दो हाथ पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 9 “Do Hath” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
दो हाथ सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 9 Do HathSummary with detailed explanation of the lesson “Do Hath” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 9 दो हाथ पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 दो हाथ पाठ के बारे में जानते हैं।
Do Hath (दो हाथ)
(डॉ० इन्दु बाली)
इस कहानी में लेखिका ने दो हाथों के द्वारा सौंदर्य के सच्चे स्वरूप पर प्रकाश डाला है। लेखिका के अनुसार सौंदर्य का एक रूप कर्म करने में विद्यमान है। ईश्वर ने हमें दो हाथ दिये हैं, भले ही वे कर्म करते हुए खराब हो जाएँ, खुरदरे हो जाएँ इससे अंतर नहीं पड़ता क्योंकि हाथों का वास्तविक सौंदर्य कर्म करने में है। इस कहानी में इसी संदेश द्वारा लेखिका ने लोगों की मानसिक निराशा को दूर करने का प्रयास किया है। और लेखिका ‘कर्म के सौंदर्य की अमूल्य कीमत’ का संदेश बच्चों तक पहुँचाने में पूर्णत: सफल भी रही हैं।
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दो हाथ पाठ सार Do Hath Summary
कहानी ‘दो हाथ’ डॉ० इन्दुबाली द्वारा रचित है। इस कहानी में लेखिका ने एक ऐसी लड़की की उस मानसिक दशा का वर्णन किया है, जिसमें वह अपने हाथों के सौंदर्य को लेकर चिंतित रहती है। उसे माँ की कमी भी अक्सर पीड़ा देती है।
नीरू को घर का सारा काम करना पड़ता था। रसोई का सारा काम करना व् घर की साफ-सफाई तथा कॉलेज की पढ़ाई करना बस यही उसका जीवन था। उसे अपने जीवन में माँ की कमी बहुत महसूस होती थी। वह अक्सर सोचती थी कि यदि उसकी माँ आज जीवित होती तो वह भी बे-फिक्र होकर बिना किसी चिंता के अपनी सहेलियों के साथ खेल सकती थी। किंतु वह अपने दुःख को घर के काम तथा पढ़ाई के बीच डालकर शांत करने का प्रयत्न करती थी। जब कभी पढ़ते और काम करते समय उसका ध्यान अपने हाथों की ओर जाता था तो वह बहुत निराश और दुखी हो जाती थी। अपनी निराशा को दूर करने के लिए वह तरह-तरह के विचार करने लगती थी। वह सोचने लगती थी कि मोर के पैर भी तो बदसूरत होते हैं लेकिन उसका असर मोर की सुंदरता पर नहीं पड़ता है। उसे भी भगवान् ने सुन्दर चेहरा दिया है। घर में सारा दिन काम करने के कारण उसके हाथ कट-फट चुके थे। कभी बर्तन मांजते हुए, कभी झाड़ू लगाते हुए तो कभी रोटियाँ सेकते हुए उसके हाथ जल जाते थे। जब कभी नीरू के पिता प्यार और दुलार से उसके सिर पर अपना हाथ रख देते थे तो वह सभी कमियों को भूल कर सुखद आनंद का अनुभव करने लगती थी। जब कभी वह उदास हो जाती थी तो पिता जी उसकी उदासी का कारण पूछते तो वह अक्सर टाल दिया करती थी। पिता जी को अंदाजा लग जाता था कि उसे उसकी माँ की याद आ रही होगी शायद इसीलिए वह फूट-फूट कर रोने लगती थी। तब पिता जी ने नीरू से कहा कि शायद वह नीरू को पूरा प्यार नहीं दे पाते, तभी तो वह अपनी माँ को इतना याद करती है। परन्तु नीरू इस बात को नकार देती है। जब नीरू को ध्यान आया कि कि अभी तो उसे रसोई का सारा काम करना है। झूठे बर्तन धोने हैं। चूल्हे की लिपाई करनी है। कल की रसोई के लिए कोयले तोड़ने हैं। लकड़ियाँ छाँटनी है। तो उसे याद आता है कि पहले जब कभी वह अपनी मां का हाथ बँटाने की बात करती थी तो उसकी माँ उसे नहीं करने देती थी। वह उसे कहती थी कि