पाँच मरजीवे पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 6 “Paanch Marjive” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
पाँच मरजीवे समाधि पर सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 6 Paanch Marjive Summary with detailed explanation of the lesson “Paanch Marjive” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 6 पाँच मरजीवे पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 पाँच मरजीवे पाठ के बारे में जानते हैं।
Paanch Marjive (पाँच मरजीवे)
कवि योगेन्द्र बख्शी जी द्वारा रचित कविता ‘पाँच मरजीवे’ सिख इतिहास की उस महान और प्रेरणादायक घटना पर आधारित है जिसने भारतीय समाज में वीरता, त्याग और आत्मसम्मान की नई रोशनी जगाई। वैशाखी के पावन अवसर पर एक विशाल सभा में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने लोगों से धर्म और न्याय की रक्षा हेतु बलिदान की माँग की। यह बलिदान साहस, स्वाभिमान और राष्ट्र चेतना की पुकार थी। इस पुकार ने पाँच वीर सिखों को जन्म दिया जिन्हें आगे चलकर ‘पंच प्यारे’ और ‘खालसा पंथ’ की नींव कहा गया। यह कविता उसी घटना को मार्मिक, प्रेरक और भावपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती है, जो मानव इतिहास में बलिदान और समर्पण का अनुपम प्रतीक बनी।
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पाँच मरजीवे पाठ सार Paanch Marjive Summary
कवि योगेन्द्र बख्शी जी द्वारा लिखित कविता ‘पाँच मरजीवे’ में उस ऐतिहासिक घटना का वर्णन किया गया है जिसने भारतीय इतिहास में साहस, त्याग और धर्म-रक्षा की नई चेतना उत्पन्न की। यह वह समय था जब भारत मुगल शासक औरंगज़ेब की कट्टर धार्मिक नीतियों, अत्याचारों और अन्याय से पीड़ित था। लोग भयभीत, असहाय और निराश थे। पूरे देश में जैसे साहस और आत्मसम्मान सो गया था और जनता अपने धर्म और अस्तित्व को बचाने की ताकत खो चुकी थी। तभी आनंदपुर साहिब की भूमि पर एक नई सुबह जन्म लेती है जहाँ गुरु गोबिन्द सिंह जी अपने तेजस्वी व्यक्तित्व, चिंतन और दृढ़ संकल्प के साथ खड़े होते हैं। वह लोगों को यह संदेश देते हैं कि जीवन संघर्ष का दूसरा नाम है और अन्याय के सामने चुप रहना कायरता है। उनके हाथ में चमकती तलवार मानो असहायता और भय को मिटाने की घोषणा कर रही थी।
यह घटना सन् 1699 की वैशाखी के पावन पर्व पर घटित हुई थी। दूर-दूर से भक्त, शिष्य और श्रद्धालु आनंदपुर साहिब पहुँचे थे। वातावरण श्रद्धा, प्रतीक्षा और उत्सुकता से भरा हुआ था। सब गुरु गोबिन्द सिंह जी के संदेश को सुनने के लिए अधीर थे। जैसे ही गुरुजी सभा में आए, उन्होंने लोगों के हृदय में कम्पन पैदा कर देने वाली घोषणा की, धर्म की रक्षा और अन्याय से मुक्ति के लिए उन्हें एक बलिदान चाहिए। उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो धर्म के लिए अपना शीश चढ़ा सके। इस कठोर माँग ने सभा में सन्नाटा पैदा कर दिया। लोग असमंजस, भय और आश्चर्य से भर उठे। किसी में भी तुरंत आगे बढ़ने का साहस नहीं था।
