डिनर पाठ सार
Maharashtra State Board Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 2 “Dinner” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
डिनर सार – Here is the Maharashtra State Board of Secondary and Higher Secondary Education (MSBSHSE) Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 2 Dinner Summary with detailed explanation of the lesson “Dinner” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, summary and difficult word meanings
इस पोस्ट में हम आपके लिए महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षण मंडळ के कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती पुस्तक के पाठ 2 डिनर से पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 10 डिनर पाठ के बारे में जानते हैं।
Dinner (डिनर)
गजेंद्र रावत
प्रस्तुत कहानी ‘डिनर’ में लेखक गजेंद्र रावत ने आधुनिक नारी के जीवन-संघर्ष को बहुत सहज और संवेदनशील रूप में प्रस्तुत किया है। इस कहानी के माध्यम से लेखक यह संदेश देता है कि घर केवल स्त्री की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि घरेलू कामों में पुरुषों की भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है। यह कहानी परिवार, सहानुभूति और आपसी समझ के महत्व को सरल भाषा में सामने लाती है।
Related:
डिनर पाठ सार Dinner Summary
यह कहानी एक कामकाजी स्त्री उर्मि के एक लंबे, थकाऊ और भावनात्मक दिन को बहुत सहज और संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। अगस्त की उमस भरी शाम है। बारिश थम चुकी है लेकिन हवा में चिपचिपाहट और थकान भरी हुई है। उर्मि दफ्तर से लौट रही है। उसके कंधों पर भारी बैग हैं, शरीर पूरी तरह थका हुआ है और मन झुंझलाया हुआ है। उसे घर जाने के लिए ऑटो नहीं मिल रहा। जो ऑटो मिलते हैं, वे रोहिणी जाने से मना कर देते हैं। लगातार मना सुनते-सुनते उसका धैर्य टूटने लगता है। टाँगें जवाब देने लगती हैं और मन में खीझ भर जाती है। वह सोचती है कि जब जरूरत होती है, तब कुछ नहीं मिलता। आखिरकार वह थककर फुटपाथ की रेलिंग से टिककर खड़ी हो जाती है और थोड़ी देर सांस लेती है। चारों ओर अंधेरा घिर आता है और सड़क की लाइटें जल उठती हैं।
कुछ देर बाद उसे एक बूढ़ा ऑटो चालक मिल जाता है जो रोहिणी चलने के लिए तैयार हो जाता है। उसकी आवाज में अपनापन है, जिससे उर्मि को राहत मिलती है। वह ऑटो में बैठ जाती है। रास्ते में दोनों के बीच बातचीत शुरू होती है। बूढ़ा उससे पूछता है कि वह क्या काम करती है। उर्मि बताती है कि वह अखबार में काम करती है और खबरें लाती है। बूढ़ा इस बात से बहुत हैरान होता है। तभी अचानक ऑटो खराब हो जाता है। उमस और गर्मी में उर्मि और परेशान हो जाती है। बूढ़ा ऑटो ठीक करने लगता है और अपने अनुभव की बातें करता है। उर्मि उससे उसके बच्चों के बारे में पूछ बैठती है और तुरंत ही उसे अपनी गलती का अहसास होता है। थोड़ी देर बाद ऑटो फिर चल पड़ता है।
रास्ते में बूढ़ा अपने जीवन की पीड़ा उर्मि से साझा करता है। वह बताता है कि उसके बेटे उसे छोड़ गए हैं, पत्नी की मौत हो चुकी है और अब वह बिल्कुल अकेला है। केवल बेटी कभी-कभी हालचाल लेने आती है। उसकी बातें सुनकर उर्मि चुप हो जाती है और मन ही मन उसे बहुत दुख होता है। कुछ दूर जाने के बाद फिर ऑटो पंचर हो जाता है। उर्मि का धैर्य और टूट जाता है क्योंकि घर पर बच्चे भूखे होंगे और पति नाराज़ होंगे, यह सोचकर वह बेचैन हो उठती है। फोन पर घर से बात होती है, जहाँ उसे डांट और ताने सुनने पड़ते हैं। उसे लगता है कि घर में उसकी मेहनत और थकान की किसी को कद्र नहीं है।
ऑटो ठीक होने के बाद वे आखिरकार उर्मि के घर पहुँच जाते हैं। रास्ते भर उर्मि के मन में यही चलता रहता है कि घर जाकर उसे फिर खाना बनाना पड़ेगा, जबकि वह दिनभर काम करके थकी हुई है। उसे लगता है कि घर के सारे काम केवल औरत के हिस्से में ही आते हैं और कोई उसकी मदद नहीं करता। जब वह घर पहुँचती है तो बच्चे भूखे होने की शिकायत करते हैं और पति देर होने पर सवाल पूछता है। रसोई देखकर उसे लगता है कि किसी ने कुछ नहीं किया है। वह मन ही मन और ज्यादा झुंझला जाती है और खाना बनाने की तैयारी करने लगती है।
लेकिन जैसे ही वह डायनिंग टेबल की लाइट जलाती है, वह चौंक जाती है। वहाँ पूरा खाना तैयार रखा होता है। उसके पति और बच्चे उसके लिए सरप्राइज़ करते हैं। सब हँसते हैं, ताली बजाते हैं और बच्चा आकर उससे लिपट जाता है। यह देखकर उर्मि को बहुत शर्म और खुशी एक साथ महसूस होती है। उसे अपने गलत सोचने का अहसास होता है। उसके मन का सारा बोझ हल्का हो जाता है। कहानी इसी भाव के साथ समाप्त होती है कि कभी-कभी हम थकान और तनाव में अपने अपनों को गलत समझ लेते हैं, जबकि वे हमारे लिए चुपचाप बहुत कुछ कर रहे होते हैं। यह कहानी कामकाजी स्त्री की दिनचर्या, उसकी मानसिक स्थिति, अकेलेपन और पारिवारिक रिश्तों की संवेदनशीलता को बहुत सरल और प्रभावी ढंग से दिखाती है।
डिनर पाठ व्याख्या Dinner Lesson Explanation
1
पाठ – अगस्त की शुरुआत थी….
