं नाम की एक चीज की खोज की थी। ऐसा लग रहा था आज वह सारी शक्ति इस समय लोटे के पक्ष में थी। लाला के होश उड़ गए क्योंकि उनका घर तीसरी मंजिल पर था और इतनी ऊँचाई से लोटे का गिरना कोई हँसी मजाक नहीं था, अगर किसी के सिर पर गिरा तो उसका जो बुरा हाल होगा वह देखने लायक होगा।

यह लोटा न जाने किस अनाधिकारी के झोंपड़े पर काशीवास का संदेश लेकर पहुँचेगा। कुछ हुआ भी ऐसा ही। गली में जोर का हल्ला उठा। लाला झाऊलाल जब तब दौड़कर नीचे उतरे तब तक एक भारी भीड़ उनके आँगन में घुस आई।

हल्ला – शोर

लेखक कहते हैं कि लाला अब घबराए हुए थे कि अगर लोटा किसी पर गिर गया तो क्या होगा? कुछ हुआ भी ऐसा ही। गली में जोर का शोर होने लगा। लाला को लगा कि आखिर में लोटा किसी न किसी के सिर पर जरूर जाकर गिरा होगा जो इतने जोर से आवाज आई। लाला झाऊलाल जब तक घबराकर नीचे आए तब तक एक भारी भीड़ उनके आँगन में घुस आई थी। 

लाला झाऊलाल ने देखा कि इस भीड़ में प्रधान पात्र एक अंग्रेज़ है जो नखशिख से भीगा हुआ है। और जो अपने एक पैर को हाथ से सहलाता हुआ दूसरे पैर पर नाच रहा है। उसी के पास अपराधी लोटे को भी देखकर लाला झाऊलाल जी ने फौरन दो और दो जोड़कर स्थिति को समझ लिया। गिरने के पूर्व लोटा एक दुकान के सायबान से टकराया।

प्रधान – मुख्य

पूर्व – पहले

लेखक कहते हैं कि जब लाला झाऊलाल को चिखाने चिल्लाने की आवाज आई तो वह नीचे दौड़े चले आए और उन्होंने देखा कि उनके आँगन में लोगों की भीड़ लगी हुई है और उस भीड़ का एक मुख्य पात्र एक अंग्रेज है जो सिर से पाँव तक भिगा हुआ है। और जो अपने एक पैर को हाथ से सहलाता हुआ दूसरे पैर पर नाच रहा है। उसके पैर पर शायद कुछ चोट लगी है इसलिए वह ऐसा कर रहा है उसी के पास अपराधी लोटे को देखकर लाला झाऊलाल सारी घटना को समझ गए कि आखिर में हुआ क्या है। गिरने के पूर्व लोटा एक दुकान के बाहरी हिस्सा  टकराया था और उससे टकराकर वह अंग्रेज के पाँव पर जा गिरा जिससे अंग्रेज घयाल हो गया।

वहाँ टकराकर उस दुकान पर खड़े उस अंग्रेज को उसने सांगोपांग स्नान कराया और फिर उसी के बूट पर आ गिरा। उस अंग्रेज़ को जब मालूम हुआ कि लाला झाऊलाल ही उस लोटे के मालिक हैं तब उसने केवल एक काम किया। अपने मुँह को खोलकर खुला छोड़ दिया। लाला झाऊलाल को आज ही यह मालूम हुआ कि अंग्रेज़ी भाषा में गालियों का ऐसा प्रकांड कोष है।

कोष – खजाना

लेखक कहते हैं कि लोटे ने दुकान पर खड़े उस अंग्रेज को पूरी तरह से सिर से लेकर पाँव तक धो दिया और फिर उसी के जूते पर आ गिरा। उस अंग्रेज़ को जब मालूम हुआ कि लाला झाऊलाल ही उस लोटे के मालिक हैं तब उसने केवल एक काम किया वह चिखाने- चिल्लाने लगा और मालिक को दोषी ठहराने लगा। लाला झाऊलाल को आज ही यह मालूम हुआ कि अंग्रेज़ी भाषा में भी गालियों का ऐसा विशाल खज़ाना है। 

इसी समय पं. बिलवासी मिश्र भीड़ को चीरते हुए आँगन में आते दिखाई पड़े। उन्होंने आते ही पहला काम यह किया कि उस अंग्रेज़ को छोड़कर और जितने आदमी आगँन में घुस आए थे। सबको बाहर निकाल दिया। फिर आगँन में कुर्सी रखकर उन्होंने साहब से कहा- “आपके पैर में शायद कुछ चोट आ गई है। अब आप आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए।”

लेखक कहते हैं कि जिस समय अंग्रेज़ लाला को बुरा-भला कह रहा था, इसी समय पं. बिलवासी मिश्र भीड़ को चीरते हुए आँगन में आते दिखाई पड़े। उन्होंने देखा कि सब लोग उनके मित्र को दोषी ठहरा रहे हैं तो उन्होंने सबसे पहले समझदारी दिखते हुए अंग्रेज को छोड़ कर बाकी जितने लोग थे सबको बाहर कर रास्ता दिखाया और फिर आगँन में कुर्सी रखकर उन्होंने उस अंग्रेज से कहा कि उसके पैर में शायद कुछ चोट आ गई है। इसलिए वह आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए। 

