
रैदास के पद पाठ सार
CBSE Class 9 Hindi Chapter 6 “रैदास के पद”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Sparsh Bhag 1 Book
प्रस्तुत पाठ कक्षा 9 की पुस्तक स्पर्श से लिया गया है। पाठ में रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ में कवि अपने आराध्य को याद करते हुए उनसे अपनी तुलना करता है। पहले पद में कवि ने भगवान् की तुलना चंदन, बादल, चाँद, मोती, दीपक से और भक्त की तुलना पानी, मोर, चकोर, धागा, बाती से की है। यही नहीं, कवि का आराध्य प्रभु हर हाल में, हर काल में उससे श्रेष्ठ और सर्वगुण संपन्न है। इसीलिए तो कवि को उन जैसा बनने की प्रेरणा मिलती है।
दूसरे पद में भगवान की अपार उदारता, कृपा और उनके समदर्शी स्वभाव का वर्णन है। रैदास कहते हैं कि भगवान ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैनु जैसे निम्न कुल के भक्तों को भी सहज-भाव से अपनाया है और उन्हें लोक में सम्माननीय स्थान दिया है।
रैदास के पद का संक्षिप्त अवलोकन (Raidas ke Pad Quick Overview)
| विवरण | जानकारी |
| कविता शीर्षक | पद |
| लेखक | रैदास |
| किताब | स्पर्श (सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी) |
| कविता नं. | 6 |
| वाचक | कवी |
| विषय | भक्त की अवस्था का वर्णन, भगवान की महिमा का बखान |
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प्रश्न – कक्षा 9 स्पर्श भाग 1 पाठ 6 “रैदास के पद” का सारांश अपने शब्दों में लिखिए ?
अथवा
कक्षा 9 स्पर्श भाग 1 पाठ 6 “रैदास के पद” पाठ का सार लिखिए।
उत्तर –
कक्षा 9 स्पर्श भाग 1 पाठ 6 “रैदास के पद” में रैदास के दो पद लिए गए हैं। पहले पद ‘प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी’ में कवि अपने आराध्य को याद करते हुए उनसे अपनी तुलना करता है। पहले पद में कवि ने भगवान् की तुलना चंदन, बादल, चाँद, मोती, दीपक से और भक्त की तुलना पानी, मोर, चकोर, धागा, बाती से की है। कवि के अनुसार उनके आराध्य प्रभु किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं रहते बल्कि कवि का प्रभु कवि के अंदर सदा विद्यमान रहता है। दूसरे पद में भगवान की अपार उदारता, कृपा और उनके समदर्शी स्वभाव का वर्णन है।
- भक्त पर प्रभु की भक्ति का असर – रैदास के दो पदों में से पहले पद में कवि ने भक्त की उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर अपने आराध्य की भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है कवि के कहने का अभिप्राय है कि एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो भक्त को भगवान् की भक्ति से दूर करना असंभव हो जाता है।
- प्रभु और भक्त का सम्बन्ध – कवि के अनुसार यदि प्रभु चंदन है तो भक्त पानी है। यदि प्रभु बादल है तो भक्त मोर के समान है जो बादल को देखते ही नाचने लगता है। यदि प्रभु चाँद है तो भक्त उस चकोर पक्षी की तरह है जो बिना अपनी पलकों को झपकाए चाँद को देखता रहता है। यदि प्रभु दीपक है तो भक्त उसकी बत्ती की तरह है जो दिन रात रोशनी देती रहती है। प्रभु यदि मोती है तो भक्त उस धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं। यदि प्रभु स्वामी है तो कवि दास है यानि नौकर है।
