Character Sketch of Shirish ke Phool

 

लेखक (हजारी प्रसाद द्विवेदी) का चरित्र-चित्रण | Character Sketch of the Writer (Hazari Prasad Dwivedi) from CBSE Class 12 Hindi Chapter 14 शिरीष के फूल

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शिरीष के फूल पाठ के लेखक (हजारी प्रसाद द्विवेदी) के चरित्र सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of the Writer)

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ-14 “शिरीष के फूल” में लेखक द्विवेदी के अनुसार शिरीष के फूल कैसे होते हैं?

उत्तर- हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार शिरीष के फूल अत्यंत कोमल, सुंदर और सरस होते हैं, परन्तु वे भीषण गर्मी, लू और विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्नतापूर्वक खिले रहते हैं। इसी कारण लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह माना है। जिस प्रकार एक संन्यासी सुख-दुख से प्रभावित हुए बिना समान भाव से रहता है, उसी प्रकार शिरीष का फूल भी हर परिस्थिति में शांत और मस्त बना रहता है। इसलिए वह जीवन की अजेयता और धैर्य का संदेश देता है।

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ-14 “शिरीष के फूल” निबंध के लेखक कौन हैं और वे इस निबंध के माध्यम से क्या सन्देश देना चाहते हैं?

उत्तर- ‘शिरीष के फूल’ निबंध के लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं। इस निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल की कोमलता और विपरीत परिस्थितियों में भी उसकी स्थिरता का वर्णन किया है। शिरीष का फूल भीषण गर्मी, लू और कठिन परिस्थितियों में भी खिला रहता है, इसलिए लेखक ने उसे कालजयी अवधूत कहा है।

इस निबंध के माध्यम से लेखक यह संदेश देना चाहते हैं कि मनुष्य को भी जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, संयम और साहस बनाए रखना चाहिए। जैसे शिरीष का फूल हर मौसम में प्रसन्न और सरस बना रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी सुख-दुख से प्रभावित हुए बिना अपने जीवन-पथ पर आगे बढ़ते रहना चाहिए। 

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ-14 “शिरीष के फूल” में द्विवेदी जी को शिरीष के फूल को देखकर किसकी याद आती है?

उत्तर- हजारी प्रसाद द्विवेदी को शिरीष के वृक्ष पर लगे पुराने फलों को देखकर उन नेताओं की याद आती है, जो समय के बदलते हुए रुख को नहीं पहचानते और अपने पद से चिपके रहते हैं। जैसे शिरीष के पुराने फल सूख जाने पर भी डालियों से चिपके रहकर खड़खड़ाते रहते हैं, उसी प्रकार कुछ नेता भी अपने पद को तब तक नहीं छोड़ते जब तक नई पीढ़ी के लोग उन्हें हटाने के लिए मजबूर न कर दें।

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ-14 “शिरीष के फूल” में द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से वर्तमान समय की भागदौड़ भरी एवं संघर्षपूर्ण जीवन-स्थिति के बारे में क्या बताया है?

उत्तर- हजारी प्रसाद द्विवेदी ने शिरीष के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है कि आज का जीवन अत्यंत भागदौड़ और संघर्ष से भरा हुआ है। मनुष्य को अपने जीवन में अनेक कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करना पड़ता है। ऐसे समय में शिरीष का फूल हमें यह प्रेरणा देता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और प्रसन्नता बनाए रखते हुए जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए।

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ-14 “शिरीष के फूल” में हजारी प्रसाद द्विवेदी का दूसरा नाम क्या था?

उत्तर- आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी (या बैजनाथ द्विवेदी) था। 

लेखक (हजारी प्रसाद द्विवेदी) का चरित्र-चित्रण (Character Sketch of  the Writer)

पाठकों के लिए मार्गदर्शक – “शिरीष के फूलनिबंध द्वारा लेखक हजारी प्रसाद द्विवेदी जी पाठकों का मार्गदर्शन करने का प्रयत्न कर रहे हैं। इस निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के माध्यम से संदेश दिया है कि जिस तरह शिरीष के फूल आँधी, लू, भयंकर गर्मी आदि विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए भी अपनी कोमलता सुंदरता को बनाए रहता है, उसी तरह हमें भी अपने जीवन की विपरीत परिस्थितियों में अपने धैर्य संयम को बनाए रखते हुए अपने जीवन में आगे बढ़ते रहना चाहिए। शिरीष का फूल हमें जीवन में लगातार संधर्ष करने की प्रेरणा देता हैं।