बारिश की तेज बौछारें होकर हटी थीं लेकिन अब वातावरण में किसी तरह की कोई सरसराहट नहीं बची थी। एकदम ठहरी हवा सीली और चिपचिपी हो गई थी। आसमान में काले-दूधिया बादलों में खामोश घमासान मचा हुआ था, मानो किसी चिकने फर्श पर फिसल रहे हों। लेकिन सड़क पर वाहनों की धक्कापेल से उठती बेसुरी ध्वनि ने वहाँ बिखरी कुदरत की नायाब चुप्पी को जबरन दबा दिया था।
उर्मि के कंधे पर लंबी तनियों के दो बैग झूल रहे थे और एक बड़ा पोली बैग उसकी ठुड्डी तक पहुँच रहा था जो दोनों बाजुओं के बीच थमा हुआ था। बुरी तरह अस्त-पस्त थी वो, भीतर से एकदम तर-बतर। खीझ और झुंझलाहट के बावजूद उसकी आँखें उद्विग्न-सी सामने के सरपट दौड़ते ट्रैफिक पर लगी हुई थीं। वह ऑटो खोज रही थी। कभी कोई ऑटो दिखाई देता पर हाथ देने पर भी रुकता न था। जो रुकता वह रोहिणी जाने के नाम से ही बिदक जाता। वह बहुतों से पूछ चुकी थी। बार-बार ऑटोवालों की हिलती स्प्रिंगदार खिलौनों-सी मुंडियों ने उसे बुरी तरह चिढ़ा दिया था। इस ‘न’ की आशंका भर से उसकी दिल की धड़कनें तेज हो गईं। इस अविवेकपूर्ण अभ्यास ने उसकी टाँगों से मानो संचित ऊर्जा का रेशा-रेशा बाहर खींच लिया हो। वह लगभग पैरों को घसीट रही थी। उनमें कदम भर चलने की ताकत नहीं बची थी।
शब्दार्थ-
बौछारें- तेज वर्षा की फुहारें
वातावरण- चारों ओर का मौसम, परिवेश
सरसराहट- हल्की आवाज या हवा की धीमी ध्वनि
सीली- नमी से भरी हुई
दूधिया- दूध के समान सफेद
खामोश घमासान– भयानक युद्ध
धक्कापेल– बहुत अधिक भीड़-भाड़ और धक्का-मुक्की
बेसुरी ध्वनि– कर्कश और अप्रिय आवाज
नायाब- अनोखी, दुर्लभ
तनियाँ- बैग की पट्टियाँ (स्ट्रैप)
पोली बैग- प्लास्टिक का थैला
अस्त-पस्त- अत्यधिक थकी हुई और बिखरी अवस्था
तर-बतर- पूरी तरह भीगी हुई, पसीने से लथपथ
खीझ- झुंझलाहट, चिड़चिड़ापन
झुंझलाहट- गुस्से और बेचैनी की भावना
उद्विग्न- चिंतित और बेचैन
सरपट- बहुत तेज गति से
बिदक जाना- डरकर या हिचककर मना कर देना
स्प्रिंगदार- स्प्रिंग की तरह हिलने वाला
मुंडियाँ– सिर
आशंका- डर, संभावना
अविवेकपूर्ण- बिना सोचे-समझे किया गया
संचित- इकट्ठा किया हुआ
रेशा-रेशा- थोड़ा-थोड़ा, पूरी तरह
घसीटना– खींचते हुए चलना
व्याख्या- इस अंश में लेखक ने वातावरण और उर्मि की मानसिक-शारीरिक स्थिति का सजीव चित्रण किया है। अगस्त महीने के प्रारम्भ में तेज बारिश हो चुकी थी, लेकिन उसके बाद वातावरण में सन्नाटा छा गया था। हवा बिल्कुल ठहरी हुई थी और उसमें सीलन व चिपचिपाहट भर गई थी। आसमान में काले और दूधिया रंग के बादल फैले हुए थे, जो आपस में उलझे हुए प्रतीत होते थे। प्रकृति की यह शांति सड़क पर चल रहे वाहनों के शोर से भंग हो रही थी। ट्रैफिक की तेज़ और बेसुरी आवाज़ें प्राकृतिक चुप्पी को दबा रही थीं।
उर्मि अत्यधिक थकी हुई थी। उसके कंधों पर दो भारी बैग झूल रहे थे और एक बड़ा पॉली बैग वह दोनों हाथों से पकड़े हुए थी जो उसकी ठुड्डी तक पहुँच रहा था। वह बाहर से ही नहीं, भीतर से भी पूरी तरह अस्त-व्यस्त थी। दिनभर की भागदौड़ और उमस ने उसे कमजोर कर दिया था। मन में खीझ और झुंझलाहट होने के बावजूद उसकी निगाहें सड़क पर दौड़ते वाहनों पर टिकी हुई थीं, क्योंकि वह ऑटो ढूँढ़ रही थी। कई ऑटो दिखते थे, लेकिन हाथ देने पर भी वे नहीं रुकते थे। जो ऑटो रुकते थे, वे रोहिणी जाने का नाम सुनते ही मना कर देते थे।
बार-बार ऑटो चालकों की मना करने वाली हिलती हुई गर्दनों ने उसे बहुत चिढ़ा दिया था। हर बार ‘न’ सुनने की आशंका से ही उसकी दिल की धड़कनें तेज हो जाती थीं। लगातार कोशिश और निराशा ने उसकी टाँगों की सारी ताकत जैसे निकाल ली थी। वह लगभग पैरों को घसीटते हुए चल रही थी। उसके पैरों में इतना भी बल नहीं बचा था कि वह ठीक से एक कदम आगे बढ़ा सके।
2
पाठ – जब चाहिए होते हैं तो एक भी नहीं दिखता और जब नहीं चाहिए तो चारों तरफ ऑटो-ही-ऑटो देख लो। इतना तो दिन भर के काम से नहीं थकी जितना कंबख्त ऑटो करने में टाँगें टूट गईं और देखो अभी तक हो भी नहीं पाया… वह सोच रही थी और बचती-बचाती सड़क पार कर पैदल ही चलने लगी। पैर घसीटते- घसीटते यही ऊहापोह पंचकुइयाँ के और अधिक व्यस्त चौराहे तक ले आई। अब नहीं चला जाता। बस ! वो फुटपाथ से लगी रेलिंग पर पीठ टिकाकर खड़ी हो गई। गहरी साँस भरते हुए उसने आसमान की ओर सिर उठाया और साँस छोड़ते हुए आँखें मूँद लीं मानो पल भर को विराम लिया हो। मगर थोड़ी देर में उसकी आँखें फिर सड़क पर लगी थीं।
चारों ओर अच्छा-खासा अँधेरा घिर चुका था। सड़क के किनारे बिजली के खंभों पर बत्तियाँ टिमटिमाने लगी थीं जिनके इर्द-गिर्द बरसाती पतंगे जमा हो रहे थे।
वह फिर से हाथ का सामान उठाकर बिना समय गँवाए पीछे के ऑटो’ की तरफ चल दी।
“चलोगे बाबा ?” उर्मि हाँफती हुई बस इतना ही बोल पाई।
“कहाँ ? वह काफी बूढ़ा था।
“रोहिणी !” उर्मि डरी-सहमी धीरे-से बोली।
“बिलकुल चलेंगे पुत्तर…” बूढ़े की आवाज में अपनापन था, जुबान मीठी थी।
इतना सुनते ही वह झट से ऑटो में बैठ गई। बूढ़े की सहमति ने उसे दिली राहत दी। बूढ़ा अभी भी अगले पहिये पर झुका हुआ था और पाँव से दबाकर टायर देख रहा था। बूढ़े की पैंट का पोंचा घुटने तक गुल्टा हुआ था। उसके घुटने के थोड़ा नीचे रगड़ का निशान बना हुआ था। वैसे तो वह अच्छा-खासा लंबा था लेकिन उसकी कमर स्थायी तौर से झुकी थी। सिर के सन-से बाल बिना कंधी के फैले हुए थे। उसके चेहरे के गोरे रंग पर मैल, धूल और धुएँ की चिपचिपी परत चढ़ी हुई थी। उसने आँखें मिचमिचाते हुए पिछली सीट के छोटे-से अँधेरे में उसे देखा-वह बैठ चुकी थी। तीनों बैग सीट के पीछे रखकर वह हाथ में मोबाइल और छोटा-सा पर्स लिए चुपचाप बैठी थी।
