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‘सूरदास के पद’ Summary, Explanation, Question and Answers and Difficult word meaning

 

कक्षा 8 पाठ 15 

सूरदास के पद

सूरदास के पद पाठ प्रवेश सूरदास के पद पाठ-की-व्याख्या
सूरदास के पद पाठ-सार सूरदास के पद प्रश्न-अभ्यास

कवि सूरदास

जन्म 1478 ईस्वी 

मृत्यु 1580 ईस्वी 

स्थान रुनकता (आगरादृमथुरा)

सूरदास के पद पाठ प्रवेश 

सूरदास जी भक्ति काल की कृष्ण भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उनकी अधिकतर रचनाएँ भक्ति पर आधारित हैं। इन पदों में कवि ने बाल कृष्ण की अद्भुत लीलाओं का मनोहारी चित्र प्रस्तुत किया है। यहाँ कवि ने वात्सल्य रस की सुन्दर अभिव्यक्ति की है। किस तरह माता यशोदा अपने लला का पालन-पोषण करती हैं और किस तरह से गोंपियाँ शिकायत लेकर आती हैं? सूरदास जी के इस पद में कृष्ण के बालपन और उनकी मैया के साथ उनका कैसा नाता था और गोपियों के साथ वह किस तरह से शरारतें करते थे यही सब बताया गया है। बालक श्री कृष्ण का अपनी माँ से शिकायत करना बड़े सुन्दर ढंग से बताया गया है तथा गोपियों का यशोदा से शिकायत करना कि उनका लला बहुत शैतानी करता है, बहुत शरारत करता है, फिर भी अनोखा है, सबसे अच्छा है, अदभूद है, सबको प्यारा लगता है। सूरदास ने गोपियों का कृष्ण से दूर ना जाने का भाव दर्शाया है। सूरदास ने अपने इन पदों में गोपियों से कृष्ण से बिछड़ जाना और उनका विरह में तड़पना बहुत ही सुन्दर तरीके से दर्शाया है।
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सूरदास के पद पाठ की व्याख्या 

(1)

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?

किती बार मोहिं दूध पियत भई, यह अजहूँ है छोटी।

तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्नै है लाँबी-मोटी।

काढ़त-गुहत न्हवावत जैहै, नागिन सी भुइँ लोटी।

काचौ दूध पियावत पचि-पचि, देति न माखन-रोटी।

सूर चिरजीवौ दोउ भैया, हरि-हलधर की जोटी।

कबहिं – कब

किती – कितनी

पियत – पिलाना

अजहूँ – आज भी 

बल – बलराम

बेनी – चोटी

लाँबी-मोटी – लंबी-मोटी 

काढ़त – बाल बनाना

गुहत – गूँथना

न्हवावत – नहलाना

नागिन – नागिन

भुइँ – भूमि

लोटी – लोटने लगी 

काचौ – कच्चा

पियावति – पिलाती

पचि-पचि – बार-बार

माखन – मखक्न 

चिरजीवी – चिरंजीवी

दोउ – दोनों

हरि-हलधर – कृष्ण-बलराम

जोटी – जोड़ी

प्रसंग – प्रस्तुत पद हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक “वसंत भाग-3” में सूरदास द्वारा रचित ‘सूरदास के पद’ से अवतरित है। इसमें सूरदास जी ने श्री कृष्ण की बाल लीला का वर्णन किया है। 

व्याख्या – सूरदास जी बताते हैं कि श्री कृष्ण बालपन में यशोदा से पूछते हैं कि उनकी चोटी कब बढ़ेगी, यह आज तक क्यों नहीं बढ़ी। वह माँ यशोदा से शिकायत करते हैं कि तुम मुझसे कहती थी की जैसे बलराम भैया की लंबी-मोटी चोटी है, मेरी भी वैसी हो जायेगी। तू मेरे बाल बनाती है, इन्हें धोती है पर यह नागिन की तरह भूमि पर क्यों नहीं लोटती। तू मुझे सिर्फ बार-बार दूध पिलाती है, मक्खन व रोटी खाने को नहीं देती। इसलिए ये बड़ी नहीं होती। सूरदास जी कहते हैं की ऐसी सुन्दर लीला दिखाने वाले दोनों भाई कृष्ण और बलराम की जोड़ी बनी रहे।

(2) 

तेरैं लाल मेरौ माखन खायौ। 

दुपहर दिवस जानि घर सूनो ढूँढ़ि-ढँढ़ोरि आपही आयौ।

खोलि किवारि, पैठि मंदिर मैं, दूध-दही सब सखनि खवायौ। 

उफखल चढ़ि, सींवेफ कौ लीन्हौ, अनभावत भुइँ मैं ढरकायौ। 

दिन प्रति हानि होति गोरस की, यह ढोटा कौनैं ढँग लायौ। 

सूर स्याम कौं हटकि न राखै तैं ही पूत अनोखौ जायौ।

 

लाल – बेटा

माखन – मक्खन

दुपहर – दोपहर

ढूँढ़ि – खोजकर

आपही – अपने आप

किवारि – दरवाजा

पैठि – घुसकर

सखनि – दोस्त/मित्र

उखल – ओखली

चढि – चढ़ना

सींके – छिका

अनभावत – जो अच्छा न लगे

भुइँ – भूमि

ढरकायौ – गिरना

हानि – नुक्सान

होति गोरस – गाय के दूघ से बने पदार्थ

ढोटा – लड़का

हटकि – हटाकर

पूत – पुत्र

अनोखौ – अनोखा

जायौ – जन्म देना

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प्रसंग – प्रस्तुत पद हमारी हिंदी की पाठ्य पुस्तक “वसंत भाग-3” में सूरदास जी द्वारा रचित ‘सूरदास के पद’ से अवतरित है। इसमें सूरदास जी ने श्री कृष्ण की गोपियों के साथ शरारतों का वर्णन किया है। 

