माँ का कमरा पाठ सार
PSEB Class 10 Hindi Book Chapter 11 (Part 1) “Maa ka Kamra” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
माँ का कमरा सार – Here is the PSEB Class 10 Hindi Book Chapter 11 (Part 1) Maa ka Kamra Summary with detailed explanation of the lesson “Maa ka Kamra” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 10 हिंदी पुस्तक के पाठ 11 (भाग-1) माँ का कमरा पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से सीबीएसई कक्षा 10 माँ का कमरा पाठ के बारे में जानते हैं।
Maa ka Kamra (माँ का कमरा )
श्याम सुन्दर अग्रवाल
श्याम सुन्दरअग्रवाल द्वारा लिखित लघुकथा ‘माँ का कमरा’ बुज़ुर्गों की स्थिति, उनके प्रति परिवार का व्यवहार और बदलते समाज की मानसिकता को उजागर करती है। इसमें बुज़ुर्ग बसंती की कथा है, जो अपने छोटे-से पुश्तैनी मकान से बेटे के बुलावे पर शहर जाती है। मन में भय और असमंजस है कि बेटे-बहू के पास उसे सम्मान मिलेगा या उपेक्षा। परंतु बेटे द्वारा उसे सजे-धजे कमरे में स्थान देना और प्रेमपूर्वक अपनाना बसंती के मन में नई आशा भर देता है।
यह लघुकथा केवल बुज़ुर्गों के सम्मान की बात नहीं करती, बल्कि यह संदेश भी देती है कि बदलते समय में परिवारिक रिश्तों में स्नेह का भाव ही सुखी जीवन का आधार है।
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माँ का कमरा पाठ सार Maa ka Kamra Summary
‘माँ का कमरा’ एक लघु कथा है जो श्याम सुन्दर अग्रवाल द्वारा लिखित है। कहानी की मुख्य पात्र बसंती एक बुजुर्ग महिला है जो अपने छोटे-से पुश्तैनी मकान में अकेली रहती है। एक दिन उसे अपने बेटे का पत्र मिलता है जिसमें वह माँ को बताता है कि उसे नौकरी में तरक्की मिली है और कंपनी की ओर से बड़ी कोठी रहने के लिए दी गई है। बेटा चाहता है कि उसकी माँ शहर आकर उसके साथ रहे और उसे कोई तकलीफ़ न हो। यह पढ़कर बसंती के मन में तरह-तरह के विचार आते हैं। पड़ोसन रेशमा उसे सावधान करती है और बताती है कि बेटे-बहू के पास रहकर अक्सर बुजुर्गों को सम्मान नहीं मिलता। वह उदाहरण देती है कि कैसे बचनी नाम की औरत अपने बेटे के पास जाकर दुखी हो गई और उसे नौकरों जैसा जीवन बिताना पड़ रहा है। इन बातों से बसंती के मन में डर बैठ जाता है।
अगले दिन बेटा कार लेकर आ जाता है। बेटे की ज़िद के आगे बसंती हार जाती है और सोचती है कि “जो होगा देखा जाएगा।” वह अपना थोड़ा-सा सामान लेकर बेटे के साथ शहर चल देती है। लंबी यात्रा के बाद वे एक बड़ी कोठी पर पहुँचते हैं। बेटा किसी काम से तुरंत बाहर चला जाता है और बसंती को नौकर के हवाले कर देता है। बहू पहले ही नौकरी पर जा चुकी होती है और बच्चे भी स्कूल गए होते हैं। अकेली बसंती कोठी देखने लगती है। उसे तीन सुंदर कमरे दिखाई देते हैं, एक में बढ़िया सोफ़ा सेट था, दूसरा शायद बच्चों का था और तीसरा मेहमानों के लिए। बसंती सोचती है कि उसके लिए तो पिछवाड़े में बने छोटे-से कमरे ही मिलेंगे।
