Dadi Maa Class 7 Hindi Chapter 2 Explanation, Summary, and Question Answers

 

Dadi Maa Class 7 Hindi

 

NCERT Class 7 Hindi Vasant Bhag 2 Chapter 2 Dadi Maa Summary, Explanation with Video, and Question Answers

Dadi Maa – Class 7 Hindi Vasant Bhag 2 book chapter 2 detailed explanation of lesson 2 ”Dadi Maa” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with a Summary and all the exercises, Questions, and Answers given at the back of the lesson. Take Free Online MCQs Test for Class 7
इस लेख में हम हिंदी कक्षा 7 ” वसंत भाग-2 ” के पाठ – 2 ” दादी माँ ” कहानी के पाठ – प्रवेश , पाठ – सार , पाठ – व्याख्या , कठिन – शब्दों के अर्थ और NCERT की पुस्तक के अनुसार प्रश्नों के उत्तर , इन सभी के बारे में चर्चा करेंगे –
 

कक्षा – 7 पाठ 2 “दादी माँ”

 

दादी माँ  पाठ प्रवेश दादी माँ पाठ की व्याख्या
दादी माँ पाठ सार दादी माँ  प्रश्न-अभ्यास

 

लेखक परिचय –
लेखक – शिव प्रसाद सिंह

Dadi Maa Class 7 Video Explanation

 

 

 

दादी माँ  पाठ प्रवेश

हमारे बड़े बुजुर्ग हमेशा हमें किसी न किसी लिए सीख देते ही रहते हैं। जब कभी वो हमें किसी गलती पर डाँट देते हैं तो कभी हमें अच्छा नहीं लगता , कभी लगता है कि वो बेवजह डाँट रहे हैं और कभी – कभी तो हम उल्टा पलट कर भी कह सुनाते हैं। जब तक हमें एहसास होता है या हम समझ पाते हैं कि वे सही थे और हम गलत , तब तक बहुत देर हो जाती है।  काहवत भी प्रसिद्ध है कि , “किसी चीज़ का मोल तभी ज्ञात होता है जब आप उस चीज़ को खो देते हैं। ”
प्रस्तुत पाठ ‘ दादी माँ ‘ के लेखक ‘ शिव प्रसाद सिंह ‘ जी को भी अपनी दादी माँ के साथ अपनी स्मृतियों की याद तभी तरो – ताज़ा हुई , जब उन्हें अपने भाई किशन के पत्र द्वारा दादी माँ के निधन की खबर मिली। लेखक को दादी माँ के स्नेह की कमी तब महसूस हुई , जब दादी माँ से दूर लेखक बीमार पद जाया करता था क्योंकि पहले जब वह बीमार पड़ता था तब दादी माँ उसका ध्यान रखती थी , तब लेखक को हलकी बिमारी पसंद थी। लेकिन दादी माँ से दूर जब लेखक बीमार पड़ता था तब नौकर , बावर्ची और डॉक्टर लेखक का ख्याल तो रखते थे परन्तु दादी माँ की तरह नहीं।
इस पाठ के जरिए लेखक हमें यही बताना चाहता है कि जब तक आपके साथ आपके बड़े बुजुर्ग हैं तब तक उन सीखों को सही तरह से ग्रहण कर लेना चाहिए। क्योंकि जब तक बड़े बुजुर्ग आपके साथ हैं कोई भी मुसीबत आए बड़े बुजुर्ग आप तक मुसीबत को आने नहीं देते चाहे उसके लिए उन्हें अपनी साडी जमा – पूँजी ही क्यों न नष्ट करनी पड़े।
प्रस्तुत पाठ में भी लेखक ने बहुत से उदाहरण प्रस्तुत किए है जो हमें न जाने कितनी सीख दे जाते हैं।
 

 

 

पाठ सार ( दादी माँ )

