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Pathjhad ki Patiya Class 10 Hindi Chapter 16 Explanation, Summary

 

पतझर की टूटी पत्तियाँ Class 10 Chapter 16 | Explanation, Summary, Difficult word meaning

पतझर की टूटी पत्तियाँ summary of CBSE Class 10 Hindi Lesson with a detailed explanation of the lesson 'पतझर की टूटी पत्तियाँ' along with meanings of difficult words.

Given here is the complete explanation of the lesson, along with a summary and all the exercises, Questions and Answers given at the back of the lesson.

See Video Explanation of Chapter 16 Pathjhad ki Patiya

हिंदी कक्षा 10 - Hindi Class 10

पाठ 16 पतझर की टूटी पत्तियाँ

 

 

patjhad ki tuti patiya

 
पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ प्रवेश पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ की व्याख्या
पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ सार पतझर की टूटी पत्तियाँ प्रश्न अभ्यास

 

लेखक परिचय

लेखक - रविंद्र केलेकर
जन्म - 7 मार्च 1925 (कोंकण)

 

पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ प्रवेश

ऐसा माना जाता है कि कम शब्दों में अधिक बात कहना एक कविता का सबसे महत्वपूर्ण गुण होता है। जब कभी इस गुण का प्रयोग कवियों के साथ-साथ लेखक भी करे अर्थात जब कभी कविताओं के साथ-साथ गद्य में भी इस गुण (कम शब्दों में अधिक बात कहने) का प्रयोग हो, तो उस गद्य को पढ़ने वाले को यह मुहावरा याद आ ही जाता है - 'सार-सार को गहि रहे, थोथा देय उड़ाय' अर्थात सही और सार्थक (जिनका कोई अर्थ हो)शब्दों का प्रयोग करके और निरर्थक (जिनका कहीं कोई अर्थ न हो) शब्दों का प्रयाग नहीं करना चाहिए।

book fire

 

आसान शब्दों का प्रयोग करना और कम शब्दों में अधिक शब्दों का अर्थ निकलने वाले वाक्यों का प्रयोग करना बहुत कठिन कम है। फिर भी लेखक इस काम को करते आए हैं। सूक्ति कथाएँ, आगम कथाएँ, जातक कथाएँ, पंचतंत्र की कहानियाँ इसी तरह से लिखी गई कथाएँ और कहानियाँ हैं। यही काम प्रस्तुत पाठ के लेखक रविंद्र केलेकर ने भी किया है।
लेखक ने प्रस्तुत पाठ में जो प्रसंग प्रस्तुत किए गए हैं उनमें भी लेखक पढ़ने वालों से उम्मीद कर रहे हैं कि वे उनके द्वारा कहे गए काम शब्दों में अधिक अर्थों को निकाले। ये प्रसंग केवल पढ़ने के ही लिए नहीं हैं ,बल्कि एक जागरूक और सक्रीय नागरिक बनने की प्रेरणा भी देते हैं।
पहले प्रसंग (गिन्नी का सोना) जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगो से परिचित करवाता है जो इस संसार को सब के लिए जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।<

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दूसरा प्रसंग (झेन की देन) बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।

 

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Video Explanation of Chapter 16 Pathjhad ki Patiya

 

पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ सार

लेखक ने प्रस्तुत पाठ में जो प्रसंग प्रस्तुत किए हैं, उनमें पहले प्रसंग (गिन्नी का सोना) जीवन में अपने लिए सुख-साधन जुटाने वालों से नहीं बल्कि उन लोगो से परिचित करवाता है जो इस संसार को सब के लिए जीने और रहने योग्य बनाए हुए हैं।
लेखक कहते हैं कि शुद्ध सोने में और सोने के सिक्के में बहुत अधिक फर्क होता है, सोने के सिक्के में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया जाता है, जिस कारण अधिक चमक आ जाती है और यह अधिक मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर उन्हीं सोने के सिक्कों के गहनें बनवाती हैं। लेखक कहते हैं कि किसी व्यक्ति का जो उच्च चरित्र होता है वह भी शुद्ध सोने की तरह होता है उसमें कोई मिलावट नहीं होती। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने चरित्र में ताँबा अर्थात मिलावटी व्यवहार मिला देते हैं, उन्ही लोगों को सभी लोग व्यावहारिक आदर्शवादी कह कर उनका गुणगान करते हैं। लेखक हम सभी को ये बताना चाहते हैं कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्णन कभी भी आदर्शों का नहीं होता, बल्कि आपके व्यवहार का होता है। कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी जी भी व्यावहारिक आदर्शवादियों में से एक थे। यदि गाँधी जी अपने आदर्शो को महत्त्व नहीं देते तो पूरा देश उनके साथ हर समय कंधे-से-कन्धा मिला कर खड़ा न होता। जो लोग केवल अपने व्यवहार पर ही ध्यान देते हैं, केवल वैज्ञानिक ढंग से ही सोचते हैं, वे व्यवहारवादी लोग कहे जाते हैं और ये लोग हमेशा चौकाने रहते हैं कि कहीं इनसे कोई ऐसा काम न हो जाए जिसके कारण इनको हानि उठानी पड़े। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं।
दूसरा प्रसंग (झेन की देन) बौद्ध दर्शन में वर्णित ध्यान की उस पद्धति की याद दिलाता है जिसके कारण जापान के लोग आज भी अपनी व्यस्ततम दिन भर के कामों के बीच भी कुछ चैन भरे या सुकून के पल हासिल कर ही लेते हैं।
लेखक ने जब अपने जापानी मित्र से वहाँ की सबसे खतरनाक बीमारी के बारे में पूछा तो उसने कहा कि जापान के लोगों को सबसे अधिक मानसिक बीमारी का शिकार होना पड़ता है। लेखक के इस मानसिक बिमारी की वजह पूछने पर लेखक के मित्र ने उत्तर दिया कि उनके जीवन की तेजी औरों से अधिक है। जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी फैल गई है।
लेखक कहते हैं कि एक शाम को उनका जापानी दोस्त उन्हें चा-नो-यू अर्थात जापान के चाय पीने के एक विशेष आयोजन में ले गया। लेखक और उनका मित्र चाय पिने के आयोजन के लिए जहाँ गए थे वह एक छः मंजिल की इमारत थी। उसकी छत पर एक सरकने वाली दीवार थी जिस पर चित्रकारी की गई थी और पत्तों की एक कुटिया बनी हुई थी जिसमें जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। उसके बाहर बैडोल-सा मिट्टी का एक पानी भरा हुआ बरतन था। लेखक और उनके मित्र ने उस पानी से हाथ-पाँव धोकर अंदर गए। अंदर चाय देने वाला एक व्यक्ति था जिसे चानीज कहा जाता है। उन्हें देखकर वह खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने उन्हें प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए।

 

ये सारा काम उस व्यक्ति ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।

लेखक कहते हैं कि चाय बनाने वाले ने चाय तैयार की और फिर उन प्यालों को लेखक और उनके मित्रों के सामने रख दिया। जापान में इस चाय समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं माना जाता। वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है।

लेखक हमें बताना चाहते हैं कि हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। जो समय अभी चल रहा है वही सच है। और यह समय कभी न ख़त्म होने वाला और बहुत अधिक फैला हुआ है। लेखक कहते हैं कि जीना किसे कहते यह उनको चाय समारोह वाले दिन मालूम हुआ। जापानियों को ध्यान लगाने की यह परंपरा विरासत में देन में मिली है।

 

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पतझर की टूटी पत्तियाँ पाठ की व्याख्या

प्रसंग 1- गिन्नी का सोना

शुद्ध सोना अलग है और गिन्नी सोना अलग। गिन्नी के सोने में थोड़ा-सा ताँबा मिलाया हुआ होता है, इसलिए वह ज्यादा चमकता है और शुद्ध सोने से मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर इसी सोने के गहने बनवा लेती हैं।
फिर भी होता तो वह है गिन्नी का ही सोना।
शुद्ध आदर्श भी शुद्ध सोने के जैसे ही होते हैं। चंद लोग उनमें व्यवहारिकता का थोड़ा-सा ताँबा मिला देते हैं और चलाकर दिखाते हैं। तब हम लोग उन्हें 'प्रेक्टिकल आइडियलिस्ट' कहकर उनका बखान करते हैं।

ginni  gold

गिन्नी - सिक्का
आदर्श - उच्चतम चरित्र
व्यवहारिकता - व्यावहारिक रूप में होने वाली स्थितियाँ
बखान – वर्णन

(यहाँ लेखक यह बताना चाहते हैं कि किस तरह लोग अपने चरित्र में बनावटी पन लाते हैं)

man with stick

लेखक कहते हैं कि शुद्ध सोने में और सोने के सिक्के में बहुत फर्क होता है। जो सोने का सिक्का होता है उसमें थोड़ा-सा ताँबा मिलाया जाता है, जिस कारण उसमें शुद्ध सोने से अधिक चमक आ जाती है और यह शुद्ध सोने से ज्यादा अधिक मज़बूत भी होता है। औरतें अकसर उन्हीं सोने के सिक्कों के गहनें बनवाती हैं। चाहे औरतें इस सोने के सिक्के के गहने बनवाती हों परन्तु होता तो यह सोने का सिक्का ही है कोई शुद्ध सोना नहीं।  

