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Kabir Ki Saakhiyaan Class 8 Summary, Explanation, Question Answers

Kabir Ki Saakhiyaan ‘कबीर की साखियाँ’ Summary, Explanation, Question and Answers and Difficult word meaning

Kabir Ki Saakhiyaan (कबीर की साखियाँ) CBSE class 8 Hindi Lesson summary with detailed explanation of the lesson ‘Kabir Ki Saakhiyaan’ along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary and all the exercises, Question and Answers given at the back of the lesson.

Kabir Ki Saakhiyaan Class 8 – Chapter 9

कक्षा – 8 पाठ 9 – कबीर की साखियाँ

kabir

 

Author Introduction

कवि – कबीरदास
जन्म – 1938 (लहरतारा, काशी)
मृत्यु – 1518 मगहर, उत्तर प्रदेश

 

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Kabir Ki Saakhiyaan Introduction – पाठ प्रवेश

इन साखियों में कबीरदास जी कहते हैं कि हमें सज्जन पुरुष को उसके ज्ञान के आधार पर ही परखना चाहिए। अर्थात् हमें व्यक्ति की पहचान उसके बाहरी रूप से न कर के उसके अंतरिक गुणों के आधार पर करना चाहिए। हमें अगर कोई बुरी बात कह रहा है तो हमें ध्यान नहीं देना चाहिए और उसे पलटकर बुरा भी नहीं कहना चाहिए नहीं तो बात बढ़ती जाती है। अगर एक व्यक्ति गाली देता है और सामने वाला तुरंत जवाब गाली  के रूप में देता है तो इस तरह से बात बढ़ जाती है, बिगड़ जाती है। अतः हमें ऐसा नहीं करना चाहिए, उसकी कही हुई बात को तुरंत नज़र अंदाज करके वहीं खत्म कर देना चाहिए। आगे वो कहते हैं कि मनुष्य चचंल स्वभाव का होता है वह माला तो दिनभर फेरता है और प्रभुनाम लेता रहता है किन्तु उसका मन तो कही और ही भटक रहा होता है। वह हाथ से माला फेर रहा होता है और प्रभु नाम का नाटक कर रहा होता है लेकिन उसका जो असली मन है वो कहीं और भटक रहा होता है किसी और दिशा में सोच रहा होता है। अर्थात् एकाग्र मन से ईष्वर को याद करने से ही ईश्वर मिलते है। अगर आप अपने मन पर लगाम नहीं लगाएँगे उसके भटकने पर रोक नहीं लगाएँगे तो ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती।

कबीरदास जी किसी को बड़ा या छोटा न समझने की बात कहते हैं तथा कहते हैं कि हमें छोटा समझकर किसी को दबाना नहीं चाहिए। कई बार छोटी चीजें भी बहुत दुःख दे देती हैं। कबीर जी कहते है कि किसी को छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिए। किसी को छोटा समझ कर उसे दबाना नहीं चाहिए कुचलना नहीं चाहिए। कई बार छोटी चीजें भी बहुत दुख दे देती हैं। जिन्हें हम छोटा समझते है, एक दिन वे  बहुत बड़े दुख का कारण भी बन जाती है। वह यह भी कहते हैं कि अगर हमारे मन में शांति है तो हमारा कोई दुश्मन नहीं है अगर हम अपना अहंकार छोड़ दे तो सब पर दया कर सकते है। इन दोहो में इनकी भाषा सरल और भावपूर्ण है।
यह जो कबीरदास की साखियाँ है इनकी भाषा बहुत सरल और भावपूर्ण अर्थात् सबके समझ में आने वाली है और भाव से भरी हुई है ।

Kabir Ki Saakhiyaan Summary – पाठ का सार

इन दोहों में कबीर मानवीय प्रवर्तियों को प्रस्तुत करते हैं। पहले दोहे में कवि कहते हैं कि मनुष्य की जाति उसके गुणों से बड़ी नहीं होती है। दूसरे में कहते हैं कि अपशब्द के बदले अपशब्द कहना कीचड़ में हाथ डालने जैसा है। तीसरे दोहे में कवि अपने चंचल मन व्यंग कर रहें हैं कि माला और जीभ प्रभु के नाम जपते हैं पर मन अपनी चंचलता का त्याग नहीं करता। चौथे में कहते हैं कि किसी को कमजोर समझकर दबाना नहीं चाहिए क्योंकि कभी-कभी यही हमारे लिए कष्टकारी हो जाता है। जैसे हाथी और चींटी। एक छोटी सी चींटी हाथी को भी बहुत परेशान कर सकती है। पाँचवे दोहे का भाव यह हैं कि मनुष्य अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करके संसार को खुशहाल और दयावान बना सकता है।

Kabir Ki Saakhiyaan Explanation – पाठ व्याख्या

1. जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मेल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

साधु: साधू या सज्जन
ज्ञान: जानकारी
मेल: खरीदना
तरवार: तलवार
रहन: रहने
म्यान: जिसमे तलवार रखीं जाती है

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर ने मनुष्य को जाति से ऊपर उठकर उसके गुणों की परख पर ध्यान देने के लिए कहा है।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें सज्जन पुरुष से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए अपितु उसका ज्ञान देखना चाहिए अर्थात मनुष्य को उसकी जाति के आधार पर नहीं उसके ज्ञान के आधार पर परखना चाहिए क्योंकि जब हम तलवार खरीदने जाते हैं तो उसकी कीमत म्यान देखकर नहीं लगाते हैं।