प्रस्तुत पाठ ‘ दादी माँ ‘ के लेखक ‘ शिव प्रसाद सिंह ‘ जी ने इस पाठ में अपनी दादी माँ के साथ अपनी स्मृतियों को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। साथ – ही – साथ बचपन की बहुत सी यादें भी लेखक इस पाठ में साँझा कर रहे हैं। प्रस्तुत पाठ में लेखक अपने बारे में हमें बताता हुआ कहता है कि लेखक के आस – पास के लोग लेखक के व्यवहार में कुछ चीजों को लेखक की कमजोरी समझते हैं , इसी के कारण लेखक के कुछ भलाई चाहने वाले मित्र लेखक के मुँह पर तो लेखक को खुश करने के लिए आने वाली छुट्टियों की सूचना देते हैं ताकि लेखक छुट्टियों की बात सुन कर खुश हो जाए परन्तु वही पीठ भलाई चाहने वाले मित्र लेखक की पीठ पीछे लेखक को कमजोर और थोड़ी – सी विपरीत परिस्थिति से घबराने वाला कहकर लेखक का मज़ाक उड़ाते हैं। अपने कठिन समय में लेखक किसी को याद न भी करना चाहे फिर भी उसको किसी अपने की याद आ ही जाती है। लेखक अपने बीते हुए दिनों को याद करता हुआ कहता है कि उसे ऐसा लग रहा है जैसे अश्विन महीने के दिन आ गए हैं। इस महीने में गाँव की सीमावर्ती भूमि से पानी के साथ बहकर आए हुए मोथा ( जलीय भूमि में होने वाला एक क्षुप ) और साईं ( फूल ) की घासें जो पूरी तरह से नहीं सड़ी होती हैं , खेतों अथवा तालाबों में उगने वाली जंगली घास की जड़ें तथा कई तरह का बरसात में उगने वाले घासों के बीज , सूरज की गरमी में उबलते हुए पानी में सड़कर एक बहुत ही अनोखी गंध छोड़ रहे हैं। लेखक बताता है की हर मौसम की  अपनी – अपनी खूबियाँ होती हैं। लेखक अपने ह्रदय की गहराइयों तक तड़प रहा था क्योंकि उस गंध से भरे हुए झागभरे जल में दो – एक दिन ही तो कूद सका था , उस पानी में नहा – धोकर वह बीमार हो गया था। लेखक बताता है कि हलकी बीमारी न जाने क्यों लेखक को अच्छी लगती है। इस बार लेखक को बुखार हुआ तो तो चढ़ता ही गया। लेखक रजाई पर रजाई डालता गया और बुखार उतरा भी तो रात के बारह बजे के बाद। लेखक बताता है कि गंध से भरे हुए झाग भरे जल में नहाने के बाद बीमार पड़ जाने के कारण दिन में लेखक चादर को लपेट कर सोया हुआ था। उस समय लेखक की दादी माँ आईं , शायद वह भी उसी झाग वाले जल में नहाकर आई थी। दादी माँ ने आते ही लेखक के सर और पेट को छुआ। दादी ने अपने पल्ले में बाँधी गाँठ खोली और दिखाई न देने वाले किसी शक्तिधारी के ईंट या पत्थर से बनी ऊँची जगह की मिट्टी लेखक के मुँह में डाली और माथे पर भी लगाई। लेखक बताता है कि जब तक लेखक ठीक नहीं हुआ उसकी दादी माँ दिन – रात लेखक की चारपाई के पास ही बैठी रहती थी , लाखों प्रश्न पूछ – पूछकर लेखक की दादी घरवालों को परेशान कर देती थी। लेखक कहता है कि गाँव में कोई भी बीमार होता तो लेखक की दादी माँ उसके पास पहुँच जाती थी और वहाँ पर भी वही काम शुरू  कर देती थी जैसे हाथ छूना , माथा छूना , पेट छूना जैसा वह लेखक के साथ करती जब लेखक बीमार पड़ जाता था। लेखक के अनुसार सफाई करना तो सभी को उसकी दादी माँ से सीखना चाहिए। लेखक कहता है कि अगर कभी उसकी दवा देने में किसी तरह की देर हो जाती , मिश्री या शहद खत्म हो जाता , चादर या गिलाफ नहीं बदले जाते , तो वे जैसे पागल ही हो जाती। लेखक वर्तमान समय की बात करता है कि बुखार तो लेखक को अब भी आता है। अब लेखक को दादी माँ की जगह नौकर पानी दे जाता है , मेस – महाराज अपने मन से पकाकर खिचड़ी या साबू दे देते हैं। डॉक्टर साहब आकर लेखक की नाड़ी देख जाते हैं और डॉक्टर के द्वारा मलेरिया के बुखार में दिया जाने वाले उस कड़वे सत मिक्सचर की शीशी इतनी तीखी कि उसके डर से बुखार अपने आप ही भाग भी जाता है , पर लेखक को अब न जाने क्यों ऐसा बुखार अच्छा नहीं लगता। किशन भैया की शादी में दादी माँ के हौसले और ख़ुशी की कोई सीमा ही नहीं थी कहने का अर्थ है कि किशन भैया की शादी से दादी माँ बहुत खुश थी। उन दिनों दादी माँ दिनभर गायब रहती थी यानि घर के कामों में उलझी रहती थी। वैसे तो सही को पता था कि दादी माँ कोई काम नहीं करती। पर किसी भी काम में अगर वे हाज़िर न हों तो असल में वह काम देरी से होता था। एक दिन दोपहर को लेखक कही बाहर से घर लौटा। बाहर के आँगन में लेखक की दादी माँ किसी पर बिगड़ रही थी। जब लेखक ने देखा तो उसने पाया कि पास के कोने में रामी की चाची दुबक के खड़ी है। दादी माँ की डाँट से रामी की चाची रोती हुई दादी माँ सेब कहने लगी कि वह जल्दी ही पैसे दे देगी। रामी की चाची ने अपने दोनों हाथों से अपना आँचल पकड़े हुए दादी माँ के पैरों की ओर झुकी और कहने लगी कि उसकी बिटिया की शादी है। अगर लेखक की दादी ही दया नहीं करेंगी तो उनकी बेचारी बेटी का उद्धार कैसे होगा ! लेखक कहता है कि उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए लेखक ने दादी माँ और रामी की चाची के बीच होने वाली इस अच्छी न लगने वाली बात – चीत को समाप्त करने की इच्छा से अपनी  दादी माँ से कहा कि वह रामी की चाची बेचारी गरीब है , कभी न कभी दे देगी आपके पैसे। लेखक की बात सुन कर लेखक की दादी माँ ने लेखक को भी यह कहते हुए कि चल , चल ! चला है समझाने , डाँट लगा दी। लेखक कहता है कि कई दिन बीत गए थे दादी माँ और रामी की चाची के बीच हुई उस बातचीत को। लेखक भी उस प्रसंग को एकदम भूल – सा गया था। लेकिन लेखक को एक दिन रास्ते में रामी की चाची मिल गई। वह लेखक की दादी माँ को आशीर्वाद दे रही थी ! लेखक ने रामी की चाची से दादी माँ को ‘ पूतों फलो दूधों नहाओ ’ का आशीर्वाद देने का कारण पूछा कि धन्नो चाची क्या बात है ? इस पर रामी की चची ने लेखक से बिना किसी बनावटी ढंग के कहा कि बेटा आज ॠण से मुक्त हो गई हूँ , लेखक की दादी को और आशीर्वाद देते हुए कहने लगी कि भगवान मालकिन का भला करे। दादी माँ कल ही रामी की चाची के पास आई थी। उन्होंने रामी की चाची का पीछे का सारा ऋण छोड़ दिया था यानि दादी माँ ने रामी की चाची का सारा ऋण माफ़ कर दिया था , साथ में ऊपर से दस रुपये का नोट देकर रामी की चाची से बोलीं थी कि देखना धन्नो , जैसी तेरी बेटी वैसी मेरी , दस – पाँच के लिए हँसाई न हो। लेखक अपने भाई किशन के विवाह के दिनों की बात करता हुआ कहता है कि विवाह के चार – पाँच दिन पहले से ही पड़ोस की औरतें रात – रातभर गीत गाती हैं। विवाह की रात को एक नाटक भी होता है और यह नाटक अक्सर एक ही कथा का हुआ करता है। लेखक का ममेरा भाई राघव भी बरामदें में सो रहा था क्योंकि वह जब तक पहुँचा तब तक बारात जा चुकी थी , वह भी बरात में नहीं जा पाया था। लेखक कहता है कि उसके वहाँ पर सोने के कारण औरतों ने उस पर दुःख प्रकट किया। दादी माँ ने लेखक को भी पास ही की एक चारपाई पर चादर उढ़ाकर चुपके से सुला दिया था। औरतों को लेखक के बारे पता नहीं चला। लेखक कहता है कि नाटक देख – कर उसे बड़ी हँसी आ रही थी। लेखक ने सोचा कि अगर कहीं उसे जोर से हँसी आ गई तो उसका वहाँ छुपने का भेद खुल जाएगा और उसे वहाँ से बाहर निकाल दिया जाएगा , इसी कारण लेखक अपनी हँसी को रोक कर छुपा रहा परन्तु जब उसकी भाभी का दृश्य आया तो लेखक अपनी हँसी नहीं रुक सका और लेखक के छुपे होने का भेद प्रकट हो गया। लेखक अपनी दादी माँ को याद करता हुआ कहता है कि उसकी दादी माँ प्यार और ममता की मूर्ति थी , आज लेखक अपनी दादी माँ की सभी बातों को अलग ही दृष्टिकोण से देखता है। आज लेखक को अपनी दादी माँ के प्यार और ममता का अनुभव ज्यादा अच्छे से होता है। लेखक के दादा की मृत्यु के बाद से ही लेखक की दादी माँ बहुत उदास रहती थी। हानि पहुँचाने वाली सलाह देने वाले लोगों के कारण लेखक की दादी माँ की परेशानियाँ और भी ज्यादा बढ़ गई थी। दादा के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म में दादी माँ के मना करने पर भी लेखक के पिता जी ने जो अत्यधिक धन – संपत्ति खर्च की थी , वह घर की तो थी नहीं। लेखक माघ के दिनों में हुई एक घटना का वर्णन करता हुआ कहता है कि । उन दिनों बहुत अधिक ठण्ड पड़ रही थी। एक शाम को लेखक ने देखा कि उसकी दादी माँ गीली धोती पहने , कोने वाले घर में एक संदूक पर दिया जलाए , हाथ जोड़कर बैठी हुई है। लेखक ने अपनी दादी माँ की प्यार से भरी हुई आँखों में कभी आँसू नहीं देखे थे और इस समय वो रो रही थी। जब लेखक की दादी माँ ने आँखें खोलीं तो लेखक ने धीरे से अपनी दादी को बुलाया। जब लेखक ने दादी माँ को धीरे से पुकारा तो दादी माँ चौंक गई और लेखक से पूछने लगी कि लेखक वहाँ उसके बगल में बैठ कर क्या कर रहा है ? लेखक ने दादी माँ से से पूछा कि क्या वह रो रही थी ? लेखक की बात का उसकी दादी माँ ने मुस्कुरा कर बात को बदलते हुए कहा कि लेखक ने अभी तक खाना भी नहीं खाया होगा तो चल कर पहले खाना खा लें। कहने का तात्पर्य यह है कि दादी माँ किसी को भी अपने दुखी होने की बात का एहसास नहीं होने देती थी। लेखक कहता है कि अगली सुबह उसने देखा कि उसके पिता जी और किशन भैया चारपाई पर बैठे परेशानी में कुछ सोच रहे हैं। लेखक ने सुना कि उसके पिता जी लगभग रोने की सी आवाज में बोल रहे थे कि उनके पास अब कोई दूसरा चारा ही नहीं है , रूपया कोई देता नहीं और कितने लोगों के तो अभी पिछला उधार भी देना बाकी है ! लेखक की दादी ने उनका एक संदूक खोला और उसके अंदर से एक चमकती – सी चीज निकाली। उन्होंने लेखक के पिता जी से कहा कि वह चमकता कंगन उन्हें दादा जी ने इसी दिन के लिए पहनाया था। लेखक अपनी दादी माँ की प्रशंसा करते हुए कहता है कि लेखक को उसकी दादी माँ सचमुच में एक ऐसी महीला लगी जिसमें कोई दोष न हो। लेखक अपनी दादी माँ के बारे में जो कुछ सोच रहा था वह धुँधली छाया की तरह लुप्त हो गई। लेखक ने देखा , दिन काफी चढ़ आया था। लेखक के हाथ में अब भी उसके किशन भैया का पत्र था , जो काँप रहा है। लेखक अपने मन से बार – बार यही पूछ रहा था कि क्या सचमुच दादी माँ नहीं रहीं ? कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक की दादी माँ का देहांत हो गया था जिसकी खबर करने के लिए किशन भैया ने पत्र लिखा था। परन्तु लेखक को इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था।
 

 

 

पाठ व्याख्या (दादी माँ )