कुछ क्षणों के मौन के बाद लाहौर का खत्री दयाराम आगे आया। उसने विनम्रता और साहस के साथ कहा कि वह अपना जीवन धर्म को अर्पित करने के लिए तैयार है। गुरु गोबिन्द सिंह जी उसके इस त्याग भावना से अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे अपने साथ अंदर ले गए। पीछे से तलवार चलने की ध्वनि सुनाई दी और पूरे वातावरण में डर और रहस्य फैल गया। थोड़ी देर बाद गुरुजी फिर से रक्तरंजित तलवार लेकर बाहर आए और उन्होंने फिर पुकार लगाई कि उन्हें एक और मरजीवा चाहिए। अब सभा में और भी भारी मौन फैल गया था। लोगों के चेहरे भयभीत थे और शरीर कांप रहे थे, तभी हस्तिनापुर का जाट धर्मराय आगे आया और उसने भी अपने प्राण अर्पित कर दिए।
गुरु गोबिन्द सिंह जी एक-एक करके पाँच वीरों की तलाश कर रहे थे। हर बार रक्त से भीगी तलवार उनका संकल्प और संदेश और भी प्रभावशाली बना देती थी। धीरे-धीरे कुल पाँच वीर ‘दयाराम, धर्मराय, मोहकम चन्द, साहब चन्द और हिम्मतराय’ आगे आए और उन्होंने अपने प्राण गुरु और धर्म के लिए समर्पित कर दिए। यह घटना साधारण बलिदान नहीं थी, बल्कि एक नए समाज के निर्माण की नींव थी जिसमें साहस, आत्मसम्मान, मानवता और धार्मिक स्वतंत्रता सर्वोच्च थी। बाद में गुरुजी उन पाँचों बलिदानियों को सुरक्षित अवस्था में वापस लेकर आए और उन्हें पंच प्यारे का सम्मान दिया। इन्हीं पाँचों से खालसा पंथ की स्थापना हुई, जिसने न केवल मुगल अत्याचारों का डटकर सामना किया बल्कि आने वाली पीढ़ियों को स्वाभिमान, वीरता और न्याय का मार्ग दिखाया।
यह कविता केवल बलिदान की घटना का वर्णन नहीं करती बल्कि वह संदेश भी देती है कि जब समाज निराश, भयभीत और दबा हुआ हो तब कुछ निडर और समर्पित लोग आगे आते हैं और उनका त्याग पूरे समाज में नई चेतना भर देता है। गुरु गोबिन्द सिंह जी ने यह दिखाया कि धर्म केवल पूजा या परंपरा नहीं, बल्कि सत्य और न्याय के लिए लड़ने का साहस भी है। ‘पाँच मरजीवे’ इसलिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि उन मूल्यों की पुकार है जो मानवता को मजबूत, जिंदा और जागृत रखते हैं।
पाँच मरजीवे पाठ व्याख्या Paanch Marjive Explanation

1
एक सुबह आनंदपुर साहिब में जागी,
कायरता जब सप्तसिन्धु की धरती से भागी।
धर्म-अधर्म के संघर्ष की रात।
एक खालस महामानव ।
युग दृष्टा-युग स्रष्टा
साहस का ज्वलन्त सूर्य ले हाथ
आह्वान कर रहा-
जागो वीरो जागो
जूझना ही जीवन है – जीवन से मत भागो!
शब्दार्थ-
कायरता- डरपोकपन, भय
सप्तसिन्धु- सिन्धु, रावी, सतलुज, झेलम, गंगा, यमुना और सरस्वती – इन सात नदियों के यहाँ बहने के कारण भारत को सप्तसिन्धु वाला देश कहा जाता है।
धर्म- न्याय, सदाचार, सत्य का मार्ग
अधर्म- अन्याय, अत्याचार, गलत कार्य
संघर्ष- टकराव, लड़ाई
खालस- खरा, शुद्ध, सच्चा
महामानव- महान मनुष्य
युग दृष्टा- युग को देखने वाला
युग स्रष्टा- युग निर्माता
साहस- वीरता, निर्भीकता
ज्वलन्त- जलता हुआ
जूझना- संघर्ष करना, लड़ना
आह्वान- बुलावा
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि उस ऐतिहासिक क्षण का वर्णन करते हैं, जब गुरु गोबिन्द सिंह ने आनंदपुर साहिब में अत्याचारों के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध की शुरुआत की। यह वह समय था जब लोग मुगल साम्राज्य और औरंगज़ेब के जुल्मों से डरे और दबे हुए थे।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि ने उस ऐतिहासिक सुबह का वर्णन किया है जब आनंदपुर साहिब की भूमि पर एक नई चेतना ने जन्म लिया। जैसे ही सूर्य निकला, वैसे ही भय और कमजोरी पंजाब की पवित्र भूमि से मानो भाग गए। पिछली रात धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष की रात थी, जो अत्याचार और अन्याय के खिलाफ लड़ाई का प्रतीक थी।
