शिवाजी का सच्चा स्वरूप पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 18 “Shivaji Ka Sacha Swaroop” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
शिवाजी का सच्चा स्वरूप सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 18 Shivaji Ka Sacha Swaroop Summary with detailed explanation of the lesson “Shivaji Ka Sacha Swaroop” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 18 शिवाजी का सच्चा स्वरूप से पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 शिवाजी का सच्चा स्वरूपपाठ के बारे में जानते हैं।
Shivaji Ka Sacha Swaroop (शिवाजी का सच्चा स्वरूप)
सेठ गोबिन्द दास
शिवाजी हमारे राष्ट्रीय के गौरव का महान ध्वज हैं। वे एक ऐसी शक्ति, शौर्य और पराक्रम का साक्षात रूप थे जिन्हें कभी हराया नहीं जा सका। वे धर्म के विरोधी विदेशी शासन के अमानवीय अत्याचारों का डट कर सामना करते थे। देश की शक्तियों को एक साथ कर उन्होंने “हिंदवी स्वराज्य” की स्थापना की। जो एक ऐसा स्वराज्य था जो सदा धर्मनिरपेक्ष था। उसमें सभी नागरिक को सम्मान-पूर्ण जीवन जीने के पूर्ण अधिकार प्राप्त था। शिवाजी का यही पवित्र चरित्र प्रस्तुत एकांकी में सामने आया है। शत्रु की पत्नी को वे माँ से भी अधिक वंदनीय मानते थे। दूसरे धर्मों को मानने वाले उन्हें प्राणों से भी अधिक प्रिय थे। उनकी सेना में वे भी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे। उनके स्वराज्य में कहीं भी मस्जिद-कुरान का अपमान नहीं हुआ। वास्तव में शिवाजी के नेतृत्व में पूरी प्रजा ने एक प्राण होकर अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया था।
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शिवाजी का सच्चा स्वरूप पाठ सार Shivaji Ka Sacha Swaroop Summary
‘शिवाजी का सच्चा स्वरूप’ सेठ गोबिन्ददास की एक प्रमुख एकांकी है। इसमें लेखक ने शिवाजी महाराज के सच्चे स्वरूप को सभी के समक्ष प्रस्तुत किया है। यह एकांकी सन् 1648 ई० की एक शाम को राजगढ़ दुर्ग के बरामदे में घटित घटना पर आधारित है। बरामदे में गोल तकिए के सहारे शिवाजी आसन पर बैठे हुए थे। राजगढ़ दुर्ग के बरामदे पर हथियारों के साथ मजबूत शरीर वाले शिवाजी के खास सैनिक खड़े हुए थे और उलटी तरफ से मोरोपंत पिगंले आते हैं। उसने शिवाजी सरकार को प्रणाम किया और बताया कि सेनापति सोनदेव कल्याण प्रांत को जीतकर वहां का सारा खज़ाना लूटकर आ गया है। यह शुभ समाचार सुनकर शिवाजी बहुत खुश हुए। कुछ समय के बाद सेनापति आवाजी सोनदेव ने शिवाजी के सामने आकर उनका आदर सत्कार किया। शिवाजी ने उसे उसकी जीत की बधाई दी तथा सेनापति ने शिवाजी को बधाई दी। दोनों ने इस युद्ध के विषय में बहुत सारी बातें की। सेनापति ने जीत के साथ-साथ कल्याण के लूटे हुए खजाने