लेखक कहते हैं कि किसी व्यक्ति का उच्च चरित्र भी शुद्ध सोने की तरह होता है उसमें कोई मिलावट नहीं होती। उसमें चमक नहीं होती जिस वजह से व्यक्ति शुद्ध चरित्र को शुद्ध सोने की तरह कम प्रयोग में लाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने चरित्र में ताँबा अर्थात मिलावटी व्यवहार मिला देते हैं और लोगो के बीच अपने आप को अच्छा साबित कर देते हैं। उन्ही लोगों को सभी लोग व्यावहारिक आदर्शवादी कह कर उनका गुणगान करते हैं।

ये बात न भूलें कि बखान आदर्शों का नहीं होता, बल्कि व्यावहारिकता का होता है। और जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब 'प्रेक्टिकल आइडियालिस्टों' के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यवहारिक सूझबूझ ही आने लगती है।

mahatma gandhi

सोना पीछे रहकर ताँबा ही आगे आता है।
चंद लोग कहते हैं, गाँधी जी 'प्रेक्टिकल आइडियालिस्टों' थे। व्यावहारिकता को पहचानते थे। उसकी कीमत जानते थे। इसलिए वे अपने विलक्षण आदर्श चला सके। वरना हवा में ही उड़ते रहते। देश उनके पीछे न जाता।

सूझबूझ - सोचने समझने की शक्ति
विलक्षण - अत्यंत लक्षणों वाला

mahatma gandhi

लेखक हम सभी को ये बताना चाहते हैं कि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्णन कभी भी आदर्शों का नहीं होता, बल्कि आपके व्यवहार का होता है। और जब किसी के व्यवहार का वर्णन होना शुरू होता है तो जिन्हें व्यावहारिक आदर्शवादी लोग समझते हैं उन आदर्शवादी लोगों के जीवन से आदर्श व्यावहारिक वर्णन के कारण कम होने लगते हैं और उनकी सोचने की शक्ति बढ़ने लगती है। कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी जी भी व्यावहारिक आदर्शवादियों में से एक थे। वे अपनी व्यावहारिकता को जानते थे और उसकी कीमत को भी पहचानते थे। इन्हीं कारणों की वजह से वे अपने अनेक लक्षणों वाले आदर्श चला सके। वरना वे हवा में ही उड़ते रहते अर्थात उनके पास धन-दौलत, शिक्षा सब कुछ था उन्हें किसी भी चीज़ की आवश्यकता नहीं थी। यदि गाँधी जी अपने आदर्शो को महत्त्व नहीं देते तो पूरा देश उनके साथ हर समय कंधे-से-कन्धा मिला कर खड़ा न होता।

हाँ, पर गाँधी जी कभी आदर्शों को व्यावहारिकता के स्तर पर उतरने नहीं देते थे। बल्कि व्यवहारिकता को आदर्शों के स्तर पर चढ़ाते थे। वे सोने में ताँबा नहीं बल्कि ताँबे में सोना मिलाकर उसकी कीमत बढ़ाते थे।
इसलिए सोना ही हमेशा आगे आता रहता था।
व्यवहारवादी लोग हमेशा सजग रहते हैं। लाभ-हानि का हिसाब लगाकर ही कदम उठाते हैं। वे जीवन में सफल होते हैं, अन्यों से आगे भी जाते हैं पर क्या वे ऊपर चढ़ते हैं। खुद ऊपर चढ़ें और अपने साथ दूसरों को भी ऊपर लें चलें, यही महत्व की बात है। यह काम तो हमेशा आदर्शवादी लोगों ने ही किया है। समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है। व्यवहारवादी लोगों ने तो समाज को गिराया ही है।

man with cap

सजग - सतर्क, सावधान
हिसाब - लेखा-जोखा
शाश्वत - सदा रहने वाला

 

(लेखक ने यहाँ व्यवहारवादी लोगों के बारे में वर्णन किया है)

लेखक कहते हैं कि गाँधी जी कभी भी अपने आदर्शों को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने देते थे । बल्कि वे अपने व्यवहार में ही अपने आदर्शों को रखने की कोशिश करते थे। वे किसी भी तरह के आदर्शों में कोई भी व्यावहारिक मिलावट नहीं करते थे बल्कि व्यव्हार में आदर्शों को मिलाते  थे जिससे आदर्श ही सबको दिखे और सब आदर्शों का ही पालन करे और आदर्शों की कीमत बढ़े। जो लोग केवल अपने व्यवहार पर ही ध्यान देते हैं, केवल वैज्ञानिक ढंग से ही सोचते हैं, वे व्यवहारवादी लोग कहे जाते हैं और ये लोग हमेशा चौकन्ने रहते हैं कि कहीं इनसे कोई ऐसा काम न हो जाए जिसके कारण इनको हानि उठानी पड़े। वे अपने जीवन में बहुत सफल होते हैं, दूसरों से आगे भी बढ़ जाते हैं, पर क्या वे लोग सही मायने में आगे बढ़ते हैं या इज़्ज़त हासिल करते हैं ?

