उड़ चल, हारिल पाठ सार

Maharashtra State Board Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 1 “Ud Chal, Haril” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

उड़ चल, हारिल सार – Here is the Maharashtra State Board of Secondary and Higher Secondary Education (MSBSHSE) Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 1 Ud Chal, Haril Summary with detailed explanation of the lesson “Ud Chal, Haril” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, summary and difficult word meanings 

इस पोस्ट में हम आपके लिए महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षण मंडळ के कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती पुस्तक के पाठ 1 उड़ चल, हारिल से पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 10 उड़ चल, हारिल पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Ud Chal, Haril  (उड़ चल, हारिल)

प्रस्तुत कविता में अज्ञेय जी ने हारिल पक्षी के माध्यम से देश के नवयुवकों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। कवि का कहना है कि जीवन के रास्ते में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आ जाए हमें उनसे घबराना नहीं चाहिए। जीवन की कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए हारिल पक्षी की तरह हमें अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की जी तोड़ मेहनत करनी चाहिए।

 

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उड़ चल, हारिल पाठ सार Ud Chal, Haril Summary

 

प्रस्तुत कविता में अज्ञेय जी ने हारिल पक्षी के माध्यम ने देश के नवयुवकों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। कवि का कहना है कि जीवन के रास्ते में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आ जाए हमें उनसे घबराना नहीं चाहिए। कवि हारिल नामक पक्षी को सम्बोधित करते हुए कहता है कि भले ही उसके पास केवल एक छोटा सा तिनका है। उसी को सहारा समझकर वह साहस के साथ जीवन में बढ़ता रहे। उसे किसी भी परिस्थिति में थक कर हार नहीं माननी चाहिए। हारिल पक्षी के माध्यम से कवि देश के नवयुवकों को हिम्मत के साथ आगे बढ़ते रहने और समय रहते खुद पर भरोसा करके कठिनाइयों को पार करने की हिम्मत रखने को कहता है। कवि नवयुवको को प्रेरित करता हुआ कहता है कि उन्हें हर परिस्थिति को पार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने चाहिए। बिना हार माने लगातार मेहनत करते हुए सभी को अचंभित कर देना चाहिए। भले ही उसके पास थोड़े कम साधन हो किन्तु उसके हुनर को जीवित रखने के लिए उतना ही काफी है। एक छोटा सा साधन भी मूलयवान होता है। कवि नवयुवकों से कहता है कि अपनी सफलता के रास्ते में वे अकेले पड़ सकते हैं, संसार उनका मजाक बना सकता है, रास्ते से भटकाने का प्रयास भी कर सकता है। परन्तु उन्हें अडिग रहना चाहिए क्योंकि वे पहले साधारण व्यक्ति थे परन्तु आज उन्होंने अपने गुणों को पहचान लिया है। उनकी असली पहचान केवल शरीर नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक है। उनके अंदर जो कुछ कर गुजरने की इच्छा है वह कोई साधारण इच्छा नहीं है। उनके आगे बढ़ने की चाह में उनका छोटा सा सहारा भी उनके लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक बनेगा। परन्तु वे चाहे जितनी तरक्की कर लें अपनी मिट्टी या पहचान को नहीं छोड़ सकते। जीवन को सुखमय बनाने के लिए काम पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी जीवन में मिलने वाली सुविधायों का अपमान नहीं करता। क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर पूर्ण विश्वास होता है। एक छोटी सी उम्मीद के सहारे वे अपने लक्ष्य को प्राप्त कर मिसाल बना सकते हैं। उनके जीवन में नई उम्मीद नई किरण जाग गई है और यह नए लक्ष्य की ओर संकेत है। इसलिए अपने छोटे से साधन के सहारे ही मेहनत करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बढ़ते रहना चाहिए।

 

उड़ चल, हारिल पाठ व्याख्या Ud Chal, Haril Poem Explanation

 

1-
उड़ चल हारिल लिए हाथ में, यही अकेला ओछा तिनका
उषा जाग उठी प्राची में कैसी बाट, भरोसा किनका !
शक्ति रहे तेरे हाथों में छूट न जाय यह चाह सृजन की
शक्ति रहे तेरे हाथों में, रुक न जाय यह गति जीवन की !