उसकी उंगलियाँ ककड़ी की तरह कोमल हैं। घर का सारा काम करते हुए उसे माँ की बातें याद आते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगते थे। वह अनजाने में अपने हाथ को साड़ी के पल्लू में छिपाने की अक्सर कोशिश करती थी। एक दिन जब पिता ने नीरू से कहा कि अब से वे सारा काम मिल कर करेंगे तो नीरू ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। पिता के पूछने पर उसने बताया कि उसकी सभी सहेलियाँ उसके गंदे-भद्दे हाथों को देखकर उस पर हँसती हैं तथा कहती हैं कि उससे कोई शादी नहीं करेगा। तब पिता जी नीरू को समझाते हुए कहते हैं कि काम करने वाले की सुंदरता तो उसके हाथों में होती है। काम करने वाली लड़की तो शक्ति तथा समृद्धि की प्रतीक होती है। पिता की बातों का नीरू पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह उमंग से भर गई। जब से नीरू की माँ का देहांत हुआ था, तभी से उसने अपने भाई बहनों की ज़िम्मेदारी का बोझ उठा रखा था। घर के काम में चलने वाले नीरू के हाथ पढ़ाई में भी खूब चलते थे। नीरू ने पढ़ाई के साथ-साथ संगीत, चित्रकला तथा खेलों में बहुत-से इनाम जीते थे। जब कॉलेज में वार्षिक उत्सव था तब नीरू काफी परेशानी में थी। वह सारी रात सो नहीं पाई थी। उसे अपने हाथों की चिंता सताए जा रही थी। नीरू घर का सारा काम निपटा कर कॉलेज में पहुँची। वह अपनी कुर्सी पर उदास एवं खोई हुई बैठी थी। इनाम देने के लिए नीरू का नाम बड़े सम्मान और तारीफ़ों के साथ लिया गया। इनाम लेने के लिए जैसे ही वह मंच पर पहुँची तो अपने हाथों को देखकर उसे बहुत शर्म आ रही थी। उसकी आँखों से आँसू टपक रहे थे। इनाम बँट जाने के बाद सभापति ने एक विशेष इनाम की घोषणा की। उन्होंने सबसे सुंदर हाथों को इनाम देने की बात कही। नीरू सभापति की बातों को सुनकर चुपचाप खड़ी थी। उसे लग रहा था कि अब मारे शर्म के वह धरती में ही गड़ जाएगी जब सभापति ने सुंदर हाथों का निर्णय सुनाया तो सभी चकित रह गए थे। उन्होंने कहा कि सबसे सुंदर हाथ नीरू के हैं क्योंकि कर्मशीलता ही हाथों की शोभा होते हैं। नीरू के हाथ कर्मशीलता का साक्षात् उदाहरण थे। नीरू जब इनाम लेकर घर लौट रही थी तो वह धीर और गंभीर थी। आज उसे अपने गंदे, भद्दे हाथ बहुत सुंदर लग रहे थे। वह अपने हाथों को लगातार देखती जा रही थी।
दो हाथ पाठ व्याख्या Do Hath Explanation
पाठ – बर्तन साफ कर नीरू ने रसोई को धोया और साग काटने में मग्न हो गई। घर का काम और कॉलेज की पढ़ाई, बस यही उसका जीवन था। माँ का अभाव प्रायः उसे खला करता । अपनी हम उमर सहेलियों को खेलते-देखती तो उसके मन में टीस-सी उठने लगती। काश, उसकी भी माँ होती तो वह भी इसी तरह बेफिकर-सी चहकती-गाती, झूमती-नाचती। यही सोचते हुए मशीन की तरह अपना काम निपटा कर पढ़ाई की किताबें ले उनमें डूब जाती।
कभी-कभी पढ़ते और काम करते समय जब उसका ध्यान अपने हाथों की ओर जाता तो वह उदास हो जाती। फिर सोचती, मोर के पैर भी तो कुरूप होते हैं। इससे क्या होता है। सुंदरता में क्या वह मोर से कम है। भगवान ने उसे सुंदर चेहरा दिया है। हाथों से दिन भर काम करेगी तो उन में सुंदरता और कोमलता कहाँ से आयेगी। कभी बर्तन माँजना, कभी झाडू देना, कभी चपाती सेकते हुए हाथ का जलना बस हर पल काम और काम रसोई का काम निपटा चुपचाप कपड़ों का ढेर धोना । किन्तु रात को जब पिता जी सिर पर हाथ रख कर कहते, “मेरी बेटी थक गई होगी।” तो पिता का अपार दुलार पाकर सभी अभाव भूल जाती उनका प्यार भरा स्पर्श बड़ा सुखद लगता।