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सबसे महत्वपूर्ण  बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं। व्यवहारवादी लोग तो केवल अपने आप को आगे लाने में लगे रहते हैं । उनको कोई फर्क नहीं पड़ता अगर समाज को नुक्सान हो रहा हो।

 

प्रसंग 2 – झेन की देन<

जापान में मैंने अपने एक मित्र से पूछा, "यहाँ के लोगों को कौन सी बीमारियाँ अधिक होती हैं ?" "मानसिक", उसने जवाब दिया,"यहाँ के अस्सी फीसदी लोग मनोरुग्ण हैं।"
"इसकी क्या वजह है ?"
कहने लगे ,"हमारे जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं, बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं। ....... अमेरिका से हम प्रतिस्पर्धा करने लगे। एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही पूरा करने की कोशिश करने लगे। वैसे भी दिमाग की रफ़्तार हमेशा तेज़ ही रहती है। उसे 'स्पीड' का इंजन लगाने पर वह हजार गुना अधिक रफ्तार से दौड़ने लगता है। फिर एक क्षण ऐसा आता है जब दिमाग का तनाव बढ़ जाता है और पूरा इंजन टूट जाता है। ...... यही कारण है जिससे मानसिक रोग यहाँ बढ़ गए हैं। .... "

फीसदी - प्रतिशत

city

मनोरुग्ण - मानसिक रोग /मानसिक बिमारी
रफ़्तार - तेज़ी
प्रतिस्पर्धा - प्रतियोगिता /मुकाबला
तनाव - द्वेष की स्थिति /टेंशन

peoples black

लेखक ने जापान के अपने एक मित्र से पूछा कि वहाँ के लोगों को सबसे अधिक कौन सी बीमारियाँ होती है ।  इस पर लेखक के मित्र में जवाब दिया कि जापान के लोगों को सबसे अधिक मानसिक बीमारी का शिकार होना पड़ता है। जापान के अस्सी प्रतिशत लोग मानसिक बिमारी से ग्रस्त हैं। लेखक के इस मानसिक बिमारी के इतना अधिक होने की वजह पूछने पर लेखक के मित्र ने उत्तर दिया कि उनके जीवन की तेजी औरों से अधिक है। जापान में कोई आराम से नहीं चलता ,बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं।

man

जापान में कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता ,वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। वैसे भी दिमाग हमेशा तेज ही रहता है और अगर उसमें स्पीड का इंजन लगा दिया जाए तो उसकी राफ्तार में कई हज़ार गुना तेजी आ सकती है और वह दौड़ने लगता है। फिर एक समय ऐसा भी आता है जब दिमाग थक जाता है और टेंशन में आ कर पूरा इंजन टूट जाता है। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी इतनी अधिक फैल गई है।

शाम को वह मुझे एक 'टी-सेरेमनी' में ले गए। चाय पीने की यह एक विधि है। जापानी में उसे चा-नो-यू कहते हैं।
वह एक छः मंजिली इमारत थी जिसकी छत पर दफ़्ती की दीवारोंवाली और तातामी (चटाई) की ज़मीनवाली एक सुंदर पर्णकुटी थी। बाहर बेढब-सा एक मिट्टी का बर्तन था। उसमें पानी भरा हुआ था। हमने अपने हाथ-पाँव इस पानी से धोए। तौलिए से पोंछे और अंदर गए। अंदर 'चानीज़' बैठा था। हमें देखकर वह खड़ा हुआ। कमर झुका कर उसने हमें प्रणाम किया। दो....झो...(आइए, तशरीफ़ लाइए) कहकर स्वागत  किया। बैठने की जगह हमें दिखाई। अँगीठी सुलगाई। उस पर चायदानी रखी। बगल के कमरे में जाकर कुछ बरतन ले आया। तौलिए से बरतन साफ किए। सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों। वहाँ का वातावरण इतना शांत था कि चायदानी के पानी का खदबदाना भी सुनाई दे रहा था।  

