एक अंतहीन चक्रव्यूह पाठ सार

PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 15 “Ek Anthin Chakravyuh” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

एक अंतहीन चक्रव्यूह सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 15 Ek Anthin Chakravyuh Summary with detailed explanation of the lesson “Ek Anthin Chakravyuh” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary

इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड  कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 15 एक अंतहीन चक्रव्यूह पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 एक अंतहीन चक्रव्यूह पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Ek Anthin Chakravyuh (एक अंतहीन चक्रव्यूह)

(डॉ० यतीश अग्रवाल)

 

‘एक अंतहीन चक्रव्यूह’ एक प्रभावशाली निबंध है, जिसमें डॉ० यतीश अग्रवाल ने समाज में तेजी से फैल रही नशे की लत की गंभीर समस्या को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यह निबंध विशेष रूप से युवाओं को चेतावनी देता है कि नशा किस प्रकार धीरे-धीरे व्यक्ति को अपने जाल में फँसाकर उसका शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन नष्ट कर देता है। लेखक नशे की शुरुआत, उसके दुष्परिणाम और उससे मुक्ति के उपाय बताते हुए नशों से दूर रहने का संदेश देता है।

 

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एक अंतहीन चक्रव्यूह पाठ सार  Ek Anthin Chakravyuh Summary

यह निबंध ‘एक अंतहीन चक्रव्यूह’ आज के समय की एक बहुत गंभीर समस्या पर आधारित है, जो है ‘नशे की लत’। लेखक बहुत सरल शब्दों में बताता है कि नशा कैसे धीरे-धीरे आदमी के जीवन को अंधकार में धकेल देता है। शुरू में मनुष्य जिज्ञासा और प्रयोग की भावना से नशे की दुनिया में प्रवेश करता है। बहुत पुराने समय से ही आदमी ने पेड़-पौधों से मिलने वाले नशीले पदार्थों का प्रयोग करना शुरू कर दिया था। पहले यह प्रयोग सीमित था, लेकिन समय के साथ-साथ नशा समाज में फैलता चला गया। आज बच्चे, युवक, छात्र, मजदूर, दुकानदार, कलाकार, बेरोजगार लगभग हर वर्ग के लोग किसी न किसी रूप में नशे की चपेट में हैं।

लेखक बताता है कि अधिकतर लोग नशे की शुरुआत मज़ाक, मनोरंजन या फैशन के नाम पर करते हैं। कुछ लोग दुख, तनाव, असफलता या अकेलेपन से बचने के लिए नशे का सहारा लेते हैं। शुरू में लगता है कि नशा थोड़ी राहत देता है, लेकिन यही आदत धीरे-धीरे व्यक्ति को अपना गुलाम बना लेती है। आदमी को बार-बार नशे की ज़रूरत पड़ने लगती है और वह एक ऐसे चक्रव्यूह में फँस जाता है, जहाँ से बाहर निकलना बहुत कठिन हो जाता है। पहले नशा केवल मन की आदत बनता है, लेकिन बाद में शरीर भी उसका आदी हो जाता है। नशा न मिलने पर व्यक्ति बेचैन हो जाता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और उसकी हालत खराब होने लगती है।

इस निबंध में लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि कुछ लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि नशा करने से सोचने-समझने की शक्ति या रचनात्मकता बढ़ती है, जबकि सच इसके बिल्कुल उलटा है। नशा आदमी की बुद्धि, स्मरण-शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर देता है। कई विद्यार्थी परीक्षा के समय ध्यान बढ़ाने के लिए नशीली दवाओं का सेवन करते हैं, लेकिन इससे उनका मन और भी भटक जाता है और स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। धीरे-धीरे नशा आदमी के व्यक्तित्व को खोखला बना देता है।

नशे का असर केवल मन पर ही नहीं, शरीर पर भी बहुत बुरा पड़ता है। नशा करने वाले व्यक्ति की भूख कम हो जाती है, शरीर कमजोर हो जाता है और वह जल्दी बीमार पड़ने लगता है। फेफड़े, लीवर और अन्य अंग खराब हो जाते हैं। सिगरेट, चिलम और इंजेक्शन के जरिए नशा करने वालों को टीबी, एड्स और अन्य गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। शरीर में दर्द, उलटी, थकान और आलस्य हमेशा बने रहते हैं। व्यक्ति साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखता और उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

नशा व्यक्ति के पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी पूरी तरह नष्ट कर देता है। नशे की वजह से घर में झगड़े बढ़ते हैं, माता-पिता, पति-पत्नी और बच्चों के बीच प्रेम और विश्वास खत्म हो जाता है। नौकरी छूट जाती है, पैसे की कमी हो जाती है और मित्र दूर हो जाते हैं। नशे की जरूरत पूरी करने के लिए व्यक्ति चोरी, झूठ और अपराध तक करने लगता है। इस तरह वह और भी गहरे दलदल में फँसता चला जाता है। कई बार नशा व्यक्ति को आत्महत्या जैसे खतरनाक रास्ते पर भी ले जाता है।

लेखक यह भी बताता है कि नशे से छुटकारा पाना आसान नहीं है। जब नशा छोड़ने की कोशिश की जाती है तो शरीर और मन दोनों में बहुत बेचैनी होती है। ऐसे समय में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की मदद जरूरी होती है। इलाज के लिए अस्पताल, दवाइयाँ और मानसिक सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। इलाज के बाद भी व्यक्ति को परिवार और समाज के सहयोग की जरूरत होती है, ताकि वह फिर से एक सामान्य जीवन जी सके।