उस समय एक महान पुरुष गुरु गोबिन्द सिंह जी उदित हुए। कवि उन्हें पवित्र महामानव और युग का निर्माण करने वाला कहता है, क्योंकि वह न केवल उस समय की परिस्थिति को समझ रहे थे, बल्कि आने वाले युग की संरचना भी कर रहे थे। उनके हाथ में उठी हुई तलवार साहस और शक्ति का चमकता हुआ कीर्ति-चिह्न थी।
गुरु गोबिन्द सिंह जी अपने अनुयायियों को पुकारते हुए कहते हैं कि वीरों, जागो। उनका संदेश है कि जीवन संघर्ष है, इससे भागना कायरता है। सच्चा जीवन वही है जो अन्याय का सामना करे, धर्म की रक्षा करे और साहस के साथ जीना सिखाए।
इस प्रकार, इन पंक्तियों के माध्यम से कवि यह संदेश देता है कि गुरु गोबिन्द सिंह जी ने लोगों को आत्मबल, त्याग और निडरता का मार्ग दिखाया और उन्हें धर्म की रक्षा के लिए प्रेरित किया।
2
सन् सोलह सौ निन्यानवे की
वैशाखी की पावन बेला है
दशम नानक के द्वारे – आनंदपुर में
दूर दूर से उमड़े भक्तों-शिष्यों का
विशाल मेला है।
शब्दार्थ-
सन्- साल, वर्ष
सोलह सौ निन्यानवे– 1699
वैशाखी- पंजाब का प्रमुख पर्व, वैशाख मास में मनाया जाने वाला त्योहार
पावन- पवित्र, शुभ
बेला- समय, घड़ी
दशम नानक- गुरु गोबिंद सिंह जी (दसवें सिख गुरु)
द्वारे- द्वार पर, दरबार में
उमड़े- एकत्र हुए, बड़ी संख्या में आए
भक्तों- श्रद्धालु, भगवान या गुरु में विश्वास रखने वाले
शिष्यों- नुयायियों, भक्त जन
विशाल- बहुत बड़ा
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि उस ऐतिहासिक क्षण का चित्रण करते हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। यह घटना वैसाखी के शुभ अवसर पर घटित हुई थी, जब देश के विभिन्न भागों से लोग आनंदपुर साहिब में एकत्र हुए थे। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं था, बल्कि इतिहास का महत्वपूर्ण मोड़ था।
व्याख्या- कवि बताते हैं कि यह सन् 1699 की वैशाखी का अत्यंत पवित्र और ऐतिहासिक क्षण था। उस शुभ दिन का माहौल बहुत भावपूर्ण था। आनंदपुर साहिब में दसवें गुरु, गुरु गोबिन्द सिंह जी के द्वार पर दूर-दूर से आये भक्तों, अनुयायियों और शिष्यों का विशाल समूह एकत्र हुआ था। यह भीड़ केवल त्योहार मनाने नहीं आई थी, बल्कि गुरु की वाणी सुनने, धर्म की रक्षा के संदेश को समझने और अपने जीवन को नई दिशा देने के उद्देश्य से वहाँ उपस्थित थी।
लोग गुरुजी के दर्शन पाने और उनके मार्गदर्शन को सुनने के लिए आतुर थे। आनंदपुर का वह दृश्य एक विशाल मेले की तरह था। जहाँ लोग एक ही उद्देश्य धर्म की रक्षा और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रतिज्ञा के लिए एकत्र हुए थे।
3
तेजपुंज गुरु गोबिन्द के हाथों में
है नंगी तलवार लहराती हवा में बारम्बार
“अकाल पुरुष का है फरमान
अभी तुरन्त चाहिये एक बलिदान
अन्याय से मुक्ति दिलाने को
धर्म बचाने, शीश कटाने को
मरजीवा क्या कोई है तैयार?
