प्रकृति का अभिशाप पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 19 “Prakriti Ka Abhishap” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
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Prakriti Ka Abhishap (प्रकृति का अभिशाप)
श्रीपाद विष्णु कानाडे
इस पाठ में लेखक श्रीपाद विष्णु कानाडे ने पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्या को सरल और रोचक संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। इस पाठ में प्रकृति के विभिन्न तत्वों पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश को देवताओं के रूप में दिखाकर यह समझाया गया है कि मनुष्य की अंधी प्रगति और स्वार्थ के कारण प्रकृति को कितना नुकसान पहुँच रहा है। प्रदूषण को एक अदृश्य दैत्य के रूप में दिखाया गया है, जो धीरे-धीरे पृथ्वी और मानव जीवन को नष्ट कर रहा है। यह पाठ हमें चेतावनी देता है कि यदि समय रहते प्रकृति की रक्षा नहीं की गई, तो इसके भयानक परिणाम होंगे, और साथ ही यह विश्वास भी दिलाता है कि मानव अपनी बुद्धि से इस संकट का समाधान कर सकता है।
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प्रकृति का अभिशाप पाठ सार Prakriti Ka Abhishap Summary
यह पाठ ‘प्रकृति का अभिशाप’ एक एकांकी है, जिसमें लेखक श्रीपाद विष्णु कानाडे ने बहुत सरल और प्रभावशाली ढंग से यह समझाने का प्रयास किया है कि मनुष्य की गलत आदतों और अंधी प्रगति के कारण आज प्रकृति संकट में पड़ गई है। पर्यावरण का अर्थ है वह सब कुछ जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है और हमारे जीवन की रक्षा करता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश इन पाँचों के बिना जीवन संभव नहीं है। हमारी संस्कृति में इन्हें देवता माना गया है क्योंकि ये जीवन देने वाले हैं। पहले प्रकृति ने मनुष्य के लिए एक सुरक्षित और सुखद कवच बनाया था, लेकिन आज वही मनुष्य अपने स्वार्थ और सुख के लिए प्रकृति को नष्ट करता जा रहा है।
पाठ की शुरुआत सूर्यदेव से होती है, जो अपनी प्रिय पुत्री पृथ्वी की चिंता कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि पृथ्वी पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। रश्मिदेवी बताती हैं कि उन्होंने पृथ्वी का भ्रमण किया है और उन्हें तो वहाँ सब कुछ बहुत अच्छा लगा। मनुष्य ने बहुत प्रगति कर ली है, बड़े-बड़े शहर बना लिए हैं और आधुनिक जीवन जी रहा है। लेकिन तभी पवनदेव, जलदेवी और वनदेवी वहाँ आकर बताते हैं कि यह प्रगति वास्तव में उन्नति नहीं, बल्कि विनाश की ओर ले जाने वाली है। वे कहते हैं कि पृथ्वी गंभीर संकट में है और इसका कारण है प्रदूषण।
पवनदेव बताते हैं कि वायु, जो जीवन के लिए सबसे ज़रूरी है, आज बहुत अधिक दूषित हो गई है। कारखानों, वाहनों और मशीनों से निकलने वाली जहरीली गैसों के कारण हवा में ऑक्सीजन की मात्रा घटती जा रही है और कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती जा रही है। इससे मनुष्य को साँस लेने में परेशानी होती है और कई बीमारियाँ फैलती हैं। सूर्यदेव बताते हैं कि वायुमंडल पृथ्वी की रक्षा करता है, लेकिन जब यही वायुमंडल दूषित हो जाता है तो जीवन खतरे में पड़ जाता है।
इसके बाद वनदेवी अपने दुःख की बात बताती हैं। वे कहती हैं कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण वे दिन-ब-दिन कम होती जा रही हैं। पेड़-पौधे न केवल हमें भोजन देते हैं, बल्कि हवा को शुद्ध भी करते हैं और वर्षा लाने में मदद करते हैं। जब जंगल कटते हैं तो वर्षा कम हो जाती है, धरती सूखने लगती है और अनेक जीव-जंतु बेघर हो जाते हैं। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है और इसका सीधा असर मनुष्य के जीवन पर पड़ता है।
जलदेवी बताती हैं कि नदियाँ, तालाब और समुद्र भी प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। कारखानों का गंदा पानी, तेल और रासायनिक पदार्थ जल में मिला दिए जाते हैं, जिससे जल विषैला हो जाता है। कीटनाशक दवाएँ भी वर्षा के पानी के साथ बहकर नदियों में पहुँच जाती हैं। इससे जल में रहने वाले जीव मरने लगते हैं और वही विषैला जल और भोजन मनुष्य के शरीर में जाता है, जिससे गंभीर बीमारियाँ फैलती हैं।
इसी बीच प्रदूषण दैत्य की डरावनी आवाज़ सुनाई देती है। वह बताता है कि वह दिखाई नहीं देता, लेकिन धीरे-धीरे वायु, जल और वनस्पति को नष्ट कर रहा है। वह गर्व से कहता है कि वही मानव के विनाश का कारण बनेगा। उसके साथ रेडियोधर्मिता और ध्वनि प्रदूषण जैसे सहायक भी हैं, जो परमाणु परीक्षण, तेज़ आवाज़ों और मशीनों के कारण मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रूप से नुकसान पहुँचा रहे हैं।
सभी देवता चिंतित हो जाते हैं, तभी बुद्धिदेवी का प्रवेश होता है। वे बताती हैं कि मानव ने हमेशा अपनी बुद्धि के बल पर कठिन परिस्थितियों पर विजय पाई है। जैसे उसने आग को अपने नियंत्रण में किया, वैसे ही वह प्रदूषण पर भी काबू पा सकता है। बुद्धिदेवी विश्वास दिलाती हैं कि सही सोच, समझ और संयम से मनुष्य इस प्रदूषण दैत्य को हरा सकता है। इसके लिए ज़रूरी है कि मनुष्य प्रकृति का सही उपयोग करे, उसे नुकसान न पहुँचाए और संतुलन बनाए रखे।
अंत में सूर्यदेव बुद्धिदेवी को आशीर्वाद देते हैं और सभी को आशा की किरण दिखाई देती है। यह पाठ हमें यह संदेश देता है कि यदि मनुष्य समय रहते नहीं जागा, तो प्रदूषण उसके विनाश का कारण बन सकता है। लेकिन अगर मनुष्य अपनी बुद्धि का सही उपयोग करे, प्रदूषण कम करे और प्रकृति के साथ मिलकर चले, तो पृथ्वी को फिर से सुरक्षित और सुंदर बनाया जा सकता है।
प्रकृति का अभिशाप पाठ व्याख्या Prakriti Ka Abhishap Lesson Explnation
| पात्र – परिच | वेश-भूषा |
| सूर्यदेव | सूर्यदेव चमकदार पीले वस्त्र और चमचमाता सुनहरा मुकुट पहने हुए हैं। |
| रश्मिदेवी | रश्मिदेवी भी चमकदार पीला लहँगा और वैसी ही चुन्नी ओढ़े हैं। |
| वनदेवी | वनदेवी फूल और पत्तों से चित्रित हरी साड़ी में हैं, सिर पर पत्तों का मुकुट है। |
| जलदेवी | जलदेवी मछलियों आदि जलीय जंतुओं से चित्रित नीली साड़ी और नीले रंग के मुकुट में हैं। |
| पवनदेव | पवनदेव सफ़ेद वस्त्र पहने हैं। |
| बुद्धिदेवी | बुद्धिदेवी रुपहली किनारी लगी हुई सफ़ेद साड़ी और रुपहले झिलमिलाते मुकुट में हैं। |
| प्रदूषण दैत्य | प्रदूषण दैत्य नेपथ्य में है अतः वेशभूषा की आवश्यकता नहीं है। |
1
पहला दृश्य
(पार्श्वभूमि को पूरी तरह से घेरता हुआ सौरमंडल का रंगीन चित्र। मंच के बीचोंबीच एक विशाल सुनहरा सिंहासन, जिस पर सूर्यदेव विराजमान हैं। रश्मिदेवी सिंहासन के पीछे खड़ी हैं।)
सूर्यदेव : (चिंतित मुद्रा में) इस सौर जगत में मेरे विशाल कुटुंब में, जितने भी ग्रह हैं, उनमें से एक के विषय में मुझे कुछ चिंता हो चली है। वह है मेरी प्रिय पुत्री-पृथ्वी। अपने इस कुटुंब में मैंने पृथ्वी को ही अधिक योग्य बनाया है। पृथ्वी की गोद में अनेक प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे पनप सकते हैं, यहाँ तक कि सबसे अधिक आश्चर्यजनक अनोखा जीव भी…।
रश्मिदेवी : अर्थात मानव, यही न स्वामी !
सूर्यदेव : (चौंककर) कौन? रश्मि तुम मेरी बातें सुन रही थीं! हाँ, तुमने ठीक पहचाना। सबसे अनोखा जीव मानव है और उसके अनोखे होने का कारण है, उसका मस्तिष्क।
रश्मिदेवी : स्वामी! जब आपने अपनी लाड़ली पृथ्वी को सौर जगत में इतना अच्छा स्थान दिया है और मानव जैसा अनोखा उपहार दिया है, तब आपको चिंता कैसी? और मैं तो अभी पृथ्वी का भ्रमण करके ही आ रही हूँ। मुझे तो पूरे सौर जगत में पृथ्वी एक नंदनवन जैसी लगती है।
सूर्यदेव : (आतुरता से) क्या तुम पृथ्वी का भ्रमण करके आ रही हो? तो फिर बताओ, मेरी प्रिय पुत्री का क्या हाल है?