शब्दार्थ –
मग्न – लीन
अभाव – कमी
खला – चुभन, पीड़ा
टीस – कसक, सहसा रह-रह कर उठने वाली पीड़ा
बेफिकर – बिना किसी परवाह के
कुरूप – बदसूरत
अपार – अत्यधिक
दुलार – प्यार
व्याख्या – सभी बर्तनों को साफ करने के बाद नीरू ने रसोई को धोया और फिर साग काटने में लीन हो गई। घर का काम करना और कॉलेज की पढ़ाई, नीरू का बस यही जीवन था। माँ की कमी हमेशा उसे पीड़ा देती थी। अपनी ही उम्र की सहेलियों को जब वह खेलते हुए देखती तो उसके मन में रह-रह कर पीड़ा उठने लगती। वह सोचने लगती कि काश, उसकी भी माँ होती तो वह भी अपनी सहेलियों की ही तरह बिना किसी चिंता के चहकती-गाती, झूमती-नाचती। यही सब सोचते हुए वह किसी मशीन की तरह अपना सारा काम ख़त्म करके, अपनी पढ़ाई की किताबें उठा कर उनमें डूब जाती। कभी-कभी पढ़ते हुए और काम करते समय जब उसका ध्यान अपने हाथों की ओर जाता तो वह अपने हाथों को देखकर उदास हो जाती। परन्तु फिर सोचती, कि मोर के पैर भी तो बदसूरत होते हैं। तो इससे मोर की सुंदरता कम नहीं हो जाती। भगवान ने उसे भी सुंदर चेहरा दिया है। यदि वह हाथों से दिन भर काम करेगी तो उन में उनकी सुंदरता और कोमलता ख़त्म तो हो ही जाएगी। कभी बर्तन माँजना, कभी झाडू देना, कभी चपाती सेकते हुए हाथ का जलना बस हर समय काम और काम। जैसे ही रसोई का काम ख़त्म करो वैसे ही चुपचाप कपड़ों का ढेर धोने लग जाओ। परन्तु रात को जब नीरू के पिता जी उसके सिर पर हाथ रख कर उससे पूछते कि वह थक गई होगी। तो पिता का अत्यधिक प्यार पाकर वह सभी कमियों को भूल जाती और पिता का प्यार भरा स्पर्श उसे बहुत सुख देता।
पाठ – कभी वह हँसते-हँसते उदास हो जाती तो पिता झट पूछते, “क्या बात है, मेरी रानी बिटिया उदास क्यों है?”
“कुछ नहीं पिता जी।”
“अरे-अरे-तुम तो रो रही हो, क्या बात है?”
“नहीं-नहीं-हाँ, बस यूं ही मन भर आया था।
“बिना बात के मन भर आया था; यह भी कभी होता है। शायद, माँ की बात याद आ गई थी? क्यों ठीक है न?”
“नहीं-तो, हाँ।” और वह फूट-फूट कर रो पड़ती। पिता जी सिर पर हाथ फेरते हुए कहते, “शायद मैं तुम्हें माँ का पूरा प्यार नहीं दे पाया।” उनकी आँखें भी डब-डबा गयी थीं।
“नहीं-नहीं, आप ग़लत न समझें। वह तो जाने क्यों वैसे ही याद आ गयी, भला आपसे अधिक प्यार कौन दे सकता है?”
शब्दार्थ –
झट – जल्दी
मन भर आना – दुखी होना
व्याख्या – कभी नीरू हँसते-हँसते ही उदास हो जाती थी तो उसके पिता जल्दी से उससे उदास होने का कारण पूछते। जिस पर नीरू उन्हें टाल देती। परन्तु उसे रोता हुआ देखकर वे उससे रोने का कारण पूछते। नीरू उन्हें बहाना बनाती कि बस उसका मन दुखी है। हँसते-हँसते ही बिना बात के मन दुखी होने की बात पर पिता को लगता है कि नीरू को उसकी माँ की बात याद आ गई होगी। इस पर नीरू फूट-फूट कर रो पड़ती है। उसके पिता जी उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि शायद वे नीरू को माँ का पूरा प्यार नहीं दे पाए। और यह कहते हुए उनकी आँखें भी आंसुओं से भर गयी थीं। परन्तु नीरू उन्हें कहती है कि वे उसे ग़लत न समझें। उसे तो ऐसे ही माँ की याद आ गयी, और उसके पिता से अधिक प्यार उसे कोई दे भी नहीं सकता।