  • लेखक दूसरे लेखकों व् कवियों का भी विरोध करने का साहस रखते हैं शिरीष के फूल को संस्कृत साहित्य में बहुत ही कोमल माना गया है। यहाँ तक की कालिदास तो यह कह गए हैं कि शिरीष के फूल केवल भौंरों के पैरों का दबाव ही सहन कर सकते हैं पक्षियों के पैरों का दबाव वे सहन नहीं कर सकते। महाकवि कालिदास की इस बात से दूसरे कवियों ने यह समझ लिया कि शिरीष के पेड़ का सब कुछ ही कोमल है जबकि इसके फल बहुत मज़बूत होते हैं। वो अपना स्थान तभी छोड़ते हैं जब नए पत्तों व् फूलों द्वारा उन्हें जबरदस्ती धकेला जाता है। नहीं तो सूखकर भी वो डालियों में ही खड़खड़ाते रहते हैं।
  • लेखक शिरीष के फूलों के माध्यम से समाज को नैतिक ज्ञान भी देते हैंलेखक कहते हैं कि पुरानी पीढ़ी को समय रहते ही अपने अधिकार करने के लोभ को छोड़ देना चाहिए और नई पीढ़ी के लिए स्थान बनाना चाहिए। लेखक मानते हैं कि वृद्धावस्था और मृत्यु, इस जगत के सत्य है और शिरीष के फूलों को भी यह समझ जाना चाहिए कि जब वह फूला है तो उसका झडना भी निश्चित है। लेखक शिरीष के फूलों को मुर्ख मानते हुए कहते हैं कि वे समझते हैं कि एक ही जगह पर बिना हिलेडुले रहने से मृत्यु के देवता से बचा जा सकता है जबकि हिलनेडुलने वाले कुछ समय के लिए तो बच सकते हैं पर झड़ते ही मृत्यु निश्चित है।
  • लेखक को प्राचीन कवियों के बारे में भी काफी जानकारी है लेखक कबीरदास को भी शिरीष के ही समान मस्त, बेपरवाह, सरस व् मादक मानते हैं। कर्नाट राज की प्रिया अर्थात रानी विज्जिका देवी ने केवल ब्रह्मा जिन्होंने वेदों की रचना की , बाल्मीकि जिन्होंने रामायण को रचा और व्यास जी जिन्होंने महाभारत की रचना की, इन तीनों को ही कवि माना हैं।
  • लेखक कवियों की रचनात्मकता का सम्मान करता है लेखक का मानना है कि जिसे कवि बनना है उसे अनासक्त योगी फक्कड़ बनने की जरूरत है। कालिदास भी किसी अनासक्त योगी की तरह शांत मन और चतुर प्रेमी थे। उनका एकएक श्लोक मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। लेखक मानते हैं कि सिर्फ शब्द लिखने और तुकबंदी करने को कविता नही कह सकते हैं। क्योंकि शब्द तो लेखक भी लिख सकता है और तुकबंदी भी कर सकता है। इसका अर्थ यह नहीं की वह भी कालिदास बन सकता है। कालिदास ने शकुंतला के सौंदर्य का वर्णन किया हैं। परन्तु लेखक मानता है कि वास्तव में वो शकुंतला का सौंदर्य नहीं बल्कि कालिदास के ह्रदय की सुंदरता हैं। वो सुखदुख दोनों में भाव रस खींच लिया करते थे। ऐसी प्रकृति सुमित्रानंदन पंत रवींद्र नाथ टैगोर में भी थी।
  • लेखक शिरीष का पेड़ की तरह पक्के सन्यासी बनने की प्रेरणा देता है लेखक कहते हैं कि आज देश में चारों ओर मारकाट, आगजनी, लूटपाट आदि का बवंडर छाया है। ऐसे में क्या स्थिर रहा जा सकता है। शिरीष रह सकता है। और लेखक के अनुसार गांधीजी भी रह सके हैं। यहाँ पर लेखक ने गांधीजी को एक ऐसे सन्यासी के रूप में याद किया हैं जिसने देह बल के ऊपर आत्मबल को सिद्ध किया है। और देश को आजादी दिलाने में अहम् भूमिका अदा की। लेखक भी चाहते हैं की आज के लोग भी शिरीष के पेड़ से कुछ सीख लें और अपने आत्मबल को बढ़ावा दें।

 

 

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