कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 17 “Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 17 Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se Summary with detailed explanation of the lesson “Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
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Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se (कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से)
By ललिता गोयल
‘कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से’ एक ज्ञानवर्धक पाठ है, जिसे लेखिका श्रीमती ललिता गोयल ने उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों की जानकारी देने और उन्हें धोखाधड़ी से बचने के लिए जागरूक बनाने के उद्देश्य से लिखा है। इसमें सरल भाषा में बताया गया है कि उपभोक्ता कैसे अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है और शिकायत कैसे कर सकता है।
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कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से पाठ सार Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se Summary
यह पाठ उपभोक्ताओं को रोज़मर्रा की ज़िंदगी में होने वाली धोखाधड़ी से बचाने के लिए लिखा गया है। लेखिका ने बहुत सरल भाषा में बताया है कि उपभोक्ता कौन होता है, उसके क्या-क्या अधिकार हैं और उन अधिकारों की रक्षा कैसे की जा सकती है। आज के समय में आम आदमी कहीं न कहीं उपभोक्ता है। वह दवा खरीदता है, सामान लेता है, बैंक की सेवा लेता है या किसी डॉक्टर से इलाज करवाता है। ऐसे में कई बार उसके साथ धोखा हो जाता है। कभी उसे एक्सपायरी दवा दे दी जाती है, कभी कम वजन का सामान मिलता है, कभी गारंटी होने पर भी सही सेवा नहीं मिलती और कभी झूठे विज्ञापनों में फँसकर उसे नुकसान उठाना पड़ता है। इस तरह की समस्याएँ आज बहुत आम हो गई हैं।
उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार ने वर्ष 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून बनाया। इस कानून के अनुसार वह हर व्यक्ति उपभोक्ता है, जो किसी वस्तु या सेवा के बदले पैसे देता है। इस कानून के तहत उपभोक्ता को कई महत्त्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। उसे सुरक्षित वस्तु पाने का अधिकार है, सही जानकारी पाने का अधिकार है, अपनी पसंद का सामान चुनने का अधिकार है, अपनी बात रखने और शिकायत सुनवाने का अधिकार है, नुकसान होने पर मुआवजा पाने का अधिकार है और उपभोक्ता शिक्षा का भी अधिकार है। लेकिन इन अधिकारों का लाभ तभी मिल सकता है, जब उपभोक्ता खुद जागरूक हो और अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो।
लेखिका बताती हैं कि आज भी बहुत कम लोग उपभोक्ता कानून के बारे में जानते हैं। कई लोग यह भी नहीं जानते कि वे शिकायत कर सकते हैं। जबकि रेडियो और टीवी पर बार-बार जागरूकता के विज्ञापन दिखाए जाते हैं। अगर उपभोक्ता चुप रहता है, तो दुकानदार और कंपनियाँ उसका फायदा उठाती रहती हैं। इसलिए जरूरी है कि उपभोक्ता एकजुट होकर और जागरूक होकर अपने अधिकारों की रक्षा करें।