मुझे चाहिए शीश एक उपहार!
जिसका अद्भुत त्याग देश की
मरणासन्न चेतना में कर दे नवरक्त संचार।”
शब्दार्थ-
तेजपुंज- अत्यंत तेजस्वी
नंगी तलवार- बिना म्यान की तलवार, खुली हुई तलवार
बारम्बार- बार-बार, लगातार
अकाल पुरुष- ईश्वर, परमात्मा
फरमान– आज्ञा
बलिदान- त्याग, अपना जीवन अर्पित करना
अन्याय- अनीति, गलत व्यवहार
मुक्ति- छुटकारा, स्वतंत्रता
शीश कटाने– सिर अर्पित करने, बलिदान देने के लिए
मरजीवा- वह जो मरकर भी जीवित माना जाए; मृत्यु को स्वीकार करके बलिदान देने वाल
उपहार– भेंट, श्रद्धांजलि
अद्भुत- आश्चर्यजनक, अनोखा
त्याग- बलिदान, परोपकार के लिए कुछ छोड़ देना
मरणासन्न- मरने के करीब
चेतना- जागरूकता, जीवित भावना
नवरक्त संचार– नए खून का संचार, नई ऊर्जा या शक्ति का प्रसार
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि उस समय को बताते हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की घोषणा करने से पहले सभा के बीच एक साहसिक और चौंकाने वाली मांग रखी। हजारों भक्तों के सामने उन्होंने बलिदान की पुकार की और वीरता तथा धर्म-रक्षा की भावना को जागृत किया।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि बताते हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह जी अत्यंत तेजस्वी स्वरूप में सभा के बीच खड़े थे। उनके हाथ में चमकती हुई तलवार थी, जिसे वे बार-बार हवा में लहराकर उपस्थित लोगों के हृदय में साहस की अग्नि प्रज्वलित कर रहे थे। उनका व्यक्तित्व दृढ़ निश्चय, पराक्रम और आत्मबल से चमक रहा था।
गुरुजी ने सभा को संबोधित करते हुए घोषणा की कि यह केवल उनकी इच्छा नहीं, बल्कि अकाल पुरुष यानी परमात्मा का आदेश है कि धर्म की रक्षा और अन्याय के अंत के लिए आज ही एक बलिदान आवश्यक है। उन्होंने पूछा कि क्या कोई ऐसा मरजीवा है जो मरकर भी अमर रहने वाला हो, जो धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अपना सिर अर्पित करने को तैयार हो।
गुरुजी ने स्पष्ट कहा कि उन्हें एक सिर उपहार स्वरूप चाहिए, ऐसा सिर जो केवल शरीर का अंग न होकर साहस, त्याग और निष्ठा का प्रतीक बने। उनका विश्वास था कि इस अद्भुत बलिदान से देश की मरणासन्न चेतना में फिर से ऊर्जा, साहस और नई क्रांति की भावना जाग उठेगी।
4
सन्नाटा छा गया मौन हो रही सभा
सब भयभीत नहीं कोई हिला
फिर लाहौर निवासी खत्री दयाराम आगे बढ़ा
“कृपाकर सौभाग्य मुझे दीजिए
धर्म-रक्षा के लिए – भेंट है शीश गुरुवर !