शब्दार्थ-
कंबख्त- परेशानी देने वाला, झुंझलाहट पैदा करने वाला
बचती-बचाती– सावधानी से, इधर-उधर से बचकर
ऊहापोह- दुविधा, असमंजस की स्थिति
व्यस्त चौराहा- जहाँ बहुत अधिक यातायात हो
विराम– थोड़ी देर का आराम
टिमटिमाना– हल्की-हल्की रोशनी के साथ जलना-बुझना
बरसाती पतंगे- बारिश के मौसम में दिखाई देने वाले उड़ने वाले कीड़े
हाँफती हुई- तेज साँस लेते हुए, थकान के कारण साँस फूलना
डरी-सहमी- भयभीत और घबराई हुई
अपनापन- स्नेह और आत्मीयता का भाव
दिली राहत– मन को मिलने वाला सुकून
सहमति- मंजूरी, तैयार होना
पोंचा- पैंट का निचला हिस्सा
सन-से बाल- बिल्कुल सफेद या बहुत हल्के रंग के बाल
मिचमिचाते हुए- आँखों को आधा बंद करके देखना
चिपचिपी परत- गंदगी या धूल की जमी हुई तह
व्याख्या- प्रस्तुत अंश में लेखिक ने उर्मि की थकान, निराशा और मानसिक तनाव को बहुत प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। उर्मि मन ही मन सोचती है कि जब उसे ऑटो की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब एक भी ऑटो नहीं मिलता और जब आवश्यकता नहीं होती, तब चारों ओर ऑटो ही ऑटो दिखाई देते हैं। वह अनुभव करती है कि दिनभर दफ्तर के काम से जितनी नहीं थकी थी, उससे कहीं अधिक थकान उसे ऑटो ढूँढ़ने में हो गई है। लगातार कोशिशों के बावजूद ऑटो न मिलने से वह पूरी तरह टूट-सी जाती है।
यह सोचते हुए वह सावधानी से सड़क पार करती है और पैदल ही चलने लगती है। उसके कदम घिसटते हुए आगे बढ़ते हैं और अनजाने में वह पंचकुइयाँ के और अधिक व्यस्त चौराहे तक पहुँच जाती है। अब उसमें आगे चलने की शक्ति नहीं बचती। विवश होकर वह फुटपाथ के पास लगी रेलिंग से पीठ टिकाकर खड़ी हो जाती है। गहरी साँस लेकर वह आसमान की ओर सिर उठाती है और आँखें मूँद लेती है, मानो कुछ पल के लिए थकान से राहत पाना चाहती हो। थोड़ी देर बाद उसकी निगाहें फिर सड़क पर टिक जाती हैं, क्योंकि घर पहुँचने की चिंता उसे चैन नहीं लेने देती।
इस बीच चारों ओर अँधेरा घिर आता है। सड़क के किनारे लगे बिजली के खंभों की बत्तियाँ टिमटिमाने लगती हैं और उनके चारों ओर बरसाती पतंगे जमा हो जाते हैं। वातावरण का यह दृश्य उर्मि की थकी और उदास मनःस्थिति को और गहरा कर देता है। तभी वह फिर से अपना सामान उठाती है और बिना समय गँवाए एक ऑटो की ओर बढ़ जाती है।
वह हाँफते हुए बूढ़े ऑटो चालक से पूछती है कि क्या वह चलेगा। चालक उससे पूछता है कि कहाँ जाना है और उर्मि डरी-सहमी आवाज़ में रोहिणी जाने की बात कहती है। बूढ़ा चालक स्नेह और अपनापन भरी आवाज़ में चलने की सहमति दे देता है। यह सुनते ही उर्मि को बहुत राहत मिलती है और वह तुरंत ऑटो में बैठ जाती है। बूढ़े की सहमति उसके लिए किसी सहारे की तरह होती है।
इसके बाद लेखक बूढ़े ऑटो चालक का सजीव चित्र प्रस्तुत करता है। वह अगले पहिये को जाँच रहा होता है। उसकी झुकी हुई कमर, घुटनों पर पड़े निशान, बिखरे बाल और धूल-धुएँ से सना चेहरा उसके संघर्षपूर्ण जीवन को बताते हैं। बूढ़ा आँखें मिचमिचाकर पीछे देखता है और पाता है कि उर्मि चुपचाप बैठ चुकी है। वह अपने तीनों बैग पीछे रखकर मोबाइल और पर्स हाथ में लिए शांत बैठी रहती है।
3
पाठ -“चलो जी चलते हैं।”बूढ़ा मीटर गिराते हुए सीट पर बैठ गया और दोनों हाथ जोड़े पल भर आँखें मूँदे रहा। सुबह से नहीं मिला हाथ जोड़ने का टाइम ? वह बूढ़े के क्रियाकलाप देखते हुए सोचने लगी।
“हाँ, तो पुत्तर कौन-से सेक्टर जाना है ?” बूढ़े की जुबान में पंजाबी लहजा था।
“सेक्टर तेरह।” वो इत्मीनान से बोली अब पहले वाली खीझ, झुंझलाहट जाती रही थी।
बूढ़ा बिना बोले चल पड़ा। ऑटो गति पकड़ने लगा।
“पुत्तर एक बात पूछूं ?” बूढ़ा आगे सड़क पर दृष्टि गड़ाए झिझकते हुए धीमे-से बोला।
“हाँ ?”
“ऐसा लगता है पुत्तर आप कहीं काम करती हो ?” “हाँ, अखबार में !” उर्मि ने सिर पीछे टिका लिया था।
“अखबार में ? अखबार में कैसे ?” बूढ़ा हैरान था। “खबरें लाती हूँ…” उर्मि कहते हुए लापरवाही से मुसकराई।
“खबरें ?” बूढ़े ने दोहराया, वह और ज्यादा हैरान था। काफी देर तक बूढ़ा चुप रहा, उर्मि की इस अजीब नौकरी के बारे में सोचता रहा।
चलते-चलते अचानक एक अजीब-सी ध्वनि के साथ ऑटो बंद हो गया और धीर-धीरे रुक गया।
“ओ हो !” बूढे के मुँह से निकला, “क्या मुसीबत है ?” वह झुंझलाते हुए ऑटो को सड़क के किनारे तक खींच लाया।
ऑटो के रुकते ही दस मिनट के अंदर ही उर्मि पसीने-पसीने हो गई। बूढ़े की बड़बड़ाहट उसके कानों तक पड़ रही थी। गरमी और घुटन से त्रस्त वह सामान ऑटो के भीतर ही छोड़कर नीचे बैठे बूढ़े के पास आ खड़ी हुई और थोड़ा-सा नीचे झुकते हुए बोली, “ठीक तो हो जाएगा न ?”
“हाँ, हाँ क्यों नहीं, चालीस साल से ऑटो चला रहा हूँ, पुर्जे-पुर्जे से वाकिफ हूँ। बस हो गया समझो!” भीतर लगी ग्रीस से उसका हाथ बुरी तरह सन गया था।
“आप इस उम्र में भी…. आपके बच्चे कमाते होंगे ?” वह आदतन पूछ बैठी लेकिन पल भर में ही उसे अहसास हुआ कि इतना निजी सवाल नहीं पूछना चाहिए था।… पता नहीं कैसे तो गुजारा कर रहा होगा बेचारा ! बच्चों के नाम पर बूढ़े ने एक बार नजर उठाकर जरूर देखा और फिर सिर झुकाकर ऐसे काम में लग गया जैसे कुछ सुना ही न हो।
“बच्चे ! हाँ पुत्तर…” बूढ़ा इतना ही बोल पाया कि उर्मि का मोबाइल बज उठा। वह फिर बोला, “आपका …!”