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टी-सेरेमनी - जापान में चाय पिने का विशेष आयोजन
चा-नो-यू - जापान ने टी-सेरेमनी का नाम
दफ़्ती - लकड़ी की खोखली सरकने वाली दीवार जिस पर चित्रकारी होती है
पर्णकुटी - पत्तों की बनी कुटिया
बेढब-सा - बेडौल-सा

man

चानीज़ - जापानी विधि में चाय पिलाने वाला
गरिमापूर्ण - सलीके से
भंगिमा - मुद्रा
जयजयवंती - एक राग का नाम
खदबदाना - उबलना  

(यहाँ लेखक जापान की चाय पिने की विशेष विधि का वर्णन कर रहे हैं)

japan tea

लेखक कहते हैं कि एक शाम को उनका जापानी दोस्त उन्हें जापान के चाय पीने के एक विशेष आयोजन में ले गया। जापान में चाय पिने की इस विधि को चा-नो-यू कहा जाता है। लेखक और उनका मित्र चाय पिने के आयोजन के लिए जहाँ गए थे वह एक छः मंजिल की इमारत थी । उसकी छत पर एक सरकने वाली दीवार थी जिस पर चित्रकारी की गई थी और पत्तों की एक कुटिया बनी हुई थी जिसमें जमीन पर चटाई बिछी हुई थी। उसके बाहर बैडोल-सा मिट्टी का एक बरतन था, जिसमें पानी भरा हुआ था। लेखक और उनके मित्र ने उस पानी  से हाथ-पाँव धोए और तौलिए से हाथ-पाँव पोंछ कर अंदर गए। अंदर चाय देने वाला एक व्यक्ति था जिसे चानीज कहा जाता है। वह लेखक और उनके मित्र को देखकर खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने लेखक और उनके दोस्त को प्रणाम किया।

tea

उसने दो... झो..अर्थात आइए, तशरीफ़ लाइए ऐसा कह कर उनका स्वागत किया। उसने उन्हें बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए। ये सारा काम उस व्यक्ति ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।  

tea with friends

चाय तैयार हुई। उसने वह प्यालों में भरी। फिर वे प्याले हमारे सामने रख दिए गए। वहाँ हम तीन मित्र ही थे। इस विधि में शांति मुख्य बात होती है। इसलिए वहाँ तीन से अधिक आदमियों को प्रवेश नहीं दिया जाता। प्याले में दो घूँट से अधिक चाय नहीं थी। हम ओठों से प्याला लगाकर एक-एक बूँद चाय पीते रहे। करीब डेढ़ घंटे तक चुसकियों का यह सिलसिला चलता रहा। पहले दस-पंद्रह मिनट तो मैं उलझन में पड़ा। फिर देखा दिमाग की रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पड़ती जा रही है। थोड़ी देर में बिलकुल बंद भी हो गई। मुझे लगा, मानो अनंतकाल में मैं जी रहा हूँ। यहाँ तक की सन्नाटा भी मुझे सुनाई देने लगा।

चुसकी -  होंठों से कोई तरल पदार्थ थोड़ा-थोड़ा तथा धीरे-धीरे करके पीने की क्रिया का भाव
सिलसिला - क्रम
उलझन - असमंजस की स्थिति
अनंतकाल - कभी ख़त्म न होने वाला समय
सन्नाटा - मौन /शांति

(यहाँ लेखक जापान के चाय पिने के समारोह में अपना पहला अनुभव व्यक्त कर रहा है)

लेखक कहते हैं कि चाय बनाने वाले ने चाय तैयार की। उसने चाय को प्यालों में भरा और फिर उन प्यालों को लेखक और उनके मित्रों के सामने रख दिया। वहाँ लेखक और उनके मित्रों के अलावा कोई नहीं था वे केवल तीन ही व्यक्ति थे। जापान में इस चाय समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं माना जाता। उन चाय के प्यालों में दो-दो घूँट से ज्यादा चाय नहीं थी। लेखक और उनके मित्र प्यालों को अपने होठों से लगा कर एक-एक बूँद चाय पी रहे थे। लेखक कहते हैं कि वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई।

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लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है। लेखक को लगा जैसे वह कभी न ख़त्म होने वाले समय में जी रहा है। यहाँ तक की लेखक का मन इतना शांत हो गया था की बाहर की शांति भी शोर लग रही थी।

अकसर हम या तो गुज़रे हुए दिनों की खट्टी-मीठी यादों में उलझे रहते हैं या भविष्य के रंगीन सपने देखते रहते हैं। हम या तो भूतकाल में रहते हैं या भविष्यकाल में। असल में दोनों काल मिथ्या हैं। एक चला गया है, दूसरा आया नहीं है। हमारे सामने जो वर्तमान क्षण है, वही सत्य है। उसी में जीना चाहिए। चाय पीते-पीते उस दिन मेरे दिमाग से भूत-भविष्य दोनों काल उड़ गए थे। केवल वर्तमान क्षण सामने था। और वह अनंतकाल जितना विस्तृत था।
जीना किसे कहते है, उस दिन मालूम हुआ।
झेन परंपरा की यह बड़ी देन मिली है जापानियों को!