प्राण मेरे लीजिए।”
शब्दार्थ-
सन्नाटा- चुप्पी
मौन– चुप्पी, बिना बोले रहना
सभा- लोगों का समूह, बैठक
भयभीत- डर से भरा हुआ
निवासी– रहने वाला, वासी
कृपा कर- दया करके, मेहरबानी करके
सौभाग्य- बड़ा सम्मान, शुभ अवसर
धर्म-रक्षा– धर्म की सुरक्षा, धार्मिक कर्तव्य की रक्षा
भेंट- उपहार, अर्पण
शीश– सिर
गुरुवर- गुरु श्रेष्ठ
प्राण- जीवन, जान
प्रसंग- प्रस्तुत कविता में गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा अपने अनुयायियों की निष्ठा, साहस और बलिदान की परीक्षा का वर्णन किया गया है। जब गुरु जी ने सभा में उपस्थित लोगों से धर्म और सत्य की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित करने का आह्वान किया, तब वहाँ उपस्थित सभी लोग भयभीत होकर मौन हो गए। ऐसे वातावरण में एक साहसी सिख आगे आते हैं और धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान देने के लिए समर्पित हो जाते हैं।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि उस गंभीर और भावनात्मक क्षण का वर्णन करते हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सभा में उपस्थित लोगों से धैर्य और निष्ठा की अंतिम परीक्षा के रूप में अपने प्राणों का बलिदान माँगा। गुरु जी के इस आदेश को सुनकर पूरी सभा में गहरा सन्नाटा फैल जाता है। लोग भय और आशंका के कारण अपनी जगह स्थिर बैठे रहते हैं, कोई भी आगे आने की हिम्मत नहीं करता।
ऐसे मौन और भयभीत वातावरण में लाहौर निवासी खत्री दयाराम साहस और श्रद्धा के साथ आगे बढ़ते हैं। वह विनम्रता से गुरु जी से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें यह सौभाग्य प्रदान किया जाए कि वह धर्म की रक्षा हेतु अपना शीश अर्पित कर सकें। उनके शब्दों और भावों में पूर्ण समर्पण, साहस और धर्मनिष्ठा झलकती है।
5
खिल उठे दशमेश उसकी बांह थाम
ले गये भीतर, बन गया काम
उभरा स्वर शीश कटने का और फिर गहरा विराम !
भयाकुल चकित चेहरे सभा के
रह गये दिल थाम !
शब्दार्थ-
खिल उठे- प्रसन्न हो उठे, खुशी से भर गए
दशमेश– सिक्खों के दसवें गुरु अर्थात् श्री गुरु गोबिन्द सिंह
बाँह थाम- हाथ पकड़कर
उभरा स्वर– आवाज़ सुनाई दी
विराम- रुक जाना, ठहराव
भयाकुल– डर और चिंता से भरा हुआ
चकित- हैरान
दिल थाम- डर और चिंता से चुप रह जाना, सांस रोक लेना
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में उस समय के बारे में बताया गया है जब एक लाहौर निवासी दयाराम बलिदान हेतु सबसे पहले आगे आते हैं। ये पंक्तियाँ उनके बलिदान के क्षण और सभा में उत्पन्न वातावरण का वर्णन करती हैं।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि उस महत्वपूर्ण क्षण को दर्शाते हैं जब दयाराम के आगे आने पर गुरु गोबिन्द सिंह जी का चेहरा प्रसन्नता और गर्व से खिल उठता है। वह दयाराम की बाँह थामकर उन्हें अपने साथ पर्दे के भीतर ले जाते हैं।
कुछ ही क्षण बाद पर्दे के भीतर से तलवार चलने की आवाज़ और फिर एक लंबा मौन सुनाई देता है। इस ध्वनि ने सभा में बैठे लोगों को हिला दिया। वहाँ उपस्थित सभी लोगों के चेहरे भय, आश्चर्य और अनिश्चितता से भर गए। लोग मन ही मन आशंकित हो उठे और स्तब्ध होकर उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगे कि आगे क्या होगा।
6
क्तरंजित फिर लिये तलवार
आ गये गुरुवर पुकारे बारबार
एक मरजीवा अपेक्षित और है
बढ़े आगे कौन है तैयार !
