रैदास के पद सार Raidas ke Pad Summary, Explanation, Word Meanings | CBSE Class 9 Hindi (Ganga Chapter 8)

 

रैदास के पद पाठ सार

CBSE Class 9 Hindi Chapter 8 “Raidas ke Pad”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Ganga Book

प्रस्तुत पाठ कक्षा 9 की पुगंगा पुस्तक से लिया गया है। पाठ में रैदास  के दो पद लिए गए हैं। इन पदों में कवि की निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति व्यंजित होती है। पहले पद ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ में कवि अपने आराध्य को याद करते हुए उनसे अपनी तुलना करता है। पहले पद में कवि ने भगवान् की तुलना चंदन, बादल, चाँद, मोती, दीपक से और भक्त की तुलना पानी, मोर, चकोर, धागा, बाती से की है। यही नहीं, कवि का आराध्य प्रभु हर हाल में, हर काल में उससे श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न है। इसीलिए तो कवि को उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती है।
दूसरे पद में वो  कहते हैं कि यदि प्रभु उनसे संबंध तोड़ लें, तो भी वे प्रभु से नाता नहीं तोड़ेंगे।

 

रैदास के पद का संक्षिप्त अवलोकन (Raidas ke Pad Quick Overview)

विवरण जानकारी
पाठ शीर्षक ‘रैदास (पद)’  
कवि  रैदास (संत रविदास)
किताब गंगा (NCERT कक्षा 9 हिंदी पुस्तक)  
पाठ नं. 8
पदवाचक कवि 
सेटिंग कवि का भाव 

 

Related:

 

प्रश्न – NCERT कक्षा 9 हिंदी पुस्तक गंगा के पाठ ‘रैदास के पद’ का पाठ सारांश लिखिए।
अथवा
NCERT कक्षा 9 हिंदी पुस्तक गंगा के पाठ ‘रैदास के पद’ का पाठ सार अपने शब्दों में लिखिए। 

उत्तर – प्रस्तुत पाठ में रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद में कवि बताते हैं कि जैसे चंदन-पानी, दीपक बाती, मोती-धागा और बादल-मोर का संबंध अटूट होता है, वैसे ही भक्त से उसके आराध्य अलग नहीं हो सकते। इस पद में अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव प्रकट होता है। दूसरे पद में भी आराध्य से भक्त का अटूट नाता व्यक्त किया गया है। वह तीर्थ और व्रत छोड़ सकता है, पर प्रभु चरणों की भक्ति नहीं। यह पद निष्ठा, विश्वास और अडिग भक्ति को व्यंजित करता है।

  • कवि की राम-नाम की लगन – रैदास में प्रभु के प्रति अनन्य भक्ति और आराध्य के प्रति समर्पण का भाव है। उन्हें जो भगवान राम का नाम जपने की आदत लग गई है वह कैसे छूटेगी? कहने का आशय यह है की उनके मन में राम-नाम की लगन इतनी गहरी हो गई है कि अब वे उसे किसी भी तरह छोड़ नहीं सकते। 
  • प्रभु चंदन, कवि पानी – कवि का मानना है कि जैसे पानी में घिसा हुआ चंदन अपनी सुगंध पानी के हर एक कण में फैला देता है, उसी प्रकार प्रभु की भक्ति कवि के अंग-अंग में समा गई है।
  • प्रभु घने बादल, कवि मोर – जैसे मोर बादल को देखकर प्रसन्न होता है और नाचने लगता है, उसी प्रकार कवि भी प्रभु के दर्शन पाकर आनंदित हो जाता है। 
  • प्रभु दीपक, कवि बाती – जैसे बाती दिन-रात जलकर दीपक को प्रकाश देती है, उसी तरह कवि भी प्रभु की भक्ति में रात-दिन जलता रहता है और प्रभु उसे जीवन का प्रकाश देते हैं।
  • प्रभु मोती, कवि धागा – कवि मानता है कि कवि के मन रूपी धागे में पिरोया प्रभु भक्ति रूपी मोती सुरक्षित है। कवि कहता है कि जैसे सुहागा सोने की अशुद्धियाँ दूर करता है, उसी प्रकार प्रभु की भक्ति कवि को शुद्ध करती है। 
  • कवि का केवल प्रभु ही आश्रय – यदि प्रभु रैदास से संबंध तोड़ लें, तो भी वे प्रभु से नाता नहीं तोड़ेंगे। यदि वे प्रभु से नाता तोड़ लेंगे, तो फिर किससे नाता जोडेंगें? अर्थात कवि का प्रभु के सिवाय कोई आश्रय नहीं है। कवि के लिए बाह्य धार्मिक कर्मकांड कोई मायने नहीं रखते, बल्कि प्रभु की भक्ति ही उनके लिए मुक्ति का मार्ग है।
  • कवि के लिए प्रभु सर्वव्यापक – जहाँ-जहाँ भी कवि जाते हैं, वहाँ-वहाँ प्रभु की पूजा होती है। प्रभु के समान कोई दूसरा देव नहीं है। कवि की यह धारणा सर्वव्यापक ईश्वर को दर्शाता है। जब ईश्वर से सच्चा प्रेम हो जाता है तो सांसारिक मोह-माया स्वयं छूट जाती है। कवि को हर पल, हर घड़ी प्रभु का ही भरोसा है। मन से, कर्म से और वचन से कवि प्रभु की भक्ति करता है।

