Character Sketch of Kaale Megha Paani De

 

लेखक (धर्मवीर भारती) का चरित्र-चित्रण | Character Sketch of the Writer (Dharamvir Bharti) from CBSE Class 12 Hindi Chapter 12 काले मेघा पानी दे

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लेखक (धर्मवीर भारती) के चरित्र सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of the Writer)

प्रश्न- कक्षा 12 हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ ‘काले मेघा पानी दे’ पाठ के आधार पर धर्मवीर भारती कौन थे और उनका साहित्यिक परिचय क्या है?

उत्तर- प्रश्न- धर्मवीर भारती कौन थे और उनका साहित्यिक परिचय क्या है?

उत्तर- धर्मवीर भारती आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और विचारक थे। उनका जन्म 25 दिसंबर 1926 को हुआ और 4 सितंबर 1997 को उनका निधन हुआ। वे प्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के प्रधान संपादक भी रहे।

डॉ. धर्मवीर भारती ने हिन्दी साहित्य को अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ दीं। उनका प्रसिद्ध उपन्यास  ‘गुनाहों का देवता’ हिन्दी साहित्य की अत्यंत लोकप्रिय और कालजयी कृतियों में माना जाता है। साहित्य और पत्रकारिता में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए उन्हें वर्ष 1972 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

प्रश्न- धर्मवीर भारती की दो प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?

उत्तर- धर्मवीर भारती की दो प्रमुख रचनाएँ ‘गुनाहों का देवता’ (उपन्यास) और ‘अँधा युग’ (नाटक) हैं। ये दोनों कृतियाँ हिन्दी साहित्य में अत्यंत प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’, ‘कनुप्रिया’ और ‘ठंडा लोहा’ भी उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं।

 

प्रश्न- कक्षा 12 हिंदी आरोह, भाग 2, पाठ ‘काले मेघा पानी दे’ के आधार पर धर्मवीर भारती को कौन सा पुरस्कार मिला था?

उत्तर- धर्मवीर भारती को पद्म श्री, व्यास सम्मान एवं साहित्य के कई अन्य राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे। 

 

लेखक (धर्मवीर भारती) का चरित्र-चित्रण (Character Sketch of  the Writer)

काले मेघा पानी दे संस्मरण में लोक-प्रचलित विश्वास और विज्ञान के संघर्ष का सुंदर चित्रण है। एक तरफ विज्ञान का अपना तर्क है और विश्वास का अपना सामर्थ्य। पढ़े-लिखे समाज में भी अक्सर इस बात पर चर्चा होती रहती है कि कौन अधिक सार्थक है। इसी दुविधा को लेकर लेखक ने पानी के संदर्भ में इस प्रसंग को रचा है। इस प्रसंग से लेखक के चरित्र की निम्नलिखित बातों का पता चलता है –

  • गाँव रीतिरिवाजों की जानकारीलेखक को गाँव के कई ऐसे रीतिरिवाजों की जानकारी है जिनको शायद ही कोई आधुनिक व्यक्ति जानता हो। जैसे संस्मरण की शरुवात ने धर्मवीर भारती जी बताते हैं कि गाँव में बच्चों की एक मंडली हुआ करती थी जिसमें 10-12 से लेकर 16-18 साल के लड़के होते थे। ये बच्चे अपने शरीर पर सिर्फ एक लंगोटी या जांगिया पहने रहते थे। जब जेठ का महीना बीत जाता और आषाढ़ भी आधा गुजर जाता मगर फिर भी बारिश नहीं होती तब गांवों शहरों में सूखे के से हालत हो जाते हैं। मिट्टी इतनी सुखी हो जाती है कि जमीन भी फटने लगती है। इंसान जानवर पानी के बैगर तड़पतड़प कर मरने लगते मगर फिर भी आसमान में बादलों का कही कोई निशान तक दिखाई नहीं देता। और विज्ञान भी उनकी इसमें कोई मदद नहीं कर पाता तब ऐसे मुश्किल हालातों में लोग अपनेअपने क्षेत्रों में प्रचलित लोक विश्वासों जैसे पूजा पाठ, हवनयज्ञ आदि के सहारे भगवान इंद्र से प्रार्थना कर वर्षा की उम्मीद लगाने लगाते थे। जब यह सब कुछ करने के बाद भी केवल हार ही नसीब होती हैं तो फिर अंत में इंदर सेना को बुलाया जाता था।
  • इंद्र सेना का पानी मांगने का तरीका लेखक को अंधविश्वास लगता था इंद्र सेना, भगवान इंद्र से वर्षा की प्रार्थना करती हुई, गीत गाती हुई पूरे गांव में निकलती थी। उस समय लेखक को भी पानी मिलने की आशा में यह सब कुछ करना ठीक लगता था। परंतु एक बात लेखक की समझ में नहीं आती थी कि जब चारों ओर पानी की इतनी अधिक कमी है कि जानवर और इंसान, दोनों ही पानी के लिए परेशान हो रहे हैं तो फिर भी मुश्किल से इकट्ठा किया हुआ पानी लोग इंद्रसेना पर डाल कर उसे क्यों बर्बाद करते हैं। लेखक को यह सब सरासर अंधविश्वास लगता था।
  • लेखक के अनुसार अन्धविश्वास देश को नुकसान पहुंचा रहे हैं लेखक को लगता था कि इंद्र सेना पर विश्वास रखने जैसे अन्धविश्वास देश को जाने कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। लेखक के अनुसार तो यह इंद्र सेना नही बल्कि पाखंड हैं। ऐसा लेखक इसलिए कहते हैं क्योंकि अगर यह इंद्र सेना, सच में इंद्र महाराज से पानी दिलवा सकती तो, क्या वो पहले अपने लिए पानी नहीं मांग लेती। लेखक का मानना है कि इस तरह के अंधविश्वास के कारण ही तो हम अंग्रेजों से पिछड़ गए और उनके गुलाम हो गये।
  •  लेखक बचपन से ही आर्य समाजी संस्कार से प्रभावित थे लेखक बचपन से ही आर्य समाजी संस्कार से प्रभावित थे। वोकुमार सुधार सभा” के उपमंत्री भी थे। जिसका कार्य समाज में सुधार करना अंधविश्वास को दूर करना था।  लेखक  हमेशा अपनी वैज्ञानिक सोच के आधार पर अंधविश्वासों के तर्क ढूंढते रहते थे।
  •  लेखक के द्वारा उठाए हुए प्रश्न हमेशा से प्रासंगिक रहे है आज भी लेखक के द्वारा उठाए हुए प्रश्न उतने ही प्रासंगिक है जितने उनके बचपन में हुआ करते थे। लेखक के अनुसार हम अपने देश के लिए करते क्या हैं? क्योंकि हमारी मांगें तो हर क्षेत्र में बड़ीबड़ी है पर त्याग का कहीं कोई नाम भी नहीं है। अपना स्वार्थ साधना ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम खूब मज़े ले लेकर लोगों की भ्रष्टाचार की बातें तो खूब करते हैं लेकिन क्या हम खुद उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे है।

 

 

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