अंत में लेखक सभी को सावधान करता है कि सबसे अच्छा उपाय यही है कि नशे से पूरी तरह दूर रहा जाए। नशे के साथ प्रयोग करना या नशा करने वालों की संगत में रहना बहुत खतरनाक है। एक बार इस अंतहीन चक्रव्यूह में फँसने के बाद बाहर निकलना बहुत कठिन हो जाता है। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे समझदारी से काम लें, अपने जीवन को मूल्यवान समझें और नशे से दूर रहकर एक स्वस्थ, उज्ज्वल और सार्थक जीवन जिएँ।

एक अंतहीन चक्रव्यूह पाठ व्याख्या Ek Anthin Chakravyuh Lesson Explanation

पाठधरती पर जीवन का अंकुर फूटते ही आदमी तरह-तरह के प्रयोग करने लगा था। नशे की मायावी दुनिया से उसका प्रथम परिचय उन्हीं दिनों हुआ। सहस्रों वर्ष पहले धरती पर पग धरते. ही उसने कौतूहलवश अपने आसपास उग रही वनस्पतियों के साथ न जाने कितने ही खेल खेलें। उसे कुछ वनस्पतियों में मन को बहलाने और रंगने के गुण दिखे। समय की धारा में वह निर्बुद्धि उनके चक्रव्यूह में ऐसा फैसा कि उसे सुध ही न रही और वह इन का बंदी बन गया। सच, मादक पदार्थों के आकाशकुसुम हैं हीं ऐसे कि कोई कितना ही छटपटाए, इस चक्रव्यूह से बचकर निकल पाना बहुत मुश्किल है। नशे के दलदल भरे चक्रव्यूह में फँसा आदमी तन-मन-धन अपना सब कुछ ही लुटा देता है। सभ्यता का सूर्य उगने से बहुत पहले ही आदमी ने पेड़-पौधों से नशीले पदार्थ पाकर उनका रसास्वादन शुरू कर दिया था। पुरातात्विक उत्खननों से पता चला है कि पाषाण युग में भी अफीम का सेवन हुआ करता था। भाँग, गांजा और चरस का इतिहास भी हजारों साल पुराना है। भारत, मिस्त्र, चीन और तुर्की में 3,000 वर्ष ईसा पूर्व से इनके इस्तेमाल के सुस्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। उत्तरी और केंद्रीय अमेरिका के कबीलों ने मैक्सीको में उगने वाले नशीले नागफनी और दक्षिण अमेरिकी आदिवासियों ने कोकेन का सदियों से नशा किया है।

शब्दार्थ-
अंकुर फूटना- आरंभ होना, शुरुआत होना
प्रयोग आज़माना, परीक्षण करना
मायावी- भ्रम पैदा करने वाली, आकर्षक
प्रथम परिचय पहली बार जान-पहचान
सहस्रों हजारों
पग- कदम
कौतूहलवश- उत्सुकता के कारण
वनस्पतियाँ पेड़-पौधे
मन को बहलाना– मन को खुश करना
समय की धारा समय का प्रवाह
निर्बुद्धि बिना समझे, मूर्खतापूर्ण ढंग से
चक्रव्यूह- चक्र के रूप में सेना की स्थापना
टिप्पणी: युद्ध में एक ऐसी मोर्चाबंदी जिसके अंदर फँसने के बाद उसमें से फिर बाहर निकलना असंभव हो जाता है, नशे की लत पड़ने पर भी यही स्थिति होती है कि व्यक्ति फिर नशे के दलदल से बाहर नहीं पाता।
सुध न रहना होश न रहना
बंदी बन जाना गुलाम हो जाना
मादक पदार्थ नशीले पदार्थ
आकाशकुसुम बहुत आकर्षक लेकिन भ्रमित करने वाली वस्तु
छटपटाना- बेचैन होना
दलदल कीचड़, ऐसी स्थिति जिससे निकलना कठिन हो
सभ्यता- सभ्य होने का भाव।
सूर्य- सूरज
रसास्वादन स्वाद लेना
पुरातात्विक पुरातत्व (प्राचीन वस्तुओं की खोज एवं अध्ययन) से सम्बन्धित
उत्खनन- जमीन से खोदकर निकालना, खुदाई
पाषाण- पत्थर
सेवन- उपयोग करना, खाना-पीना
सुस्पष्ट उल्लेख स्पष्ट विवरण
कबीले आदिवासी समूह
नागफनी साँप के फन के आकार का गूदेदार पौधा
आदिवासी- मूल निवासी लोग
कोकेन- कोका की पत्तियों से तैयार किया गया द्रव्य, जिसे लगाने से अंग सुन्न हो जाता है।

