साए पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 10 “Saaye” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
साए सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 10 Saaye Summary with detailed explanation of the lesson “Saaye” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 10 साए पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 साए पाठ के बारे में जानते हैं।
Saaye (साए)
(हिमांशु जोशी)
‘साए’ कहानी हिंदी के कथाकार हिमांशु जोशी द्वारा लिखित है। कहानी में बताया गया है कि विपत्ति के समय जो मित्र निःस्वार्थ भाव से साथ निभाता है, वही सच्चा मित्र होता है। यह कहानी बताती है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में दिखाई न देने वाले सहारे ही व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं। लेखक ने मित्रता के उस रूप को प्रस्तुत किया है, जिसमें स्वार्थ नहीं बल्कि कर्त्तव्य मुख्य है। ‘साए’ कहानी हमें यह समझाती है कि असली मित्र वही होता है, जो संकट में बिना किसी अपेक्षा के साथ खड़ा रहता है।
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साए पाठ सार Saaye Summary
‘साए’ कहानी सच्ची मित्रता, त्याग, भावनाओं और निःस्वार्थ कर्त्तव्य की एक मार्मिक और प्रेरक कथा है। यह कहानी बताती है कि कठिन समय में जो साथ देता है, वही वास्तविक मित्र होता है। जीवन कई बार ऐसे अदृश्य सहारों पर टिका होता है, जिनका अहसास हमें बहुत देर से होता है।
कहानी की शुरुआत एक भारतीय परिवार की दयनीय स्थिति से होती है। पति रोजगार के लिए अफ्रीका गया हुआ है, पत्नी बीमार है और छोटे-छोटे दुधमुँहे बच्चे हैं। घर में न कोई सहारा है और न ही कोई नजदीकी रिश्तेदार जो संकट में मदद कर सके। महीनों तक पति की कोई चिट्ठी नहीं आती, जिससे पत्नी की चिंता और बढ़ जाती है। अंततः नैरोबी के एक अस्पताल से पत्र आता है, जिसमें बताया जाता है कि रंगभेद के कारण इलाज में देर हो गई और रोगी की स्थिति गंभीर है। यह पत्र पत्नी और बच्चों को गहरे दुख में डाल देता है।
कुछ समय बाद एक और पत्र आता है, जिसमें हालत में सुधार की बात कही जाती है। इसके साथ ही रुपये भी आने लगते हैं। धीरे-धीरे पत्र नियमित हो जाते हैं और आर्थिक सहायता भी लगातार मिलती रहती है। पति अपने कारोबार के विस्तार, टाइपराइटर खरीदने और जमीन लेने जैसी योजनाओं का उल्लेख करता है। इससे पत्नी और बच्चों को यह विश्वास हो जाता है कि संकट का समय अब समाप्त हो रहा है और उनका भविष्य सुरक्षित है।
समय बीतता है। तीन वर्ष गुजर जाते हैं। बच्चे बड़े हो रहे हैं, पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और माँ का स्वास्थ्य भी पहले से बेहतर है। बड़ी बेटी तनु के विवाह की बात चलती है। पिता पत्रों में आश्वासन देता है कि वह विवाह में आएगा, दहेज की चिंता न करने को कहता है और आवश्यक खर्च भी भेजता है। यद्यपि वह स्वयं विवाह में नहीं आ पाता, फिर भी गहने, कपड़े और पैसे भेजकर अपने दायित्व को निभाता है। इसी विश्वास के कारण बेटी का विवाह अच्छे घर में संपन्न हो जाता है।
बेटा अज्जू पढ़ाई और खेल दोनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता है। उसके पुरस्कारों और उपलब्धियों के चित्र पिता को भेजे जाते हैं। बदले में महंगे उपहार और भावुक पत्र आते हैं। पिता बार-बार लिखता है कि वह बच्चों के लिए ही जी रहा है और सारा कारोबार उन्हीं के भविष्य के लिए है। लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से उसका घर आना टलता रहता है।
अंततः अज्जू अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है। माँ की तबीयत लगातार गिरती जा रही है। अंतिम इच्छा के रूप में वह पति को देखना चाहती है। पिता इलाज के लिए पैसे तो भेजता है, पर स्वयं नहीं आता। तब अज्जू बिना बताए अफ्रीका जाने का निर्णय करता है, ताकि अचानक पहुँचकर पिता को आश्चर्यचकित कर सके।
नैरोबी पहुँचकर अज्जू जब दिए गए पते पर जाता है, तो वहाँ ताला लगा मिलता है। पड़ोसियों से पता चलता है कि वहाँ एक वृद्ध भारतीय रहते हैं, जो बहुत अकेले हैं। रात में वही वृद्ध व्यक्ति आता है और अज्जू को देखकर उसे स्नेह से गले लगा लेता है। बातचीत में वह वृद्ध बताता है कि वह अज्जू के पिता का घनिष्ठ मित्र है और दोनों ने मिलकर कारोबार शुरू किया था।
यहीं कहानी का सबसे मार्मिक और चौंकाने वाला सत्य सामने आता है। वृद्ध बताता है कि अज्जू के पिता की मृत्यु तो वर्षों पहले ही हो चुकी थी। मरते समय उसने अपने मित्र से वचन लिया था कि वह उसके परिवार का पालन-पोषण करेगा। उसी वचन को निभाते हुए वृद्ध मित्र वर्षों तक पिता बनकर पत्र लिखवाता रहा, पैसे भेजता रहा और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करता रहा। उसने अपने मित्र के हिस्से की कमाई पूरी ईमानदारी से बच्चों को भेजी, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें।
कहानी के अंत में यह स्पष्ट होता है कि अज्जू और उसका परिवार जिन आशाओं, सपनों और सहारों के कारण जीवन की कठिनाइयों से बाहर निकला, वे वास्तव में उस निस्वार्थ मित्र के ‘साए’ थे। यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची मित्रता दिखावे की नहीं, बल्कि त्याग और कर्त्तव्य की होती है। कभी-कभी जीवन में जो हमें बचा लेता है, वह सामने नहीं होता, बल्कि एक अदृश्य साया होता है, जो बिना किसी अपेक्षा के हमारा मार्गदर्शन करता है।
साए पाठ व्याख्या Saaye Lesson Explanation
पाठ – नन्हें–नन्हें दुधमुँहे बच्चे! अकेली रुग्ण पत्नी! नाते–रिश्ते का ऐसा कोई नहीं, जो जरूरत पर काम आ सके! पति सुदूर अफ्रीका में अस्पताल में बीमार! महीनों तक कोई पत्र नहीं…..