शब्दार्थ-
मीटर गिराना– ऑटो/टैक्सी का किराया शुरू करने के लिए मीटर चालू करना
क्रियाकलाप- गतिविधियाँ, काम करने का तरीका
लहजा- बोलने का ढंग
इत्मीनान से- आराम के साथ
गति पकड़ना- तेज चलने लगना
दृष्टि गड़ाए- ध्यानपूर्वक देखना
झिझकते हुए- संकोच के साथ
हैरान– आश्चर्यचकित
ध्वनि- आवाज
बड़बड़ाहट– धीमी आवाज में शिकायत या कुछ बोलते रहना
घुटन– बंद वातावरण के कारण बेचैनी महसूस होना
त्रस्त- परेशान या दुखी
पुर्जे- हिस्से, मशीन का कोई भाग
वाकिफ- परिचित, ज्ञात
ग्रीस– मशीनों में लगाया जाने वाला चिकना काला तेल
सन जाना– पूरी तरह लग जाना या लिपट जाना
आदतन– आदत के कारण
अहसास– महसूस होना, समझ आना
निजी सवाल- व्यक्तिगत प्रश्न
गुजारा करना– किसी तरह जीवन चलाना
नजर उठाना- ऊपर देखना
बेचारा- दया के योग्य, असहाय व्यक्ति
व्याख्या- इस गद्याँश में लेखक उर्मि और बूढ़े ऑटो चालक के बीच बातचीत को प्रस्तुत करता है। बूढ़ा चालक ऑटो चलाने से पहले मीटर गिराकर सीट पर बैठ जाता है और दोनों हाथ जोड़कर कुछ पल आँखें मूँद लेता है और चलने के लिए कहता है। उर्मि उसके इस व्यवहार को देखकर मन ही मन सोचती है कि शायद उसे सुबह से हाथ जोड़ने का समय नहीं मिला होगा। इससे उर्मि के भीतर उसके प्रति सहानुभूति का भाव उत्पन्न होता है।
इसके बाद बूढ़ा स्नेह से उर्मि से पूछता है कि उसे किस सेक्टर जाना है। उसकी भाषा में पंजाबी लहजा है, जो उसके सरल और अपनापूर्ण स्वभाव को प्रकट करता है। उर्मि शांत स्वर में सेक्टर तेरह बताती है। अब उसके मन की पहले वाली खीझ और झुंझलाहट समाप्त हो चुकी होती है। बूढ़ा बिना कुछ कहे ऑटो आगे बढ़ा देता है और ऑटो गति पकड़ लेता है।
कुछ दूरी तय करने के बाद बूढ़ा झिझकते हुए उर्मि से पूछता है कि क्या वह कहीं काम करती है। उर्मि उसके प्रश्न का उत्तर देते हुए बताती है कि वह अखबार में काम करती है। यह सुनकर बूढ़ा हैरान हो जाता है और और अधिक जानने की इच्छा प्रकट करता है। जब उर्मि बताती है कि वह खबरें लाती है, तो बूढ़ा और भी चकित हो जाता है। उसके लिए यह बात नई और अनोखी होती है। वह काफी देर तक चुप रहता है और उर्मि की नौकरी के बारे में सोचता रहता है।
इसी बीच अचानक एक अजीब आवाज के साथ ऑटो बंद हो जाता है और धीरे-धीरे रुक जाता है। बूढ़ा इसे मुसीबत मानकर झुंझलाते हुए ऑटो को सड़क के किनारे खड़ा कर देता है। ऑटो रुकते ही गर्मी और उमस के कारण उर्मि को बहुत बेचैनी होने लगती है और कुछ ही देर में वह पसीने से तर हो जाती है। बूढ़े की बड़बड़ाहट उसके कानों में पड़ती रहती है। परेशान होकर वह ऑटो के भीतर सामान छोड़कर नीचे उतर आती है और चिंता से पूछती है कि ऑटो ठीक हो जाएगा या नहीं।
बूढ़ा आत्मविश्वास के साथ उसे भरोसा दिलाता है कि वह चालीस वर्षों से ऑटो चला रहा है और उसके सभी पुर्जों को अच्छी तरह जानता है, इसलिए ऑटो जल्दी ही ठीक हो जाएगा। उसके हाथ ग्रीस से सने होते हैं, जो उसके परिश्रम और मेहनती जीवन को बताते हैं। बातचीत के दौरान उर्मि आदतन उससे पूछ बैठती है कि इस उम्र में भी वह काम कर रहा है और शायद उसके बच्चे कमाते होंगे। यह प्रश्न करते ही उसे एहसास हो जाता है कि उसने बहुत निजी बात पूछ ली है। वह मन ही मन सोचती है कि बेचारा बूढ़ा न जाने कैसे जीवन चला रहा होगा।
बच्चों का नाम सुनते ही बूढ़ा एक क्षण के लिए उसकी ओर देखता है और फिर सिर झुकाकर काम में लग जाता है, जैसे उसने कुछ सुना ही न हो। इससे उसके जीवन के छिपे हुए दुःख और अकेलेपन का संकेत मिलता है। वह बस इतना ही कह पाता है कि उसके बच्चे हैं, लेकिन तभी उर्मि का मोबाइल बज उठता है और उसकी बात अधूरी रह जाती है।
4
पाठ – उर्मि चौंकी और मोबाइल को कान से सटाकर फुटपाथ पर चढ़ती हुई बात करने लगी, “आ रही हूँ बाबा ! हाँ भई हाँ ! शास्त्री नगर में हूँ… ऑटो खराब हो गया है…. नहीं-नहीं, वह ठीक कर रहा है।” अंतिम शब्द उसने बहुत धीमे-से कहे।
कुछ देर की आशा-निराशा के बाद ऑटो स्टार्ट हो ही गया। ऑटो को स्टार्ट होते देख उर्मि जल्दी से उछलकर पिछली सीट पर बैठ गई। कुछ देर ऑटो को ठीक-ठाक चलते देख, बूढ़ा बोलने लगा, “दो लड़के हैं, पहला तो शादी होते ही अलग हो गया, मैंने सोचा, चलो छोटेवाला तो साथ है पर वह तो और भी चालाक निकला, एक प्लॉट था उसके बिकते ही पठ्ठे ने हमारा सामान बाँध दिया… मुझे ही पता है कि कैसे इज्जत बचाई…” इतना कहते-कहते उसकी आँखें नम होती चली गईं। आवाज अवरुद्ध होती जा रही थी।
“तो अभी बिलकुल अकेले हो ?”