व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक यह बता रहा है कि जब से धरती पर मानव जीवन की शुरुआत हुई, तभी से मनुष्य नए-नए प्रयोग करने लगा। उसी समय उसका परिचय नशे की आकर्षक और भ्रम पैदा करने वाली दुनिया से हो गया। हजारों वर्ष पहले मनुष्य ने जिज्ञासा के कारण अपने आसपास उगने वाले पेड़-पौधों को आज़माना शुरू किया। कुछ वनस्पतियों में उसे मन को आनंद देने और बहलाने वाले गुण दिखाई दिए। धीरे-धीरे वह इनके प्रभाव में इतना उलझ गया कि बिना समझे-सोचे इनके जाल में फँसता चला गया और इनका गुलाम बन गया।
लेखक कहता है कि नशीले पदार्थ बहुत लुभावने होते हैं। एक बार आदमी इनके चक्रव्यूह में फँस जाए तो चाहे जितनी कोशिश करे, बाहर निकलना आसान नहीं होता। नशे के इस दलदल में फँसा व्यक्ति अपना शरीर, मन और धन सब कुछ नष्ट कर देता है। आगे लेखक ऐतिहासिक उदाहरण देकर बताता है कि सभ्यता के विकसित होने से बहुत पहले ही मनुष्य ने पेड़-पौधों से मिलने वाले नशीले पदार्थों का सेवन शुरू कर दिया था। पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि पाषाण युग में भी अफीम का प्रयोग होता था। भाँग, गांजा और चरस का इतिहास भी हजारों वर्ष पुराना है। भारत, मिस्र, चीन और तुर्की में ईसा से तीन हजार वर्ष पहले इनका उपयोग किया जाता था। इसी तरह उत्तरी और मध्य अमेरिका में रहने वाले कबीले मैक्सिको में उगने वाले एक विशेष प्रकार के नशीले नागफनी (कैक्टस) का सेवन करते थे। इसी तरह दक्षिण अमेरिका के आदिवासी लोग कोका पौधे से बनने वाले कोकेन का उपयोग सदियों से करते आ रहे हैं। 

 

पाठ– 19वीं सदी के उत्तर्शद्ध तक मन की तार-तरंगों को रागमय बनाने के ये भ्रामक प्रयास आबादी के छोटे- से हिस्से तक सीमित थे। जीवन की सच्चाइयों से मुँह मोड़ने के लिए थोड़े – से लोग नशे की भूल-भुलैया में खो जाया करते थे। जैसे-जैसे जीवन का रूप बदला, तौर-तरीके और मूल्य बदले, चिलम का धुआँ समाज की रग-रग में बढ़ता-फैलता गया। आज नशा करनेवालों में हर तबके और हर उम्र के लोग – हाई स्कूल और कॉलेज के छात्र-छात्राएँ, पढ़ाई बीच में छोड़ देनेवाले किशोर और युवा कलाकार, अभिनेता-अभिनेत्रियाँ, छोटे-बड़े दुकानदार, दफ्तर में कलम घिसते क्लर्क, छोटी-बड़ी फैक्टरियों में काम करते मजदूर, रिक्शा-ठेला खींचने वाले, तिपहिया स्कूटर और टैक्सी-चालक, पान-सिगरेट बेचनेवाले, और बेरोजगार-सभी इस भूल-भुलैया में सम्मिलित हैं। कोई गम ग़लत करने, तो कोई शून्य, स्नेहरिक्त, नीरस जीवन में रस लाने के लिए, कोई उत्सुकतावश तो कोई फैशनेबल दिखने-कहलाने के लिए नशे के नरक में भैंसता जा रहा है।

मोटे तौर पर आदमी की नशे की निर्भरता दो तरह की होती है। पहली वह, जिसमें नशा न मिलने पर मन बेचैन होने लगता है, पर शारीरिक लक्षण नहीं उभरते। इसे मनोवैज्ञानिक निर्भरता (साइकोलॉजिकल डिपेंडेंस) कहते हैं। कुछ नशों में मन के बाद शरीर भी नशे का इतना गुलाम हो जाता है कि अगली खुराक न मिलने पर छटपटाने लगता है। धीरे-धीरे खुराक की मात्रा भी बढ़ती जाती है। यह दूसरी अवस्था शारीरिक निर्भरता (फिजिकल डिपेंडेंस) के दरजे में आती है। इसे ही व्यसन या ड्रग एडिक्शन भी कहते हैं।

शब्दार्थ-
सदी- शताब्दी, सौ वर्ष की अवधि
उत्तरार्द्ध- पिछला आधा भाग
तार-तरंगें- मन की भावनाएँ और विचार
रागमय आनंदपूर्ण, सुखद
भ्रामक भ्रम उत्पन्न करने वाला, बहलाने वाला
आबादी जनसंख्या
सीमित- सीमाबद्ध
भूल-भुलैया- उलझन भरा रास्ता
तौर-तरीके जीवन जीने के ढंग
चिलम- मिट्टी की बनी हुई नली जिस में तंबाकू जलाकर पीते हैं।
मूल्य आदर्श, मान्यताएँ
रग-रग में फैलना- पूरी तरह फैल जाना
तबका- वर्ग
किशोर- कम उम्र के लड़के-लड़कियाँ
कलम घिसना- दफ्तर में कागज़ी काम करना
सम्मिलित शामिल
ग़म ग़लत करना- दुःख भूलने के लिए नशा करना
शून्य- खालीपन
स्नेहरिक्त- स्नेह से रहित
नीरस- उबाऊ, बिना आनंद का
उत्सुकतावश- जिज्ञासा के कारण
फैशनेबल- आधुनिक दिखने वाला
नरक अत्यंत कष्टदायक स्थिति
भैंसना फँसना, डूब जाना
मोटे तौर पर- सामान्य रूप से
निर्भरता आदत, आश्रित होना
बेचैन अशांत
शारीरिक लक्षण- शरीर में दिखाई देने वाले संकेत
मनोवैज्ञानिक निर्भरता- मानसिक आदत
गुलाम हो जाना- पूरी तरह वश में हो जाना
खुराक- मात्रा, डोज
दरजा- स्तर
शारीरिक निर्भरता- शरीर की लत
व्यसन- लत
ड्रग एडिक्शन- नशीले पदार्थ पर शारीरिक मानसिक रूप से निर्भरता

