NCERT Class 7 Hindi Vasant Bhag 2 Chapter 11 Rahim Ke Dohe Summary, Explanation with Video and Question Answers 

Rahim Ke Dohe- NCERT Solution for Class 7 Hindi Vasant Bhag 2 book Chapter 11 Rahim Ke Dohe Summary and detailed explanation of lesson “Rahim Ke Dohe” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with all the exercises, Questions and Answers are given at the back of the lesson. Take Free Online MCQs Test for Class 7.


 


 

इस लेख में हम हिंदी कक्षा 7 ” वसंत भाग – 2 ” के पाठ 11रहीम के दोहेकविता के पाठप्रवेश , पाठसार , पाठव्याख्या , कठिनशब्दों के अर्थ और NCERT की पुस्तक के अनुसार प्रश्नों के उत्तर , इन सभी के बारे में चर्चा करेंगे

 

कक्षा – 7 पाठ 11 ” रहीम के दोहे”

रहीम के दोहे पाठ प्रवेशरहीम के दोहे पाठ की व्याख्या
रहीम के दोहे पाठ साररहीम के दोहे प्रश्न-अभ्यास

 

कवि परिचय –

कवि – रहीम

 

 

पाठ प्रवेश ( रहीम के दोहे ) –

रहीम जी के दोहे जीवन की हर स्थिति जुड़े होते हैं। रहीम जी के दोहों में हर तरह की सीख होती है जिससे व्यक्ति को जीवन के हर पहलु का ज्ञान होता है। रहीम जी के दोहे जीवन की वास्तविकता का परिचय तो देते ही हैं , उसके साथ ही प्रेम , त्याग और जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में किस तरह सरलता से जीवन जीना चाहिए इसकी प्रेरणा भी देते हैं।
 

 

 

पाठ सार ( रहीम के दोहे ) –

 प्रस्तुत दोहों में रहीम जी ने कहा है कि जब आपके पास धन – सम्पति होती है , तब तो बहुत से लोग आपके मित्र बन जाते हैं। लेकिन उन में से जो मित्र मुसीबत के समय भी आपके साथ रहता है वही आपका सच्चा मित्र होता है। रहीम जी ये भी सीख देते हैं कि एक तरफा प्रेम भी घातक होता है क्योंकि जब मछली को पकड़ने के लिए जाल खींचा जाता है तो पानी तो मछली का साथ छोड़ देता है लेकिन मछली को पानी के प्रेम के कारण प्राण त्यागने पड़ते हैं। रहीम जी सज्जन लोगों के एक गुण को बताते हुए कहते हैं कि जिस तरह पेड़ कभी अपना फल नहीं खाते , नदी – तालाब कभी अपना जल नहीं पीते , उसी तरह सज्जन व्यक्ति धन का संग्रह अपने लिए नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के लिए करते हैं। रहीम जी ने निर्धन व्यक्तियों की तुलना अश्विन महीने के बादलों से की है क्योंकि निर्धन लोगों का बीते हुए सुख के दिनों की बातें करना वैसे ही बेकार होता है जैसे अश्विन महीने के बादलों का गरजना। क्योंकि अश्विन महीने के बादल भी बेकार में ही गरजते है , बरसते नहीं हैं। और अंत में  रहीम जी कहते हैं कि जिस तरह धरती गर्मी , सर्दी , बरसात , तूफान आदि सभी प्रकार की परिस्थितियों का सामना एक समान भाव से करती है उसी तरह मनुष्य को भी अपने जीवन की प्रत्येक परिस्थिति का सामना सहज रूप से करना चाहिए।
 

 

 

पाठ व्याख्या ( रहीम के दोहे ) –

 दोहा – कहि ‘ रहीम ’ संपति सगे , बनत बहुत बहु रीति।

बिपति – कसौटी जे कसे , सोई सांचे मीत॥

कठिन शब्द –

कहि – कहना

सगे – सगे-संबंधी

बनत – बनना

बहु – सारे , अधिक

रीति – रीति-रिवाज

बिपति – कसौटी – मुसीबत के समय

कसे – काम आना

सोई – वही

सांचे – सच्चा

मीत – मित्र

दोहे का अर्थ – रहीम जी इस दोहे में कहते हैं कि हमारे सगे – संबंधी किसी संपत्ति की तरह होते हैं , क्योंकि संपत्ति भी बहुत कठिन परिश्रम से इकट्ठी की जाती है और सगे – संबंधी भी बहुत सारे रीति – रिवाजों के बाद बनते हैं। परंतु जो व्यक्ति मुसीबत में आपकी सहायता करता है या आपके काम आता है , वही आपका सच्चा मित्र होता है।