“हाँ पुत्तर, घरवाली को मरे चार साल हो गए हैं… बस बेटी है तुम्हारी उम्र की होगी, वो चक्कर लगा लेती है हफ्ते-पंद्रह दिन में। बेटी का मन नहीं मानता ! बेचारी वह भी अकेली कमाने वाली है। उसके आदमी के पास भी काम नहीं है।” बूढ़ा धीमे-धीमे बोल रहा था और आखिरी शब्द तक बिलकुल ऊर्जाहीन हो चुका था मानो आगे नहीं बोल पाएगा।
कुछ देर वे चुप्पी में बँध गए।
बूढ़ा फिर धीर-धीरे बोलने लगा, “मैं किसी को दोष नहीं देता… सब किस्मत का खेल है ! दस साल का था मैं, जब लाहौर से दिल्ली आया था …. बाऊ जी ताँगा चलाते थे। यहाँ भी ताँगा ले लिया और जिंदगी भर वही चलाते रहे ।”…
यकायक एक तीखा-कर्कश स्वर गूँजा। खड़ख-खड़खड़ …. और झटके के साथ ऑटो रुक गया।
“ओफ्फ ओ ! अब क्या हुआ ?” बूढ़ा झुंझलाया।
शब्दार्थ-
चौंकी– अचानक घबरा जाना
सटाकर– पास में लगाकर
फुटपाथ– सड़क के किनारे पैदल चलने का रास्ता
आशा-निराशा– उम्मीद और निराशा की मिली-जुली भावना
स्टार्ट- चालू होना
उछलकर– जल्दी और फुर्ती से
ठीक-ठाक– सही तरीके से, बिना परेशानी के
चालाक– होशियार लेकिन स्वार्थी या धूर्त
पठ्ठा– नालायक या कठोर स्वभाव वाला व्यक्ति
इज्जत- मान-सम्मान
नम आँखें- आँसुओं से भरी आँखें
अवरुद्ध- रुक जाना
घरवाली– पत्नी
ऊर्जाहीन- बिना शक्ति या उत्साह के
चुप्पी- ख़ामोशी, मौन
दोष- गलती या जिम्मेदारी
किस्मत का खेल– भाग्य का प्रभाव
ताँगा– घोड़े से खींची जाने वाली सवारी गाड़ी
यकायक- अचानक
तीखा- कर्कश स्वर- तेज और कानों को चुभने वाली आवाज
गूँजा- जोर से सुनाई दिया
झटके के साथ– अचानक हिलते हुए
व्याख्या- इस अंश में लेखक ने उर्मि की घरेलू जिम्मेदारियों की चिंता और बूढ़े ऑटो चालक के पीड़ादायक जीवन को भावनात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। अचानक मोबाइल बजने पर उर्मि चौंक जाती है और फोन कान से लगाकर फुटपाथ पर चढ़ते हुए बात करने लगती है। वह घरवालों को यह समझाने की कोशिश करती है कि वह रास्ते में है और ऑटो खराब हो गया था, लेकिन अब ठीक किया जा रहा है। अंतिम शब्द वह बहुत धीमी आवाज़ में कहती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह घर पर किसी को परेशान या चिंतित नहीं करना चाहती।
कुछ देर की अनिश्चितता और तनाव के बाद जब ऑटो स्टार्ट हो जाता है, तो उर्मि को राहत मिलती है और वह जल्दी से ऑटो में बैठ जाती है। ऑटो के ठीक तरह से चलने पर बूढ़ा चालक अपने जीवन की व्यथा बताने लगता है। वह कहता है कि उसके दो बेटे हैं। बड़ा बेटा शादी के बाद अलग हो गया और छोटे बेटे से उसे उम्मीद थी, लेकिन उसने भी उसे धोखा दिया। बेटे द्वारा जमीन बेचकर माता-पिता को बेसहारा छोड़ देने की बात कहते हुए उसकी आँखें नम हो जाती हैं और उसकी आवाज रुक जाती है।
उर्मि उससे पूछती है कि क्या वह अब बिल्कुल अकेला है। बूढ़ा बताता है कि उसकी पत्नी को गुजरे चार साल हो चुके हैं और अब केवल एक बेटी है, जो कभी-कभी हफ्ते-पंद्रह दिनों में हालचाल लेने आती है। वह यह भी बताता है कि बेटी स्वयं भी आर्थिक संघर्ष में है, क्योंकि वही अकेली कमाने वाली है और उसके पति के पास काम नहीं है। बूढ़ा यह सब बहुत धीमी और थकी हुई आवाज़ में कहता है।
कुछ देर तक दोनों चुप रहते हैं। यह चुप्पी उनके मन के बोझ और पीड़ा को और गहरा कर देती है। इसके बाद बूढ़ा फिर बोलता है और कहता है कि वह किसी को दोष नहीं देता, क्योंकि वह सब कुछ किस्मत का खेल मानता है। वह अपने बचपन की बात करता है कि दस साल की उम्र में वह लाहौर से दिल्ली आया था और उसके पिता ताँगा चलाते थे। बाद में उसने भी वही काम अपनाया और पूरी जिंदगी मेहनत करते हुए निकाल दी। इससे उसके संघर्षपूर्ण और साधारण जीवन की झलक मिलती है।
इसी दौरान अचानक तेज़ और कर्कश आवाज़ के साथ ऑटो फिर से रुक जाता है। यह घटना उर्मि की चिंता को और बढ़ा देती है और बूढ़े को भी झुंझलाहट हो जाती है।
5
पाठ – उर्मि ने कलाई को रोशनी तक ले जाकर टाइम देखा, फिर खीझ में धीरे-से फुसफुसाई, “नो… ओ नो !” बूढ़ा उतरकर ऑटो के इर्द-गिर्द घूमने लगा “पंचर हो गया… दस मिनट लगेंगे। आप फिकर न करें !”
फिर एक बार ऑटो पटरी के साथ खड़ा हो गया। बूढ़े ने आगे से प्लग-पाना, जैक और स्टेपनी निकाल ली, फिर बैठकर जैक लगाने लगा।
उर्मि ऑटो से उतर फुटपाथ पर चढ़ गई। उद्विग्न-सी, सिर नीचे किए छोटे-छोटे कदमों से टहलने लगी। अब टाइम ज्यादा हो गया है, ये गुस्सा कर रहे होंगे। बच्चे तो मेरे जिम्मे ही मानकर चलते हैं… उसने सोचा।
आकाश बादलों से पटा हुआ था। दूर कभी-कभी बिजली चमक जाती थी जिसकी तेज रोशनी आस-पास के घिरे अँधेरे में दिखाई दे रही थी।
अचानक मोबाइल बजने की आवाज ने उसे चौंका दिया। ये चिंता कर रहे होंगे ? उसने जल्दी से मोबाइल कान से लगा लिया … “हैलो !”
“हैलो, क्या हो रहा है ? कहाँ हो यार ?”
वह ऑटो से थोड़ा दूर जाकर धीरे-से बोली, “ऑटो पंक्चर हो गया है, ऑटो वाला बूढ़ा है, बेचारा धीरे-धीरे पहिया बदल रहा है।”
“ऐसे खटारे में चढ़ी क्यों ? छोड़ो उसे, दूसरा ऑटो ले लो !”
