नींव की ईंट पाठ सार

PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 12 “Neev ki Eent” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

नींव की ईंट सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 12 Neev ki Eent Summary with detailed explanation of the lesson “Neev ki Eent” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary

इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड  कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 12 नींव की ईंट पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 नींव की ईंट पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Neev ki Eent (नींव की ईंट)

(श्री रामवृक्ष बेनीपुरी)

 

‘नींव की ईंट’  श्री रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित एक प्रेरणादायक निबंध है। इसमें लेखक ने इमारत की नींव और कँगूरे के माध्यम से जीवन और समाज का गहरा सत्य समझाया है। लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि सच्चा महत्त्व दिखावे, नाम और प्रशंसा का नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा, त्याग और कर्त्तव्य का होता है। यह पाठ विशेष रूप से युवाओं को समाज और राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित करता है।

 

Related: 

 

नींव की ईंट पाठ सार  Neev ki Eent Summary

‘नींव की ईंट’ एक प्रेरणादायक निबंध है, जिसमें लेखक श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने जीवन, समाज और राष्ट्र-निर्माण का गहरा संदेश बहुत सरल उदाहरण के माध्यम से दिया है। लेखक इमारत का उदाहरण देकर समझाता है कि जो चीज़ सबसे अधिक दिखाई देती है, वही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हो, यह आवश्यक नहीं। एक सुंदर और ऊँची इमारत सबको आकर्षित करती है, उसके कँगूरे, कलश और ऊपरी सजावट लोगों को लुभाती है, लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि यह इमारत आखिर टिकी किस पर है। वास्तव में पूरी इमारत नींव पर टिकी होती है, और नींव में लगी ईंटें ही उसकी मजबूती का आधार होती हैं।

लेखक कहता है कि दुनिया केवल चमक-दमक देखती है। लोग ऊपर दिखने वाली सुंदरता की प्रशंसा करते हैं, लेकिन उसके नीचे छिपे सत्य की ओर ध्यान नहीं देते। सत्य हमेशा चमकदार और सुंदर नहीं होता, वह कठोर और साधारण भी हो सकता है। इसी कारण लोग सत्य से भी दूर भागते हैं। अगर हम सच में सच्चाई को समझते, तो हम इमारत के कँगूरों के गीत गाने से पहले नींव की ईंटों के गीत गाते।

निबंध में लेखक नींव की ईंट को सबसे महान बताता है। एक ईंट जो कट-छँटकर ऊपर कँगूरे पर लगती है, वह सबकी नज़रों में आती है और प्रशंसा पाती है। लेकिन उससे कहीं अधिक महान वह ईंट है, जो ज़मीन के भीतर गहराई में जाकर दब जाती है और पूरी इमारत का भार अपने ऊपर लेती है। उसी पहली ईंट की मजबूती पर पूरी इमारत का अस्तित्व निर्भर करता है। यदि नींव की एक ईंट भी हिल जाए, तो ऊपर की सारी भव्यता पलभर में मिट्टी में मिल सकती है।

नींव की ईंट अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीती है। वह अंधेरे, सीलन और दबाव को सहन करती है ताकि ऊपर की ईंटें खुली हवा और रोशनी में रह सकें। वह अपना अस्तित्व इसलिए मिटा देती है ताकि दुनिया एक सुंदर इमारत देख सके। लेखक बताता है कि सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान मांगती है चाहे वह बलिदान ईंट का हो या इंसान का।

लेखक समाज और इतिहास से उदाहरण देता है। वह कहता है कि जिन शहादतों को नाम और प्रसिद्धि मिली, वे कँगूरे के समान हैं। लेकिन जिन लोगों ने बिना नाम के, बिना किसी प्रशंसा की उम्मीद के अपना जीवन समर्पित कर दिया, वही समाज की असली नींव हैं। ईसा मसीह की शहादत प्रसिद्ध है, लेकिन ईसाई धर्म को फैलाने और जीवित रखने का काम उन अनगिनत लोगों ने किया, जिन्होंने चुपचाप अत्याचार सहे, यातनाएँ झेलीं और अपने प्राण तक दे दिए। उनके नाम कहीं दर्ज नहीं हैं, लेकिन धर्म उन्हीं के त्याग से फल-फूल रहा है।

