Character Sketch of Ateet Mein Dabe Paon

 

लेखक (ओम थानवी) का चरित्र-चित्रण | Character Sketch of Writer (Om Thanvi) from CBSE Class 12 Hindi Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

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लेखक (ओम थानवी) के चरित्र सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of the Writer)

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी वितान, भाग 2, पाठ 3 ‘अतीत में दबे पाँव’ में मोहनजोदड़ो को देखते-देखते लेखक को किसकी याद आ गई?

उत्तर- मोहनजोदड़ो के खंडहरों को देखते-देखते लेखक ओम थानवी को कुलधरा गाँव की याद आ गई। राजस्थान का यह गाँव भी वीरान पड़ा है, जहाँ मकान तो मौजूद हैं लेकिन लोग नहीं रहते।

मोहनजोदड़ो के खंडहरों को देखकर लेखक को वही सूना और रहस्यमय वातावरण महसूस हुआ, इसलिए उन्हें कुलधरा की याद आ गई।

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी वितान, भाग 2, पाठ 3 ‘अतीत में दबे पाँव’ से लेखक के व्यक्तित्व के बारे में क्या पता चलता है?

उत्तर- ‘अतीत में दबे पाँव’ के आधार पर ओम थानवी का व्यक्तित्व एक जिज्ञासु, संवेदनशील और खोजी प्रवृत्ति वाले व्यक्ति के रूप में सामने आता है। वे इतिहास को केवल पढ़ते ही नहीं, बल्कि उसे प्रत्यक्ष अनुभव करके गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। प्राचीन अवशेषों को देखकर वे अतीत की सभ्यता, संस्कृति और जीवन-शैली की कल्पना करते हैं, जिससे उनके चिंतनशील और अनुभूति-प्रधान स्वभाव का परिचय मिलता है।

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी वितान, भाग 2, पाठ 3 ‘अतीत में दबे पाँव’ के आधार पर लेखक ओम थानवी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। 

उत्तर- लेखक ओम थानवी के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. ओम थानवी एक सूक्ष्म और सतर्क निरीक्षक हैं। वे मोहनजोदड़ो के खंडहरों की छोटी-छोटी बातों का गहराई से अवलोकन करते हैं।
  2. वे कल्पनाशील और संवेदनशील हैं। वे खंडहरों में भी जीवंत जीवन की अनुभूति करते हैं।
  3. उनका व्यक्तित्व इतिहास-प्रेमी का है। वे सिंधु घाटी सभ्यता को अत्यंत विकसित और महत्वपूर्ण मानते हैं।
  4. वे अतीत और वर्तमान को जोड़ने वाले चिंतक हैं। पुरानी सभ्यता को आज के संदर्भ में समझते हैं।
  5. उनकी दृष्टि तार्किक और व्यवस्थित है। वे नगर-योजना, जल-निकासी और जीवन-शैली का विश्लेषण करते हैं।
  6. वे खंडहरों में भी मानव जीवन के प्रमाण खोजने वाले यायावर लेखक के रूप में दिखाई देते हैं।

 

प्रश्न- कक्षा 12, हिंदी वितान, भाग 2, पाठ 3 ‘अतीत में दबे पाँव’ के लेखक कौन हैं?

उत्तर- ‘अतीत में दबे पाँव’ के लेखक ओम थानवी हैं, जो एक प्रसिद्ध पत्रकार और संपादक के रूप में जाने जाते हैं।

लेखक (ओम थानवी) का चरित्र-चित्रण (Character Sketch of the Writer)

“अतीत में दबे पाँव” के लेखक ओम थानवी जी हैं, जिन्होंने इस पाठ में सिंधु घाटी सभ्यता के एक महत्वपूर्ण स्थल “मोहनजोदड़ो” की अपनी यात्रा का वर्णन किया हैं। इस यात्रा के दौरान उनके व्यवहार से उनके व्यक्तित्व की झलक मिलती है –

  • इतिहास के जानकार – इस पाठ के जरिए हमें पता चलता है कि लेखक को इतिहास की काफी समझ है। लेखक हमें सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता को लगभग 5,000 साल पुरानी सभ्यता माना जाता है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा केवल प्राचीन भारत के ही नहीं, बल्कि दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। मोहनजोदड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। इसकी व्यापक खुदाई में बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले है। इस तरह की बहुत सी महत्वपूर्ण जानकारी लेखक ने इस पाठ में हमें दी है।
  • इतिहास का पुनः जीवंत प्रस्तुतिकरण करने में सक्षम – लेखक इतिहास के खण्डों की व्याख्या इतनी बखूबी से करते हैं कि ऐसा महसूस होता है जैसे इतिहास फिर से जीवित रूप ले रहा हो।  जैसे लेखक मोहनजोदड़ो की खूबी का वर्णन कुछ इस प्रकार करते हैं जैसे भले ही यह एक खंडहर क्यों न हो, परन्तु इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। या शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान लगाकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्त्व की तसवीरों में मिट्टी के रंग में देखा है, इत्यादि।
  • लेखक मोहनजोदड़ो के नगर नियोजन को मिसाल रूप में देखते हैं – लेखक मानते हैं कि मोहनजोदड़ो के सभी खंडहरों और खुदाई में मिली चीजों को जोड़-जोड़ कर उन खंडहरों और चीजों के इस्तेमाल का केवल हम अंदाजा मात्र लगा सकते हैं। हमें नहीं पता कि हम कहाँ तक मोहनजोदड़ो के इतिहास को सही से जान पाए हैं। परन्तु नगर नियोजन को मोहनजोदड़ो की अनूठी मिसाल के तौर पर समझा जाता है। क्योंकि यहाँ की इमारतें भले ही खंडहरों में बदल चुकी हों मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है।
  • मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिले कुंड को लेखक एक सिद्ध वास्तुकला का नमूना मानते हैं – कुंड करीब चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं। इनमें किसी भी स्नानघर का द्वार दूसरे स्नानघर के सामने नहीं खुलता। यह एक सिद्ध वास्तुकला का नमूना है। इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है।
  • लेखक मोहनजोदड़ो के घरों को देखकर जो अंदाजा लगाते हैं उससे पता चलता है कि लेखक की कल्पना शक्ति अद्धभुत है – छोटे घरों में छोटे कमरे समझ में आते हैं। पर बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर थोड़ी हैरानी होती है। इसका एक अर्थ तो यह लगाया गया है कि शहर की आबादी काफी रही होगी। बड़े घरों के आँगन में चौड़ी सीढ़ियाँ हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियाँ नहीं हैं। शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो समय के साथ नष्ट हो गईं हो। मोहनजोदड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिह्न नहीं हैं। अक्सर गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए यह आम प्रावधान होता है। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी। मोहनजोदड़ो की जानी-मानी मुहरों के पशुयों के चिह्न है जैसे शेर, हाथी या गैंडा। इस मरु-भूमि में ऐसे जानवर नहीं रह सकते। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ जंगल भी रहे होंगे।
  • लेखक के अनुसार सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था – वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है।

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