साहब बिलवासी जी को धन्यवाद देते हुए बैठ गए और लाला झाऊलाल की ओर इशारा करके बोले- ’आप इस शख्स को जानते हैं?’ बिलकुल नहीं। और मैं ऐसे आदमी को जानना भी नहीं चाहता जो निरीह राह चलतों पर लोटे के वार करे।’ मेरी समझ में ‘ही इज ए डेंजरस ल्यूनाटिक’ यानी, यह खतरनाक पागल है।

निरीह – बेचारा

लेखक कहते हैं कि जब पं. बिलवासी ने अंग्रेज को बैठने को कहा तो अंग्रेज बिलवासी जी को धन्यवाद देते हुए बैठ गया। लाला झाऊलाल की ओर इशारा करके अंग्रेज ने बिलवासी जी से पूछा कि क्या वे लाला को जानते हैं? बिलवासी बिलकुल मुकर गए और कहते हैं कि वे लाला को बिलकुल नहीं जानते और न ही वह ऐसे आदमी को जानना चाहते हैं जो राह चलते व्यक्तियों को लोटे से चोट पहुँचाए। आगे बिलवासी जी कहते हैं कि उनकी नज़र में यह इंसान एक खतरनाक पागल है। बिलवासी जी ने ऐसा अंग्रेज को शांत करने के लिए कहा था।

’नहीं, मेरी समझ में ‘ही इज ए डेंजरस क्रिमिनल’ नहीं, यह खतरनाक मुजरिम है’। परमात्मा ने लाला झाऊलाल की आँखों को इस समय कहीं देखने के साथ खाने की भी शक्ति दे दी होती तो यह निश्चय है कि अब तक बिलवासी जी को वे अपनी आँखों से खा चुके होते।

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी के लाला को पागल कहने पर अंग्रेज कहता है कि उसकी समझ में लाला एक बहुत बड़ा मुज़रिम है। लेखक कहते हैं कि उस समय लाला को देखने से लग रहा था कि अगर परमात्मा ने लाला झाऊलाल की आँखों को इस समय देखने के साथ खाने की भी शक्ति दे दी होती तो यह निश्चय है कि अब तक बिलवासी जी को वे अपनी आँखों से खा चुके होते। क्योंकि लाला को समझ नहीं आ रहा था कि बिलवासी जी लाला के मित्र हैं या अंग्रेज के। 

वे कुछ समझ नहीं पाते थे कि बिलवासी जी को इस समय क्या हो गया है। साहब ने बिलवासी जी से पूछा तो क्या करना चाहिए?’ ’पुलिस में इस मामले की रिपोर्ट कर दीजिए जिससे यह आदमी फौरन हिरासत (गिरफ्तार) में ले लिया जाए।’

“पुलिस स्टेशन है कहाँ?”

“पास ही है, चलिए मैं बताउँ”

“चलिए।”

“अभी चला। आपकी इजाज़त हो तो पहले मैं इस लोटे को इस आदमी से खरीद लूँ। क्यों जी बेचोगे? मैं पचास रुपये तक इसके दाम दे सकता हूँ।” 

लेखक कहते हैं कि जब बिलवासी जी लाला का साथ देने के बजाय उस अंग्रेज का साथ दे रहे थे तो लाला को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि बिलवासी जी को इस समय क्या हो गया है? अंग्रेज ने बिलवासी जी से पूछा तो अब उसे क्या करना चाहिए? तो इस पर पं. बिलवासी ने अंग्रेज व्यक्ति को सलाह दी कि पुलिस थाने में रिपोर्ट कर दो और लाला के खिलाफ शिकायत दर्ज कर दो ताकि इस आदमी को तुरंत ही गिरफ्तार कर लिया जाए। इस सलाह पर अंग्रेज पूछता है कि पुलिस स्टेशन कहाँ है? बिलवासी जी कहते हैं पास ही है और अंग्रेज कहे तो वह उन्हें वहाँ तक पहुँचा दे, और अंग्रेज भी कहता हैं कि तुरंत चलते हैं और इसे सजा दिलवाते है। अब बिलवासी जी अंग्रेज को कहते है कि वह अभी तुरंत उसके साथ पुलिस थाने चलेगा परन्तु फिर बिलवासी जी कहते हैं कि अगर उस अंग्रेज की इजाज़त हो तो पहले वह इस लोटे को लाला से खरीद लेना चाहते हैं। फिर बिलवासी जी लाला से पूछते हैं कि क्या वह इस लोटे को बेचने के लिए तैयार हैं? वह इसके पचास रूपए देने के लिए तैयार है। 

 

लाला झाऊलाल तो चुप रहे पर साहब ने पूछा- ’’इस रद्दी लोटे के आप पचास रुपये क्यों दे रहे हैं?’’

लेखक कहते हैं कि लाला झाऊलाल अपने मित्र की इस तहर की योजना को चुपचाप खड़े देख रहे थे और अंग्रेज व्यक्ति ने बिलवासी जी से उस बेकार बदसूरत लोटे की इतनी बड़ी कीमत देने के पीछे की वजह पूछी, कि वे उस बदसूरत लोटे के पचास रुपये क्यों दे रहे हैं?

