मैंने कहा, पेड़ पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 5 “Maine Kaha Ped” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
मैंने कहा, पेड़ पर सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 5 Maine Kaha Ped Summary with detailed explanation of the lesson “Maine Kaha Ped” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 5 मैंने कहा, पेड़ पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 मैंने कहा, पेड़ पाठ के बारे में जानते हैं।
Maine Kaha Ped (मैंने कहा, पेड़)
By अज्ञेय
मैंने कहा, पेड़ कविता सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी द्वारा रचित है। यह कविता प्रकृति और जीवन दर्शन पर आधारित एक गहन और प्रेरणादायक रचना है। इसमें कवि ने एक पेड़ के माध्यम से मनुष्य को विनम्रता, धैर्य, संतुलन और त्याग जैसे महत्वपूर्ण जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयास किया है। पूरी कविता एक संवाद के रूप में है, जिसमें कवि पेड़ की प्रशंसा करता है और पेड़ विनम्रता से कहता है कि इसका श्रेय किसी और को जाता है।
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मैंने कहा, पेड़ पाठ सार Maine Kaha Ped Summary
यह कविता मानव और प्रकृति के संवाद पर आधारित है। कवि एक पेड़ से बात करता है और उसके माध्यम से विनम्रता, धैर्य, त्याग और जीवन के सच्चे अर्थ को समझाता है। पहले भाग में कवि पेड़ की मजबूती और सहनशीलता की प्रशंसा करता है। वह कहता है कि पेड़ बहुत बड़ा और कठोर है तथा न जाने कितने वर्षों तक आँधी, तूफ़ान और बारिश सहकर भी अपनी जगह अडिग खड़ा है। समय बदलता रहता है, सूरज उगता और डूबता है, चाँद घटता-बढ़ता है, ऋतुएँ बदलती रहती हैं, बादल आते और बरसते हैं, परंतु पेड़ अपनी जगह स्थिर और शांत खड़ा है। कवि को लगता है कि पेड़ बिना शिकायत के, धैर्य और संतुलन बनाए हुए, हरी पत्तियों से ढका हुआ है, लेकिन भीतर से कठोर और दृढ़ है।
लेकिन जब पेड़ सुनता है कि कवि उसकी प्रशंसा कर रहा है, तब उसके पत्ते हल्के से कांपते हैं और ऐसा लगता है जैसे वह कह रहा हो कि नहीं, यह श्रेय मेरा नहीं है। पेड़ कहता है कि अगर मिट्टी ना होती तो वह बार-बार गिर जाता, टूट जाता या सूखकर ठूँठ बन जाता। वह स्वयं को महान नहीं मानता और कहता है कि जितना वह आकाश की ओर बड़ा है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ें धरती में हैं। यानी उसकी सफलता का आधार उसकी जड़ें, मिट्टी हैं, जिसने उसे संभाला और पोषित किया।
अंत में पेड़ एक महत्वपूर्ण सीख देता है। वह कहता है कि उसका कोई श्रेय नहीं है, सब श्रेय उस नामहीन मिट्टी का है, और उन सब शक्तियों का है जो प्रकृति में निरंतर बदलती रहती हैं, जैसे- सूरज, चाँद, मौसम और वर्षाएँ। पेड़ कहता है कि उसने सदियों के अनुभव से एक बात सीखी है, जो नष्ट होने वाला है, वही जीवन देने वाला है। यानी मिट्टी, पानी, पत्तों का झड़ना, बीजों का गलना, ये सब नए जीवन की शुरुआत का आधार बनते हैं।
इस प्रकार इस कविता से शिक्षा मिलती है कि विनम्रता, धैर्य, सहनशीलता और त्याग ही सच्चा जीवन है। सफलता केवल बाहरी मजबूती से नहीं मिलती, बल्कि गहरी जड़ों और आत्मिक नम्रता से मिलती है।