व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक बताता है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक नशे का चलन समाज के बहुत छोटे से वर्ग तक ही सीमित था। उस समय केवल कुछ ही लोग जीवन की कठिनाइयों और सच्चाइयों से बचने के लिए नशे का सहारा लेते थे। नशा तब केवल मन को बहलाने या थोड़ी देर के लिए दुख भुलाने का साधन माना जाता था। लेकिन जैसे-जैसे समय बदला, जीवन की शैली, सोच और सामाजिक मूल्य बदलते गए, वैसे-वैसे नशे का प्रभाव भी समाज में गहराता चला गया। लेखक ने ‘चिलम के धुएँ’ के माध्यम से यह दिखाया है कि नशा धीरे-धीरे पूरे समाज की नस-नस में फैल गया।
आज की स्थिति यह है कि नशा किसी एक वर्ग या उम्र तक सीमित नहीं रहा। इसमें स्कूल और कॉलेज के छात्र, पढ़ाई छोड़ चुके किशोर, युवा कलाकार, अभिनेता-अभिनेत्रियाँ, दुकानदार, दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारी, कारखानों के मजदूर, रिक्शा और टैक्सी चलाने वाले, पान-सिगरेट बेचने वाले और बेरोजगार लोग सभी शामिल हैं। कोई अपने दुख को भुलाने के लिए, कोई सूने और नीरस जीवन में थोड़ी खुशी लाने के लिए, कोई जिज्ञासावश और कोई फैशन या दिखावे के कारण नशे की ओर बढ़ रहा है। इस तरह नशा एक भयानक भूल-भुलैया बन गया है, जिसमें लोग फँसते चले जा रहे हैं।
आगे लेखक नशे की निर्भरता के दो प्रकार समझाता है। पहली स्थिति में व्यक्ति का मन नशे का आदी हो जाता है। जब नशा नहीं मिलता तो मन बेचैन रहता है, लेकिन शरीर पर कोई खास असर नहीं दिखता। इसे मनोवैज्ञानिक निर्भरता कहा जाता है। दूसरी स्थिति अधिक गंभीर होती है, जिसमें मन के साथ-साथ शरीर भी नशे का गुलाम बन जाता है। नशा न मिलने पर व्यक्ति को शारीरिक कष्ट होने लगते हैं और उसे अधिक मात्रा में नशा चाहिए होता है। इस अवस्था को शारीरिक निर्भरता या व्यसन कहा जाता है, जिसे ड्रग एडिक्शन भी कहते हैं।

 

पाठ– नशे की शुरुआत अक्सर किसी दोस्त या साथी के कहे में आकर होती है। यह एक ‘अनुभव’ ही कई बार आगे चलकर व्यसन में तबदील हो जाता है। अवसाद, तनाव, विफलता, हताशा आदि मन को कमजोर बनाने वाली स्थितियाँ भी आदमी को नशे की ओर धकेल सकती हैं। मन का संतुलन खोजता आदमी एक अंतहीन चक्रव्यूह में फँस जाता है।
कुछ इस गलतफहमी का शिकार हो जाते हैं कि नशा कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता बढ़ाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि नशा करने से मननक्षमता क्षीण हो जाती है और व्यक्ति अपना स्वास्थ्य भी गँवा सकता है। कुछ विद्यार्थी परीक्षा के दिनों में यह सोचकर भी नशीली दवाएँ लेने लगते हैं कि इससे उनकी मानसिक एकाग्रता बेहतर बन जाएगी, पर होता उलटा है।
व्यक्तित्व की कुछ खामियाँ भी आदमी को नशे में डुबो सकती हैं। जरा-जरा-सी बात पर चिंता, तनाव, अवसाद और मन में हीन भावना का घर कर जाना नशे की तरफ ले जा सकता है। घर में बड़ों को नशा करते देखकर भी कुछ किशोर और युवा गुमराह हो जाते हैं।
हर नशा मन की दुनिया पर गहरा असर डालता है। ज़्यादातर मादक पदार्थ सुख का भ्रांति-भाव पैदा करते हैं। आदमी पर मदहोशी-सी छा जाती है और मन कुछ सोच नहीं पाता। इसके साथ-साथ हर नशे का अपना एक खास रंग होता है। एल. एस. डी. और पी.सी.पी. नाना प्रकार के भ्रमराक्षस ( इल्यूजन) उत्पन्न करते हैं – रंगों में सुर्खी आ जाती है, खुद का अस्तित्व परिवेश में मिटता लगता है और मन अद्भुत कल्पनाओं की उड़ान भरने लगता है। कैनाबिस लेने के बाद मन प्रमत्त हो उठता है, बेवजह हँसो और रुलाई छूटने लगती है और वास्तविकता से नाता टूट जाता है। कोई चीज़ बड़ी दिखती है तो कोई छोटी, सुबह शाम लगती है और शाम सुबह। अपना शरीर ही अपरिचित-सा दिखने लगता है। एंफेटामिन दवाएँ विभ्रम पैदा करती हैं। आदमी दृष्टि-भ्रम और श्रुति-भ्रमों से घिर जाता है। कोकेन के सेवन से कभी यह आभास होता है कि मानो त्वचा के नीचे असंख्य कीड़े रेंगने लगे हैं।

