झाँसी की रानी की समाधि पर पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 4 “Jahnsi Ki Rani Ki Samadhi Par” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
झाँसी की रानी की समाधि पर सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 4 Jahnsi Ki Rani Ki Samadhi Par Summary with detailed explanation of the lesson “Jahnsi Ki Rani Ki Samadhi Par” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 4 झाँसी की रानी की समाधि पर पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 झाँसी की रानी की समाधि पर पाठ के बारे में जानते हैं।
Jahnsi Ki Rani Ki Samadhi Par (झाँसी की रानी की समाधि पर)
सुभद्राकुमारी चौहान
प्रस्तुत कविता में झाँसी की रानी की वीरगाथा का वर्णन किया गया है। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की अमर सेनानी के रूप में उन्होंने अंग्रेजी सेना के साथ साहसपूर्वक मुकाबला करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। कवयित्री को रानी की समाधि अति प्रिय है और उन्होंने स्नेह और श्रद्धा के साथ रानी को याद किया है। कवयित्री मानती है कि वीरांगना की समाधि में उनकी स्मृतियाँ समाई हुई हैं जो हमें सदा स्वतंत्रता के लिए प्रेरणा देती रहेंगी।
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‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ नामक कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की वीरता को याद किया है। कवयित्री मानती है कि झाँसी की रानी की समाधि में राख की एक ढेरी ऐसी छिपी हुई है जिसने स्वयं जलकर स्वतंत्रता की अलौकिक आरती फेरी थी। यह समाधि उनके युद्ध क्षेत्र का अंतिम स्थान है। इसी समाधि के आस-पास उनकी मृत्यु हुई थी। उन्होंने शत्रुओं के वार पर वार अपने अंतिम समय तक सहन किए थे और वे शत्रुओं से एक वीरांगना के समान लड़ी थीं। उन्होंने अपने आप को स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अर्पित कर दिया और सदा के लिए अमर हो गई।युद्ध क्षेत्र में अपना बलिदान देने से किसी भी वीर योद्धा का मान बढ़ जाता है, उसका आदर-सत्कार उसी प्रकार कीमती हो जाता है जैसे सोने की भस्म, सोने से भी अधिक कीमती होती है। इसी वजह से कवयित्री को अब रानी से भी अधिक रानी की यह समाधि प्यारी है क्योंकि उस समाधि में स्वतंत्रता प्राप्त करने की आशा रूपी चिंगारी छिपी हुई है। संसार में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि से भी सुन्दर अनेक समाधियाँ बनी हुई हैं। परन्तु उन समाधियों पर आधी रात में क्षुद्र जन्तु गाते रहते हैं अर्थात् गीदड़, झींगुर, छिपकली आदि तुच्छ जन्तु उन समाधियों पर निवास करते हैं। परन्तु कवियों की अमर वाणी में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि की कभी न समाप्त होने वाली कहानी गायी जाती है। कवयित्री कहती है कि हमने बुंदेलखंड के यशोगान करने वालों के मुख से यह कहानी सुनी है कि वह झाँसी वाली रानी खूब वीरता के साथ दुश्मनों से लड़ी थी। रानी लक्ष्मीबाई की यह समाधि, लंबे समय तक बनी रहने वाली समाधि है। यह समाधि वीरता के साथ लड़ने वाली लक्ष्मीबाई की अंतिम युद्ध क्षेत्र की स्थली रही है।
झाँसी की रानी की समाधि पर पाठ व्याख्या Jahnsi Ki Rani Ki Samadhi Par Explanation

1 –
इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी।
जलकर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी।।
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की।
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की।।
शब्दार्थ –
समाधि – चिता पर बनाया जाने वाला एक स्मारक
दिव्य – अलौकिक
लघु – छोटी-सी
अंतिम – आखिरी
लीला-स्थली – कार्य करने का स्थान
मरदानी – वह स्त्री जो वीरतापूर्ण कार्य करे
व्याख्या – प्रस्तुत काव्यांश सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ नामक कविता से लिया गया है। इसमें कवयित्री ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की वीरता को याद किया है। कवयित्री मानती है कि झाँसी की रानी की समाधि में राख की एक ढेरी छिपी हुई है। उस राख की एक ढेरी ने स्वयं जलकर स्वतंत्रता की अलौकिक आरती फेरी थी। यह समाधि, जो छोटी-सी समाधि है, वह झाँसी की रानी की समाधि है। यह उनके युद्ध क्षेत्र का अंतिम स्थान है, यह समाधि उस वीरता पूर्ण कार्य करने वाली लक्ष्मीबाई की है।
2 –
यहीं कहीं पर बिखर गई वह भग्न विजय-माला-सी।
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी।।
सहे वार पर वार अन्त तक लड़ी वीर बाला-सी।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर चमक उठी ज्वाला-सी।।