के बारे में बताया तथा उसने बताया कि वह कल्याण सूबेदार अहमद की पुत्र-वधू को भी बंदी बना कर शिवाजी की सेवा में लाया है। यह सुनकर अचानक ही शिवाजी का व्यवहार बदल जाता है। सेनापति भी घबरा उठता है। क्रोधित स्वर में शिवाजी तुरंत अहमद की पुत्र-वधू की पालकी को अपने सामने लाने का आदेश देते हैं। आवाजी उसी समय बंद पालकी महाराज के सामने प्रस्तुत करते हैं। उसमें से बहुत सुंदर युवती (अहमद की पुत्रवधु) बाहर निकल चुपचाप एक तरफ डरी हुई सी खड़ी हो जाती है।
परन्तु शिवाजी उसे माँ कहकर अपने सेनापति के बर्ताव के लिए माफी मांगते हैं, शिवाजी कहते हैं कि वे तो उसके सौंदर्य का हिंदू विधि से पूजन करना चाहते हैं । इसके बाद शिवाजी क्रोध में आकर सेनापति पर बरस पड़ते हैं कि उसने ऐसा घृणित कार्य कैसे कर किया। शिवाजी ने आजतक किसी मस्जिद में बाल बराबर भी दरार नहीं आने दी। उन्हें अगर कहीं कुरान मिली तो उन्होंने उसे भी सर माथे लगाया। उसका सम्मान किया। इस्लाम उसके लिए अपने ही धर्म के समान पूज्य है। इस्लाम के पवित्र स्थान तथा पवित्र ग्रंथ उनके लिए सम्माननीय हैं। शिवाजी की सेना में हिंदु ही नहीं मुस्लिम सैनिक भी थे। वह देश में हिंदू राज्य नहीं बल्कि सच्चे स्वराज्य की स्थापना करना चाहते थे। वह आक्रमणकारियों से सत्ता लेकर उदार लोगों को देना चाहते थे। वह तो पराई स्त्री को माता के समान पूजनीय मानता था। शिवाजी अपने सेनापति को इस बुरे कार्य के लिए फटकारते रहे। वे बार-बार अपने सेनापति के इस बुरे कर्म की वजह से पश्चाताप करने लगे। उन्होंने उसी समय घोषणा की कि यदि आगे कोई ऐसा कार्य करेगा तो उसका सर उसी समय धड़ से अलग कर दिया जाएगा। यह कहकर शिवाजी का सिर नीचे झुक गया। और अहमद की पुत्रवधु तिरछी निगाहों से शिवाजी को देखती रही और उसकी आंखों से शिवाजी के प्रति सम्मान में आँसू छलक गए।
शिवाजी का सच्चा स्वरूप पाठ व्याख्या Shivaji Ka Sacha Swaroop Lesson Explanation
एकाँकी के पात्र
शिवाजी: प्रसिद्ध मराठा वीर
मोरोपंत: पेशवा
आवाजी सोनदेव: शिवाजी का एक सेनापति
स्थान: राजगढ़ दुर्ग का एक दालान
काल: सन् 1648 ई०, संध्या

पाठ –
(दाहिनी ओर दालान का कुछ हिस्सा दिखाई देता है। दालान के सामने किले का खुला मैदान है। मैदान के इस ऊंचे स्तम्भ पर भगवा रंग का मराठा झंडा फहरा रहा है। दालान में जाजम बिछी है, उस पर कमख्याय की गद्दी पर मसनद के सहारे शिवाजी वीरासन में बैठे हैं। दालान के द्वार पर शस्त्रों से सुसज्जित दो मावली शरीर रक्षक खड़े हुए हैं। बायीं ओर से मोरोपंत पिंगले का प्रवेश)।
मोरोपंत : (अभिवादन कर) श्रीमंत सरकार, सेनापति आवाजी सोनदेव कल्याण प्रांत की जीत, वहाँ का सारा खजाना लूटकर आ गये हैं।
शिवाजी : (चौंककर) अच्छा। (मोरोपंत की ओर देखकर) बैठी पेशवा, बड़ा शुभ संवाद लाए। आवाजी सोनदेव है कहाँ?
