
लेखक (फणीश्वर नाथ रेणु)और पहलवान लुट्टन सिंहका चरित्र-चित्रण | Character Sketch of the Writer (Phanishwar Nath Renu) and Pahalwan Luttan Singh from CBSE Class 12 Hindi Chapter 13 पहलवान की ढोलक
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कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” लेखक (फणीश्वर नाथ रेणु) के चरित्र सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of the Writer)
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ में लेखक ‘फणीश्वर नाथ रेणु जी’ ने क्या वर्णन किया है ?
उत्तर – “पहलवान की ढोलक” कहानी के लेखक ‘फणीश्वर नाथ रेणु जी’ हैं। । फणीश्वर नाथ रेणु जी की कलम में अपने गाँव, अंचल एवं संस्कृति को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है। ऐसा लगता है मानो उनकी रचना का हर एक पात्र वास्तविक जीवन ही जी रहा हो। पात्रों एवं उसके आसपास के वातावरण का इतना सच्चा चित्रण बहुत कम देखने को मिलता है। रेणु वैसे गिने-चुने कथाकारों में से हैं जिन्होंने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है, नहीं तो ढोलक की उठती-गिरती आवाज़ और पहलवान के क्रियाकलापों का ऐसा सामंजस्य दुर्लभ है।
प्रश्न – “पहलवान की ढोलक” कहानी के लेखक की मुख्य विशेषता बताइए।
अथवा
“पहलवान की ढोलक” कहानी के आधार पर लेखक की रचना “पहलवान की ढोलक” की विशेषता बताइए।
उत्तर – “पहलवान की ढोलक” कहानी के लेखक ‘फणीश्वर नाथ रेणु जी’ हैं। । फणीश्वर नाथ रेणु जी की कलम में अपने गाँव, अंचल एवं संस्कृति को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है। लेखक के कलम में पात्रों को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है। लेखक की रचना में ऐसा प्रतीत होता है जैसे हर एक पात्र वास्तविक जीवन ही जी रहा हो। पात्रों एवं उसके आसपास के वातावरण का इतना सच्चा चित्रण बहुत कम देखने को मिलता है। रेणु वैसे गिने–चुने कथाकारों में से हैं जिन्होंने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है, नहीं तो ढोलक की उठती–गिरती आवाज़ और पहलवान के क्रियाकलापों का ऐसा सामंजस्य दुर्लभ है।
लेखक (फणीश्वर नाथ रेणु) का चरित्र-चित्रण | (Character Sketch of the Writer)
“पहलवान की ढोलक” कहानी के लेखक ‘फणीश्वर नाथ रेणु जी’ हैं। । फणीश्वर नाथ रेणु जी की कलम में अपने गाँव, अंचल एवं संस्कृति को सजीव करने की अद्भुत क्षमता है।
- लेखक के कलम में पात्रों को सजीव करने की क्षमता है – लेखक की रचना में ऐसा प्रतीत होता है जैसे हर एक पात्र वास्तविक जीवन ही जी रहा हो। पात्रों एवं उसके आसपास के वातावरण का इतना सच्चा चित्रण बहुत कम देखने को मिलता है। रेणु वैसे गिने–चुने कथाकारों में से हैं जिन्होंने गद्य में भी संगीत पैदा कर दिया है, नहीं तो ढोलक की उठती–गिरती आवाज़ और पहलवान के क्रियाकलापों का ऐसा सामंजस्य दुर्लभ है।
कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह का चरित्र-चित्रण (Character Sketch of Pahalwan Luttan Singh)
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ के मुख्य पात्र लुट्टन पहलवान का परिचय अपने शब्दों में दीजिए ?
उत्तर – लुट्टन सिंह पहलवान अपने बारे में कहता था कि “होल इंडिया” उसे जानता है लेकिन लेखक के अनुसार उसका “होल इंडिया” उसके जिले तक ही सीमित होगा क्योंकि उसे उसके जिले के अधिकतर लोग जानते थे। इसके बाद लेखक लुट्टन सिंह के बचपन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि लुट्टन सिंह जब नौ साल का था तब उसके माता-पिता का देहांत हो चुका था। सौभाग्य से उसकी शादी पहले ही हो गयी थी। वरना उम्र छोटी होने के कारण वह भी शायद अपने माता-पिता की तरह मृत्यु को प्राप्त करता। उसकी विधवा सास ने ही उसको पाल पोस कर बड़ा किया। वह बचपन में गाय चराता, खूब दूध-दही खाता और कसरत करता था।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ के मुख्य पात्र लुट्टन के पहलवान बनने का क्या कारण था ?