‘‘आप इस लेटे को रद्दी बताते हैं? आश्चर्य! मैं तो आपको एक विज्ञ और सुशिक्षित आदमी समझता था।’’

विज्ञ – ज्ञानी

सुशिक्षित – पढ़ा-लिखा

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी बहुत चतुर और समझदार व्यक्ति हैं वह अंग्रेज को अपने झांसे में लेते हैं और उन्हें कहते है की मैं तो समझता था कि आप बहुत ज्ञानी है बहुत ही पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं आप अवश्य ही बात को समझते होंगे।

“आखिर बात क्या है, कुछ बताइए भी।”

“जनाब यह एक ऐतिहासिक लोटा जान पड़ता है। जान क्या पड़ता है, मुझे पूरा विश्वास है। यह वह प्रसिद्ध अकबरी लोटा है जिसकी तलाश में संसार-भर के म्यूज़ियम परेशान हैं।” 

लेखक कहते हैं कि जब बिलवासी जी ने वह बदसूरत लोटा खरीदने की बात की तो अंग्रेज ने आगे जानना चाहा की आखिर बात क्या है वह यह बदसूरत लोटा क्यों खरीदना चाहता है। अंग्रेज की उत्सुकता देख कर बिलवासी जी उससे कहते हैं कि उसे लगता है यह एक ऐतिहासिक लोटा है ऐसा उसे पूरा विश्वास है और यह वह प्रसिद्ध अकबरी लोटा है जिसकी तलाश में संसार भर के म्यूजियम परेशान हैं और दुनिया भर के लोगों को अपने म्यूजियम में उसे रखने की चाहत है।

‘’यह बात?’’

‘‘जी, जनाब। सोलहवीं शताब्दी की बात है। बादशाह हुमायूँ शेरशाह से हार कर भागा था और सिंध के रेगिस्तान में मारा-मारा फिर रहा था। एक अवसर पर प्यास से उसकी जान निकल रही थी। उस समय एक ब्राह्मण ने इसी लोटे से पानी पिलाकर उसकी जान बचाई थी।

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी की कहानी पर अंग्रेज हैरान हो गया और उस लोटे के बारे में और ज्यादा जानना चाहा तो बिलवासी जी कहानी आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह सोलहवीं शताब्दी की बात है। जब बादशाह हुमायूँ शेर-शाह से हार कर अपनी जान बचा कर भागा था तो सिंध के रेगिस्तान में मारा-मारा फिर रहा था। उस समय में उन्हें प्यास लगी थी। एक अवसर पर प्यास से उसकी जान निकल रही थी। उस समय एक ब्राह्मण ने इसी लोटे से पानी पिलाकर उसकी जान बचाई थी। बिलवासी जी ने बहुत सुन्दर कहानी का वर्णन किया जिससे अंग्रेज बहुत ही प्रभावित हो गया था और उस लोटे की ओर आकर्षित भी हो गया।

हुमायूँ के बाद अकबर ने उस ब्राह्मण का पता लगाकर उससे इस लोटे को ले लिया और इसके बदले में उसे इसी प्रकार के दस सोने के लोटे प्रदान किए।

प्रदान – देना

जब हुमायुँ के बाद अकबर बादशाह बने तो उन्होंने उस ब्राह्मण का पता लगा लिया, जिस ब्राह्मण ने हुमायुँ को इस लोटे से पानी पीला कर उसकी जान बचाई थी। उस ब्राह्मण से अकबर ने यह लोटा ले लिया और इसके बदले दस सोने के लोटे दे दिए।

यह लोटा सम्राट अकबर को बहुत प्यारा था। इसी से इसका नाम अकबरी लोटा पड़ा। वह बराबर इसी से वजू करता था। सन् 57 तक इसके शाही घराने में रहने का पता है। पर इसके बाद लापता हो गया। कलकत्ता के म्यूजियम में इसका प्लास्टर का मॉडल रखा हुआ है।

वजू – पूजा करने का तरीका

म्यूजियम – अजायब घर

मॉडल – प्रतिरूप

बिलवासी जी आगे सुनाते हैं कि यह लोटा सम्राट अकबर को बहुत ज्यादा प्यारा था। इसी कारण इसका नाम अकबरी लोटा पड़ा। अकबर हमेशा इसी लोटे को पूजा करने के लिए प्रयोग करता था। बिलवासी जी कहते हैं कि अभी इतनी ही जानकारी है कि 1857 के आसपास शाही घराने के पास यह लोटा हुआ करता था पर इसके बाद यह लोटा गायब हो गया। कलकत्ता के अजायब घर में इसका प्लास्टर का मॉडल रखा हुआ है।

पता नहीं यह लोटा इस आदमी के पास कैसे आया? म्यूजियम वालों को पता चले तो फेंसी (अच्छा) दाम देकर खरीद ले जाएँ।

फेंसी – अच्छा

आगे बिलवासी जी कहते हैं कि पता नहीं यह लोटा इस आदमी के पास कहा से आ गया? अगर म्यूजियम वालों को पता चले तो अच्छा-ख़ासा दाम देकर खरीद ले जाएँ क्योंकि उन्हें ऐसी चीजों की बहुत जरूरत होती है।

इस विवरण को सुनते-सुनते साहब की आँखों पर लोभ और आश्चर्य का ऐसा प्रभाव पड़ा कि वे कौड़ी के आकार से बढ़कर पकौड़ी के आकार की हो गईं। उसने बिलवासी जी से पूछा- ’’तो आप इस लोटे का क्या करिएगा?’’