व्याख्या – सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ सदा श्री कृष्ण की शिकायत यशोदा माँ से करती रहती है। एक गोपी यशोदा जी को कहती है कि आपका लाल मेरा मक्खन खा जाता है, दोपहर के समय जब उसका घर खाली होता है, तो कृष्ण स्वयं ही ढूंढकर घर आ जाते हैं। वह हमारे मंदिर के दरवाज़े खोलकर उसमे घुस जाते हैं तथा अपने मित्रों को दही-मक्खन खिला देते हैं। वह ओखली पर चढ़कर छीके तक पहुँच जाते हैं तथा मक्खन खा लेते हैं, और बहुत सारा मक्खन भूमि पर गिरा देते हैं। जिससे हर रोज़ दूध-दही का नुकसान कर देते हैं, गोपियाँ कहती हैं कि आपका यह बेटा कैसा है जो हमें सताता हैं। सूरदास जी कहते हैं कि फिर भी उसे अपने से अलग नहीं करा जा सकता। यशोदा तुमने सबसे अनोखे बेटे को जन्म दिया है। 
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सूरदास के पद पाठ सार 


पहले पद में सूरदास जी ने कृष्ण के मन के भावों का सुन्दर वर्णन है। कृष्ण चाहते थे कि उनकी चोटी भाई बलराम की तरह ज़मीन पर लोटे। यद्यपि माँ यशोदा नियम से उनके बाल धोती थी और गूंथती थी। फिर भी उनके बाल लंबे नहीं होते थे। दूसरे पद में एक ग्वालन माँ यशोदा को उलाहना देते हुए कहती हैं कि नटखट कृष्ण प्रतिदिन उनके घर से मक्खन चोरी करके खा जाते हैं। वह यशोदा से कहती हैं कि उसने अनोखे पुत्र को जन्म दिया है जो दूसरों से अलग है। ग्वालन की शिकायत में सूरदास जी द्वारा वात्सल्य प्रेम की अभिव्यक्ति सराहनीय है। 
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सूरदास के पद  प्रश्न-अभ्यास (महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर )

प्रश्न 1 – बालक कृष्ण किस लोभ के कारण दूध पीने के लिए तैयार हुए?

उत्तर – यशोदा माँ बालक कृष्ण को लोभ देती थी कि यदि वह नियम से प्रतिदिन दूध पीएँगे तो उनकी चोटी भाई बलराम की तरह लंबी और मोटी हो जाएगी। कृष्ण अपने बाल बढ़ाना चाहते थे इसलिए वह ना चाहते हुए भी दूध पीने के लिए तैयार हो गए। 

प्रश्न 2 – कृष्ण अपनी चोटी के विषय में क्या-क्या सोच रहे थे?

उत्तर – कृष्ण अपनी चोटी के बारे में सोचते थे कि उनकी चोटी भी दूध पीने से बलराम भैया के जैसी लंबी-मोटी हो जाएगी। माता यशोदा हर रोज उन्हें पीने को दूध देती थी, फिर भी उनकी चोटी बढ़ नहीं रही थी। 

प्रश्न 3 – दूध की तुलना में कृष्ण कौन-सा पदार्थ अधिक पसंद करते थे?

उत्तर – कृष्ण अपनी माँ के कहने पर दूध पीते थे परंतु उन्हें दूध पीना ज़रा भी पसंद नहीं था। दूध पीने की जगह मक्खन और रोटी खाना पसंद करते थे। माँ के बार-बार दूध पिलाने के कारण वह मक्खन और रोटी नहीं खा पाते थे। 

प्रश्न 4 – “तैं ही पूत अनोखौ जायौ” पंक्ति में ग्वालन के मन के कौन से भाव मुखरित हो रहे हैं?

उत्तर – ये शब्द ग्वालन ने यशोदा से कहे। वह शिकायत करती हुई कहती है कि नटखट कृष्ण प्रतिदिन उनके घर से मक्खन चोरी करके खा जाते हैं। वह यशोदा से कहती हैं कि उन्होंने अनोखे पुत्र को जन्म दिया है जो दूसरों से अलग हैं। 

प्रश्न 5 – मक्खन चुराते समय कृष्ण थोड़ा सा मक्खन बिखरा क्यों देते हैं?

उत्तर – श्री कृष्ण बहुत छोटे थे और छींका बहुत ऊँचा था। जब वह छींका से मक्खन चोरी करते थे तो थोड़ा मक्खन इधर-उधर बिखर जाता था क्योंकि उनका हाथ छींके तक नही पहुँच पाता था। कृष्ण ऐसा जान-बूझकर भी करते थे ताकि उनकी चोरी पकड़ी जाए और माँ उनसे नाराज़ हो जाए तथा माँ को मनाने का अवसर मिले। 

प्रश्न 6 – दोनों पदों में से आपको कौन सा पद अधिक पसंद आया और क्यों?

उत्तर – दोनों पदों में से मुझे पहला पद ज़्यादा पसंद आया ज्यों की सूरदास जी ने भक्तिरस में डूबकर बाल सुलभ व्यवहार का मनमोहक चित्र प्रस्तुत किया है। वात्सल्य रास की सुन्दर अभिव्यक्ति की है। बालक श्री कृष्ण का अपनी माँ से शिकायत करना बड़े सुन्दर ढंग से बताया गया है।
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