Top

रैदास के पद पाठ व्याख्या

पद – 1
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा॥

शब्दार्थ –
बास – गंध, वास
समानी – समाना (सुगंध का बस जाना), बसा हुआ (समाहित)
घन – बादल
मोरा – मोर, मयूर
चितवत – देखना, निरखना
चकोर – तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है
बाती – बत्ती, रुई, जिसे तेल में डालकर दिया जलाते हैं
जोति – ज्योति, देवता के प्रीत्यर्थ जलाया जाने वाला दीपक
बरै – बढ़ाना, जलना
राती – रात्रि
सुहागा – सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में आने वाला क्षारद्रव्य
दासा – दास, सेवक

व्याख्याइस पद में कवि ने भक्त की उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर अपने आराध्य की भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है कवि के कहने का अभिप्राय है कि एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो भक्त को भगवान् की भक्ति से दूर करना असंभव हो जाता है।
कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु! यदि तुम चंदन हो तो तुम्हारा भक्त पानी है। कवि कहता है कि जिस प्रकार चंदन की सुगंध पानी के बूँद-बूँद में समा जाती है उसी प्रकार प्रभु की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु!
यदि तुम बादल हो तो तुम्हारा भक्त किसी मोर के समान है जो बादल को देखते ही नाचने लगता है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु यदि तुम चाँद हो तो तुम्हारा भक्त उस चकोर पक्षी की तरह है जो बिना अपनी पलकों को झपकाए चाँद को देखता रहता है।
कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु यदि तुम दीपक हो तो तुम्हारा भक्त उसकी बत्ती की तरह है जो दिन रात रोशनी देती रहती है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु! यदि तुम मोती हो तो तुम्हारा भक्त उस धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं।
उसका असर ऐसा होता है जैसे सोने में सुहागा डाला गया हो अर्थात उसकी सुंदरता और भी निखर जाती है। कवि रैदास अपने आराध्य के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते हुए कहते हैं कि हे मेरे प्रभु! यदि तुम स्वामी हो तो मैं आपका भक्त आपका दास यानि नौकर हूँ।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न – 

प्रश्न – प्रस्तुत पद में कवि ने भक्त की किस अवस्था का वर्णन किया है ?

उत्तर – प्रस्तुत पद में कवि ने भक्त की उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर अपने आराध्य की भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है कवि के कहने का अभिप्राय है कि एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो भक्त को भगवान् की भक्ति से दूर करना असंभव हो जाता है।

प्रश्न – कवि ने प्रभु और भक्त के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए किन उदाहरणों को लिया है ?

उत्तर – कवि के अनुसार प्रभु यदि चंदन है तो भक्त पानी है। प्रभु बादल है तो भक्त मोर है। प्रभु यदि चाँद है तो भक्त चकोर पक्षी है। प्रभु यदि दीपक है तो भक्त उसकी बत्ती है। प्रभु यदि मोती है तो भक्त उस धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं। कवि रैदास अपने आराध्य के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते हुए कहते हैं कि प्रभु यदि स्वामी है तो भक्त आपका दास है यानि नौकर है। 

 

पद – 2
जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ, तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ।
तीरथबरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरनकमल एकभरोसां।
जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा, तुम सा देव ओर नहिं दूजा।
मैं अपनो मन हरि से जोरौ, हरि सो जोरि सबन सो तोरों।
सबही पहर तुम्हारी आसा, मन क्रम वचन कहै रैदासा।

शब्दार्थ –
तोरौ – छोड़ो
कवन – किसी से
जोरौ – जोड़ना
तीरथबरत – तीर्थ और व्रत
अंदेसा – चिंता 