कमजोरी ही है अपनी , पर सच तो यह है कि ज़रा – सी कठिनाई पड़ते ; बीसों गरमी , बरसात और वसंत देखने के बाद भी , मेरा मन सदा नहीं तो प्रायः अनमना – सा हो जाता है। मेरे शुभचिंतक मित्र मुँह पर मुझे प्रसन्न करने के लिए आने वाली छुट्टियों की सूचना देते हैं और पीठ पीछे मुझे कमजोर और ज़रा – सी प्रतिकूलता से घबराने वाला कहकर मेरा मज़ाक उड़ाते हैं। मैं सोचता हूँ , ‘ अच्छा , अब कभी उन बातों को न सोचूँगा। ठीक है , जाने दो , सोचने से होता ही क्या है ’। पर , बरबस मेरी आँखों के सामने शरद की शीत किरणों के समान स्वच्छ , शीतल किसी की धुँधली छाया नाच उठती है।
कठिन शब्द
ज़रा – सी – थोड़ी सी
सदा – हमेशा
अनमना – सा – उदासीन , बेमन का ,बेपरवाह , सुस्त
शुभचिंतक – भलाई चाहने वाला , हितैषी
प्रसन्न – खुश
प्रतिकूलता – प्रतिकूल होने की अवस्था , विपरीतता , विरोध
बरबस – ज़बरदस्ती , बलपूर्वक , निरर्थक , व्यर्थ
शरद – शरद ऋतु , पतझड़
शीत – ठण्ड
स्वच्छ  – साफ
शीतल – ठंडा
धुँधला – अपूर्ण अँधेरा , अस्पष्ट
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपनी कमजोरी के बारे में बताता हुआ कह रहा है कि चाहे कोई आपका कितना ही अच्छा मित्र क्यों न हो आपके बुरे समय में सभी आपका मज़ाक बनाते हैं इस गद्यांश में हमें पता चलता है कि अपने कठिन समय में लेखक किसी को याद करता है।
व्याख्या – लेखक अपने बारे में हमें बताता हुआ कहता है कि लेखक के आस – पास के लोग लेखक के व्यवहार में कुछ चीजों को लेखक की कमजोरी समझते हैं , परन्तु लेखक के अनुसार सच तो यह है कि अपने जीवन में थोड़ी – सी कठिनाई पड़ते ही लेखक को अब तक उसके जीवन की बीती बीसों गरमी , बरसात और वसंत देखने के बाद भी उन कठिनाइयों के पल में लेखक का मन हमेशा तो नहीं किन्तु कभी – कभी उदासीन या सुस्त – सा हो जाता है। इसी के कारण लेखक के कुछ भलाई चाहने वाले मित्र लेखक के मुँह पर तो लेखक को खुश करने के लिए आने वाली छुट्टियों की सूचना देते हैं ताकि लेखक छुट्टियों की बात सुन कर खुश हो जाए परन्तु वही पीठ भलाई चाहने वाले मित्र लेखक की पीठ पीछे लेखक को कमजोर और थोड़ी – सी विपरीत परिस्थिति से घबराने वाला कहकर लेखक का मज़ाक उड़ाते हैं। इन सभी के बाद लेखक हमेशा सोचता है कि अच्छा यही होगा कि अब वह ऐसी बातों बारे में न सोचे जो लेखक को परेशान करे और कमजोर दिखाए। वैसे भी सोचने से होता ही क्या है। कहने का तात्पर्य यह है कि बेमतलब के सोचते रहने से केवल मन ही दुखी होता है। लेकिन सच तो यह है कि चाहे वह कितनी ही कोशिश कर ले पर बिना किसी मतलब के ही लेखक की आँखों के सामने पतझड़ की ठंडी किरणों के समान साफ और ठंडी किसी की अस्पष्ट छाया नाच उठती है। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने कठिन समय में लेखक किसी को याद न भी करना चाहे फिर भी उसको किसी अपने की याद आ ही जाती है।

मुझे लगता है जैसे क्वार के दिन आ गए हैं। मेरे गाँव के चारों ओर पानी ही पानी हिलोरें ले रहा है। दूर के सिवान से बहकर आए हुए मोथा और साईं की अधगली घासें , घेऊर और बनप्याज की जड़ें तथा नाना प्रकार की बरसाती घासों के बीज, सूरज की गरमी में खौलते हुए पानी में सड़कर एक विचित्र गंध छोड़ रहे हैं। रास्तों में कीचड़ सूख गया है और गाँव के लड़के किनारों पर झागभरे जलाशयों में धमाके से कूद रहे हैं। अपने – अपने मौसम की अपनी – अपनी बातें होती हैं। आषाढ़ में आम और जामुन न मिलें , चिंता  नहीं , अगहन में चिउड़ा और गुड़ न मिले , दुख नहीं , चैत के दिनों में लाई के साथ गुड़ की पट्टी न मिले , अफ़सोस नहीं , पर क्वार के दिनों में इस गंधपूर्ण झागभरे जल में कूदना न हो तो बड़ा बुरा मालूम होता है। मैं भीतर हुड़क रहा था। दो-एक दिन ही तो कूद सका था , नहा – धोकर बीमार हो गया। हलकी बीमारी न जाने क्यों मुझे अच्छी लगती है। थोड़ा – थोड़ा ज्वर हो , सर में साधारण दर्द और खाने के लिए दिनभर नींबू और साबू। लेकिन इस बार ऐसी चीज़ नहीं थी। ज्वर जो चढ़ा तो चढ़ता ही गया। रजाई पर रजाई और उतरा रात बारह बजे के बाद।
कठिन शब्द
क्वार – अश्विन का महीना
हिलोरें – जल में उठने वाली तरंग या लहर , मौजें
सिवान – गाँव की सीमावर्ती भूमि , सीमा पर स्थित प्रदेश
मोथा – जलीय भूमि में होने वाला एक क्षुप , औषध के काम में आनेवाली उक्त क्षुप की जड़
साईं – फूल , हर जगह , ईश्वर , भगवान शिव , साईं बाबा , स्वामी
अधगली – जो पूरी तरह से सड़ा हुआ न हो
घेऊर और बनप्याज – खेतों अथवा तालाबों में उगने वाली जंगली घास
नाना प्रकार की – अनेक प्रकार की , विभिन्न तरह की
बरसाती घास – बरसात में उगने वाला घास
खौलते हुए – उबलते हुए
विचित्र – अजीब , अनोखा
जलाशय – जल भरा हुआ गहरा स्थल, झील, तालाब।
अगहन – अग्रहायण या मार्गशीर्ष मास
चिउड़ा – एक प्रकार का चर्वण जो हरे, भिगोए या उबाले हुए धान को कूटने से बनता हैं ,चूरा
लाई – धान या बाजरे आदि को भूनकर बनाया गया खाद्य पदार्थ
अफ़सोस – दुःख , खेद
हुड़क – तड़पने की क्रिया या भाव , प्रिय चीज़ न मिलने पर की जाने वाली बच्चे की ज़िद
ज्वर – बुखार
नोट – इस गद्यांश में लेखक अशिवन के महीने में गंधपूर्ण झागभरे जल में नहाने और उसके परिणाम का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक अपने बीते हुए दिनों को याद करता हुआ कहता है कि उसे ऐसा लग रहा है जैसे अश्विन महीने के दिन आ गए हैं। इस महीने में लेखक के गाँव के चारों ओर केवल पानी ही पानी हो जाता है जिसमें लहरें उठती रहती हैं। लेखक बताता है कि गाँव की सीमावर्ती भूमि से पानी के साथ बहकर आए हुए मोथा ( जलीय भूमि में होने वाला एक क्षुप ) और साईं ( फूल ) की घासें जो पूरी तरह से नहीं सड़ी होती हैं , खेतों अथवा तालाबों में उगने वाली जंगली घास की जड़ें तथा कई तरह का बरसात में उगने वाले घासों के बीज , सूरज की गरमी में उबलते हुए पानी में सड़कर एक बहुत ही अनोखी गंध छोड़ रहे हैं। बरसात के कारण रास्तों में आया हुआ कीचड़ वहीं सूख गया है और गाँव के लड़के किनारों पर झागभरे तालाबों में धमाके से कूद रहे हैं। लेखक बताता है की हर मौसम की  अपनी – अपनी खूबियाँ होती हैं। लेखक कहता है कि अगर आषाढ़ महीने में आम और जामुन खाने को न मिलें तो उन्हें किसी तरह की कोई चिंता नहीं होती , मार्गशीर्ष मास में उबाले हुए धान को कूटने से बना चूरा और गुड़ न मिले तो भी कोई दुख नहीं , चैत के दिनों में धान या बाजरे आदि को भूनकर बनाए गए  खाद्य पदार्थ के साथ गुड़ की पट्टी न मिले तो भी कोई दुःख नहीं , पर यदि अशिवन के महीने के दिनों में इस गंध से भरे हुए झागभरे जल में कूदना न मिले तो लेखक को बहुत बुरा लगता है। लेखक अपने ह्रदय की गहराइयों तक तड़प रहा था क्योंकि उस गंध से भरे हुए झागभरे जल में दो – एक दिन ही तो कूद सका था , उस पानी में नहा – धोकर वह बीमार हो गया था। लेखक बताता है कि हलकी बीमारी न जाने क्यों लेखक को अच्छी लगती है। जिसमे अगर थोड़ा – थोड़ा बुखार हो , सर में साधारण दर्द हो और खाने के लिए दिनभर नींबू और साबू मिलते रहे तो यह लेखक को पसंद है। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं था। इस बार लेखक को बुखार हुआ तो तो चढ़ता ही गया। लेखक रजाई पर रजाई डालता गया और बुखार उतरा भी तो रात के बारह बजे के बाद।