रश्मिदेवी : उसका हाल बहुत अच्छा है। मानव ने अपने मस्तिष्क के सहारे प्रगति की है। जंगल और गुफाओं में रहने वाला मानव आज नगरों में बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं में रहता है। उसने प्रकृति पर काफ़ी सीमा तक विजय प्राप्त कर ली है। वह उन्नति के शिखर…।
शब्दार्थ-
पार्श्वभूमि– आस-पास की ज़मीन
सौरमंडल- सूर्य और उसके ग्रहों का समूह
मंच- नाटक खेलने का स्थान
बीचोंबीच– बिल्कुल बीच में
विशाल- बहुत बड़ा
सुनहरा- सोने जैसा चमकदार
सिंहासन- राजा या देवता के बैठने का आसन
विराजमान- बैठे हुए
चिंतित– परेशान
सौर जगत- सूर्य से संबंधित संसार
कुटुंब– परिवार
ग्रह- पृथ्वी जैसे खगोलीय पिंड
विषय– बात, मुद्दा
प्रिय– प्यारा
पुत्री- बेटी
योग्य- सक्षम, लायक
गोद– आश्रय, स्थान
जीव-जंतु- पशु-पक्षी और अन्य प्राणी
पनपना- बढ़ना, विकसित होना
आश्चर्यजनक– चौंकाने वाला
अनोखा- सबसे अलग
मानव– मनुष्य
रश्मि– किरण
स्वामी– मालिक, प्रभु
मस्तिष्क– दिमाग
लाड़ली– बहुत प्यारी
उपहार- भेंट, तोहफ़ा
भ्रमण- घूमना
नंदनवन– स्वर्ग जैसा सुंदर स्थान
आतुरता– उत्सुकता, बेचैनी
हाल- स्थिति
प्रगति- उन्नति
अट्टालिका- महल, पक्की इमारत
विजय- जीत
उन्नति के शिखर– विकास की ऊँचाई
व्याख्या- प्रस्तुत अंश में मंच पर सौरमंडल का अत्यंत भव्य और रंगीन दृश्य दिखाया गया है। मंच के मध्य एक विशाल सुनहरे सिंहासन पर सूर्यदेव विराजमान हैं और उनके पीछे रश्मिदेवी खड़ी हैं। सूर्यदेव चिंतित मन से यह कहते हैं कि उनके विशाल सौर परिवार में अनेक ग्रह हैं, परंतु उनमें से एक ग्रह को लेकर उनके मन में विशेष चिंता उत्पन्न हो रही है। वे स्पष्ट करते हैं कि यह ग्रह उनकी प्रिय पुत्री पृथ्वी है। सूर्यदेव यह भी बताते हैं कि उन्होंने अपने पूरे सौर जगत में पृथ्वी को सबसे अधिक योग्य और विशेष स्थान दिया है। वे यह समझाते हैं कि पृथ्वी की गोद में अनेक प्रकार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे और जीवन के विविध रूप सुरक्षित रूप से विकसित हो सकते हैं। वे यह संकेत भी देते हैं कि पृथ्वी पर एक ऐसा अनोखा जीव है, जो अन्य सभी जीवों से अलग और विशेष है।
इस पर रश्मिदेवी यह स्पष्ट करती हैं कि सूर्यदेव मानव की ही बात कर रहे हैं। सूर्यदेव आश्चर्य प्रकट करते हुए यह स्वीकार करते हैं कि रश्मिदेवी उनकी बातों को ध्यान से सुन रही हैं और वे यह भी बताते हैं कि मानव वास्तव में सबसे अनोखा जीव है। वे यह स्पष्ट करते हैं कि मानव के अनोखे होने का मुख्य कारण उसका विकसित मस्तिष्क है, जिसके कारण वह सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता रखता है।
आगे रश्मिदेवी यह कहती हैं कि जब सूर्यदेव ने पृथ्वी को सौर जगत में इतना श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है और मानव जैसा अद्भुत उपहार दिया है, तो चिंता का कोई कारण नहीं होना चाहिए। वे यह भी बताती हैं कि वे अभी-अभी पृथ्वी का भ्रमण करके आई हैं और उनके अनुसार पूरी सौर व्यवस्था में पृथ्वी उन्हें एक सुंदर नंदनवन के समान प्रतीत होती है।
यह सुनकर सूर्यदेव उत्सुकता और आतुरता के साथ पृथ्वी की स्थिति के बारे में जानना चाहते हैं। इसके उत्तर में रश्मिदेवी यह बताती हैं कि पृथ्वी की दशा बहुत अच्छी है। वे यह भी स्पष्ट करती हैं कि मानव ने अपने मस्तिष्क और बुद्धि के सहारे निरंतर प्रगति की है। जो मानव पहले जंगलों और गुफाओं में जीवन व्यतीत करता था, वही आज नगरों में ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं में निवास कर रहा है। रश्मिदेवी यह भी कहती हैं कि मानव ने प्रकृति पर काफी हद तक विजय प्राप्त कर ली है और वह निरंतर उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ रहा है।
2
(पवनदेव का प्रवेश)
पवनदेव : (बात काटकर) नहीं भगवन् ! उन्नति नहीं, पतन के गर्त में गिरने वाला है।
(जलदेवी का प्रवेश)
जलदेवी : (क्रोधित स्वर में) लेकिन ऐसी उन्नति भी भला किस काम की, जिससे उसे अशुद्ध जल पीकर अनेक बीमारियों का शिकार होना पड़ता है। (सूर्यदेव तथा रश्मिदेवी और अधिक आश्चर्यचकित होते हैं।)
(वनदेवी का प्रवेश)
वनदेवी : यही नहीं, असाधारण प्रगति के कारण मानव के समक्ष विषाक्त भोजन खाकर आत्मघात करने के सिवाय कोई चारा नहीं रहेगा, भगवन् !
सूर्यदेव : (एक-एक चेहरे को देखते हुए) आखिर आप लोग हैं कौन और क्या कह रहे हैं?
पवनदेव : (हाथ जोड़कर) सौर जगत के अधिपति भगवान सूर्य हमें क्षमा करें। देवी रश्मि के असत्य कथन से कि मानव उन्नति के शिखर पर पहुँच रहा है, लोग क्षुब्ध हो उठे और बीच में ही बोल उठे। क्षमा करें भगवन्!
(सूर्यदेव अभी भी चकित मुद्रा में)
पवनदेव : हम (सिर झुकाकर) देव! आपकी लाड़ली पुत्री पृथ्वी का तुच्छ सेवक पवनदेव आपको नमन करता है।
जलदेवी : (सिर झुकाकर) उसी पृथ्वी की सेविका इस जलदेवी का प्रणाम स्वीकार करें।
वनदेवी : (सिर झुकाकर) भगवन्! आपकी पुत्री पृथ्वी की एक और सेविका वनदेवी का कोटि-कोटि प्रणाम!
सूर्यदेव : (हाथ उठाकर) अपनी पुत्री की सेविकाओं से मिलकर मुझे प्रसन्नता हो रही है परंतु आप लोगों के इस अनायास आगमन का कारण क्या है?
पवनदेव : (खिन्न स्वर में) भगवन्! क्षमा करें परंतु हमारी स्वामिनी पृथ्वी इस समय बड़े संकट में है और अपने दुःख की गाथा सुनाने ही उन्होंने हमें यहाँ भेजा है।
सूर्यदेव : (तेज़ स्वर में) क्या कहा? हमारे रहते हमारी पुत्री संकट में है? असंभव ! (रश्मि की ओर मुड़कर) रश्मि ! तुम तो अभी पृथ्वी का भ्रमण करके आई हो। तुमने अभी बताया कि पृथ्वी नंदनवन – सी लगती है!
रश्मिदेवी : (मुस्कराकर) मैंने तो अपने भ्रमण में ऐसा ही पाया। हर जगह मानव की प्रगति हो रही है।
जलदेवी : (दो कदम आगे बढ़कर) भगवन्! क्षमा करें। रश्मिदेवी ने प्रकाश की तीव्र गति से पृथ्वी का भ्रमण किया इसलिए उन्हें केवल ऊपरी-ऊपरी बातें ही नज़र आई होंगी।
सूर्यदेव : (सिंहासन से उठकर) आखिर बात क्या है? कौन-सा ऐसा बड़ा संकट पृथ्वी पर मंडरा रहा है?