हर रोज़ वे रंग–बिरंगे टिकटोंवाले पत्र की राह देखते परंतु डाकिया भूल से भी इधर झाँकता न था।
हाँ, बहुत लंबे अर्से के बाद एक दिन एक पत्र मिला। बड़ा अजीब–सा था यह बहुत करुण, बहुत दर्दभरा। नैरोबी के किसी अस्पताल से। लिखा था – रंगभेद के कारण पहले यूरोपियन लोगों के अस्पताल में जगह नहीं मिली किंतु बाद में कुछ कहने–कहलवाने पर स्थान तो मिला पर इस अनावश्यक विलंब के कारण रोग काबू से बाहर हो गया है। डॉक्टरों ने ऑपरेशन की सलाह दी है किंतु उसमें भी अब सार लगता नहीं। चंद दिनों की मेहमानदारी है….। उसके बाद तुम लोगों का क्या होगा, कुछ सूझता नहीं पास होते तो….. लेकिन….. भरोसा रखना…. भगवान सबका रखवाला है…. जिसने पैदा किया है, वह परवरिश भी करेगा…..।
पत्नी पत्र पढ़ती…. रोती …. अबोध बच्चे रूलाईभरी आँखों से माँ का मुँह ताकते।
फिर चिट्ठी पर चिट्ठियाँ डालीं उन्होंने फिर तार तब कहीं केन्या की मोहर लगा एक विदेशी लिफ़ाफ़ा मिला। लिखा था, परमात्मा का ही यह चमत्कार है कि हालत सुधर रही है। एक नया जन्म मिला है….।
थोड़े दिनों बाद फिर पत्र आया, पहले की ही तरह किसी से बोलकर लिखवाया हुआ – हालत पहले से अच्छी है। चिंता की अब कोई बात नहीं।
हमेशा की तरह कुछ रुपये भी पहुँच गए इस बार।
बच्चों के मुरझाए मुखड़े खिल उठे। रुग्ण पत्नी का स्वास्थ्य तनिक सुधार की ओर बढ़ा। चिट्ठियाँ नियमित रूप से आती रहीं। रुपये भी पहुँचते रहे।
शब्दार्थ-
नन्हें-नन्हें- बहुत छोटे
दुधमुँहे बच्चे- दूध पीने वाले छोटे बच्चे
रुग्ण- बीमार
सुदूर- बहुत दूर
राह देखना- इंतज़ार करना
डाकिया- पत्र बाँटने वाला
अर्सा- लंबा समय
करुण- दयनीय, दुःख से भरा
रंगभेद- नस्ल या रंग के आधार पर भेदभाव
अनावश्यक- बेकार, फालतू
विलंब- देरी
ऑपरेशन- शल्य-चिकित्सा
सार लगता नहीं- लाभ की संभावना न होना
चंद दिनों की मेहमानदारी- थोड़े दिनों का जीवन शेष होना
सूझता नहीं- समझ में नहीं आता
रखवाला- रक्षा करने वाला
परवरिश- पालन-पोषण
अबोध- अनजान, नासमझ
रुलाईभरी आँखें- आँसुओं से भरी आँखें
तार- टेलीग्राम
मोहर- मुहर, छाप
परमात्मा- ईश्वर
तनिक- थोड़ा
मुरझाए मुखड़े- उदास चेहरे
खिल उठे- प्रसन्न हो गए
नियमित- लगातार
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक एक ऐसे परिवार की स्थिति का वर्णन करता है जो गहरे संकट में है। पत्नी बीमार है और उसके छोटे-छोटे दुधमुँहे बच्चे हैं। घर में कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं है जो समय पर सहायता कर सके। पति रोज़गार के लिए दूर अफ्रीका में है और वहीं अस्पताल में गंभीर रूप से बीमार है। कई महीनों तक उसका कोई पत्र नहीं आता, इसलिए पत्नी और बच्चे हर दिन डाकिए की राह देखते रहते हैं, परंतु कोई समाचार नहीं मिलता।
लंबे समय के बाद जब एक पत्र प्राप्त होता है, तो वह अत्यंत करुणा और पीड़ा से भरा होता है। उस पत्र में यह बताया जाता है कि रंगभेद की नीति के कारण पहले यूरोपीय लोगों के अस्पताल में भर्ती नहीं किया जाता, जिससे इलाज में अनावश्यक देरी हो जाती है और बीमारी गंभीर रूप ले लेती है। बाद में बहुत प्रयास करने पर अस्पताल में स्थान तो मिल जाता है, लेकिन तब तक रोग काबू से बाहर हो चुका होता है। डॉक्टर ऑपरेशन की सलाह देते हैं, परंतु अब उससे भी विशेष लाभ होने की संभावना कम दिखाई देती है। पत्र में यह आशंका भी व्यक्त की जाती है कि आगे क्या होगा, यह समझ में नहीं आता। साथ ही परिवार के भविष्य को लेकर गहरी चिंता प्रकट की जाती है, लेकिन अंत में ईश्वर पर भरोसा रखने और विश्वास बनाए रखने की बात कही जाती है।