दिन में मैं चादर लपेटे सोया था। दादी माँ आईं, शायद नहाकर आई थीं, उसी झागवाले जल में। पतले-दुबले स्नेह – सने शरीर पर सफेद किनारीहीन धोती, सन – से सफेद बालों के सिरों पर सध्यः टपके हुए जल की शीतलता। आते ही उन्होंने सर , पेट छुए। आँचल की गाँठ खोल किसी अदृश्य शक्तिधारी के चबूतरे की मिट्टी मुँह में डाली , माथे पर लगाई। दिन – रात चारपाई के पास बैठी रहतीं , कभी पंखा झलतीं , कभी जलते हुए हाथ – पैर कपड़े से सहलातीं , सर पर दालचीनी का लेप करतीं और बीसों बार छू – छूकर ज्वर का अनुमान करतीं। हाँडी में पानी आया कि नहीं ? उसे पीपल की छाल से छौंका कि नहीं ? खिचड़ी में मूँग की दाल एकदम मिल तो गई है ? कोई बीमार के घर में सीधे बाहर से आकर तो नहीं चला गया , आदि लाखों प्रश्न पूछ – पूछकर घरवालों को परेशान कर देतीं।
कठिन शब्द
स्नेह – प्यार
सने – लिपटे हुए
किनारीहीन – रुपहला – सुनहला गोटा जो कपड़ों के किनारे पर लगाया जाता है उससे रहित
सन – एक प्रसिद्ध पौधा जिसके रेशे से बोरे आदि बनते हैं
आँचल – पल्ला (धोती, ओढ़नी आदि वस्त्र का एक सिरा)
अदृश्य – जो दिखाई न दे
चबूतरा – ईंट या पत्थर से बनी ऊँची जगह
नोट – इस गद्यांश में लेखक ने बताया है कि किस तरह उसके बीमार पड़ जाने पर उसकी दादी माँ किस तरह उसका ध्यान रखती थी और किस तरह लाखों प्रश्न पूछ – पूछ कर घरवालों को परेशान कर देती थी।

व्याख्या – लेखक बताता है कि गंध से भरे हुए झाग भरे जल में नहाने के बाद बीमार पड़ जाने के कारण दिन में लेखक चादर को लपेट कर सोया हुआ था। उस समय लेखक की दादी माँ आईं , शायद वह भी उसी झाग वाले जल में नहाकर आई थी। लेखक अपनी दादी माँ का वर्णन करता हुआ कहता है कि उसकी दादी माँ पतले – दुबले शरीर वाली थी। लेखक के अनुसार उसकी दादी के शरीर के हर अंग से प्यार झलकता था। कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक

की दादी माँ सभी से प्यार करने वाली थी। लेखक कहता है कि जब उसकी दादी माँ उस झाग वाले जल में नहा कर आई थी तब उन्होंने शरीर पर ऐसी सफेद धोती पहन राखी थी जिसके किनारे पर कोई भी सजावटी गोटा नहीं लगाया गया था।  दादी माँ के सफेद बाल जो सन के पौधे के रेशों की तरह थे , उन बालों के सिरों पर से जल की ठंडी बूंदें टपक रही थी। लेखक बताता है कि जैसे ही उसकी दादी माँ आई उन्होंने आते ही लेखक के सर और पेट को छुआ। दादी ने अपने पल्ले में बाँधी गाँठ खोली और दिखाई न देने वाले किसी शक्तिधारी के ईंट या पत्थर से बनी ऊँची जगह की मिट्टी लेखक के मुँह में डाली और माथे पर भी लगाई। लेखक बताता है कि जब तक लेखक ठीक नहीं हुआ उसकी दादी माँ दिन – रात लेखक की चारपाई के पास ही बैठी रहती थी , कभी लेखक के लिए पंखा झुलाती थी , कभी लेखक के जलते हुए हाथ – पैर ठन्डे कपड़े से सहलाती रहती , कभी लेखक के सर पर दालचीनी का लेप करती और बीसो बार अर्थात कई बार छू – छूकर बुखार का अनुमान करती। लेखक बताता है कि उसकी दादी में सभी घर वालों से पूछती रहती कि हाँडी में पानी आया कि नहीं ? उसे पीपल की छाल से छौंका कि नहीं ? खिचड़ी में मूँग की दाल एकदम मिल तो गई है ? कोई बीमार के घर में सीधे बाहर से आकर तो नहीं चला गया , इस तरह के लाखों प्रश्न पूछ – पूछकर लेखक की दादी घरवालों को परेशान कर देती थी। कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक के बीमार पड़ जाने के कारण लेखक की दादी माँ बहुत चिंतित हो जाया करती थी।

दादी माँ को गँवई – गाँव की पचासों किस्म की दवाओं के  नाम याद थे। गाँव में कोई बीमार होता , उसके पास पहुँचती और वहाँ भी वही काम। हाथ छूना , माथा छूना , पेट छूना। फिर भूत से लेकर मलेरिया , सरसाम , निमोनिया तक का अनुमान विश्वास के साथ सुनातीं। महामारी और विशूचिका के दिनों में रोज सवेरे उठकर स्नान के बाद लवंग और गुड़ – मिश्रित जलधार , गुग्गल और धूप। सफाई कोई उनसे सीख ले। दवा में देर होती , मिश्री या शहद खत्म हो जाता , चादर या गिलाफ नहीं बदले जाते , तो वे जैसे पागल हो जातीं। बुखार तो मुझे अब भी आता है। नौकर पानी दे जाता है , मेस – महाराज अपने मन से पकाकर खिचड़ी या साबू। डॉक्टर साहब आकर नाड़ी देख जाते हैं और कुनैन मिक्सचर की शीशी की तिताई के डर से बुखार भाग भी जाता है , पर न जाने क्यों ऐसे बुखार को बुलाने का जी नहीं होता !
कठिन शब्द
गँवई – गाँव का , गाँव में रहने वाला , गँवार
सरसाम – बुखार की एक अवस्था जिसमें कफ, पित्त और वात एक साथ कुपित होकर बहुत उग्र रूप धारण कर लेते हैं , या त्रिदोष नामक रोग
अनुमान – अंदाज़ा , अटकल
महामारी – मरक , मरी ( जैसे – हैजा , चेचक महामारी का रूप है )
विशूचिका – विषूचिका , हैजा
लवंग – लौंग नामक वृक्ष और उसकी कलियाँ
मिश्रित – मिलाया हुआ
गुग्गल – सलई का पेड़ जिसमें धूप या राल निकलती है
कुनैन – मलेरिया ज्वर में दिया जाने वाला एक कड़वा सत
तिताई – तीखा होने की अवस्था या भाव
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपनी दादी माँ की प्रशंसा कर रहा है और भले ही लेखक को हल्का बुखार अच्छा लगता है परन्तु दादी माँ के न होने के कारण अब लेखक को वह हल्का बुखार भी अच्छा नहीं लगता चाहे उसकी सेवा करने वाले सभी हों।
व्याख्या – अपनी दादी माँ के बारे में लेखक हमें बताता हुआ कहता है कि उसकी दादी माँ को गाँव में जितनी दवाएँ ( जड़ी – बूटियाँ ) थी , प्रत्येक किस्म की दवाओं के  नाम याद थे। लेखक कहता है कि गाँव में कोई भी बीमार होता तो लेखक की दादी माँ उसके पास पहुँच जाती थी और वहाँ पर भी वही काम शुरू  कर देती थी जैसे हाथ छूना , माथा छूना , पेट छूना जैसा वह लेखक के साथ करती जब लेखक बीमार पड़ जाता था। जब लेखक की दादी माँ किसी बीमार की  जाँच करती थी तो जाँच के बाद भूत से लेकर मलेरिया , त्रिदोष नामक रोग , निमोनिया तक का अंदाज़ा पुरे विश्वास के साथ करती थी। लेखक अपनी दादी माँ की प्रशंसा करते हुए कहता है कि  हैजा , चेचक जैसी महामारी के दिनों में वह रोज सवेरे उठ कर स्नान करने के बाद लौंग की कलियों और गुड़ को मिला का बनाया गया पानी पीती थी और फिर धुप – बती करती थी। लेखक के अनुसार सफाई करना तो सभी को उसकी दादी माँ से सीखना चाहिए। लेखक कहता है कि अगर कभी उसकी दवा देने में किसी तरह की देर हो जाती , मिश्री या शहद खत्म हो जाता , चादर या गिलाफ नहीं बदले जाते , तो वे जैसे पागल ही हो जाती।  कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक की दादी माँ लेखक का बहुत ध्यान रखती थी। लेखक वर्तमान समय की बात करता है कि बुखार तो लेखक को अब भी आता है। अब लेखक को दादी माँ की जगह नौकर पानी दे जाता है , मेस – महाराज अपने मन से पकाकर खिचड़ी या साबू दे देते हैं। डॉक्टर साहब आकर लेखक की नाड़ी देख जाते हैं और डॉक्टर के द्वारा मलेरिया के बुखार में दिया जाने वाले उस कड़वे सत मिक्सचर की शीशी इतनी तीखी कि उसके डर से बुखार अपने आप हीउ भाग भी जाता है , पर लेखक को अब न जाने क्यों ऐसा बुखार अच्छा नहीं लगता।