इसी प्रकार भारत की आज़ादी भी केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं के कारण नहीं मिली, बल्कि देश के हर कोने में ऐसे अनजान बलिदानी थे, जिन्होंने अपना सब कुछ देश के लिए न्योछावर कर दिया। वे दिखाई नहीं दिए, लेकिन उनके त्याग ने ही देश को स्वतंत्र बनाया। लेखक स्पष्ट करता है कि जो दिखाई नहीं देता, वह सत्य नहीं है, यह सोच गलत है। सच्चा सत्य खोजने से मिलता है।

अंत में लेखक वर्तमान समाज की स्थिति पर चिंता व्यक्त करता है। वह कहता है कि आज हर कोई कँगूरा बनना चाहता है, यानी नाम, पद और प्रशंसा पाना चाहता है। लेकिन नींव की ईंट बनने की इच्छा लोगों में कम होती जा रही है। जबकि देश और समाज के नव-निर्माण के लिए नींव की ईंटों की सबसे अधिक आवश्यकता है। गाँवों, शहरों, कारखानों और पूरे राष्ट्र के निर्माण के लिए ऐसे नौजवान चाहिए जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना शोर मचाए, पूरी निष्ठा से काम करें।

लेखक युवाओं को चुनौती देता है कि वे प्रशंसा और प्रसिद्धि से दूर रहकर कर्त्तव्य के लिए कर्म करें। वही सच्चे अर्थों में नींव की ईंट हैं। यही इस निबंध का मुख्य संदेश है कि समाज और देश का भविष्य उन लोगों पर निर्भर करता है, जो चुपचाप त्याग और बलिदान का मार्ग अपनाते हैं।

 

नींव की ईंट पाठ व्याख्या Neev ki Eent Lesson Explanation

पाठ – वह जो चमकीली, सुंदर, सुघड़-सी इमारत है, वह किस पर टिकी है? इसके कँगूरों को आप देखा करते हैं, क्या कभी आपने इसकी नींव की ओर ध्यान दिया है?
दुनिया चमक-दमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, आवरण के नीचे जो ठोस सत्य है, उस पर कितने लोगों का ध्यान जाता है?
ठोस ‘सत्य’ सदा ‘शिवम्’ होता ही है किंतु वह हमेशा ‘सुंदरम्’ भी हो, यह आवश्यक नहीं। सत्य कठोर होता है, कठोरता और भद्दापन साथ-साथ जन्मा करते हैं, जिया करते हैं। हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं इसलिए सत्य से भी भागते हैं। नहीं तो हम इमारत के गीत नींव के गीत से प्रारंभ करते।

Neev ki Eent Summary img 1

वह ईंट धन्य है जो कट-छँटकर कँगूरे पर चढ़ती है और बरबस लोक लोचनों को अपनी ओर आकृष्ट करती है। किंतु धन्य है वह ईंट, जो ज़मीन के सात हाथ नीचे जाकर गड़ गई और इमारत की पहली ईंट बनी।
क्यों इसी पहली ईंट पर, उसकी मजबूती और पुख़्तेपन पर सारी इमारत की अस्ति-नास्ति निर्भर करती है?
उस ईंट को हिला दीजिए, कँगूरा बेतहाशा ज़मीन पर आ गिरेगा।

शब्दार्थ-
चमकीली- चमकदार
सुघड़- सुडौल, जिसकी बनावट सुंदर हो
कँगूरा- चोटी, शिखर, गुंबद बुर्ज
नींव- भवन का आधार, बुनियाद
चमक-दमक- बाहरी सजावट, दिखावा
आवरण- पर्दा
ठोस- मजबूत
सत्य- सच
शिवम्- कल्याणकारी
सुंदरम्- सुंदर, आकर्षक
कठोर- सख्त, कड़ा
भद्दापन- बदसूरती
मुख मोड़ना- ध्यान न देना, दूर होना
धन्य- प्रशंसनीय, सराहनीय
कट-छँटकर- तराशकर, आकार देकर
बरबस- अपने आप, अनायास
लोक लोचन- लोगों की नजरों
आकृष्ट- आकर्षित
गड़ गई- मजबूती से धँस गई
अस्ति-नास्ति- होना न होना
पुख़्तापन- मजबूती, दृढ़ता
बेतहाशा- अचानक और वेगपूर्वक

