वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी पाठ सार

PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 11 “Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 11 Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi Summary with detailed explanation of the lesson “Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary

इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड  कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 11 वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi(वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी)

By गोविंद कुमार ‘गुंजन’

 

प्रस्तुत कहानी ‘वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी’ में लेखक ने मनुष्य की आदत पर प्रकाश डाला है। मनुष्य की कोई आदत जो कभी नहीं बदलती वह कभी-कभी किसी दूसरे के कारण बदल जाती है। लेखक के देर तक सोने की आदत को एक छोटी सी चिड़िया सुबह उठने की आदत में बदल देती है।

 

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वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी पाठ सार Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi Summary

“वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी…….” गोविंद कुमार गुंजन द्वारा रचित एक बहुत ही अच्छी कहानी है। लेखक अपनी इस कहानी के द्वारा समझाना चाहते हैं कि मनुष्य की आदत कभी नहीं बदलती किंतु कभी-कभी कुछ कारण ऐसे बन जाते हैं जिनके कारण मानव को अपनी आदतों में बदलाव लाना पड़ता है।

कहानी में लेखक बताते हैं कि मोबाइल फ़ोन में अलार्म मौजूद होने के कारण बाज़ार में अलार्म घड़ियों की माँग कम हो गई है। परंतु एक समय में अलार्म घड़ी को महत्वपूर्ण वस्तु माना जाता था। परीक्षा के दिनों में, सुबह जल्दी यात्रा पर जाने मे तथा सुबह समय पर उठाने में अलार्म घड़ियाँ बहुत काम आती थीं। परन्तु मोबाइल फ़ोन की तरह पहले सबके पास अलार्म घड़ियाँ मौजूद नहीं रहती थीं। किसी को घड़ी किसी के द्वारा उपहार में दी गई होती थी। बच्चों को परीक्षा में पास होने पर और कॉलेज में प्रवेश लेने पर ही घड़ियाँ दिलवाई जाती थी। और शादी में दूल्हे को ससुराल पक्षवाले उसे घड़ी जरूर देते थे। कई सरकारी विभागों में कार्यकाल समाप्त होने पर भी घड़ी देने का रिवाज़ था। लेखक को पहली बार कलाई घड़ी कॉलेज में प्रवेश करने पर मिली थी और पहली अलार्म घड़ी भी कॉलेज में एक निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रूप में ही मिली थी। जब लेखक के पास कोई घड़ी नहीं हुआ करती थी, तब अपने पिता जी के कहे अनुसार, वे अपने तकिये से कहकर सो जाया करते थे और इस तरीके को उन्होंने सही काम करते भी पाया था कि तकिया उनकी बात सुनता है और ठीक समय पर उन्हें जगा भी देता है। लेखक को सुबह-सुबह उठकर पढ़ना पसंद नहीं था। उन्हें देर रात तक पढ़ना अच्छा लगता था। रात के अकेले में बीच रात से सुबह तक पढ़ते रहना और सुबह-सुबह नींद आ जाने पर देर से उठना लेखक की आदत बनती जा रही थी। लेखक को पुरस्कार में जो अलार्म घड़ी मिली थी, जो तीस सालों से भी अधिक समय से लेखक के पास बंद हालत में है, और वह अब ठीक होने की हालत में नहीं है। 1980 से 1989 तक के बीच के समय में लेखक की नई-नई नौकरी लगी थी। लेखक पहली बार घर से बाहर अकेला निकला था और वह एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगा था। लेखक के लिए अकेले रहने का यह पहला अनुभव था। लेखक के लिए रातें जाग-जागकर बिताना, कविताएँ लिखना और कविताओं में डूबे रहना मानो किसी स्वर्ग में जीने के समान लग रहा था परंतु अपने उस अकेलेपन में, रात भर जागने की आदत के कारण लेखक का सुबह जल्दी उठना मुश्किल होने लगा था। 

लेखक के कमरे में सिर्फ़ एक दरवाज़ा ही था। वहां न कोई खिड़की थी, न कोई रोशनदान था परंतु फिर भी वह कमरा लेखक को बहुत प्यारा लगता था। वहां लेखक की देर तक रात में पढ़ने-लिखने की बुरी आदत बढ़ती जा रही थी और वहां उसकी इस आदत के बीच में कोई बाधा भी नहीं थी। लेखक को सिर्फ कठिनाई सुबह होती थी, क्योंकि सुबह उसकी नींद नहीं खुलती थी। इस कारण उसका पूरा दिन गड़बड़ा जाता था। लेखक अपनी किताबों की दुनिया में इतना खोया हुआ रहता था कि उसे इस बात की कोई खबर ही हुई कि कब एक चिड़िया उसके कमरे के खुले दरवाज़े से उसके कमरे में आकर दीवार पर लगी पंत जी की तस्वीर के पीछे अपना घोंसला बनाने लगी थी, लेखक इस बात से बेखबर ही रहा। शाम को देर तक लेखक के कमरे का दरवाज़ा खुला रहता था इसलिए खिड़की या रोशनदान न होने के बावजूद भी वह चिड़िया आराम से कमरे ने आ जाती थी। एक सुबह जब लेखक नींद में था तब चिड़िया उसके पलंग के सिरहाने बैठकर एक अलग तरह की चिढ़ और गुस्से से भरी चीं… चीं… कर रही थी। लेखक कुछ समझा नहीं परंतु जैसे ही उठकर दरवाज़ा खोला तो चिड़िया बाहर चली गई। लेखक को तब समझ में आया कि कमरे में खिड़की या रोशनदान होता, तो वह चिड़िया लेखक को जगाए बिना स्वयं ही बाहर चली जाती परंतु दरवाजा बंद होने पर उसके बाहर जाने का दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था इसीलिए वह दरवाजा खुलवाने के लिए लेखक को जगा रही थी, और लेखक के न जागने पर वह नाराज़ भी हो रही थी। 