शब्दार्थ-
प्रवेश- अंदर आना
बात काटकर- बीच में रोककर बोलना
भगवन्- हे प्रभु
उन्नति- प्रगति, आगे बढ़ना
पतन- गिरावट
गर्त- गड्ढा
क्रोधित- गुस्से में
स्वर– आवाज़
अशुद्ध- गंदा, शुद्ध न होना
शिकार होना– प्रभावित होना
असाधारण- असामान्य, बहुत अधिक
विषाक्त– ज़हरीला
समक्ष– सामने
आत्मघात– अपनी हत्या
सिवाय- के अलावा
चारा– उपाय
आखिर– अंत में
अधिपति– स्वामी, मालिक
क्षमा– माफ़ी
असत्य– झूठा
कथन– कहना
क्षुब्ध- क्रोध मिश्रित दुःख
चकित- हैरान
तुच्छ- छोटा, विनम्र भाव से कहा गया
नमन- प्रणाम
सेविका– सेवा करने वाली
कोटि-कोटि- करोड़ों
प्रसन्नता– खुशी
अनायास- अचानक
खिन्न- दुःखी, उदास
स्वामिनी- मालकिन
संकट- कठिनाई, विपत्ति
दुःख की गाथा- दुखों की कहानी
तेज़ स्वर– ऊँची आवाज़
असंभव- जो संभव न हो
भ्रमण– घूमना
तीव्र गति– बहुत तेज़ रफ़्तार
ऊपरी-ऊपरी– केवल सतही
मंडराना- चारों ओर घूमना, छाया की तरह होना
व्याख्या- इस दृश्य में यह बताया गया है कि अचानक पवनदेव का प्रवेश होता है और वे सूर्यदेव की बात को बीच में रोकते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि मानव उन्नति की ओर नहीं, बल्कि पतन के गहरे गर्त की ओर बढ़ रहा है। उनके इस कथन से वातावरण गंभीर हो जाता है। तभी जलदेवी का प्रवेश होता है और वे क्रोधित स्वर में यह कहती हैं कि ऐसी उन्नति का कोई महत्त्व नहीं है, जिसके कारण मानव को अशुद्ध जल पीना पड़ रहा है और वह अनेक भयानक रोगों से ग्रस्त हो रहा है। उनके इस कथन से सूर्यदेव और रश्मिदेवी और अधिक आश्चर्यचकित हो जाते हैं।
इसके बाद वनदेवी का प्रवेश होता है और वे भी चिंता व्यक्त करते हुए यह कहती हैं कि अत्यधिक और असंतुलित प्रगति के कारण मानव के सामने विषैला भोजन करने और आत्मघात जैसी स्थिति उत्पन्न हो रही है। वे यह संकेत देती हैं कि प्रकृति के विनाश का परिणाम मानव के लिए विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। इन सभी बातों को सुनकर सूर्यदेव एक-एक करके सबके चेहरों की ओर देखते हैं और यह जानना चाहते हैं कि ये सभी कौन हैं और इस प्रकार की गंभीर बातें क्यों कह रहे हैं।
इस पर पवनदेव हाथ जोड़कर क्षमा याचना करते हैं और बताते हैं कि वे सौर जगत के अधिपति भगवान सूर्य से क्षमा चाहते हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि देवी रश्मि द्वारा मानव की उन्नति से संबंधित कथन सुनकर वे अत्यंत व्यथित हो गए थे और इसी कारण वे स्वयं को रोक नहीं पाए। इसके बाद पवनदेव विनम्रता से यह परिचय देते हैं कि वे सूर्यदेव की लाड़ली पुत्री पृथ्वी के तुच्छ सेवक पवनदेव हैं। उनके साथ जलदेवी स्वयं को पृथ्वी की सेविका बताकर प्रणाम करती हैं और वनदेवी भी पृथ्वी की एक अन्य सेविका के रूप में कोटि-कोटि प्रणाम अर्पित करती हैं।
सूर्यदेव यह कहते हैं कि उन्हें अपनी पुत्री की सेविकाओं से मिलकर प्रसन्नता हो रही है, किंतु वे यह भी जानना चाहते हैं कि उनका इस प्रकार अचानक आगमन क्यों हुआ है। इसके उत्तर में पवनदेव खिन्न स्वर में बताते हैं कि पृथ्वी इस समय अत्यंत गंभीर संकट में है और उसी दुःख और पीड़ा को प्रकट करने के लिए पृथ्वी ने उन्हें यहाँ भेजा है।
यह सुनकर सूर्यदेव तेज स्वर में आश्चर्य प्रकट करते हैं और कहते हैं कि उनके रहते उनकी पुत्री पृथ्वी संकट में हो, यह असंभव है। वे रश्मिदेवी की ओर मुड़कर यह याद दिलाते हैं कि रश्मिदेवी अभी पृथ्वी का भ्रमण करके आई हैं और उन्होंने पृथ्वी को नंदनवन के समान बताया था। इस पर रश्मिदेवी मुस्कराकर यह दोहराती हैं कि उन्हें अपने भ्रमण में हर स्थान पर मानव की प्रगति ही दिखाई दी थी।
तभी जलदेवी दो कदम आगे बढ़कर विनम्रतापूर्वक यह स्पष्ट करती हैं कि रश्मिदेवी ने प्रकाश की तीव्र गति से पृथ्वी का भ्रमण किया था, इसलिए उन्हें केवल बाहरी और ऊपरी स्थिति ही दिखाई दी होगी, वास्तविक समस्याएँ नहीं। अंत में सूर्यदेव सिंहासन से उठते हैं और गंभीर स्वर में यह जानना चाहते हैं कि पृथ्वी पर ऐसा कौन-सा बड़ा संकट मंडरा रहा है, जिसने सभी को चिंतित कर दिया है।
3
पवनदेव : (घबराए स्वर में) देव! एक महादैत्य हम लोगों के पीछे लगा हुआ है।
रश्मिदेवी : (डरी हुई मुद्रा में) क… क… क… क्या कहा? महादैत्य! (सूर्य से चिपककर) मुझे बचाइए!
सूर्यदेव : डरती क्यों हो? क्या तुमने अपने भ्रमण के दौरान उस महादैत्य को देखा?
रश्मिदेवी : (वीरता के भाव से) मैंने कोई दैत्य नहीं देखा। मैं किसी से डरने वाली नहीं।
सूर्यदेव : (क्रोधित होकर) तुमने नहीं देखा, तो फिर ये लोग क्या कह रहे हैं? बोलो!
पवनदेव : (मंच पर एक चक्कर काटते हुए) रश्मिदेवी ठीक कह रही हैं। यह दैत्य ऐसा ही है जो दिखाई नहीं देता परंतु धीरे-धीरे पृथ्वी के वातावरण को विषाक्त बना रहा है।
सूर्यदेव : क्या नाम है उस दैत्य का?
जलदेवी : उसका नाम है – प्रदूषण!
रश्मिदेवी : खर-दूषण का नाम तो मैंने सुना है किंतु उसे तो प्रभु रामचंद्र जी ने त्रेतायुग में समाप्त कर दिया था।
पवनदेव : (हँसी रोकने की मुद्रा में) देवी जी, खर-दूषण नहीं! प्रदूषण! प्रदूषण!
रश्मिदेवी : (सिर हिलाकर) हाँ, तो यह राक्षस अवश्य ही खर-दूषण के कुल में जन्मा होगा।
वनदेवी : (अपने स्थान से एक कदम आगे बढ़कर) जी नहीं। इस राक्षस का प्रादुर्भाव गत शताब्दी में हुआ, जब से संसार में औद्योगिक क्रांति प्रारंभ हुई। इस शताब्दी के अंत तक तो यह न मालूम क्या गज़ब ढाएगा!
सूर्यदेव : (सिंहासन पर बैठ जाते हैं) देखो, तुम लोग जरा स्पष्ट रूप से सब समझाओ। पवन! पहले तुम बताओ।
पवनदेव : (सूर्य के आगे नत होकर) भगवन्, आप जानते ही हैं कि यह तुच्छ सेवक पवन, आपकी पुत्री पृथ्वी के वातावरण का एक मुख्य घटक है। वायुमंडल के रूप में मैंने पृथ्वी को आच्छादित कर रखा है।
सूर्यदेव : हाँ, मैंने अपने अन्य किसी पुत्र को इतना अच्छा वातावरण नहीं दिया। वायुमंडल के कारण एक तो पृथ्वी के प्राणी जीवित रह पाते हैं, दूसरा यह कई प्रकार के संकटों से पृथ्वी की रक्षा भी करता है।
रश्मिदेवी : (डरकर) वह कैसे?