व्याख्या- इन पंक्तियों में लेखक जीवन और समाज का एक गहरा सत्य समझाने के लिए इमारत का उदाहरण देता है। लेखक पूछता है कि जो इमारत हमें बाहर से बहुत सुंदर और चमकदार दिखाई देती है, वह आखिर किसके सहारे खड़ी है। हम अक्सर उसके कँगूरों और ऊपरी सुंदर भाग को देखते हैं, लेकिन उसकी नींव की ओर ध्यान नहीं देते। लेखक कहना चाहता है कि दुनिया केवल दिखावे और चमक-दमक को महत्त्व देती है, परंतु उसके नीचे छिपे सच्चे आधार को बहुत कम लोग समझते हैं।
लेखक आगे बताता है कि सच्चा सत्य हमेशा कल्याणकारी होता है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि वह देखने में सुंदर भी लगे। सत्य अक्सर कठोर और कड़वा होता है। क्योंकि लोगों को कठोर और साधारण बातें पसंद नहीं होतीं, इसलिए वे सत्य से भी दूर भागते हैं। अगर लोग सत्य को सही रूप में समझते, तो वे इमारत की सुंदरता की प्रशंसा करने से पहले उसकी नींव के महत्त्व को समझते और उसी की सराहना करते।
आगे लेखक ईंट का उदाहरण देकर अपने विचार को और स्पष्ट करता है। वह कहता है कि वह ईंट भी प्रशंसा के योग्य है जो कट-छँटकर कँगूरे पर लगती है और सबका ध्यान अपनी ओर खींचती है। लेकिन उससे भी अधिक महान वह ईंट है जो जमीन के भीतर गहराई में जाकर दब जाती है और इमारत की पहली ईंट बनती है। पूरी इमारत का अस्तित्व उसी पहली ईंट की मजबूती पर टिका होता है।
लेखक स्पष्ट करता है कि यदि नींव की उस पहली ईंट को हिला दिया जाए, तो ऊपर का कँगूरा भी टिक नहीं पाएगा और गिर जाएगा। इसका अर्थ यह है कि जो लोग समाज और देश की नींव बनते हैं, वही सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं, भले ही वे दिखाई न दें या उन्हें कोई प्रसिद्धि न मिले।

 

पाठ – कँगूरे के गीत गाने वाले हम, आइए, अब नींव के गीत गाएँ।
वह ईंट, जो जमीन में इसलिए गड़ गई कि दुनिया को इमारत मिले, कँगूरा मिले। वह इंट, जो सब ईंटों से ज्यादा पक्की थी जो ऊपर लगी होती तो कँगूरे की शोभा सौगुनी कर देती।
किंतु जिस ईंट ने देखा, इमारत की पायदारी उसकी नींव पर मुनहसिर होती है इसलिए उसने अपने को नींव में अर्पित किया।
वह ईंट, जिसने अपने को सात हाथ जमीन के अंदर इसलिए गाड़ दिया कि इमारत जमीन से सौ हाथ ऊपर तक जा सके।
वह ईंट, जिसने अपने लिए अंधकूप इसलिए क़बूल किया कि ऊपर के उसके साथियों को स्वच्छ हवा मिलती रहे, सुनहली रोशनी मिलती रहे।
वह ईंट, जिसने अपना अस्तित्व इसलिए विलीन कर दिया कि संसार एक सुंदर सृष्टि देखे । सुंदर सृष्टि! सुंदर सृष्टि! हमेशा ही बलिदान खोजती है, बलिदान ईंट का हो या व्यक्ति का। सुंदर इमारत बने इसलिए कुछ पक्की-पक्की लाल ईंटों को चुपचाप नींव में जाना है। सुंदर समाज बने इसलिए कुछ तपे-तपाए लोगों को मौन-मूक शहादत का लाल सेहरा पहनना है।

शब्दार्थ-
कँगूरे के गीत गाना- ऊपर दिखाई देने वाली सफलता की प्रशंसा करना
नींव के गीत गाना- आधार बनने वालों की सराहना करना
पक्की- मजबूत, दृढ़
शोभा- सुंदरता
सौगुनी- कई गुना बढ़ी हुई
पायदारी- मजबूती
मुनहसिर- निर्भर
अर्पित- दिया हुआ
सात हाथ- बहुत गहराई
स्वच्छ- साफ़, शुद्ध
सुनहली- स्वर्ण जैसी, उजली
अंधकूप- अँधेरा कुआँ
क़बूल किया- स्वीकार किया
अस्तित्व- हस्ती
विलीन- ओझल, अदृश्य, मिल जाना
सृष्टि- रचना, संसार
बलिदान- बलिदान
तपे-तपाए- कष्ट सहकर निखरे हुए
मौन-मूक- चुपचाप, बिना बोले
शहादत- बलिदान, कुर्बानी
लाल सेहरा- बलिदान का गौरवपूर्ण प्रतीक