पत्र पढ़कर पत्नी रोती है और मासूम बच्चे माँ की ओर आशंका भरी आँखों से देखते रहते हैं। इसके बाद पत्नी लगातार पत्र और तार भेजती है। अंत में केन्या से एक और पत्र आता है, जिसमें बताया जाता है कि ईश्वर की कृपा से हालत में सुधार हो रहा है और जीवन को नया अवसर मिला है। कुछ दिनों बाद फिर पत्र आता है, जिसमें स्थिति पहले से बेहतर बताई जाती है और चिंता न करने को कहा जाता है। साथ ही कुछ रुपये भी भेजे जाते हैं।
इन पत्रों और पैसों से बच्चों के उदास चेहरे खिल उठते हैं और पत्नी के स्वास्थ्य में भी थोड़ा सुधार होने लगता है। इसके बाद पत्र और धनराशि नियमित रूप से आने लगती है, जिससे परिवार को फिर से आशा और सहारा मिलता है।
पाठ – उसने लिखा था, हाथ के ऑपरेशन के बाद अब वह पत्र नहीं लिख पाता इसलिए किसी से लिखवा लेता है। इधर एक नया टाइपराइटर खरीद लिया है उसने अपने कारोबार का भी कुछ विस्तार कर रहा है – धीरे–धीरे। कुछ नई जमीन खरीदने का भी इरादा है – शहर के पास एक फार्म हाउस‘ की योजना है…..
घर के बारे में, पत्नी के बारे में, बच्चों की पढ़ाई के बारे में कितने ही प्रश्न थे! बड़ी उत्साहजनक बातें थीं – विस्तार से। इतना अच्छा पत्र पहले कभी भी न आया था। सबको स्वाभाविक रूप से प्रसंनता हुई।
डूबती नाव फिर पार लग रही थी – धीरे–धीरे
लगभग तीन बरस बीत गए।
घर की ओर से पत्र पर पत्र जाते रहे कि अब उसे थोड़ा – सा समय निकालकर कभी घर भी आना चाहिए। बच्चे उसे बहुत याद करते हैं। उसे देखनेभर को तरसते हैं। जो – जो हिदायतें चिट्ठियों में लिखी रहती हैं, उनका अक्षरशः पालन करते हैं। माँ को किसी किस्म का कष्ट नहीं देते कहना मानते हैं; पढ़ने में बहुत मेहनत करते हैं। अज्जू कहता है कि बड़ा होकर वह भी पापा की तरह अफ्रीका जाएगा। इंजीनियर बनेगा। पापा के साथ खूब काम करेगा। अब वह पूरे बारह साल का हो गया है। छठी कक्षा में सबसे अव्वल आया है। मास्टर जी कहते हैं कि उसे वजीफ़ा मिलेगा। उसी से अपनी आगे की पढ़ाई जारी रख सकता है। तनु अब अठारह पार कर रही है। उसका भी ब्याह करना है। कहीं कोई अच्छा–सा लड़का, अपनी जात–बिरादरी का मिले तो चल सकता है……
चिट्ठी के जवाब में बहुत–सी बातें थीं। लिखा था कि इस समय तो नहीं, हाँ, अगले साल तनु के व्याह पर अवश्य पहुँचेगा। योग्य वर तो यहाँ भी मिल सकते हैं पर विदेश में अफ्रीका जैसे देश में लड़की को ब्याहने के पक्ष में वह नहीं है। दहेज की चिंता न करना। वहीं वर की खोज करना।
शब्दार्थ-
टाइपराइटर- टाइप करने की मशीन
कारोबार- व्यवसाय
विस्तार- बढ़ोतरी
इरादा- योजना, मन का सोचना
फार्म हाउस- खेती से जुड़ा घर
उत्साहजनक- उत्साह बढ़ाने वाला
स्वाभाविक- बिना किसी बनावट के
प्रसन्नता- खुशी
डूबती नाव पार लगना- बिगड़ती स्थिति का सुधर जाना
लगभग- करीब-करीब
तरसना- बहुत इच्छा होना
हिदायतें- सीख
अक्षरशः- ज्यों-का-त्यों
कष्ट- परेशानी, दुःख
अव्वल- प्रथम
वजीफ़ा- छात्रवृत्ति
ब्याह- विवाह
जात-बिरादरी- एक ही जाति या समुदाय के लोग
उपयुक्त- योग्य
पक्ष में- समर्थन में
दहेज- विवाह में दिया जाने वाला धन या सामान
खोज करना- तलाश करना
व्याख्या – इस अंश में पत्र के माध्यम से परिवार को मिलने वाली आशा और विश्वास का वर्णन किया गया है। पत्र में बताया जाता है कि हाथ के ऑपरेशन के बाद वह स्वयं पत्र नहीं लिख पाता, इसलिए किसी अन्य व्यक्ति से लिखवाता है। वह यह भी बताता है कि उसने नया टाइपराइटर खरीदा है और धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार कर रहा है। साथ ही वह भविष्य की योजनाओं का उल्लेख करता है, जैसे नई जमीन खरीदने और शहर के पास फार्म हाउस बनाने का विचार। इन बातों से यह संकेत मिलता है कि उसकी आर्थिक स्थिति सुधर रही है।