अगर उपभोक्ता के अधिकारों का हनन होता है, तो उपभोक्ता खुद या कोई उपभोक्ता संगठन उसकी ओर से शिकायत कर सकता है। शिकायत बहुत सरल तरीके से सादे कागज़ पर की जा सकती है। इसमें शिकायतकर्ता और सामने वाले का नाम-पता, घटना का विवरण, जरूरी दस्तावेज़, माँगी गई राहत और हस्ताक्षर लिखना होता है। इसके साथ नाममात्र की फीस देकर उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। छोटे मामलों के लिए जिला स्तर, बड़े मामलों के लिए राज्य और बहुत बड़े मामलों के लिए राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में शिकायत की जाती है। शिकायत दो साल के भीतर करनी होती है और अधिकतर मामलों में वकील की भी जरूरत नहीं पड़ती। बीपीएल कार्डधारकों को तो कोई फीस भी नहीं देनी होती।
पाठ में यह भी बताया गया है कि कई बार दुकानदार एमआरपी से ज्यादा कीमत वसूलते हैं, खासकर स्टेशन, बस स्टैंड या एयरपोर्ट पर। यह भी उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है। इसके अलावा कंपनियाँ झूठी योजनाओं का विज्ञापन करके लोगों को फँसाती हैं, बैंक बिना कारण खाता फ्रीज़ कर देते हैं और बिल्डर एक ही फ्लैट कई लोगों को बेच देते हैं। ऐसी सभी स्थितियों में उपभोक्ता शिकायत कर सकता है।
लेखिका उपभोक्ताओं को सावधान भी करती हैं। सामान खरीदते समय एगमार्क का निशान देखना चाहिए, पैकिंग की तारीख, वजन, बैच नंबर और एक्सपायरी डेट जरूर जाँचनी चाहिए। बिल लेना बहुत जरूरी है, क्योंकि बिना बिल के शिकायत करना मुश्किल हो जाता है। पैकेट फटा न हो, गारंटी या वारंटी कार्ड पर हस्ताक्षर हो और विज्ञापन के झाँसे में आए बिना गुणवत्ता को परखा जाए।
आज के समय में उपभोक्ता ऑनलाइन भी शिकायत कर सकता है। सरकार की वेबसाइट और टोलफ्री नंबर के ज़रिए आसानी से शिकायत दर्ज की जा सकती है और जल्दी कार्यवाही भी होती है। इस तरह यह पाठ उपभोक्ताओं को न केवल उनके अधिकारों की जानकारी देता है, बल्कि उन्हें सजग, समझदार और साहसी बनने की प्रेरणा भी देता है, ताकि वे धोखाधड़ी से बच सकें और न्याय पा सकें।
कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से पाठ व्याख्या Kaise Bachein Upbokta Dhokadhdhi Se Lesson Explanation
पाठ- रोज़मर्रा की जिंदगी में उपभोक्ताओं को ठगी व धोखाधड़ी का शिकार होना पड़ता है। कभी दवा की दुकान पर ऐक्सपायरी डेट क्रॉस कर चुकी दवा दे दी जाती है, तो कभी खरीदे गए उत्पाद पर गारंटी होने के बावजूद सही सर्विस नहीं दी जाती। कभी उत्पाद पर लिखे वज़न से कम वजन का सामान दे दिया जाता है, तो कभी चिकित्सक द्वारा मरीज का सही इलाज नहीं किया जाता। कभी लुभावने विज्ञापनों द्वारा ग्राहकों को प्रभावित किया जाता है और उत्पाद के बारे में उन्हें गलत जानकारी दी जाती है, जिस का खामियाजा अंततः ग्राहकों को ही भुगतना पड़ता है।
उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए सरकार ने 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू किया। इस कानून के अनुसार, वह हर एक व्यक्ति उपभोक्ता है, जो किसी वस्तु या सेवा को पाने के बदले धन का भुगतान करता है। इस कानून के अनुसार उपभोक्ता के रूप में उसे कुछ अधिकार प्राप्त हैं। मसलन, सुरक्षा का अधिकार, जानकारी होने का अधिकार, उत्पाद चुनने का अधिकार सुनवाई का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार, उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार।
शब्दार्थ-
रोज़मर्रा- रोजाना की
उपभोक्ता- सामान या सेवा खरीदने वाला व्यक्ति
ठगी- धोखा देकर नुकसान पहुँचाना
धोखाधड़ी– छल, कपट
शिकार होना- प्रभावित होना, फँस जाना
ऐक्सपायरी डेट– समापन तिथि
क्रॉस- लाँधी हुई, बीती हुई
गारंटी- निश्चित समय तक सेवा या मरम्मत का आश्वासन
सर्विस- सेवा