वह नौकरों के लिए बने पिछवाड़े के कमरे भी देख आती है। छोटे होने के बावजूद बसंती सोचती है कि यहाँ भी उसका गुज़ारा हो जाएगा। उसे बस इतना चाहिए कि बेटा-बहू और बच्चे उससे प्यार से बोल लें और समय पर दो वक्त की रोटी मिल जाए। नौकर उसका सामान लेकर बरामदे के पास बने एक कमरे में रख देता है। बसंती जब उस कमरे को देखती है तो आश्चर्यचकित रह जाती है। वह बहुत सुंदर था, उसमें डबल बैड, साथ में गुस्लखाना, टीवी, टेप रिकॉर्डर और कुर्सियाँ भी थीं। उसे वह कमरा स्वर्ग जैसा लगता है। वह मन ही मन सोचती है, काश! कभी उसे भी ऐसे कमरे में रहने का अवसर मिले।
डरते-डरते वह बैड पर लेटती है, पर मन में भय है कि कहीं बहू आकर डाँट न दे कि वह इतने अच्छे कमरे में क्यों सो रही है। इसलिए तुरंत उठ जाती है। शाम को बेटा लौटता है तो बसंती कहती है कि उसका सामान उसके कमरे में रखवा दे। यह सुनकर बेटा हैरान होता है और बताता है कि सामान तो उसके ही कमरे में रखा गया है। यह सुनकर बसंती को विश्वास ही नहीं होता कि इतना सुंदर कमरा उसका है। बेटा कहता है कि जब दीदी आएँगी तो वे भी उसके पास सोएँगी और पोते-पोतियाँ भी उसके साथ रहेंगे। वह टीवी देख सकती है, भजन सुन सकती है और जो भी चीज़ चाहिए, बेझिझक माँग सकती है। इतना कहकर बेटा अपनी माँ को गले लगा लेता है।
यह सुनकर बसंती की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उसकी सारी शंका और डर दूर हो जाते हैं। यह लघुकथा हमें यह संदेश देती है कि बुजुर्गों के साथ स्नेहपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार करना आवश्यक है। जिस प्रकार बेटे ने अपनी माँ को प्यार और सम्मान दिया, उसी तरह समाज में भी बुजुर्गों की देखभाल प्रेम और सम्मान के साथ की जानी चाहिए। कहानी निराशा से आशा की ओर बढ़ने का सुंदर संदेश देती है और यह बताती है कि बदलते समय में परिवार के रिश्तों में सकारात्मक सोच और मानसिकता का विकास आवश्यक है।
माँ का कमरा पाठ व्याख्या Maa ka Kamra Lesson Explanation

पाठ – छोटे-से पुस्तैनी मकान में रह रही बुजुर्ग बसंती को दूर शहर में रहते बेटे का पत्र मिला- माँ मेरी तरक्की हो गई है। कंपनी की ओर से मुझे बहुत बड़ी कोठी मिली है रहने को। अब तो तुम्हें मेरे पास शहर में आकर रहना ही होगा। यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। पड़ोसन रेशमा को पता चला तो वह बोली, “अरी, रहने दे शहर जाने को शहर में बहू-बेटे के पास रहकर बहुत दुर्गति होती है। वह बचनी गई थी न अब पछता रही है, रोती है। नौकरों वाला कमरा दिया है रहने को और नौकरानी की तरह ही रखते हैं न वक्त से रोटी, न चाय कुत्ते से भी बुरी जून है।”
शब्दार्थ-
पुस्तैनी- जो कई पीढ़ियों से चला आ रहा हो
बुजुर्ग- वृद्ध
तरक्की- पदोन्नति
कोठी- बड़ा घर
तकलीफ– कष्ट, परेशानी
पड़ोसन– पड़ोस में रहने वाली महिला
दुर्गति– दुर्दशा
जून- दशा
व्याख्या- प्रस्तुत अंश में बताया गया है कि बसंती नाम की एक बुजुर्ग महिला अपने छोटे-से पुश्तैनी मकान में रहती है। एक दिन उसे अपने बेटे का पत्र मिलता है, जिसमें लिखा होता है कि उसकी नौकरी में तरक्की हो गई है और अब कंपनी ने उसे बड़ी कोठी रहने के लिए दी है। बेटा चाहता है कि उसकी माँ शहर आकर उसके साथ रहे। बेटा पत्र में लिखता है कि आपको यहाँ कोई तकलीफ़ नहीं होगी।
