विप्लव गायन पाठ के पाठ सार, पाठ-व्याख्या, कठिन शब्दों के अर्थ और NCERT की पुस्तक के अनुसार प्रश्नों के उत्तर

 
विप्लव गायन
 
Viplav Gayan Summary Class 7 Hindi Vasant Bhag 2 book Chapter 20 Summary of Viplav Gayan and detailed explanation of the lesson along with meanings of difficult words. Here is the complete explanation of the lesson, along with all the exercises, Questions and Answers are given at the back of the lesson. Take Free Online MCQs Test for Class 7.
 
स लेख में हम हिंदी कक्षा 7 ” वसंत भाग – 2 ” के पाठ – 20 ” विप्लव गायन ” पाठ के पाठ – प्रवेश , पाठ – सार , पाठ – व्याख्या , कठिन – शब्दों के अर्थ और NCERT की पुस्तक के अनुसार प्रश्नों के उत्तर , इन सभी के बारे में चर्चा करेंगे –
 

विप्लव गायन

 

Class 7 Hindi Lesson Explanation notes

 

 

कवि परिचय 

कवि – बालकृष्ण शर्मा ‘ नवीन ’ जी

 

 

विप्लव गायन पाठ प्रवेश

जब बदलाव होता है तो उथल – पुथल मचती है। फिर चाहे वो बदलाव प्रकृति में हो , हमारी निजी जिंदगी में हो या फिर समाज में ही क्यों न हो। कवि बालकृष्ण शर्मा ‘ नवीन ’ जी ने अपनी इस कविता में लोगों से सामाजिक बुराईयों और पाखंडों की ज़ंजीरें तोड़कर प्रगति के मार्ग पर बढ़ने का आह्वान किया है। यह कविता उस समय लिखी गई थी जब भारत का स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था। कवि ने भी असहयोग आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। अपनी इस कविता के माध्यम से वे भी लोगों में बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। वो कहते हैं कि अगर हम अपने आस – पास बदलाव चाहते हैं तो हमें  शांति के गीत गाना छोड़ कर , क्रांति की तान सुननी होगी अर्थात क्रान्ति का सहारा लेना होगा ताकि बुराईयों और बुरे लोगों में हलचल मच जाए। कवि ने इस कविता के जरिए समाज को एक महान बदलाव करने का संदेश दिया है। कवि मानते हैं कि पुराने कुविचारों और पाखंडों का अंत करके ही हम एक नए और स्वच्छ समाज की नींव रख पाएंगे। इसीलिए कवि ने ‘ विप्लव गायन ‘ कविता में हम सभी से एक क्रांति लाने का अनुरोध किया है , ताकि एक बेहतर समाज बनाया जा सके।
 

 

 