व्याख्या- इन पंक्तियों में लेखक बताता है कि अब तक हम केवल कँगूरे, यानी ऊपर दिखने वाली चमकदार उपलब्धियों की प्रशंसा करते रहे हैं, लेकिन अब हमें नींव की ईंटों की प्रशंसा करनी चाहिए। लेखक चाहता है कि समाज में उन लोगों को सम्मान मिले, जो चुपचाप त्याग और सेवा करते हैं।
लेखक उस ईंट का गुणगान करता है जो जान-बूझकर जमीन के भीतर गड़ गई ताकि दुनिया को एक मजबूत और सुंदर इमारत मिल सके। यह वही ईंट है जो बहुत पक्की और मजबूत थी। अगर वह ऊपर लगती, तो कँगूरे की सुंदरता और बढ़ा देती। फिर भी उसने ऊपर दिखने की इच्छा छोड़ दी, क्योंकि वह समझ गई थी कि पूरी इमारत की मजबूती नींव पर ही निर्भर करती है।
लेखक आगे बताता है कि उस ईंट ने खुद को बहुत गहराई में इसलिए गाड़ दिया, ताकि इमारत बहुत ऊँची बन सके। उसने अपने हिस्से में अंधेरा, दबाव और घुटन स्वीकार कर ली, ताकि ऊपर की ईंटों को खुली हवा और सुनहरी धूप मिलती रहे। यह त्याग का सर्वोच्च रूप है।
अंत में लेखक स्पष्ट करता है कि सुंदर सृष्टि हमेशा बलिदान मांगती है। चाहे वह बलिदान किसी ईंट का हो या किसी इंसान का। जैसे एक सुंदर और मजबूत इमारत बनाने के लिए कुछ मजबूत ईंटों को बिना किसी शिकायत के नींव में दबना पड़ता है, वैसे ही एक सुंदर और सभ्य समाज बनाने के लिए कुछ श्रेष्ठ लोगों को बिना नाम और प्रसिद्धि के चुपचाप बलिदान देना पड़ता है। यही सच्ची शहादत है।

 

पाठ – शहादत और मौन-मूक! जिस शहादत को शुहरत मिली, जिस बलिदान को प्रसिद्धि प्राप्त हुई, वह इमारत का कँगूरा है – मंदिर का कलश है।
हाँ, शहादत और मौन-मूक समाज की आधारशिला यही होती है।
ईसा की शहादत ने ईसाई धर्म को अमर बना दिया, आप कह लीजिए। किंतु मेरी समझ में ईसाई धर्म को अमर बनाया उन लोगों ने, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार में अपने को अनाम उत्सर्ग कर दिया।
उसमें से कितने जिंदा जलाए गए, कितने शूली पर चढ़ाए गए, कितने वन-वन की खाक छानते जंगली जानवरों के शिकार हुए, कितने उससे भी भयानक भूख-प्यास के शिकार हुए। उनके नाम शायद ही कहीं लिखे गए हों। उनकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो किंतु ईसाई धर्म उन्हीं के पुण्य-प्रताप से फल-फूल रहा है। वे नींव की ईट थे, गिरजाघर के कलश उन्हीं की शहादत से चमकते हैं।

शब्दार्थ-
मौन-मूक- चुपचाप, बिना बोले
शुहरत शोहरत, ख्याति, प्रसिद्धि
बलिदान- त्याग
प्रसिद्धि- ख्याति
कलश- मंदिर का शिखर
आधारशिला बुनियाद का पत्थर
अमर- सदा जीवित रहने वाला
धर्म-प्रचार- धर्म का प्रसार
अनाम- बिना नाम वाला, गुमनाम
उत्सर्ग- बलिदान
शूली- लोहे की नुकीली छड़, प्राण दंड देने का एक साधन
वन-वन की खाक छानना– जंगलों में भटकना
पुण्य-प्रताप- अच्छे कर्मों का प्रभाव
फल-फूल रहा है- आगे बढ़ रहा है, विकसित हो रहा है
नींव की ईंट- आधार बनने वाला व्यक्ति
गिरजाघर चर्च