सूर्यदेव : अंतरिक्ष में अनेक उल्काएँ हर पल पृथ्वी की ओर आकृष्ट होती हैं। वायुमंडल घर्षण के कारण वे मार्ग में ही भस्म हो जाती हैं। यदि वायुमंडल न होता, तो उल्काएँ पृथ्वी पर विनाश करतीं। पृथ्वी का धरातल भी चंद्रमा के समान बड़े-बड़े गड्ढों से युक्त होता।
पवनदेव : जी हाँ! मेरे अस्तित्व के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है।
शब्दार्थ
घबराए स्वर में- डरे हुए अंदाज़ में
महादैत्य– महाराक्षस
मुद्रा– भाव-भंगिमा, हाव-भाव
b घूमना-फिरना
वीरता- साहस, बहादुरी
क्रोधित– गुस्से में भरा हुआ
वातावरण- चारों ओर का प्राकृतिक परिवेश
आकृष्ट– खिंचा हुआ
दैत्य– राक्षस
त्रेतायुग– हिंदू धर्म का एक प्राचीन युग
कुल- वंश, खानदान
प्रादुर्भाव– प्रकट होना, उत्पत्ति
गत शताब्दी– पिछली सदी
औद्योगिक– उद्योग सम्बन्धी
गज़ब ढाना– भारी विनाश करना
सिंहासन– राजगद्दी
नत होकर– झुककर, विनम्रता से
तुच्छ– छोटा, नगण्य
सेवक- सेवा करने वाला
घटक– भाग, तत्व
वायुमंडल– वातावरण
आच्छादित– ढका हुआ
उल्काएँ- लौह मिश्रित पत्थर के टुकड़े जो अंतरिक्ष से पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं।
अंतरिक्ष– आकाश
घर्षण– रगड़
भस्म– राख
धरातल– पृथ्वी की सतह
अस्तित्व- हस्ती, सत्ता, विद्यमान होना
व्याख्या- इस अंश में यह बताया गया है कि पवनदेव घबराए हुए स्वर में यह सूचना देते हैं कि एक महादैत्य उनके पीछे लगा हुआ है। उनकी यह बात सुनकर रश्मिदेवी अत्यंत भयभीत हो जाती हैं और हकलाते हुए यह पूछती हैं कि महादैत्य कैसे हो सकता है। वे डर के कारण सूर्यदेव से चिपक जाती हैं और उनसे रक्षा की प्रार्थना करती हैं। इस पर सूर्यदेव उन्हें शांत करते हुए यह पूछते हैं कि क्या उन्होंने अपने पृथ्वी-भ्रमण के दौरान उस महादैत्य को देखा है।
रश्मिदेवी वीरता का भाव दिखाते हुए यह कहती हैं कि उन्होंने किसी दैत्य को नहीं देखा और वे किसी से डरने वाली नहीं हैं। सूर्यदेव क्रोधित होकर यह प्रश्न करते हैं कि जब रश्मिदेवी ने कुछ नहीं देखा, तो फिर पवनदेव और अन्य देवियाँ किस आधार पर यह बातें कह रहे हैं।
इसके उत्तर में पवनदेव मंच पर एक चक्कर लगाते हुए स्पष्ट करते हैं कि रश्मिदेवी का कथन सही है, क्योंकि वह दैत्य दिखाई नहीं देता। वे यह भी बताते हैं कि वह अदृश्य रहते हुए धीरे-धीरे पृथ्वी के वातावरण को विषैला बना रहा है। सूर्यदेव उस दैत्य का नाम पूछते हैं। तब जलदेवी यह बताती हैं कि उस दैत्य का नाम ‘प्रदूषण’ है।
यह सुनकर रश्मिदेवी भ्रमित होकर कहती हैं कि उन्होंने ‘खर-दूषण’ का नाम तो सुना है, जिसे त्रेतायुग में भगवान राम ने समाप्त कर दिया था। इस पर पवनदेव हँसी रोकते हुए स्पष्ट करते हैं कि वे ‘खर-दूषण’ नहीं बल्कि ‘प्रदूषण’ की बात कर रहे हैं। रश्मिदेवी फिर भी यह मान लेती हैं कि यह राक्षस अवश्य ही उसी कुल का होगा।
तभी वनदेवी एक कदम आगे बढ़कर यह स्पष्ट करती हैं कि यह राक्षस किसी पौराणिक युग का नहीं है, बल्कि इसका जन्म पिछली शताब्दी में हुआ है, जब संसार में औद्योगिक क्रांति आरंभ हुई। वे यह आशंका भी व्यक्त करती हैं कि इस शताब्दी के अंत तक यह प्रदूषण न जाने कितनी बड़ी विपत्तियाँ खड़ी कर देगा।
इसके बाद सूर्यदेव सिंहासन पर बैठ जाते हैं और सभी से आग्रह करते हैं कि वे पूरी बात स्पष्ट रूप से समझाएँ। वे विशेष रूप से पवनदेव को पहले बोलने के लिए कहते हैं। पवनदेव विनम्रतापूर्वक यह बताते हैं कि वे पृथ्वी के वातावरण का एक प्रमुख घटक हैं और वायुमंडल के रूप में उन्होंने पृथ्वी को चारों ओर से ढक रखा है।
सूर्यदेव इस बात की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि उन्होंने अपने किसी अन्य ग्रह को पृथ्वी जैसा उत्तम वातावरण नहीं दिया है। वे समझाते हैं कि वायुमंडल के कारण ही पृथ्वी के प्राणी जीवित रह पाते हैं और यह वातावरण पृथ्वी को अनेक संकटों से भी बचाता है। जब रश्मिदेवी डरते हुए यह पूछती हैं कि वह कैसे, तब सूर्यदेव यह बताते हैं कि अंतरिक्ष से अनेक उल्काएँ हर समय पृथ्वी की ओर आकर्षित होती रहती हैं, परंतु वायुमंडल से घर्षण होने के कारण वे रास्ते में ही जलकर नष्ट हो जाती हैं। यदि वायुमंडल न होता, तो पृथ्वी पर भारी विनाश होता और उसका धरातल चंद्रमा की तरह गड्ढों से भर जाता। अंत में पवनदेव यह स्पष्ट करते हैं कि उनके अस्तित्व के कारण ही पृथ्वी पर जीवन संभव है।
4
सूर्यदेव : मनुष्य के लिए शुद्ध हवा की कमी न रहे इसीलिए मैंने पृथ्वी को हवा के अथाह समुद्र में डुबो दिया है।
पवनदेव : (उदास होकर) इस हवा के अथाह समुद्र का केवल 1/5 भाग, जिसे ऑक्सीजन कहते हैं, मानव के लिए प्रत्यक्षतः उपयोग का है और मुझमें इसका तीव्रता से ह्रास होता जा रहा है।
सूर्यदेव : क्या इस ह्रास को रोका नहीं जा सकता?
पवनदेव : प्रत्येक जीव ऑक्सीजन का उपयोग करता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। यही नहीं, असंख्य कारखानों, इंजनों में आग का उपयोग हो रहा है जिससे कार्बन डाइऑक्साइड अत्यधिक उत्पन्न हो रही है। मुझमें ऑक्सीजन कम होने का यह प्रमुख कारण है।
सूर्यदेव : इस दूषित कार्बन डाइऑक्साइड से पुनः ऑक्सीजन प्राप्त करने के लिए ही तो मैंने वनस्पति जैसी सेविका पृथ्वी को प्रदान की है।
वनदेवी : प्रभु, आपका कहना ठीक है ! आपके तीव्र प्रकाश की सहायता से मेरी हरी पत्तियाँ कार्बन डाइऑक्साइड को प्रकाश संश्लेषण की क्रिया से कार्बन और ऑक्सीजन में विश्लेषित करती हैं। मैं स्वयं के पोषण के लिए कार्बन रख लेती हूँ और प्राणदायिनी ऑक्सीजन को पुनः वायु में भेज देती हूँ। मेरी प्रत्येक हरी पत्ती एक अनोखा कारखाना है जो भोजन और ऑक्सीजन बनाती है। इस कारखाने में कभी कोई हड़ताल नहीं होती है।

रश्मिदेवी : (मुँह बनाकर) इतना अच्छा काम तुम्हारा, फिर भी यह रोनी सूरत !
वनदेवी : प्रभु, आपने अपनी प्रकृति को संतुलित बनाया था परंतु अब कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ती जा रही है और मैं घटती जा रही हूँ।
रश्मिदेवी : नहीं…नहीं… वनस्पतियाँ पैदा भी होती हैं।
वनदेवी : (गुस्से से) ज़रा सोच-समझकर बात किया करो ! मानव की आधुनिक प्रगति और औद्योगिक वृद्धि के कारण हरे-भरे जंगल नष्ट हो रहे हैं। विवेकहीन मनुष्य जंगल की लकड़ी अंधाधुंध काट रहा है। नई बस्तियाँ, नए शहर बसाने के लिए और कागज बनाने के लिए उपयोगी जंगल काट लिए जाते हैं। फलस्वरूप न केवल वायु को शुद्ध करने की मेरी क्षमता नष्ट हो रही है, अपितु…।
रश्मिदेवी : अब बंद भी करो अपना रोना !
वनदेवी : इसे मज़ाक न समझो। जंगलों के नष्ट होने से दो नुकसान और भी होते हैं। इनका प्रभाव मानव के जीवन पर भी पड़ता है।
सूर्यदेव : ये कौन-से नुकसान हैं?