पत्र में घर, पत्नी और बच्चों की पढ़ाई से जुड़े कई प्रश्न पूछे जाते हैं। सारी बातें उत्साह से भरी होती हैं और विस्तारपूर्वक लिखी जाती हैं। परिवार को ऐसा लगता है कि यह अब तक का सबसे अच्छा पत्र है। सभी स्वाभाविक रूप से प्रसन्न होते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी डूबती हुई जिंदगी की नाव अब धीरे-धीरे किनारे की ओर बढ़ रही है।
समय बीतता है और लगभग तीन वर्ष गुजर जाते हैं। घर की ओर से लगातार पत्र भेजे जाते हैं, जिनमें उससे कुछ समय निकालकर घर आने का अनुरोध किया जाता है। बच्चों के बारे में बताया जाता है कि वे उसे बहुत याद करते हैं और केवल एक बार उसे देखने को तरसते हैं। यह भी बताया जाता है कि बच्चे पत्रों में दी गई सभी बातों का पूरी तरह पालन करते हैं, माँ को कोई कष्ट नहीं देते और पढ़ाई में खूब मेहनत करते हैं।
पत्रों में अज्जू के सपनों और उपलब्धियों का उल्लेख किया जाता है। बताया जाता है कि वह बड़ा होकर पिता की तरह अफ्रीका जाना चाहता है, इंजीनियर बनना चाहता है और उनके साथ काम करना चाहता है। यह भी लिखा जाता है कि वह अब बारह वर्ष का हो गया है और छठी कक्षा में प्रथम आया है। अध्यापक के अनुसार उसे वजीफ़ा मिलेगा, जिससे वह आगे की पढ़ाई कर सकेगा। साथ ही यह जानकारी भी दी जाती है कि तनु अठारह वर्ष की होने वाली है और उसके विवाह की चिंता भी शुरू हो गई है।
इन पत्रों के उत्तर में बहुत-सी बातें लिखी जाती हैं। वह बताता है कि अभी तो उसका आना संभव नहीं है, लेकिन अगले वर्ष तनु के विवाह पर वह अवश्य आएगा। वह यह भी स्पष्ट करता है कि लड़की का विवाह अफ्रीका जैसे विदेशी देश में करने के पक्ष में वह नहीं है। दहेज की चिंता न करने को कहा जाता है और वहीं, अपने समाज में योग्य वर खोजने की सलाह दी जाती है।
पाठ – वर की तलाश में अधिक भटकने की आवश्यकता न हुई। आसानी से खाता–पीता घर मिल गया। शायद इतना अच्छा घराना न मिलता लेकिन इस भरम से कि कन्या का बाप अफ्रीका में सोना बटोर रहा है, सब सहज हो गया।
शादी की तिथि निश्चित हो गई। नैरोबी से पत्र आया कि वह समय पर पहुँच रहा है। गहने, कपड़े सब बनवाकर वह साथ लाएगा लेकिन शादी के समय वह चाहकर भी पहुँच नहीं पाया। विवशताओं से भरा लंबा पत्र आया कि इस बीच जो एक नया कारोबार शुरू किया है, उसमें मजदूरों की हड़ताल चल रही है। ऐसे संकट के समय में, यह सब छोड़कर वह कैसे आ सकता है! हाँ, गहने, कपड़े और रुपये भिजवा दिए हैं। वर–वधू के चित्र उसे अवश्य भेजें, वह प्रतीक्षा करेगा।
खैर, ब्याह हो गया, धूमधाम के साथ। विवाह के सारे चित्र भी भेज दिए। अज्जू ने इस वर्ष कई इनाम जीते। हाई स्कूल की परीक्षा में जिले में सर्वप्रथम रहा। खेलों में भी पहला। बहुत–से सर्टिफिकेट मिले, वजीफ़ा मिला। इनाम में मिली सारी वस्तुओं के फ़ोटो वे पापा को भेजना न भूले।
बदले में कीमती कैमरा आया। गरम सूट का कपड़ा आया। सुंदर घड़ी आई। और मर्मस्पर्शी लंबा पत्र आया। लिखा था कि वह बच्चों की उम्मीद पर ही जी रहा है। पत्नी का स्वास्थ्य अच्छा रहना चाहिए। बच्चे इसी तरह नाम रोशन करते रहें – उनके सहारे वह जिंदगी की डोर कुछ और लंबी खींच लेगा…. यह सारा कारोबार सब उन्हीं के लिए तो है!