मोरोपंत : (वीरासन से बैठकर) श्रीमंत की सेवा में अभी उपस्थित हो रहे हैं।
(कुछ देर निस्तब्धता। शिवाजी और मोरोपंत दोनों उत्सुकता से बाईं ओर देखते हैं। कुछ ही देर में आवाजी सोनदेव बाई ओर आता हुआ दिखाई देता है। उसके पीछे हम्मालों का एक बड़ा भारी झुंड है। हर हम्माल के सिर पर एक हारा (बड़ा भारी टोकना) है। हम्मालों के झुंड के पीछे पालकी। पालकी बन्द है। आवाजी सोनदेव भी अधेड़ अवस्था का ऊँचा-पूरा मनुष्य है। वेश-भूषा मोरोपंत के सदृश है। आवाजी सोनदेव दालान में आकर शिवाजी का अभिवादन करता है। हम्मालों का झुंड और पालकी दालान के बाहर रहते हैं।)
शब्दार्थ –
दाहिनी – सीधी
दालान – बरामदा
क़िला – गढ़, दुर्ग
स्तम्भ – खंभा
भगवा – केसरिया
जाजम – फर्श आदि पर बिछाई जाने वाली छपी हुई चादर, कालीन
कमख्याय – रंगीन-बूटीधार रेशमी कपड़ा
मसनद – गोल लंबोतरा तथा बड़ा तकिया
वीरासन – , योगियों तांत्रिकों आदि द्वारा अपनाया जाता है।
शस्त्रों – हथियार
सुसज्जित – सजा हुआ
मावली – शिवाजी के खास सैनिक
बायीं – उलटी
अभिवादन – सत्कार
संवाद – चर्चा, समाचार
निस्तब्धता – चुप्पी
उत्सुकता – अधीरता, बेसब्री, व्याकुलता, बेचैनी
हम्माल – मजदूर, कुली
अधेड़ – मध्यम आयु का
सदृश – समान बैठने का एक ढंग जो प्रायः प्राचीन योद्धाओं
व्याख्या – सीधी ओर से बरामदे का जो हिस्सा दिखाई दे रहा था वहां से बरामदे के सामने का किले का खुला मैदान दिखाई दे रहा था। मैदान के ऊंचे खम्भे पर केसरिया रंग का मराठा झंडा फहरा रहा था। बारामदे में फर्श आदि पर बिछाई जाने वाली कालीन बिछी थी, उस पर रंगीन-बूटीधार रेशमी कपडे की गद्दी पर गोल लंबोतरा तथा बड़े तकिए के सहारे शिवाजी प्राचीन योद्धाओं के बैठने के तरीके से बैठे हुए थे। बरामदे के दरवाजों पर हथियारों से सजे हुए दो शिवाजी के खास सैनिक खड़े हुए थे। बरामदे के उलटी ओर से मोरोपंत पिंगले आते है और मोरोपंत शिवाजी को प्रणाम करके बताते हैं कि सेनापति आवाजी सोनदेव कल्याण प्रांत पर जीत हासिल कर, वहाँ का सारा खजाना लूटकर आ गये हैं। शिवाजी चौंककर मोरोपंत की ओर देखकर कहते हैं कि उन्होंने बहुत शुभ समाचार लाया है और वे आवाजी सोनदेव के बारे में पूछते हैं। मोरोपंत प्राचीन योद्धाओं के बैठने के तरीके से बैठते हैं और फिर बताते हैं कि सेनापति, शिवाजी की सेवा में अभी उपस्थित हो रहे हैं। थोड़ी देर चुप्पी के साथ शिवाजी और मोरोपंत दोनों उत्सुकता से बाईं ओर देखते हैं। कुछ ही देर में आवाजी सोनदेव बाई ओर से आता हुआ दिखाई देता है। उसके पीछे मजदूरों का एक बड़ा भारी झुंड दिखाई दे रहा था। हर मजदुर के सिर पर एक बड़ा भारी टोकना था। मजदूरों के झुंड के पीछे एक बन्द पालकी भी थी। आवाजी सोनदेव मध्यम आयु की अवस्था का ऊँचा-पूरा मनुष्य था। उसकी वेश-भूषा भी मोरोपंत के ही समान थी । आवाजी सोनदेव बरामदे में आकर शिवाजी का आदर सत्कार करता है। मजदूरों का झुंड और पालकी बरामदे के बाहर रखे गए थे।
पाठ –
शिवाजी : बैठो आवाजी, कल्याण-विजय पर तुम्हें बधाई हैं।
आवाजी सोनदेव : (बैठते हुए) बधाई है श्रीमंत सरकार को।
शिवाजी : कहो, पैदल मावलियों ने अधिक वीरता दिखाई या हेटकरियों ने?
आवाजी सोनदेव : इनमें भी दोनों ने ही श्रीमंत।
शिवाजी : सेना के अधिपति कैसे रहे?
आवाजी सोनदेव : पैदल के अधिपति-नायक, हवालदार, जुमलादार और एकहजारी, तथा घुड़सवारों के अधिपति-हवालदार, जुमलदार और सूबेदार, सभी का काम प्रशंसनीय रहा, श्रीमंत सरकार।
शिवाजी : (हम्माल की ओर देखकर मुस्कराते हुए) कल्याण का खजाना भी लूट लाए; बहुत माल मिला?
