Saakhi (साखी) Summary, Explanation, Word meanings | CBSE Class 10 Hindi (Sparsh Poem 1)

class 10 Hindi B - Saakhi - Summary, lesson notes, PDF

 

CBSE Class 10 Hindi Chapter 1 “Saakhi”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Sparsh Bhag 2 Book

 

स्पर्श पुस्तक के कक्षा 10 के अध्याय 1 “साखी” में, संत कबीर अपने शिष्य को स्पष्ट और प्रत्यक्ष ज्ञान प्रदान करते हैं। यह ज्ञान व्यक्ति के सामाजिक आचरण से संबंधित है और वेदों और पुराणों जैसे प्राचीन ग्रंथों में दिए गए ज्ञान से भिन्न है। संत कबीर की साखी पर विभिन्न क्षेत्रों का प्रभाव है और इसमें प्रयुक्त भाषा विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों का मिश्रण है, इसलिए इसे ‘पंचमेल खिचड़ी’ कहा जाता है।

 

साखी का संक्षिप्त अवलोकन (Saakhi Quick Overview)

विवरण जानकारी
कविता शीर्षक साखी
लेखक संत कबीर
किताब स्पर्श (सीबीएसई कक्षा 10 हिंदी)
कविता नं. 1
कथावाचक कवि
सेटिंग विभिन्न सामाजिक परिदृश्य
विषय नैतिक मूल्य, अच्छा आचरण, ईश्वर की पूजा, वैराग्य

 

Related:

प्रश्न – कक्षा 10 हिंदी पाठ 1 साखी के सारांश को अपने शब्दों में लिखिए
अथवा
कक्षा 10 हिंदी पाठ 1 साखी पाठ का सार लिखिए । 

उत्तर –  ‘साखी ‘ शब्द ‘ साक्षी ‘ शब्द का ही (तद्भव ) बदला हुआ रूप है। साक्षी शब्द साक्ष्य से बना है। जिसका अर्थ होता है -प्रत्यक्ष ज्ञान अर्थात जो ज्ञान सबको स्पष्ट दिखाई दे। यह प्रत्यक्ष ज्ञान गुरु द्वारा शिष्य को प्रदान किया जाता है। संत ( सज्जन ) सम्प्रदाय (समाज ) मैं अनुभव ज्ञान (व्यवाहरिक ज्ञान ) का ही महत्व है -शास्त्रीय ज्ञान अर्थात वेद , पुराण इत्यादि का नहीं। कबीर का अनुभव क्षेत्र बहुत अधिक फैला हुआ था अर्थात कबीर जगह -जगह घूम कर प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करते थे। 

  • साखी – ‘ साखी ‘ वस्तुतः (एक तरह का ) दोहा छंद ही है जिसका लक्षण है 13 और 11 के विश्राम से 24 मात्रा अर्थात पहले व तीसरे चरण में 13 वर्ण व दूसरे व चौथे चरण में 11 वर्ण के मेल से 24 मात्राएँ। प्रस्तुत पाठ की साखियाँ प्रमाण हैं की सत्य को सामने रख कर ही गुरु शिष्य  को जीवन के व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा देता है। यह शिक्षा जितनी अधिक प्रभावशाली होगी, उतनी ही अधिक याद  रहेगी।
  • ईश्वर प्रेम – इन साखियों में कबीर ईश्वर प्रेम के महत्त्व को प्रस्तुत कर रहे हैं। पहली साखी में कबीर मीठी भाषा का प्रयोग करने की सलाह देते हैं ताकि दूसरों को सुख और और अपने तन को शीतलता प्राप्त हो। 
  • ईश्वर का सही स्थान – दूसरी साखी में कबीर ईश्वर को मंदिरों और तीर्थों में ढूंढ़ने के बजाये अपने मन में ढूंढ़ने की सलाह देते हैं। 
  • अहंकार और ईश्वर एक दूसरे से विपरीत – तीसरी साखी में कबीर ने अहंकार और ईश्वर को एक दूसरे से विपरीत (उल्टा ) बताया है।  चौथी साखी में कबीर कहते हैं कि प्रभु को पाने की आशा उनको संसार के लोगो से अलग करती है।  
  • ईश्वर वियोग स्थिति – पांचवी साखी में कबीर कहते हैं कि ईश्वर के वियोग में कोई व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता, अगर रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती है। 
  • निंदक का महत्त्व – छठी साखी में कबीर निंदा करने वालों को हमारे स्वभाव परिवर्तन में मुख्य मानते हैं। 
  • ज्ञान प्राप्ति की राह – सातवीं साखी में कबीर ईश्वर प्रेम के अक्षर को पढने वाले व्यक्ति को पंडित बताते हैं और अंतिम साखी में कबीर कहते हैं कि यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो मोह – माया का त्याग करना पड़ेगा।