उत्पाद- वस्तु, सामान
वज़न- भार
चिकित्सक– वैद्य, डॉक्टर
इलाज– उपचार
लुभावने- आकर्षित करने वाले
विज्ञापन- प्रचार
प्रभावित– असर डालना
खामियाजा– नुकसान
अंतत- अंत में
संरक्षण- रक्षा
कानून- नियम
धन- पैसा
अधिकार- हक
मसलन- उदाहरण के तौर पर
सुनवाई- बात रखे जाने का अवसर
शिकायत निवारण– शिकायत का समाधान
उपभोक्ता शिक्षा– उपभोक्ता को उसके अधिकारों की जानकारी देना
व्याख्या- इस गद्याँश में लेखिका ने आम उपभोक्ताओं के साथ होने वाली ठगी और धोखाधड़ी की समस्याओं को सरल रूप में स्पष्ट किया है। लेखिका बताती हैं कि रोज़मर्रा की जिंदगी में उपभोक्ताओं को अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कभी दवा की दुकान से ऐसी दवा मिल जाती है, जिसकी उपयोग की अंतिम तिथि समाप्त हो चुकी होती है। कभी कोई वस्तु गारंटी सहित खरीदी जाती है, फिर भी खराब होने पर उसकी सही मरम्मत या सेवा नहीं मिलती। कई बार पैकेट पर लिखा वजन और वास्तव में दिया गया वजन अलग होता है। कभी-कभी डॉक्टर भी मरीज का ठीक से इलाज नहीं करते, जिससे मरीज को नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा आकर्षक और भ्रामक विज्ञापनों के माध्यम से ग्राहकों को प्रभावित किया जाता है और उत्पाद के बारे में गलत जानकारी दी जाती है। इन सभी स्थितियों में अंततः नुकसान उपभोक्ता को ही सहना पड़ता है।
इन्हीं समस्याओं से उपभोक्ताओं की रक्षा करने के लिए सरकार ने वर्ष 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून लागू किया। इस कानून के अनुसार जो व्यक्ति किसी वस्तु या सेवा को प्राप्त करने के लिए धन का भुगतान करता है, वह उपभोक्ता कहलाता है। इस कानून के अंतर्गत उपभोक्ता को कई महत्त्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। इनमें सुरक्षित वस्तु प्राप्त करने का अधिकार, वस्तु के बारे में सही जानकारी पाने का अधिकार, अपनी पसंद का उत्पाद चुनने का अधिकार, अपनी शिकायत को सुने जाने का अधिकार, नुकसान होने पर समाधान या मुआवजा पाने का अधिकार तथा उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार शामिल हैं। इस प्रकार यह कानून उपभोक्ताओं को जागरूक बनाकर उनके हितों की रक्षा करता है।
पाठ– इन सभी अधिकारों को पाने के लिए ग्राहक को जागना होगा व संगठित हो कर अपना संरक्षण करना होगा। एक ताजा अध्ययन के अनुसार देश के मात्र 20% ग्राहक ही उपभोक्ता संरक्षण कानून से अवगत हैं और केवल 42% ग्राहकों ने ही सुना है कि ऐसा कोई कानून भी हैं। हालांकि रेडियो व टेलीविज़न पर भी ग्राहकों को उन के अधिकारों के बारे में जागरूक करने हेतु अनेक विज्ञापन दिखाए व सुनाए जाते हैं।
स्वयं उपभोक्ता या कोई स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन इस बात के लिए अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है, जिस के अंतर्गत उपभोक्ता अधिकारों का हनन हुआ है।
शिकायतकर्ता सादे कागज़ पर निम्नलिखित जानकारी दे कर शिकायत दर्ज करा सकता है-
- शिकायतकर्ता व विपक्ष का नाम और पता।
- शिकायत से संबंधित तथ्य यानी अधिकारों का हनन कब व कहाँ हुआ।
- शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में ज़रूरी दस्तावेज़।
- उस हरजाने या राहत का उल्लेख जो शिकायतकर्ता पाना चाहता है।
- शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर
उपरोक्त विवरण वाले कागज़ के साथ उपभोक्ता नाममात्र का न्यायालय शुल्क दे कर उपभोक्ता फोरम में शिकायत दर्ज करा सकता है।