शब्दार्थ-
रक्तरंजित- रक्त से सनी हुई
अपेक्षित- जिसकी ज़रूरत या आशा हो
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियों में गुरु गोबिन्द सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना के समय लिए गए ऐतिहासिक बलिदानों का वर्णन है। पहले मरजीवा दयाराम के आगे आने और उनके अंदर ले जाए जाने के बाद अब गुरु जी फिर से सभा में उपस्थित लोगों की परीक्षा लेते हैं। ये पंक्तियाँ उसी क्षण को प्रकट करती हैं।
व्याख्या- प्रस्तुत पंक्तियों में कवि बताते हैं कि दयाराम को पर्दे के अंदर ले जाने के बाद गुरु गोबिन्द सिंह जी पुनः सभा के सामने प्रकट हुए। उनके हाथ में अब भी खून से सनी तलवार थी, जो अभी-अभी हुए बलिदान का प्रतीक बन चुकी थी। यह दृश्य उपस्थित जनसमूह के लिए अत्यंत गंभीर था।
गुरु जी ने ऊँचे स्वर में दोबारा पुकार लगाई, उन्हें अभी एक और मरजीवा चाहिए। यह पुकार केवल बलिदान की मांग नहीं थी, बल्कि साहस, निष्ठा, धर्मपरायणता और आत्मबलिदान की परम परीक्षा थी। गुरु जी यह देखना चाहते थे कि वहाँ उपस्थित भक्तों में से कौन इतनी कठिन परिस्थिति में निडर होकर आगे बढ़ सकता है।
उनकी आवाज़ सभा में गूँज रही थी, और लोगों के हृदय भय, संशय और श्रद्धा के भावों से भर उठे थे। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिक गई थीं कि अगला साहसी कौन होगा जो धर्म की रक्षा और मानवता के उद्देश्य के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा।
7
प्राण के लाले पड़े हैं।
सभी के मन स्तब्ध से मानो जड़े हैं।
किन्तु फिर धर्मराय बलिदान-व्रत-धारी
जाट हस्तिनापुर का खड़ा करबद्ध
गुरुचरण बलिहारी !
हर्षित गुरु ले गये भीतर उसे भी-
लीला विस्मयकारी।
शब्दार्थ-
प्राण के लाले पड़े हैं- जीवन संकट में पड़ गया है, जान पर बन आई है
स्तब्ध- चकित, हैरान, शब्दहीन
मानो- जैसे
जड़े हैं- स्थिर, हिल न पाना
किन्तु- लेकिन, परंतु
बलिदान-व्रत-धारी- बलिदान देने का संकल्प रखने वाला
करबद्ध- हाथ जोड़े गुरुचरण बलिहारी– गुरुओं के चरणों पर स्वयं को समर्पित करना, गुरु की महिमा स्वीकार करना
हर्षित- प्रसन्न
लीला- दिव्य कार्य, चमत्कार
विस्मयकारी- आश्चर्यजनक
प्रसंग- यह पंक्तियाँ उस ऐतिहासिक क्षण से जुड़ी हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी खालसा पंथ की स्थापना के लिए वीरों का चयन कर रहे थे। पहले मरजीवा दयाराम के अंदर ले जाए जाने के बाद गुरु जी ने एक और बलिदानी की पुकार की। अब सभा फिर से भय, उत्सुकता और मौन में डूबी है। इसी स्थिति का वर्णन इन पंक्तियों में मिलता है।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि बताते हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह जी की दूसरी पुकार सुनकर सभा में उपस्थित लोगों के हृदयों में दहशत फैल गई। ऐसा लगा जैसे सबके प्राण किसी अदृश्य खतरे में पड़ गए हों। उपस्थित लोगों के चेहरे भय से कठोर हो गए थे और उनकी देह मानो स्थिर हो गई थी। कोई आगे बढ़ने का साहस नहीं जुटा पा रहा था।