किशन भैया की शादी ठीक हुई , दादी माँ के उत्साह और आनंद का क्या कहना ! दिनभर गायब रहतीं। सारा घर जैसे उन्होंने सर पर उठा लिया हो। पड़ोसिनें आतीं। बहुत बुलाने पर दादी माँ आतीं , ” बहिन बुरा न मानना। कार – परोजन का घर ठहरा। एक काम अपने हाथ से न करूँ , तो होने वाला नहीं। ” जानने को यों सभी जानते थे कि दादी माँ कुछ करतीं नहीं। पर किसी काम में उनकी अनुपस्थिति वस्तुतः विलंब का कारण बन जाती। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन दोपहर को मैं घर लौटा। बाहरी निकसार में दादी माँ किसी पर बिगड़ रही थीं। देखा , पास के कोने में दुबकी रामी की चाची खड़ी है। ” सो न होगा , धन्नो ! रुपये मय सूद के आज दे दे। तेरी आँख में तो शरम है नहीं। माँगने के समय कैसी आई थी ! पैरों पर नाक रगड़ती फिरी , किसी ने एक पाई भी न दी। अब लगी है आजकल करने – फसल में दूँगी , फसल में दूँगी… अब क्या तेरी खातिर दूसरी फसल कटेगी ? “
कठिन शब्द
उत्साह – उमंग , हौसला
कार – परोजन – कार्य  -प्रयोजन , काम -काज
अनुपस्थिति = अविद्यमानता या ग़ैरहाज़िरी
वस्तुतः – यथार्थ , असल में
विलंब – देर
बाहरी निकसार – बाहर के आँगन की जगह
किसी पर बिगड़ना – किसी पर गुस्सा करना
सूद – ऋण के रूप में दिए गए धन पर मिलने वाला लाभ का अंश , ब्याज , (इंटरेस्ट)
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपनी दादी माँ के स्वभाव का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक इस गद्यांश में कहता है कि उसके किशन भैया की शादी अच्छे से हो गई , किशन भैया की शादी में दादी माँ के हौसले और ख़ुशी की कोई सीमा ही नहीं थी कहने का अर्थ है कि किशन भैया की शादी से दादी माँ बहुत खुश थी। उन दिनों दादी माँ दिनभर गायब रहती थी यानि घर के कामों में उलझी रहती थी। ऐसा लगता था जैसे सारे घर के काम का जिम्मा उन्होंने अपने सर पर उठा लिया है। लेखक कहता है कि पड़ोसिनें दादी माँ से मिलने के लिए आती थी। बहुत बुलाने पर ही दादी माँ आती थी और उन पड़ोसिनों से कहती थी कि वे सब बुरा न माने क्योंकि घर में काम – काज बहुत है , शादी – व्याह का घर जो ठहरा। दादी माँ  पड़ोसिनों के सामने अपने आप को बहुत व्यस्त बताते हुए कहती थी कि अगर वे कोई एक काम अपने हाथ से न करे , तो वह काम समझो होने वाला नहीं है। लेखक कहता है कि वैसे तो सही को पता था कि दादी माँ कोई काम नहीं करती। पर किसी भी काम में अगर वे हाज़िर न हों तो असल में वह काम देरी से होता था। कहने का तात्पर्य यह है कि दादी माँ भले ही कोई काम न करती हो परन्तु वो दूसरों से काम बड़ी जल्दी करवाती थी जिससे काम जल्दी हो जाता था। लेखक उन्हीं दिनों की बात बताता है जब उसके भाई की शादी का माहौल था। एक दिन दोपहर को लेखक कही बाहर से घर लौटा। बाहर के आँगन में लेखक की दादी माँ किसी पर बिगड़ रही थी अर्थात किसी पर गुस्सा कर रही थी। जब लेखक ने देखा तो उसने पाया कि पास के कोने में रामी की चाची दुबक के खड़ी है। उनसे लेखक की दादी माँ कह रही थी कि  ऐसा नहीं होगा , धन्नो ! जो रुपये तुझे दिय है उन्हें ब्याज के साथ आज ही दे दे। उसकी आँख में तो शरम है नहीं। जब माँगने के समय था तब तो जल्दी – जल्दी आई थी ! सबके पैरों पर नाक रगड़ती फिर रही थी , किसी ने उसको एक पैसा भी न दिया था। तब दादी माँ ने उसे पैसे दिए थे। अब जब लौटाने का समय  आ गया था तब रामी की चाची कहने लगी कि जब फसल में दूँगी , फसल में दूँगी… यानि जब फसल कटेगी और बिकेगी तब लौटाने की बात कर रही है लेकिन इस बार की फसल तो काट ली गई है और दादी माँ तभी गुस्से  से कह रही थी कि अब क्या रामी की चाची की खातिर दूसरी फसल कटेगी ? यानि इस बार की फसल से रामी की चाची दादी माँ के पैसे नहीं लौटा पाई थी।

” दूँगी , मालकिन ! ” रामी की चाची रोती हुई , दोनों हाथों से आँचल पकड़े दादी माँ के पैरों की ओर झुकी , ” बिटिया की शादी है। आप न दया करेंगी तो उस बेचारी का निस्तार कैसे होगा ! “
” हट, हट ! अभी नहाके आ रही हूँ ! ” दादी माँ पीछे हट गईं।
” जाने दो दादी , ” मैंने इस अप्रिय प्रसंग को हटाने की गरज से कहा , ” बेचारी गरीब है , दे देगी कभी। “
” चल , चल ! चला है समझाने…”
कठिन शब्द
निस्तार – तैरकर पार होना , छुटकारा , उद्धार
अप्रिय  – जो प्यारा न हो , अरुचिकर
गरज – स्वार्थजन्य इच्छा , आवश्यकता, ज़रूरत
नोट – इस गद्यांश में लेखक ने अपनी दादी माँ और रामी की चाची के बीच में हुई वार्तालाप का वर्णन किया है।
व्याख्या – लेखक कहता है कि दादी माँ की डाँट से रामी की चाची रोती हुई दादी माँ सेब कहने लगी कि वह जल्दी ही पैसे दे देगी। रामी की चाची ने अपने दोनों हाथों से अपना आँचल पकड़े हुए दादी माँ के पैरों की ओर झुकी और कहने लगी कि उसकी बिटिया की शादी है। अगर लेखक की दादी ही दया नहीं करेंगी तो उनकी बेचारी बेटी काउद्धार कैसे होगा ! लेखक कहता है कि जैसे ही रामी की चाची दादी माँ के पैरों की ओर झुकी दादी माँ पीछे हट गई और रामी की चाची को पीछे हटने को कहने लगी क्योंकि वह थोड़ी देर पहले ही नहा कर आई थी और लेखक ने पहले ही कहा था कि लेखक की दादी माँ को साफ – सफाई पसंद है। लेखक कहता है कि उसे यह सब अच्छा नहीं लग रहा था इसलिए लेखक ने दादी माँ और रामी की चाची के बीच होने वाली इस अच्छी न लगने वाली बात – चीत को समाप्त करने की इच्छा से अपनी  दादी माँ से कहा कि वह रामी की चाची बेचारी गरीब है , कभी न कभी दे देगी आपके पैसे। लेखक की बात सुन कर लेखक की दादी माँ ने लेखक को भी यह कहते हुए कि चल , चल ! चला है समझाने , डाँट लगा दी।

मैं चुपके से आँगन की ओर चला गया। कई दिन बीत गए , मैं इस प्रसंग को एकदम भूल – सा गया। एक दिन रास्ते में रामी की चाची मिली। वह दादी को ‘ पूतों फलो दूधों नहाओ ’ का आशीर्वाद दे रही थी ! मैंने पूछा , ” क्या बात है , धन्नो चाची ” , तो उसने विह्नल होकर कहा , ” उरिन हो गई बेटा , भगवान भला करे हमारी मालकिन का। कल ही आई थीं। पीछे का सभी रुपया छोड़ दिया , ऊपर से दस रुपये का नोट देकर बोलीं , ‘ देखना धन्नो , जैसी तेरी बेटी वैसी मेरी , दस – पाँच के लिए हँसाई न हो। ’ देवता है बेटा , देवता। “
” उस रोज तो बहुत डाँट रही थीं ? ” मैंने पूछा।
” वह तो बड़े लोगों का काम है बाबू , रुपया देकर डाँटें भी न तो लाभ क्या ! “
मैं मन-ही-मन इस तर्क पर हँसता हुआ आगे बढ़ गया।
कठिन शब्द
विह्नल – व्यस्त , जिसके कोई विशेष लक्षण या चिह्न न हों
उरिन – ब्याज , कर्ज़ , कर देना , ॠण से मुक्त होना
रोज – दिन
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपनी दादी माँ के असली चरित्र का वर्णन कर रहा है।

व्याख्या – लेखक अपनी दादी माँ से डाँट खा कर चुपके से आँगन की ओर चला गया। लेखक कहता है कि कई दिन बीत गए थे दादी माँ और रामी की चाची के बीच हुई उस बातचीत को। लेखक भी उस प्रसंग को एकदम भूल – सा गया था। लेकिन लेखक को एक दिन रास्ते में रामी की चाची मिल गई। वह लेखक की दादी माँ को ‘ पूतों फलो दूधों नहाओ ’ का आशीर्वाद दे रही थी ! लेखक ने रामी की चाची से दादी माँ को ‘ पूतों फलो दूधों नहाओ ’ का आशीर्वाद देने का कारण पूछा कि धन्नो चाची क्या बात है ? इस पर रामी की चची ने लेखक से बिना किसी बनावटी ढंग के कहा कि बेटा आज ॠण से मुक्त हो गई हूँ , लेखक की दादी को और आशीर्वाद देते हुए कहने लगी कि भगवान मालकिन का भला करे। दादी माँ कल ही रामी की चाची के पास आई थी। उन्होंने रामी की चाची का पीछे का सारा ऋण छोड़ दिया था यानि दादी माँ ने रामी की चाची का सारा ऋण माफ़ कर दिया था , साथ में ऊपर से दस रुपये का