लेकिन जब पड़ोसन रेशमा को यह बात पता चलती है, तो वह समझाती है कि शहर जाकर बेटे-बहू के साथ रहना हमेशा अच्छा नहीं होता। वह एक उदाहरण देती है कि बचनी नाम की औरत भी अपने बेटे-बहू के पास शहर गई थी, लेकिन अब वहाँ दुखी रहती है और रोती रहती है। उसे सिर्फ नौकरों वाला कमरा दिया गया है और वह नौकरानी की तरह काम करती है। उसे समय पर खाना और चाय भी नहीं मिलती, और उसका जीवन कुत्ते से भी बुरा हो गया है।
पाठ – अगले दिन बेटा कार लेकर आ गया। बेटे की जिद्द के आगे बसंती की एक न चली। ‘जो होगा देखा जावेगा’ की सोच के साथ बसंती अपने थोड़े-से सामान के साथ कार में बैठ गई। लंबे सफर के बाद कार एक बड़ी कोठी के सामने जाकर रुकी। “एक जरूरी काम है माँ, मुझे अभी जाना होगा।” कह, , बेटा माँ को नौकर के हवाले कर गया। बहू पहले ही काम पर जा चुकी थी और बच्चे स्कूल । बसंती कोठी देखने लगी। तीन कमरों में डबल बैड लगे थे। एक कमरे में बहुत बढ़िया सोफा-सैट था। एक कमरा बहू-बेटे का होगा, दूसरा बच्चों का और तीसरा मेहमानों के लिए, उसने सोचा।
शब्दार्थ-
सफर- यात्रा
बहू- बेटे की पत्नी
सोफा-सैट– बैठने का आरामदायक फर्नीचर
व्याख्या- इस अंश में बताया गया है कि बसंती का बेटा अगले दिन कार लेकर आता है। वह अपनी माँ को साथ चलने के लिए बहुत मनाता है, तब बसंती साथ चलने को मान जाती है और थोड़े से सामान के साथ में कार में बैठ जाती है और मन ही मन सोचती है कि जो होगा देखा जायेगा।
लंबा सफर तय करने के बाद कार एक बड़ी कोठी के सामने रुकती है। बेटा अपनी माँ से कहता कि मुझे अभी एक जरूरी काम से जाना है, आप नौकर के साथ अंदर चली जाइए। यह कहकर वह माँ को नौकर के भरोसे छोड़ दिया जाता है। बहू पहले ही काम पर जा चुकी थी और बच्चे भी स्कूल गए थे।
बसंती कोठी को ध्यान से देखती है। उसमें तीन कमरे थे जिनमें डबल बैड लगे थे। एक कमरे में सुंदर सोफा-सैट रखा था। बसंती मन ही मन सोचती है कि एक कमरा बेटे-बहू का होगा, दूसरा बच्चों का और तीसरा मेहमानों के लिए रखा होगा। इस प्रकार बसंती के मन में कई प्रकार के विचार चलते हैं।
पाठ – पिछवाड़े में नौकरों के लिए बने कमरे भी वह देख आई। कमरे छोटे थे, पर ठीक थे। उसने सोचा, उसकी गुजर हो जाएगी। बस बहू-बेटा और बच्चे प्यार से बोल लें और दो वक्त की रोटी मिल जाए। उसे और क्या चाहिए। नौकर ने एक बार उसका सामान बरामदे के साथ वाले कमरे में टिका दिया। कमरा क्या था, स्वर्ग लगता था डबल बैड बिछा था, गुस्लखाना भी साथ था। टी.वी. भी पड़ा था और टेपरिकार्डर भी दो कुर्सियाँ भी पड़ी थीं। बसंती सोचने लगी- काश! उसे भी कभी ऐसे कमरे में रहने का मौका मिलता।
शब्दार्थ-
पिछवाड़ा- मकान का पिछला हिस्सा
गुज़र हो जाएगी- जीवन कट जाएगा
वक्त- समय
बरामदा – मकान का खुला या छतदार हिस्सा, आँगन से लगा हुआ भाग
टिका देना- रख देना, जमा करना
गुस्लखाना- स्नानघर
टेपरिकार्डर- गाने सुनने की मशीन