विप्लव गायन पाठ सार 

 
कवि बालकृष्ण शर्मा ‘ नवीन ’ जी ने अपनी इस कविता में लोगों से सामाजिक बुराईयों और पाखंडों की ज़ंजीरें तोड़कर प्रगति के मार्ग पर बढ़ने का आह्वान किया है। विप्लव गायन कविता में कवि एक ऐसा गीत गाने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं , जो समाज में क्रांति पैदा करे और जिससे परिवर्तन की शुरुआत हो।समाज में बदलाव लाने की इच्छा से कविता में कवि से अनुरोध किया जा रहा है कि वह कोई ऐसी तान सुनाए जिससे हर तरफ उथल पुथल मच जाए , जिससे सब जगह हलचल हो जाए। कवि चाहते हैं कि यह बदलाव केवल एक तरफ  न हो बल्कि यह हर जगह हो। इस बदलाव की एक लहर एक दिशा से आए और दूसरी अलग दिशा से ताकि हर जगह बुराई के खिलाफ आवाज़ उठे। कवि अपने गीत से सबको सतर्क रहने को कहते हैं। कवि का कहना है कि उसकी वीणा यानि वाद्ययंत्र में चिंगारियाँ प्रवेश कर चुकी हैं। वे निडर हो गए हैं। वीणा की मिजराबें अर्थात तार को छेड़ने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला छोटा उपकरण अब टूट चुका हैं और वीणा बजाने वाले की अंगुलियाँ अकड़ गई हैं। कविता में कवि कहते हैं कि उनके गीत को गाने वाले गायक का गला बैठ जाने के कारण उसके मुँह से निकलने वाले इस प्रलय के गीत का रास्ता रुका हुआ है। कवि का मानना है कि वह अत्यंत आवेश से विनाशक गीत गाना चाहता है क्योंकि वे जानते हैं कि विध्वंस की नींव पर ही नवनिर्माण संभव है। उसके गले से अधिक उत्तेजना के कारण विनाशकारी गीत के स्वर निकल नहीं पाते है। उस रुकावट से जल्दी ही उसके तन बदन में आग लगेगी और हृदय  क्रोध से भर जाएगा और चिंतित हो जायेगा। क्योंकि जब हर तरफ से प्रतिबंध लगने लगते हैं तो ऐसे में किसी भी व्यक्ति का खून खौलेगा। कविता में कवि यह भी कहते हैं कि जिस तरह काँटेदार झाड़ियों या बेकार या रद्दी चीज़ों के समूह को आग जला कर भस्म कर देती है , उसी प्रकार अपने डर को समाप्त कर जब सारे बंधनों को तोड़कर , गाने वाले के स्वर फूटते हैं तो उससे जो अग्नि निकलती है उससे हर तरफ आग लग जाती है। जब कवि भी अपने अवरुद्ध गले से क्रोधित होकर गीत निकालता है तो कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। अर्थात जब कई वर्षों तक दबाए जाने के बाद क्रान्ति आती है तो वो भी अपने आस – पास की सभी बेड़ियों को जिसने उसे रोक रखा था, उसे अपने अंदर की,  क्रोध की आग से जला कर भस्म कर देती है। गाने का हर स्वर हर जगह अपना असर दिखने लगता है। सभी लोगों के मन में कवि के स्वर गूँजने लगते हैं अर्थात सभी बदलाव के लिए तैयार हो रहे हैं। यह सब देख कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी विषधर की मणि से ज्वाला निकल रही हो। आज जब सभी बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो रहे हैं तब कवि ने अपने जीवन के रहस्यों को भी समझ लिया है अर्थात पराधीनता के लंबे संघर्ष ने कवि को जीवन के सभी राज का मर्म समझा दिया है। कवि को पता चल गया है कि किस तरह उस गुलामी के विनाश के सूत्र काम करते हैं। अब वह पराधीनता का विनाश करने को पूरी तरह तैयार है।
 

 

 

विप्लव गायन पाठ व्याख्या 

कवि , कुछ ऐसी तान सुनाओ –

जिससे उथल पुथल मच जाए ,

एक हिलोर इधर से आए ,

एक हिलोर उधर से आए।

शब्दार्थ –

तान – विस्तार , ज्ञान का विषय , संगीत में स्वरों का कलात्मक विस्तार , किसी बात को धुन के साथ कहते रहना

उथल – पुथल – अराजकता , अव्यवस्था , गड़बड़ी , भारी उलटफेर , उलट – पुलट , क्रमभंग , हलचल

हिलोर – जल में उठने वाली तरंग या लहर , हिल्लोल

व्याख्या – समाज में बदलाव लेन की इच्छा से इन पंक्तियों में कवि से अनुरोध किया जा रहा है कि वह कोई ऐसी तान सुनाए जिससे हर तरफ उथल पुथल मच जाए , जिससे सब जगह हलचल हो जाए। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि ऐसा जोशीला गीत गाना चाहते हैं जिससे लोगों के अंदर बुराई को समाप्त करने की ताकत आ पाए। कवि चाहते हैं कि यह बदलाव केवल एक तरफ  न हो बल्कि यह हर जगह हो। इस बदलाव की एक लहर एक दिशा से आए और दूसरी अलग दिशा से ताकि हर जगह बुराई के खिलाफ आवाज़ उठे।

भावार्थ – विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कवि एक ऐसा गीत गाने की इच्छा व्यक्त कर रहे हैं , जो समाज में क्रांति पैदा करे और जिससे परिवर्तन की शुरुआत हो।

 