Top

Saakhi Previous Year Questions with Model Answers PDF

कक्षा 10 के पाठ साखी के प्रीवियस ईयर क़ुएस्तिओन्स का फ्री डाउनलोड कीजिये। इसकी मदद से आप एग्जाम की तयारी कर सकते हैं।

To Download Saakhi Previous Year Questions with Model Answers- Click Here

 

Top

साखी की पाठ व्याख्या

काव्यांश
ऐसी बाँणी बोलिये ,मन का आपा खोइ।
अपना तन सीतल करै ,औरन कौ सुख होइ।।

शब्दार्थ
बाँणी –
बोली
आपा – अहम् (अहंकार )
खोइ – त्याग करना
सीतल – शीतल ( ठंडा ,अच्छा )
औरन – दूसरों को
होइ – होना

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है। इस साखी के कवी ‘कबीरदास ‘जी है। इसमें कबीर ने मीठी बोली बोलने और दूसरों को दुःख न देने की बात कही है

व्याख्या -: इसमें कबीरदास जी कहते है कि हमें अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमे हमारा अपना तन मन भी सवस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो अर्थात दूसरों को भी सुख प्राप्त हो।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर किस तरह की भाषा का प्रयोग करने की सलाह देते हैं ?
अथवा
कबीर के अनुसार हमें कैसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए ?

उत्तर – कबीरदास जी के अनुसार हमें अपने मन का अहंकार त्याग कर ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जिसमे हमारा अपना तन मन भी सवस्थ रहे और दूसरों को भी कोई कष्ट न हो अर्थात दूसरों को भी सुख प्राप्त हो।

 

काव्यांश
कस्तूरी कुंडली बसै ,मृग ढूँढै बन माँहि।
ऐसैं घटि- घटि राँम है , दुनियां देखै नाँहिं।।

शब्दार्थ
कुंडली –
नाभि
मृग –
हिरण
घटि घटि –
कण कण

प्रसंग -:  प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है। इसके कवी कबीरदास जी है इसमें कबीर कहते है कि संसार के लोग कस्तूरी हिरण की तरह  हो गए है जिस तरह हिरण कस्तूरी प्राप्ति के लिए इधर उधर भटकता रहता है उसी तरह लोग भी ईश्वर प्राप्ति के लिए भटक रहे है।

व्याख्या -: कबीरदास जी कहते है कि जिस प्रकार एक हिरण कस्तूरी की खुशबु को जंगल में ढूंढ़ता फिरता है जबकि वह सुगंध उसी की नाभि में विद्यमान होती है परन्तु  वह इस बात से बेखबर होता है, उसी प्रकार संसार के कण कण में ईश्वर विद्यमान है और मनुष्य इस बात से बेखबर ईश्वर को देवालयों और तीर्थों में ढूंढ़ता है। कबीर जी कहते है कि अगर ईश्वर को ढूंढ़ना ही है तो अपने मन में ढूंढो।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी मनुष्य को ईश्वर को ढूंढने के लिए किस राह पर चलने की सलाह देते हैं ?
अथवा
कबीर जी ईश्वर प्राप्ति की राह दिखाने के लिए किस उदाहरण को प्रस्तुत करते हैं ?