काश– अगर ऐसा हो पाता, इच्छा व्यक्त करने का शब्द
व्याख्या- प्रस्तुत अंश में बताया गया है कि कैसे बसंती नई जगह को देखकर जिज्ञासु होती है। वह कोठी के पीछे बने नौकरों के कमरे भी देख आती है। कमरे छोटे थे लेकिन उसके हिसाब से सही थे। वह मन ही मन कहती है कि वह यहाँ रह लेगी, गुजारा हो ही जायेगा। वह आगे कहती है कि बस बहु-बेटा खाना-पीना दे दें और बच्चे प्यार से बात कर लें, बस इतना ही काफी है। नौकर बसंती का सामान बरामदे के साथ वाले कमरे में लगा देता है। बसंती को वह कमरा स्वर्ग से कम नहीं लग रहा था। उसमें डबल बैड था, स्नानघर भी उसी के अंदर था। वहाँ का सामान देखकर वह चौंक जाती है कि टी.वी. और टेपरिकार्डर भी रखा है और साथ ही दो कुर्सियाँ भी लगी हैं। यह सब उसकी कल्पना से बाहर था। वह सोचती है कि अगर ऐसा कमरा उसे भी मिल जाता तो कितना अच्छा होता।
पाठ – वह डरती डरती बैड पर लेट गई। बहुत नर्म गद्दे थे। उसे एक लोककथा की नौकरानी की तरह नींद ही न आ जाए और बहू आकर उसे डाँटे, सोचकर वह उठ खड़ी हुई। शाम को जब बेटा घर आया तो बसंती बोली, “बेटा, मेरा सामान मेरे कमरे में रखवा देता, ” बेटा हैरान हुआ, “माँ तेरा सामान तेरे कमरे में ही तो रखा है नौकर ने बसंती आश्चर्यचकित रह गई, “मेरा कमरा ! यह मेरा कमरा !! डबल-बैंड वाला…..!” “हाँ माँ, जब दीदी आती है तो तेरे पास सोना ही पसंद करती है और तेरे पोता-पोती भी सो जाया करेंगे तेरे साथ तू.टी.वी. देख, भजन सुन कुछ और चाहिए तो बेझिझक बता देना।” उसे आलिंगन में ले बेटे ने कहा तो बसंती की आँखों में आँसू आ गए।
शब्दार्थ-
नर्म- मुलायम
लोककथा- लोक में प्रचलित पुरानी कहानियाँ
हैरान- आश्चर्यचकित होना
आश्चर्यचकित– हैरान
डबल-बैड- बड़ा बिस्तर जिस पर दो व्यक्ति आराम से लेट सकें
बेझिझक– बिना झिझक
आलिंगन– गले लगाना
व्याख्या- इस अंश में बताया गया है कि बसंती जैसा सोच रही थी कि कैसे उसके विपरीत होता है। बसंती डरते-डरते उस नरम गद्दों वाले बैड पर लेट जाती है। उसे डर था कि कहीं वह सो गयी तो बहू आकर डाँट न दे कि वह इतने अच्छे कमरे में क्यों सो रही है, इसलिए वह तुरंत उठ जाती है।
शाम को जब बेटा घर आता है तो बसंती कहती है कि बेटा, मेरा सामान मेरे कमरे में रखवा देते। यह सुनकर बेटा हैरान होता हुआ बोलता है कि माँ, तेरा सामान तो तेरे ही कमरे में रखा है। यह सुनकर बसंती चौंक जाती है और आश्चर्य से कहती है कि मेरा कमरा, ये डबल बैड वाला कमरा मेरा है।
बेटा हँसकर जबाव देता है कि हाँ माँ, जब दीदी आती है तो वह भी तेरे पास सोती है, और पोता-पोती भी तेरे साथ रहेंगे। तू आराम से टीवी देख, भजन सुन, और जो भी चाहिए, बेझिझक बता देना। यह सुनकर बेटे ने माँ को गले लगाया तो बसंती की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘माँ का कमरा’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। श्याम सुन्दर अग्रवाल द्वारा लिखित यह कहानी वृद्ध माता-पिता के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के महत्व को रेखांकित करती है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।