पर, अनेक वादे करने पर भी घर आना संभव न हो पाता। हर बार कुछ–न–कुछ अड़चनें आ जातीं और उसका जाना स्थगित हो जाता।
पाँवों पर पंख बाँधकर समय उड़ता रहा–अबाध गति से।
शब्दार्थ-
वर- दूल्हा
तलाश- खोज
भटकना- इधर-उधर घूमना
खाता-पीता घर- संपन्न परिवार
घराना- परिवार
भरम- भ्रम, गलत धारणा
बटोरना- इकट्ठा करना
सहज- आसान
तिथि- तारीख
निश्चित- तय
गहने- आभूषण
विवशता- मजबूरी
कारोबार- व्यवसाय
हड़ताल- काम बंद करना
संकट- कठिन स्थिति
वर-वधू- दूल्हा-दुल्हन
धूमधाम- बड़े उत्सव के साथ
सर्वप्रथम- सबसे पहले
सर्टिफिकेट- प्रमाण-पत्र
वजीफ़ा- छात्रवृत्ति
कीमती- मूल्यवान
मर्मस्पर्शी- दिल को छू लेने वाला
जिंदगी की डोर- जीवन की आशा
अड़चन- बाधा
स्थगित- कुछ समय के लिए रोक देना
अबाध- बाधा रहित, बिना रुकावट
व्याख्या- इस अंश में बताया गया है कि लड़की के लिए वर खोजने में अधिक कठिनाई नहीं होती है। परिवार को आसानी से एक अच्छा और संपन्न घर मिल जाता है। यह भी संकेत दिया जाता है कि यदि यह धारणा न होती कि कन्या का पिता अफ्रीका में बहुत धन कमा रहा है, तो शायद इतना अच्छा रिश्ता न मिलता।
इसके बाद विवाह की तिथि तय हो जाती है। नैरोबी से पत्र आता है, जिसमें वह यह लिखवाता है कि वह विवाह के समय पर पहुँच जाएगा और गहने व कपड़े बनवाकर स्वयं लाएगा। किंतु विवाह के समय वह आ नहीं पाता। एक लंबा पत्र आता है, जिसमें बताया जाता है कि नए शुरू किए गए कारोबार में मजदूरों की हड़ताल चल रही है और ऐसे संकट के समय सब कुछ छोड़कर आना संभव नहीं है। साथ ही यह भी बताया जाता है कि गहने, कपड़े और रुपये भेज दिए गए हैं और वर-वधू के चित्र अवश्य भेजने का आग्रह किया जाता है।
विवाह धूमधाम से संपन्न हो जाता है और उसके सभी चित्र भेज दिए जाते हैं। इसी बीच अज्जू की उपलब्धियों का उल्लेख किया जाता है। वह हाई स्कूल की परीक्षा में जिले में प्रथम आता है, खेलों में भी श्रेष्ठ प्रदर्शन करता है और उसे कई प्रमाण-पत्र तथा वजीफ़ा प्राप्त होता है। परिवार उसकी सभी उपलब्धियों की तस्वीरें उसे भेजता है।
इसके उत्तर में कीमती उपहार भेजे जाते हैं, जैसे कैमरा, गरम सूट का कपड़ा और सुंदर घड़ी। साथ ही एक भावनात्मक पत्र आता है, जिसमें बताया जाता है कि वह बच्चों की उम्मीदों के सहारे ही जीवन जी रहा है। वह यह इच्छा प्रकट करता है कि पत्नी स्वस्थ रहे और बच्चे इसी प्रकार नाम रोशन करते रहें, क्योंकि उन्हीं के सहारे वह जीवन की डोर को आगे बढ़ाए हुए है और सारा कारोबार भी उन्हीं के भविष्य के लिए है।
हालाँकि बार-बार वचन देने के बावजूद उसका घर आना संभव नहीं हो पाता। हर बार कोई न कोई बाधा सामने आ जाती है और उसका आना टल जाता है। इस प्रकार समय बहुत तेजी से बीतता चला जाता है और जीवन आगे बढ़ता रहता है।
पाठ – बच्चों ने लिखा कि यदि उसका इधर आ पाना कठिन हो रहा है, तो वे ही सब अफ्रीका आने की सोच रहे हैं। कुछ वर्ष वहीं बिता लेंगे।
उत्तर में केवल इतना ही था कि काम बहुत बढ़ गया है। नैरोबी, मोम्बासा के अलावा अन्य स्थानों पर भी उसे नियमित रूप से जाना पड़ता है। यहाँ विश्वास के आदमी मिलते नहीं इसलिए उसे स्वयं ही खटना पड़ता है। यहाँ की आबोहवा बच्चों की पढ़ाई, अनेक प्रश्न थे। अज्जू जब तक अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता, तब तक कुछ नहीं हो सकता। समय निकालकर कभी वह स्वयं घर आने का प्रयास करेगा। बच्चों की बहुत याद आती है। घर की बहुत याद आती है। लेकिन, विवशता है, क्या किया जाए!
अंत में वह दिन भी आ पहुँचा जब अज्जू ने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली। कहीं अच्छी नौकरी की तलाश शुरू हुई। पर पिता के अब भी घर आने की संभावना न दिखी तो उसने लिखा – अम्मा बीमार रहती हैं, बहुत कमजोर हो गई हैं। एक बार, अंतिम बार देखना भर चाहती हैं।
प्रत्युत्तर में विस्तृत पत्र मिला। इलाज के लिए रुपये भी। परंतु इस बार अज्जू ने ही जाने का कार्यक्रम बना लिया। अकस्मात पहुँचकर पापा को चौंकाने की पूरी–पूरी योजना के साथ।
टिकट खरीद लिया। पासपोर्ट, वीजा भी सब देखते–देखते बन गया और एक दिन दिल्ली से वह विमान से रवाना भी हो गया।
उसके मन में गहरी उत्कंठा थी कि पापा उसे देखकर कितने चकित होंगे! उन्होंने कल्पना भी न की होगी कि एकाएक वह इतनी दूर एक दूसरे देश में इतनी आसानी से आ जाएगा। उनकी निगाहों में तो अभी वह उतना ही छोटा होगा, जब वह निक्कर पहनकर आँगन में गुल्ली–डंडा खेलता था!