लेखक कहते हैं कि जब अंग्रेज ने बिलवासी जी के मुँह से यह कहानी सुनी तो अंग्रेज की आँखे खुलकर बड़ी हो गई उसके अन्दर लोभ जाग गया और साथ-ही-साथ वह आश्चर्य चकित हो गया और उनकी आँखे जो कि पहले छोटी थी, कौड़ी के आकार थी, अब बढ़कर पकौड़ी के आकार की हो गई है अर्थात् बड़ी हो गई, उसने बिलवासी जी से पूछा- कि आप इस लोटे को खरीदकर क्या करेंगे।

“मुझे पुरानी और ऐतिहासिक चीजों के संग्रह का शौक है।’’ 

“मुझे भी पुरानी और ऐतिहासिक चीजों के संग्रह करने का शौक है। जिस समय यह लोटा मेरे ऊपर गिरा था, उस समय मैं यही कर रहा था। उस दुकान से पीतल की कुछ पुरानी मूर्तियाँ खरीद रहा था।’’

“जो कुछ हो, लोटा मैं ही खरीदूँगा।’’

“वाह, आप कैसे खरीदेंगे, मैं खरीदूँगा, यह मेरा हक है।’’

लेखक कहते हैं कि जब अंग्रेज ने बिलवासी जी से पूछा कि वे इस लोटे तो खरीद कर क्या करेंगे तो बिलवासी जी बोले कि उन्हें पुरानी और ऐतिहासिक चीजों को एकत्रित करने का शौक है। उनके ऐसा कहने पर अंग्रेज भी तुरंत बोला कि उसे भी पुरानी और ऐतिहासिक चीजों के संग्रह करने का शौक है। उसने यह भी बताया की जिस समय यह लोटा उसके ऊपर गिरा था, उस समय भी वह यही काम कर रहा था। वह उस दुकान से पीतल की कुछ पुरानी मूर्तियाँ खरीद रहा था। बिलवासी जी अंग्रेज की बात सुन कर बोले कि चाहे जो भी हो वे ही उस लोटे को खरीदेंगे। अंग्रेज उनसे बहस करने लगा कि वे उस लोटे को नहीं खरीद सकते क्योंकि उस पर केवल उसका अधिकार है अतः वह ही उस लोटे को खरीदेगा। 

’’हक है?’’

’’जरूर हक है। यह बताइए कि उस लोटे के पानी से आपने स्नान किया या मैंने?’’

’’आपने।’’

’’वह आपके पैरों पर गिरा या मेरे?’’

’’आपके।’’

’’अँगूठा उसने आपका भुरता किया या मेरा?’’

’’आपका।’’

’’इसलिए उसे खरीदने का हक मेरा है।’’

हक – अधिकार

भुरता – कुचलना

लेखक कहते हैं कि अब बिलवासी जी अंग्रेज से बहस करने लगे कि तुम्हारा कैसे अधिकार हो  गया? इस पर अंग्रेज जवाब देता है कि बहुत कारणों से उसका अधिकार सिद्ध होता है। फिर अंग्रेज प्रश् करता है कि यह बताइए कि उस लोटे के पानी से किसका स्नान करवाया था? बिलवासी जी ने उत्तर दिया कि आपका। अंग्रेज फिर पूछता है कि वह किसके पैर पर गिरा? बिलवासी जी ने फिर कहा आपके। अंग्रेज फिर पूछता है कि अँगूठा उसने किसका कुचला था?

बिलवासी जी ने फिर उत्तर दिया कि आपका। इन सभी के आधार पर अंग्रेज कहता है कि इसलिए उसे खरीदने का अधिकार उसी का है। 

“यह सब बकवास है। दाम लगाइए, जो अधिक दे, वह ले जाए।’’

“यही सही। आप इसका पचास रुपया लगा रहे थे, मैं सौ देता हूँ।’’

“मैं डेढ़ सौ देता हूँ।’’

“मैं दो सौ देता हूँ।’’

“अजी मैं ढाई सौ देता हूँ‘‘।

यह कहकर बिलवासी जी ने ढाई सौ के नोट लाला झाऊलाल के आगे फेंक दिए।

बकवास – बेकार की बात

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी अंग्रेज के तर्कों को बेकार की बात कहते हैं और अंग्रेज से कहते हैं कि जो भी ज्यादा दाम लगाएगा, वह ले जाएगा। बिलवासी जी की यह बात अंग्रेज ने मान ली और कहा की वे इस लोटे के पचास रुपया लगा रहे थे, वह सौ देगा। फिर बिलवासी जी कहते है कि वे ढाई सौ देंगे, अंग्रेज और अधिक बोली लगते हुए बोला कि वह दो सौ देगा। बिलवासी जी ने ढाई सौ के नोट लाला झाऊलाल के आगे फेंकते हुए कहा कि वे ढ़ाई सौ रुपए देंगे। 