दूसरे दिन सुबह फिर लेखक की नींद नहीं खुली थी। देर रात तक पढ़ा था। अचानक चिड़िया की झुंझलाहट भरी चहचहाहट ने जगा दिया। पलंग के सिरहाने बैठी वह चिड़िया मुझे गुस्से से देख रही थी, मानो मेरे देर तक सोने के कारण वह मुझसे नाराज़ हो। लेखक ने उठकर दरवाज़ा खोला, तो वह चिड़िया बाहर निकलकर चली गई। अब यह रोज़ ही की बात हो गई थी। जब लेखक अपने छोटे से कमरे के बिस्तर को छोड़कर सुबह में चिड़िया को बाहर जाने देने के लिए दरवाज़ा खोलता, तो दरवाज़े से ताजी सुबह के शरीर की आभा कमरे को चमका जाती थी। ठंडी हवा का स्पर्श और बहुत कोमल उजाला लेखक की आँखों को सहलाता था। लेखक को ऐसा लगा जैसे वह देर तक सोकर किसी अनुपम व् अनोखे अनुभव को बेकार करता रहा था। उस चिड़िया की चहचहाहट किसी घड़ी की यंत्र से संबंधित आवाज नहीं थी, बल्कि वह एक अपनेपन से भरी पुकार थी, जो लेखक को आसमान से उतर कर आती हुई सुबह के समय की शुभ घड़ी में पुकारती थी। 

उस चिड़िया ने भी लेखक के छोटे से कमरे को खोलकर उसे भी सुबह के सौंदर्य के रत्न दिखा दिए थे। दरवाज़ा खोलते ही चिड़िया चहचहाती हुई बाहर जाती, मानो लेखक से कहती हुई जा रही हो कि देखो यह सुंदर नकाशी वाली सुंदर डिबिया खुल रही है, फिर यह बंद हो जाएगी। फिर तो दिनभर केवल सुंदर नकाशी से सजी डिबिया ही दिखाई देगी, इसके रत्न नहीं दिखेंगे।

लेखक उस ममतामयी चिड़िया के उस उपकार को बहुत आदर से महसूस करता है। उसने लेखक को उस घड़ी जगना सिखाया, जब धरती ओस के मोती बिखराकर हर नए खिल रहे फूल का अभिनंदन कर रही होती है।

 

 

वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी पाठ व्याख्या Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi Lesson Explanation

पाठ – अब मोबाइल फ़ोन में अलार्म उपलब्ध रहने से अलार्म घड़ियों की बाज़ार में माँग घटने लगी है परंतु एक समय घरों में अलार्म घड़ी महत्वपूर्ण वस्तु हुआ करती थी। परीक्षा के दिनों में सिरहाने रखी अलार्म घड़ी भोर में जगाती थी। सुबह जल्दी यात्रा करनी होती, तो रात को घड़ी में अलार्म लगा देते थे ताकि सुबह समय पर उठा जा सके। अलार्म घड़ियाँ बहुत काम आती थीं, परंतु आज जैसे हर किसी के पास मोबाइल फ़ोन है, कुछ इसी तरह पहले सबके पास घड़ियाँ उपलब्ध नहीं रहती थीं। कलाई पर घड़ी एक उपहार हुआ करती थी। परीक्षा में पास होने पर और कॉलेज में दाखिला होने पर बच्चों को दिलवाई जाती थी, तो शादी में दूल्हे को ससुराल पक्षवाले घड़ी अवश्य देते थे। कई सरकारी विभागों में सेवा-निवृत्ति पर भी घड़ी देने की परंपरा थी। हम लोग कहते थे कि सेवा-निवृत्ति के बजाय नौकरी लगने पर विभाग द्वारा पहले ही कर्मचारी को एक घड़ी भेंट में दी जानी चाहिए ताकि वह समय पर अपने काम पर उपस्थित हुआ करे।

शब्दार्थ –
भोर – प्रातः काल
उपलब्ध – मौजूद
उपहार – तौफ़ा, भेंट
दाखिला – प्रवेश
सेवा-निवृत्ति – रिटायरमेंट, कार्यकाल समाप्त होना

व्याख्यालेखक बताते हैं कि आज के समय में सभी के पास मोबाइल फ़ोन में अलार्म मौजूद होने के कारण बाज़ार में अलार्म घड़ियों की माँग घट रही है। परंतु एक समय ऐसा भी था जब सभी घरों में अलार्म घड़ी महत्वपूर्ण वस्तु मानी जाती थी। जब परीक्षा के दिन होते तो सिरहाने पर रखी अलार्म घड़ी ही सुबह होने पर जगाती थी। यदि किसी को सुबह जल्दी यात्रा करनी होती, तो रात को घड़ी में अलार्म लगा देते थे ताकि सुबह समय पर उठा जा सके। उस समय अलार्म घड़ियाँ बहुत काम आती थीं। परन्तु आज के समय में जैसे हर किसी के पास मोबाइल फ़ोन है, कुछ इसी तरह पहले के समय में सबके पास अलार्म घड़ियाँ मौजूद नहीं रहती थीं। किसी की कलाई पर बंधी घड़ी उसे किसी के द्वारा उपहार में दी गई होती थी। बच्चों को परीक्षा में पास होने पर और कॉलेज में प्रवेश लेने पर ही घड़ियाँ दिलवाई जाती थी। और शादी में दूल्हे को ससुराल पक्षवाले घड़ी जरूर देते थे। कई सरकारी विभागों में कार्यकाल समाप्त होने पर भी घड़ी देने का रिवाज़ था। लेखक का कहना था कि कार्यकाल समाप्त होने के बजाय नौकरी लगने पर विभाग द्वारा पहले ही कर्मचारी को एक घड़ी भेंट में दी जानी चाहिए ताकि वह सभी समय पर अपने काम पर उपस्थित हुआ करे।