शब्दार्थ –
भग्न – टूटी हुई
विजय-माला – जीत की माला
फूल – अस्थियाँ
संचित – एकत्र किए हुए, जमा
स्मृति – याद
बाला – युवती
आहुति – बलि, बलिदान करना
ज्वाला – आग की लपट
व्याख्या – प्रस्तुत काव्यांश सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ से लिया गया है। झाँसी की रानी के बलिदान को याद करते हुए कवयित्री कहती है कि झाँसी की रानी की समाधि के आस-पास ही कहीं वे एक टूटी हुई विजय की माला के समान बिखर गई थी। कहने का अभिप्राय यह है कि जहाँ उनकी समाधि है वहीं आस-पास उनकी मृत्यु हुई थी। उनके फूल अर्थात उनकी अस्थियाँ उनकी समाधि में ही एकत्र करके रखी गई हैं। यह समाधि उनकी याद की स्थली है। उन्होंने शत्रुओं के वार पर वार अपने अंतिम समय तक सहन किए थे और वे शत्रुओं से एक वीरांगना के समान लड़ी थीं। वे यज्ञ के समान स्वतंत्रता संग्राम में किसी आहुति के समान गिर कर चिता पर चढ़ गईं और आग की लपटों में एक ज्वाला के समान चमक उठीं। कहने का आशय यह है कि उन्होंने अपने आप को स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अर्पित कर दिया और सदा के लिए अमर हो गई।
3 –
बढ़ जाता है मान वीर का रण में बलि होने से।
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से।।
रानी से भी अधिक हमें अब, यह समाधि है प्यारी।
यहाँ निहित है स्वतन्त्रता की, आशा की चिनगारी।।
शब्दार्थ –
मान – सम्मान, आदर
रण – युद्ध
मूल्यवती – कीमती
यथा – जैसे
निहित – छिपी हुई
व्याख्या – प्रस्तुत काव्यांश सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ से लिया गया है। कवयित्री रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान को याद करती हुई कहती है कि युद्ध क्षेत्र में अपना बलिदान देने से किसी भी वीर योद्धा का मान बढ़ जाता है, उसका आदर-सत्कार उसी प्रकार कीमती हो जाता है जैसे सोने की भस्म, सोने से भी अधिक कीमती होती है। इसी वजह से कवयित्री को अब रानी से भी अधिक रानी की यह समाधि प्यारी है क्योंकि उस समाधि में स्वतंत्रता प्राप्त करने की आशा रूपी चिंगारी छिपी हुई है।
4 –
इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते।
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते।।
पर कवियों की अमर गिरा में इसकी अमिट कहानी।
स्नेह और श्रद्धा से गाती है वीरों की बानी।।
शब्दार्थ –
जग – संसार
गाथा – कथा, कहानी
निशीथ – आधी रात
क्षुद्र – तुच्छ, छोटे
गिरा – बाणी
अमिट – कभी न मिटने वाली
व्याख्या – प्रस्तुत काव्यांश सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित कविता ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ से लिया गया है। कवयित्री के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई की समाधि से सुंदर समाधियाँ हमें इस संसार में और भी मिलती हैं। अर्थात संसार में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि से भी सुन्दर अनेक समाधियाँ बनी हुई हैं। परन्तु उन समाधियों पर आधी रात में क्षुद्र जन्तु गाते रहते हैं अर्थात् गीदड़, झींगुर, छिपकली आदि तुच्छ जन्तु उन समाधियों पर निवास करते हैं। परन्तु कवियों की अमर वाणी में रानी लक्ष्मीबाई की समाधि की कभी न समाप्त होने वाली कहानी गायी जाती है, क्योंकि रानी की समाधि के प्रति उनमें श्रद्धाभाव है। इस समाधि की गाथा को वीर अपने स्वर में अत्यंत श्रद्धा और स्नेहपूर्वक गाते हैं।
5 –
बुंदेले हरबोलों के मुख, हमने सुनी कहानी।
खूब लड़ी मरदानी वह भी झांसी वाली रानी।।
यह समाधि यह चिर समाधि है, झाँसी की रानी की।
अन्तिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की।
शब्दार्थ –
बुंदेले – बुंदेलखंड के
हर बोलों – बुंदेलखंड की एक जाति जो राजा-महाराजाओं का यशोगान करती थी
चिर – सदा रहने वाली, स्थाई
व्याख्या – प्रस्तुत काव्यांश सुभद्राकुमारी चौहान द्वारा रचित कविता ‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ से ली गई हैं। कवयित्री कहती है कि हमने बुंदेलखंड के यशोगान करने वालों के मुख से यह कहानी सुनी है कि वह झाँसी वाली रानी खूब वीरता के साथ दुश्मनों से लड़ी थी। रानी लक्ष्मीबाई की यह समाधि, लंबे समय तक बनी रहने वाली समाधि है। यह समाधि वीरता के साथ लड़ने वाली लक्ष्मीबाई की अंतिम युद्ध क्षेत्र की स्थली रही है।
Conclusion
‘झाँसी की रानी की समाधि पर’ नामक कविता में सुभद्रा कुमारी चौहान ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की वीरता को याद किया है। उन्होंने अंग्रेजी सेना के साथ साहसपूर्वक मुकाबला करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 4 ‘झासी की रानी की समाधि पर’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।