वनदेवी : वन वर्षा लाते हैं। वनों की कमी से वर्षा नहीं होती। वर्षा न होने से वनस्पतियाँ नहीं उगतीं और वनस्पतियों के अभाव में वायु अशुद्ध रह जाती है, फिर वन अन्य वन्यप्राणियों के निवास-स्थान भी हैं। प्रकृति में इन प्राणियों का अपना अलग-अलग उपयोग और महत्व है।
शब्दार्थ-
शुद्ध– साफ़, निर्मल
अथाह– गहरा
प्रत्यक्षतः- प्रत्यक्ष रूप से
तीव्रता से- तेज़ी से
ह्रास- कमी, गिरावट
प्रत्येक– हर एक
असंख्य- बहुत अधिक
कारखाने- काम करने की जगह, उद्योग-स्थल
इंजन- मशीन का वह भाग जो शक्ति उत्पन्न करता है
अत्यधिक- बहुत ज़्यादा
उत्पन्न– पैदा होना
दूषित– गंदा, प्रदूषित
पुनः- फिर से
वनस्पति- पेड़-पौधे
सेविका- सेवा करने वाली
प्रदान- देना
तीव्र- तेज़
प्रकाश संश्लेषण- पौधों द्वारा सूर्य के प्रकाश से भोजन बनाने की प्रक्रिया
विश्लेषित– अलग-अलग किया हुआ
पोषण- पालन
प्राणदायिनी– जीवन देने वाली
अनोखा- विशेष, अद्भुत
हड़ताल- काम बंद करना
मुँह बनाकर- नाराज़गी या उपेक्षा दिखाते हुए
रोनी सूरत– उदास चेहरा
संतुलित– बराबर, समुचित
घटती जा रही हूँ- कम होती जा रही हूँ
औद्योगिक– उद्योगों से संबंधित
वृद्धि- बढ़ोतरी
विवेकहीन– बिना समझ-बूझ वाला
अंधाधुंध– बिना सोचे-समझे
बस्तियाँ- रहने के स्थान
फलस्वरूप– परिणामस्वरूप
क्षमता- शक्ति, योग्यता
अपितु– बल्कि
प्रभाव– असर
निवास-स्थान- रहने का स्थान
वन्यप्राणी- जंगल में रहने वाले जानवर
अभाव- कमी
महत्व- उपयोगिता
व्याख्या- इस अंश में सूर्यदेव यह स्पष्ट करते हैं कि उन्होंने मनुष्य के लिए शुद्ध वायु की कोई कमी न रहने देने के उद्देश्य से पृथ्वी को वायु के अथाह समुद्र से घेर दिया है। वे बताते हैं कि पृथ्वी के चारों ओर फैला वायुमंडल मानव जीवन के लिए एक अमूल्य वरदान है। इस पर पवनदेव उदास स्वर में यह जानकारी देते हैं कि इस अथाह वायु-सागर का केवल पाँचवाँ भाग, जिसे ऑक्सीजन कहा जाता है, ही मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष रूप से उपयोगी है और दुर्भाग्यवश यही ऑक्सीजन तीव्र गति से घटती जा रही है।
सूर्यदेव चिंता व्यक्त करते हुए यह जानना चाहते हैं कि क्या इस ह्रास को रोका नहीं जा सकता। इसके उत्तर में पवनदेव बताते हैं कि प्रत्येक जीव श्वसन के दौरान ऑक्सीजन का उपयोग करता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है। वे यह भी बताते हैं कि असंख्य कारखानों, वाहनों और इंजनों में ईंधन के जलने से अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न हो रही है। यही कारण है कि वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा निरंतर घट रही है।
तब सूर्यदेव यह स्मरण कराते हैं कि दूषित कार्बन डाइऑक्साइड को पुनः ऑक्सीजन में बदलने के लिए ही उन्होंने पृथ्वी को वनस्पति रूपी सेविका प्रदान की है। इस पर वनदेवी विनम्रता से यह समझाती हैं कि सूर्यदेव के तीव्र प्रकाश की सहायता से उनकी हरी पत्तियाँ प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड को कार्बन और ऑक्सीजन में विभाजित करती हैं। वे बताती हैं कि वे अपने पोषण के लिए कार्बन को ग्रहण कर लेती हैं और जीवनदायिनी ऑक्सीजन को पुनः वायु में छोड़ देती हैं। वनदेवी यह भी कहती हैं कि उनकी प्रत्येक हरी पत्ती एक अनोखे कारखाने की तरह कार्य करती है, जहाँ बिना रुके भोजन और ऑक्सीजन का निर्माण होता रहता है।
इसके बाद रश्मिदेवी हल्के-फुल्के और उपहासपूर्ण भाव से यह कहती हैं कि इतना अच्छा कार्य करने के बावजूद वनदेवी उदास क्यों दिखाई दे रही हैं। इस पर वनदेवी गंभीर स्वर में यह कहती हैं कि सूर्यदेव ने प्रकृति को संतुलित रूप में बनाया था, परंतु अब कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती जा रही है और वनस्पति निरंतर घटती जा रही है। रश्मिदेवी यह तर्क देती हैं कि वनस्पतियाँ तो उत्पन्न भी होती हैं, किंतु वनदेवी क्रोधित होकर यह स्पष्ट करती हैं कि मानव की आधुनिक प्रगति और औद्योगिक विकास के कारण हरे-भरे जंगल तेजी से नष्ट किए जा रहे हैं।
वनदेवी यह बताती हैं कि विवेकहीन मानव जंगलों की लकड़ी अंधाधुंध काट रहा है। नई बस्तियाँ, नए नगर बसाने और कागज बनाने के लिए उपयोगी वन समाप्त किए जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप न केवल वायु को शुद्ध करने की उनकी क्षमता नष्ट हो रही है, बल्कि प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ रहा है। जब रश्मिदेवी उन्हें चुप रहने को कहती हैं, तब वनदेवी चेतावनी देते हुए कहती हैं कि इस समस्या को मज़ाक में नहीं लिया जाना चाहिए।
अंत में वनदेवी यह स्पष्ट करती हैं कि जंगलों के नष्ट होने से दो और गंभीर नुकसान होते हैं, जिनका प्रभाव सीधे मानव जीवन पर पड़ता है। वे बताती हैं कि वन वर्षा लाने में सहायक होते हैं और वनों की कमी से वर्षा घट जाती है। वर्षा न होने से वनस्पतियाँ नहीं उगतीं और उनके अभाव में वायु अशुद्ध बनी रहती है। साथ ही, वन अनेक वन्य प्राणियों के निवास-स्थान भी हैं और प्रकृति में प्रत्येक जीव का अपना अलग महत्त्व और उपयोग है।
5
पवनदेव : मेरे दूषित होने के और भी अनेक कारण हैं जिनके मूल में हैं, आधुनिक औद्योगिक प्रगति !
रश्मिदेवी : (आश्चर्य से) प्रगति प्रदूषण का कारण कैसे हो सकती है?
पवनदेव : अनेक आधुनिक उद्योगों के कारण वायुमंडल में विविध प्रकार की गैसें आ जाती हैं। इन गैसों का प्रभाव मानव जीवन पर भी पड़ता रहता है।
रश्मिदेवी : रश्मिदेवी मानती हूँ! वायुमंडल में गैसें बहुत बढ़ गई हैं किंतु मानव पर भला इनका क्या असर होता है?
पवनदेव : गंधकयुक्त औषधियाँ मानव में आँतों की बीमारियाँ उत्पन्न करती हैं और तपेदिक जैसे रोगों को बढ़ावा देती हैं।
वनदेवी : गंधकयुक्त औषधियों के कारण मेरे पनपने में भी रुकावट आती है। मेरी हरी पत्ती के कारखाने ठीक से काम नहीं कर पाते।
पवनदेव : मेरे दूषित होने के दूसरे गंभीर कारण हैं – इन कारखानों के इंजन आदि से आने वाले असंख्य सूक्ष्म कण।
रश्मिदेवी : कार्बन डाइऑक्साइड और गंधकयुक्त औषधियाँ तुम्हें दूषित करती हैं, माना, पर ये सूक्ष्म कण तुम्हारा क्या बिगाड़ सकते हैं?
पवनदेव : (सूर्यदेव की ओर मुड़कर) देव! इन कणों के मुझमें मिल जाने से पृथ्वी को आपकी किरणों का पूरा-पूरा लाभ नहीं मिल पाता। ये कण कीटाणुओं से मिलकर जल और वनस्पतियों को भी दूषित करते हैं। इन असंख्य कारखानों, इंजनों आदि में जलने वाला पेट्रोल तो मुझे कहीं का नहीं छोड़ता!
सूर्यदेव : ऐसा क्यों?
पवनदेव : पेट्रोल को सक्षम बनाने के लिए उसमें सीसा मिलाया जाता है और यह सीसा तो मेरे अस्तित्व को अत्यधिक विषाक्त बना डालता है। बड़े शहरों का वातावरण तो इस पेट्रोल के कारण बहुत अधिक विषाक्त बन गया है, भगवन् !
रश्मिदेवी : इससे अच्छा तो यह होता कि लोग बड़े-बड़े शहरों में न रहकर छोटे-छोटे गाँवों में ही रहते!
पवनदेव : तुम्हारा कहना ठीक है, दैत्य प्रदूषण के लंबे हाथ अभी गाँवों तक नहीं पहुँचे हैं, और लोगों का गाँवों में रहना ही अच्छा है। इस सीसा मिश्रित पेट्रोल के कारण पृथ्वी पर एक और संकट मंडरा रहा है, प्रभु! आप तो जानते हैं कि वायुमंडल में ओजोन की परत है जो आपके द्वारा विसर्जित पराबैंगनी किरणों के दुष्प्रभाव से पृथ्वी के जीवों की रक्षा करती है।