शब्दार्थ-
नशे की शुरुआत नशा करने की पहली अवस्था
साथी- मित्र, संगत करने वाला
अनुभव- तजुर्बा
तबदील हो जाना- बदल जाना
अवसाद- सुस्ती, थकावट, उदासी
तनाव मानसिक दबाव
विफलता- असफलता
हताशा निराशा, दुःख
धकेलना- किसी ओर मजबूर करना
संतुलन मानसिक स्थिरता
अंतहीन- जिसका अंत न हो
गलतफहमी- गलत धारणा
कल्पनाशीलता मन की कल्पना शक्ति
सृजनात्मकता- मौलिकता, रचनात्मक शक्ति
वास्तविकता- सच्चाई
मनन-क्षमता- सोचने-समझने की शक्ति
क्षीण- कमजोर
गँवा देना- खो देना
एकाग्रता ध्यान लगाने की शक्ति
व्यक्तित्व- व्यक्ति के गुण
खामियाँ- कमजोरियाँ, दोष
हीन भावना- अपने को तुच्छ समझने की भावना
घर कर जाना- स्थायी रूप से बस जाना
गुमराह- गलत रास्ते पर पड़ जाना
गहरा असर- तेज प्रभाव
मादक पदार्थ नशा करने वाली वस्तुएँ
भ्रांति- भ्रम, संदेह
मदहोशी- नशे की अवस्था
परिवेश- आसपास का वातावरण
भ्रमराक्षस (इल्यूजन)– दृष्टि या मन का धोखा
सुर्खी- लालिमा
अस्तित्व- होने का बोध
अद्भुत- विचित्र, आश्चर्यजनक
प्रमत्त- अत्यधिक उत्तेजित
वास्तविकता से नाता टूटना– सच से संपर्क समाप्त होना
अपरिचित अनजाना
विभ्रम- संदेह
दृष्टि-भ्रम- आँखों से गलत दिखाई देना
श्रुति-भ्रम- कानों से गलत सुनाई देना
आभास- अनुभव, महसूस होना
रेंगना- धीरे-धीरे चलना

व्याख्या- इस गद्याँश में लेखक नशे की शुरुआत, उसके कारणों और मन पर पड़ने वाले प्रभावों को विस्तार से समझाता है। लेखक बताता है कि अधिकतर लोग नशा अपनी इच्छा से नहीं, बल्कि दोस्तों या साथियों के कहने पर शुरू करते हैं। पहले इसे केवल एक नया अनुभव समझा जाता है, लेकिन यही अनुभव धीरे-धीरे आदत बन जाता है और आगे चलकर व्यसन का रूप ले लेता है। इसके अलावा जीवन में आने वाला अवसाद, तनाव, असफलता, निराशा और हताशा भी व्यक्ति के मन को कमजोर कर देती है। ऐसे समय में मनुष्य मानसिक संतुलन पाने के लिए नशे का सहारा लेता है और इस तरह वह एक ऐसे अंतहीन चक्रव्यूह में फँस जाता है, जहाँ से निकलना बहुत कठिन हो जाता है।
लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि कई लोग इस भ्रम में रहते हैं कि नशा करने से कल्पनाशक्ति और रचनात्मकता बढ़ती है। जबकि सच्चाई यह है कि नशा व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर कर देता है और उसके स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुँचाता है। कुछ विद्यार्थी परीक्षा के समय यह मान लेते हैं कि नशीली दवाएँ लेने से उनकी एकाग्रता बढ़ेगी, लेकिन इसका परिणाम उलटा होता है। उनका ध्यान और भी भटक जाता है और याद रखने की क्षमता घट जाती है।
आगे लेखक बताता है कि व्यक्ति के स्वभाव की कुछ कमज़ोरियाँ भी उसे नशे की ओर ले जाती हैं। छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक चिंता करना, तनाव में रहना, उदासी और मन में हीन भावना रखना नशे की आदत को जन्म दे सकता है। कई बार घर के बड़े लोगों को नशा करते देखकर भी बच्चे और युवा गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं और भ्रमित हो जाते हैं।
लेखक अंत में विभिन्न नशों के मानसिक प्रभावों का वर्णन करता है। हर नशा मन पर गहरा असर डालता है और अधिकतर नशीले पदार्थ झूठे सुख का अनुभव कराते हैं। नशे की हालत में व्यक्ति पर मदहोशी छा जाती है और उसकी सोचने की शक्ति लगभग समाप्त हो जाती है। कुछ नशे भ्रम पैदा करते हैं, जिससे रंग बदलते हुए दिखते हैं, व्यक्ति को अपना अस्तित्व खोता हुआ महसूस होता है और मन अजीब कल्पनाओं में खो जाता है। कुछ नशों के प्रभाव से हँसी या रोना बिना कारण आने लगता है और वास्तविकता से संबंध टूट जाता है। कभी चीजें बड़ी लगती हैं, कभी छोटी, और समय का सही बोध भी नहीं रहता। कुछ नशीले पदार्थ देखने और सुनने में भी भ्रम पैदा करते हैं। कोकेन जैसे नशों से व्यक्ति को ऐसा लगता है मानो उसके शरीर के नीचे कीड़े रेंग रहे हों। इन उदाहरणों से लेखक यह सिद्ध करता है कि नशा मनुष्य के मानसिक संतुलन को पूरी तरह बिगाड़ देता है।