“दूसरा मिलना मुश्किल है, बहुत कोशिशों से मिला है ये भी।”
“अरे हाँ, तुम तो बूढ़े का साक्षात्कार ले रही होगी, वृद्धों के एकाकी जीवन पर लेख जो लिखना है।”
“नहीं, नहीं… क्या बात कर रहे हो।”
“नहीं, नहीं…क्या, ऐसा ऑटो ही क्यों किया… कभी तो दिमाग का इस्तेमाल किया करो”… वह उसी तरह झुकी हुई एक लंबी साँस खींचकर बिना हिले-डुले खड़ी रही। झिड़कते रहते हैं हर वक्त ! न जाने क्या समझते हैं अपने आपको ? मैं कोई जान-बूझकर ऐसा कर रही हूँ। इसे पचास रुपये दे देती हूँ… उसने पचास का एक नोट पर्स से निकालकर मुट्ठी में दबा लिया। अब वह सामने गुजरते ऑटो पर नजर रखे हुए थी।
शब्दार्थ-
कलाई– हाथ का वह भाग जहाँ घड़ी पहनी जाती है
फुसफुसाई- बहुत धीमे स्वर में बोलना
इर्द-गिर्द- चारों ओर, आसपास
पंचर– टायर में छेद हो जाना जिससे हवा निकल जाए
फिकर– चिंता
पटरी- सड़क का किनारा
प्लग-पाना– टायर ठीक करने का औजार (पाना- नट-बोल्ट खोलने का उपकरण)
जैक- वाहन को ऊपर उठाने का यंत्र
स्टेपनी– अतिरिक्त टायर
जिम्मे- जिम्मेदारी, देखभाल का भार
पटा हुआ- पूरी तरह ढका हुआ
खटारा- पुराना और खराब वाहन
साक्षात्कार– इंटरव्यू, बातचीत द्वारा जानकारी लेना
एकाकी- अकेला, जिसमें साथ देने वाला कोई न हो
झिड़कते- डाँटते या उलाहना देते
जान-बूझकर– सोच-समझकर, इरादे से
पर्स– छोटा बटुआ
व्याख्या- इस अंश में उर्मि की बढ़ती हुई बेचैनी, समय का दबाव और पारिवारिक अपेक्षाओं का बोझ स्पष्ट रूप से सामने आता है। उर्मि घड़ी की ओर देखकर समय का अनुमान लगाती है और देर हो जाने पर खीझ के साथ मन ही मन चिंता प्रकट करती है। उसे लगता है कि अब बहुत देर हो चुकी है और घरवाले उससे नाराज़ हो रहे होंगे। दूसरी ओर बूढ़ा ऑटो चालक शांत भाव से ऑटो से उतरकर पंचर की जाँच करता है और उसे विश्वास दिलाता है कि दस मिनट में सब ठीक हो जाएगा।
बूढ़ा आवश्यक औज़ार प्लग-पाना, जैक और स्टेपनी निकालकर सावधानी से पहिया बदलने लगता है। उर्मि ऑटो से उतरकर फुटपाथ पर चली जाती है और बेचैनी में सिर झुकाए छोटे-छोटे कदमों से टहलने लगती है। उसके मन में यह विचार चलता रहता है कि बच्चों की सारी जिम्मेदारी उसी पर डाली जाती है और देर होने पर वही दोषी ठहराई जाएगी। यह सोच उसकी मानसिक पीड़ा को और बढ़ा देती है।
आसमान बादलों से घिरा हुआ है और बीच-बीच में चमकती बिजली अंधेरे को और भयावह बना देती है। इसी माहौल में अचानक मोबाइल की घंटी उसे चौंका देती है। वह सोचती है कि शायद घरवाले उसकी चिंता कर रहे होंगे। फोन पर बात करते समय वह स्थिति को समझाने की कोशिश करती है और बूढ़े ऑटो चालक के प्रति सहानुभूति भी प्रकट करती है। वह बताती है कि ऑटो पंचर हो गया है और बूढ़ा धीरे-धीरे पहिया बदल रहा है।
फोन पर दूसरी ओर से उसे डाँट और उपेक्षा भरी बातें सुनने को मिलती हैं। उससे पूछा जाता है कि वह ऐसे पुराने ऑटो में क्यों बैठी और उसे दूसरा ऑटो ले लेना चाहिए था। तब वह कहती है कि यही ऑटो बढ़ी मुश्किल से मिला है। उसका पति उससे कहता है कि तुम्हे तो बूढ़े का साक्षात्कार लेना होगा, वृद्धों के एकाकी जीवन पर लेख जो लिखना है।
इन बातों से उर्मि भीतर ही भीतर आहत हो जाती है। वह बिना कुछ कहे चुपचाप खड़ी रहती है और एक लंबी साँस लेकर अपने अपमान और झुंझलाहट को दबाने की कोशिश करती है।
उसे लगता है कि लोग हर समय उसे ही दोष देते रहते हैं, जैसे वह जान-बूझकर परेशानी मोल लेती हो। इसी मनःस्थिति में वह बूढ़े ऑटो चालक को अतिरिक्त पैसे देने का विचार करती है और पर्स से पचास रुपये निकालकर हाथ में दबा लेती है। अब वह सामने से गुजरते ऑटो की ओर देखने लगती है।
6
पाठ– “टाइम लगेगा क्या बाबा ?”
“नहीं, पुत्तर बस हो गया !”बूढ़ा पहिये के नट कस रहा था।
“तुम्हारा बच्चा छोटा है क्या ?” बूढ़ा दोनों घुटनों पर हाथ रखकर खड़े होते हुए बोला।
वह बूढ़े के इस असंगत प्रश्न से हैरान थी लेकिन उसने धीमे-से स्वीकृति में सिर हिला दिया। असंगत प्रश्न होने के बावजूद उसे अपने पापा की याद आ गई। उन्होंने बड़े किए हैं मेरे दोनों बच्चे…।
बूढ़ा ऑटो की तकनीक पर बड़ी देर तक बड़बड़ाता रहा।
वह बिना कुछ कहे बैठ गई। ऑटो फिर से दौड़ते ट्रैफिक में शामिल हो गया। ऑटो जब सिग्नल पर रुका तो उर्मि ने कलाई की घड़ी को फिर देखा और सिर्फ होंठों को हिलाते हुए फुसफुसाई… ‘एक महाभारत अभी घर पर भी झेलनी है… क्या पकाना है ? ओफ हो ! लेबर-सी जिंदगी हो गई है ! दिन भर रिपोर्टिंग के लिए धक्के खाओ… घर पहुँचो तो…. डिनर बनाओ !’