 

पाठ – मुझे पहली बार कलाई घड़ी तब मिली थी, जब मैंने कॉलेज में प्रवेश पाया था और पहली अलार्म घड़ी भी मुझे कॉलेज में एक निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार स्वरूप मिली थी। उस अलार्म घड़ी में चाबी भरकर अलार्म की घंटी बार-बार बजाकर उसके सम्मोहक प्रभाव को मैं बहुत गहराई तक महसूस करता था। वह मुझे जागृत करने वाली ध्वनि थी, जो रोमांचित कर देती थी। उस ध्वनि का नशा और स्वाद अब महँगे-से-महँगे अलार्म ध्वनि वाले मोबाइल फ़ोन से भी नहीं मिलता। संवेदना के स्तर सदैव एक जैसे नहीं रहते। कभी उनकी सघनता घट जाती है, तब बड़ी-बड़ी बातें भी उतना रस नहीं देतीं। यह सब मानवीय मनों की संवेदनाओं का खेल है।

शब्दार्थ –
सम्मोहक – वह जो मोह लेता हो, मोहक, लुभावना
संवेदना – अनुभूति, अनुभव
सघनता – अधिकता, गंभीरता, प्रगाढ़ता, गाढ़ापन

व्याख्या – लेखक को पहली बार कलाई घड़ी तब मिली थी, जब उन्होंने कॉलेज में प्रवेश किया था और उन्हें पहली अलार्म घड़ी भी कॉलेज में एक निबंध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार के रूप में ही मिली थी। उस अलार्म घड़ी में चाबी भरकर अलार्म की घंटी बार-बार बजाकर उसके लुभावने प्रभाव को लेखक बहुत गहराई तक महसूस करता था। वह आवाज लेखक को जगाने वाली थी, जो उसे रोमांचित कर देती थी। उस आवाज का जो नशा और स्वाद था, लेखक को वह अब महँगे-से-महँगे अलार्म की आवाज वाले मोबाइल फ़ोन से भी नहीं मिलता। लेखक बताते हैं कि अनुभव का स्तर हमेशा एक जैसे नहीं रहता। कभी अनुभव की गंभीरता घट जाती है, तब बड़ी-बड़ी बातें भी उतना आनंद नहीं देतीं। लेखक को यह सब मानवीय मनों के अनुभवों का खेल लगता है।

पाठ- जिन दिनों हमारे पास कोई घड़ी नहीं थी, तब पिता जी कहा करते थे कि तुम्हें सुबह जितने बजे भी उठना हो, तुम अपने तकिये से कहकर सो जाओ कि सुबह मुझे इतने बजे उठा देना। बस, फिर तुम्हारी नींद सुबह उतने ही बजे खुल जाएगी। बचपन में कितनी ही बार इस फ़ॉर्मूले को अपनाया था और सही पाया था। तकिया हमारी बात सुनता है और ठीक समय पर हमें जगा भी देता है। यह कौतूहल भरा आश्चर्यजनक अनुभव बहुत अच्छा लगता था, भले ही तब उसका रहस्य हमें पता नहीं था। मुझे सुबह-सुबह उठकर पढ़ना रास नहीं आता था। रात में देर तक पढ़ना सुहाता था। रात्रि के एकांत में मध्य रात्रि से भोर तक पढ़ते रहना और सुबह-सुबह नींद आ जाने पर देर से उठना मेरी आदत होती जा रही थी। कई बार रात को दो या तीन बजे तक पढ़ने के कारण सुबह जल्दी नींद नहीं खुलती थी और सुबह का सौंदर्य सिर्फ़ कविताओं में ही महसूस किया जाता था। पुरस्कार में मिली वह अलार्म घड़ी जब खराब हुई, तो फिर सुधर नहीं सकी। आज भी वह तीन दशकों से अधिक समय से मेरे पास बंद हालत में है, वह अब सुधरने योग्य नहीं रही परंतु मैं भी कहाँ सुधरने लायक बचा था! देर रात तक पढ़ना और सुबह देर तक सोना एक अभ्यास ही बन गया था।

शब्दार्थ –
फ़ॉर्मूले – तरीके
कौतूहल – जिज्ञासा, उत्सुकता
आश्चर्यजनक – हैरान
अनुभव – काम की जानकारी, तजुर्बा
रास – पसंद
सुहाता – सुखद, मनभावन, प्यारा
एकांत – अकेले
सौंदर्य – सुंदरता
सुधर – सही, अच्छी
तीन दशक – 30 साल (तीस वर्ष)
लायक – उचित, ठीक
अभ्यास – किसी काम को बार-बार करना, आदत

व्याख्यालेखक बताते हैं कि पहले के दिनों में जब उनके पास कोई घड़ी नहीं हुआ करती थी, तब लेखक के पिता जी उनसे कहा करते थे कि उन्हें सुबह जितने बजे भी उठना हो, वे अपने तकिये से कहकर सो जाया करे कि सुबह उन्हें इतने बजे उठा देना। बस, फिर उनकी नींद सुबह उतने बजे ही खुल जाएगी। बचपन में न जाने लेखक ने कितनी ही बार इस तरीके को अपनाया था और इस तरीके को सही काम करते भी पाया था कि तकिया उनकी बात सुनता है और ठीक समय पर उन्हें जगा भी देता है। यह जिज्ञासा से भरा हैरान करने वाला अनुभव लेखक को बहुत अच्छा लगता था, भले ही उस समय इस बात का रहस्य लेखक को पता नहीं था। लेखक को सुबह-सुबह उठकर पढ़ना पसंद नहीं था। उन्हें देर रात तक पढ़ना अच्छा लगता था। रात के अकेले में बीच रात से सुबह तक पढ़ते रहना और सुबह-सुबह नींद आ जाने पर देर से उठना लेखक की आदत बनती जा रही थी। कई बार रात को दो या तीन बजे तक पढ़ने के कारण लेखक की सुबह जल्दी नींद नहीं खुलती थी और लेखक के द्वारा सुबह की सुंदरता को सिर्फ़ कविताओं में ही महसूस किया जाता था। लेखक को पुरस्कार में जो अलार्म घड़ी मिली थी, जब वह खराब हुई, तो फिर वह ठीक नहीं की जा सकी। वर्तमान समय में भी वह घड़ी तीस सालों से भी अधिक समय से लेखक के पास बंद हालत में है, और वह अब ठीक होने की हालत में नहीं है। परंतु लेखक भी मानता है कि घड़ी की ही तरह वह भी अब ठीक होने की हालत में नहीं है। क्योंकि देर रात तक पढ़ना और सुबह देर तक सोना एक लेखक की आदत ही बन गया है।