उत्तर – कबीरदास जी उदाहरण देते है कि जिस प्रकार एक हिरण कस्तूरी की खुशबु को जंगल में ढूंढ़ता फिरता है जबकि वह सुगंध उसी की नाभि में विद्यमान होती है परन्तु  वह इस बात से बेखबर होता है, उसी प्रकार संसार के कण कण में ईश्वर विद्यमान है और मनुष्य इस बात से बेखबर ईश्वर को देवालयों और तीर्थों में ढूंढ़ता है। कबीर जी कहते है कि अगर ईश्वर को ढूंढ़ना ही है तो अपने मन में ढूंढो।

 

काव्यांश
जब मैं था तब हरि नहीं ,अब हरि हैं मैं नांहि।
सब अँधियारा मिटी गया , जब दीपक देख्या माँहि।।

शब्दार्थ
मैं –
अहम् ( अहंकार )
हरि –
परमेश्वर
अँधियारा –
अंधकार

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है।  इस साखी के कवि कबीरदास जी हैं। इसमें कबीर जी मन में अहम् या अहंकार के मिट जाने के बाद मन में परमेश्वर के वास की बात कहते है।

व्याख्या -: कबीर जी कहते हैं कि जब इस हृदय में ‘मैं ‘ अर्थात मेरा अहंकार था तब इसमें परमेश्वर का वास नहीं था परन्तु अब हृदय में अहंकार नहीं है तो इसमें प्रभु का वास है।  जब परमेश्वर नमक दीपक के दर्शन हुए तो अज्ञान रूपी अहंकार का विनाश हो गया।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी अहंकार और ईश्वर को विपरीत बताते हैं। स्पष्ट कीजिए ?
अथवा
कबीर जी के अनुसार मन में परमेश्वर का वास कब होता है ?

उत्तर – कबीर जी के अनुसार जब हृदय में ‘मैं ‘ अर्थात अहंकार था तब इसमें परमेश्वर का वास नहीं था परन्तु अब हृदय में अहंकार नहीं है तो इसमें प्रभु का वास है। जब परमेश्वर नमक दीपक के दर्शन होते हैं तो अज्ञान रूपी अहंकार का विनाश हो जाता है। कबीर जी मन में अहम् या अहंकार के मिट जाने के बाद मन में परमेश्वर के वास की बात कहते है।

 

काव्यांश
सुखिया सब संसार है , खायै अरु सोवै।
दुखिया दास कबीर है , जागै अरु रोवै।।

शब्दार्थ
सुखिया –
सुखी
अरु –
अज्ञान रूपी अंधकार
सोवै –
सोये हुए
दुखिया –
दुःखी
रोवै –
रो रहे

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है।  इस साखी के कवि कबीरदास जी है। इसमें कबीर जी अज्ञान रूपी अंधकार में सोये हुए मनुष्यों को देखकर दुःखी हैं और रो रहे है हैं।

व्याख्या -: कबीर जी कहते हैं कि संसार के लोग अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे हुए हैं अपनी मृत्यु आदि से भी अनजान सोये हुये हैं। ये सब देख कर कबीर दुखी हैं और वे रो रहे हैं। वे प्रभु को पाने की आशा में हमेशा चिंता में जागते रहते हैं।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी क्या देखकर दुखी हो रहे हैं ?
अथवा
कबीर जी और संसार के लोगों में क्या अंतर है ?

उत्तर – संसार के लोग अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे हुए हैं अपनी मृत्यु आदि से भी अनजान सोये हुये हैं। ये सब देख कर कबीर दुखी हैं और वे रो रहे हैं। वे प्रभु को पाने की आशा में हमेशा चिंता में जागते रहते हैं। 

 

काव्यांश
बिरह भुवंगम तन बसै , मंत्र न लागै कोइ।
राम बियोगी ना जिवै ,जिवै तो बौरा होइ।।

शब्दार्थ
बिरह –
बिछड़ने का गम
भुवंगम –
भुजंग , सांप
बौरा –
पागल

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गयी है। इस साखी के कवि कबीरदास जी हैं। इसमें कबीर कहते हैं कि ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और अगर रह भी जाता है तो वह पागल हो जाता है।

व्याख्या -: कबीरदास जी कहते हैं कि जब मनुष्य के मन में अपनों के बिछड़ने का गम सांप बन कर लोटने  लगता है तो उस पर न कोई मन्त्र असर करता है और न ही कोई दवा असर करती है। उसी तरह राम अर्थात ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों  जैसी हो जाती है।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी के अनुसार ईश्वर वियोग में मनुष्य की स्थिति कैसी हो जाती है ?
अथवा
कबीर जी ने ईश्वर वियोग की स्थिति को समझाने के लिए किस उदाहरण को प्रस्तुत किया है ?