सावधान ! मेरी वीणा में ,

चिनगारियाँ आन बैठी हैं ,

टूटी हैं मिजराबें , अंगुलियाँ

दोनों मेरी ऐंठी हैं।

शब्दार्थ  –

सावधान – ध्यानपूर्वक काम करने वाला , सचेत , सतर्क , जागरूक , चौकस

वीणा –  सितार जैसा एक वाद्ययंत्र जिसके दोनों सिरों पर तूँबे लगे रहते हैं

चिनगारियाँ – क्रोध , बेबाक हो जाना , निडर हो जाना

आन बैठी – आ कर बैठना

मिजराबें – तार को छेड़ने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला छोटा उपकरण

ऐंठी – तनना , खींचना , कसना , अकड़ना

व्याख्या – इन पंक्तियों में कवि अपने गीत से सबको सतर्क रहने को कहते हैं। कवि का कहना है कि उसकी वीणा यानि वाद्ययंत्र में चिंगारियाँ प्रवेश कर चुकी हैं। अर्थात अब उन्हें अपनी बात को दूसरों तक पहुँचाने से कोई नहीं  रोक सकता , वे निडर हो गए हैं। वीणा की मिजराबें अर्थात तार को छेड़ने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला छोटा उपकरण अब टूट चुका हैं और वीणा बजाने वाले की अंगुलियाँ अकड़ गई हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कवि जिन बातों को अपने गीत के माध्यम से बताना चाहता है उन बातों को गीत की धुन देने वाला व्यक्ति भी डर गया है जिस कारण वह वीणा को नहीं बजा पा रहा है।

भावार्थ – इन पंक्तियों में कवि लोगों को सावधान करते हुए कहते हैं कि मेरा यह गीत समाज में क्रांति की चिंगारियाँ पैदा कर सकता है , सब की शांति भंग हो सकती है और इस क्रांति से आने वाले बदलाव सबको कष्ट भी दे सकते हैं। वो कहते हैं कि उनके इस गीत से समाज में कई बदलाव आएँगे और वर्तमान व्यवस्था उलट – पुलट सकती है।

 

कंठ रुका है महानाश का

मारक गीत रुद्ध होता है ,

आग लगेगी क्षण में , हृत्तल

में अब क्षुब्ध युद्ध होता है ,

शब्दार्थ –

कंठ – गला , गरदन , गले का भीतरी हिस्सा , टेंटुआ

महानाश – विध्वंस , प्रलय

मारक – मारने वाला , जान से मार डालने वाला , नाशक , दमन करने वाला

रुद्ध – घेरा हुआ , रोका हुआ , अवरुद्ध

क्षण –  पल , काल की अत्यंत छोटी इकाई , एक बार पलक झपकने भर का समय

हृत्तल –  हृदय , दिल , कलेजा

क्षुब्ध –  क्रोध , चिंतित , भयभीत

व्याख्या –  कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि उनके गीत को गाने वाले गायक का गला बैठ जाने के कारण उसके मुँह से निकलने वाले इस प्रलय के गीत का रास्ता रुका हुआ है। कवि का मानना है कि वह अत्यंत आवेश से विनाशक गीत गाना चाहता है क्योंकि वे जानते हैं कि विध्वंस की नींव पर ही नवनिर्माण संभव है। अर्थात अगर वे बदलाव चाहते हैं तो उन्हें पहले से बने बनाए समाज की प्रथाओं को उखाड़ फेंकना होगा तभी नई चीज़ों को समाज में जगह मिल सकेगी। उसके गले से अधिक उत्तेजना के कारण विनाशकारी गीत के स्वर निकल नहीं पाते है। उस रुकावट से जल्दी ही उसके तन बदन में आग लगेगी और हृदय  क्रोध से भर जाएगा और चिंतित हो जायेगा। क्योंकि जब हर तरफ से प्रतिबंध लगने लगते हैं तो ऐसे में किसी भी व्यक्ति का खून खौलेगा।

भावार्थ – कवि ने विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कहा है कि उनके गीत से पैदा हुए हालातों की वजह से महाविनाश का गला रुंध गया है और उसने मृत्यु का गीत गाना रोक दिया है। असल में , इन पंक्तियों में कवि कहना चाह रहे हैं कि जब भी समाज में बदलाव के लिए आवाज़ उठाई जाती है , तो उसे दबाने की लाखों कोशिशें की जाती हैं। मगर , क्रांति की आवाज़ ज्यादा समय तक दबाई नहीं जा सकती।

 

 

झाड़ और झंखाड़ दग्ध हैं –

इस ज्वलंत गायन के स्वर से

रुद्ध गीत की क्रुद्ध तान है

निकली मेरे अंतरतर से !