आवाजी सोनदेव : हां श्रीमंत, सारा खजाना लूट लिया गया है और इतना माल मिला जितना अब तक की किसी लूट में न मिला था। चाँदी, सोना, जवाहरात न जाने क्या-क्या मिला। मैं तो समझता हूँ, श्रीमंत, केवल दक्षिण ही नहीं उत्तर की भी विजय इस संपदा से हो सकेगी।
शिवाजी : (हम्मालों के पीछे पालकी को देखकर) और उस मेणा में क्या है?
आवाजी सोनदेव : (मुस्कराते हुए) उस मेणा … उस मेणा में श्रीमंत, इस विजय का सबसे बड़ा तोहफा है।
शिवाजी : (उत्सुकता से आवाजी सोनदेव की ओर देखते हुए) अर्थात्?
आवाजी सोनदेव : श्रीमंत, कल्याण सूबेदार अहमद की पुत्र-वधू के सौंदर्य का वृत्त कौन नहीं जानता? उसे भी श्रीमंत की सेवा के लिए बंद करके लाया हूँ।
(शिवाजी की सारी प्रसंनता एकाएक लुप्त हो जाती है। उनकी भृकुटी चढ़ जाती है और नीचे का होंठ ऊपर के दांतों के नीचे आ जाता है। आवाजी सोनदेव शिवाजी की परिवर्तित मुद्रा देखकर घबरा-सा जाता है। मोरोपंत एकाएक शिवाजी की ओर देखता है। कुछ देर निस्तब्धता रहती है।)
शब्दार्थ –
अधिपति – स्वामी, प्रधान
संपदा – दौलत
मेणा – बंद पालकी
वृत्त – इतिहास, वृत्तांत
लुप्त – गायब
भृकुटि – भौंह
परिवर्तित – बदली हुई
व्याख्या – शिवाजी आवाजी को बैठने के लिए कहते हैं और कल्याण प्रांत पर विजय की बधाई भी देते हैं। आवाजी सोनदेव भी बैठते हुए शिवाजी को जीत की बधाई देते है। शिवाजी उनसे पूछते हैं कि युद्ध में पैदल सैनिकों ने अधिक वीरता दिखाई या दूसरे घुड़सवार सैनिकों ने। आवाजी सोनदेव बताते हैं कि दोनों तरह के सैनिकों ने पूरी वीरता दिखाई। शिवाजी सेना के प्रमुखों के बारे में पूछते हैं तो आवाजी सोनदेव बताते हैं कि पैदल सैनिकों के प्रधान – नायक, हवालदार, जुमलादार और एकहजारी, तथा घुड़सवारों के प्रधान – हवालदार, जुमलदार और सूबेदार, सभी ने बहुत बहादुरी से काम किया। शिवाजी मजदूरों की ओर देखकर मुस्कराते हुए कहते हैं कि वे कल्याण का खजाना भी लूट लाए हैं, लगता है बहुत धन सम्पदा मिली है। आवाजी सोनदेव हामी भरते हैं, कि वहां का सारा खजाना लूट लिया गया है और इतना खजाना मिला है जितना अब तक की किसी लूट में नहीं मिला था। चाँदी, सोना, जवाहरात और भी बहुत कुछ मिला। उनकी समझ के अनुसार केवल दक्षिण ही नहीं उत्तर पर भी वे अपनी विजय इस संपदा के सहारे कर पाएंगे। शिवाजी मजदूरों के पीछे पालकी को देखकर प्रश्न करते हैं कि उस पालकी में क्या है। आवाजी सोनदेव मुस्कराते हुए उत्तर देते हैं कि उस बंद पालकी में इस जीत का सबसे बड़ा उपहार है। शिवाजी उत्सुकता से आवाजी सोनदेव की ओर प्रश्न भरी दृष्टि से देखते हैं। आवाजी सोनदेव बताते हैं कि कल्याण सूबेदार अहमद की पुत्र-वधू की सुंदरता का वर्णन सभी करते थे इसलिए वे उसे भी शिवाजी की सेवा के लिए बंद करके लाए हैं। यह सुनते ही शिवाजी की सारी प्रसन्नता एकाएक गायब हो गई। उनकी भौहें चढ़ जाती है और नीचे का होंठ ऊपर के दांतों के नीचे आ जाता है। आवाजी सोनदेव शिवाजी की इस परिवर्तित मुद्रा को देखकर घबरा-सा जाता है। मोरोपंत एकाएक शिवाजी की ओर देखता है। कुछ देर चुप्पी रहती है।