 

पाठ – वह अस्सी का दशक था, मेरी नई-नई नौकरी लगी थी। पहली बार घर से बाहर निकला था। एक कमरा किराए पर लेकर रहता था। अकेले रहने का यह पहला पहला अनुभव। कमरे में मैंने महादेवी, पंत और निराला जी की सुंदर तसवीरें फ्रेम करवाकर टाँग दी थीं। एक तरफ़ गुसाईं तुलसीदास जी का चित्र, अपनी पुस्तकें और अपना एकांत । रातें जाग-जागकर बिताना, कविताएँ लिखना और कविताओं में डूबे रहना जैसे स्वर्ग में जीना था परंतु अपने उस एकांत में, निशाचरी वृत्ति के कारण फिर सुबह जल्दी उठना मुश्किल होने लगा। पड़ोसी कृपा करके दरवाज़ा खटखटाते तो नींद खुलती। देर-सवेर दफ़्तर पहुँचता । अलार्म घड़ी भी नहीं थी और न ही खरीदने का ख्याल आया। मोबाइल फोन तो तब देखे भी नहीं थे।
मेरे कमरे में सिर्फ़ एक दरवाज़ा ही था। न कोई खिड़की थी, न कोई रोशनदान परंतु फिर भी वह कमरा बहुत प्यारा लगता था। किराया भी काफ़ी कम था। इन सबसे बढ़कर पड़ोसी बहुत अच्छे थे। देर तक रात में पढ़ने-लिखने का व्यसन बढ़ता जा रहा था और इसमें कोई व्यवधान नहीं था। हिंदी और अंग्रेज़ी का बहुत सारा साहित्य मैंने उस एकांत में खंगाल डाला। वह सुख अपूर्व था। कठिनाई सिर्फ़ सुबह की थी, जब नींद नहीं खुलती थी। दिन के काम और दफ़्तर की नई-नई जिम्मेदारी देर से उठने के कारण अव्यवस्थित हो जाती। दिन गड़बड़ा जाता था। कई बार तकिये से सुबह जल्दी उठा देने की भी मिन्नतें करता था परंतु तब तकिये ने मेरी बात सुनना बंद कर दिया था। ऐसे ही दिन गुज़र रहे थे।

शब्दार्थ –
अस्सी का दशक – 1980 से 1989 तक का समय
निशाचरी – राक्षसी, रात में घूमने वाली, रात में सक्रिय रहने वाली (जैसे उल्लू, चमगादड़)
वृत्ति – कार्य, व्यापार
ख्याल – विचार
व्यसन – बुरी आदत, लत
व्यवधान – बाधा, परदा, ओट
खंगाल – किसी चीज़ को अच्छे से साफ़ करना, छानबीन करना, या पूरी तरह से खाली कर देना/तलाशना
अपूर्व – अद्‌भुत
मिन्नतें – प्राथनाएँ

व्याख्या1980 से 1989 तक के बीच के समय में लेखक की नई-नई नौकरी लगी थी। लेखक पहली बार घर से बाहर अकेला निकला था और वह एक कमरा किराए पर लेकर रहने लगा था। लेखक के लिए अकेले रहने का यह पहला अनुभव था। लेखक ने अपने कमरे में महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्द पंत और निराला जी की सुंदर तस्वीरों को फ्रेम करवाकर टाँग दिया था। कमरे के एक तरफ़ लेखक ने गुसाईं तुलसीदास जी का चित्र, अपनी पुस्तकें और अपने अकेलेपन को रखा था। लेखक के लिए रातें जाग-जागकर बिताना, कविताएँ लिखना और कविताओं में डूबे रहना मानो किसी स्वर्ग में जीने के समान था परंतु अपने उस अकेलेपन में, रात भर जागने की आदत के कारण लेखक का सुबह जल्दी उठना मुश्किल होने लगा था। लेखक अपने पड़ोसी का आभार मानता था जो दरवाज़ा खटखटाते थे तो लेखक की नींद खुलती थी। वह सवेरे देर से दफ़्तर पहुँचता था। उस समय लेखक के पास अलार्म घड़ी भी नहीं थी और न ही कभी लेखक को अलार्म घड़ी खरीदने का विचार आया। उन दौरान मोबाइल फोन तो किसी ने देखे भी नहीं थे।
लेखक के कमरे में सिर्फ़ एक दरवाज़ा ही था। वहां न कोई खिड़की थी, न कोई रोशनदान था परंतु फिर भी वह कमरा लेखक को बहुत प्यारा लगता था। उसका किराया भी काफ़ी कम था। और इन सबसे बढ़कर वहां पड़ोसी बहुत अच्छे थे। वहां लेखक की देर तक रात में पढ़ने-लिखने की बुरी आदत बढ़ती जा रही थी और वहां उसकी इस आदत के बीच में कोई बाधा भी नहीं थी। लेखक ने हिंदी और अंग्रेज़ी के बहुत सारे साहित्य उस एकांत में पूरी तरह पढ़ व् समझ डाले थे। लेखक को वहां अद्धभुत सुख मिलता था। लेखक को सिर्फ कठिनाई सुबह होती थी, क्योंकि सुबह उसकी नींद नहीं खुलती थी। लेखक के दिन के काम और दफ़्तर की नई-नई जिम्मेदारियाँ उसके देर से उठने के कारण अव्यवस्थित हो जाती थी। उसका पूरा दिन गड़बड़ा जाता था। लेखक कई बार अपने तकिये से सुबह जल्दी उठा देने की भी प्रार्थनाएँ करता था परंतु अब उसके तकिये ने उसकी बात सुनना बंद कर दिया था जैसे वह बचपन में सुना करता था और लेखक को उठा देता था। परन्तु अब लेखक के दिन ऐसे ही रात को देर तक जागने और सुबह देर से उठने में बीत रहे थे।