शब्दार्थ-
ग्राहक- खरीदने वाला व्यक्ति
जागरूक होना- सचेत होना
संगठित- मिलकर, एकजुट होकर
संरक्षण- हिफ़ाज़त
ताज़ा अध्ययन– हाल का सर्वे, शोध
मात्र- केवल
अवगत- जानकार
हालाँकि– फिर भी
जागरूक करना– जानकारी देना
स्वयं- खुद
स्वैच्छिक- अपनी इच्छा से
उपभोक्ता संगठन– उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने वाला समूह
शिकायत दर्ज करना– शिकायत लिखवाना
हनन- चोट पहुँचना, आघात
शिकायतकर्ता- शिकायत करने वाला
तथ्य- सच, यथार्थ
आरोप- दोष लगाना
समर्थन- प्रमाण
दस्तावेज़– विविध लेख्य
हरजाना– नुकसान
राहत– आराम, चैन
उल्लेख- ज़िक्र
हस्ताक्षर- साइन
उपरोक्त- ऊपर लिखी हुई
न्यायालय- अदालत
शुल्क- फीस
उपभोक्ता फोरम- उपभोक्ताओं की शिकायत सुनने वाली संस्था
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखिका उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक और सक्रिय बनने की आवश्यकता पर ज़ोर देती हैं। लेखिका कहती हैं कि उपभोक्ता को अपने अधिकार अपने आप नहीं मिलते, बल्कि उन्हें पाने के लिए उपभोक्ता को जागरूक होना पड़ता है और मिलकर, संगठित होकर अपनी रक्षा करनी होती है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार देश में बहुत कम लोग उपभोक्ता संरक्षण कानून के बारे में जानते हैं। केवल लगभग 20 प्रतिशत लोग ही इस कानून से परिचित हैं और 42 प्रतिशत लोगों ने बस इसका नाम ही सुना है। इसका मतलब यह है कि अधिकतर उपभोक्ता अपने अधिकारों से अनजान हैं। जबकि सरकार रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों से लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करने के लिए लगातार विज्ञापन दिखाती और सुनाती है।
लेखिका आगे बताती हैं कि यदि उपभोक्ता के अधिकारों का हनन होता है, तो स्वयं उपभोक्ता या कोई स्वैच्छिक उपभोक्ता संगठन उसकी ओर से शिकायत दर्ज करा सकता है। शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया बहुत सरल है। शिकायतकर्ता को सादे कागज़ पर अपनी शिकायत लिखनी होती है। इसमें अपना और सामने वाले का नाम व पता लिखना होता है। साथ ही यह बताना होता है कि उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन कब और कहाँ हुआ। अपने आरोपों को सही साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज़, जैसे बिल या रसीद, भी लगाने होते हैं। इसके अलावा यह भी लिखना होता है कि वह कितना मुआवजा या किस प्रकार की राहत चाहता है। अंत में शिकायतकर्ता को अपने हस्ताक्षर करने होते हैं। इस प्रकार की जानकारी वाले कागज़ के साथ नाममात्र की न्यायालय शुल्क देकर उपभोक्ता फोरम में आसानी से शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
पाठ ₹20 लाख तक के क्लेम के लिए उपभोक्ता जिलास्तर के उपभोक्ता संरक्षण आयोग में न्याय की गुहार करे और ₹20 लाख से अधिक के क्लेम के लिए राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग में शिकायत दर्ज कराए। ₹1 करोड़ से अधिक के क्लेम के लिए वह राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग में शिकायत दर्ज कराए।
यह ध्यान रहे कि उपभोक्ता शिकायत अधिकारों के हनन के 2 वर्ष के भीतर ही करें। ज्यादातर मामलों में पीड़ित उपभोक्ता को वकील करने की ज़रूरत नहीं होती। वह चाहे तो खुद भी पैरवी कर सकता है। और तो और बीपीएल (बिलो पावर्टी लाइन) कार्डधारक को तो शिकायत दर्ज करने के लिए किसी तरह की फीस भी नहीं देनी होती।