मिथ्या - झूठ
विस्तृत - बहुत अधिक फैला हुआ
झेन परंपरा - ध्यान लगाने की परंपरा

लेखक हमें बताना चाहते हैं कि हम लोग या तो बीते हुए दिनों की अच्छी-बुरी यादों में उलझ कर रह जाते हैं या फिर आने वाले समय के बारे में सपने देखने लगते हैं। हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। वो इसलिए क्योंकि एक बीत चूका होता है और दूसरा अभी आया भी नहीं होता। तो बात आती है कि सच क्या है तो लेखक कहते हैं कि जो समय अभी चल रहा है वही सच है। और यह समय कभी न ख़त्म होने वाला और बहुत अधिक फैला हुआ है।
लेखक कहते हैं कि जीना किसे कहते यह उनको चाय समारोह वाले दिन मालूम हुआ। जापानियों को ध्यान लगाने की यह परंपरा विरासत में देन में मिली है।

 

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पतझर की टूटी पत्तियाँ प्रश्न अभ्यास (महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर )

(क) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (25-30 शब्दों में) लिखिए -
(1) प्रश्न i - शुद्ध आदर्श की तुलना सोने से और व्यावहारिकता की तुलना ताँबे से क्यों की गई है?

उत्तर - शुद्ध सोने में चमक होती है और आदर्श भी शुद्ध सोने की तरह चमकदार और महत्वपूर्ण मूल्यों से भरा होता है। ताँबे से सोना मजबूत तो होता है परन्तु उसकी शुद्धता समाप्त हो जाती है। इसी प्रकार व्यवहारिकता के कारण आदर्श समाप्त हो जाते हैं परन्तु यदि सही ढंग से व्यवहारिकता और आदर्शों को मिलाया जाये तो जीवन में बहुत कुछ हासिल किया जा सकता है।

 

(2) प्रश्न ii - चानीज ने कौन-सी क्रियाएँ गरिमापूर्ण ढंग से पूरी की?

उत्तर - लेखक और उनके मित्र को देखकर चानीज खड़ा हो गया। कमर झुका कर उसने उन्हें प्रणाम किया और बैठने की जगह दिखाई। अँगीठी को जलाया और उस पर चाय बनाने वाला बरतन रख दिया। वह साथ वाले कमरे में गया और कुछ बरतन ले कर आया। फिर तौलिए से बरतन साफ किए। ये सारा काम चानीज ने बड़े ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो।

 

प्रश्न iii - 'टी-सेरेमनी' में कितने आदमियों को प्रवेश दिया जाता था और क्यों ?

उत्तर - जापान में 'टी-सेरेमनी' समारोह की सबसे खास बात शांति होती है। इसलिए वहाँ तीन से ज्यादा व्यक्तियों को नहीं माना जाता।

 

प्रश्न iv - चाय पिने के बाद लेखक ने स्वयं में क्या परिवर्तन महसूस किया ?

उत्तर - लेखक कहते हैं कि वे करीब डेढ़ घंटे तक प्यालों से चाय को धीरे-धीरे पीते रहे। पहले दस-पंद्रह मिनट तो लेखक को बहुत परेशानी हुई। लेकिन धीरे -धीरे लेखक ने महसूस किया कि उनके दिमाग की रफ़्तार कम होने लेगी है। और कुछ समय बाद तो लगा कि दिमाग बिलकुल बंद ही हो गया है। लेखक को लगा जैसे वह कभी न ख़त्म होने वाले समय में जी रहा है। यहाँ तक की लेखक का मन इतना शांत हो गया था की बाहर की शांति भी शोर लग रही थी।

 

(ख) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर (50- 60 शब्दों में) लिखिए -
(1) प्रश्न i - गांधीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी; उदहारण सहित इस बात की पुष्टि कीजिए।