तभी सभा की स्थिरता को भेदते हुए हस्तिनापुर का जाट धर्मराय आगे आया। उसके चेहरे पर भय नहीं, बल्कि संकल्प और श्रद्धा थी। वह हाथ जोड़कर गुरु के चरणों में प्रणाम करते हुए बोला कि वह धर्म की रक्षा और गुरु के आदेश के लिए अपना जीवन समर्पित करने को तैयार है। उसके इस दृढ़ संकल्प को देखकर गुरु गोबिन्द सिंह जी अति प्रसन्न हुए। वह धर्मराय को भी उसी प्रकार अंदर ले जाते हैं। उपस्थित जनसमूह आश्चर्यचकित हो उठता है। सब कुछ मौन, अद्भुत और चमत्कार जैसा प्रतीत होता है।
8
टप टप टपक रहे रक्त बिन्दु
गहरी लाल हुई चम चम तलवार-
माँग रही बलि बारम्बार
गुरुवर की लीला अपरम्पार ।
शब्दार्थ-
टप टप धीरे-धीरे गिरने की आवाज
टपक रहे- गिर रहे, बह रहे
रक्त बिन्दु- खून की बूंदें
चम-चम- चमकना
बलि- बलिदान
बारम्बार- बार-बार, फिर-फिर
अपरम्पार- असीम, अपार, जिसका पार न पाया जा सके
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ उस क्षण का वर्णन करती हैं जब दयाराम और धर्मराय के भीतर ले जाने के बाद गुरु गोबिन्द सिंह जी पुनः सभा के सामने खून से सनी तलवार लेकर लौटते हैं। लोग आशंका, डर और रहस्य से भरे वातावरण में बैठे थे और गुरु जी बार-बार और बलिदान की पुकार कर रहे थे। इस परिस्थिति में सभा का माहौल भय और विस्मय से भरा हुआ था।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि उस दृश्य का चित्रण करते हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी की तलवार से रक्त की बूंदें निरंतर टपक रही थीं। यह खून उस महान बलिदान और त्याग का प्रतीक बन चुका था। तलवार अब साधारण अस्त्र नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध युद्ध का लाल-लाल तेजस्वी प्रतीक बन गई थी। ऐसा प्रतीत होता था मानो तलवार स्वयं और बलिदानों की पुकार कर रही हो, जैसे उसे अभी और वीरों के त्याग की आवश्यकता हो।
कवि अंत में कहते हैं कि गुरु जी की यह लीला साधारण नहीं थी। यह गहन, रहस्यमय और महान उद्देश्य से भरी हुई थी। उनके हर कार्य के पीछे ऐसी दूरदृष्टि और ऐसी भावना थी जिसे सामान्य मनुष्य समझ नहीं सकता था। इस पूरी घटना के माध्यम से गुरु गोबिन्द सिंह जी समाज को त्याग, दृढ़ता, साहस और धर्म के लिए जीने-मरने की शिक्षा दे रहे थे।
9
बलिदानों के क्रम में एक एक कर शीश कटाने
बढ़ा आ रहा द्वारिका का मोहकम चन्द धोबी
बिदर का साहब चन्द नाई, पुरी का हिम्मतराय कहार
पाँच ये बलिदान अद्भुत चमत्कार !
शब्दार्थ-
बलिदानों- बलिदान, त्याग करने वाले लोगों के कार्य
क्रम में– एक के बाद एक
शीश- सिर
अद्भुत- आश्चर्यजनक
प्रसंग- यह पंक्तियाँ उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ी हैं जब गुरु गोबिन्द सिंह जी ने वैसाखी के पावन अवसर पर अपने अनुयायियों से बलिदान की माँग की। पहले दो बलिदानियों, दयाराम और धर्मराय के आगे आने के बाद गुरु जी ने फिर पुकार लगाई। अब पूरा वातावरण भय से भरा हुआ था। इसी दौरान अन्य वीरों ने भी अपने जीवन को धर्म और गुरु पर न्योछावर करने की ठानी।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि बताते हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह जी की पुकार सुनकर बलिदान देने वालों का क्रम रुकने का नाम नहीं ले रहा था। एक-एक करके लोग आगे बढ़ते जा रहे थे, जैसे उनके भीतर साहस और श्रद्धा की ज्वाला जाग उठी हो। सबसे पहले द्वारका के रहने वाले मोहकम चन्द धोबी आगे आए और गुरु के चरणों में अपना जीवन समर्पित करने की इच्छा जताई। फिर बिदर से आए साहब चन्द नाई ने दृढ़ मन से अपना सिर अर्पित करने का संकल्प लिया। अंत में पुरी के रहने वाले हिम्मतराय कहार आगे आए और पूर्ण समर्पण की भावना से गुरु के सामने खड़े हो गए।