व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक शहादत के दो रूपों को स्पष्ट करता है एक वह, जिसे प्रसिद्धि और सम्मान मिलता है, और दूसरी वह, जो बिना नाम और चर्चा के होती है। लेखक कहता है कि जिस बलिदान को लोगों की वाहवाही और पहचान मिल जाती है, वह इमारत के कँगूरे या मंदिर के कलश के समान होता है, जो ऊपर दिखाई देता है और सबका ध्यान आकर्षित करता है।
लेकिन लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि समाज की असली नींव उन मौन और गुमनाम शहादतों से बनती है, जिनकी कोई चर्चा नहीं होती। ऐसे बलिदान ही समाज को मजबूती देते हैं और लंबे समय तक टिकाए रखते हैं।
लेखक ईसा मसीह का उदाहरण देता है। आमतौर पर लोग मानते हैं कि ईसा की शहादत से ईसाई धर्म अमर हुआ, लेकिन लेखक के अनुसार ईसाई धर्म को वास्तव में अमर बनाने वाले वे अनगिनत लोग थे, जिन्होंने उस धर्म के प्रचार के लिए अपना जीवन गुमनाम रूप से बलिदान कर दिया।
लेखक बताता है कि इनमें से कई लोगों को जिंदा जला दिया गया, कई को सूली पर चढ़ाया गया, कई जंगलों में भटकते हुए जंगली जानवरों का शिकार बने और कई भूख-प्यास से मरे। उनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हैं और न ही उनकी चर्चा होती है। फिर भी आज ईसाई धर्म उन्हीं के त्याग और पुण्य के कारण फल-फूल रहा है। लेखक अंत में कहता है कि वे लोग नींव की ईंट थे और गिरजाघरों के कलश उनकी ही शहादत से चमकते हैं।

 

पाठ – आज हमारा देश आजाद हुआ। सिर्फ उनके बलिदानों के कारण नहीं, जिन्होंने इतिहास में स्थान पा लिया है।
देश का शायद कोई ऐसा कोना हो, जहाँ कुछ ऐसे दधीचि नहीं हुए हों, जिनकी हड्डियों के दान ने ही विदेशी वृत्रासुर का नाश किया।
हम जिसे देख नहीं सके, वह सत्य नहीं है, यह है मूढ धारणा ढूँढने से ही सत्य मिलता है। हमारा काम है, धर्म है, ऐसी नींव की ईंटों की ओर ध्यान देना।
सदियों के बाद नए समाज की सृष्टि की ओर हमने पहला कदम बढ़ाया है। इस नए समाज के निर्माण के लिए हमें नींव की ईंट चाहिए।
अफ़सोस, कँगूरा बनने के लिए चारों ओर होड़ा-होड़ी मची है नींव की ईंट बनने की कामना लुप्त हो रही है।
सात लाख गाँवों का नव-निर्माण! हजारों शहरों और कारखानों का नव-निर्माण। कोई शासक इसे संभव नहीं कर सकता। जरूरत है ऐसे नौजवानों की जो इस काम में अपने को चुपचाप खपा दें।
जो एक नई प्रेरणा से अनुप्राणित हों, एक नई चेतना से अभिभूत, जो शाबाशियों से दूर हों, दलबंदियों से अलग हों, जिनमें कंगूरा बनने की कामना न हो; कलश कहलाने की जिनमें वासना न हो, सभी कामनाओं एवं सभी वासनाओं से दूर हों।
उदय के लिए आतुर हमारा समाज चिल्ला रहा है – हमारी नींव की ईट किधर है? देश के नौजवानों को यह चुनौती है।