शब्दार्थ-
कठिन- मुश्किल
बिता लेंगे- समय गुज़ारेंगे
उत्तर- जवाब
नियमित रूप से- लगातार
विश्वास के आदमी- भरोसेमंद लोग
खटना- मेहनत करना
आबोहवा- जलवायु
विवशता- मजबूरी
अंत में- आखिरकार
संभावना- उम्मीद
प्रत्युत्तर- जवाब में
विस्तृत- विस्तार से, फैला हुआ
इलाज- उपचार
कार्यक्रम बनाना- योजना तैयार करना
अकस्मात- सहसा, अचानक
चौंकाना- हैरान करना
उत्कंठा- प्रबल इच्छा
चकित- हैरान
एकाएक- अचानक
निगाहें- नज़र
निक्कर- बच्चों की छोटी पैंट
गुल्ली-डंडा- बच्चों का खेल
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में बच्चों की बेचैनी और पिता से मिलने की तीव्र इच्छा व्यक्त की गयी है। बच्चे पत्र में यह लिखते हैं कि यदि पिता का भारत आना कठिन हो रहा है, तो वे स्वयं अफ्रीका आने का विचार कर रहे हैं और कुछ वर्ष वहीं बिताने को तैयार हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे पिता से मिलने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हैं।
इसके उत्तर में बताया जाता है कि काम बहुत अधिक बढ़ गया है। उसे नैरोबी और मोम्बासा के अतिरिक्त अन्य स्थानों पर भी नियमित रूप से जाना पड़ता है। वहाँ भरोसेमंद लोग नहीं मिलते, इसलिए सारा काम उसे स्वयं ही देखना पड़ता है। पत्र में बच्चों की पढ़ाई और वहाँ की आबोहवा को लेकर कई प्रश्न उठाए जाते हैं। यह भी बताया जाता है कि जब तक अज्जू अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर लेता, तब तक बच्चों का वहाँ आना संभव नहीं है। साथ ही यह आश्वासन दिया जाता है कि अवसर मिलने पर वह स्वयं घर आने का प्रयास करेगा। पत्र में बच्चों और घर की बहुत याद आने की बात भी कही जाती है, लेकिन विवशता का उल्लेख करते हुए असमर्थता जताई जाती है।
अंत में वह समय भी आ जाता है जब अज्जू अपनी पढ़ाई पूरी कर लेता है और अच्छी नौकरी की तलाश शुरू करता है। फिर भी पिता के घर आने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। तब अज्जू पत्र में यह लिखता है कि माँ अक्सर बीमार रहती है और बहुत कमजोर हो गई है। वह केवल एक बार, अंतिम बार पिता को देखना चाहती है।
इसके उत्तर में एक विस्तृत पत्र प्राप्त होता है, जिसमें इलाज के लिए रुपये भेजे जाते हैं। किंतु इस बार अज्जू स्वयं अफ्रीका जाने का निश्चय कर लेता है। वह बिना बताए अचानक पहुँचकर पिता को चकित करने की पूरी योजना बनाता है। वह टिकट खरीद लेता है और पासपोर्ट तथा वीजा भी शीघ्र बन जाते हैं। अंत में वह दिल्ली से विमान द्वारा रवाना हो जाता है।
उसके मन में यह उत्सुकता बनी रहती है कि पिता उसे देखकर कितना आश्चर्यचकित होंगे। उसे लगता है कि पिता ने कल्पना भी नहीं की होगी कि वह इतनी दूर, दूसरे देश में, इतनी आसानी से पहुँच जाएगा। वह यह भी सोचता है कि पिता की नजरों में वह अब भी वही छोटा बच्चा होगा, जो कभी निक्कर पहनकर आँगन में गुल्ली-डंडा खेला करता था।
पाठ – नैरोबी के हवाई अड्डे पर उतरकर वह सीधा उसी पते पर गया, जो पत्र में दिया हुआ था परंतु वहाँ ताला लगा था। हाँ, उसके पिता की पुरानी धुँधली नेमप्लेट अवश्य लगी थी।
आसपास पूछताछ की तो पता चला कि एक वृद्ध भारतीय अप्रवासी अवश्य यहाँ रहते हैं। रात को देर से दफ़्तर से घर लौटते हैं। किसी से मिलते–जुलते नहीं। निपट अकेले हैं।
वह बाहर बरामदे में रखी बेंच पर बैठा प्रतीक्षा करता रहा।
रात को एक बूढ़ा व्यक्ति ताला खोलने लगा तो देखा – एक युवक सामान के सामने बैठा ऊँघ रहा है।
उसका नाम–धाम पूछा तो उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
बड़े उत्साह से उसका स्वागत किया।
भोजन के बाद वे उसे अपने कमरे में ले गए। दीवार की ओर उन्होंने इंगित किया – एक नन्हा बच्चा माँ की गोद में ढुलका किलक रहा है।

“यह किसका चित्र है?”
युवक ने गौर से देखा। कुछ झेंपते हुए कहा, “मेरा!“वृद्ध इस बार कुछ और जोर से खिलखिलाए, “मेरे बच्चे, तुम इतने बड़े हो गए हो! सच कितने साल बीत गए। जैसे कल की बात हो!” उन्होंने उसके चेहरे की ओर देखा, “तुम शायद नहीं जानते, तुम्हारे पिता का मैं कितना जिगरी दोस्त हूँ। कितने लंबे समय तक हम साथ–साथ रहे दो दोस्तों की तरह नहीं, सगे भाइयों की तरह। उसी ने मुझे हिंदुस्तान से यहाँ बुलाया था। बड़ी लगन से सारा काम सिखलाया। साथ–साथ सांझे में हमने यह कारोबार शुरू किया। नैरोबी की आज यह एक बहुत अच्छी फ़र्म है। यह सब उसी की बदौलत है…..” कहते–कहते वह ठिठक गए।
उसका हाथ अपने हाथों में थामते हुए बोले, “तुम्हारी माँ कैसी हैं?”
“अच्छी हैं….।“
“भाई–बहन…. ?”
“सब ठीक हैं।“
“कहीं कोई कठिनाई तो नहीं?”