उत्तर – लुट्टन सिंह को यह देख कर बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता था कि गांव के लोग उसकी सास को परेशान करते हैं। इसीलिए उसने गांव के लोगों से बदला लेने के लिए ही पहलवान बनने की ठानी थी। और युवावस्था तक आते आते वह अच्छा खासा पहलवान बन गया था। उसने कुश्ती के दाँव पेंच भी सीख लिए थे।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ के मुख्य पात्र लुट्टन की ढोलक को क्यों खास माना गया है ?
उत्तर – पहलवान की ढोलक गाँव के लोगों के लिए एक आशा की किरण थी। रात की खमोशी को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही तोड़ती थी। पहलवान की ढोलक संध्याकाल से लेकर प्रात:काल तक लगातार एक ही गति से बजती रहती थी और गाँव में फैली महामारी से होने वाली मौतों को चुनौती देती रहती थी। ढोलक की आवाज निराश, हताश, कमजोर और अपनों को खो चुके लोगों में संजीवनी भरने का काम करती थी। और इस ढोलक को लुट्टन सिंह पहलवान बजाया करता था। महामारी में पहलवान की ढोलक की आवाज ही लोगों को उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती थी। वह उनके लिए संजीवनी का काम करती थी।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ का पात्र लुट्टन सिंह बहुत हिम्मती था। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
अथवा
लुट्टन सिंह के आम पहलवान से राज पहलवान बनने के सफर का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर – एक बार लुट्टन सिंह श्याम नगर मेले में दंगल देखने गया। वहाँ कुश्ती देखकर और ढोल की आवाज सुनकर उसकी नसों में जैसे खून बिजली की तरह दौड़ने लगा और उसने बिना सोचे समझे वहाँ चाँद सिंह नाम के एक पहलवान को चुनौती दे दी। चाँद सिंह पहलवान अपने गुरु बादल सिंह के साथ पंजाब से आया था और उसे “शेर के बच्चे” का खिताब दिया गया था। क्योंकि उसने वहाँ तीन दोनों में ही सभी पहलवानो को धूल चटा दी थी। उसका पराक्रम देखकर श्याम नगर के राजा चाँद सिंह को अपने यहाँ राज पहलवान रखने की भी सोच रहे थे। लुट्टन सिंह की चुनौती चाँद सिंह ने स्वीकार कर ली लेकिन जब लुट्टन सिंह, चाँद सिंह से भिड़ा तो चाँद सिंह बाज की तरह लुट्टन से भीड़ गया और उसने पहली बार में ही लुट्टन को जमीन में पटक दिया। लेकिन लुट्टन सिंह उठ खड़ा हुआ और दुबारा दंगल शुरू हुआ। परन्तु राजा साहब ने बीच में ही कुश्ती रोक कर लुट्टन को बुलाकर उसके साहस के लिए उसे दस रूपए देकर मेला घूमने और घर जाने को कहा। परन्तु इस बार लुट्टन सिंह ने सभी की उम्मीदों के विपरीत चांद सिंह को चित कर दिया। उसने इस पूरी कुश्ती में ढोल को अपना गुरु मानते हुए उसके स्वरों के हिसाब से ही दांव-पेंच लगाया और कुश्ती जीत ली। जीत की ख़ुशी में उसने राजा जी को उठा लिया और राजा ने भी प्रसन्न होकर कहा कि उसने बाहर से आए पहलवान को हरा कर अपनी मिट्टी की लाज रख ली और उन्होंने उसे राज पहलवान बना दिया।
प्रश्न – कक्षा 12, हिंदी आरोह, भाग 2 पाठ 13 “पहलवान की ढोलक” पाठ के पात्र लुट्टन सिंह के राज पहलवान और नए राजा के कार्यभार सँभालने के बाद के जीवन में क्या परिवर्तन देखने को मिले ?