 

पाठ – अपनी किताबों की दुनिया में खोया हुआ मैं इतना बेख़बर था कि कब एक चिड़िया कमरे के खुले दरवाज़े से कमरे में आकर दीवार पर लगी पंत जी की तस्वीर के पीछे अपना घोंसला बनाने लगी, मुझे पता नहीं चला। जब पता चला, तब तक उसका अपने घोंसले में गृह-प्रवेश हो चुका था और वहाँ वह अपनी गृहस्थी जमा चुकी थी।
शाम को देर तक मेरा दरवाज़ा खुला रहता था इसलिए खिड़की या रोशनदान न होने के बावजूद भी वह चिड़िया आराम से पधार जाती। अपने घोंसले में आराम करती। मैं अपनी किताबों की दुनिया में खोया कभी उसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं देता था। एक सुबह मैं नींद में था। चिड़िया मेरे पलंग के सिरहाने बैठकर एक अलग तरह की झुंझलाहट से भरी चीं… चीं… कर रही थी। उसकी आवाज़ तीव्र थी, मानो मेरे न उठने पर वह नाराज हो। उसकी आवाज़ से मेरी नींद खुली परंतु मैं उठा नहीं। चिड़िया बार-बार पलंग के सिरहाने आकर फुदकती और अपनी तीव्र ध्वनि से कमरे को गुँजा रही थी। मैं कुछ समझा नहीं परंतु उठकर दरवाज़ा खोला तो वह बाहर चली गई।
मैं तब समझा कि सुबह-सुबह चिड़िया को बाहर जाना होता है। घोंसला तो उसका केवल रातभर का आश्रय है। दिन में वह घोंसले में आराम से पड़ी नहीं रहती। छुट्टी के दिन हम घर में भले ही पड़े रहें, चिड़िया को दिन में घोंसले में रहना नहीं सुहाता।
कमरे में खिड़की या रोशनदान होता, तो वह चिड़िया मुझे जगाए बिना बाहर चली जाती परंतु दरवाजा बंद होने पर उसके बाहर जाने का दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था इसीलिए वह दरवाजा खुलवाने के लिए मुझे जगा रही थी, मेरे न जागने पर वह नाराज़ भी हो रही थी। उसकी चहचहाहट में जिस झुंझलाहट को मैंने महसूस किया था, उसका कारण भी मुझे समझ में आ चुका था। दरवाजा खुलते ही चिड़िया तेजी से चली गई थी और शाम को फिर लौट आई, चुपचाप पंत जी की तस्वीर के पीछे बनाए हुए अपने घोंसले में!

शब्दार्थ –
बेख़बर – जिसे कोई खबर या जानकारी न हो, अनजान
गृह-प्रवेश – नवनिर्मित घर में निवास करना
गृहस्थी – परिवार, वंश
पधार – प्रवेश करना
झुंझलाहट – चिढ़, ग़ुस्सा
तीव्र – तेज
फुदकती – कुदकना
गुँज – ध्वनि की प्रतिध्वनि या गूँज
आश्रय – ठिकाना
सुहाता – अच्छा लगना

व्याख्यालेखक अपनी किताबों की दुनिया में इतना खोया हुआ रहता था कि उसे इस बात की कोई खबर नहीं हुई कि कब एक चिड़िया उसके कमरे के खुले दरवाज़े से उसके कमरे में आकर दीवार पर लगी पंत जी की तस्वीर के पीछे अपना घोंसला बनाने लगी थी, लेखक इस बात से बेखबर ही रहा। परन्तु जब उसे इस बात का पता चला, तब तक चिड़िया का उसके घोंसले में पूरी तरह गृह-प्रवेश हो चुका था और अब वह अपने घौंसलें में अपनी गृहस्थी जमा चुकी थी। अर्थात जब लेखक को पता चला कि उसके करे में पंत जी की तस्वीर के पीछे चिड़िया ने घौंसला बनाया है तब तक चिड़िया अपना पूरा घौंसला बना चुकी थी और उसमें रहने भी लगी थी।
शाम को देर तक लेखक के कमरे का दरवाज़ा खुला रहता था इसलिए खिड़की या रोशनदान न होने के बावजूद भी वह चिड़िया आराम से कमरे में आ जाती थी। वह अपने घोंसले में आराम करती थी। लेखक अपनी किताबों की दुनिया में ही खोया रहता था और वह कभी चिड़िया की तरफ़ ध्यान ही नहीं देता था। एक सुबह जब लेखक नींद में था तब चिड़िया उसके पलंग के सिरहाने बैठकर एक अलग तरह की चिढ़ और गुस्से से भरी चीं… चीं… कर रही थी। उसकी आवाज़ बहुत तेज थी, ऐसा लग रहा था मानो वह लेखक के सुबह न उठने पर नाराज हो रही हो। उसकी आवाज़ से लेखक की नींद खुली परंतु वह नहीं उठा। चिड़िया बार-बार पलंग के सिरहाने आकर कूदती जा रही थी और अपनी तेज आवाज से कमरे को भर रही थी। लेखक कुछ समझा नहीं परंतु जैसे ही उठकर दरवाज़ा खोला तो चिड़िया बाहर चली गई।
लेखक को तब समझ में आया कि सुबह-सुबह चिड़िया को बाहर जाना होता है। घोंसला में तो वह केवल रातभर आराम करती है। दिन में वह घोंसले में आराम से पड़ी नहीं रहती। छुट्टी के दिन हम घर में भले ही पड़े रहें, परन्तु चिड़िया को दिन में घोंसले में रहना बिलकुल अच्छा नहीं लगता।
कमरे में खिड़की या रोशनदान होता, तो वह चिड़िया लेखक को जगाए बिना स्वयं ही बाहर चली जाती परंतु दरवाजा बंद होने पर उसके बाहर जाने का दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था इसीलिए वह दरवाजा खुलवाने के लिए लेखक को जगा रही थी, और लेखक के न जागने पर वह नाराज़ भी हो रही थी। उसकी चहचहाहट में जिस चीड़ और गुस्से को लेखक ने महसूस किया था, उसका कारण भी अब लेखक को समझ में आ चुका था। दरवाजा खुलते ही चिड़िया तेजी से बाहर चली गई थी और शाम को फिर लौट आई थी, और चुपचाप पंत जी की तस्वीर के पीछे बनाए हुए अपने घोंसले में आराम करने लगी थी।