- प्रभु की महिमा – कवि अपने आराध्य को ही अपना सबकुछ मानते हैं। प्रभु गरीबों और दीन-दुःखियों पर दया करने वाले हैं, उनके माथे पर सजा हुआ मुकुट उनकी शोभा को बढ़ाता है। प्रभु में इतनी शक्ति है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और उनके बिना कुछ भी संभव नहीं है। भगवान के छूने से अछूत मनुष्यों का भी कल्याण हो जाता है क्योंकि भगवान अपने प्रताप से किसी नीच जाति के मनुष्य को भी ऊँचा बना सकते हैं। जिस भगवान ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैनु जैसे संतों का उद्धार किया था वही बाकी लोगों का भी उद्धार करेंगे। कवि के अनुसार हरि के द्वारा इस संसार में सब कुछ संभव है।
रैदास के पद पाठ व्याख्या
पद – 1
अब कैसे छूटै राम नाम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी।
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी, तुम मोती हम धागा, जैसे सोनहिं मिलत सुहागा।
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा॥
शब्दार्थ –
बास – गंध, वास
समानी – समाना (सुगंध का बस जाना), बसा हुआ (समाहित)
घन – बादल
मोरा – मोर, मयूर
चितवत – देखना, निरखना
चकोर – तीतर की जाति का एक पक्षी जो चंद्रमा का परम प्रेमी माना जाता है
बाती – बत्ती, रुई, जिसे तेल में डालकर दिया जलाते हैं
जोति – ज्योति, देवता के प्रीत्यर्थ जलाया जाने वाला दीपक
बरै – बढ़ाना, जलना
राती – रात्रि
सुहागा – सोने को शुद्ध करने के लिए प्रयोग में आने वाला क्षारद्रव्य
दासा – दास, सेवक
व्याख्या – इस पद में कवि ने भक्त की उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर अपने आराध्य की भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है कवि के कहने का अभिप्राय है कि एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो भक्त को भगवान् की भक्ति से दूर करना असंभव हो जाता है।
कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु! यदि तुम चंदन हो तो तुम्हारा भक्त पानी है। कवि कहता है कि जिस प्रकार चंदन की सुगंध पानी के बूँद-बूँद में समा जाती है उसी प्रकार प्रभु की भक्ति भक्त के अंग-अंग में समा जाती है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु!
यदि तुम बादल हो तो तुम्हारा भक्त किसी मोर के समान है जो बादल को देखते ही नाचने लगता है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु यदि तुम चाँद हो तो तुम्हारा भक्त उस चकोर पक्षी की तरह है जो बिना अपनी पलकों को झपकाए चाँद को देखता रहता है।
कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु यदि तुम दीपक हो तो तुम्हारा भक्त उसकी बत्ती की तरह है जो दिन रात रोशनी देती रहती है। कवि भगवान् से कहता है कि हे प्रभु! यदि तुम मोती हो तो तुम्हारा भक्त उस धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं।
उसका असर ऐसा होता है जैसे सोने में सुहागा डाला गया हो अर्थात उसकी सुंदरता और भी निखर जाती है। कवि रैदास अपने आराध्य के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते हुए कहते हैं कि हे मेरे प्रभु! यदि तुम स्वामी हो तो मैं आपका भक्त आपका दास यानि नौकर हूँ।
काव्यांश पर आधारित प्रश्न –
प्रश्न – प्रस्तुत पद में कवि ने भक्त की किस अवस्था का वर्णन किया है ?
उत्तर – प्रस्तुत पद में कवि ने भक्त की उस अवस्था का वर्णन किया है जब भक्त पर अपने आराध्य की भक्ति का रंग पूरी तरह से चढ़ जाता है कवि के कहने का अभिप्राय है कि एक बार जब भगवान की भक्ति का रंग भक्त पर चढ़ जाता है तो भक्त को भगवान् की भक्ति से दूर करना असंभव हो जाता है।
प्रश्न – कवि ने प्रभु और भक्त के सम्बन्ध को दर्शाने के लिए किन उदाहरणों को लिया है ?