शब्दार्थ –
हारिल – हरियाल (एक पक्षी) (महाराष्ट्र का राज्यपक्षी)
ओछा – तुच्छ, छोटा
उषा – सुबह
प्राची – पूर्व दिशा
बाट – रास्ता
किनका – अन्न का टूटा हुआ छोटा दाना, छोटा कण या चावल आदि का महीन टुकड़ा
चाह – इच्छा
सृजन – रचना

व्याख्या प्रस्तुत पंक्तियों में कवि हारिल नामक पक्षी से कहता है कि हे हारिल पक्षी! तू उड़ चल, भले ही तेरे पास केवल एक छोटा सा तिनका है। पूर्व दिशा में सुबह की किरणें जाग गई हैं, अब वह किसका रास्ता देख रहा है अथवा किस के भरोसे बैठा है। उसमें इतनी शक्ति रहनी चाहिए कि उसमें रचना करने की इच्छा अधूरी न रह जाए और उसमें इतना साहस रहना चाहिए कि उसके जीवन की गति बढ़ती रहे। अर्थात कवि देश के नवयुवकों को प्रेरित करते हुए कहता है कि भले ही उनके पास साधन कम हो परन्तु उन्हें हिम्मत के साथ आगे बढ़ते रहना चाहिए। समय रहते खुद पर भरोसा करके कठिनाइयों को पार करने की हिम्मत रखनी चाहिए। जीवन में आगे बढ़ते समय उनमें न तो रचनात्मकता की कमी होनी चाहिए और न ही जीवन की गति में कोई रुकावट आनी चाहिए। 

 

2 –
ऊपर-ऊपर-ऊपर-ऊपर, बढ़ा चीर चल दिग्मंडल
अनथक पंखों की चोटों से, नभ में एक मचा दे हलचल !
तिनका तेरे हाथों में है, अमर एक रचना का साधन
तिनका तेरे पंजे में है, विधना के प्राणों का स्पंदन !

शब्दार्थ
दिग्मंडल – दिशाओं का समूह
अनथक – कभी न थकने वाला
नभ – आकाश
हलचल – हड़बड़ी
विधना – होनहार
स्पंदन – फड़कना, संवेग, फड़फड़ाहट

व्याख्या कवि हारिल पक्षी से कहता है कि वह उड़ते हुए ऊपर-ही-ऊपर बढ़ता चला जाए और  सभी दिशाओं के समूह को चीरता हुआ आगे बढ़ता चला जाए। वह कभी न थकने वाले अपने पंखों की चोटों अर्थात आवाजों से पूरे आकाश में हड़बड़ी मचा दे। उसके हाथों में जो तिनका है वही उसकी रचना का माध्यम है। उसके पंजों में जो तिनका है वह उसके जीवन के हुनर की फड़फड़ाहट है। कहने का अभिप्राय यह है कि कवि नवयुवको को प्रेरित  करता हुआ कहता है कि उन्हें हर परिस्थिति को पार करते हुए अपने लक्ष्य की और बढ़ते जाने चाहिए। बिना हार माने लगातार मेहनत करते हुए सभी को अचंभित कर देना चाहिए। भले ही उसके पास थोड़े कम साधन हो किन्तु उसके हुनर को जीवित रखने के लिए उतना ही काफी है। एक छोटा सा साधन भी मूलयवान होता है। 

 

3 –
काँप न, यद्यपि दसों दिशा में, तुझे शून्य नभ घेर रहा है
रुक न यद्यपि उपहास जगत का, तुझको पथ से हेर रहा है !
तू मिट्टी था, किंतु आज मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्टि किंतु स्रष्टा का, गुर तूने पहचान लिया है !

शब्दार्थ – |
यद्यपि – चाहे
शून्य – खाली
उपहास – मज़ाक
जगत – संसार
पथ – रास्ते
हेर – भटकाना |
सृष्टि – संसार
स्रष्टा – संसार को बनाने वाला
गुर – गुण 

व्याख्या कवि हारिल पक्षी से कहता है कि तू डरना मत चाहे चारों दिशाओं में सिर्फ तुझे खाली आकाश ही दिखाई दे। तू रुकना मत चाहे सारा संसार तेरा मजाक बनाए या तुझे तेरे रास्ते से भटकाने की कोशिश करे। तू पहले एक साधारण जीव था परन्तु आज तूने कुछ बना लिया है। तू पहले संसार के जीवों में से एक था परन्तु आज तूने खुद कुछ बनाने का गुण पहचान लिया है।  कहने का अभिप्राय यह है कि कवि नवयुवकों को प्रेरित करते हुए कहता है कि अपनी सफलता के रास्ते में तुम अकेले पड़ सकते हो, संसार तुम्हारा मजाक बना सकता है, तुम्हें रास्ते से भटकाने का प्रयास भी कर सकता है। परन्तु तुम अडिग रहना। क्योंकि तुम पहले साधारण व्यक्ति थे परन्तु आज तुमने अपने गुणों को पहचान लिया है।  

 

4 –
मिट्टी निश्चय है यथार्थ, पर क्या जीवन केवल मिट्टी है ?
तू मिट्टी पर मिट्टी से उठने की इच्छा किसने दी है ?
आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का, तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दंड बना यह तिनका, सूने पथ का एक सहारा !