पाठ – उसी समय नीरू को ध्यान आया कि अभी उसे ढेर सारा काम करना है। रसोई में सारे बर्तन जूठे पड़े हैं। चूल्हे को लीपना है। कल के लिए कोयले तोड़ने हैं। इस बार लकड़ियाँ इतनी मोटी हैं कि रोज कुल्हाड़ी से उन्हें छाँटना होता है। उसे याद आया कैसे माँ उसे घर का कोई काम नहीं करने देती थी। जब कभी माँ का हाथ बंटाने के लिए कुछ करना चाहती माँ कह देती, “यह सब काम तेरे करने के नहीं। हम अनपढ़ औरतें तो जानवर होती हैं और माँ अपने हाथ खोल कर दिखाती मोटी खुरदरी उंगलियाँ, कटी-फटी चमड़ी और टेढ़-मेढ़े नाखून!” नीरू को जाने कैसे लगता और वह अपने सुंदर हाथों की कोमलता में एक प्यार – का सपना बुनने लगती माँ कहती, “तुम्हारी उंगलियाँ ककड़ी की तरह कोमल हैं, इन पाँच उंगलियों में पाँच अंगूठियाँ डालूंगी, मेंहदी रचाऊंगी, कलाई को चूड़ियों से सजाऊंगी।” और माँ उन्हें गहराई से छू चूम लेती, अपनी गालों पर घुमाती पर अब नीरू जैसे ही अपने हाथों को देखती उसका सपना टूटने लगता। मन की गहराई में जाने कैसा तूफान घिरने-उभरने लगता। काम करते हुए कई बार नीरू का ध्यान इस बात की और चला जाता और वह सोचती क्या उसके हाथ हमेशा ऐसे ही रहेंगे? पहले जैसे न होंगे? अनजाने ही वह अपने हाथों को साड़ी के पल्लू में छिपाने की कोशिश करती। माँ की याद उसे और बेचैन करने लगती।
शब्दार्थ –
ढेर सारा – बहुत सारा
लीपना – साफ करना
चूम लेती – चुंबन करना, लाड़ करना
अनजाने – बिना जाने
बेचैन – परेशान
व्याख्या – पिता से बात करते हुए नीरू को ध्यान आया कि अभी उसे बहुत सारा काम करना है। जैसे – रसोई में सारे बर्तन जूठे पड़े हैं। चूल्हे को लीपना है। अगले दिन के लिए के लिए कोयले तोड़ने हैं। उस बार लकड़ियाँ इतनी मोटी थी कि उन्हें रोज कुल्हाड़ी से काटना – छाँटना पड़ता था । इन सभी यादों के बीच उसे याद आया कैसे उसकी माँ उसे घर का कोई भी काम करने नहीं देती थी। जब कभी वह अपनी माँ का किसी काम में हाथ बंटाने के लिए कुछ करना चाहती तो उसकी माँ उससे कह देती कि यह सब काम उसके करने के नहीं हैं। उसकी माँ उससे कहती कि अनपढ़ औरतें तो जानवर होती हैं और फिर अपने हाथ खोल कर नीरू को दिखाती। उनकी मोटी खुरदरी उंगलियाँ, कटी-फटी चमड़ी और टेढ़-मेढ़े नाखून थे। उनके हाथों को देखकर नीरू को अजीब लगता और वह अपने सुंदर हाथों की कोमलता में एक प्यार – का सपना बुनने लगती। उसकी माँ उससे कहती कि उसकी उंगलियाँ ककड़ी की तरह कोमल हैं, वह उसकी पाँचों उंगलियों में पाँच अंगूठियाँ पहनाएगी, उसके हाथों में मेंहदी रचाएगी और उसकी कलाई को चूड़ियों से साजाएगी। और उसकी माँ नीरू के हाथों को गहराई से छूती और लाड़ करती, और अपने गालों पर घुमाती। परन्तु अब नीरू जैसे ही अपने हाथों को देखती उसका वह सपना टूटने लगता। उसके मन की गहराई में मानों कोई तूफान घिरने-उभरने लगता। काम करते हुए कई बार नीरू का ध्यान इस बात की ओर चला जाता और वह सोचती कि क्या उसके हाथ हमेशा ऐसे ही रहेंगे? वह पहले जैसे नहीं होंगे? बिना जाने ही वह अपने हाथों को अपनी साड़ी के पल्लू में छिपाने की कोशिश करती। उसे उसकी माँ की याद और भी ज्यादा परेशान करने लगती।
पाठ – अगले दिन रसोई में नीरू काम कर रही थी। पिता दफ्तर से लौटे थे और आते ही प्यार से नीरू को पास बुला कर कहने लगे, “आज से सारा काम में किया करूँगा।”
“यह कैसे हो सकता है, मेरे रहते आप काम करें?”
“क्यों नहीं, तुम भी तो मेरे रहते सब काम करती हो?”
“यह बात अलग है।”
“नहीं बेटी; तुम भोली हो – चलो दोनों बाँट कर करेंगे, क्यों ठीक है न?”