नोट देकर रामी की चाची से बोलीं थी कि देखना धन्नो , जैसी तेरी बेटी वैसी मेरी , दस – पाँच के लिए हँसाई न हो। अर्थात थोड़े से रुपयों के लिए बेज़्ज़ती नहीं होनी चाहिए। रामी की चाची लेखक की दादी माँ को देवता की जगह पर रख रही थी। ये सब सुनने के बाद लेखक ने रामी की चाची से पूछा कि उस दिन तो वे बहुत डाँट रही थीं। लेखक की बात सुन कर रामी की चाची ने एक तर्क दिया कि रूपया देकर डाँटना तो बड़े लोगों का काम है , अगर वे ऐसा भी न करे तो क्या लाभ ! लेखक को यह तर्क बहुत मजाकिया लगा और लेखक मन – ही – मन इस तर्क पर हँसता हुआ आगे बढ़ गया।

किशन के विवाह के दिनों की बात है। विवाह के चार – पाँच रोज पहले से ही औरतें रात – रातभर गीत गाती हैं। विवाह की रात को अभिनय भी होता है। यह प्रायः एक ही कथा का हुआ करता है , उसमें विवाह से लेकर पुत्रोत्पत्ति तक के सभी दृश्य दिखाए जाते हैं – सभी पार्ट औरतें ही करती हैं। मैं बीमार होने के कारण बारात में न जा सका। मेरा ममेरा भाई राघव दालान में सो रहा था ( वह भी बारात जाने के बाद पहुँचा था। ) औरतों ने उस पर आपत्ति की।
कठिन शब्द
अभिनय – आंगिक चेष्टाओं का कलात्मक प्रदर्शन , अनुकरण , नाटक
प्रायः – अक्सर , करीब – करीब , लगभग
पुत्रोत्पत्ति – पुत्र की उत्पत्ति , पुत्र की प्राप्ति
दालान – बरामदा
आपत्ति – संकट , कष्ट , क्लेश , दुःख व अचानक आ गिरने वाली विपत्ति , आफ़त , मुसीबत
नोट – इस गद्यांश में लेखक विवाह से पहले के उत्सवों का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक अपने भाई किशन के विवाह के दिनों की बात करता हुआ कहता है कि विवाह के चार – पाँच दिन पहले से ही पड़ोस की औरतें रात – रातभर गीत गाती हैं। विवाह की रात को एक नाटक भी होता है और यह नाटक अक्सर एक ही कथा का हुआ करता है , जिस में विवाह से लेकर पुत्र की प्राप्ति तक के सभी दृश्य दिखाए जाते हैं। लेखक कहता है कि उस नाटक के सभी भाग औरतें ही करती हैं। कहने का अर्थ है कि उस नाटक में चाहे पुरुष का या लड़के का भाग हो उस भाग को भी महिलाएँ ही करती हैं। लेखक कहता है कि वह बीमार था जिस के कारण वह बारात में नहीं जा सका था। लेखक का ममेरा भाई राघव भी बरामदें में सो रहा था क्योंकि वह जब तक पहुँचा तब तक बारात जा चुकी थी , वह भी बरात में नहीं जा पाया था। लेखक कहता है कि उसके वहाँ पर सोने के कारण औरतों ने उस पर दुःख प्रकट किया। क्योंकि वे वहाँ नाटक करने वालीं थीं और नाटक में कोई पुरुष नहीं था और न ही पुरुषों को उस नाटक को देखने की अनुमति थी इसी कारण लेखक के ममेरे भाई का वहाँ होना औरतों को पसंद नहीं आ रहा था।

दादी माँ बिगड़ीं , ” लड़के से क्या परदा ? लड़के और ब्रह्मा का मन एक – सा होता है। “
मुझे भी पास ही एक चारपाई पर चादर उढ़ाकर दादी माँ ने चुपके से सुला दिया था। बड़ी हँसी आ रही थी। सोचा , कहीं जोर से हँस दूँ , भेद खुल जाए तो निकाल बाहर किया जाऊँगा , पर भाभी की बात पर हँसी रुक न सकी और भंडाफोड़ हो गया।
देबू की माँ ने चादर खींच ली ,  ” कहो दादी , यह कौन बच्चा सोया है। बेचारा रोता है शायद , दूध तो पिला दूँ। ” हाथापाई शुरू हुई। दादी माँ बिगड़ीं , ” लड़के से क्यों लगती है ! “
सुबह रास्ते में देबू की माँ मिलीं , ” कल वाला बच्चा , भाभी ! ” मैं वहाँ से जोर से भागा और दादी माँ के पास जा खड़ा हुआ। वस्तुतः किसी प्रकार का अपराध हो जाने पर जब हम दादी माँ की छाया में खड़े हो जाते , अभयदान मिल जाता।
कठिन शब्द
भंडाफोड़ – गोपनीय बात का प्रकट हो जाना , भेद प्रकट हो जाना , रहस्य प्रकट हो जाना
हाथापाई – हाथ और पाँव की सहायता से होने वाली मारपीट, झगड़ा या उठा – पटक
वस्तुतः – यथार्थतः , असल में
अभयदान – भय से रक्षा का वचन देना , शरण देना
नोट – इस गद्यांश में लेखक नाटक के दौरान पकड़े जाने और मुसीबत में दादी माँ की मदद लेने का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक कहता है कि जब औरतों ने लेखक के ममेरे भाई की वजह से गुस्सा किया तो लेखक की दादी माँ ने भी उन सब पर गुस्सा किया और बोली कि लड़के से क्या परदा ? अर्थात लड़के से क्या छुपाना ? लड़के और ब्रह्मा का मन एक – समान होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का निर्माण माना जाता है तो उनसे कुछ भी छुपाया नहीं जा सकता , उन्हें सब पता होता है। दादी माँ लड़कों को भी ब्रह्मा के समान बता कर औरतों को शांत करना चाह रही थी। ताकि औरतें इस बात को ज्यादा बढ़ावा न दें। दादी माँ ने लेखक को भी पास ही की एक चारपाई पर चादर उढ़ाकर चुपके से सुला दिया था। औरतों को लेखक के बारे पता नहीं चला। लेखक कहता है कि नाटक देख – कर उसे बड़ी हँसी आ रही थी। लेखक ने सोचा कि अगर कहीं उसे जोर से हँसी आ गई तो उसका वहाँ छुपने का भेद खुल जाएगा और उसे वहाँ से बाहर निकाल दिया जाएगा , इसी कारण लेखक अपनी हँसी को रोक कर छुपा रहा परन्तु जब उसकी भाभी का दृश्य आया तो लेखक अपनी हँसी नहीं रुक सका और लेखक के छुपे होने का भेद प्रकट हो गया। देबू की माँ ने लेखक की चादर खींच ली और  दादी माँ से कहने लगी कि यह कौन बच्चा सोया है। बेचारा शायद रो रहा है , इसको दूध तो पिला दूँ। उन सब औरतों का झगड़ा शुरू हो गया। दादी माँ सभी पर गुस्सा करते हुए बोली कि वे सब लड़के से क्यों लगती है ? कहने का तात्पर्य यह है कि औरतों ने लेखक के ममेरे भाई को तो नाटक की जगह मान लिया था क्योंकि वह छोटा था , परन्तु जब उन्हें लेखक के भी वहाँ होने का पता चला तो वे दादी माँ से लड़ने लग गई। सुबह रास्ते में लेखक को देबू की माँ मिली और लेखक को देखते ही वो आपस में बात करने लगी कि यह तो कल वाला बच्चा है। उनकी बातें सुन कर लेखक वहाँ से जोर से भागा क्योंकि उसे लगा वो औरतें उस पर गुस्सा करेंगी। लेखक भाग कर दादी माँ के पास जा खड़ा हुआ। असल में जब भी लेखक या उसके घर का कोई बच्चा किसी प्रकार की कोई शरारत कर देते थे तो बड़ों की डाँट से बचने के लिए दादी माँ की छाया में खड़े हो जाते थे , दादी माँ के पास उन्हें शरण मिल जाया करती थी क्योंकि दादी माँ उन्हें डाँट या मार पड़ने से बचा लेती थी।