उत्तर – राजा का संरक्षण मिलने के बाद लुट्टन सिंह को अच्छा खाना व कसरत करने की सभी सुविधाएं मिलने लगी। बाद में काले खाँ जैसे कई प्रसिद्ध पहलवानों को हराकर वह लगभग 15 वर्षों तक अजेय रहा। इसीलिए उसके ऊपर हमेशा राजा की विशेष कृपा दृष्टि रहती थी। धीरे-धीरे राजा उसे किसी से लड़ने भी नहीं देते थे क्योंकि लुट्टन सिंह सभी पहलवानों को आसानी से हरा देता था और खेल का मज़ा खराब हो जाता था। अब वह राज दरबार का सिर्फ एक दर्शनीय जीव बन कर रह गया था।
परन्तु नए राजा के कार्यभार सँभालने के बाद लुट्टन सिंह की परिस्थिति बदल गई। नये राजा को कुश्ती में बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं थी। और लुट्टन सिंह पर होने वाला खर्चा सुन कर वह हक्का-बक्का रह गया अतः उसने लुट्टन सिंह को राजदरबार से निकाल दिया। लुट्टन सिंह अपने दोनों बेटों के साथ गाँव वापस आ गया। गाँव वालों ने उसकी मदद के लिए गाँव के एक छोर पर उसकी एक छोटी सी झोपड़ी बना दी और उसके खाने-पीने का इंतजाम भी कर दिया। इसके बदले में वह गाँव के नौजवानों को पहलवानी सिखाने लगा। लेकिन यह सब ज्यादा दिनों तक नही चला क्योंकि गाँव के गरीब नौजवान पहलवानी करने के लिए पौष्टिक आहार आदि का खर्च नहीं उठा पाते थे। इसीलिए अब वह अपनी ढोलक की थाप पर अपने दोनों बेटों को ही कुश्ती सिखाया करता था। उसके बेटे दिन भर मजदूरी करते जिससे उनका गुजर-बसर चलता और शाम को कुश्ती के दांव पेंच सीखते थे।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह को लोगों की निराशा को आशा में बदलने वाला क्यों बताया गया है ?
उत्तर – पहलवान लुट्टन सिंह लोगों की निराशा को आशा में बदलने की कोशिश करने वाला व्यक्ति है। रात की खमोशी को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही तोड़ती थी। पहलवान की ढोलक संध्याकाल से लेकर प्रात:काल तक लगातार एक ही गति से बजती रहती थी और गाँव में फैली महामारी से होने वाली मौतों को चुनौती देती रहती थी। ढोलक की आवाज निराश, हताश, कमजोर और अपनों को खो चुके लोगों में संजीवनी भरने का काम करती थी।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह के जीवन पर प्रकाश डालिए ?
उत्तर – पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह का जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ था। लुट्टन सिंह जब नौ साल का था तब उसके माता–पिता का देहांत हो चुका था। सौभाग्य से उसकी शादी पहले ही हो गयी थी। वरना उम्र छोटी होने के कारण वह भी शायद अपने माता–पिता की तरह मृत्यु को प्राप्त करता। उसकी विधवा सास ने ही उसको पाल पोस कर बड़ा किया। वह बचपन में गाय चराता, खूब दूध–दही खाता और कसरत करता था। गांव के लोग उसकी सास को परेशान करते थे जो उसे अच्छा नहीं लगता था। इसीलिए उसने गांव के लोगों से बदला लेने के लिए ही पहलवान बनने की ठानी थी। और युवावस्था तक आते आते वह अच्छा खासा पहलवान बन गया था। उसने कुश्ती के दाँव पेंच भी सीख लिए थे।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह की बहादुरी का कोई उदाहरण दीजिए।
उत्तर – एक बार लुट्टन सिंह श्याम नगर मेले में दंगल देखने गया। वहाँ कुश्ती देखकर और ढोल की आवाज सुनकर उसकी नसों में जैसे खून बिजली की तरह दौड़ने लगा और उसने बिना सोचे समझे वहाँ चाँद सिंह नाम के एक पहलवान को चुनौती दे दी। लुट्टन सिंह की चुनौती चाँद सिंह ने स्वीकार कर ली लेकिन जब लुट्टन सिंह चाँद सिंह से भिड़ा तो चाँद सिंह बाज की तरह लुट्टन से भिड़ गया और उसने पहली बार में ही लुट्टन को जमीन में पटक दिया। लेकिन लुट्टन सिंह उठ खड़ा हुआ और दुबारा दंगल शुरू हुआ। इस बार लुट्टन सिंह ने सभी की उम्मीदों के विपरीत चांद सिंह को चित कर दिया। उसने इस पूरी कुश्ती में ढोल को अपना गुरु मानते हुए उसके स्वरों के हिसाब से ही दांव–पेंच लगाया और कुश्ती जीत ली।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह किसे अपना गुरु मानता था ?