सूर्यदेव : पराबैंगनी किरणों का थोड़ा-सा सेवन प्राणियों के लिए अत्यंत आवश्यक है पर इनकी मात्रा बढ़ जाने से तो सभी मर जाएँगे। ओज़ोन की परत इन पराबैंगनी किरणों के कुछ भाग को ही आर-पार होने देती है।
पवनदेव : ऊपरी वायुमंडल में पेट्रोल से चलनेवाले जैट जैसे विशालकाय हवाई जहाज़ इस ओज़ोन की परत को नष्ट कर रहे हैं।
शब्दार्थ–
मूल- जड़, आधार
आधुनिक– नए समय का
प्रगति- विकास, उन्नति
आश्चर्य- हैरानी
वायुमंडल– पृथ्वी के चारों ओर फैली हवा
विविध- कई प्रकार की
प्रभाव- असर
भला– आखिर, वास्तव में
गंधकयुक्त- गंधक (सल्फर) मिला हुआ
औषधियाँ- दवाइयाँ
आँतों– पेट के अंदर की नलियाँ
तपेदिक– टी.बी. नामक रोग
रुकावट– बाधा
गंभीर– गहरी, बहुत महत्त्वपूर्ण
सूक्ष्म– बहुत छोटे
कण– छोटे-छोटे कण/टुकड़े
किरणें- प्रकाश की रेखाएँ
कीटाणु– रोग पैदा करने वाले सूक्ष्म जीव
सक्षम- योग्य
सीसा- लेड धातु
मिश्रित– मिला हुआ
मंडरा रहा है- आस-पास खतरे के रूप में घूम रहा है
ओज़ोन की परत- वायुमंडल की वह परत जो सूर्य की हानिकारक किरणों से रक्षा करती है
विसर्जित- छोड़ना
पराबैंगनी किरणें– सूर्य की अत्यंत तीव्र किरणें
दुष्प्रभाव– बुरा प्रभाव
सेवन– ग्रहण करना
आर-पार- पूरी तरह होकर निकल जाना
विशालकाय– बहुत बड़ा
नष्ट– समाप्त करना
व्याख्या- इस अंश में पवनदेव यह बताते हैं कि उनके दूषित होने के अनेक कारण हैं और सबसे बड़ा कारण आधुनिक औद्योगिक प्रगति है। उनकी यह बात सुनकर रश्मिदेवी आश्चर्य व्यक्त करती हैं और यह जानना चाहती हैं कि प्रगति प्रदूषण का कारण कैसे बन सकती है। इसके उत्तर में पवनदेव स्पष्ट करते हैं कि अनेक आधुनिक उद्योगों की स्थापना के कारण वायुमंडल में विभिन्न प्रकार की हानिकारक गैसें मिल जाती हैं। वे यह भी बताते हैं कि इन गैसों का दुष्प्रभाव केवल वातावरण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मानव जीवन को भी प्रभावित करता है।
रश्मिदेवी यह स्वीकार करती हैं कि वायुमंडल में गैसों की मात्रा बढ़ गई है, किंतु वे यह प्रश्न करती हैं कि इनका मानव पर क्या प्रभाव पड़ता है। तब पवनदेव बताते हैं कि गंधकयुक्त गैसें मानव में आँतों से संबंधित रोग उत्पन्न करती हैं और तपेदिक जैसे गंभीर रोगों को बढ़ावा देती हैं। इस पर वनदेवी भी चिंता व्यक्त करती हैं और कहती हैं कि गंधकयुक्त गैसों के कारण उनके पनपने में बाधा आती है तथा उनकी हरी पत्तियों के कारखाने ठीक से कार्य नहीं कर पाते।
पवनदेव आगे यह भी बताते हैं कि उनके दूषित होने का एक और गंभीर कारण कारखानों के इंजनों से निकलने वाले असंख्य सूक्ष्म कण हैं। रश्मिदेवी यह जानना चाहती हैं कि ये सूक्ष्म कण वायुमंडल को किस प्रकार नुकसान पहुँचाते हैं। तब पवनदेव सूर्यदेव की ओर मुख करके यह स्पष्ट करते हैं कि इन कणों के वायुमंडल में मिल जाने से पृथ्वी को सूर्य की किरणों का पूरा लाभ नहीं मिल पाता। वे यह भी बताते हैं कि ये सूक्ष्म कण कीटाणुओं के साथ मिलकर जल और वनस्पतियों को भी दूषित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त वे यह कहते हैं कि कारखानों और इंजनों में जलने वाला पेट्रोल वायुमंडल को अत्यधिक हानि पहुँचाता है।
जब सूर्यदेव इसका कारण पूछते हैं, तब पवनदेव यह बताते हैं कि पेट्रोल को अधिक सक्षम बनाने के लिए उसमें सीसा मिलाया जाता है और यही सीसा वायुमंडल को अत्यधिक विषाक्त बना देता है। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि बड़े-बड़े शहरों का वातावरण इस सीसा मिश्रित पेट्रोल के कारण अत्यंत प्रदूषित हो चुका है। इस पर रश्मिदेवी यह विचार प्रकट करती हैं कि लोगों का बड़े शहरों की बजाय छोटे-छोटे गाँवों में रहना अधिक अच्छा होता। पवनदेव उनके इस विचार से सहमति जताते हैं और कहते हैं कि प्रदूषण रूपी दैत्य के लंबे हाथ अभी गाँवों तक पूरी तरह नहीं पहुँचे हैं।
आगे पवनदेव यह चेतावनी देते हैं कि सीसा मिश्रित पेट्रोल के कारण पृथ्वी पर एक और गंभीर संकट मंडरा रहा है। वे यह याद दिलाते हैं कि वायुमंडल में ओज़ोन की एक परत है, जो सूर्य द्वारा निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के दुष्प्रभाव से पृथ्वी के जीवों की रक्षा करती है। इस पर सूर्यदेव स्पष्ट करते हैं कि पराबैंगनी किरणों की थोड़ी मात्रा प्राणियों के लिए आवश्यक है, परंतु उनकी मात्रा बढ़ जाने पर समस्त जीवन नष्ट हो सकता है। वे यह भी बताते हैं कि ओज़ोन की परत इन किरणों के केवल कुछ भाग को ही पृथ्वी तक पहुँचने देती है।
अंत में पवनदेव गंभीर स्वर में यह बताते हैं कि ऊपरी वायुमंडल में पेट्रोल से चलने वाले विशालकाय जेट विमान ओज़ोन की इस सुरक्षा परत को नष्ट कर रहे हैं।
6
वनदेवी : (आँसू पोंछकर) प्रभो, अब कुछ मेरी भी सुनिए ! दैत्य प्रदूषण तो मुझे परेशान कर ही रहा है परंतु इन कीटनाशक रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग भी मुझे बहुत अधिक क्षति पहुँचा रहा है। अनाजों को बचाने के लिए कीटनाशक रसायनों का यथोचित प्रयोग ठीक हो सकता है परंतु अत्यधिक प्रयोग अनेक उपयोगी वनस्पतियों को भी नष्ट कर देता है। अनाजों को विषाक्त बनाता है, सो अलग!
जलदेवी : यही नहीं, ये कीटनाशक रसायन, वर्षा के जल में घुलकर नदियों और तालाबों को दूषित कर देते हैं जिससे जलीय वनस्पतियों और जीवों को काफ़ी नुकसान पहुँचता है।
रश्मिदेवी : इतना अधिक कीटनाशक बहकर आता है?
जलदेवी : एक बात और है, अनेक कारखाने अपना दूषित तेल और विषैले पदार्थ नदियों में बहा देते हैं जिससे जीव-जंतुओं को काफ़ी नुकसान पहुँचता है।
सूर्यदेव : यह सब तो बहुत खराब है।
जलदेवी : ऐसा तब और अधिक होता है, जब पेट्रोल से भरे विशाल टैंकर समुद्रों में टूट जाते हैं। समुद्र के किनारे ऐसे स्थान भी हैं जहाँ कास्टिक सोडे की अशुद्धियाँ बहाई जाती हैं। इनमें ज़हरीला पारा होता है। इस जहरीले पारे से मछलियाँ प्रभावित होती हैं और उन्हें खाकर मनुष्य !
सूर्यदेव : (माथे पर हाथ रखकर) यह सब तो अत्यंत घातक है !
रश्मिदेवी : स्वामी ! अब मैं तो इस जहरीली पृथ्वी का भ्रमण करने ही नहीं जाऊँगी।
सूर्यदेव : रश्मि ! यह असंभव है, पृथ्वी पर तो तुम्हें जाना ही होगा। तुम तो मानव-जीवन का सहारा हो।
(नेपथ्य से प्रदूषण दैत्य की आवाज़ आती है)
दैत्य प्रदूषण : (डरावनी हँसी में) हा… हा… हा…, आज मैं बड़ा प्रसन्न हूँ। मैंने वायु, जल और वनस्पति की नाक में दम कर दिया। है। देखी मेरी करामात ! हा… हा… हा…!
सूर्यदेव : (चौंककर सिंहासन से उठ जाते हैं।) कौन है, जो इस तरह बोल रहा है?
पवनदेव : आसपास तो कोई दिखाई नहीं देता !
दैत्य प्रदूषण : दिखाई दूँगा भी कैसे! मैं तो अदृश्य रहकर ही सबको सताता हूँ।
रश्मिदेवी : आवाज़ तो बड़ी डरावनी मालूम पड़ रही है।
दैत्य प्रदूषण : (चीखकर) मुझसे डरना ही पड़ेगा। मैं मनुष्य के विनाश का कारण बनने वाला हूँ।
वनदेवी : आखिर तुम हो कौन?
दैत्य प्रदूषण : (फिर चीखकर) मैं हूँ मानव का महाकाल, प्रगति का अभिशाप, औद्योगिक प्रगति का विष-वृक्ष, मैं हूँ मानव का अदृश्य शत्रु- प्रदूषण दैत्य ! समझे…. प्रदूषण दैत्य !
रश्मिदेवी : (डरते हुए) क… क…. क्या कहा? प्रदूषण दैत्य! स्वामी, मेरी रक्षा कीजिए!