मैंने कहा, पेड़ पाठ व्याख्या Maine Kaha Ped Explanation
पाठ
मैंने कहा, “पेड़, तुम इतने बड़े हो,
इतने कड़े हो,
न जाने कितने सौ बरसों के आँधी-पानी में
सिर ऊँचा किये अपनी जगह अड़े हो।
शब्दार्थ-
कड़ा- सख्त, कठोर
अड़ा– रुका हुआ
बरसों– वर्षों सालों
प्रसंग- इस कविता में कवि एक पेड़ से बात करता है और उसकी मज़बूती, सहनशीलता और स्थिरता की प्रशंसा करता है।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि पेड़ से कहता है कि तुम कितने विशाल और मजबूत हो। तुम्हारी ऊँचाई और कठोरता देखकर लगता है कि तुम बहुत वर्षों से प्रकृति की कठिन परिस्थितियों को सहते आए हो। न जाने कितनी आंधियाँ, तूफ़ान और बारिशें आईं होंगी, लेकिन तुमने कभी हार नहीं मानी और हमेशा अपना सिर ऊँचा करके अपनी जगह पर डटे रहे। तुम शांत, स्थिर और दृढ़ दिखाई देते हो।
पाठ
सूरज उगता डूबता है, चाँद मरता-छीजता है
ऋतुएँ बदलती हैं, मेघ उमड़ता-पसीजता है,
और तुम सब सहते हुए
संतुलित शान्त धीर रहते हुए
विनम्र हरियाली से ढँके, पर भीतर ठोठ कठैठ खड़े हो।
शब्दार्थ-
छीजता- नष्ट होता
ऋतु- मौसम
मेघ- बादल
उमड़ता- जमना, घना होना
पसीजना- दया भाव उमड़ना
संतुलित- समान भाव वाला
धीर- शांत स्वभाव वाला
विनम्र- विनीत
भीतर- अंदर
ठोठ- ठेठ, निरा, अविकृत
कठैठ– सख्त, मजबूत
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि पेड़ की तुलना प्रकृति के बदलावों से करते हुए बताता है कि समय कैसे बदलता रहता है, लेकिन पेड़ फिर भी अपनी जगह पर टिके रहता है।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहता है कि सूरज हर दिन उगता और डूबता है, चाँद कभी पूरा होता है तो कभी घटता है। मौसम भी बदलते रहते हैं, कभी गर्मी, कभी सर्दी, कभी बारिश। बादल कभी उमड़कर आकाश में भर जाते हैं और फिर बरसकर खाली हो जाते हैं। लेकिन इन सभी बदलावों के बीच भी पेड़ शांत, स्थिर और धैर्य के साथ खड़ा रहता है। वह कुछ भी होने पर शिकायत नहीं करता, न डगमगाता है। वह विनम्रता से हरी पत्तियों में ढका रहता है, पर अंदर से वह बहुत मजबूत और कठोर है।

पाठ
काँपा पेड़, मर्मरित पत्तियाँ
बोली मानी, नहीं, नहीं, नहीं, झूठा
श्रेय मुझे मत दो !
मैं तो बार-बार झुकता, गिरता, उखड़ता
या कि सूखा ठूंठ हो के टूट जाता,
शब्दार्थ-
काँपा- हिला
मर्मरित- मर्मर ध्वनि करता हुआ
श्रेय- यश
ठूंठ- पेड़ का बचा हुआ धड़
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि की बातें सुनकर पेड़ कहता है कि जैसा आप समझ रहे हैं वैसा नहीं है। इन पंक्तियों में पेड़ वास्तविकता को समझाने का प्रयास कर रहा है।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि कहता है कि उसकी बात सुनकर पेड़ हल्का-सा काँप गया और उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई आवाज़ करने लगीं, जैसे वे बोल रही हों। पेड़ कहता है कि जैसा आप सोच रहे हैं वैसा नहीं है, यह सब झूठ है। मुझे इतना श्रेय मत दो। तुम मुझे जितना बड़ा और मजबूत समझ रहे हो, मैं वैसा नहीं हूँ।