तभी नीरू और भी जोर से रोने लगी और बोली, “मेरी सब सहेलियाँ मेरे हाथ देखकर हँसती हैं और कहती हैं, तेरी शादी कभी नहीं होगी, तुझे कोई पसंद नहीं करेगा। चेहरे के सौन्दर्य के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण हाथों का सौंदर्य होता है। फिर किसी को शादी दासी या नौकरानी से तो करनी नहीं लड़कियों के हाथ तो अवश्य सुंदर, कोमल, स्निग्ध और चमकीले होने चाहिए और भी जाने क्या-क्या कह मेरा और आपका उपहास करती हैं।” “जाने कौन यह सब व्यर्थ की बातें तुम्हारे दिमाग में भरता रहता है सब पगली हैं। देखो नीरू ! काम करने वाले की शोभा तो उसके हाथों से ही आँकी जाती है। अपने हाथ से काम करने वाली लड़की तो शक्ति और सम्पन्नता की प्रतीक होती है। काम करने वाले ये दो हाथ तो मानव जीवन की शोभा हैं। भगवान ने ये दो हाथ कर्म करने के लिए बनाए हैं। यही इतिहास, संस्कृति और साहित्य का निर्माण करते हैं। हाथों का सौंदर्य तो कर्म की गति के साथ सुंदर से सुंदरतर और सुंदरतर से सुन्दरतम होता जाता है।” यही सब कहते कहते वह गम्भीर हो गये थे।
शब्दार्थ –
भोली – नादान
गम्भीर – गहरा
सौन्दर्य – सुंदरता
स्निग्ध – चिकना
उपहास – निंदा, बुराई
व्यर्थ – बेकार
आँकी – नापी
सम्पन्नता – समृद्ध
व्याख्या – अगले दिन जब रसोई में नीरू काम कर रही थी, तब उसके पिता दफ्तर से लौटे ही थे और आते ही प्यार से नीरू को अपने पास बुला कर कहने लगे कि अब घर का सारा काम वे ही किया करेंगे। नीरू ने अपने पिता से पूछा कि वे उसके रहते क्यों काम करेंगे। पिता ने उससे कहा जैसे वह उनके रहते सब काम करती है। वह भी वैसे ही कर सकते हैं। नीरू का कहना था कि उसका काम करना एक अलग बात है। उसके पिता उसे भोली कहते है और कहते हैं कि वे दोनों बाँट कर काम कर लेंगे।
इस सबके बाद नीरू और भी जोर से रोने लगी और बोली कि उसकी सब सहेलियाँ उसके हाथ देखकर हँसती हैं और कहती हैं, उसकी शादी कभी नहीं होगी, कोई उसे पसंद नहीं करेगा। क्योंकि चेहरे की सुंदरता के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण हाथों की सुंदरता होती है। और किसी को शादी दासी या नौकरानी से तो करनी नहीं है। लड़कियों के हाथ तो अवश्य सुंदर, कोमल, चिकने और चमकीले होने चाहिए और भी न जाने क्या-क्या कह कर उसका और उसके पिता की बुराई करती हैं। नीरू की ऐसी बातों को सुनकर उसके पिता उससे कहते हैं कि पता नहीं कौन यह सब बेकार की बातें उसके दिमाग में भरता रहता है। उसकी सभी सहेलियां पगली हैं। वे नीरू को समझाते हैं कि काम करने वाले की शोभा तो उनके हाथों से ही पारखी जाती है। अपने हाथ से काम करने वाली लड़की तो शक्ति और समृद्धि की प्रतीक होती है। काम करने वाले ये दो हाथ तो मानव जीवन की शोभा हैं। भगवान ने ये दो हाथ कर्म करने के लिए बनाए हैं। यही हाथ तो इतिहास, संस्कृति और साहित्य का निर्माण करते हैं। हाथों की सुंदरता तो काम करते हुए सुंदर से सुंदरतर और सुंदरतर से सुन्दरतम होती जाती है। यही सब कहते कहते नीरू के पिता गम्भीर हो गये थे।
पाठ – तभी नीरू में एक नई जागृति आ गई और वह उमंग से भर कहने लगी, “सच पिता जी, आप ठीक कहते हैं।” और वह अपने पिता के चेहरे की तरफ श्रद्धालु भक्त की तरह देखने लग गई। उनके चेहरे पर ऐसा भाव उदय हुआ था कि जिसकी गहराई के रहस्य से नीरू का अन्तर्मन प्रकाशित होने लगा था। वह अपने काम में फिर से लग गई, तरह-तरह के पकवान बना टेबल संवारने लगी। दो हाथों के सौंदर्य का रहस्य धीरे-धीरे परत-दर परत खुलने लगा था।
माँ की मृत्यु के बाद भाई बहनों को संभालने का सारा बोझ उसने ही उठा लिया था। सभी छोटे बहन-भाई खेलने खाने में मस्त रहते और माँ की तरह गम्भीर स्वभाव के कारण अपनी ही धुन में समस्त कर्तव्य निभाती रहती। पढ़ाई में भी सबसे आगे रहती। घर के काम में व्यस्त हाथ कलम पर भी खूब चलते थे।
कल कॉलेज में वार्षिक उत्सव था और उसे ढेरों इनाम दिये जाने वाले थे। पढ़ाई के साथ साथ संगीत, चित्रकला और खेलों में भी ढेरों इनाम जीते थे पर न जाने क्यों आज रह रह कर माँ की याद आ रही थी और फिर मन उदास हो जाता था। रात भर अजीब- अजीब सपने देखती रही, माँ को देखा सपना उनमें कहीं न था, उसका अपना सपना कहीं खो गया था। वह चौंक- चौंक कर उठती रही। रह कर अपने हाथों को टटोलती, स्पर्श करती और शरमा जाती । उसके कॉलेज की सभी लड़कियाँ हफ्तों से अपने नाखूनों की सजावट में जुटी थीं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह इन हाथों का क्या करे?