साहब को भी ताव आ गया। उसने कहा- ’’आप ढाई सौ देते हैं, तो मैं पाँच सौ देता हूँ। अब चलिए।’’ बिलवासी जी अफ़सोस के साथ अपने रुपये उठाने लगे, मानो अपनी आशाओं की लाश उठा रहे हों। साहब की ओर देखकर उन्होंने कहा- ’’लोटा आपका हुआ, ले जाइए, मेरे पास ढाई सौ से अधिक नहीं हैं।’’

ताव – जोश

लेखक कहते हैं कि जब बिलवासी जी ने ढ़ाई सौ रूपए लाला के सामने फेंके तो अंग्रेज भी जोश में आ गया और बोला अगर बिलवासी जी ढाई सौ देते हैं, तो वह पाँच सौ देगा और कहता है कि अब आगे कहिए। बिलवासी जी अफ़सोस के साथ अपने रुपये उठाने लगे, जैसा की बिलवासी जी को सच में बहुत बुरा लग रहा हो कि वे लोटा नहीं खरीद पाए और वे अंग्रेज की ओर देखकर कहने लगे कि यह लोटा उसी का हुआ, ले जाइए, क्योंकि अब बिलवासी जी के पास ढाई सौ से अधिक नहीं हैं। 

यह सुनना था कि साहब के चेहरे पर प्रसन्नता की कूँची गिर गई। उसने झपटकर लोटा लिया और बोला- ’’अब मैं हँसता हुआ अपने देश लैटूँगा। मेजर डगलस की डींग सुनते-सुनते मेरे कान पक गए थे।’’

‘’मेजर डगलस कौन हैं?’’

कूँची – चाबी

लेखक कहते हैं कि अंग्रेज यह सुनते ही कि लोटा उसका हुआ, उसका चेहरा प्रसन्नता से भर उठा। उसने झपटकर लोटा लिया और बोला कि अब वह ख़ुशी-ख़ुशी अपने देश लौटकर जाएगा। उसने यह भी जिक्र किया कि मेजर डगलस की बड़ी-बड़ी बातें सुनते-सुनते उसके कान पक गए थे। मेजर डगलस का नाम सुनते ही बिलवासी जी ने प्रश्न किया कि ये मेजर डगलस कौन हैं?

“मेजर डगलस मेरे पड़ोसी हैं। पुरानी चीजों के संग्रह करने में मेरी उनकी होड़ रहती है। गत वर्ष वे हिंदुस्तान आए थे और यहाँ से जहाँगीरी अंडा ले गए थे।’’

अंग्रेज मेजर डगलस के बारे में बताते हुए कहते हैं कि वे उसके पड़ोसी हैं। उन्हें भी पुरानी चीजें इकठ्ठे करने का शौक है और उसे भी और दोनों में मुकाबला होता रहता है कि कौन किससे ज्यादा चीजें इकठ्ठी करेगा। पीछले वर्श वे हिंदुस्तान आए थे और यहाँ से जहाँगीरी अंडा ले गए थे और उसके आगे ढींगे मार रहे थे कि देखो वे कितनी अदभूत चीज लेकर आए हैं। 

“जहाँगीरी अंडा?’’

“हाँ, जहाँगीरी अंडा। मेजर डगलस ने समझ रखा था कि हिंदुस्तान से वे ही अच्छी चीजें ले सकते हैं।’’

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी जहाँगीरी अंडा के नाम सुन कर आश्चर्य के साथ अंग्रेज से उसके बारे में पूछते हैं।  तो अंग्रेज ने उत्तर दिया कि मेजर डगलस ने समझ रखा था कि हिंदुस्तान से वे ही अच्छी चीजें ले सकते हैं। और कोई नहीं ला सकता।

“पर जहाँगीरी अंडा है क्या?’’ 

“आप जानते होंगे कि एक कबूतर ने नूरजहाँ से जहाँगीर का प्रेम कराया था। जहाँगीर के पूछने पर कि, मेरा एक कबूतर तुमने कैसे उड़ जाने दिया, नूरजहाँ ने उसके दूसरे कबूतर को उड़ाकर बताया था, कि ऐसे।

लेखक कहते हैं कि अंग्रेज अपनी ही बातों में मस्त था, उसने बिलवासी जी की बात नहीं सुनी तो बिलवासी जी ने उत्सुकता के साथ फिर पूछा कि आखिर ये जहाँगीरी अण्डा है क्या? इस बार अंग्रेज कहता है कि वे जानते होंगे कि एक कबूतर ही नूरजहाँ और जहाँगीरी के प्रेम का कारण बना था। जहाँगीर के पूछने पर कि, उसका एक कबूतर नूरजहाँ ने कैसे उड़ जाने दिया, नूरजहाँ ने उसके दूसरे कबूतर को उड़ाकर बताया था, कि ऐसे। 

उसके इस भोलेपन पर जहाँगीर दिलोजान से निछावर हो गया। उसी क्षण से उसने अपने को नूरजहाँ के हाथ कर दिया। कबूतर का यह एहसान वह नहीं भूला। उसके एक अंडे को बड़े जतन से रख छोड़ा। एक बिल्लोर की हाँडी में वह उसके सामने टँगा रहता था।