आगे की ड्राइविंग सीट पर बूढ़ा भी लगातार बड़बड़ा रहा था जो ट्रैफिक के भारी शोर में स्पष्ट नहीं था। उर्मि का मन घर पर ही लगा था … अनुराग मुझसे तो इतनी पूछताछ कर रहे हैं कि कहाँ हूँ, पर ये नहीं कि सब्जी ही काट दें, दाल धोकर गैस पर चढ़ा दें। दिन भर आराम ही तो किया है। सुबह तो खाना मैं ही बनाकर आती हूँ। … लेकिन मेरी किस्मत कहाँ ! ये सब तो मेरे इंतजार में होंगे ! आएगी और करेगी …. और क्या ? दुनिया में सिर्फ औरत को न तो कभी थकान होती, न दुख, न तकलीफ ! सारे काम औरत के जिम्मे हैं… आदमी तो फिर आदमी है ! ये सारे खयाल करते-करते उसके मुँह से हल्की-सी आह निकल आई।
“मुड़ना किधर है ?” बूढ़ा तेजी से बोला।
वह चौंकी और फिर बाहर देखती हुई बोली, “सीधे हाथ… अगले गेट से अंदर ले लेना।”
ऑटो बिल्डिंग के नीचे रुक गया। बूढ़े को पैसे देकर वह सामान को पहले की तरह समेटे भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ते चढ़ते सोचने लगी… ‘दस से ऊपर का टाइम हो गया है, तीन भूखे प्राणी घर में विचरण कर रहे होंगे… उनके लिए, अपने लिए खाना बनाना ! क्या मुसीबत है ! सुबह फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस और दफ्तर ! कैसे होगा ये सब ! क्या उनके बस का कुछ भी नहीं है ? मैं भी तो जॉब करती हूँ। ये तो तीन महीने से घर पर ही हैं… मेहनत तो मेरे काम में ही ज्यादा है।’ वह दरवाजे तक पहुँच गई और बेल दबाकर दीवार से सिर टिकाकर खड़ी हो गई।
शब्दार्थ-
नट- पेंच
असंगत- जिसका कोई संबंध न हो, बेढंगा
स्वीकृति– सहमति, हाँ कहना
तकनीक- काम करने की विधि या तरीका
दौड़ते ट्रैफिक– तेज गति से चल रहे वाहन
शामिल- जुड़ जाना
सिग्नल- यातायात नियंत्रित करने वाली लाल-पीली-हरी बत्ती
फुसफुसाई- बहुत धीमे स्वर में कहा
लेबर- मजदूर
रिपोर्टिंग– समाचार के लिए जानकारी जुटाने का कार्य
धक्के खाना- बहुत मेहनत और परेशानियाँ उठाना
स्पष्ट– साफ-साफ
किस्मत- भाग्य
खयाल- विचार
आह– दर्द या थकान व्यक्त करने की धीमी आवाज
समेटे- इकट्ठा किए हुए|
विचरण- इधर-उधर घूमना
प्रेस कॉन्फ्रेंस- पत्रकारों की बैठक जिसमें जानकारी दी जाती है
व्याख्या- प्रस्तुत अंश में लेखक ने उर्मि की जिम्मेदारियों के बोझ और तनाव को बताया है। उर्मि ऑटो के पंचर ठीक होने के दौरान बूढ़े ऑटो चालक से पूछती है कि क्या अधिक समय लगेगा। यह प्रश्न उसके मन की बेचैनी को बताता है, क्योंकि वह पहले ही देर कर चुकी है और घर पहुँचने की चिंता उसे सता रही है। बूढ़ा उसे स्नेहपूर्वक पुत्तर कहकर आश्वासन देता है कि काम बस पूरा ही होने वाला है।
इसके बाद बूढ़ा अचानक उससे पूछता है कि उसका बच्चा छोटा है या नहीं। यह प्रश्न बातचीत के संदर्भ से मेल नहीं खाता, इसलिए उर्मि को यह असंगत लगता है और वह थोड़ी हैरान हो जाती है। फिर भी वह चुपचाप सिर हिलाकर स्वीकृति दे देती है। इस प्रश्न के कारण उसे अपने पिता की याद आ जाती है, जिन्होंने उसके दोनों बच्चों को बड़ा किया था।
बूढ़ा ऑटो की तकनीकी बातों पर देर तक बड़बड़ाता रहता है। उर्मि बिना कुछ कहे ऑटो में बैठ जाती है और ऑटो फिर से तेज़ ट्रैफिक में शामिल हो जाता है। जब ऑटो सिग्नल पर रुकता है, तब उर्मि अपनी कलाई की घड़ी देखती है और मन-ही-मन बुदबुदाती है कि घर पहुँचकर उसे एक और महाभारत झेलनी पड़ेगी। वह सोचती है कि दिन भर रिपोर्टिंग के लिए भागदौड़ करने के बाद भी उसे घर जाकर खाना बनाना पड़ेगा। इससे उसका जीवन उसे मज़दूर-सा कठोर और थकाऊ लगने लगता है।
आगे बूढ़ा ड्राइविंग सीट पर भी बड़बड़ाता रहता है, लेकिन ट्रैफिक के शोर में उसकी आवाज़ साफ़ नहीं सुनाई देती। उर्मि का ध्यान पूरी तरह घर पर लगा रहता है। वह मन ही मन अनुराग से शिकायत करती है कि वे उससे बार-बार पूछताछ तो करते हैं, लेकिन घर के काम में मदद नहीं करते। उसे लगता है कि अगर सब्ज़ी काटने या दाल बनाने जैसे छोटे काम भी कर दिए जाएँ तो उसे कितना सहारा मिल सकता है। वह यह भी सोचती है कि समाज में यह मान लिया गया है कि औरत को कभी थकान या परेशानी नहीं होती और सारे काम उसी के हिस्से आते हैं। इन विचारों से उसका मन भारी हो जाता है और उसके मुँह से अनायास एक आह निकल जाती है।
इसी बीच बूढ़ा अचानक तेज़ आवाज़ में पूछता है कि कहाँ मुड़ना है। उर्मि चौंक जाती है और बाहर देखकर रास्ता बताती है। इससे स्पष्ट होता है कि वह अपने विचारों में इतनी डूबी हुई थी कि आसपास का ध्यान ही नहीं रहा।
ऑटो बिल्डिंग के नीचे रुक जाता है। उर्मि बूढ़े को पैसे देकर सामान समेटती है और भारी कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ने लगती है। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए वह सोचती है कि घर में तीन लोग भूखे उसका इंतज़ार कर रहे होंगे और उसे उनके लिए तथा अपने लिए खाना बनाना होगा। साथ ही अगले दिन की प्रेस कॉन्फ्रेंस और दफ्तर की चिंता भी उसे घेर लेती है। वह यह महसूस करती है कि जबकि वह नौकरी भी करती है, फिर भी घरेलू जिम्मेदारियों का पूरा बोझ उसी पर है। पति तो तीन महीनों से घर पर ही हैं। वह सोचती है कि उसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। अंत में वह दरवाज़े तक पहुँचकर बेल बजाती है और दीवार से सिर टिकाकर खड़ी हो जाती है।
7
पाठ– दरवाजा खुला। वे तीनों एक साथ ही उदास चेहरे लिए दरवाजे पर खड़े थे। छोटा दौड़कर उससे लिपट गया “मम्मा भूख लगी है !”
‘उसके तन-बदन में जैसे आग लग गई हो। कम-से-कम बच्चों को कुछ खाने को दे सकते थे’ … उसने सोचा लेकिन धीरे से बुदबुदाई, “अरे भीतर तो आने दे !”
अनुराग सिर नीचे किए हुए बोला, “बहुत लेट हो गई हो, ऐसा भी क्या ऑटो था ?”
उर्मि ने कुछ न कहा, एक नजर रसोई की ओर देखा। एकदम साफ-सुथरी। ‘दिन में कामवाली करके गई होगी तब से किचन में घुसे तक नहीं। इन्होंने सब्जी तक नहीं काटी। हर तरफ मुझे ही मरना है।’ वह भीतर-ही-भीतर सोचती रही। बेडरूम की तरफ जाते हुए विपरीत दिशा में हाथ से इशारा करते हुए बोली, “वहाँ अँधेरा क्यों किया है ?”
“हम सब बेडरूम में ही थे। सीरियल देख रहे थे इसलिए वहाँ क्या फायदा बेकार में लाइट …’’ अनुराग के साथ खड़ी बेटी शैफी ने कहा।
“चलो ठीक है, मैं हाथ-मुँह धोकर खाना पकाती हूँ।” वह तल्ख होकर बोली।… ‘सीरियल देख रहे हैं… बताओ।’
वे सब वहीं खड़े उसे हाथ-मुँह धोते चुपचाप देखते रहे।
उर्मि रसोई की तरफ मुड़ गई। ऐप्रन पहनकर फ्रिज से सब्जियाँ निकालकर स्लैब पर रखते हुए खीझ से बोली, “चाकू कहाँ है ?”