कई बार दुकानदार अपने उत्पाद पर लेबल या स्टिकर लगा कर उसे बाजार भाव से ज्यादा कीमत पर बेचता है। ऐसा करना उपभोक्ता अधिकारों का हनन है। अगर आप को रेलवे स्टेशन, ट्रेन, एअरपोर्ट या बस स्टैंड पर किसी भी सामान को एमआरपी से अधिक कीमत पर बेचा जाता है, तो आप अपने उपभोक्ता अधिकारों का प्रयोग कर के शिकायत कर सकते हैं।
उपभोक्ताओं के अधिकारों के उल्लंघन के ऐसे मामले भी सामने आते हैं, जिन में कंपनियाँ आकर्षक ब्याज दर या कुछ समय में धन दोगुना करने की स्कीम का भ्रामक विज्ञापन देती हैं और उपभोक्ता उन के जाल में फँस कर नुकसान उठाता है।
कई बार एक ही फ्लैट 2-2 लोगों को आवंटित कर दिया जाता है और असली हकदार को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
कई बार बैंक बिना कारण ग्राहक का अकाउंट फ्रीज़ कर देते हैं, जिस की वजह से ग्राहक को वित्तीय लेनदेन में कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
शब्दार्थ-
क्लेम- दावा
जिलास्तर- ज़िले के स्तर पर
उपभोक्ता संरक्षण आयोग– उपभोक्ताओं की शिकायत सुनने वाली संस्था
न्याय की गुहार– न्याय की माँग
राज्य स्तर- प्रदेश के स्तर पर
राष्ट्रीय- देश स्तर का
ध्यान रहे- याद रखें
अधिकारों का हनन- अधिकारों का उल्लंघन
पीड़ित- जिसके साथ गलत हुआ हो
वकील- अधिवक्ता
पैरवी- अपना पक्ष रखना
बीपीएल (बिलो पावर्टी लाइन)- गरीबी रेखा से नीचे
फीस- शुल्क
लेबल / स्टिकर- चिपकाया गया काग़ज़
बाज़ार भाव- बाजार की सही कीमत
एमआरपी- अधिकतम खुदरा मूल्य
प्रयोग- उपयोग
उल्लंघन- नियम या अधिकार तोड़ना
आकर्षक- लुभावना
भ्रामक विज्ञापन– भ्रम में डालने वाला इश्तिहार
जाल में फँसना– धोखे में आ जाना
आवंटित- दिया जाना
हकदार- अधिकार वाला व्यक्ति
अकाउंट फ्रीज़– खाता बंद कर देना
वित्तीय लेनदेन- पैसों का लेन-देन
व्याख्या- इस गद्यांश में लेखिका उपभोक्ता को यह समझाती हैं कि उसे अपनी शिकायत किस स्तर पर और कैसे दर्ज करनी चाहिए। लेखिका बताती हैं कि यदि उपभोक्ता का नुकसान ₹20 लाख तक का है, तो उसे जिले के उपभोक्ता संरक्षण आयोग में शिकायत करनी चाहिए। यदि नुकसान ₹20 लाख से अधिक है, तो शिकायत राज्य उपभोक्ता संरक्षण आयोग में दर्ज कराई जाती है। और यदि नुकसान ₹1 करोड़ से अधिक का है, तो राष्ट्रीय उपभोक्ता संरक्षण आयोग में न्याय की गुहार लगाई जाती है। इससे उपभोक्ता को यह स्पष्ट जानकारी मिलती है कि उसे अपने मामले के अनुसार सही जगह पर शिकायत करनी चाहिए।
लेखिका यह भी स्पष्ट करती हैं कि उपभोक्ता को अपने अधिकारों के हनन के दो वर्ष के भीतर ही शिकायत दर्ज करानी चाहिए। यदि समय सीमा निकल जाती है, तो शिकायत स्वीकार नहीं की जाती। अच्छी बात यह है कि अधिकतर मामलों में उपभोक्ता को वकील रखने की आवश्यकता नहीं होती। वह स्वयं भी अपनी बात उपभोक्ता फोरम में रख सकता है। इसके अलावा जो उपभोक्ता गरीबी रेखा से नीचे आते हैं, यानी बीपीएल कार्डधारक होते हैं, उन्हें शिकायत दर्ज करने के लिए किसी प्रकार की फीस भी नहीं देनी होती।
इसके बाद लेखिका कुछ आम उदाहरण देकर उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन को समझाती हैं। कई बार दुकानदार किसी सामान पर लेबल या स्टिकर लगाकर उसे तय मूल्य से अधिक कीमत पर बेचता है। यह उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है। यदि रेलवे स्टेशन, ट्रेन, हवाई अड्डे या बस स्टैंड पर कोई सामान एमआरपी से ज्यादा कीमत पर बेचा जाता है, तो उपभोक्ता उसके खिलाफ शिकायत कर सकता है।