शब्दार्थ –

झाड़ – काँटेदार क्षुप , गुंजान , एक प्रकार की समुद्री घास

झंखाड़ – घनी और काँटेदार झाड़ियों का समूह , वन में पौधों – लताओं का घना समूह , बेकार या रद्दी चीज़ों का समूह या ढेर

दग्ध – जला या जलाया हुआ , भस्मीकृत , अत्यधिक पीड़ा युक्त , दुखी

ज्वलंत – चमकता हुआ , प्रकाशित , जलता हुआ , स्पष्ट , साफ़

रुद्ध – घेरा हुआ , रोका हुआ , अवरुद्ध

क्रुद्ध –  क्रोधित , जो गुस्से में हो

अंतरतर – अंदर से

व्याख्या – कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि जिस तरह काँटेदार झाड़ियों या बेकार या रद्दी चीज़ों के समूह को आग जला कर भस्म कर देती है , उसी प्रकार अपने डर को समाप्त कर जब सारे बंधनों को तोड़कर , गाने वाले के स्वर फूटते हैं तो उससे जो अग्नि निकलती है उससे हर तरफ आग लग जाती है। जब कवि भी जब अपने अवरुद्ध गले से क्रोधित होकर गीत निकलता है तो कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। अर्थात जब कई वर्षों तक दबाए जाने के बाद क्रान्ति आती है तो वो भी अपने आस – पास की सभी बेड़ियों को जिसने उसे रोक रखा था उसे अपने अंदर की क्रोध की आग से जला कर भस्म कर देती है।

भावार्थ – कवि के दिल में सामाजिक बुराइयों और वर्तमान व्यवस्था के प्रति जो रोष है , उसकी ज्वाला से हर अवरोध जल कर राख हो जाएगा। फिर बदलाव के गीतों की तान दोबारा दोगुने ज़ोर से शुरू हो जाती है और उसके वेग से सभी सामाजिक कुरीतियाँ और ढोंग – पाखंड पल भर में समाप्त हो जाते हैं।

 

कण – कण में है व्याप्त वही स्वर

रोम – रोम गाता है वह ध्वनि ,

वही तान गाती रहती है ,

कालकूट फणि की चिंतामणि ,

शब्दार्थ –

व्याप्त – फैला हुआ , समाया हुआ , परिपूर्ण , भरा हुआ

व्याख्या –  कवि जब अपना गाना गाने लगता है तो कण – कण में उसकी ज्वाला फैल जाती है। अर्थात गाने का हर स्वर हर जगह अपना असर दिखने लगता है। सभी लोगों के मन में कवि के स्वर गूँजने लगते हैं अर्थात सभी बदलाव के लिए तैयार हो रहे हैं। यह सब देख कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी विषधर की मणि से ज्वाला निकल रही हो। कहने का तात्पर्य यह है कि बदलाव के बारे में सोचना अलग बात है किन्तु जब सच में बदलाव होने लगता है तब उस पर उसी प्रकार विश्वास करना कठिन होता है जैसे किसी विषधर की मणि को चमकते हुए देखने की बात पर विश्वास करना। 

भावार्थ: विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि संसार के हर एक कण में क्रांति का गीत समा गया है , हर दिशा से उसी की प्रतिध्वनि आ रही है। जिस तरह शेषनाग अपनी मणि की चिंता में डूबे रहते हैं , उसी प्रकार यह सारा संसार भी नवनिर्माण के चिंतन में लीन हो गया है।

 

 