पेड़ आगे कहता है कि अगर परिस्थितियाँ बहुत कठोर होतीं तो वह कई बार झुक जाता, गिर जाता या जड़ सहित उखड़ जाता। कभी-कभी तो वह सूखकर एक ठूँठ बन जाता और टूट जाता। यानी, पेड़ स्वीकार करता है कि उसकी मजबूती उसकी अपनी नहीं है और वह भी कमजोर पड़ सकता है।
पाठ
श्रेय है तो मेरे पैरों-तले इस मिट्टी को
जिसमें न जाने कहाँ मेरी जड़ें खोयी हैं:
ऊपर उठा हूँ उतना ही आश में
जितना कि मेरी जड़ें नीचे दूर धरती में समायी हैं।
शब्दार्थ-
तले- नीचे वाले भाग में
आश- उम्मीद
समाना- भरना
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में पेड़ कवि की सोच को गलत बताता है कि श्रेय मुझे मत दीजिये। असल श्रेय तो मिट्टी का है, जिसके कारण में इतनी दृढ़ता से खड़ा हुआ हूँ।
व्याख्या- इन पंक्तियों में पेड़ स्वयं कवि से कहता है कि अगर किसी को श्रेय देना है तो वह मुझे नहीं, बल्कि इस मिट्टी को मिलना चाहिए, क्योंकि मेरी जड़ें इसी मिट्टी में कहीं गहराई तक फैली हुई हैं। यह मिट्टी ही मुझे मजबूती, पोषण और सहारा देती है।
पेड़ आगे कहता है कि मैं जितना आसमान की ओर ऊपर उठा हूँ, उतना ही मेरी जड़ें धरती की ओर नीचे गई हैं। इसका मतलब है कि मेरी ऊँचाई और मजबूती मेरी जड़ों की गहराई, मिट्टी के सहारे पर आधारित है।
पाठ
श्रेय कुछ मेरा नहीं, जो है इस नामहीन मिट्टी का।
और हाँ, इन सब उगने-डूबने, भरने-छीजने,
बदलने, गलने, पसीने,
बनने – मिटने वालों का भी:
शतियों से मैंने बस एक सीख पायी है:
जो मरण-धर्मा हैं वे ही जीवनदायी हैं।”
शब्दार्थ-
नामहीन– नाम रहित
छीजना– नष्ट होना
शतियों– सदियों, सौ का समूह
सीख- शिक्षा
मरण– मृत्यु
मरण-धर्मा- मरने वाला
जीवनदायी- जीवन देने वाला
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में पेड़ अपनी विनम्रता व्यक्त करते हुए कवि को बताता है कि उसकी शक्ति, उसकी उपलब्धि सिर्फ उसकी नहीं है। इसका श्रेय किसी और को जाता है।
व्याख्या- इन पंक्तियों में पेड़ कहता है कि उसकी कोई भी सफलता या मजबूती उसकी अपनी नहीं है। असली श्रेय उस मिट्टी का है जो बिना नाम की है, साधारण है, लेकिन उसे पोषण और सहारा देती है। मिट्टी, हवा, पानी, सूर्य और चंद्रमा जैसे प्राकृतिक तत्वों ने उसे बनाया है और जीवित रखा है।
पेड़ यह भी कहता है कि सिर्फ मिट्टी ही नहीं, बल्कि वह सब चीजें जो प्रकृति में पैदा होती हैं और फिर खत्म हो जाती हैं, जैसे मौसमों के बदलाव, बादलों का आना और बरसना, चाँद का बढ़ना-घटना। इन सबने उसे बहुत कुछ सिखाया है। जीवन में मिली उपलब्धियाँ सिर्फ हमारी नहीं होतीं, कई चीज़ों और लोगों का योगदान होता है। अंत में पेड़ कहता है कि सदियों के अनुभव से उसने एक बड़ी सीख प्राप्त की है। जो नष्ट होते हैं, वही नया जीवन पैदा करते हैं। प्रकृति से सीख मिलती है कि जो बदलता है, मिटता है, वही आगे जीवन का आधार बनता है।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘मैंने कहा, पेड़’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। प्रस्तुत पाठ में सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ जी ने एक पेड़ के माध्यम से मनुष्य को विनम्रता, धैर्य, संतुलन और त्याग जैसे महत्वपूर्ण जीवन मूल्यों को समझाने का प्रयास किया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।