पाठ –
शिवाजी : (भर्राए हुए स्वर में) मेणा को तत्काल इस पड़वी में लाओ। (आवाजी सोनदेव जल्दी दालान के बाहर जाता है। शिवाजी एकटक पालकी की ओर देखते हैं; मोरोपंत शिवाजी की तरफ। कुछ ही क्षणों में पालकी दालान में आती है। ज्योंही पालकी दालान में रखी जाती है त्योंही शिवाजी जल्दी से पालकी के निकट पहुंचते हैं। मोरोपंत शिवाजी के पीछे जाता है।)
शिवाजी : (आवाजी सोनदेव से) खोल दो मेणा, आवाजी।
(आबाजी सोनदेव मेणा के दरवाजे खोलता है। दरवाजे खुलते ही अहमद की पुत्र-वधू उस में से निकल चुपचाप एक ओर सिकुड़कर खड़ी हो जाती है। वह परम सुन्दरी युवती है। वेश-भूषा मुग़ल स्त्रियों के सदृश।)
शिवाजी : (अहमद की पुत्र-वधू से) माँ, शिवा अपने सिपहसालार की नामाकूल हरकत पर आपसे मुआफी चाहता है। आह! कैसी अजीबो-गरीब खूबसूरती है आपकी। आपको देखकर मेरे दिल में एक- सिर्फ एक बात उठ रही है – कहीं मेरी माँ में आपकी सी खूबसूरती होती तो मैं भी बदसूरत न होकर एक खूबसूरत शख्स होता। माँ आपकी खूबसूरती को मैं एक … सिर्फ एक काम में ला सकता हूँ – उसका हिंदू विधि से पूजन करूं; उसकी इस्लामी तरीके से इबादत करूं। आप जरा भी परेशान न हों। माँ, आपको आराम, इज्जत, हिफाजत और खबरदारी के साथ आपके शौहर के पास पहुँचा दिया जायेगा; बिना देरी के फौरन। (आवाजी सोनदेव की ओर घूमकर) आवाजी, तुमने ऐसा काम किया है जो कदाचित् क्षमा नहीं किया जा सकता। शिवा को जानते हुए, निकट से जानते हुए भी तुम्हारा साहस ऐसा घृणित कार्य करने के लिए कैसे हुआ? शिवा ने आज तक किसी मस्जिद की दीवार में बाल बराबर दरार भी न आने दी। शिवा को यदि कुरान की पुस्तक मिली तो उसने उसे सिर पर चढ़ा, उसके एक पन्ने को भी किसी प्रकार की क्षति पहुँचाए बिना, मौलवी साहब की सेवा में भेज दिया। हिन्दू होते हुए भी शिवा के लिए इस्लाम धर्म पूज्य है। इस्लाम के पवित्र स्थान, उसके पवित्र ग्रन्थ सम्मान की वस्तुएँ हैं। शिवा, हिन्दू और मुसलमान प्रजा में कोई भेद नहीं समझता। अरे ! उसकी सेना में मुस्लिम सैनिक तक हैं। वह देश में हिंदू-राज्य नहीं, सच्चे स्वराज्य की स्थापना चाहता है। आततायियों से सत्ता का अपहरण कर उदारचेताओं के हाथों में अधिकार देना चाहता है। फिर पर-स्त्री-अरे ! पर स्त्री तो हरेक के लिए माता के समान है। जो अधिकार – प्राप्त जन हैं, जो सरदार हैं, या राजा … उन्हें तो इस संबंध में विवेक, सबसे अधिक विवेक रखना आवश्यक है। (कुछ रुककर) आवाजी, क्या तुम मेरी परीक्षा लेना चाहते थे? इसलिए तो तुमने यह कार्य नहीं किया? शिवा ये लड़ाई-झगड़े, ये लूट-पाट व्यक्तिगत सुखों के लिए कर रहा है? क्या स्वयं चैन उड़ाना उसका उद्देश्य है? तब … तब तो ये रक्तपात, ये लूटमार घृणित कृतियाँ हैं। शिवा में यदि शील नहीं तो उसके सेनापतियों, सरदारों को शील का स्पर्श तक नहीं हो सकता। फिर तो हममें और इन्द्रिय-लोलुप लुटेरों तथा डाकुओं में कोई अंतर ही नहीं रह जाता। अरे ! तब तो हमारे जीवन से हमारी मृत्यु, हमारी विजय से हमारी पराजय, कहीं श्रेयस्कर है। (मोरोपंत से) आह। पेशवा, यह… यह मेरे … मेरे एक सेनापति ने… मेरे एक सेनापति ने क्या… क्या कर डाला। लज्जा से मेरा सिर आज पृथ्वी में नहीं, पाताल में घुसा जाता है। इस पाप का न जाने मुझे कैसा… कैसा प्रायश्चित करना पड़ेगा? (कुछ रुक कर) पेशवा, इस समय तो मैं केवल एक घोषणा करता हूँ – भविष्य में अगर कोई ऐसा कार्य करेगा जो उसका सिर उसी समय धड़ से अलग कर दिया जाएगा।