उत्तर – लुट्टन सिंह ने हमेशा से ही ढोलक को ही अपना गुरु माना था इसीलिए अपने दोनों बेटों को भी ढोलक की थाप में पूरा ध्यान देने को कहता था। उसने अपने दोनों बेटों को भी अपनी ही तरह पहलवान बना दिया था।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह की जिंदगी नए राजा के राज्य का भार सँभालने के बाद कैसी थी?
अथवा
नए राजा के राज्य का भार सँभालने के बाद पहलवान लुट्टन सिंह की जिंदगी पे कैसा असर पड़ा ?
उत्तर – लुट्टन सिंह की जिंदगी ठीक–ठाक चल रही थी। लेकिन राजा की मृत्यु के बाद उनके बेटे ने राज्य का भार संभाल लिया। नये राजा को कुश्ती में बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं थी। और लुट्टन सिंह पर होने वाला खर्चा सुन कर उसने लुट्टन सिंह को राजदरबार से निकाल दिया। गाँव वालों ने उसकी मदद के लिए गाँव के एक छोर पर उसकी एक छोटी सी झोपड़ी बना दी और उसके खाने–पीने का इंतजाम भी कर दिया। इसके बदले में वह गाँव के नौजवानों को पहलवानी सिखाने लगा। लेकिन यह सब ज्यादा दिनों तक नही चला क्योंकि गाँव के गरीब नौजवान पहलवानी करने के लिए पौष्टिक आहार आदि का खर्च नहीं उठा पाते थे। इसीलिए अब वह अपनी ढोलक की थाप पर अपने दोनों बेटों को ही कुश्ती सिखाया करता था। उसके बेटे दिन भर मजदूरी करते जिससे उनका गुजर–बसर चलता और शाम को कुश्ती के दांव पेंच सीखते थे।
प्रश्न – कक्षा 12 हिंदी पाठ 13 पहलवान की ढोलक के पात्र पहलवान लुट्टन सिंह का साहस किस तरह लोगों में नई ऊर्जा का संचार करता था ?
अथवा
पहलवान की ढोलक लोगों को किस मुसीबत में साहस प्रदान करती थी?
अथवा
पहलवान की ढोलक किस प्रकार लोगों में संजीवनी भरने का काम करती थी?
उत्तर – यह पहलवान के साहस का ही प्रतीक है कि जब गांव के लोगों के साथ –साथ उसके बेटों को भी हैजे और मलेरिया ने जकड़ लिया। तब पहलवान की ढोलक की आवाज ही लोगों को उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती थी। वह उनके लिए संजीवनी का काम करती थी। पहलवान के दोनों बेटे भी बीमारी की चपेट में आकर मरने की स्थिति में पहुंच चुके थे और मरने से पहले वो अपने पिता से ढोलक बजाने को कहते हैं। लुट्टन सिंह रात भर ढोलक बजाता है और सुबह जाकर देखता है तो वो दोनों पेट के बल मरे पड़े थे। वह अपने दोनों बेटों को कंधे पर ले जाकर नदी में बहा देता हैं। लोगों का मनोबल न टूटे इसके लिए वह उसी रात को फिर से ढोलक बजाता है। लोगों ने उसकी हिम्मत की दाद दी और साथ ही साथ खुद में भी एक ऊर्जा का अनुभव किया।
पहलवान लुट्टन सिंह का चरित्र-चित्रण (Character Sketch of Pahalwan Luttan Singh)
लोगों की निराशा को आशा में बदलने की कोशिश करने वाला – रात की खमोशी को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही तोड़ती थी। पहलवान की ढोलक संध्याकाल से लेकर प्रात:काल तक लगातार एक ही गति से बजती रहती थी और गाँव में फैली महामारी से होने वाली मौतों को चुनौती देती रहती थी। ढोलक की आवाज निराश, हताश, कमजोर और अपनों को खो चुके लोगों में संजीवनी भरने का काम करती थी।