निछावर – बलिदान

अंग्रेज आगे बताता है कि नूरजहाँ के इस भोलेपन पर जहाँगीर दिलोजान से निछावर हो गया अर्थात् उनपर मोहित हो गए। उसी क्षण से उसने नूरजहाँ के आगे अपने आप को सौंप दिया। कबूतर का यह एहसान वह नहीं भूले थे क्योंकि उस कबूतर की वजह से ही जहाँगीर नूरजहाँ से मिले थे। उसके एक अंडे को बड़े जतन से, बडे़ ही कोशिश से अपने पास सहज कर रखा था। एक बिल्लोर की हाँडी में वह उसके सामने टँगा रहता था। 

बाद में वही अंडा ’’जहाँगीरी अंडा’’ के नाम से प्रसिद्व हुआ। उसी को मेजर डगलस ने पारसाल दिल्ली में एक मुसलमान सज्जन से तीन सौ रुपये में खरीदा।

“यह बात?’’

“हाँ, पर अब मेरे आगे दून की नहीं ले सकते। मेरा अकबरी लोटा उनके जहाँगीरी अंडे से भी एक पुश्त पुराना है।’’

पारसाल – पीछले साल

पुश्त – पीढ़ी

आगे अंग्रेज कहता है कि बाद में वही अंडा “जहाँगीरी अंडा’’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसी को मेजर डगलस ने पिछले साल दिल्ली में एक मुसलमान सज्जन से तीन सौ रुपये में खरीदा। और वह इसी बात की ढींगे अंग्रेज व्यक्ति के समाने हाँक रहे थे। अब बिलवासी जी को जहाँगीरी अण्डे की पूरी कहानी ज्ञात हो गई थी। अब अंग्रेज बड़ी ख़ुशी से बोला कि अब उनका पडोसी उनके आगे बड़ी-बड़ी बाते नहीं कर सकेगा क्योंकि अब उसके पास भी अकबरी लोटा है और उसका अकबरी लोटा उसके पडोसी के जहाँगीरी अंडे से भी एक पुश्त पुराना है।

 

“इस रिश्ते से तो आपका लोटा उस अंडे का बाप हुआ।”

साहब ने लाला झाऊलाल को पाँच सौ रुपये दे कर अपनी राह ली। लाला झाऊलाल का चेहरा इस समय देखते बनता था। जान पड़ता था कि मुँह पर छः दिन की बड़ी हुई दाढ़ी का एक-एक बाल मारे प्रसन्नता के लहरा रहा है। उन्होंने पूछा -“बिलवासी जी! मेरे लिए ढ़ाई सौ रूपया घर से ले कर आए! पर आपके पास तो थे नहीं।”

अंग्रेज की बात सुन कर बिलवासी जी ने मज़ाक के साथ अंग्रेज से कहा कि इस रिश्ते से तो आपका लोटा आपके पड़ोसी के उस अंडे का बाप हुआ। अंग्रेज ने लाला झाऊलाल से वह लोटा पाँच सौ रुपये में खरीद लिया और अपने रास्ते चल पड़ा। लाला झाऊलाल का चेहरा इस समय देखते बनता था। लाला झाऊलाल हाथ कहाँ तो ढाई सौ रुपये का इंतजाम नहीं कर पा रहे थे और अब उन्हें एक मुक्त में पाँच सौ रुपये मिल गए थे तो उनकी खुशी का ठिकाना ही नहीं था। ऐसा लग रहा था कि उसके चेहरे पर छह दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी का एक-एक बाल अपनी खुशी जाहिर कर रहा था उनके चहेरे पर प्रसन्नता साफ झलक रही थी। अब लाला झाऊलाल ने अपने मित्र से अपनी बात कही कि क्या जो तुमने मेरे साथ वादा किया था ढाई सौ रुपये घर से लाने का क्या वह तुम्हारे पास वकाई में नहीं थे ऐसा कहकर वह हँसने लगे।

“इस भेद को मेरे सिवाए मेरा ईश्वर ही जानता है। आप उसी से पूछ लीजिए, मैं नहीं बताऊँगा।’’

“पर आप चले कहाँ? अभी मुझे आपसे काम है दो घंटे तक।’’

“दो घंटे तक?’’

लेखक कहते हैं कि जब लाला ने बिलवासी जी से पूछा कि वह पैसे कहाँ से लाए हैं तो बिलवासी जी ने उत्तर देते हुए कहा कि इस रहस्य की बात को उनके सिवाए केवल उनका ईश्वर ही जानता है। अगर उनको जानना है तो ईश्वर से पूछ लें क्योंकि वे तो लाला को नहीं बताने वाले। बिलवासी जी आगे बढ़ कर कहीं जाने लगे तो झाऊलाल ने उनसे पूछा कि वे अब कहाँ जा रहे हैं। अभी तो उन्हें उनसे दो घंटे का काम बाकी है। बिलवासी जी आश्चर्य के साथ लाला से पूछते हैं कि ऐसा क्या काम है जिसमें दो घण्टे लगने हैं। 