शब्दार्थ-
प्रभो– हे प्रभु, हे भगवान
कीटनाशक– कीड़े मारने वाले रसायन
रसायन- रासायनिक पदार्थ
क्षति- नुकसान
यथोचित- जैसा चाहिए वैसा, समुचित
वनस्पतियाँ– पौधे
घुलकर– मिलकर
जलीय- जल सम्बन्धी
काफ़ी– बहुत
बहकर आना– पानी के साथ आ जाना
विषैले पदार्थ- ज़हर जैसे तत्व
जीव-जंतु– जानवर और अन्य प्राणी
टैंकर– तेल ढोने वाला बड़ा जहाज़
कास्टिक सोडा- एक तीव्र रासायनिक पदार्थ
अशुद्धियाँ- गंदे तत्व
ज़हरीला पारा– विषैली धातु
घातक– खतरनाक
सहारा- आधार, सहायक
नेपथ्य- परदे के पीछे
डरावनी– भय उत्पन्न करने वाली
नाक में दम करना- बहुत अधिक परेशान करना
करामात- अद्भुत काम
चौंककर- अचानक डर
अदृश्य- जो दिखाई न दे
सताना– कष्ट देना
विनाश- नाश, समाप्ति
महाकाल– मृत्यु का प्रतीक
अभिशाप– बद्दुआ, शाप
शत्रु– दुश्मन
रक्षा- बचाव
व्याख्या- इस अंश में वनदेवी आँसू पोंछते हुए सूर्यदेव से निवेदन करती हैं कि अब वे उनकी पीड़ा भी सुनें। वे बताती हैं कि प्रदूषण दैत्य तो पहले से ही उन्हें परेशान कर रहा है, परंतु कीटनाशक रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग उन्हें और अधिक क्षति पहुँचा रहा है। वे यह स्पष्ट करती हैं कि अनाजों की रक्षा के लिए सीमित और उचित मात्रा में कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है, किंतु अत्यधिक प्रयोग अनेक उपयोगी वनस्पतियों को नष्ट कर देता है और अनाज को भी विषैला बना देता है।
इसके बाद जलदेवी इस बात को आगे बढ़ाते हुए बताती हैं कि यही कीटनाशक रसायन वर्षा के जल में घुलकर नदियों और तालाबों तक पहुँच जाते हैं, जिससे जल दूषित हो जाता है और जलीय वनस्पतियों तथा जीव-जंतुओं को भारी नुकसान होता है। रश्मिदेवी आश्चर्य व्यक्त करती हैं कि क्या इतना अधिक कीटनाशक बहकर आता है। तब जलदेवी यह भी जोड़ती हैं कि अनेक कारखाने अपना दूषित तेल और विषैले रसायन सीधे नदियों में बहा देते हैं, जिसके कारण जलचर जीवों का जीवन संकट में पड़ जाता है।
सूर्यदेव यह सुनकर चिंता व्यक्त करते हैं और कहते हैं कि यह स्थिति अत्यंत खराब है। जलदेवी आगे बताती हैं कि यह समस्या तब और भी गंभीर हो जाती है, जब पेट्रोल से भरे विशाल टैंकर समुद्रों में टूट जाते हैं। वे यह भी बताती हैं कि समुद्र के किनारे कुछ स्थानों पर कास्टिक सोडे की अशुद्धियाँ बहाई जाती हैं, जिनमें जहरीला पारा होता है। इस पारे से मछलियाँ विषाक्त हो जाती हैं और उन मछलियों को खाने से मनुष्य का जीवन भी खतरे में पड़ जाता है। यह सुनकर सूर्यदेव अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं और इसे बहुत घातक स्थिति बताते हैं।
इसके पश्चात रश्मिदेवी भयभीत होकर यह कहती हैं कि अब वे इस जहरीली हो चुकी पृथ्वी का भ्रमण नहीं करना चाहतीं। किंतु सूर्यदेव उन्हें समझाते हैं कि उनका पृथ्वी पर जाना अनिवार्य है, क्योंकि वे मानव-जीवन के लिए प्रकाश और ऊर्जा का सहारा हैं।
तभी पर्दे के पीछे से प्रदूषण दैत्य की डरावनी हँसी सुनाई देती है। वह गर्व के साथ यह घोषणा करता है कि वह बहुत प्रसन्न है, क्योंकि उसने वायु, जल और वनस्पति को पूरी तरह त्रस्त कर दिया है और अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर चुका है। उसकी आवाज़ सुनकर सूर्यदेव चौंक जाते हैं और यह जानना चाहते हैं कि इस प्रकार बोलने वाला कौन है। पवनदेव चारों ओर देखते हैं, पर उन्हें कोई दिखाई नहीं देता।
तब प्रदूषण दैत्य यह बताता है कि वह अदृश्य रहकर ही सबको सताता है। रश्मिदेवी उसकी भयानक आवाज़ से भयभीत हो जाती हैं। दैत्य चीखकर यह कहता है कि उससे डरना ही पड़ेगा, क्योंकि वही मानव-विनाश का कारण बनने वाला है। जब वनदेवी उससे पूछती हैं कि वह आखिर है कौन, तब वह स्वयं को मानव का महाकाल, प्रगति का अभिशाप, औद्योगिक विकास का विष-वृक्ष और मानव का अदृश्य शत्रु बताता है। अंत में रश्मिदेवी अत्यंत भय के साथ यह स्वीकार करती हैं कि यह तो प्रदूषण दैत्य है और वे सूर्यदेव से अपनी रक्षा की प्रार्थना करती हैं।
7
दैत्य प्रदूषण : मैं तुझे क्षति नहीं पहुँचाऊँगा रश्मि, मैं तो पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों एवं अन्य जीवों का विनाश करना चाहता हूँ। मैं उन्हें घुला घुलाकर मारूँगा।
पवनदेव : देव! सुन लिया आपने, अब आप ही अपनी लाड़ली पुत्री पृथ्वी को बचाइए!
जलदेवी : (वायु के पास सिमटकर) भगवन्, मुझे भी इस दैत्य से बचाने की कृपा करें ताकि पृथ्वी का जल शुद्ध रह सके।|
वनदेवी : (जलदेवी के पास आकर) यह दैत्य मनमानी करता रहा, तो मैं प्राणियों को भोजन कैसे दे सकूँगी?
(सूर्यदेव चिंतामग्न हो जाते हैं।)
(नेपथ्य में मधुर संगीत के साथ बुद्धिदेवी का प्रवेश होता है।)
बुद्धिदेवी : भगवन् ! इस दैत्य से पृथ्वी को बचाने के लिए आपको कष्ट करने की ज़रूरत नहीं है। पृथ्वीवासियों के जीवन को सुखी बनाने वाली जल, वायु और वनस्पति देवियों की रक्षा मैं करूँगी।
जलदेवी : हे देवी, आप कौन हैं? आपकी बातों से अपार बुद्धिमत्ता झलक रही है।
बुद्धिदेवी : मैं हूँ बुद्धि और मेरे बल पर ही मानव अनादिकाल से प्रगति करता रहा है।
दैत्य प्रदूषण : क्या तुम मुझ प्रदूषण दैत्य से लोहा लोगी? मानव को मेरे चंगुल से छुड़ाओगी? असंभव ! हा… हा… हा…।
बुद्धिदेवी : निःसंदेह, जरा मानव इतिहास पर दृष्टि डालो। आज मानव मेरे ही बलबूते पर महान बना है।
दैत्य प्रदूषण : तुम्हारे कहने का मतलब?
बुद्धिदेवी : सब यही समझते थे कि जंगली जीव-जंतु मानव को पनपने नहीं देंगे। मनुष्य ठंड से मर जाएगा, गुफ़ाओं में रहने वाला मानव भला कितने दिन जीवित रह सकेगा? तुम दैत्य भले ही हो परंतु मेरे लिए तुम तिनके के समान हो।
दैत्य प्रदूषण : क्या कहा? तिनके के समान ! मैं दिखाई नहीं देता हूँ परंतु मै अदृश्य रहकर ही मनुष्य के गले में फंदा कसता जा रहा हूँ।
बुद्धिदेवी : अपने अदृश्य होने का घमंड न करो। मानव ने हमेशा अपने शत्रुओं पर विजय पाई है।
शब्दार्थ-
घुला-घुलाकर मारना- धीरे-धीरे नष्ट करना
लाड़ली पुत्री– अत्यंत प्रिय संतान
कृपा करना- दया करना
सिमटकर– पास आकर, सहमकर
शुद्ध– साफ़, निर्मल
मनमानी– अपनी इच्छा से, बिना रोक-टोक
प्राणी- जीव
चिंतामग्न- गहरी चिंता में डूबा हुआ
मधुर– मीठा, सुरीला
कष्ट- परेशानी, कठिनाई
पृथ्वीवासी– पृथ्वी पर रहने वाले लोग
सुखी- प्रसन्न, आनंदमय
अपार- अत्यधिक, जिसका पार न पाया जा सके
झलकना- दिखाई देना
अनादिकाल– आरम्भ से ही
लोहा लेना– मुकाबला करना
चंगुल- पकड़, अधिकार
निःसंदेह– बेशक, बिना शक के
दृष्टि डालना- ध्यान से देखना
बलबूते– ताक़त, जोर
भले ही– चाहे
तिनके के समान– बहुत तुच्छ
घमंड- अहंकार
विजय पाना– जीत हासिल करना
व्याख्या– इस अंश में प्रदूषण दैत्य यह स्पष्ट करता है कि वह रश्मिदेवी को कोई क्षति नहीं पहुँचाना चाहता, बल्कि उसका उद्देश्य पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों और अन्य जीवों का विनाश करना है। वह यह भी कहता है कि वह उन्हें धीरे-धीरे, भीतर ही भीतर घुलाकर मारना चाहता है। उसकी इस भयानक घोषणा को सुनकर पवनदेव सूर्यदेव से निवेदन करते हैं कि अब वे ही अपनी लाड़ली पुत्री पृथ्वी की रक्षा करें।
इसके बाद जलदेवी भयभीत होकर पवनदेव के समीप सिमट जाती हैं और सूर्यदेव से प्रार्थना करती हैं कि वे उन्हें भी इस दैत्य से बचाएँ, ताकि पृथ्वी का जल शुद्ध बना रह सके। वनदेवी भी चिंता व्यक्त करते हुए कहती हैं कि यदि यह दैत्य मनमानी करता रहा, तो वे प्राणियों को भोजन देने में असमर्थ हो जाएँगी। इन सभी की बातें सुनकर सूर्यदेव गहरे चिंतन में डूब जाते हैं और वातावरण में गंभीरता छा जाती है।
तभी पीछे से मधुर संगीत के साथ बुद्धिदेवी का प्रवेश होता है। वे सूर्यदेव से कहती हैं कि पृथ्वी को इस दैत्य से बचाने के लिए सूर्यदेव को स्वयं कष्ट उठाने की आवश्यकता नहीं है। वे यह विश्वास दिलाती हैं कि पृथ्वीवासियों के जीवन को सुखी बनाने वाली जल, वायु और वनस्पति देवियों की रक्षा वे स्वयं करेंगी। उनकी बातों से प्रभावित होकर जलदेवी यह जानना चाहती हैं कि वे कौन हैं, क्योंकि उनके शब्दों से गहरी बुद्धिमत्ता झलक रही है।
इस पर बुद्धिदेवी अपना परिचय देती हैं और कहती हैं कि वे बुद्धि का स्वरूप हैं और मानव अनादिकाल से उन्हीं के बल पर प्रगति करता आया है। तभी प्रदूषण दैत्य हँसी उड़ाते हुए यह प्रश्न करता है कि क्या वे उससे युद्ध करेंगी और मानव को उसके चंगुल से छुड़ा लेंगी। वह इसे असंभव बताते हुए हँसता है।
बुद्धिदेवी दृढ़ता से उत्तर देती हैं कि निःसंदेह वे ऐसा करेंगी और प्रदूषण दैत्य से मानव इतिहास पर दृष्टि डालने को कहती हैं। वे यह स्पष्ट करती हैं कि आज मानव उन्हीं की शक्ति के कारण महान बना है। दैत्य जब उनके कथन का अर्थ पूछता है, तब बुद्धिदेवी उदाहरण देते हुए कहती हैं कि एक समय यह माना जाता था कि जंगली जीव-जंतु मानव को पनपने नहीं देंगे, ठंड से मानव मर जाएगा और गुफाओं में रहने वाला मनुष्य अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाएगा। किंतु मानव ने अपनी बुद्धि के बल पर इन सभी संकटों पर विजय प्राप्त की।
अंत में बुद्धिदेवी यह भी कहती हैं कि प्रदूषण दैत्य चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उनके लिए वह तिनके के समान है। यह सुनकर दैत्य क्रोधित हो जाता है और यह कहता है कि वह अदृश्य रहकर ही मनुष्य के गले में फंदा कसता जा रहा है। इसके उत्तर में बुद्धिदेवी उसे चेतावनी देती हैं कि वह अपने अदृश्य होने का घमंड न करे, क्योंकि मानव ने सदैव अपने शत्रुओं पर बुद्धि के बल से विजय प्राप्त की है।
8
दैत्य प्रदूषण : ठीक है ! पर मेरे अनेक सहायक हैं। एक नवीनतम सहायक है, रेडियोधर्मिता।
रश्मिदेवी : यह क्या बला है?