Vah chidiya Ek Alarm Ghadi Thi Summary img1

पाठ – दूसरे दिन सुबह फिर मेरी नींद नहीं खुली थी। देर रात तक पढ़ा था। अचानक चिड़िया की झुंझलाहट भरी चहचहाहट ने जगा दिया। पलंग के सिरहाने बैठी वह चिड़िया मुझे गुस्से से देख रही थी, मानो मेरे देर तक सोने के कारण वह मुझसे नाराज़ हो। मैं थोड़ी देर उसकी चहचहाहट का आनंद लेता रहा। उसने मेरी रज़ाई का कोना चोंच से पकड़कर खींचा, वह मुझसे ज़रा भी डर नहीं रही थी। वह रजाई के उस हिस्से पर आ बैठी जो मेरे सीने पर था। उसका इस तरह मेरे ऊपर आना बहुत अच्छा लगा था। पंत जी की वाणी में लिखी पंक्तियाँ मानस में तैरने लगीं-
तूने ही पहले बहुदर्शिनी, गाया जागृति का गाना,
श्री सुख-सौरभ का नभचारिणी, गूँथ दिया ताना-बाना,
खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि, खिली सुरभि, डोले मधुबाल,
स्पंदन कंपन औ’ नवजीवन, सीखा जग ने अपनाना।
सचमुच, उस सुबह पलकें खुलने पर ऐसा ही लगा, जैसे किसी ने जागृति का गीत गाया हो। उस नभचारिणी ने सचमुच श्री सुख-सौरभ का ताना-बाना उस सूने कमरे में गूँथ दिया था। ऐसी एक सुवर्ण छवि कमरे में छाई थी, जिसे पहले मैंने कभी महसूस नहीं किया था।
उस सुबह चिड़िया ने मेरी रज़ाई का कोना अपनी चोंच से खींचकर अपनी चहचहाहट से जगाया था। बचपन में इतने ही प्यार और इतनी ही झुंझलाहट से देर तक सोने पर माँ जगाती थी। मैं अपने चारों ओर फैले हुए उस श्री सुख-सौरभ की स्वर्णिम छवि से अभिभूत होकर जागा था।
मैंने उठकर दरवाज़ा खोला, तो वह चिड़िया बाहर निकलकर चली गई। अब यह रोज़ ही की बात हो गई थी। सुबह चिड़िया को कमरे से बाहर जाना होता था, वह जल्दी जग जाती और दरवाज़ा खुलवाने के लिए मेरे पलंग के सिरहाने बैठकर चहचहाती और मेरी नींद खुल जाती।

शब्दार्थ –
वाणी – आवाज
मानस – मन
जागृति – जागना, जागरूकता, चेतना, या सचेत होना
नभचारिणी – आकाश में घूमने वाली
सौरभ – अच्छी गन्ध या महक, खुशबु
ताना-बाना – बुनावट का तार, बुना हुआ, बुनी हुई वस्तु
सूने – वीरान
सुवर्ण छवि – सुनहरी आकृति
अभिभूत – पूरी तरह से किसी भावना (जैसे खुशी, दुःख, आश्चर्य) या स्थिति से घिर जाना या हावी हो जाना, पराजित महसूस करना