 

पाठ– लगभग सभी नशों का लगातार सेवन मननक्षमता और स्मरणशक्ति को कमजोर बना देता है। रोगी पर आलस्य छाया रहता है और वह पोस्ती हो जाता है। किसी कामकाज में मन नहीं लगता, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। ज़राज़रासी बात पर झूठ बोलने की आदत बन जाती है। पहनावे और व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति लापरवाह हो जाता है। शंकालु भाव हावी होने पर मरनेमारने पर उतारू हो जाता है। नशा करने वाले लोगों में आत्महत्या की दर भी अधिक पाई गई है।
नशीले पदार्थों का सेवन शरीर पर भी कई दुष्प्रभाव डालता है। भूख मर जाती हैं, जिससे शरीर दुर्बल हो जाता है और रोगों से लड़ने के काबिल नहीं रहता। यही कारण है कि नशा करने वालों में तपेदिक, एच.आई.वी. और दूसरे संक्रामक रोग अधिक पाए जाते हैं। मतली, क़ै और शरीर के दर्द भी उन्हें सताते हैं। सिगरेट और चिलम के सहारे नशा करनेवालों के फेफड़े रुग्ण हो जाते हैं। यह लोग बिना फिल्टर की सिगरेट पीते हैं और नशे का पूरा रस लेने के लिए उसका धुआँ देर तक भीतर रोके रखते हैं। इससे वातस्फीति (एंफाइसिमा, दम फूलने का एक रोग) और फेफड़े का कैंसर होने की आशंका कई गुणा बढ़ जाती है। पूरे समूह में एक ही टीके से नस में नशीली दवा लेनेवालों में यकृतशोध ( हेपेटाइटिसबी) और एच.आई.वी. एड्स का खतरा बढ़ जाता है।
मन और तन की ये रुग्णताएँ रोगी के पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी खंडहरों में बदल देती हैं। वह अपनों का प्यार और साथ खो बैठता है और दुनिया में निरपट अकेला हो जाता है। नौकरी छूट जाती है, मित्र और सगेसंबंधी छूट जाते हैं। आर्थिक समस्याएँ दिनोंदिन बढ़ती जाती हैं। इसके बावजूद मन और तन की छटपटाहट अगली खुराक जुटाने के लिए, उससे चोरी, नशीले पदार्थों की बिक्री, तस्करी आदि कुछ भी करवा सकती है जिससे वह फिर और ज्यादा दलदल में फँसता जाता है तथा अपराधी का जीवन जीने के लिए विवश हो जाता है।

शब्दार्थ-
सेवन उपयोग
मनन-क्षमता- सोचने-समझने की शक्ति
स्मरण-शक्ति याद रखने की क्षमता
रोगी- बीमार व्यक्ति
आलस्य- सुस्ती
पोस्ती- नशे में डूबा हुआ, सुस्त
चिड़चिड़ा- जल्दी गुस्सा करने वाला
लापरवाह बेपरवाह, ध्यान न देने वाला
व्यक्तिगत स्वच्छता– निजी साफ-सफाई
शंकालु- संदेह करने वाला
हावी होना- प्रभावी हो जाना
उतारू हो जाना करने को तैयार हो जाना
आत्महत्या- स्वयं को मार लेना
दर- अनुपात, संख्या
नशीले पदार्थ-  नशा करने वाली वस्तुएँ
दुष्प्रभाव- हानिकारक असर
भूख मर जाना- भूख न लगना
दुर्बल- कमजोर
काबिल- सक्षम
तपेदिक क्षय रोग, टी. बी. (Tubercle bacillus)
संक्रामक रोग- फैलने वाले रोग
मतली- मिचली, जी मचलने की अवस्था
क़ै- वमन, उल्टी करना
रुग्ण- बीमार, दूषित
फिल्टर- छानने का यंत्र
रस लेना पूरा असर पाना
वातस्फीति (एंफाइसिमा)- फेफड़ों की बीमारी जिसमें साँस फूलती है
आशंका- डर, संभावना
कई गुणा- कई गुना अधिक
टीका- इंजेक्शन की सुई
नस- शिरा
यकृतशोध (हेपेटाइटिस-बी)– जिगर की सूजन
एड्स- (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम) एक विशेष तरह के वायरस से उत्पन्न एक रोग जिसमें
शरीर की रोग-बचाव प्रणाली बेअसर हो जाती है।
रुग्णताएँ- बीमारियाँ
खंडहर- उजड़ा हुआ स्थान
निरपट- बिल्कुल
सगे-संबंधी- रिश्तेदार
दिनोंदिन- दिन-प्रतिदिन
खुराक- नशे की मात्रा
तस्करी- अवैध व्यापार
दलदल- कीचड़, फँसाने वाली स्थिति
विवश- मजबूर