“हाँ, और क्या, अभी मैं आपकी पीठ ठोककर शाबाशी दूँगा, एक घंटा इसमें लगेगा। फिर गले लगाकर धन्यवाद दूँगा, एक घंटा इसमें भी लग जाएगा।’’

“अच्छा पहले पाँच सौ रुपये गिनकर सहेज लीजिए।’’

बिलवासी जी जब लाला से पूछते हैं कि ऐसा क्या काम है जिसमें दो घण्टे लगने हैं। तब लाला जवाब देते हैं कि अभी वह उनकी पीठ ठोककर शाबाशी देगा, जिसमें एक घंटा तो लग ही जाएगा। फिर गले लगाकर धन्यवाद दूँगा, एक घंटा तो उसमें भी लग जाएगा। अब लाला झाऊलाल की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था वह अपने मित्र की पीठ ठोककर उसको शाबाशी देकर और उसका धन्यवाद करना चाहते थे क्योंकि यह सब कुछ उसकी वजह से ही हो सका था। बिलवासी जी ने लाला से कहा कि यह सब बाद में करना पहले अब यह अपने पाँस सौ रुपये जरा संभालकर गिनकर अपने पास रख लिजिए।

“रुपया अगर अपना हो, तो उसे सहेजना एक ऐसा सुखद मनमोहक कार्य है कि मनुष्य उस समय सहज में ही तन्मयता प्राप्त कर लेता है। लाला झाऊलाल ने अपना कार्य समाप्त करके ऊपर देखा। पर बिलवासी जी इस बीच अंतर्धान हो गए।’’ 

सुखद – सुख देने वाला

तन्मयता – लगन

लेखक कहते हैं कि रुपया अगर अपना हो, तो उसे संभल कर रखने में एक अलग ही सुख की प्राप्ति होती है और मनुष्य उस समय अपने आप ही में ही बड़े लगन के साथ उसे इस्तेमाल करने की सोचता रहता है। लाला झाऊलाल ने जैसे ही पैसा संभल कर रखा और ईश्वर का धन्यवाद करते हुए ऊपर देखा। तब तक बिलवासी जी वहाँ से चले गए थे।  

उस दिन रात्रि में बिलवासी जी को देर तक नींद नहीं आई। वे चादर लपेटे चारपाई पर पड़े रहे। एक बजे वे उठे। धीरे, बहुत धीरे से अपनी सोई हुई पत्नी के गले से उन्होंने सोने की वह सिकड़ी निकाली जिसमें एक ताली बँधी हुई थी। फिर उसके कमरे में जाकर उन्होंने उस ताली से संदूक खोला।

ताली – चाबी

संदूक – बक्सा

लेखक कहते हैं कि उस दिन रात में बिलवासी जी को देर तक नींद नहीं आई। वे चादर लपेटे चारपाई पर ऐसे ही पड़े रहे। करीब एक बजे वे अपने बिस्तर से उठे। उन्होंने धीरे, बहुत धीरे से अपनी सोई हुई पत्नी के गले से सोने का छल्ला निकाला जिसमें एक ताली बँधी हुई थी। फिर उसके कमरे में जाकर उन्होंने उस ताली से संदूक खोला और उसमें चुपचाप पैसे रख दिए। इसका अर्थ यह हुआ कि जो पैसे वे लाला की मदद के लिए लाए थे वो अपनी पत्नी को बिना बताए उसके संदूक से निकाल कर लाए थे। यही उनका राज था जो केवल वे और उनका ईश्वर ही जानते थे। 

उसमें ढाई सौ के नोट ज्यों-के-त्यों रखकर उन्होंने उसे बंद कर दिया। फिर दबे पाँव लौटकर ताली को उन्होंने पूवर्वत अपनी पत्नी के गले में डाल दिया। इसके बाद उन्होंने हँसकर अँगड़ाई ली। दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक चैन की नींद सोए।

लेखक कहते हैं कि बिलवासी जी ने जो ढ़ाई सौ रूपए लाला की मदद के लिए निकाले थे उन्होंने उन रुपयों को उस संदूक में ज्यों-के-त्यों रख दिया और उसे बंद कर दिया। फिर वे बिना कोई आवाज़ किए लौटकर आए और ताली को उन्होंने पहले की तरह अपनी पत्नी के गले में डाल दिया। सारा काम सफलता पूर्वक हो जाने के बाद उन्होंने हँसकर अँगड़ाई ली और अपनी जीत की खुशी मनाते हुए सो गए और दूसरे दिन सुबह आठ बजे तक चैन की नींद सोए रहे।

 

पाठ का सार –

पंडित अन्नपूर्णानद जी ने इस कहानी में बताया है कि लाला झाऊलाल नामक व्यक्ति बहुत अमीर नहीं है। पर उन्हें गरीब भी नहीं कहा जा सकता। पत्नी के ढाई सौ रूपए माँगने तथा अपने मायके से लेने की बात पर अपनी इज्जत के लिये सात दिन में रुपये देने की बात की।

पाँच दिन बीतने पर अपने मित्र बिलवासी को यह घटना सुना कर पैसे की इच्छा रखी पर उस समय उनके पास रूपए न थे। बिलवासी जी ने उसके अगले दिन आने का वादा किया जब वह समय पर न पहुँचे तो झाऊलाल चिंता में छत पर टहलते हुए पानी माँगने लगे। पत्नी द्वारा लाये हुए नापसंद लोटे में पानी पीते हुए लोटा नीचे एक अंग्रेज पर गिर गया।