व्याख्याअगले दिन भी सुबह फिर लेखक की नींद नहीं खुली थी क्योंकि वह देर रात तक पढ़ रहा था। अचानक चिड़िया की चीड़ और गुस्से से भरी चहचहाहट ने लेखक को जगा दिया। पलंग के सिरहाने बैठी वह चिड़िया लेखक को गुस्से से देख रही थी, ऐसा लग रहा था मानो वह लेखक के देर तक सोने के कारण लेखक से नाराज़ हो। लेखक अचानक नहीं उठा, वह थोड़ी देर तक उसकी चहचहाहट का आनंद लेता रहा। चिड़िया ने लेखक की रज़ाई का कोना चोंच से पकड़कर खींचा, वह लेखक से थोड़ा सा भी नहीं डर रही थी। वह रजाई के उस हिस्से पर आकर बैठी थी जो लेखक के सीने पर था। लेखक को उसका इस तरह लेखक के सीने के ऊपर आना बहुत अच्छा लगा था। उस समय लेखक के मन में पंत जी की वाणी में लिखी पंक्तियाँ तैरने लगीं-
तूने ही पहले बहुदर्शिनी, गाया जागृति का गाना,
श्री सुख-सौरभ का नभचारिणी, गूँथ दिया ताना-बाना,
खुले पलक, फैली सुवर्ण छवि, खिली सुरभि, डोले मधुबाल,
स्पंदन कंपन औ’ नवजीवन, सीखा जग ने अपनाना।
उस सुबह पलकें खुलने पर लेखक को सचमुच ऐसा लगा, जैसे किसी ने चेतना को जगाने वाला गीत गाया हो। ऐसा लग रहा था उस आकाश में घूमने वाली ने सचमुच ख़ुशी और आनंद की खुशबु की बनावट से उस वीरान कमरे को भर दिया था। उस सुबह लेखक ने अपने कमरे में ऐसी एक सुनहरी आकृति को महसूस किया था, जिसे पहले लेखक ने कभी महसूस नहीं किया था।
उस सुबह चिड़िया ने लेखक की रज़ाई का कोना अपनी चोंच से खींचकर अपनी चहचहाहट से जगाया था। बचपन में इतने ही प्यार और इतनी ही चीड़ और गुस्से से देर तक सोने पर लेखक की माँ उसे जगाती थी। लेखक अपने चारों ओर फैले हुए उस ख़ुशी और आनंद की खुशबु की सुनहरी आकृति से मानो पराजित होकर जागा था। अर्थात उस सुबह लेखक ख़ुशी की भावना से घिर कर जागा था।
लेखक ने उठकर दरवाज़ा खोला, तो वह चिड़िया बाहर निकलकर चली गई। अब यह रोज़ ही की बात हो गई थी। सुबह चिड़िया को कमरे से बाहर जाना होता था, वह जल्दी जग जाती और दरवाज़ा खुलवाने के लिए लेखक के पलंग के सिरहाने बैठकर चहचहाती और लेखक की नींद खुल जाती।

 

पाठ – जब मैं अपनी बंद कोठरी की शय्या को छोड़कर भोर में चिड़िया को बाहर जाने देने के लिए दरवाज़ा खोलता, तो दरवाज़े से उस ताजी सुबह की देह की कांति कमरे में कौंध जाती। ठंडी हवा का स्पर्श और बहुत कोमलकांत उजाला आँखों को सहलाता। मुझे लगा किसी अप्रतिम अनुभव को मैं देर तक सोकर व्यर्थ करता रहा हूँ। अब भी मैं रात को देर तक पढ़ता हूँ परंतु अब वह चिड़िया मेरी अलार्म घड़ी है, जो मुझे अपने साथ सुबह जगा लेती है। अब वह पलंग के सिरहाने या मेरी रजाई पर बैठकर मधुर चहचहाहट से मुझे जगाती है। उसकी चहचहाहट में अब वह झुंझलाहट नहीं, एक वात्सल्य भरी जागृति है । यह किसी घड़ी की यांत्रिक ध्वनि नहीं है, अपनेपन से भरी पुकार है, जो मुझे आसमान से अवतरित होती हुई प्रातः काल की सुमंगल घड़ी में पुकारती है। उस सुमंगल घड़ी में सरिताओं का जल, आकाश की वायु, सूर्य का प्रकाश – सब अपनी निर्मलता के चरम पर पहुँचकर सृष्टि में नए फूल खिलाने का उपक्रम करते हैं।
अब मैं चिड़िया के साथ जगना सीख गया था और सुबह की फूलों की सुगंध से भरी ताज़गी का वरदान पाने लगा था।
रवींद्रनाथ ने अपनी जीवन स्मृति में सच ही लिखा है, “मैं देवदार के जंगलों में घूमा, झरनों के किनारे बैठा, उसके जल में स्नान किया, कंचनजंगा की मेघमुक्त महिमा की ओर ताकता बैठा रहा लेकिन जहाँ मैंने यह समझा था कि पाना सरल होगा, वहीं मुझे खोजने पर भी कुछ नहीं मिला। परिचय मिला लेकिन और कुछ देख नहीं पाया। रत्न देख रहा था, सहसा वह बंद हो गया, अब मैं डिबिया देख रहा था। लेकिन डिबिया के ऊपर कैसी ही मीनाकारी क्यों न हो, उसको गलती से डिबिया मात्र मानने की आशंका नहीं रही।”
सच है, एक बार रत्न दिख गया तो फिर भले ही डिबिया बंद हो जाए, पर उस डिबिया में रत्न है, यह अनुभूति नहीं जानी चाहिए। रवींद्रनाथ की इन पंक्तियों में डिबिया की मीनाकारी का भी जो उल्लेख है, वह महत्वपूर्ण है।
उस चिड़िया ने डिबिया खोलकर मुझे भी उषा सुंदरी के रत्न दिखा दिए थे। उसका यह उपकार मैं भला कैसे भूलता ? दरवाज़ा खोलते ही चिड़िया चहचहाती हुई बाहर जाती, मानो मुझे कहती हुई जा रही हो कि देखो यह मीनाकारी वाली सुंदर डिबिया खुल रही है, फिर यह बंद हो जाएगी। फिर तो दिनभर मीनाकारी से सजी डिबिया ही दिखाई देगी, इसके रत्न नहीं दिखेंगे।
मैं उस वात्सल्यमयी चिड़िया के उस उपकार को बहुत कृतज्ञता से महसूस करता हूँ। उसने मुझे उस घड़ी जगना सिखाया, जब धरती ओस के मोती बिखराकर हर नए खिल रहे फूल का अभिनंदन कर रही होती है।