व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक नशे के मानसिक, शारीरिक तथा सामाजिक दुष्परिणामों को स्पष्ट रूप से समझाता है। लेखक कहता है कि लगभग सभी प्रकार के नशों का लगातार सेवन व्यक्ति की सोचने-समझने की शक्ति और याददाश्त को कमजोर कर देता है। नशे का आदी व्यक्ति हर समय आलसी और सुस्त रहता है। उसे किसी काम में रुचि नहीं रहती और उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर झूठ बोलना उसकी आदत बन जाती है। वह अपने पहनावे और व्यक्तिगत साफ-सफाई पर भी ध्यान नहीं देता। धीरे-धीरे उसके मन में शक और संदेह की भावना घर कर जाती है और वह हिंसक व्यवहार पर भी उतर सकता है। लेखक यह भी बताता है कि नशा करने वाले लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है।
नशीले पदार्थों का प्रभाव शरीर पर भी बहुत घातक होता है। नशे से भूख खत्म हो जाती है, जिससे शरीर कमजोर हो जाता है और बीमारियों से लड़ने की शक्ति घट जाती है। इसी कारण नशा करने वालों में टीबी, एच.आई.वी. और अन्य संक्रामक रोग अधिक देखने को मिलते हैं। उन्हें उलटी, मतली और शरीर में दर्द जैसी समस्याएँ लगातार परेशान करती रहती हैं। सिगरेट और चिलम के माध्यम से नशा करने वालों के फेफड़े बुरी तरह प्रभावित होते हैं। वे बिना फिल्टर की सिगरेट पीते हैं और धुएँ को देर तक अंदर रोकते हैं, जिससे फेफड़ों की बीमारियाँ, सांस फूलने की समस्या और फेफड़ों के कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इंजेक्शन के जरिए नशा करने वालों में एक ही सुई के प्रयोग से हेपेटाइटिस-बी और एच.आई.वी. एड्स जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।
लेखक आगे बताता है कि मन और शरीर की ये बीमारियाँ व्यक्ति के पारिवारिक और सामाजिक जीवन को भी पूरी तरह नष्ट कर देती हैं। नशे का आदी व्यक्ति अपने परिवार का प्रेम और सहयोग खो देता है और समाज में अकेला पड़ जाता है। उसकी नौकरी छूट जाती है, मित्र और रिश्तेदार उससे दूरी बना लेते हैं और आर्थिक समस्याएँ बढ़ती जाती हैं। इसके बावजूद नशे की तीव्र इच्छा उसे अगली खुराक जुटाने के लिए मजबूर कर देती है। वह चोरी, नशीले पदार्थों की बिक्री और तस्करी जैसे अपराध करने लगता है। इस तरह वह और भी गहरे दलदल में फँस जाता है और अपराधपूर्ण जीवन जीने को मजबूर हो जाता है।

 

पाठ – मादक पदार्थों के व्यसन से मुक्ति पाना आसान नहीं होता। शारीरिक आसक्तता उत्पन्न करने वाले नशे समय से अगली खुराक मिलने पर तनमन के भीतर गहरी तड़प पैदा कर देते हैं। ये अवहार लक्षण नशा मिलने के चंद घंटों बाद ही शुरू हो जाते हैं और 10-14 दिन तक कायम रहते हैं। इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए चिकित्सीय मदद की जरूरत पड़ती है।
नशे के चंगुल से मुक्त कराने में मनोरोग विशेषज्ञ विशेष रूप से मदद कर सकते हैं। नशामुक्ति के लिए वे कई प्रकार की चिकित्सीय पद्धतियाँ व्यवहार में लाते हैं। कुछ नशीले पदार्थों से छुटकारा दिलाने के लिए डॉक्टर नशे की खुराक घटाते हुए उसे धीरेधीरे बंद करते हैं, तो कुछ नशों को बंद करने के साथसाथ ऐसी दवाएँ दी जाती हैं, जिनसे तनमन की छटपटाहट नियंत्रण में रहती है। उपचार का यह प्रथम चरण प्रायः दो हफ्ते तक चलता है। इस दौरान रोगी को अस्पताल में भरती करना पड़ सकता है।
मादक पदार्थों के चंगुल से निकलने के बाद उपचार का दूसरा चरण शुरू होता है। इसमें रोगी के मानसिक और सामाजिक पुनर्वास के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। यह पुनर्वास परिवारजनों और प्रियजनों के सच्चे सहयोग से ही पूरा हो सकता है। जब तक रोगी बीते जीवन को भुला ले और उसमें नई शुरुआत करने का संकल्प जागे, यह यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता।
आज देश में बहुत से सरकारी और गैरसरकारी संगठन, अस्पताल, पुलिस और स्वयंसेवी संस्थाएँ नशामुक्ति की सुविधाएँ प्रदान कर रही हैं। किंतु अच्छाई इसी में है कि इस चक्रव्यूह से स्वयं को बिल्कुल आजाद ही रखें। कोई कुछ भी कहे, तो नशों के साथ एक्सपेरिमेंट करना अच्छा है, ऐसी संगत में रहना ठीक है जहाँ लोग उसके चंगुल में कैद हों। कई युवा दूसरों की देखादेखी इस चक्रव्यूह में फँस तो जाते हैं, पर फिर चाह कर भी उसकी क़ैद से छूट नहीं पाते। चारों तरफ अंधियारा गहराता जाता है, जीवन खून की सिसकियों में लिपट जाता है और मृत्यु का साया समीप आता दिखाई देता है।