लेखिका यह भी बताती हैं कि कुछ कंपनियाँ लोगों को लालच देने के लिए अधिक ब्याज या कम समय में पैसा दोगुना करने जैसी योजनाओं का झूठा प्रचार करती हैं। लोग इन भ्रामक विज्ञापनों में फँसकर अपना पैसा खो देते हैं। इसी तरह कई बार एक ही फ्लैट दो लोगों को बेच दिया जाता है, जिससे असली खरीदार को लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई बार बैंक बिना कोई ठोस कारण बताए ग्राहक का खाता फ्रीज़ कर देते हैं, जिससे उसे पैसों के लेन-देन में भारी परेशानी होती है। ये सभी स्थितियाँ उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन के उदाहरण हैं, जिनके खिलाफ उपभोक्ता आवाज़ उठा सकता है।
पाठ– उपभोक्ता अगर सचेत रहें और सामान खरीदते समय निम्न बातों का ध्यान रखें तो ठगी का शिकार होने से बच सकते हैं-
- उपभोक्ता केवल वही उत्पाद खरीदे जिस पर एगमार्क का लोगो हो। अगर एगमार्क वाले उत्पाद की गुणवत्ता सही नहीं पाई जाती, तो उत्पादक का लाइसेंस रद्द हो सकता है।
- उत्पाद खरीदते समय उत्पाद पर बैच नंबर या लौट नंबर भी अवश्य जाँच लें।
- पैकिंग की तारीख, उत्पाद का वज़न, किस तारीख से पहले प्रयोग उचित रहेगा, अवश्य देखें। इस के अलावा उत्पादक का नाम व पता भी अवश्य देखें।
- अधिकांश उपभोक्ता वैट बचाने के चक्कर में बिल न लेने के लिए तैयार हो जाते हैं। यही वजह होती है कि उन के पास खरीदी गई वस्तु का प्रमाण नहीं होता और वे शिकायत करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाते।
- इसलिए कोई भी सामान खरीदते समय बिल लेना न भूलें।
- उत्पाद विज्ञापन के आधार पर लेने की बजाय उस की गुणवत्ता परख कर लें।
- उत्पाद खरीदते समय ध्यान रखें कि पैकेट खुले व फटे न हों।
- उत्पाद के साथ मिलने वाले गारंटी / वारंटी कार्ड पर दुकानदार के हस्ताक्षर अवश्य करवा लें।
उपभोक्ता अगर चाहे तो इंटरनैट के ज़रिए कोर सेंटर में भी शिकायत कर सकता है। इस के लिए उपभोक्ता consumerhelpline.gov.in पर लॉग इन कर के कंप्लेंट रजिस्ट्रेशन पर एक क्लिक द्वारा अपनी शिकायत दर्ज करवा सकता है। शिकायत दर्ज होने के बाद उपभोक्ता को ऑनलाइन ही शिकायत क्रमांक प्राप्त हो जाता है और 72 घंटे के भीतर ही आगे की कार्यवाही संपादित की जाती है। दूसरे पक्ष को 14 दिन के भीतर उपभोक्ता की शिकायत दूर करने के निर्देश दिए जाते हैं। उपभोक्ता को ईमेल के जरिए संपादित कार्यवाही से भी अवगत कराया जाता है।
उपभोक्ता नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन नंबर 1800114000, 1915 पर भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। यह टोलफ्री नंबर है, जिस पर 9 बजे से 5.30 बजे तक शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
शब्दार्थ-
सचेत- सावधान, जागरूक
शिकार होना- फँस जाना
उत्पाद– वस्तु, सामान
एगमार्क- गुणवत्ता की सरकारी मुहर
लोगो- चिह्न
गुणवत्ता- स्तर, अच्छाई
उत्पादक- बनाने वाला
लाइसेंस- अनुमति पत्र
रद्द- समाप्त
बैच नंबर / लॉट नंबर– उत्पादन की पहचान संख्या
उचित- सही
वैट- कर (टैक्स)
प्रमाण- सबूत
दिशा में आगे बढ़ना– कदम उठाना
परखना- जाँच करना
पैकेट- डिब्बा
गारंटी / वारंटी- निश्चित समय तक सेवा या मरम्मत का आश्वासन
इंटरनैट– ऑनलाइन माध्यम
कोर सेंटर- सहायता केंद्र
लॉग इन- प्रवेश करना
कंप्लेंट रजिस्ट्रेशन– शिकायत दर्ज करना
शिकायत क्रमांक– शिकायत का नंबर
कार्यवाही- की जाने वाली प्रक्रिया
संपादित- पूरी की गई
निर्देश- आदेश
अवगत कराया जाना– जानकारी दी जाना