इन पाँचों बलिदानों को कवि ने अद्भुत और चमत्कारिक बताया है, क्योंकि सभा में उपस्थित लोगों को लगता था कि सचमुच इनका शीश काट दिया गया है। परन्तु यह बलिदान केवल शारीरिक मृत्यु का प्रतीक नहीं था, यह था अहंकार की मृत्यु, धर्म के लिए समर्पण और खालसा पंथ की स्थापना की दिशा में एक महान परीक्षा।
10
लीला से पर्दा हटा गुरु प्रकट हुए
चकित देखते सब पाँचों बलिदानी संग खड़े
गुरुवर बोले “मेरे पाँच प्यारे सिंघ
साहस, रूप, वेश, नाम में न्यारे सिंघ
दया सिंघ, धर्म सिंघ और मोहकम सिंघ
खालिस जाति खालसा के साहब सिंघ व हिम्मत सिंघ
शुभाचरण पथ पर निर्भय देंगे बलिदान
अब से पंथ “खालसा ” मेरा ऐसे वीरों की पहचान।”
शब्दार्थ-
पर्दा- परदा, आवरण
प्रकट हुए– सामने आए, दिखाई दिए
चकित- हैरान
न्यारे- अलग, विशिष्ट
खालिस– शुद्ध
खालसा- गुरु गोबिंद सिंह द्वारा स्थापित वीर सिख पंथ
शुभाचरण– अच्छे कर्म करने वाला, सदाचार
पथ- मार्ग, रास्ता
निर्भय- बिना डर के
पंथ- धर्म, समुदाय
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ बताती हैं कि जब पाँचों बलिदानियों के क्रम के बाद सभा में एक गहरा मौन और आशंका का वातावरण था। लोग यह मान चुके थे कि पाँचों ने अपने प्राण त्याग दिए हैं। तभी गुरु गोबिन्द सिंह जी ने सभा को सत्य बताने और अपने उद्देश्य का रहस्य खोलने का समय उपयुक्त समझा। इसी क्षण खालसा पंथ की आधारशिला रखी गई और इतिहास का एक नया अध्याय प्रारंभ हुआ।
व्याख्या- इन पंक्तियों में कवि बताते हैं कि गुरु गोबिन्द सिंह जी ने जब अपनी लीला का रहस्य खोल दिया तो पूरे वातावरण में आश्चर्य और श्रद्धा की लहर दौड़ गई। अचानक पर्दा हटा और गुरु जी पाँचों वीर बलिदानियों के साथ सभा के सामने प्रकट हुए। जिन्हें सब मृत समझ बैठे थे, वे जीवित और दृढ़ आत्मविश्वास के साथ खड़े थे। इस दृश्य को देखकर उपस्थित लोग चौंक गए। यह एक अलौकिक, प्रेरणादायी और चमत्कारिक क्षण था।
गुरु जी ने घोषणा करते हैं कि ये पाँच अब साधारण मनुष्य नहीं, बल्कि मेरे ‘पाँच प्यारे सिंह’ हैं। उनका स्वर दृढ़ और गर्व से भरा था। वह आगे कहते हैं कि ये वीर साहस, रूप, वेश और पहचान में अब विशिष्ट हैं। इनके नाम हैं दयासिंह, धरमसिंह, मोहकमसिंह, साहबसिंह और हिम्मतसिंह।
गुरु जी ने यह भी स्पष्ट किया कि ये पाँच अब खालसा, अर्थात् शुद्ध, निर्मल, निर्भय और धर्म-समर्पित योद्धा हैं। इनके जीवन का उद्देश्य मानवता, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए निडर होकर बलिदान देना है। अंत में गुरु जी घोषणा करते हैं कि आज से ‘खालसा पंथ’ की स्थापना हुई और ऐसे ही निडर, सत्यनिष्ठ और त्यागी व्यक्तित्व इसकी पहचान होंगे।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘पाँच मरजीवे’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। कवि योगेन्द्र बख्शी जी द्वारा रचित कविता ‘पाँच मरजीवे’ सिख इतिहास की उस महान और प्रेरणादायक घटना पर आधारित है जिसने भारतीय समाज में वीरता, त्याग और आत्मसम्मान की नई रोशनी जगाई। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।