भावार्थ – सच्चा मित्र वही है जो मुसीबत में आपका साथ न छोड़े।

 

दोहा – जाल परे जल जात बहि , तजि मीनन को मोह।

‘ रहिमन ’ मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥

कठिन शब्द –

बहि – बह जाना

तजि – त्याग करना

मीनन – मछली

मोह – प्यार ,  प्रेम

मछरी – मछली

नीर – जल , पानी

तऊ – तब भी , तथापि

छोह – प्रेम , स्नेह , कृपा , दया

दोहे का अर्थ – इस दोहे में रहीम जी ने एक तरफा प्रेम का वर्णन किया है। रहीम जी के अनुसार , जब किसी नदी में मछली को पकड़ने के लिए जाल डालकर बाहर निकाला जाता है , तो नदी का जल तो उसी समय जाल से बाहर निकल जाता है। उसे मछली से कोई प्रेम नहीं होता इसलिए वह मछली को त्याग देता है। परन्तु , मछली पानी के प्रेम को भूल नहीं पाती है और उसी के वियोग में प्राण त्याग देती है।

भावार्थ – सच्चा प्रेम वही है जो किसी भी स्थिति में आपका त्याग न करे और अंत तक आपके लिए ही जिए और आपके बिना प्राण तक त्याग दे।

 

दोहा – तरुवर फल नहिं खात है , सरवर पियहि न पान।

कहि रहीम पर काज हित , संपति सँचहि सुजान॥

कठिन शब्द –

तरुवर – वृक्ष , पेड़

खात – खाना

सरवर – नदी , तालाब

पियहि – पीना

पान – पानी

काज – कार्य , काम , प्रयोजन

हित – भलाई , उपकार , कल्याण , मंगल

सँचहि – संचित किया हुआ , इकठ्ठा किया हुआ

सुजान – सज्जन , अच्छे व्यक्ति

दोहे का अर्थ – अपने इस दोहे में रहीम जी कहते है कि जिस प्रकार वृक्ष अपने फल खुद नहीं खाते और नदी , तालाब अपना पानी कभी स्वयं नहीं पीते। ठीक उसी प्रकार , सज्जन और अच्छे व्यक्ति अपने द्वारा इकठ्ठे किए गए धन का उपयोग केवल अपने हित के लिए प्रयोग नहीं करते , वो उस धन का दूसरों के भले के लिए भी प्रयोग करते हैं।

भावार्थ – हमें अपनी धन – सम्पति का प्रयोग केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी करना चाहिए। तभी समाज का चहुमुखी विकास संभव है।

 

दोहा – थोथे बादर क्वार के , ज्यों ‘ रहीम ’ घहरात ।

धनी पुरुष निर्धन भये , करैं पाछिली बात ॥

कठिन शब्द –

थोथा – तत्वरहित , निकम्मा , बेढंगा , भद्दा

बादर – बादल

क्वार – अशिवन का महीना

ज्यों – जैसे

घहरात – गरजना

धनी – अमीर

निर्धन – गरीब

भये – हो जाना

करैं – करना

पाछिली – पिछली

दोहे का अर्थ – इस दोहे में रहीम जी कहते है कि जिस प्रकार बारिश और सर्दी के बीच के समय यानि अश्विन महीने में बादल केवल गरजते हैं , बरसते नहीं हैं। उसी प्रकार , कंगाल होने के बाद अमीर व्यक्ति अपने पिछले समय की बड़ी – बड़ी बातें करते रहते हैं , जिनका कोई मूल्य नहीं होता है।

भावार्थ – सही समय पर न किए गए काम का बाद में कोई मूल्य नहीं होता।

 

दोहा – धरती की सी रीत है , सीत घाम औ मेह ।

जैसी परे सो सहि रहै , त्‍यों रहीम यह देह॥

कठिन शब्द –

रीत – प्रथा , रिवाज , परंपरा

सीत – सहनशक्ति

घाम – सूर्य का प्रकाश , धूप , कष्ट , विपत्ति

मेह – वर्षा , बादल

सहि – सहन करना

त्‍यों – वैसे

देह – शरीर

दोहे का अर्थ – रहीम जी ने अपने इस दोहे में मनुष्य के शरीर की सहनशीलता का वर्णन किया है। वो कहते हैं कि मनुष्य के शरीर की सहनशक्ति बिल्कुल इस धरती के समान ही है। जिस तरह धरती सर्दी , गर्मी , बरसात आदि सभी मौसम झेल लेती है , ठीक उसी तरह हमारा शरीर भी जीवन के सुख – दुख रूपी हर कष्ट , विपत्ति के मौसम को सहन कर लेता है।