(शिवाजी का सिर नीचे झुक जाता है। अहमद की पुत्रवधू कनखियों से शिवाजी की ओर देखती है। उसकी आंखों में आँसू छलछला आते हैं। मोरोपंत शिवाजी की ओर देखता है और आबाजी सोनदेव घबराहट-भरी दृष्टि से मोरोपंत की ओर।)
शब्दार्थ –
भर्राए – दुख, भय, या अत्यधिक रोने के कारण आवाज का भारी या रुँधा हुआ हो जाना
तत्काल – तुरंत
सदृश – के समान
सिपहसालार – सेनापति
नामाकूल हरकत – अनुचित व्यवहार, मूर्खतापूर्ण व्यवहार बेहूदा शरारत
मुआफी – क्षमा
अजीबो गरीब – विचित्र
इबादत – पूजा
हिफाज़त – सुरक्षा
शौहर – पति
खबरदारी – सावधानीपूर्ण होशियारी से
कदाचित् – शायद, कभी
घृणित – घृणा के योग्य
क्षति – नुकसान
आततायी – सताने वाले
सत्ता का अपहरण – राज्य छीनना
रक्तपात – खून बहाना
उदारचेता – खुले विचारों वाला
शील – चरित्र
इन्द्रियलोलुप – भोग-विलास की इच्छा रखने वाला
पेशवा – सरदार, नेता
श्रेयस्कर – कल्याणकारी
प्रायश्चित्त – पछतावा
कनखी – तिरछी नजर
व्याख्या – शिवाजी दुःख से भारी हुए स्वर में पालकी को तुरंत सामने लाने का आदेश देते हैं। आवाजी सोनदेव जल्दी बरामदे के बाहर जाता है। शिवाजी एकटक दृष्टि से पालकी की ओर देखते हैं और मोरोपंत शिवाजी की तरफ देखे जा रहे थे। कुछ ही पलों में पालकी बरामदे में लाई जाती है। जैसे ही पालकी बरामदे में रखी जाती है वैसे ही शिवाजी जल्दी से पालकी के नजदीक पहुंचते हैं। मोरोपंत भी शिवाजी के पीछे जाता है। शिवाजी आवाजी सोनदेव से पालकी खोलने को कहते हैं। आवाजी सोनदेव पालकी के दरवाजे खोलता है। दरवाजे खुलते ही अहमद की पुत्र-वधू उस में से निकल चुपचाप एक ओर घबराकर खड़ी हो जाती है। वह बहुत ही सुन्दर युवती थी। उसकी वेश-भूषा मुग़ल स्त्रियों के समान थी। शिवाजी अहमद की पुत्र-वधू को माँ कहकर सम्बोधित करते हैं और अपने सेनापति की अनुचित हरकत पर उससे माफी मांगते है। शिवाजी उसकी विचित्र खूबसूरती की तारीफ करते हैं और कहते हैं कि उसको देखकर उनके दिल में एक ही बात उठ रही है कि अगर उनकी माँ भी उसकी तरह खूबसूरत होती तो वे भी बदसूरत न होकर एक खूबसूरत इंसान होते। वे उसकी खूबसूरती को सिर्फ एक काम में ला सकते हैं कि वे उसका हिंदू विधि विधान से पूजन करें और उसकी इस्लामी तरीके से इबादत करें। शिवाजी उससे बिलकुल भी परेशान न होने को कहते हैं। और बताते हैं कि वे उसे आराम, इज्जत, सुरक्षा और सावधानीपूर्ण होशियारी के साथ बिना देरी के फौरन उसके पति के पास पहुँचा देंगे। शिवाजी आवाजी सोनदेव की ओर घूमकर उसे फटकारते हुए कहते हैं कि उसने ऐसा काम किया है जो कभी भी क्षमा नहीं किया जा सकता। शिवाजी को निकट से जानते हुए भी उसका ऐसा घृणित कार्य करने का साहस कैसे हो गया। शिवाजी