उत्तर - गांधीजी में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी। गाँधी जी भी व्यावहारिक आदर्शवादियों में से एक थे। वे अपनी व्यावहारिकता को जानते थे और उसकी कीमत को भी पहचानते थे। इन्हीं कारणों की वजह से वे अपने अनेक लक्षणों वाले आदर्श चला सके। यदि गाँधी जी अपने आदर्शो को महत्त्व नहीं देते तो पूरा देश उनके साथ हर समय कंधे-से-कन्धा मिला कर खड़ा न होता। यह बात उनके अहिंसात्मक आंदोलन उसे स्पष्ट हो जाती है। वह अकेले चलते थे और लाखों में उनके पीछे हो जाते थे। नमक का कानून तोड़ने के लिए जब उन्होंने जनता का आह्वान किया तो उनके नेतृत्व में हजारों लोग उनके साथ पैदल ही दांडी यात्रा पर निकल पड़े थे । इसी प्रकार से असहयोग आंदोलन के समय भी उनकी एक आवाज़ पर देश के हजारों नौजवान अपनी पढ़ाई छोड़कर उनके नेतृत्व में आंदोलन के रास्ते पर चल पड़े थे।

 

प्रश्न ii - आपके विचार से कौन-से ऐसे मूल्य हैं जो शाश्वत हैं ? वर्तमान समय में इन मूल्यों की प्रासंगिकता स्पष्ट कीजिए।

उत्तर -  हमारे विचार से - सत्य, अहिंसा, दया, प्रेम, भाईचारा, त्याग, परोपकार, मीठी वाणी, मानवीयता इत्यादि ये मूल्य शाश्वत हैं। वर्तमान समाज में इन मूल्यों की प्रासंगिकता अर्थात महत्व बहुत अधिक है। जहाँ- जहाँ और जब-जब इन मूल्यों का पालन नहीं किया गया है वहाँ तब-तब समाज का नैतिक पतन हुआ है। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है।

 

प्रश्न iii - 'शुद्ध सोने में ताँबे की मिलावट या ताँबे में सोना ',गांधीजी के आदर्श और व्यवहार के सन्दर्भ में यह बात किस तरह झलकती है ? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर - गांधीजी ने जीवन भर सत्य और अहिंसा का पालन किया। वे आदर्शों को ऊंचाई तक ले कर जाते थे अर्थात वे सोने में ताँबा मिलकर उसकी कीमत कम नहीं करते थे, बल्कि ताँबे में सोना मिलकर उसकी कीमत बड़ा देते थे। वे अपनी व्यावहारिकता को जानते थे और उसकी कीमत को भी पहचानते थे। इन्हीं कारणों की वजह से वे अपने अनेक लक्षणों वाले आदर्श चला सके। गाँधी जी कभी भी अपने आदर्शों को अपने व्यवहार पर हावी नहीं होने देते थे। बल्कि वे अपने व्यवहार में ही अपने आदर्शों को रखने की कोशिश करते थे। वे किसी भी तरह के आदर्शों में कोई भी व्यावहारिक मिलावट नहीं करते थे बल्कि व्यव्हार में आदर्शों को मिलते थे जिससे आदर्श ही सबको दिखे और सब आदर्शों का ही पालन करे और आदर्शों की कीमत बड़े।

 

प्रश्न iv - 'गिरगिट' कहानी में अपने समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल में बदल डालने की एक बानगी देखी। इस पाठ के अंश 'गिन्नी का सोना' के सन्दर्भ में स्पष्ट कीजिए कि 'आदर्शवादिता' और 'व्यावहारिकता' इनमेसे जीवन में किसका महत्त्व है ?

उत्तर - 'गिरगिट' कहानी में स्वार्थी इंस्पेक्टर समाज में व्याप्त अवसरानुसार अपने व्यवहार को पल-पल बदलता है। वह अवसर के साथ-साथ जहाँ उसका लाभ हो रहा हो वहाँ उसी के अनुसार अपना व्यवहार बदलता है। 'गिन्नी का सोना' कहानी में इस बात पर बल दिया गया है कि आदर्श शुद्ध सोने के समान हैं। उनमे व्यवहारिकता का गुण मिलाकर उन्हें और भी अधिक मजबूत किया जा सकता है। समाज में देखा गया है कि व्यवहारवादी लोग आदर्शवादी लोगो से बहुत आगे तो बढ़ जाते हैं परन्तु वे अपने जीवन के नैतिक मूल्यों को पीछे छोड़ देते हैं और स्वार्थी हो जाते हैं। सबसे महत्पूर्ण बात तो यह है कि खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं। व्यवहारवादी लोग तो केवल अपने आप को आगे लाने में लगे रहते हैं उनको कोई फर्क नहीं पड़ता अगर समाज को नुक्सान हो रहा हो।

 

(2) प्रश्न vi - लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के क्या-क्या कारण बताए ?आप इन कारणों से कहाँ तक सहमत हैं?