शब्दार्थ –
यथार्थ – जैसा होना चाहिए ठीक वैसा
ऊर्ध्वंग – शरीर के ऊपर का भाग, मन
ज्वाल – लौ, लपट, ज्वाला
दुर्निवार – जिसे जल्दी न रोका जा सके
हरकारा – पत्र ले जानेवाला
सूने – खाली 

व्याख्याकवि हारिल पक्षी से कहते हैं कि यह सही है की हम सब मिट्टी से बने हैं लेकिन क्या केवल जीवन मिट्टी होना ही है। तू मिट्टी ही है परन्तु मिट्टी से ऊपर उठने की इच्छा तेरे अंदर किसने जगाई। आज तुम ऊपर उठने की ज्वाला के ऐसे संदेशवाहक बने हो जिसे कोई रोक नहीं सकता और यह जो तिनका है वह तुम्हारे झंडे का डंडा बनेगा जो तुम्हारे सुने रास्ते का सहारा होगा। कहने का आशय यह है कि कवि नवयुवकों से कहता है कि उनकी असली पहचान केवल शरीर नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक है। उनके अंदर जो कुछ कर गुजरने की इच्छा है वह कोई साधारण इच्छा नहीं है। तुम्हारे आगे बढ़ने की चाह में तुम्हारा छोटा सा सहारा भी तुम्हारे लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक बनेगा। 

 

5 –
मिट्टी से जो छीन लिया है, वह तज देना धर्म नहीं है
जीवन साधन की अवहेला, कर्मवीर का कर्म नहीं है !
तिनका पथ की धूल स्वयं तू, है अनंत की पावन धूली
किंतु आज तूने नभ पथ में, क्षण में बद्ध अमरता छूली !
उषा जाग उठी प्राची में, आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हारिल लिए हाथ में, एक अकेला पावन तिनका !
(‘इत्यलम्’ कविता संग्रह से)

Ud Chal, Haril Summary img 1

शब्दार्थ –
तज देना – छोड़ देना
अवहेला – अनादर, अवज्ञा, तिरस्कार
कर्मवीर – कर्म करने वाला
अनंत – जिसका अंत न हो
पावन – पवित्र
आवाहन – बुलाना

व्याख्या कवि हारिल पक्षी से कहता है कि मिट्ठी से तुम चाहे जितने ऊपर उड़ लो, मिट्ठी को छोड़ना तुम्हारा धर्म नहीं है। कर्म करने वाला कभी जीवन के संसाधनों का अपमान नहीं करता। तू स्वयं भी तिनके की ही तरह रास्ते की धूल मात्र है। परन्तु अपने काम के द्वारा तू उस पवित्र धूल के समान हो गया है जिसे लंम्बे समय तक याद किया जाएगा। आज तूने एक छोटे से तिनके के सहारे आकाश के रास्ते पल भर में अमरता छू ली है। कवि हारिल पक्षी से कहता है कि पूर्व दिशा में सुबह जाग गई है और नाय दिन तुम्हें पुकार रहा है। इसलिए हे हारिल पक्षी अपने हाथ में उस अकेले पवित्र तिनके को ले कर अब अड़ चल। कहने का आशय यह है कि कवि नवयुवको से कहता है कि तुम चाहे जितनी तरक्की कर लो अपनी मिट्टी या पहचान को नहीं छोड़ सकते। जीवन को सुखमय बनाने के लिए काम पर विश्वास रखने वाला व्यक्ति कभी जीवन में मिलने वाली सुविधायों का अपमान नहीं करता। क्योंकि उसे अपनी मेहनत पर पूर्ण विश्वास होता है। एक छोटी सी उम्मीद के सहारे तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर मिसाल बना सकते हो। तुम्हारे जीवन में नई उम्मीद नई किरण जाग गई है और यह नए लक्ष्य की ओर संकेत है। इसलिए अपने छोटे से साधन के सहारे ही मेहनत करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बढ़ते रहो। 

 

Conclusion

“उड़ चल, हारिल” प्रसिद्ध साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ द्वारा रचित है। यह एक प्रेरक कविता है, जिसमें हारिल पक्षी के माध्यम से जीवन में निरंतर प्रगति, साहस, और विपरीत परिस्थितियों में भी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने का संदेश दिया गया है। MSBSHSE कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती ch 1 “उड़ चल, हारिल” की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।