शब्दार्थ
कोठरी – छोटा कमरा
शय्या – बिस्तर
भोर – सुबह
देह – शरीर
कांति – चमक, आभा
कौंध – बिजली की चमक, चमक
कोमलकांत – मृदुल तथा कमनीय
अप्रतिम – बेजोड़, अनुपम
व्यर्थ – बेकार
वात्सल्य – ममता
यांत्रिक – मशीन या यंत्र से संबंधित
अवतरित – उतरा हुआ
सुमंगल – बहुत शुभ, कल्याणकारी, मंगलमय
सरिताओं – नदियों
निर्मलता – स्पष्टता, शुद्धि, निर्मलता, सफ़ाई
चरम – सीमा
उपक्रम – आरंभ, आयोजन
जीवन स्मृति – जीवन की यादें, आत्मकथा
मीनाकारी – स्वर्ग जैसी सुंदरता को धातु पर उकेरना
कृतज्ञता – आभार या धन्यवाद व्यक्त करने की भावना
अभिनंदन – अभिवादन, सराहना करना

व्याख्याजब लेखक अपने छोटे से कमरे के बिस्तर को छोड़कर सुबह में चिड़िया को बाहर जाने देने के लिए दरवाज़ा खोलता, तो दरवाज़े से ताजी सुबह के शरीर की आभा कमरे को चमका जाती थी। ठंडी हवा का स्पर्श और बहुत कोमल उजाला लेखक की आँखों को सहलाता था। लेखक को ऐसा लगा जैसे वह देर तक सोकर किसी अनुपम व् अनोखे अनुभव को बेकार करता रहा था। आने वाले दिनों में भी लेखक रात को देर तक पढ़ता था परंतु अब वह चिड़िया लेखक की अलार्म घड़ी बन गई थी, जो लेखक को अपने साथ सुबह जगा लेती थी। वह पलंग के सिरहाने या लेखक की रजाई पर बैठकर अब मधुर चहचहाहट से लेखक को जगाती थी। उसकी चहचहाहट में अब वह चीड़ या गुस्सा नहीं था, बल्कि एक ममता भरी चेतना थी। उसके लिए लेखक कहता है कि उस चिड़िया की चहचहाहट किसी घड़ी की यंत्र से संबंधित आवाज नहीं थी, बल्कि वह एक अपनेपन से भरी पुकार थी, जो लेखक को आसमान से उतर कर आती हुई सुबह के समय की शुभ घड़ी में पुकारती थी। उस शुभ घड़ी में नदियों का जल, आकाश की वायु, सूर्य का प्रकाश – सब अपनी स्वच्छता की सीमा पर पहुँचकर प्रकृति में नए फूल खिलाने का आरम्भ करते हैं।
अब लेखक चिड़िया के साथ जगना सीख गया था और सुबह की फूलों की सुगंध से भरी ताज़गी का वरदान पाने लगा था।
रवींद्रनाथ ने अपनी जीवन स्मृति या आत्मकथा में सच ही लिखा है कि वे देवदार के जंगलों में घूमे, झरनों के किनारे बैठे और उसके जल में उन्होंने स्नान किया, कंचनजंगा की बादलों से रहित महिमा की ओर ताकते बैठे रहे लेकिन जहाँ उन्होंने यह समझा था कि कुछ हासिल करना सरल होगा, वहीं उन्हें खोजने पर भी कुछ नहीं मिला। उन्हें परिचय तो मिला लेकिन वे और कुछ देख नहीं पाए। वे रत्न देख रहे थे, अचानक वह दिखना बंद हो गया, और अब वे केवल डिबिया देख रहे थे। लेकिन डिबिया के ऊपर चाहे कैसी ही सुंदर आकृतियाँ बनी हुई हों, उसको गलती से केवल डिबिया मानने की भूल अब नहीं रही थी। क्योंकि यह सच है कि एक बार यदि रत्न दिख गया तो फिर भले ही डिबिया बंद हो जाए, पर उस डिबिया में रत्न है, यह अनुभूति नहीं जानी चाहिए। रवींद्रनाथ की इन पंक्तियों में डिबिया की जिस सुंदर नकाशी का उल्लेख है, वह महत्वपूर्ण है। अर्थात रवींद्रनाथ ने प्रकृति की डिबिया बताया है और उस पर सुन्दर नकाशी को प्रकृति की सुन्दर वस्तुएँ बताया है। परन्तु डिबिया के अंदर रत्नों का अर्थ प्रकृति के छुपे हुए सौन्दर्य से है।
उस चिड़िया ने भी लेखक के छोटे से कमरे को खोलकर उसे भी सुबह के सौंदर्य के रत्न दिखा दिए थे। उसका यह उपकार लेखक भला कैसे भूलता। दरवाज़ा खोलते ही चिड़िया चहचहाती हुई बाहर जाती, मानो लेखक से कहती हुई जा रही हो कि देखो यह सुंदर नकाशी वाली सुंदर डिबिया खुल रही है, फिर यह बंद हो जाएगी। फिर तो दिनभर केवल सुंदर नकाशी से सजी डिबिया ही दिखाई देगी, इसके रत्न नहीं दिखेंगे।
लेखक उस ममतामयी चिड़िया के उस उपकार को बहुत आदर से महसूस करता है। उसने लेखक को उस घड़ी जगना सिखाया, जब धरती ओस के मोती बिखराकर हर नए खिल रहे फूल का अभिनंदन कर रही होती है।

 

Conclusion

“वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी” में लेखक ने मनुष्य की आदत पर प्रकाश डालना चाहा है। लेखक ने कहानी में बताया है कि मनुष्य की आदत कभी नहीं बदलती किंतु कभी-कभी कुछ कारण ऐसे बन जाते हैं जिनके कारण मानव को अपनी आदतों में बदलाव लाना पड़ता है। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 11 ‘वह चिड़िया एक अलार्म घड़ी थी’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।