शब्दार्थ-
आज़ाद- स्वतंत्र
बलिदान- त्याग, कुर्बानी
इतिहास में स्थान पाना– इतिहास में नाम दर्ज होना
कोना- क्षेत्र, हिस्सा
दधीचि- महान त्यागी ऋषि, यहाँ अत्यधिक बलिदान देने वाले व्यक्ति का प्रतीक
हड्डियों का दान– अपना सर्वस्व त्याग देना
विदेशी बाहरी, पराया
वृत्रासुर अत्याचारी शत्रु (यहाँ विदेशी शासकों का प्रतीक)
नाश- अंत, विनाश
मूढ़- मूर्ख
सत्य- सच
धर्म- जिम्मेदारी (कर्त्तव्य के अर्थ में)
सृष्टि- रचना
नव-निर्माण- नए सिरे से निर्माण
अफ़सोस- दुख
होड़ा-होड़ी- प्रतिस्पर्धा, एक दूसरे से आगे बढ़ जाने की कोशिश
कामना- इच्छा
लुप्त- गायव
शासक शासक वर्ग, सरकार
नौजवान- युवा
खपा देना पूरी तरह लग जाना
प्रेरणा- उत्साह
अनुप्राणित- प्रेरित
चेतना- जागरूकता
अभिभूत- पूरी तरह प्रभावित
शाबाशी- प्रशंसा
दलबंदियाँ- गुटबाज़ी
वासना इच्छा
आतुर- उतावला
चुनौती- ललकार, कठिन परीक्षा

व्याख्या- इस गद्याँश में लेखक देश की आज़ादी और समाज-निर्माण की सच्ची भावना को स्पष्ट करता है। लेखक कहता है कि हमारा देश आज़ाद केवल उन लोगों के कारण नहीं हुआ, जिनके नाम इतिहास में लिखे गए हैं। इसके पीछे अनगिनत ऐसे बलिदान हैं, जो गुमनाम रहे लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण थे।
लेखक कहता है कि देश का शायद ही कोई ऐसा हिस्सा होगा, जहाँ ऐसे त्यागी लोग न हुए हों, जिन्होंने दधीचि की तरह अपना सर्वस्व देश के लिए समर्पित कर दिया हो। यहाँ ‘दधीचि’ से आशय उन महान त्यागियों से है, जिन्होंने अपने शरीर और जीवन तक का दान कर दिया ताकि विदेशी शोषण का अंत हो सके। उनके बलिदान ने ही देश को स्वतंत्रता दिलाई।
लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि जो हमें दिखाई नहीं देता, उसे असत्य मान लेना गलत सोच है। सच्चाई दिखाई देने से नहीं, बल्कि खोजने से मिलती है। इसलिए हमारा कर्त्तव्य है कि हम ऐसे गुमनाम बलिदानियों, यानी समाज की नींव बनने वाले लोगों की ओर ध्यान दें और उन्हें सम्मान दें।
आगे लेखक कहता है कि बहुत लंबे समय बाद हम एक नए समाज के निर्माण की ओर बढ़े हैं। इस नए समाज को मजबूत बनाने के लिए नींव की ईंटों की आवश्यकता है। लेकिन लेखक को दुख है कि आज हर कोई कँगूरा बनना चाहता है, यानी नाम और प्रसिद्धि चाहता है, जबकि नींव की ईंट बनने की भावना लोगों में कम होती जा रही है।
लेखक देश के सामने मौजूद बड़े कार्यों का उल्लेख करता है, लाखों गाँवों, हज़ारों शहरों और कारखानों के निर्माण का कार्य। लेखक कहता है कि यह सब कोई अकेला शासक नहीं कर सकता। इसके लिए ऐसे युवाओं की ज़रूरत है जो बिना किसी स्वार्थ के, बिना प्रशंसा की इच्छा के, चुपचाप देश-निर्माण में जुट जाएँ।
अंत में लेखक युवाओं का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है। वह चाहता है कि युवा नई प्रेरणा और नई चेतना से भरे हों, लेकिन प्रशंसा, गुटबाज़ी और पद-लालसा से दूर रहें। उनमें कँगूरा या कलश बनने की इच्छा न हो। लेखक कहता है कि उन्नति के लिए बेचैन हमारा समाज आज युवाओं से पूछ रहा है कि हमारी नींव की ईंट कहाँ है। यही देश के नौजवानों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।

 

Conclusion

इस पोस्ट में ‘नींव की ईंट’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। इस निबंध के माध्यम से श्री रामवृक्ष बेनीपुरी ने बताया है कि सच्चा महत्त्व दिखावे, नाम और प्रशंसा का नहीं, बल्कि निःस्वार्थ सेवा, त्याग और कर्त्तव्य का होता है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।