उत्तर – जब मनुष्य के मन में अपनों के बिछड़ने का गम सांप बन कर लोटने  लगता है तो उस पर न कोई मन्त्र असर करता है और न ही कोई दवा असर करती है।  उसी तरह राम अर्थात ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों  जैसी हो जाती है।

काव्यांश
निंदक नेड़ा राखिये , आँगणि कुटी बँधाइ।
बिन साबण पाँणीं बिना , निरमल करै सुभाइ।।

शब्दार्थ
निंदक –
निंदा करने वाला
नेड़ा –
निकट
आँगणि –
आँगन
साबण –
साबुन
निरमल –
साफ़
सुभाइ –
स्वभाव

प्रसंग-: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है। इस साखी के कवी कबीदास जी हैं। इसमें कबीरदास जी निंदा करने वाले व्यक्तियों को अपने पास रखने की सलाह देते हैं ताकि आपके स्वभाव में सकारात्मक परिवर्तन आ सके।

व्याख्या -: इसमें कबीरदास जी कहते हैं कि हमें हमेशा निंदा करने वाले व्यक्तिओं को अपने निकट रखना चाहिए। हो सके तो अपने आँगन में ही उनके लिए घर बनवा लेना चाहिए अर्थात हमेशा अपने आस पास ही रखना चाहिए।  ताकि हम उनके द्वारा बताई गई हमारी गलतिओं को सुधर सकें। इससे हमारा स्वभाव बिना साबुन और पानी की मदद के ही साफ़ हो जायेगा।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी के अनुसार ईश्वर वियोग में मनुष्य की स्थिति कैसी हो जाती है ?
अथवा
कबीर जी ने ईश्वर वियोग की स्थिति को समझाने के लिए किस उदाहरण को प्रस्तुत किया है ?

उत्तर – जब मनुष्य के मन में अपनों के बिछड़ने का गम सांप बन कर लोटने  लगता है तो उस पर न कोई मन्त्र असर करता है और न ही कोई दवा असर करती है।  उसी तरह राम अर्थात ईश्वर के वियोग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों  जैसी हो जाती है।

 

काव्यांश
पोथी पढ़ि – पढ़ि जग मुवा , पंडित भया न कोइ।
ऐकै अषिर पीव का , पढ़ै सु पंडित होइ।

शब्दार्थ
पोथी –
पुस्तक
मुवा –
मरना
भया –
बनना
अषिर –
अक्षर
पीव –
प्रिय

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है।  इस साखी के कवि कबीरदास जी हैं। इसमें कबीर जी पुस्तक ज्ञान को महत्त्व न देकर ईश्वर – प्रेम को  महत्त्व देते हैं।

व्याख्या -: कबीर जी कहते है कि इस संसार में मोटी – मोटी पुस्तकें (किताबें ) पढ़ कर कई मनुष्य मर गए परन्तु कोई भी मनुष्य पंडित (ज्ञानी ) नहीं बन सका।  यदि किसी व्यक्ति ने ईश्वर प्रेम का एक भी अक्षर पढ़ लिया होता तो वह पंडित बन जाता अर्थात ईश्वर प्रेम ही एक सच है इसे जानने वाला ही वास्तविक ज्ञानी है।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी के अनुसार वास्तविक ज्ञानी कौन है ?
अथवा
वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्या आवश्यक है ?
अथवा
कबीर जी किसे अधिक महत्त्व देते हैं ?