‘नहीं। सब ठीक है।“
शब्दार्थ-
हवाई अड्डा- विमान उतरने-उड़ने का स्थान
नेमप्लेट- नाम की पट्टी
धुँधली- हल्की, साफ़ न दिखने वाली
पूछताछ- जानकारी लेना
वृद्ध- बूढ़ा व्यक्ति
अप्रवासी- दूसरे देश में रहने वाला व्यक्ति
दफ़्तर- कार्यालय
निपट अकेले- बिल्कुल अकेले
बरामदा- घर का बाहरी भाग
प्रतीक्षा- इंतज़ार
ऊँघना- नींद में झपकी लेना
नाम-धाम- नाम और पहचान
बाँहों में भर लेना- गले लगाना
उत्साह- खुशी, उमंग
स्वागत- आदरपूर्वक ग्रहण करना
इंगित- इशारा
ढुलका- झुका हुआ
किलकना- हँसना
गौर से- ध्यानपूर्वक
झेंपना- संकोच करना
खिलखिलाना- ज़ोर से हँसना
जिगरी दोस्त- बहुत घनिष्ठ मित्र
सगे भाई- असली भाई
लगन- मेहनत और मन लगाकर
सांझे में- मिलकर, साझेदारी में
फ़र्म- व्यापारिक संस्था
बदौलत- कारण से
ठिठकना- अचानक रुक जाना
थामना- पकड़ना
कठिनाई- परेशानी
व्याख्या- इस गद्याँश में अज्जू के नैरोबी पहुँचने और सत्य के निकट आने की स्थिति का वर्णन किया गया है। वह नैरोबी के हवाई अड्डे पर उतरकर उसी पते पर जाता है, जो पत्रों में दिया गया होता है, लेकिन वहाँ ताला लगा मिलता है। केवल उसके पिता की पुरानी और धुँधली नेमप्लेट लगी हुई दिखाई देती है, जिससे उसके मन में कई प्रश्न उठते हैं।
आसपास पूछताछ करने पर उसे यह जानकारी मिलती है कि वहाँ एक वृद्ध भारतीय प्रवासी रहते हैं, जो रात को देर से कार्यालय से लौटते हैं। वह किसी से अधिक मेल-जोल नहीं रखते और बहुत अकेला जीवन जीते हैं। यह सुनकर अज्जू घर के बाहर बरामदे में रखी बेंच पर बैठकर प्रतीक्षा करता रहता है।
रात में जब एक वृद्ध व्यक्ति ताला खोलता है, तो वह देखता है कि एक युवक अपना सामान सामने रखे बैठा हुआ है और ऊँघ रहा है। वह युवक से उसका नाम और परिचय पूछता है और सच्चाई जानकर उसे प्रेमपूर्वक अपनी बाँहों में भर लेता है। वह अत्यंत उत्साह के साथ उसका स्वागत करता है।
भोजन के बाद वृद्ध उसे अपने कमरे में ले जाता है और दीवार पर लगे एक चित्र की ओर संकेत करता है, जिसमें एक नन्हा बच्चा अपनी माँ की गोद में खेलता हुआ दिखाई देता है। जब वह पूछता है कि यह चित्र किसका है, तो अज्जू चित्र को ध्यान से देखकर संकोच के साथ बताता है कि वह उसी का है।
यह सुनकर वृद्ध हँसते हुए भावुक हो जाता है और कहता है कि अज्जू बहुत बड़ा हो गया है और कितने वर्ष बीत चुके हैं, जैसे सब कुछ कल की ही बात हो। वह यह भी बताता है कि अज्जू को शायद यह ज्ञात नहीं है कि वह उसके पिता का कितना घनिष्ठ मित्र रहा है। वह समझाता है कि दोनों लंबे समय तक केवल मित्र नहीं, बल्कि सगे भाइयों की तरह साथ रहे हैं। उसी ने उसे भारत से अफ्रीका बुलाया था, काम सिखाया था और दोनों ने मिलकर साझे में कारोबार शुरू किया था, जो आज नैरोबी की एक अच्छी फर्म बन चुका है। यह सब अज्जू के पिता की मेहनत और सहयोग से संभव हुआ है।
बात करते-करते वह रुक जाता है और अज्जू का हाथ अपने हाथों में थामकर उसकी माँ, भाई-बहनों के बारे में पूछता है। अज्जू उत्तर देता है कि सभी ठीक हैं और किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं है।
पाठ – “बस, यही मैं चाहता था…. यही।” हौले से उन्होंने उसका हाथ सहलाया। देर तक शून्य में पलकें टिकाए कुछ सोचते रहे। कुछ क्षणों का मौन भंग कर खोए–खोए–से बोले, “देखो बेटे, तिनकों के सहारे तो हर कोई जी लेता है। लेकिन कभी–कभी हम तिनकों के साए मात्र के आसरे, भंवर से निकलकर किनारे पर आ लगते हैं। हमारा जीवन कुछ ऐसे ही तंतुओं के सहारे टिका रहता है। यदि वे टूट जाएँ, छिन्न–छिन्न होकर बिखर जाएँ, तो पलभर में पानी के बुलबुलों की तरह सब समाप्त हो जाता है….।“
“….जरा सोचो बेटे!” वे खाँसे, “अगर तुम्हारे पिता की मृत्यु आज से 10-15 साल पहले हो जाती, तो क्या होता! भले ही वे एक अच्छी रकम तुम्हारे नाम छोड़ जाते।” उन्होंने युवक के असमंजस में डूबे, गंभीर चेहरे की ओर देखा, “रुपये रेत में गिरे पानी की तरह कहीं विलीन हो जाते और तुम अनाथ हो जाते! तुम्हारी माँ घुल-घुलकर कब की मर चुकी होती। तुम इतने हौसले से पढ़ नहीं पाते। जहाँ तुम आज हो, वहाँ तक नहीं पहुँच पाते! निराशा की हताशा की असुरक्षा की इतनी गहरी खाई में होते, कि वहाँ से अँधेरे के अलावा और कुछ भी न दीखता तुमको…..।“
उन्होंने अपने सूखे होठों को जीभ की नोक से भिगोया, “हम दुर्बल होते हुए, असहाय, अकेले होते हुए भी कितने कितने बीहड़ वनों को पार कर जाते हैं सहारे की एक अदृश्य डोर के सहारे….”