2. आवत गारी एक है, उलटत होइ अनेक।
कह कबीर नहिं उलटिए,वही एक की एक।

आवत: आते हुए
गारी: गाली
उलटत: पलटकर
होइ: होती
अनेक: बहुत सारी

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर ने अपशब्द सुनकर उस पर ध्यान न देने की बात कही है।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि जब हमें कोई गाली देता है तब वह एक होती है पर हम पलटकर उसे भी देते हैं तो वो बढ़ते-बढ़ते अनेक हो जाती है इसलिय जब हम उसकी एक गाली पर ही ध्यान नहीं देंगे तो वह वहीं ख़त्म हो जाएगी अर्थात वो एक की एक ही रह जायेगी।

3. माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि।
मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै,  यह तौ सुमिरन नाहिं।

माला तो कर: हाथ
फिरै: घूमना
जीभि: जीभ
मुख: मुँह
माँहि: में
मनुवाँ: मन
दहुँ: दसों
दिसि: दिशा
तौ: तो
सुमिरन: स्मरण

प्रसंग प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास“ जी हैं। इसमें कबीर प्रभुनाम स्मरण पर बल दे रहें हैं।

व्याख्या इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि माला को हाथ में लेकर मनुष्य मन को को घुमाता है जीभ मुख के अंदर घूमती रहती है। परन्तु मनुष्य का चंचल मन सभी दिशाओं में घूमता रहता है। मानव मन गतिशील होता है जो बिना विचारे इधर-उधर घूमता रहता है परन्तु ये भगवान् का नाम क्यों नहीं लेता।

4. कबीर घास न नींदिए, जो पाऊँ तलि होइ।
उड़ि पड़ै जब आँखि मैं, खरी दुहेली होइ।

नींदिए: निंदा करना
पाऊँ: पाँव
तलि: नीचे
आँखि: आँख
खरी: कठिन
दुहेली: दुःख देने वाली

प्रसंग प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर दास जी छोटे को कमजोर समझकर उसे दबाने वाले को चेतावनी दे रहें हैं।

व्याख्या इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें कभी घास को छोटा समझकर उसे दबाना नहीं चाहिए क्योंकि जब घास का एक छोटा सा तिनका भी आँख में गिर जाता है तो वह बहुत दुख देता है अर्थात हमें छोटा समझकर किसी पर अत्याचार नहीं करना चाहिए।

5. जग में बैरी कोइ नहीं, जो मन सीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।

जग: संसार
बैरी: शत्रु
सीतल: शांति
आपा: स्वार्थ

प्रसंग – प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘वसंत-3’ से ली गई है। इस साखी के कवि “कबीरदास” जी हैं। इसमें कबीर दास जी मनुष्य को स्वार्थ त्यागकर दयावान बनने की सीख दे रहें हैं।

व्याख्या – इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य का मन अगर शांत है तो संसार में कोई शत्रु नहीं हो सकता। यदि सभी मनुष्य स्वार्थ का त्याग कर दें तो सभी दयावान बन सकते हैं। अर्थात मनुष्य को अपनी कमजोरियों को दूर करके संसार में प्रेम और दया फैलाना चाहिए।

 

Kabir Ki Saakhiyaan Questions Answers – प्रश्न अभ्यास

प्र॰1 ‘तलवार का महत्त्व होता है म्यान का नहीं’- उक्त उदाहरण से कबीर क्या कहना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कबीरदास जी के अनुसार मनुष्य की सुंदरता उसके शरीर की अपेक्षा उसके गुणों से आकना चाहिए क्योंकि शरीर तो बाहरी आवरण है जबकि सच्चाई उसका अंर्तमन है। इसलिए कवि कहते हैं कि तलवार का महत्त्व होता है म्यान का नहीं।

प्र॰2 पाठ की तीसरी साखी-जिसकी एक पंक्ति है ‘मनुवाँ तो दहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं’ के द्वारा कबीर क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- तीसरी साखी में कबीर दास जी कहना चाहते हैं कि मनुष्य का मन चंचल होता है वह हाथ में माला और जबान पर हरिनाम तो जपता रहता है किन्तु भगवान् का नाम लेना तब सार्थक होता है जब मनुष्य अपने चंचल मन पर काबू पा लेता है।

प्र॰3 कबीर घास की निंदा करने से क्यों मना करते हैं। पढ़े हुए दोहे के आधार पर स्पष्ट कीजिए।

उत्तर- कबीर दास जी छोटे को कमजोर समझकर उसकी उपेक्षा करने को मना करते हैं मनुष्य को घास को पैरों के नीचे वाली रौंदने वाली वस्तु समझकर उसे कमजोर नहीं मानना चाहिए क्योंकि जब एक घास का तिनका भी आँख में चला जाता है तो वह बहुत कष्ट देता है। इसलिय हमें किसी को कमजोर समझकर उसकी निंदा नहीं करनी चाहिए।

 

प्र॰4 मनुष्य के व्यवहार में ही दूसरों को विरोधी बना लेनेवाले दोष होते हैं। यह भावार्थ किस दोहे से व्यक्त होता है?

उत्तर – यह भावार्थ अंतिम साखी में है –
जग में बैरी कोई नहीं जो मन शीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।।

 

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