स्नेह और ममता की मूर्ति दादी माँ की एक – एक बात आज कैसी – कैसी मालूम होती है। परिस्थितियों का वात्याचक्र जीवन को सूखे पत्ते – सा कैसा नचाता है , इसे दादी माँ खूब जानती थीं। दादा की मृत्यु के बाद से ही वे बहुत उदास रहतीं। संसार उन्हें धोखे की टट्टी मालूम होता। दादा ने उन्हें स्वयं जो धोखा दिया। वे सदा उन्हें आगे भेजकर अपने पीछे जाने की झूठी बात कहा करते थे। दादा की मृत्यु के बाद कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ने वाले , मुँह में राम बगल में छुरी वाले दोस्तों की शुभचिंता ने स्थिति और भी डाँवाडोल कर दी। दादा के श्राद्ध में दादी माँ के मना करने पर भी पिता जी ने जो अतुल संपत्ति व्यय की , वह घर की तो थी नहीं।
कठिन शब्द
वात्याचक्र – बवंडर , आँधी
धोखे की टट्टी ( मुहावरा ) – भ्रम में डालने वाली तत्व – रहित वस्तु्
कुकुरमुत्ता –  सीली जगहों पर उगने वाला एक पौधा
मुँह में राम राम बगल में छुरी ( मुहावरा ) – मित्रता का ढोंग कर हानि पहुँचाना
डाँवाडोल – इधर उधर हिलता डोलता हुआ , एक स्थिति पर न रहने वाला
श्राद्ध – पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म , तृप्त करने की क्रिया और देवताओं , ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया
अतुल – अमित , असीम , अत्यधिक
व्यय – खर्च
नोट – इस गद्यांश में लेखक दादा जी की मृत्यु के बाद दादी माँ के संसार को समझने का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक अपनी दादी माँ को याद करता हुआ कहता है कि उसकी दादी माँ प्यार और ममता की मूर्ति थी , आज लेखक को अपनी दादी माँ की एक – एक बात अलग ही ढंग से मालूम होती है , कहने का तात्पर्य यह है कि आज लेखक अपनी दादी माँ की सभी बातों को अलग ही दृष्टिकोण से देखता है। आज लेखक को अपनी दादी माँ के प्यार और ममता का अनुभव ज्यादा अच्छे से होता है। लेखक कहता है कि जीवन में विभिन्न परिस्थितियों का बवंडर जीवन को सूखे पत्ते की तरह कैसा नचाता है , इसे दादी माँ खूब जानती थीं अर्थात जिस प्रकार आँधी सूखे पत्ते को इधर से उधर उड़ाती जाती है उसी प्रकार जीवन में विभिन्न परिस्थितियाँ भी जीवन में उथल – पुथल मचती हैं , यह लेखक की दादी माँ अच्छे से जानती थी। लेखक के दादा की मृत्यु के बाद से ही लेखक की दादी माँ बहुत उदास रहती थी। संसार उन्हें भ्रम में डालने वाली तत्व – रहित वस्तु् मालूम होता था अर्थात दादा की मृत्यु के बाद उनके लिए संसार कोई मायने नहीं रखता था। क्योंकि दादा ने उन्हें स्वयं धोखा दिया था। लेखक कहता है कि उसके दादा हमेशा दादी माँ को आगे भेजकर अपने पीछे जाने की झूठी बात कहा करते थे अर्थात लेखक के दादा हमेशा दादी माँ को कहा करते थे कि वे कभी उनसे पहले नहीं मरेंगे यानि वे उनका साथ कभी नहीं छोड़ेंगे। लेखक कहता है कि दादा की मृत्यु के बाद सीली जगहों पर उगने वाले पौधे की तरह बढ़ने वाले और मित्रता का ढोंग कर हानि पहुँचाने वाले दोस्तों की शुभचिंता ने स्थिति और भी अधिक अस्थिर कर दिया था , कहने का तात्पर्य यह है कि हानि पहुँचाने वाली सलाह देने वाले लोगों के कारण लेखक की दादी माँ की परेशानियाँ और भी ज्यादा बढ़ गई थी। दादा के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म में दादी माँ के मना करने पर भी लेखक के पिता जी ने जो अत्यधिक धन – संपत्ति खर्च की थी , वह घर की तो थी नहीं अर्थात जब लेखक के दादा की मृत्यु हुई थी तब लेखक के घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी इसी कारण लेखक की दादी माँ ने श्राद्ध में ज्यादा खर्च न करने  को कहा था किन्तु लेखक के पिता जी ने उधार ले कर श्राद्ध की सारी क्रियाएँ पूरी की थी।

दादी माँ अकसर उदास रहा करतीं। माघ के दिन थे। कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था। पछुवा का सन्नाटा और पाले की शीत हड्डियों में घुसी पड़ती। शाम को मैंने देखा , दादी माँ गीली धोती पहने , कोने वाले घर में एक संदूक पर दिया जलाए , हाथ जोड़कर बैठी हैं। उनकी स्नेह – कातर आँखों में मैंने आँसू कभी नहीं देखे थे। मैं बहुत देर तक मन मारे उनके पास बैठा रहा। उन्होंने आँखें खोलीं। ” दादी माँ ! ” , मैंने धीरे से कहा।
कठिन शब्द
अकसर – अधिकतर
कड़ाके का जाड़ा – बहुत अधिक ठण्ड
पछुवा – पश्चिम दिशा से चलने वाली हवा
सन्नाटा – स्तब्धता , चुप्पी , मौन , निर्जनता
पाला – हवा में मिले हुए भाप के सूक्ष्म कण जो अधिक ठंड पड़ने पर सफ़ेद तह के रूप में पेड़–पौधों आदि पर जम जाते हैं, तुषार
मन मारना – स्वेच्छया अथवा विवशतावश अपनी इच्छाओं का दमन करना , इच्छा को रोकना
नोट – इस गद्यांश में लेखक दादा जी की मृत्यु के बाद दादी माँ के दुःख का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक कहता है कि दादा जी की मृत्यु के बाद दादी माँ अधिकतर उदास रहा करती थी। लेखक माघ के दिनों में हुई एक घटना का वर्णन करता हुआ कहता है कि । उन दिनों बहुत अधिक ठण्ड पड़ रही थी। पश्चिम दिशा से चलने वाली हवा में एक दम चुप्पी थी और हवा में मिले हुए भाप के सूक्ष्म कण जो अधिक ठंड पड़ने पर सफ़ेद तह के रूप में पेड़–पौधों आदि पर जम जाते हैं , उनके कारण ठण्ड इतनी अधिक थी कि वह ठण्ड हड्डियों तक महसूस होती थी। लेखक कहता है कि उस शाम को उसने देखा कि उसकी दादी माँ गीली धोती पहने , कोने वाले घर में एक संदूक पर दिया जलाए , हाथ जोड़कर बैठी हुई है। लेखक ने अपनी दादी माँ की प्यार से भरी हुई आँखों में कभी आँसू नहीं देखे थे और इस समय वो रो रही थी। लेखक अपनी दादी को इस तरह देख कर बहुत देर तक उनसे यह पूछने के लिए उनके पास बैठा रहा कि वो क्यों रो रही हैं। जब लेखक की दादी माँ ने आँखें खोलीं तो लेखक ने धीरे से अपनी दादी को बुलाया।

” क्या है रे , तू यहाँ क्यों बैठा है ? “
” दादी माँ , एक बात पूछूँ , बताओगी न ? ” मैंने उनकी स्नेहपूर्ण आँखों की ओर देखा।
” क्या है , पूछ। “
” तुम रोती थीं ? “
दादी माँ मुसकराईं , ” पागल , तूने अभी खाना भी नहीं खाया न , चल – चल ! “
” धोती तो बदल लो , दादी माँ ” , मैंने कहा।

” मुझे सरदी – गरमी नहीं लगती बेटा। ” वे मुझे खींचती रसोई में ले गईं।
सुबह मैंने देखा , चारपाई पर बैठे पिता जी और किशन भैया मन मारे कुछ सोच रहे हैं। ” दूसरा चारा ही क्या है ? ” बाबू बोले , रूपया कोई देता नहीं। कितने के तो अभी पिछले भी बाकी हैं ! ” वे रोने – रोने – से हो गए।
कठिन शब्द
स्नेहपूर्ण – प्यार से भरी हुई
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपनी दादी की भावनाओं का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – जब लेखक ने दादी माँ को धीरे से पुकारा तो दादी माँ चौंक गई और लेखक से पूछने लगी कि लेखक वहाँ उसके बगल में बैठ कर क्या कर रहा है ? लेखक ने अपनी दादी माँ की हमेशा प्यार बरसाने वाली आँखों ओर देखा और पूछा कि अगर वह उनसे कुछ पूछेगा तो क्या वह उसे बताएँगी। दादी माँ ने बड़े प्यार से लेखक को बात पूछने के लिए कहा। लेखक ने दादी माँ से से पूछा कि क्या वह रो रही थी ? लेखक की बात का उसकी दादी माँ ने मुस्कुरा कर बात को बदलते हुए कहा कि लेखक ने अभी तक खाना भी नहीं खाया होगा तो चल कर पहले खाना खा लें।  लेखक ने दादी माँ की गीली धोती की और इशारा करते हुए कहा कि पहले धोती को तो बदल लो दादी माँ। लेखक की बात सुन कर दादी माँ लेखक को रसोई में खींचती हुई ले गईं और साथ में कहने लगीं कि उन्हें सरदी – गरमी कुछ नहीं लगती। कहने का तात्पर्य यह है कि दादी माँ इतनी दुखी रहने लगी थी कि उन्हें गीले कपड़ों से भी कोई फर्क नहीं पद रहा था और सबसे अनोखी बात यह थी कि वे किसी को भी अपने दुखी होने की बात का एहसास नहीं होने देती थी। लेखक कहता है कि अगली सुबह उसने देखा कि उसके पिता जी और किशन भैया चारपाई पर बैठे परेशानी में कुछ सोच रहे हैं। लेखक ने सुना कि उसके पिता जी लगभग रोने की सी आवाज में बोल रहे थे कि उनके पास अब कोई दूसरा चारा ही नहीं है , रूपया कोई देता नहीं और कितने लोगों के तो अभी पिछला उधार भी देना बाकी है !