ने आज तक किसी मस्जिद की दीवार में बाल बराबर दरार भी नहीं आने दी। यदि कुरान की पुस्तक कहीं मिली तो उसने उसे सिर पर चढ़ा दिया, उसके एक पन्ने को भी किसी प्रकार का नुक्सान पहुँचाए बिना, मौलवी साहब की सेवा में भेज दिया। हिन्दू होते हुए भी उसके के लिए इस्लाम धर्म पूज्य है। इस्लाम के पवित्र स्थान, उसके पवित्र ग्रन्थ उसके लिए सम्मान की वस्तुएँ हैं। वह हिन्दू और मुसलमान प्रजा में कोई भेद नहीं समझता। उसकी सेना में मुस्लिम सैनिक भी हैं। वह देश में हिंदू-राज्य नहीं, बल्कि सच्चे स्वराज्य की स्थापना करना चाहता है। बाहर के आक्रमणकारियों से सत्ता की रक्षा करते वह खुले विचारों वाले राजाओं के हाथों में अधिकार देना चाहता है। फिर पराई स्त्री तो हर व्यक्ति के लिए माता के समान है। जो अधिकार – प्राप्त व्यक्ति हैं, जो सरदार हैं, या राजा है , उन्हें तो इस संबंध में और भी अभिक विवेक से ध्यान रखना आवश्यक है। यह सब कहते हुए कुछ रुककर वे आवाजी से पूछते हैं कि कहीं वे शिवाजी की परीक्षा तो नहीं लेना चाहते थे। इसलिए तो उसके यह कार्य नहीं किया। शिवाजी ये लड़ाई-झगड़े, ये लूट-पाट अपने खुद के व्यक्तिगत सुखों के लिए कर रहे या स्वयं चैन उड़ाना उसका उद्देश्य है। यदि वह शिवाजी को ऐसा समझता है तब तो ये रक्तपात, ये लूटमार घृणित कृतियाँ हैं। शिवाजी में यदि अच्छा चरित्र नहीं तो उसके सेनापतियों, सरदारों को अच्छा चरित्र का स्पर्श तक नहीं हो सकता। फिर तो उनमे और भोग-विलास की इच्छा रखने वाले लुटेरों तथा डाकुओं में कोई अंतर ही नहीं रह जाता। तब तो उनके जीवन से उनकी मृत्यु, उनकी विजय से उनकी पराजय, कहीं अधिक अच्छी है। शिवाजी मोरोपंत से दुखी होकर कहते हैं कि उसने यह एक सेनापति होते हुए क्या अनर्थ कर डाला। शर्म से उनका सिर आज पृथ्वी में नहीं, पाताल में घुसा रहा है। इस पाप का न जाने अब उन्हें कैसा प्रायश्चित करना पड़ेगा। फिर कुछ रुक कर वे मोरोपंत से कहते हैं कि, इस समय तो वे केवल एक घोषणा कर सकते हैं कि भविष्य में अगर कोई ऐसा कार्य करेगा जो उसका सिर उसी समय धड़ से अलग कर दिया जाएगा।
यह सब कहते हुए शिवाजी का सिर नीचे झुक जाता है। अहमद की पुत्रवधू तिरछी नजरों से शिवाजी की ओर देखती है। उसकी आंखों में आँसू छलछला आते हैं। मोरोपंत शिवाजी की ओर देखता है और आवाजी सोनदेव घबराहट-भरी दृष्टि से मोरोपंत की ओर देखते रह जाते हैं।
Conclusion
शिवाजी हमारे राष्ट्रीय के गौरव का महान ध्वज हैं। वे एक ऐसी शक्ति, शौर्य और पराक्रम का साक्षात रूप थे जिन्हें कभी हराया नहीं जा सका। देश की शक्तियों को एक साथ कर उन्होंने “हिंदवी स्वराज्य” की स्थापना की। जो एक ऐसा स्वराज्य था जो सदा धर्मनिरपेक्ष था। उनके स्वराज्य में कहीं भी मस्जिद-कुरान का अपमान नहीं हुआ। वास्तव में शिवाजी के नेतृत्व में पूरी प्रजा ने एक प्राण होकर अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष किया था। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 16 ‘बचेंद्री पाल’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।