उनका गला भर आया, “तुम्हारे पिता तो तभी गुजर गए थे। अपने सांझे कारोबार से, उनके ही हिस्से के पैसे तुम्हें नियमित रूप से भेजता रहा। कितने वर्षों से मैं इसी दिन के इंतज़ार में था…. अब तुम बड़े हो गए हो। अपने इस कारोबार में मेरा हाथ बँटाओ। तुम सरसब्ज हो गए, मेरा वचन पूरा हो गया जो मैंने उसे मरते समय दिया था।….” उनका गला भर आया। डबडबाई आँखों से वे दीवार पर टंगे एक धुंधले–से चित्र की ओर न जाने क्या–क्या सोचते हुए देखते रहे!
शब्दार्थ-
हौले से- धीरे से
सहलाना- प्यार से हाथ फेरना
शून्य- खालीपन
पलकें टिकाए- एकटक देखना
मौन- चुप्पी
मौन भंग होना- चुप्पी टूटना
खोए-खोए- विचारों में डूबा हुआ
तिनके- सूखे घास के छोटे टुकड़े
साया- छाया
आसरा- सहारा
भँवर- लहरों का चक्कर
तंतु- डोर, धागा
छिन्न-छिन्न- टुकड़ों में बँटा हुआ
पलभर- बहुत कम समय
असमंजस- दुविधा
गंभीर- गहरा
विलीन- मिलकर समाप्त हो जाना
अनाथ- जिसके माता-पिता न हों
घुल-घुलकर- धीरे-धीरे कमजोर होकर
हताशा- निराशा
असुरक्षा- सुरक्षा का अभाव
बीहड़- ऊबड़-खाबड़
अदृश्य- जो दिखाई न दे
गुजर जाना- मृत्यु हो जाना
सांझा कारोबार- मिलकर किया गया व्यापार
सरसब्ज- हरा-भरा
वचन- वादा
डबडबाई आँखें- आँसुओं से भरी आँखें
धुँधला चित्र- साफ़ न दिखने वाला चित्र
व्याख्या- पाठ के इस अंश में वृद्ध व्यक्ति अपने मन के भाव और जीवन का गहरा सत्य प्रकट करता है। वह यह बताता है कि वही वह चाहता था, यह देखकर वह संतोष अनुभव करता है। वह स्नेहपूर्वक अज्जू का हाथ सहलाता है और कुछ समय तक शून्य में देखते हुए गहन विचार में डूबा रहता है। इसके बाद वह समझाने लगता है कि सामान्यतः लोग छोटे-छोटे सहारों के बल पर जीवन जी लेते हैं, लेकिन कई बार केवल सहारे के साए के भरोसे ही मनुष्य जीवन के भँवर से निकलकर सुरक्षित किनारे तक पहुँच जाता है। वह यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य का जीवन ऐसी ही अदृश्य डोरों पर टिका होता है और यदि ये डोरें टूट जाएँ, तो सब कुछ पलभर में नष्ट हो सकता है।
आगे वह अज्जू से यह सोचने को कहता है कि यदि उसके पिता की मृत्यु दस-पंद्रह वर्ष पहले हो गई होती, तो क्या स्थिति होती। वह समझाता है कि केवल धन छोड़ जाना पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि वह धन धीरे-धीरे समाप्त हो जाता और बच्चे अनाथ हो जाते। वह यह भी बताता है कि ऐसी स्थिति में उसकी माँ अत्यधिक दुःख और असहायता के कारण जीवित नहीं रह पाती और बच्चे आत्मविश्वास के साथ पढ़ाई भी नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप वे आज जिस स्थान पर हैं, वहाँ तक कभी नहीं पहुँच पाते और निराशा, हताशा तथा असुरक्षा के अंधकार में घिर जाते।
वृद्ध यह भी स्पष्ट करता है कि मनुष्य कमजोर, असहाय और अकेला होते हुए भी एक अदृश्य सहारे की डोर के सहारे कठिन से कठिन रास्तों को पार कर लेता है। भावुक होकर वह बताता है कि अज्जू के पिता की मृत्यु बहुत पहले हो चुकी थी और उसी समय उसने वचन दिया था कि वह अपने मित्र के परिवार की जिम्मेदारी निभाएगा। वह यह बताता है कि उसने साझे के कारोबार से पिता के हिस्से की राशि वर्षों तक नियमित रूप से बच्चों को भेजी। अब जब अज्जू बड़ा और आत्मनिर्भर हो गया है, तो उसका वचन पूरा हो गया है। अंत में वह अज्जू से आग्रह करता है कि अब वह इस कारोबार में उसका हाथ बँटाए। यह कहते हुए वह भावुक हो उठता है और नम आँखों से दीवार पर टंगे धुँधले चित्र को देखते हुए अपने बीते दिनों को स्मरण करता रहता है।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘साए’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। कहानीकार हिमाँशु जोशी द्वारा लिखित यह कहानी बताती है कि जीवन की कठिन परिस्थितियों में दिखाई न देने वाले सहारे ही व्यक्ति को आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।