आज देख आया हूँ – जीवन

के सब राज़ समझ आया हूँ ,

भ्रू – विलास में महानाश के

पोषक सूत्र परख आया हूँ। 

शब्दार्थ –

राज़ –  गुप्त योजना , रहस्य , भेद

भ्रू – भौंह , भौं , आँखों के ऊपर के बाल

विलास –  आनंद , प्रसन्नता , हर्ष

पोषक – समर्थक , हिमायती , पोषण प्रदान करने वाला , स्वास्थ्यवर्धक

सूत्र –  तागा , धागा , डोरी , पता , संकेत , सुराग , क्लू

परख – अच्छे – बुरे की समझ , योग्यता या पहचान , जाँच , परीक्षण , टेस्ट

व्याख्या – कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि आज जब सभी बदलाव को स्वीकार करने के लिए तैयार हो रहे हैं तब कवि ने अपने जीवन के रहस्यों को भी समझ लिया है अर्थात पराधीनता के लंबे संघर्ष ने कवि को जीवन के सभी राज का मर्म समझा दिया है। कवि को पता चल गया है कि किस तरह उस गुलामी के विनाश के सूत्र काम करते हैं। अब वह पराधीनता का विनाश करने को पूरी तरह तैयार है।

भावार्थ – विप्लव गायन कविता की इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि वे तो यह जान गए हैं कि बदलाव के बाद समाज में कैसी परिस्थितियां पैदा होंगी। इसीलिए वो कहते हैं कि समाज के विचारों और नज़रिए में बदलाव आने के साथ ही बुराइयों से भरे दूषित समाज का विनाश जरुरी है और इसके बाद ही एक नए राष्ट्र और समाज का निर्माण प्रारम्भ हो सकता है।  
 

 

 

Viplav Gayan Question Answers (विप्लव गायन प्रश्न अभ्यास) 

प्रश्न 1 – ‘ कण – कण में है व्याप्त वही स्वर ……… कालकूट फणि की चिंतामणि। ’

(क) ‘ वही स्वर ’ ,  ‘ वह ध्वनि ’ एवं ‘ वही तान ’ आदि वाक्यांश किसके लिए किस भाव के लिए प्रयुक्त हुए हैं ?

उत्तर – ‘ वही स्वर ’ , ‘ वह ध्वनि ’ एवं ‘ वही तान ’ नवनिर्माण का रास्ते खोलने के लिए तथा लोगों में जागरूकता का आहवान करने के लिए प्रयोग किया गया है। इसके अलावे इन वाक्यांश का प्रयोग लोगों में क्रांति की भावना को जगाने के लिए किया गया हैं , जो हर ओर पहले से व्याप्त है , केवल उसे जागृत करने की आवश्यकता है।

 

(ख) वही स्वर , वह ध्वनि एवं वही तान से संबंधित भाव का ‘ रुद्ध – गीत की क्रुद्ध तान है / निकली मेरी अंतरतर से ‘ – पंक्तियों से क्या कोई संबंध बनता है ?

उत्तर – हाँ , वही स्वर , वही ध्वनि एवं वही तान से संबंधित भाव ‘ रुद्ध – गीत की क्रुद्ध तान है / निकली मेरे अंतरतर से ‘ – पंक्तियों से सही संबंध बनता है क्योंकि कवि की इस कविता की इन पंक्तियों में वर्तमान व्यवस्था के प्रति आक्रोश है , वही आक्रोश क्रांति गीत के रूप में निकल रहा है। वही क्रांति रोम – रोम में घुलकर प्रति ध्वनित होने लगती है।

 

प्रश्न 2 – नीचे दी गई पंक्तियों का भाव स्पष्ट कीजिए –

सावधान ! मेरी वीणा में .……… दोनों मेरी ऐंठी हैं। ’

उत्तर – ‘ सावधान ! मेरी वीणा में .……… दोनों मेरी ऐंठी हैं। ’ कविता की इन पंक्तियों का भाव यह है कि कवि लोगों को परिवर्तन के प्रति सावधान करता है और वीणा से कोमल स्वर निकालने की बजाय कठोर स्वर निकालने के कारण उसकी उँगलियों से वीणा की मिज़राबें टूटकर गिर गईं , जिससे उसकी उँगलियाँ ऐंठकर घायल हो जाती हैं। अर्थात बदलाव लाना आसान नहीं होता उसके लिए कई बलिदान करने पड़ते हैं और न जाने कितनी तकलीफों का सामना करना पड़ता है।