उत्तर – कबीर जी पुस्तक ज्ञान को महत्त्व न देकर ईश्वर – प्रेम को  महत्त्व देते हैं। क्योंकि इस संसार में मोटी – मोटी पुस्तकें (किताबें ) पढ़ कर कई मनुष्य मर गए परन्तु कोई भी मनुष्य पंडित (ज्ञानी ) नहीं बन सका।  यदि किसी व्यक्ति ने ईश्वर प्रेम का एक भी अक्षर पढ़ लिया होता तो वह पंडित बन जाता अर्थात ईश्वर प्रेम ही एक सच है इसे जानने वाला ही वास्तविक ज्ञानी है।

 

काव्यांश
हम घर जाल्या आपणाँ , लिया मुराड़ा हाथि।
अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि।।

शब्दार्थ
जाल्या –
जलाया
आपणाँ –
अपना
मुराड़ा –
जलती हुई लकड़ी , ज्ञान
जालौं –
जलाऊं
तास का –
उसका

प्रसंग -: प्रस्तुत साखी हमारी हिंदी पाठ्य पुस्तक ‘स्पर्श ‘ से ली गई है।  इस साखी के कवि कबीरदास जी हैं। इसमें कबीर मोह – माया रूपी घर को जला कर  अर्थात त्याग कर ज्ञान को प्राप्त करने की बात करते हैं।

व्याख्या -: कबीर जी कहते हैं कि उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है अर्थात उन्होंने मोह -माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है।  अब उनके हाथों में जलती हुई मशाल ( लकड़ी ) है यानि ज्ञान है। अब वे उसका घर जलाएंगे जो उनके साथ चलना चाहता है अर्थात उसे भी मोह – माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

काव्यांश पर आधारित प्रश्न –

प्रश्न – कबीर जी ने किस तरह ज्ञान प्राप्त किया ?
अथवा
कबीर जी किन लोगों को अपने साथ चलने को कह रहे हैं ?
अथवा
‘अब घर जालौं तास का, जे चलै हमारे साथि’ पंक्ति द्वारा कबीर जी क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर – कबीर मोह – माया रूपी घर को जला कर  अर्थात त्याग कर ज्ञान को प्राप्त करने की बात करते हैं। कबीर जी कहते हैं कि उन्होंने अपने हाथों से अपना घर जला दिया है अर्थात उन्होंने मोह -माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया है।  अब उनके हाथों में जलती हुई मशाल ( लकड़ी ) है यानि ज्ञान है।  अब वे उसका घर जलाएंगे जो उनके साथ चलना चाहता है अर्थात उसे भी मोह – माया से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता है।

Top

Saakhi Class 10 Chapter 1 Video Explanation

Top

Saakhi FAQs

प्रश्न: साखी के कवि कौन हैं?

उत्तर: साखी संत कबीर द्वारा रचित है।

प्रश्न: कक्षा 10 की कविता साखी का विषय क्या है?

उत्तर: साखी कविता का मुख्य संदेश ईश्वर की उपासना का महत्व है। संत कबीर प्रत्येक साखी में शिष्ट वाणी का महत्व, अहंकार का त्याग, वैराग्य और ईश्वर प्रेम जैसे विभिन्न उपदेश देते हैं।

प्रश्न: साखी के अनुसार ईश्वर को कहाँ पाया जा सकता है?

उत्तर: कवि कबीर के अनुसार, ईश्वर को धार्मिक स्थलों में खोजने के बजाय, हमें अपने भीतर खोजना चाहिए क्योंकि ईश्वर प्रत्येक प्राणी में निवास करता है।

प्रश्न: साखी कविता में कबीर अज्ञान की तुलना किससे करते हैं?

उत्तर: साखी कविता में कबीर कहते हैं कि अज्ञान अंधकार के समान है। मनुष्य अज्ञान के कारण अंधकार में डूबा रहता है और आने वाली मृत्यु से अनभिज्ञ रहता है।

प्रश्न: साखी कविता किस विषय पर आधारित है?

उत्तर: संत कबीर की हिंदी कविता साखी सही नैतिक आचरण और उन सिद्धांतों के बारे में है जिनका पालन व्यक्ति को करना चाहिए। कबीर जी ज्ञान प्रदान करने के लिए वास्तविक जीवन के विभिन्न उदाहरण देते हैं, जो कि अनूठा है।

Top