व्याख्या – रैदास कहते हैं कि यदि प्रभु उनसे संबंध तोड़ लें, तो भी वे प्रभु से नाता नहीं तोड़ेंगे। यदि वे प्रभु से नाता तोड़ लेंगे, तो फिर किससे नाता जोडेंगें? अर्थात कवि का प्रभु के सिवाय कोई आश्रय नहीं है।
कवि को तीर्थ और व्रत की कोई चिंता नहीं है। क्योंकि उनका एकमात्र सहारा प्रभु के चरण-कमल हैं। अर्थात कवि के लिए बाह्य धार्मिक कर्मकांड कोई मायने नहीं रखते, बल्कि प्रभु की भक्ति ही उनके लिए मुक्ति का मार्ग है।
कवि कहते हैं कि जहाँ-जहाँ भी वे जाते हैं, वहाँ-वहाँ प्रभु की पूजा होती है। प्रभु के समान कोई दूसरा देव नहीं है। कवि की यह धारणा सर्वव्यापक ईश्वर को दर्शाता है।
कवि अपना मन हरि (भगवान) से जोड़ता है और हरि से जोड़ने के बाद बाकी सबसे अपना नाता तोड़ लेता है। कहने का आशय यह है कि जब ईश्वर से सच्चा प्रेम हो जाता है तो सांसारिक मोह-माया स्वयं छूट जाती है।
कवि को हर पल, हर घड़ी प्रभु का ही भरोसा है। मन से, कर्म से और वचन से कवि प्रभु की भक्ति करता है। रैदास का सभी को यही संदेश है।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न – 

प्रश्न – ‘जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ’ पंक्ति में कवि क्या बताना चाहते हैं ?

उत्तर – रैदास कहना चाहते हैं कि यदि प्रभु उनसे संबंध तोड़ लें, तो भी वे प्रभु से नाता नहीं तोड़ेंगे। क्योंकि यदि वे प्रभु से नाता तोड़ लेंगे, तो वे किसी और से नाता नहीं जोड़ पाएंगे अर्थात कवि बताना चाहते हैं कि उनका प्रभु के सिवाय कोई आश्रय नहीं है।

प्रश्न – कवि को तीर्थ और व्रत की कोई चिंता क्यों नहीं है और इसका क्या तात्पर्य है ?

उत्तर – कवि को तीर्थ और व्रत की कोई चिंता नहीं है। क्योंकि उनका एकमात्र सहारा प्रभु के चरण-कमल हैं। इसका तात्पर्य यह है कि कवि के लिए बाह्य धार्मिक कर्मकांड कोई मायने नहीं रखते, बल्कि प्रभु की भक्ति ही उनके लिए मुक्ति का मार्ग है। अर्थात कवि केवल ईश्वर भक्ति को ही सर्वोपरि मानते हैं। 

प्रश्न – ‘जहँ जहँ जाओ तुम्हरी पूजा’ से कवि किस धारणा को दर्शाते हैं। 

उत्तर – कवि का मानना हैं कि जहाँ-जहाँ भी वे जाते हैं, वहाँ-वहाँ प्रभु की पूजा होती है। प्रभु के समान कोई दूसरा देव नहीं है। कवि की यह धारणा सर्वव्यापक ईश्वर को दर्शाता है। अर्थात कवि बताना चाहते हैं कि ईश्वर हर जगह हर कण में विद्यमान है। 

Top

रैदास के पद Class 9 Video Explanation

Top

Raidas ke Pad FAQs

प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक स्पर्श  की कविता ‘पद’ के लेखक कौन हैं?

उत्तर: कक्षा 9 की कविता ‘पद’ की रचना रैदास ने की है।

प्रश्न: कक्षा 9 की कविता ‘पद’ का विषय क्या है?

उत्तर: ‘पद’ कविता भक्त की अवस्था का वर्णन, भगवान की महिमा का बखान  के बारे में है।

प्रश्न: ‘पद’ कविता किस विषय पर आधारित है?

उत्तर: कवि ने भगवान् की तुलना चंदन, बादल, चाँद, मोती, दीपक से और भक्त की तुलना पानी, मोर, चकोर, धागा, बाती से की है।
उसका प्रभु बाहर कहीं किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं विराजता अर्थात कवि कहता है कि उनके आराध्य प्रभु किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं रहता बल्कि कवि का प्रभु अपने अंतस में सदा विद्यमान रहता है।

Top