नेशनल कंज्यूमर हेल्पलाइन– उपभोक्ताओं की सहायता के लिए राष्ट्रीय फोन सेवा
टोलफ्री– निःशुल्क कॉल
दर्ज कराना- लिखवाना
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखिका उपभोक्ताओं को सावधान और जागरूक रहने की सलाह देती हैं, ताकि वे ठगी और धोखाधड़ी से बच सकें। लेखिका कहती हैं कि यदि उपभोक्ता सामान खरीदते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखें, तो वे आसानी से धोखे का शिकार होने से बच सकते हैं। सबसे पहले उपभोक्ता को वही खाद्य उत्पाद खरीदने चाहिए, जिन पर एगमार्क का निशान लगा हो। एगमार्क यह संकेत देता है कि उत्पाद की गुणवत्ता जाँची गई है। यदि एगमार्क वाला उत्पाद खराब पाया जाता है, तो उत्पादक के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो सकती है और उसका लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है।
सामान खरीदते समय उपभोक्ता को पैकेट पर लिखा बैच नंबर या लॉट नंबर भी जरूर देखना चाहिए, क्योंकि इससे उत्पाद की पहचान होती है। इसके साथ ही पैकिंग की तारीख, वजन, और किस तारीख तक उस वस्तु का उपयोग सुरक्षित है, यह भी जाँचना बहुत जरूरी है। उपभोक्ता को उत्पाद बनाने वाली कंपनी का नाम और पता भी अवश्य देखना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर संपर्क किया जा सके।
लेखिका यह भी बताती हैं कि बहुत से लोग थोड़ा पैसा बचाने के लिए बिल नहीं लेते। बाद में यही आदत उनके लिए परेशानी बन जाती है, क्योंकि बिना बिल के यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि सामान कहाँ से खरीदा गया था। इसलिए उपभोक्ता को हमेशा बिल लेना चाहिए। इसके अलावा केवल विज्ञापनों को देखकर सामान नहीं खरीदना चाहिए, बल्कि उसकी गुणवत्ता खुद जाँच लेनी चाहिए। पैकेट खुला या फटा हुआ न हो, इस बात का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए।
यदि किसी सामान के साथ गारंटी या वारंटी कार्ड मिलता है, तो उस पर दुकानदार के हस्ताक्षर जरूर करवाने चाहिए, ताकि भविष्य में किसी समस्या पर उसका लाभ मिल सके। लेखिका आगे बताती हैं कि आज के समय में उपभोक्ता इंटरनेट के माध्यम से भी आसानी से शिकायत दर्ज कर सकता है। इसके लिए वह सरकार की वेबसाइट consumerhelpline.gov.in पर जाकर ऑनलाइन शिकायत कर सकता है। शिकायत दर्ज होने के बाद उपभोक्ता को एक शिकायत नंबर मिलता है और 72 घंटे के अंदर ही उस पर कार्रवाई शुरू हो जाती है। संबंधित पक्ष को 14 दिन के भीतर ही समस्या हल करने के निर्देश दिए जाते हैं और उपभोक्ता को ईमेल के माध्यम से पूरी जानकारी दी जाती है।
इसके अलावा उपभोक्ता राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के टोलफ्री नंबर 1800114000, 1915 पर फोन करके भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। यह सुविधा 9 बजे से 5.30 बजे तक उपलब्ध रहती है। इस प्रकार लेखिका उपभोक्ताओं को यह संदेश देती हैं कि थोड़ी सी सतर्कता और जानकारी से उपभोक्ता अपने अधिकारों की रक्षा कर सकता है और धोखाधड़ी से बच सकता है।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘कैसे बचें उपभोक्ता धोखाधड़ी से’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। श्रीमती ललिता गोयल द्वारा लिखित इस कहानी का उद्देश्य उपभोक्ताओं को जागरूक बनाना है ताकि वे रोज़मर्रा की जिंदगी में होने वाली ठगी और धोखाधड़ी से बच सकें। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।