भावार्थ – हमें जीवन की किसी भी विपत्ति या मुसीबत से डरना नहीं चाहिए क्योंकि जिस तरह भगवान् ने प्रकृति को हर कष्ट से उभारना सिखाया है उसी प्रकार भगवान् ने जब हमें बनाया तो हमें भी सभी कष्टों को झेलने की शक्ति के साथ बनाया है अतः खुद को कभी कमजोर नहीं समझना चाहिए। 
 

 

 

Apurv Anubhav Question Answer (रहीम के दोहे प्रश्न-अभ्यास) 

प्रश्न 1 – पाठ में दिए गए दोहों की कोई पंक्ति कथन है और कोई कथन को प्रमाणित करने वाला उदाहरण। इन दोनों प्रकार की पंक्तियों को पहचान कर अलग – अलग लिखिए।

उत्तर – दोहों में वर्णित निम्न पंक्ति कथन हैं –

 

1 – कहि रहीम संपति सगे , बनते बहुत बहु रीत।

बिपति कसौटी जे कसे , तेई साँचे मीत ।।1।।

 

कठिन समय में जो मित्र हमारी सहायता करता है , वही हमारा सच्चा मित्र होता है।

 

2 – जाल परे जल जात बहि , तजि मीनन को मोह ।।

रहिमन मछरी नीर को , तऊ न छाँड़ति छोह ।। 2।।

 

मछली जल से अपार प्रेम करती है इसीलिए उससे बिछुड़ते ही अपने प्राण त्याग देती है।

 

निम्न पंक्तियों में कथन को प्रमाणित करने के उदाहरण हैं-

1 – तरुवर फल नहिं खात है , सरवर पियत न पान।

कहि रहीम परकाज हित , संपति – सचहिं सुजान ।।3।।

 

निस्वार्थ भावना से दूसरों का हित करना चाहिए , जैसे – पेड़ अपने फल नहीं खाते , सरोवर अपना जल नहीं पीते और सज्जन धन संचय अपने लिए नहीं करते।

 

2 – थोथे बाद क्वार के , ज्यों रहीम घहरात।

धनी पुरुष निर्धन भए , करें पाछिली बात ।।4।।

 

कई लोग गरीब होने पर भी दिखावे हेतु अपनी अमीरी की बातें करते रहते हैं , जैसे – आश्विन के महीने में बादल केवल गहराते हैं बरसते नहीं।

 

3 – धरती की – सी रीत है , सीत घाम औ मेह।

जैसी परे सो सहि रहे , त्यों रहीम यह देह।।5।।

 

मनुष्य को सुख – दुख समान रूप से सहने की शक्ति रखनी चाहिए , जैसे – धरती सरदी , गरमी व बरसात सभी मौसम समान रूप से सहती है।

 

प्रश्न 2 – रहीम ने क्वार के मास में गरजने वाले बादलों की तुलना ऐसे निर्धन व्यक्तियों से क्यों की है जो पहले कभी धनी थे और बीती बातों को बताकर दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं ? दोहे के आधार पर आप सावन के बरसने और गरजने वाले बादलों के विषय में क्या कहना चाहेंगे ?

उत्तर – रहीम जी ने आश्विन (क्वार) के महीने में आसमान में छाने वाले बादलों की तुलना निर्धन हो गए धनी व्यक्तियों से इसलिए की है , क्योंकि दोनों गरजकर रह जाते हैं , कुछ कर नहीं पाते। बादल बरस नहीं पाते , निर्धन व्यक्ति का धन लौटकर नहीं आता। जो अपने बीते हुए सुखी दिनों की बात करते रहते हैं , उनकी बातें बेकार और वर्तमान परिस्थितियों में अर्थहीन होती हैं। दोहे के आधार पर सावन के बरसने वाले बादल धनी तथा क्वार के गरजने वाले बादल निर्धन कहे जा सकते हैं। क्योंकि धनी व्यक्ति सावन के बरसने वाले बादलों की तरह होते हैं जो अगर अपनी धन – सम्पति का गुणगान करे भी तो उसमें कुछ अर्थ प्रतीत होता है।