शब्दार्थ –
जागृति – जाग, जागना
श्रद्धालु – जिसके मन में श्रद्धा हो, श्रद्धावान, धर्मात्मा
उदय – उगना
परत – तह, स्तर
टटोलती – स्पर्श द्वारा मालूम करना, छूना
उमंग – उत्साह
अन्तर्मन – मन के भीतर
व्याख्या – पिता के समझाने पर नीरू सारी बात समझ गई और वह खुशी से भर कर अपने पिता की बात से सहमत हो गई। और वह अपने पिता के चेहरे की तरफ इस तरह देखने लगी जैसे कोई श्रद्धालु भक्त भगवान् की तरफ देखता है। उनके चेहरे पर ऐसा भाव उत्पन्न हुआ था कि उस भाव की गहराई के रहस्य से नीरू का मन मानो प्रकाशमय होने लगा था। वह अपने घर के काम में फिर से लग गई, उसने तरह-तरह के पकवान बना कर टेबल सजा दी। दो हाथों के सौंदर्य का रहस्य अब धीरे-धीरे परत-दर परत उसके सामने खुलने लगा था।
माँ की मृत्यु के बाद अपने छोटे भाई बहनों को संभालने का सारा बोझ नीरू ने ही उठा लिया था। सभी छोटे बहन-भाई खेलने खाने में ही मस्त रहते थे और माँ की तरह गम्भीर स्वभाव होने के कारण नीरू अपनी ही धुन में सारे कर्तव्य को निभाती रहती थी। काम के साथ-साथ पढ़ाई में भी वह सबसे आगे रहती थी। घर के काम में व्यस्त रहने वाले नीरू के हाथ कलम पर भी खूब चलते थे।
अगले दिन कॉलेज में वार्षिक उत्सव था और उस में नीरू को भी ढेरों इनाम दिये जाने वाले थे। पहले भी पढ़ाई के साथ साथ संगीत, चित्रकला और खेलों में भी ढेरों इनाम जीते थे। परन्तु आज न जाने क्यों नीरू को रह – रह कर अपनी माँ की याद आ रही थी और उसका मन फिर से उदास हो जाता था। रात भर नीरू अजीब- अजीब सपने देखती रही, उसने सपने में माँ को देखा परन्तु उसका अपना सपना उनमें कहीं नहीं था, लग रहा था मानो उसका अपना सपना कहीं खो गया था। वह सारी रात चौंक- चौंक कर उठती रही। रह-रह कर अपने हाथों को टटोलती, स्पर्श करती और फिर शरमा जाती। उसके कॉलेज की सभी लड़कियाँ हफ्तों से अपने नाखूनों की सजावट में जुटी थीं। परन्तु नीरू को समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपने इन कटे-फटे हाथों का क्या करे!
पाठ – दो हाथ-दो हाथ-दो हाथ-चारों तरफ सुंदर सुंदर कमल रूपी हाथ दिखाई देते थे। सारा आकाश उन हाथों से भर गया था, पर वह अंधेरा कैसा है? वह घबरा जाती है उसे उस अन्धेरे में कुछ दिखाई नहीं देता, उसका दम घुटने लगता है। तभी उनके मध्य से उदित होते दो कटे-फटे, मैले धब्बेदार, टेढ़े नाखूनों वाले, आटा लगे, कहीं से जले, काले पीले बदशक्ल दो हाथ दिखाई दिये। पर अजीब बात है उन दो हाथों के उदित होते ही वातावरण जगमगा उठा, जैसे सूर्य के उदित होते ही रात्रि का अंधकार जगमगा उठता है और सुन्दर हाथ तारों के समान कहीं खो गये थे, नीरू यह अनोखा सपना देख फिर सो न पाई। उसके मन में अजीब उद्वेलन -सा हो रहा था।
प्रातः का समय बहुत ही व्यस्तता का समय होता है। हर तरफ जल्दी और भाग-दौड़ । कोई कुछ माँग रहा था कोई कुछ बस समय भी भाग रहा था। नीरू किसी तरह सारा काम निपटा तैयार हुई और कॉलेज जा पहुँची। पर जल्दी में हाथ धोना ही भूल गई। हाल में उत्सव था और वहाँ पहुँचने के बाद ही उसे याद आया। पर अब क्या हो सकता था? सभी बैठ चुके थे। सभापति आ चुके थे। भागते-भागते ही वह अपनी निश्चित कुर्सी पर पहुँची और उदास खोई-सी बैठ गई। सभापति के स्वागत के बाद इनाम बंटने आरम्भ हुए। नीरू का नाम बहुत ही सम्मान और तारीफ़ों के बाद लिया गया। बड़े चाव से भागती हुई वह स्टेज पर गई पर इनाम लेने के लिए ज्यों ही हाथ फैलाये शर्म से उसके हाथ कांपने लगे और आँखों से आँसू टपकने लगे।
शब्दार्थ –
उद्वेलन – उछाल (भावों की उथल पुथल)
उदित – उदय, उगना
बदशक्ल – जो देखने में अच्छा न हो