“डायनिंग टेबल पर होगा।” बेडरूम से अनुराग की आवाज थी। इनसे छोटी-छोटी मदद की भी उम्मीद नहीं की जा सकती … वह झल्लाहट में पैर पटकती डायनिंग टेबल तक पहुँची। ‘…यहाँ कहाँ रख दिया अँधेरे में ! कोई चीज जगह पर नहीं मिलती।’ वह बड़बड़ाई और दीवार तक पहुँचकर लाइट का बटन दबा दिया। रोशनी होते ही उसने टेबल पर देखा तो भौचक्की रह गई। वहाँ खाना बना रखा हुआ था। डोंगा, सब्जी और केसरोल ! उसने जल्दी से डोंगे का ढक्कन हटाया और देखकर ढक दिया।
इस सीन को लाइव देखने के लिए वे तीनों बेडरूम से निकलकर डायनिंग टेबल के पास इकट्ठा हो गए।
उन्हें पास देखकर उर्मि बुरी तरह झेंप गई। हथेलियों से मुँह छिपाती वहीं दुबककर बैठ गई।
वे तीनों जोर-जोर से हँसते ताली बजाते उसे घेरकर खड़े हो गए। छोटा, मौका देखकर माँ से चिपक गया और तुतलाता हुआ बोला, “मम्मा हमने बना दिया” इतनी रात हँसी की आवाज दूर तक जाती रही।
‘मैं भी क्या-क्या सोचती रहती हूँ’, उसने इन्हीं ठहाकों के बीच फिर सोचा। शर्म से उसके गालों पर लालिमा फैल गई।
शब्दार्थ-
उदास- दुखी, निराश
लिपट गया– गले लग गया
तन-बदन– पूरा शरीर
आग लग गई हो– बहुत क्रोध या गुस्सा आना
बुदबुदाई- धीमे स्वर में कुछ कहा
लेट- देर से
एक नजर- जल्दी से देखना
साफ-सुथरी– पूरी तरह स्वच्छ
कामवाली- घर का काम करने वाली महिला
भीतर-ही-भीतर– मन ही मन
विपरीत दिशा- उलटी या दूसरी ओर
इशारा- संकेत करना
फायदा- लाभ
बेकार- व्यर्थ, बिना कारण
तल्ख- कडुवा, कटु
रसोई– रसोईघर, किचन
ऐप्रन- कपड़ों को गंदा होने से बचाने वाला वस्त्र
डायनिंग टेबल– भोजन करने की मेज
उम्मीद– आशा
झल्लाहट- अधिक गुस्सा या चिड़चिड़ापन
पैर पटकती- गुस्से में जोर से पैर रखना
भौचक्की- अत्यंत आश्चर्यचकित
डोंगा- बड़ा कटोरा
केसरोल- खाना गर्म रखने का ढक्कन वाला बर्तन
सीन- दृश्य
लाइव– प्रत्यक्ष, सामने हो रहा
झेंप गई- शर्मिंदा हो गई
दुबककर– सिमटकर बैठ जाना
तुतलाता हुआ- अस्पष्ट बोलना
ठहाके– जोर-जोर से हँसना
लालिमा- हल्की लाल रंगत
व्याख्या- इस अंश में कहानी एक भावनात्मक मोड़ लेती है। जैसे ही दरवाज़ा खुलता है, उर्मि अपने पति अनुराग और दोनों बच्चों को उदास चेहरे लिए सामने खड़ा देखती है। छोटा बच्चा दौड़कर माँ से लिपट जाता है और भूख की शिकायत करता है। उर्मि को ऐसा लगता है मानो उसके शरीर में आग लग गई हो और वह सोचती है कि कम से कम बच्चों को कुछ खाने को तो दे सकते थे। फिर भी वह अपने गुस्से को दबाकर सहज स्वर में अंदर आने को कहती है।
अनुराग का सिर झुकाकर यह कहना कि वह बहुत देर से आई है, उर्मि के मन में पहले से मौजूद खीझ को और बढ़ा देता है। वह चुप रहती है लेकिन रसोई की ओर देखकर सब कुछ समझ जाती है। पूरी तरह साफ-सुथरी रसोई उसे यह एहसास कराती है कि दिन में कामवाली के जाने के बाद किसी ने रसोई में कदम तक नहीं रखा। इससे उसे लगता है कि घर के सारे काम करने की जिम्मेदारी केवल उसी की है और कोई भी उसकी मदद नहीं करता। इसी मानसिक स्थिति में वह बेडरूम की ओर जाते हुए लिविंग रूम में अंधेरा होने पर प्रश्न करती है।
बेटी शैफी का यह कहना कि सब लोग बेडरूम में सीरियल देख रहे थे और इसलिए बाहर लाइट नहीं जलाई, उर्मि को और चुभता है। उसे लगता है कि उसके थककर आने के बावजूद बाकी लोग आराम से मनोरंजन में लगे हुए थे। इसी तल्खी के साथ वह कहती है कि वह हाथ-मुँह धोकर खाना बनाएगी। यह कथन उसकी विवशता और दबे हुए आक्रोश को बताता है।
जब वह रसोई में जाकर ऐप्रन पहनती है और सब्जियाँ निकालती है, तब उसका गुस्सा साफ झलकता है। चाकू पूछने पर अनुराग का बेडरूम से जवाब देना और खुद उठकर मदद न करना उसकी झल्लाहट को और बढ़ा देता है। उसे लगता है कि उससे छोटी-सी मदद की भी उम्मीद नहीं की जा सकती। अँधेरे में चीज़ें न मिलने पर वह बड़बड़ाती हुई लाइट जलाती है और तभी उसकी आँखें खुली रह जाती हैं, डायनिंग टेबल पर पूरा खाना तैयार रखा हुआ होता है। डोंगा, सब्जी और केसरोल देखकर वह क्षणभर के लिए अवाक रह जाती है।
जैसे ही परिवार के तीनों सदस्य यह दृश्य देखने बाहर आते हैं, उर्मि को अपनी सारी शंकाओं और कठोर विचारों पर शर्म महसूस होती है। वह झेंपकर हथेलियों से मुँह ढँक लेती है और वहीं बैठ जाती है। तीनों हँसते हुए तालियाँ बजाते हैं और छोटा बच्चा माँ से लिपटकर मासूमियत से कहता है कि उन्होंने खाना बना लिया है। यह क्षण उर्मि के लिए भावनात्मक रूप से बहुत सशक्त है।
अंत में उर्मि सोचती है कि वह बेवजह कितना कुछ गलत सोचती रही। परिवार की इस छोटी-सी पहल और स्नेहपूर्ण व्यवहार से उसकी सारी थकान और शिकायतें पिघल जाती हैं। उसके गालों पर शर्म और आत्मग्लानि की लालिमा फैल जाती है।
(‘लकीर’ कहानी संग्रह से)
Conclusion
इस पोस्ट में ‘डिनर’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ MSBSHSE कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। इस कहानी में लेखक गजेंद्र रावत ने आधुनिक नारी के जीवन-संघर्ष को बहुत सहज और संवेदनशील रूप में प्रस्तुत किया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।