शब्दार्थ-
मुक्ति पाना- छुटकारा मिलना
आसक्तता- लिप्तता
खुराक- नशे की मात्रा
तड़प- तीव्र बेचैनी
अवहार लक्षण- नशा छोड़ने पर दिखने वाले लक्षण
चंद- कुछ
कायम रहना- बना रहना
चिकित्सीय- चिकित्सा से संबंधित
चंगुल- पकड़
मनोरोग विशेषज्ञ- मानसिक रोगों के डॉक्टर
नशा-मुक्ति- नशे से छुटकारा
चिकित्सीय पद्धतियाँ– इलाज के तरीके
व्यवहार में लाना– लागू करना
छुटकारा दिलाना– मुक्त करना
नियंत्रण में रहना– काबू में रहना
उपचार- इलाज
प्रथम चरण- पहला चरण
प्रायः सामान्यतः
मानसिक- मन से संबंधित
सामाजिक- समाज से जुड़ा
पुनर्वास बीमारी आदि के कारण उजड़े बर्बाद हुए लोगों का उपचार करके उन्हें फिर से बसाना
आवश्यक कदम– जरूरी उपाय
परिवारजन- परिवार के लोग
प्रियजन- अपने लोग
सहयोग- मदद
संकल्प- दृढ़ निश्चय
यज्ञ- यहाँ कठिन और पवित्र कार्य के अर्थ में
सम्पन्न होना पूरा होना
सरकारी / गैर-सरकारी संगठन- सरकार द्वारा / निजी संस्थाएँ
स्वयंसेवी संस्थाएँ- सेवा करने वाली संस्थाएँ
एक्सपेरिमेंट प्रयोग
संगत- साथ, मित्रता
देखादेखी- दूसरों की नकल में
क़ैद- बंधन
अंधियारा- अँधेरा, निराशा
सिसकियाँ- करुण आवाज़ में रोना
साया- छाया, प्रभाव

व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक नशे से छुटकारा पाने की कठिन प्रक्रिया और उससे जुड़ी वास्तविकताओं को स्पष्ट करता है। लेखक कहता है कि मादक पदार्थों की लत से मुक्त होना बिल्कुल आसान नहीं होता, क्योंकि कुछ नशे शरीर को पूरी तरह अपने वश में कर लेते हैं। जब ऐसे नशे समय पर नहीं मिलते, तो व्यक्ति के मन और शरीर में तीव्र बेचैनी और तड़प पैदा हो जाती है। इसे नशा छोड़ने के लक्षण कहा जाता है। ये लक्षण नशा न मिलने के कुछ ही घंटों बाद शुरू हो जाते हैं और लगभग दस से चौदह दिन तक बने रहते हैं। इसलिए इस खतरनाक चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए केवल इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों की मदद भी आवश्यक होती है।
लेखक आगे बताता है कि नशे की लत छुड़ाने में मनोरोग विशेषज्ञों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। वे नशा-मुक्ति के लिए विभिन्न प्रकार की चिकित्सीय विधियाँ अपनाते हैं। कुछ नशों में डॉक्टर धीरे-धीरे नशे की मात्रा कम करते हैं, ताकि शरीर अचानक झटका न झेले। वहीं कुछ मामलों में नशा पूरी तरह बंद कर दिया जाता है और साथ में ऐसी दवाइयाँ दी जाती हैं, जिनसे मन और शरीर की बेचैनी को नियंत्रित किया जा सके। इलाज का यह पहला चरण आमतौर पर दो सप्ताह तक चलता है और कई बार रोगी को इस दौरान अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है।
नशे से शारीरिक रूप से मुक्त होने के बाद उपचार का दूसरा और बहुत महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। इसमें रोगी के मानसिक और सामाजिक पुनर्वास पर ध्यान दिया जाता है। उसे फिर से सामान्य जीवन जीने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाया जाता है और समाज से जोड़ा जाता है। यह प्रक्रिया परिवार और प्रियजनों के सच्चे सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकती। जब तक रोगी अपने पुराने नशेभरे जीवन को भूलकर नई शुरुआत करने का दृढ़ निश्चय नहीं करता, तब तक यह प्रयास सफल नहीं हो सकता।
अंत में लेखक बताता है कि आज देश में कई सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएँ, अस्पताल, पुलिस और स्वयंसेवी संगठन नशामुक्ति की सुविधाएँ प्रदान कर रहे हैं। फिर भी लेखक का स्पष्ट संदेश यह है कि सबसे अच्छा उपाय यही है कि नशे के इस चक्रव्यूह में कभी प्रवेश ही न किया जाए। नशों के साथ प्रयोग करना या नशा करने वालों की संगत में रहना खतरनाक है। कई युवा दूसरों की नकल में नशे की ओर बढ़ जाते हैं और फिर चाहकर भी उससे बाहर नहीं निकल पाते। धीरे-धीरे उनका जीवन अंधकार से भर जाता है और वे मृत्यु की ओर बढ़ने लगते हैं। लेखक इस प्रकार पाठकों को नशे से दूर रहने की सख्त चेतावनी देता है।

 

Conclusion

इस पोस्ट में ‘एक अंतहीन चक्रव्यूह’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। इस पाठ में डॉ० यतीश अग्रवाल ने समाज में तेजी से फैल रही नशे की लत की गंभीर समस्या को सरल भाषा में प्रस्तुत किया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।