निपटा – ख़त्म, पूरा
सभापति – सभा को सम्बोधित करने वाला
व्याख्या – सपने में नीरू ने देखा कि दो हाथ-दो हाथ-दो हाथ- चारों तरफ सुंदर सुंदर कमल के सामान कोमल हाथ दिखाई दे रहे थे। सारा आकाश उन हाथों से भर गया था, परन्तु वहां कुछ अंधेरा दिख रहा था। सपने में वह घबरा जाती है उसे उस अन्धेरे में कुछ दिखाई नहीं देता, उसका दम घुटने लगता है। तभी उन हाथों के बीच से दो कटे-फटे, मैले धब्बेदार, टेढ़े नाखूनों वाले, आटा लगे, कहीं से जले, काले पीले बदशक्ल दो हाथ उदित होते हुए दिखाई दिये। परन्तु अजीब बात थी कि उन दो बदसूरत हाथों के उदित होते ही वातावरण जगमगा उठा, जैसे सूर्य के उदित होते ही रात का अंधकार जगमगा उठता है और सभी सुन्दर हाथ तारों के समान कहीं खो गये थे, नीरू यह अनोखा सपना देख कर जाग गई और फिर पूरी रात सो नहीं पाई। उसके मन में अजीब उथल-पुथल हो रही थी।
नीरू के घर में प्रातः का समय बहुत ही व्यस्तता का समय होता था। हर तरफ जल्दी और भाग-दौड़ मची रहती थी। कोई कुछ माँग रहा था कोई कुछ, ऐसा लग रहा था बस समय भी भाग रहा हो। नीरू किसी तरह सारा काम निपटा कर तैयार हुई और कॉलेज जा पहुँची। परन्तु जल्दी में वह अपने हाथ धोना ही भूल गई थी। उत्सव हाल में था और वहाँ पहुँचने के बाद ही नीरू को याद आया कि वह हाथ धोना भूल गई है। परन्तु अब वह कुछ नहीं कर सकती थी। सभी बैठ चुके थे। सभापति भी आ चुके थे। भागते-भागते ही वह अपनी निश्चित की गई कुर्सी पर पहुँची और वहां उदास सी कहीं खोई हुई सी बैठ गई। सभापति के स्वागत के बाद इनाम बंटने शुरू हुए। इनाम लेने ले लिए नीरू का नाम बहुत ही सम्मान और तारीफ़ों के बाद लिया गया। नीरू बड़े चाव से भागती हुई स्टेज पर गई परन्तु इनाम लेने के लिए जैसे ही उसने अपने हाथ फैलाये वैसे ही शर्म से उसके हाथ कांपने लगे और उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे।
पाठ – इनाम बंट जाने के बाद सभापति ने कहा, “एक विशेष इनाम देने को मन चाह रहा है। वह इनाम है उस लड़की के लिए जिसके हाथ कॉलेज में सबसे सुंदर होंगे। निर्णय जजों पर छोड़ा जाता है। इतना सुनना था कि सुन्दर सुंदर हाथ अपने अपने को संवारते से आ धमके। आज सभी लड़कियां खुश थीं। उनकी किस्मत जाग उठी थी। कोई मूल्य डालने वाला तो मिला। पर नीरू मौन सिर झुकाये खड़ी थी। इतनी उदास और शर्मिन्दा तो वह पहले कभी न हुई थी। उसकी समस्त सहन शक्ति मानो खो गई थी, लगने लगा था एक भयंकर विस्फोट होगा और वह धरती में समा जायेगी।”
सभापति ने निर्णय सुनाया तो सभी चौंक गये। वह कह रहे थे नीरू के दो हाथ मुझे पिछले चार घंटों से अपने अपूर्व सौंदर्य के प्रति आकर्षित कर रहे थे। आज मैंने जाना सुंदर हाथ कर्म से सजते हैं। कर्मशीलता ही हाथों की शोभा होती है। हाथ सर्जक हैं, उनका सौंदर्य कार्य करने की क्षमता है। वह जीवन का बाह्य नहीं, आंतरिक सौंदर्य और शृंगार हैं। वे हाथ कितने सुंदर हो सकते हैं जिन्हें कर्म-साधना में अपनी ही होश नहीं और जो केवल दूसरों की सेवा में लगे हैं। हाथों पर लगा आटा, काले-पीले जले निशान, स्थान-स्थान से कटे-फटे नदी-नालों सम बहता अद्वितीय अलौकिक सृष्टि का अपार-सौंदर्य मानो यहीं आकर समा गया हो। ऐसे सुंदर हाथ मैंने पहले कभी नहीं देखे! यह कहते कहते सभापति समस्त हाल मे बैठी लड़कियों की तरफ देखने लगे, जैसे उनकी आँखें कहीं दूर खो गई हों।
नीरू इनाम लेकर लौट रही थी। वह खुश थी। धरती सम गम्भीर सागर सी अपार थी उसकी खुशी की उपलब्धि। उसने अपने हाथों की ओर देखा। उसे आज से दोनों हाथ सुंदर लग रहे थे। साथ यह भी उसके मन में आया कि सौंदर्य का केंद्र बिन्दु कहाँ है?