” रोता क्यों है रे ! ” दादी माँ ने उनका माथा सहलाते हुए कहा , ” मैं तो अभी हूँ ही। ” उन्होंने संदूक खोलकर एक चमकती – सी चीज निकाली , ” तेरे दादा ने यह कंगन मुझे इसी दिन के लिए पहनाया था। ” उनका गला भर आया , ” मैंने इसे पहना नहीं , इसे सहेजकर रखती आई हूँ। यह उनके वंश की निशानी है। ” उन्होंने आँसू पोंछकर कहा , ” पुराने लोग आगा – पीछा सब सोच लेते थे , बेटा। “
कठिन शब्द
आगा – पीछा = अगला – पिछला
नोट – इस गद्यांश में लेखक ने दादी माँ का परिवार के लिए प्यार को दर्शाया है।
व्याख्या – लेखक कहता है कि जब दादी माँ को पता चला कि उनके बच्चे उधार न चूका पाने के कारण बहुत परेशान है तो उन्होंने कहा कि वे लोग क्यों परेशान हो रहे हैं ? लेखक कहता है कि दादी माँ ने उसके पिता का माथा सहलाते हुए कहा कि अभी वे हैं अर्थात अभी वे जिन्दा हैं किसी को परेशान होने की जरुरत नहीं है। लेखक की दादी ने उनका एक संदूक खोला और उसके अंदर से एक चमकती – सी चीज निकाली। उन्होंने लेखक के पिता जी से कहा कि वह चमकता कंगन उन्हें दादा जी ने इसी दिन के लिए पहनाया था। उनका गला भर आया और उन्होंने कहा कि उन्होंने इस कंगन को पहना नहीं , इसे सहेजकर रखती आई हैं। यह कंगन उनके वंश की निशानी है। इतना कह के उन्होंने अपने आँसू पोंछकर फिर कहा कि पुराने लोग अगला – पिछला सब सोच लेते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि दादी माँ उन सब की मदद के लिए अपना पुश्तैनी कंगन दे दिया और कहा कि पुराने लोग ऐसे ही मुसीबत के दिनों के लिए पूँजी संजो कर रखा करते थे।

सचमुच मुझे दादी माँ शापभ्रष्ट देवी – सी लगीं। धुँधली छाया विलीन हो गई। मैंने देखा , दिन काफी चढ़ आया है। पास के लंबे खजूर के पेड़ से उड़कर एक कौआ अपनी घिनौनी काली पाँखें फैलाकर मेरी खिड़की पर बैठ गया। हाथ में अब भी किशन भैया का पत्र काँप रहा है। काली चींटियों – सी कतारें धूमिल हो रही हैं। आँखों पर विश्वास नहीं होता। मन बार – बार अपने से ही पूछ बैठता है – ‘ क्या सचमुच दादी माँ नहीं रहीं ? ’
कठिन शब्द
शापभ्रष्ट देवी – जिसमें कोई दोष न हो
विलीन – लुप्त हुआ , अदृश्य , ओझल
घिनौनी – घृणा का भाव , गंदगी का भाव
कतारें – पंक्तियाँ
धूमिल – धुएँ के रंग का , धुँधला
नोट – इस गद्यांश में लेखक अपने किशन भैया के पत्र द्वारा दादी माँ के देहांत का समाचार मिलने पर अपनी प्रतिक्रिया का वर्णन कर रहा है।
व्याख्या – लेखक अपनी दादी माँ की प्रशंसा करते हुए कहता है कि लेखक को उसकी दादी माँ सचमुच में एक ऐसी महीना लगी जिसमें कोई दोष न हो। लेखक अपनी दादी माँ के बारे में जो कुछ सोच रहा था वह धुँधली छाया की तरह लुप्त हो गई। लेखक ने देखा , दिन काफी चढ़ आया था। लेखक के घर के पास के लंबे खजूर के पेड़ से उड़कर एक कौआ अपने गंदे काले पंखों को फैलाकर लेखक की खिड़की पर बैठ गया। लेखक के हाथ में अब भी उसके किशन भैया का पत्र था , जो काँप रहा है। उसमें लिखे गए अक्षर काली चींटियों की पंक्तियों की तरह धीरे – धीरे धुँधले हो रहे हैं। लेखक को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि उस पत्र में  ऐसी लिखी थी। लेखक अपने मन से बार – बार यही पूछ रहा था कि क्या सचमुच दादी माँ नहीं रहीं ? कहने का तात्पर्य यह है कि लेखक की दादी माँ का देहांत हो गया था जिसकी खबर करने के लिए किशन भैया ने पत्र लिखा था। परन्तु लेखक को इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था।
 

 

 

Dadi Maa Question Answers (“दादी माँ” – प्रश्न अभ्यास)

प्रश्न 1 – लेखक को अपनी दादी माँ की याद के साथ – साथ बचपन की और किन – किन बातों की याद आ जाती है ?
उत्तर – जब लेखक को किशन भाई के पत्र से मालूम हुआ कि दादी माँ की मृत्यु हो गई है तो उसके सामने दादी माँ के साथ बिताए उसके सभी पल सजीव हो उठे। दादी माँ की याद के साथ ही उसे अपने बचपन की दूसरी यादें भी स्मरण हो आई जैसे – क्वार के दिनों में गाँव के चारों ओर पानी भर जाना , गंधपूर्ण झागभरे जलाशयों में कूदना , बुखार का आना , बीमार होने पर दादी माँ का दिन – रात उसके बिस्तर के समीप रहकर उसकी सेवा करना , किशन भैया की शादी पर औरतों द्वारा गाए जाने वाले गीत और अभिनय के समय चादर ओढ़ – कर चुपके से बिना किसी को खबर हुए सोना और हँसी को न रोक पाने के कारण पकड़े जाना , दादी माँ का दूसरी महिलाओं के साथ बहस करना , दादी माँ का रामी की चाची को डाँटना और बाद में बिना किसी को बताए रामी की चाची की आर्थिक सहायता करना , रामी चाची का दादी माँ को आशीर्वाद देना , दादी माँ का परिवार की सहायता के लिए स्वार्थहीन व्यवहार आदि भी लेखक को याद आ जाते हैं क्योंकि ये सभी स्मृतियाँ कहीं – न – कहीं दादी माँ से ही जुड़ी हुई थी।
 
प्रश्न 2 – दादा की मृत्यु के बाद लेखक के घर की आर्थिक स्थिति खराब क्यों हो गई थी ?
उत्तर – दादा की मृत्यु के बाद लेखक के घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी , क्योंकि दादा की मृत्यु के बाद से ही सीली जगहों पर उगने वाले पौधे की तरह बढ़ने वाले फजूल के लोग और मित्रता का ढोंग कर हानि पहुँचाने वाले दोस्तों की शुभचिंता ने स्थिति को और भी अधिक अस्थिर कर दिया था , कहने का तात्पर्य यह है कि हानि पहुँचाने वाली सलाह देने वाले लोगों के कारण लेखक की दादी माँ की परेशानियाँ और भी ज्यादा बढ़ गई थी। गलत मित्रों की संगति ने घर का सारा धन पहले ही नष्ट कर डाला था। इसके अलावा दादा जी के श्राद्ध में भी दादी माँ के मना करने के बावजूद लेखक के पिता जी ने बेहिसाब दौलत व्यर्थ में खर्च की। यह संपत्ति घर की नहीं थी , कर्ज में ली गई थी। दादी माँ के मना करने के बावजूद उन्होंने नहीं माना जिससे घर की माली हालत डाँवाडोल हो गई। घर पर कर्ज बढ़ता चला जा रहा था।
 
प्रश्न 3 – दादी माँ के स्वभाव का कौन – सा पक्ष आपको सबसे अच्छा लगता है और क्यों ?
उत्तर – दादी माँ के स्वभाव में अनेक पक्ष थे , जो हमें अच्छे लगते थे , जैसे – दादी माँ का निस्वार्थ सभी की सेवा करने वाला पक्ष , बच्चों के लिए संरक्षणी वाला पक्ष , परोपकारी व सरस स्वभाव आदि का पक्ष हमें सबसे अच्छा लगता है , क्योंकि इन्हीं के कारण ही वे दूसरों का मन जीतने में सदैव सफल रही थी। लेखक के बीमार होने पर दादी द्वारा उसकी सेवा करना , गाँव में भी किसी के भी बीमार पड़ने पर वहाँ पहुँच जाना , रामी चाची की बेटी की शादी पर उसके घर जाकर उसकी सहायता करना व पिछला बकाया ऋण माफ़ करना , पिता जी की आर्थिक तंगी देखकर दादी जी की आखरी निशानी सोने का कंगन उन्हें देना आदि दर्शाता है कि दूसरों की मदद करना ही उनके जीवन का प्रमुख उद्देश्य था। दादी माँ का स्वभाव दयालु है। उनके स्वभाव का यही पक्ष सबसे अच्छा लगता है। दादी माँ अपने घर के सदस्य से लेकर गरीबों तक की मदद करने से पीछे नहीं हटती हैं।