उत्तर - लेखक के मित्र ने मानसिक रोग के कारण बताते हुए कहा कि वहाँ जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं।  कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं। जापान के लोग अमेरिका से प्रतियोगिता में लग गए जिसके कारण वे एक महीने में पूरा होने वाला काम एक दिन में ही ख़त्म करने की कोशिश करने लगे। ऐसा करने के कारण जब दिमाग थक जाता है और टेंशन में आ कर पूरा इंजन टूट जाता है। यही कारण है कि जापान के लोगो में मानसिक बिमारी बहुत अधिक फैल गई है। हम इन कारणों से पूरी तरह सहमत हैं।

 

प्रश्न vii - लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। लेखक ने ऐसा क्यों कहा होगा?  स्पष्ट कीजिए।

उत्तर - लेखक के अनुसार सत्य केवल वर्तमान है, उसी में जीना चाहिए। हम लोग या तो बीते हुए दिनों में रहते हैं या आने वाले दिनों में। जबकि दोनों ही समय झूठे होते हैं। वो इसलिए क्योंकि एक बीत चूका होता है और दूसरा अभी आया भी नहीं होता। तो बात आती है कि सच क्या है तो इस बात पर लेखक कहते हैं कि जो समय अभी चल रहा है वही सच है।

 

(ग) निम्नलिखित के आशय स्पष्ट कीजिए -
(1) (i) समाज के पास अगर शाश्वत मूल्यों जैसा कुछ है तो वह आदर्शवादी लोगों का ही दिया हुआ है।

उत्तर - हमारे समाज में अगर हमेशा रहने वाले कई मूल्य बचे हैं तो वो सिर्फ आदर्शवादी लोगो के कारण ही बच पाए हैं। खुद भी तरक्की करो और अपने साथ-साथ दूसरों को भी आगे ले चलो और ये काम हमेशा से ही आदर्शो को सबसे आगे रखने वाले लोगो ने किया है। व्यवहारवादी लोग तो केवल अपने आप को आगे लाने में लगे रहते हैं उनको कोई फर्क नहीं पड़ता अगर समाज को नुक्सान हो रहा हो।

 

(ii) जब व्यावहारिकता का बखान होने लगता है तब 'प्रेक्टिकल आइडियालिस्टों' के जीवन से आदर्श धीरे-धीरे पीछे हटने लगते हैं और उनकी व्यवहारिक सूझबूझ ही आने लगती है।

उत्तर - जब किसी के व्यवहार का वर्णन होना शुरू होता है तो जिन्हें व्यावहारिक आदर्शवादी लोग समझते हैं उन व्यावहारिक आदर्शवादी लोगों के जीवन से आदर्श व्यावहारिक वर्णन के कारण कम होने लगते हैं क्योंकि वर्णन कभी भी आदर्शों का नहीं होता, बल्कि आपके व्यवहार का होता है। और आदर्शों के कम होते ही सोचने की शक्ति बढ़ने लगती है।

 

(2) (iii) जीवन की रफ़्तार बढ़ गई है। यहाँ कोई चलता नहीं, बल्कि दौड़ता है। कोई बोलता नहीं, बकता है। हम जब अकेले पड़ते हैं तब अपने आपसे लगातार बड़बड़ाते रहते हैं।

उत्तर -जापान के लोगों के जीवन की तेजी औरों से अधिक है। जापान में कोई आराम से नहीं चलता, बल्कि दौड़ता है अर्थात सब एक दूसरे से आगे जाने की सोच रखते हैं। जापान में कोई भी व्यक्ति आराम से बात नहीं करता, वे लोग केवल काम की ही बात करते हैं। यहाँ तक की जब जापान के लोग कभी अपने आप को अकेला महसूस करते हैं तो वे किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही बातें करते हैं।

 

(iv) सभी क्रियाएँ इतनी गरिमापूर्ण ढंग से कीं कि उसकी हर भंगिमा से लगता था मानो जयजयवंती के सुर गूँज रहे हों।

उत्तर - जापान में चाय बनाने वाले को चानीज कहते हैं और उसने लेखक और उनके मित्रों के स्वागत से ले कर चाय परोसने तक का सारा काम इतने ही सलीके से पूरा किया और उसकी हर एक मुद्रा या काम करने के ढंग से लगता था कि जैसे जयजयवंती नाम के राग की धुन गूँज रही हो। उस जगह का वातावरण इतना अधिक शांत था कि चाय बनाने वाले बरतन में उबलते हुए पानी की आवाज़ें तक सुनाई दे रही थी।  

 

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