शब्दार्थ –
मौन – चुप
भयंकर विस्फोट – धमाका, फूटना, अचानक वृद्धि
बाह्य – बाहरी
अद्वितीय – अनोखा, अनूठा
अलौकिक – जो लोक में न मिलता हो, अद्भुत, अपूर्व
समस्त – सारा
उपलब्धि – प्राप्ति, सफलता, सिद्धि
कर्मशीलता – फल की इच्छा छोड़कर काम करना
सर्जक – रचना करने वाला
व्याख्या – जब सभी इनाम बंट गए तब सभापति ने कहा कि उनका एक विशेष इनाम देने को मन चाह रहा है। वह उस लड़की को इनाम देना चाहते हैं, जिसके हाथ कॉलेज में सबसे सुंदर होंगे। चुनाव का निर्णय जजों पर छोड़ा गया। सभापति की बात को सुनकर सभी सुन्दर सुंदर हाथ अपने अपने को संवारते हुए आ गए। सभापति की बात सुनकर आज सभी लड़कियां खुश थीं। क्योंकि आज उनके हाथों की किस्मत जाग उठी थी। आज कोई उनके मूल्य को पहचानने वाला मिल गया था। परन्तु सभी के बीच नीरू चुप चाप सिर झुकाये खड़ी थी। जितनी उदास और शर्मिन्दा वह आज थी, पहले कभी इतनी उदास और शर्मिन्दा नहीं हुई थी। उसकी सारी सहन शक्ति मानो कहीं खो गई थी, उसे ऐसा लगने लगा था जैसे कोई एक भयंकर विस्फोट होगा और वह धरती में समा जायेगी।
सभापति ने जब निर्णय सुनाया तो सभी चौंक गये। वह कह रहे थे कि नीरू के दो हाथ उन्हें पिछले चार घंटों से अपने अपूर्व सौंदर्य के प्रति आकर्षित कर रहे थे। आज उन्होंने जाना कि सुंदर हाथ कर्म से सजते हैं। फल की इच्छा छोड़कर काम करना ही हाथों की शोभा होती है। हाथ रचना करने वाले होते हैं, उनकी सुंदरता कार्य करने की क्षमता है। हाथ जीवन के बाहर के नहीं, बल्कि आंतरिक सुंदरता और शृंगार हैं। वे हाथ कितने सुंदर हो सकते हैं जिन्हें कर्म-साधना में अपनी ही होश नहीं और जो केवल दूसरों की सेवा में लगे हैं। हाथों पर लगा आटा, काले-पीले जले निशान, स्थान-स्थान से कटे-फटे हाथ ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे नदी-नालों के सामान बहता अत्यधिक सुंदर सृष्टि की अद्धभुत सुंदरता मानो इन्हीं हाथों में आकर समा गई हो। ऐसे सुंदर हाथ उन्होंने पहले कभी नहीं देखे। यह कहते कहते सभापति सारे हाल में बैठी लड़कियों की तरफ देखने लगे, जैसे उनकी आँखें कहीं दूर खो गई हों। और उन हाथों को खोज रही हो।
जब नीरू इनाम लेकर घर लौट रही थी। तब वह बहुत खुश थी। उसकी खुशी की उपलब्धि धरती के सामान गम्भीर और सागर के सामान अपार थी। उसने अपने हाथों की ओर देखा। और उसे आज से अपने दोनों हाथ सुंदर लग रहे थे। साथ ही वह यह भी सोचने लगी कि सुंदरता का केंद्र बिन्दु कहाँ है!
Conclusion
‘दो हाथ’ कहानी एक मनोवैज्ञानिक कहानी है। इस कहानी में लेखिका ने मानव के दो हाथों के माध्यम से सौन्दर्य के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला है। लेखिका ने माना है कि हाथों की सुंदरता का रूप कर्म करने में विद्यमान हैं। और लेखिका ‘कर्म के सौन्दर्य की अमूल्य कीमत’ का संदेश बच्चों तक पहुँचाने में पूर्णतः सफल रही। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 9 ‘दो हाथ’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।