उत्तर – कवि के अनुसार प्रभु यदि चंदन है तो भक्त पानी है। प्रभु बादल है तो भक्त मोर है। प्रभु यदि चाँद है तो भक्त चकोर पक्षी है। प्रभु यदि दीपक है तो भक्त उसकी बत्ती है। प्रभु यदि मोती है तो भक्त उस धागे के समान है जिसमें मोतियाँ पिरोई जाती हैं। कवि रैदास अपने आराध्य के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते हुए कहते हैं कि प्रभु यदि स्वामी है तो भक्त आपका दास है यानि नौकर है।
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पद – 2
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै।
गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै।।
जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै।
नीचहु ऊच करै मेरा गोबिंदु काहू ते न डरै॥
नामदेव कबीरु तिलोचनु सधना सैनु तरै।
कहि रविदासु सुनहु रे संतहु हरिजीउ ते सभै सरै॥
शब्दार्थ
लाल – स्वामी
कउनु – कौन
गरीब निवाजु – दीन-दुखियों पर दया करने वाला
गुसईआ – स्वामी, गुसाईं
माथै छत्रु धरै – मस्तक पर मुकुट धारण करने वाला
छोति – छुआछूत, अस्पृश्यता
जगत कउ लागै – संसार के लोगों को लगती है
ता पर तुहीं ढरै – उन पर द्रवित होता है
नीचहु ऊच करै – नीच को भी ऊँची पदवी प्रदान करता है
नामदेव – महाराष्ट्र के एक प्रसिद्ध संत, इन्होंने मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रचना की है
तिलोचनु (त्रिलोचन) – एक प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य, जो ज्ञानदेव और नामदेव के गुरु थे
सधना – एक उच्च कोटि के संत जो नामदेव के समकालीन माने जाते हैं
सैनु – ये भी एक प्रसिद्ध संत हैं, आदि ‘गुरुग्रंथ साहब’ में संगृहीत पद के आधार पर इन्हें रामानंद का समकालीन माना जाता है
हरिजीउ – हरि जी से
सभै सरै – सब कुछ संभव हो जाता है
व्याख्या – इस पद में कवि भगवान की महिमा का बखान कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि हे! मेरे स्वामी तुझ बिन मेरा कौन है अर्थात कवि अपने आराध्य को ही अपना सबकुछ मानते हैं। कवि भगवान की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि भगवान गरीबों और दीन-दुःखियों पर दया करने वाले हैं, उनके माथे पर सजा हुआ मुकुट उनकी शोभा को बड़ा रहा है। कवि कहते हैं कि भगवान में इतनी शक्ति है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और उनके बिना कुछ भी संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान् की इच्छा के बिना दुनिया में कोई भी कार्य संभव नहीं है। कवि कहते हैं कि भगवान के छूने से अछूत मनुष्यों का भी कल्याण हो जाता है क्योंकि भगवान अपने प्रताप से किसी नीच जाति के मनुष्य को भी ऊँचा बना सकते हैं अर्थात भगवान् मनुष्यों के द्वारा किए गए कर्मों को देखते हैं न कि किसी मनुष्य की जाति को। कवि उदाहरण देते हुए कहते हैं कि जिस भगवान ने नामदेव, कबीर, त्रिलोचन, सधना और सैनु जैसे संतों का उद्धार किया था वही बाकी लोगों का भी उद्धार करेंगे। कवि कहते हैं कि हे !सज्जन व्यक्तियों तुम सब सुनो, उस हरि के द्वारा इस संसार में सब कुछ संभव है।
काव्यांश पर आधारित प्रश्न –
प्रश्न – कवि अपने प्रभु की महिमा का बखान कैसे करते हैं ?
उत्तर – कवि अपने आराध्य को ही अपना सबकुछ मानते हैं। कवि भगवान की महिमा का बखान करते हुए कहते हैं कि भगवान गरीबों और दीन-दुःखियों पर दया करने वाले हैं, उनके माथे पर सजा हुआ मुकुट उनकी शोभा को बड़ा रहा है। भगवान में इतनी शक्ति है कि वे कुछ भी कर सकते हैं और उनके बिना कुछ भी संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान् की इच्छा के बिना दुनिया में कोई भी कार्य संभव नहीं है।
प्रश्न – ‘जाकी छोति जगत कउ लागै ता पर तुहीं ढ़रै।’ का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर – भगवान के छूने से अछूत मनुष्यों का भी कल्याण हो जाता है क्योंकि भगवान अपने प्रताप से किसी नीच जाति के मनुष्य को भी ऊँचा बना सकते हैं कहने का अभिप्राय यह है कि भगवान् मनुष्यों के द्वारा किए गए कर्मों को देखते हैं न कि किसी मनुष्य की जाति को।
रैदास के पद Class 9 Video Explanation
Raidas ke Pad FAQs
प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक स्पर्श की कविता ‘पद’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर: कक्षा 9 की कविता ‘पद’ की रचना रैदास ने की है।
प्रश्न: कक्षा 9 की कविता ‘पद’ का विषय क्या है?
उत्तर: ‘पद’ कविता भक्त की अवस्था का वर्णन, भगवान की महिमा का बखान के बारे में है।
प्रश्न: ‘पद’ कविता किस विषय पर आधारित है?
उत्तर: कवि ने भगवान् की तुलना चंदन, बादल, चाँद, मोती, दीपक से और भक्त की तुलना पानी, मोर, चकोर, धागा, बाती से की है।
उसका प्रभु बाहर कहीं किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं विराजता अर्थात कवि कहता है कि उनके आराध्य प्रभु किसी मंदिर या मस्जिद में नहीं रहता बल्कि कवि का प्रभु अपने अंतस में सदा विद्यमान रहता है।
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