अंग्रेज एक लंबी चौड़ी भीड़ सहित आँगन में घुस गया और लोटे के मालिक को गाली देने लगा। बिलवासी जी ने बड़ी चतुराई से अंग्रेज को ही मुर्ख बनाकर उसी लोटे को अकबरी लोटा बताकर उसे 500 रूपए में बेच दिया। इससे रुपये का इंतजाम भी हो गया और झाऊलाल की इज्जत भी बच गई। इससे लाला बहुत प्रसन्न हुए उसने बिलवासी जी को बहुत धन्यवाद दिया।

बिलवासी ने पत्नी के संदूक से लाला की मदद के लिये निकले गए ढाई सौ रुपये उसके संदूक में वापस रख दिए फिर चैन की नींद सो गए।

 

प्रश्न अभ्यास –

प्रश्न 1 – “लाला ने लोटा ले लिया, बोले कुछ नहीं, अपनी पत्नी का अदब मानते थे।’’ लाला झाउलाल को बेढंगा लोटा बिलकुल पसंद नहीं था। फिर भी उन्होंने चुपचाप लोटा ले लिया। आपके विचार से वे चुप क्यों रहे? अपने विचार लिखिए।

उत्तर – एक सभ्य मनुष्य अपनी पत्नी का सम्मान करता है। लाला झाउलाल सभ्य मनुष्य थे। कहानी में लाला झाउलाल छह दिनों तक भी रूपयों का इंतजाम नहीं कर पाए थे इसलिए वह बहुत दुःखी और शर्मिन्दा थे। और इसीलिए उन्होंने लोटा चुपचाप ले लिया और पानी पीने लगे।

प्रश्न 2 – “लाला झाउलाल जी ने फौरन दो और दो जोड़कर स्थिति को समझ लिया।’’ आपके विचार से लाला झाउलाल ने कौन-कौन सी बातें समझ ली होंगी?

उत्तर – लाला भीड़ को घर में घुसते देख ही समझ गए कि उनके हाथ से छूटा लोटा जरूर किसी पर गिरा है। जिसकी शिकायत लेकर ये भीड़ उनके घर में चली आ रही थी।

प्रश्न 3 – बिलवासी जी ने रुपयों का प्रबंध कहाँ से किया था? लिखिए।

उत्तर – बिलवासी जी ने रुपयों का प्रबंध अपनी पत्नी के संदूक से चोरी करके निकाल कर किया था। यद्यपि चाबी उसकी पत्नी की सोने की चेन में बँधी रहती थी, पर उन्होंने चुपचाप उसे उतार कर ताली से संदूक खोल लिया था और रुपए निकाल लिए थे। बाद में वे रुपए चुपचाप वहीं रख भी दिए। पत्नी कुछ न जान पाई।

प्रश्न 4 – आपके विचार में अंग्रेज ने वह पुराना लोटा क्यों खरीद लिया? आपस में चर्चा करके वास्तविक कारण की खोज कीजिए और लिखिए।

उत्तर – अंग्रेज पुरानी ऐतिहासिक महत्त्व की चीज़े खरीदने के शौकीन होते हैं। उस अंग्रेज का एक पड़ोसी मेजर डगलस पुरानी चीज़ों में उससे बाजी मारने का दावा करता रहता था। उसने एक दिन जहाँगीरी अंडा दिखाकर कहा था कि वह इसे दिल्ली से 300 रुपए में लाया है। वह लोटा अकबरी था ही नहीं, बिलवासी ने उसे मूर्ख बनाया था। इस लोटे को दिखाकर वह मेजर डगलस को नीचा दिखाना चाहता था और स्वंय को श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहता था।

प्रश्न 5 – पं. बिलवासी मिश्र कहाँ आते दिखाई पड़े? उन्होंने आते ही क्या किया? उन्होंने अंग्रेज के साथ किस प्रकार सहानुभूति प्रकट की?

उत्तर – पं. बिलवासी मिश्र भीड़ को चीरते हुए आँगन में आते दिखाई पड़े। उन्होंने आते ही पहला काम यह किया कि उस अंग्रेज को छोड़ कर बाकी जितने लोग थे सबको बाहर कर रास्ता दिखाया और फिर आगँन में कुर्सी रखकर उन्होंने उस अंग्रेज से कहा कि उसके पैर में शायद कुछ चोट आ गई है। इसलिए वह आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए। जब पं. बिलवासी ने अंग्रेज को बैठने को कहा तो अंग्रेज बिलवासी जी को धन्यवाद देते हुए बैठ गया। लाला झाऊलाल की ओर इशारा करके अंग्रेज ने बिलवासी जी से पूछा कि क्या वे लाला को जानते हैं? बिलवासी बिलकुल मुकर गए और कहते हैं कि वे लाला को बिलकुल नहीं जानते और न ही वह ऐसे आदमी को जानना चाहते हैं जो राह चलते व्यक्तियों को लोटे से चोट पहुँचाए।

 

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