वनदेवी : प्रभो, मैं तो आपको बताना ही भूल गई थी। जब से मानव ने यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का परमाणु-परीक्षण किया है, तब से मैं, जल और वायु इस विनाशकारी विकिरण से दूषित हो गए हैं।
रश्मिदेवी : यह किस तरह हानिकारक है?
दैत्य प्रदूषण : मैं बताता हूँ! रेडियोधर्मिता से पीड़ित मानव स्वयं तो घुल-घुलकर मरेगा ही, वह एक ऐसी पीढ़ी को भी जन्म देगा जिसे विकृतियों के कारण मानव के रूप में पहचानना भी संभव नहीं होगा। शर्त यह है कि वह बस परमाणु-परीक्षण करता रहे। उसके अलावा मेरा एक और साथी ध्वनि प्रदूषण तो है ही न !
रश्मिदेवी : ध्वनि प्रदूषण?
दैत्य प्रदूषण : हाँ, बड़े-बड़े शहरों में विशालकाय हवाई जहाजों, वाहनों, लाउडस्पीकरों आदि अन्य स्रोतों से इतनी अधिक ध्वनि उत्पन्न होती है कि मुझे विश्वास है कि वह लाखों लोगों को बहरा बना देगी। सुना, मेरा प्रताप ! क्यों बुद्धि, क्या तुम अब भी मनुष्य को मेरे चंगुल से छुड़ाने का साहस करोगी?
बुद्धिदेवी : अवश्य! मुझे तुम्हारी चुनौती स्वीकार है।
दैत्य प्रदूषण : ठीक है, अभी तो मैं जाता हूँ अपना विनाश कार्य करने।
बुद्धिदेवी : आप लोग चिंता न करें, मुझ पर भरोसा रखें। आदि मानव विनाशकारी अग्नि से भयभीत हो गया था। फिर उसने इसी अग्नि को अपने अधीन कर लिया और आज अग्नि मानव के लिए बड़ी देन है। मैं इस प्रदूषण दैत्य को ही जड़ से समाप्त कर दूँगी। संसार से इसका उन्मूलन करना परमावश्यक है।
सूर्यदेव : धन्य हो बुद्धिदेवी! तुम धन्य हो !
बुद्धिदेवी : मुझे आशीर्वाद दीजिए, शक्ति दीजिए कि मैं लोग-कल्याण के इस कार्य को करने में सफल होऊँ।
सूर्यदेव : तथास्तु।
(सभी के चेहरे पर प्रसन्नता दिखलाई देती है। परदा गिरता है।)
शब्दार्थ-
सहायक– मदद करने वाला
नवीनतम– सबसे नया
रेडियोधर्मिता– रेडियोधर्मी तत्वों से निकलने वाली हानिकारक शक्ति
बला- मुसीबत
रेडियोधर्मी तत्व– ऐसे तत्व जिनसे हानिकारक विकिरण निकलता है
परमाणु-परीक्षण– परमाणु बम या परमाणु शक्ति की जाँच
विकिरण– किरणों के रूप में फैलने वाली शक्ति
हानिकारक– नुकसान पहुँचाने वाला
पीड़ित- प्रभावित, कष्ट झेलने वाला
पीढ़ी- वंश, आने वाली संतान
विकृति- विकार, खराबी (विकार के बाद प्राप्त रूप)
शर्त- बाज़ी
ध्वनि प्रदूषण– अत्यधिक और कर्कश आवाज़ से होने वाला प्रदूषण
बहरा- सुनने की शक्ति खो देने वाला
प्रताप- प्रभाव, ताकत
साहस– हिम्मत
चुनौती- ललकार, मुकाबले की बात
विनाश कार्य– नष्ट करने का काम
भरोसा– विश्वास
आदि मानव– प्रारंभिक मानव
भयभीत– डरा हुआ
अधीन करना– अपने वश में करना
देन- उपहार, लाभ
जड़ से समाप्त करना– पूरी तरह खत्म करना
उन्मूलन– उखाड़ फेंकना, जड़ से ख़त्म कर देना
परमावश्यक– अत्यंत आवश्यक
धन्य- प्रशंसनीय, गौरवान्वित
आशीर्वाद- शुभकामना
लोग-कल्याण- समाज का भला
तथास्तु- ऐसा ही हो
व्याख्या– प्रस्तुत अंश में प्रदूषण दैत्य यह स्वीकार करता है कि उसके अनेक सहायक हैं और वह यह भी बताता है कि उसका एक नया और अत्यंत खतरनाक सहायक रेडियोधर्मिता है। उसकी यह बात सुनकर रश्मिदेवी आश्चर्य व्यक्त करती हैं और यह जानना चाहती हैं कि यह रेडियोधर्मिता आखिर क्या है। तब वनदेवी सूर्यदेव से कहती हैं कि वे यह बताना भूल गई थीं कि जब से मानव ने यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का उपयोग कर परमाणु परीक्षण आरंभ किया है, तब से वे स्वयं, जल और वायु इस विनाशकारी तत्त्वों के फैलने से दूषित हो गए हैं।
रश्मिदेवी यह प्रश्न करती हैं कि यह रेडियोधर्मिता किस प्रकार हानिकारक है। इस पर प्रदूषण दैत्य स्वयं उत्तर देता है और घमंड के साथ यह कहता है कि रेडियोधर्मिता से पीड़ित मानव धीरे-धीरे घुलकर मरता है और साथ ही वह ऐसी संतानों को जन्म देता है, जिनमें विकृतियाँ होती हैं और जिन्हें पूर्ण मानव के रूप में पहचानना भी कठिन हो जाता है। वह यह भी स्पष्ट करता है कि यदि मानव निरंतर परमाणु परीक्षण करता रहा, तो यह विनाश और अधिक बढ़ता जाएगा। इसके अतिरिक्त वह यह भी बताता है कि उसका एक और सहायक ध्वनि प्रदूषण है।
जब रश्मिदेवी ध्वनि प्रदूषण के विषय में पूछती हैं, तब प्रदूषण दैत्य यह बताता है कि बड़े-बड़े शहरों में विशालकाय हवाई जहाजों, वाहनों, लाउडस्पीकरों और अन्य साधनों से इतनी अधिक ध्वनि उत्पन्न होती है कि लाखों लोग बहरे हो सकते हैं। वह अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए बुद्धिदेवी को चुनौती देता है और पूछता है कि क्या वे अब भी मानव को उसके चंगुल से छुड़ाने का साहस करेंगी।
इसके उत्तर में बुद्धिदेवी दृढ़ता के साथ कहती हैं कि वे उसकी चुनौती स्वीकार करती हैं। तब प्रदूषण दैत्य यह कहकर वहाँ से चला जाता है कि वह अभी अपने विनाशकारी कार्य में लगने जा रहा है। उसके जाने के बाद बुद्धिदेवी सभी को विश्वास दिलाती हैं कि उन्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है और उन्हें उन पर विश्वास रखना चाहिए। वे उदाहरण देते हुए बताती हैं कि आदिमानव कभी अग्नि से भयभीत था, किंतु बाद में उसने उसी अग्नि को अपने वश में कर लिया और आज अग्नि मानव के लिए एक महान वरदान बन चुकी है। इसी प्रकार वे यह विश्वास दिलाती हैं कि वे प्रदूषण दैत्य को जड़ से समाप्त कर देंगी और संसार से इसको नष्ट करना अत्यंत आवश्यक है।
बुद्धिदेवी की इस दृढ़ और विश्वास भरी वाणी से सूर्यदेव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रशंसा करते हुए उन्हें धन्य कहते हैं। इसके बाद बुद्धिदेवी सूर्यदेव से आशीर्वाद और शक्ति की कामना करती हैं, ताकि वे लोक-कल्याण के इस महान कार्य को सफलतापूर्वक पूरा कर सकें। सूर्यदेव उन्हें ‘तथास्तु’ कहकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अंत में सभी के चेहरों पर प्रसन्नता दिखाई देती है और नाटक का परदा गिर जाता है।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘प्रकृति का अभिशाप’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। इस पाठ में लेखक श्रीपाद विष्णु कानाडे ने पर्यावरण प्रदूषण की गंभीर समस्या को सरल और रोचक संवादों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।