- कठिनाइयों भरा जीवन – लुट्टन सिंह जब नौ साल का था तब उसके माता–पिता का देहांत हो चुका था। सौभाग्य से उसकी शादी पहले ही हो गयी थी। वरना उम्र छोटी होने के कारण वह भी शायद अपने माता–पिता की तरह मृत्यु को प्राप्त करता। उसकी विधवा सास ने ही उसको पाल पोस कर बड़ा किया। वह बचपन में गाय चराता, खूब दूध–दही खाता और कसरत करता था। गांव के लोग उसकी सास को परेशान करते थे जो उसे अच्छा नहीं लगता था। इसीलिए उसने गांव के लोगों से बदला लेने के लिए ही पहलवान बनने की ठानी थी। और युवावस्था तक आते आते वह अच्छा खासा पहलवान बन गया था। उसने कुश्ती के दाँव पेंच भी सीख लिए थे।
- बहादुर – एक बार लुट्टन सिंह श्याम नगर मेले में दंगल देखने गया। वहाँ कुश्ती देखकर और ढोल की आवाज सुनकर उसकी नसों में जैसे खून बिजली की तरह दौड़ने लगा और उसने बिना सोचे समझे वहाँ चाँद सिंह नाम के एक पहलवान को चुनौती दे दी। लुट्टन सिंह की चुनौती चाँद सिंह ने स्वीकार कर ली लेकिन जब लुट्टन सिंह चाँद सिंह से भिड़ा तो चाँद सिंह बाज की तरह लुट्टन से भिड़ गया और उसने पहली बार में ही लुट्टन को जमीन में पटक दिया। लेकिन लुट्टन सिंह उठ खड़ा हुआ और दुबारा दंगल शुरू हुआ। इस बार लुट्टन सिंह ने सभी की उम्मीदों के विपरीत चांद सिंह को चित कर दिया। उसने इस पूरी कुश्ती में ढोल को अपना गुरु मानते हुए उसके स्वरों के हिसाब से ही दांव–पेंच लगाया और कुश्ती जीत ली।
- लुट्टन सिंह ढोलक को ही अपना गुरु मानता था – लुट्टन सिंह ने हमेशा से ही ढोलक को ही अपना गुरु माना था इसीलिए अपने दोनों बेटों को भी ढोलक की थाप में पूरा ध्यान देने को कहता था। उसने अपने दोनों बेटों को भी अपनी ही तरह पहलवान बना दिया था।
- हिम्मती – लुट्टन सिंह की जिंदगी ठीक–ठाक चल रही थी। लेकिन राजा की मृत्यु के बाद उनके बेटे ने राज्य का भार संभाल लिया। नये राजा को कुश्ती में बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं थी। और लुट्टन सिंह पर होने वाला खर्चा सुन कर उसने लुट्टन सिंह को राजदरबार से निकाल दिया। गाँव वालों ने उसकी मदद के लिए गाँव के एक छोर पर उसकी एक छोटी सी झोपड़ी बना दी और उसके खाने–पीने का इंतजाम भी कर दिया। इसके बदले में वह गाँव के नौजवानों को पहलवानी सिखाने लगा। लेकिन यह सब ज्यादा दिनों तक नही चला क्योंकि गाँव के गरीब नौजवान पहलवानी करने के लिए पौष्टिक आहार आदि का खर्च नहीं उठा पाते थे। इसीलिए अब वह अपनी ढोलक की थाप पर अपने दोनों बेटों को ही कुश्ती सिखाया करता था। उसके बेटे दिन भर मजदूरी करते जिससे उनका गुजर–बसर चलता और शाम को कुश्ती के दांव पेंच सीखते थे।
- साहसी – यह पहलवान के साहस का ही प्रतीक है कि जब गांव के लोगों के साथ –साथ उसके बेटों को भी हैजे और मलेरिया ने जकड़ लिया। तब पहलवान की ढोलक की आवाज ही लोगों को उनके जिंदा होने का एहसास दिलाती थी। वह उनके लिए संजीवनी का काम करती थी। पहलवान के दोनों बेटे भी बीमारी की चपेट में आकर मरने की स्थिति में पहुंच चुके थे और मरने से पहले वो अपने पिता से ढोलक बजाने को कहते हैं। लुट्टन सिंह रात भर ढोलक बजाता है और सुबह जाकर देखता है तो वो दोनों पेट के बल मरे पड़े थे। वह अपने दोनों बेटों को कंधे पर ले जाकर नदी में बहा देता हैं। लोगों का मनोबल न टूटे इसके लिए वह उसी रात को फिर से ढोलक बजाता है। लोगों ने उसकी हिम्मत की दाद दी और साथ ही साथ खुद में भी एक ऊर्जा का अनुभव किया।
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