बचेंद्री पाल पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 16 “Bachendri Pal” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
बचेंद्री पाल सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 16 Bachendri Pal Summary with detailed explanation of the lesson “Bachendri Pal” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 16 बचेंद्री पाल पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 बचेंद्री पाल पाठ के बारे में जानते हैं।
Bachendri Pal (बचेंद्री पाल)
बचेंद्री ने एवरेस्ट विजय की अपनी पर्वतारोहण-यात्रा को स्वयं लिखा है। प्रस्तुत पाठ उनके उसी विवरण में से लिया गया है। इस पाठ में इन्होंने अपनी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा और पर्वतारोहण की यात्रा को प्रस्तुत किया है।
Related:
बचेंद्री पाल पाठ सार Bachendri Pal Summary
‘बचेंद्री पाल’ यात्रा वृत्तांत पर्वतारोही बचेंद्री पाल द्वारा लिखा गया है। इसमें लेखिका ने अपनी एवरेस्ट विजय अभिमान की यात्रा का रोचक वर्णन किया है। इसमें इन्होंने अपनी सम्पूर्ण जीवन यात्रा तथा पर्वतारोहण यात्रा का वर्णन किया है। बचेंद्री पाल बताती हैं कि उनका जन्म 24 मई, 1954 को हुआ था। बचेंद्री पाल को पता था कि गढ़वाल में यदि किसी के घर लड़की पैदा हो तो उसे बोझ माना जाता था। इसलिए बचेंद्री पाल ने बचपन से ही यह निश्चय कर लिया था कि वे परिवार में किसी से भी पीछे नहीं रहेगी। बचेंद्री पाल अपने परिवार के लड़कों से भी बड़ा कुछ करना चाहती थी। वह एक बहुत बड़ी स्वप्न देखने वाली लड़की थी। उन्होंने कभी किसी चीज़ को अपनी पहुँच से बाहर नहीं समझा। जब वे सिर्फ दस साल की थी तभी से वे जंगलों और पहाड़ी ढलानों पर अक्सर अकेली घूमा करती थी। बसंत के दिनों में वे उन दूसरे स्थानों से आए पक्षियों के झुंडों को देखने के लिए चुपचाप घर से बाहर निकल जाती थी। उनका परिवार बहुत गरीब था और कम से कम आवश्यकताओं को पूरा करने में भी असमर्थ था। बचेंद्री पाल हर तरह की बाहरी खेलों में विशेषता प्राप्त करना चाहती थी, खास कर के लड़कों के साथ होने वाली प्रतियोगिताओं में वे सभी से अच्छा करने का प्रयास करती थी। बचेंद्री पाल पढ़ाई में भी काफी अच्छी थी, लेकिन खेल-कूद में वे और भी ज्यादा अच्छी थी। जिन-जिन खेलों में बचेंद्री पाल ने भाग लिया, अधिकतर खेलों में वे प्रथम रहती थी और मैदान में खेले जाने वाले खेलों जैसे कि गोला फेंक, डिस्क फेंक व लम्बी दौड़ में भी उन्होंने अनेक कप जीते थे। जब बचेंद्री पाल ने आठवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी, तभी उनके पिता ने कह दिया था कि वे अब बचेंद्री पाल को स्कूल भेजने का खर्च सहन नहीं कर सकते और अब बचेंद्री पाल को घर के काम में मदद करनी चाहिए। बचेंद्री पाल ने अपने मन में ऊँची शिक्षा प्राप्त करने का निश्चय कर लिया था, इसलिए वे दिन के समय में न केवल अपने हिस्से का, बल्कि उससे कहीं अधिक घर का काम करती थी और अपने मित्रों से स्कूल की किताबें उधार लेकर देर रात तक बैठकर पढ़ाई भी करती थी। उनके इस तीव्र उत्साह और पक्के इरादे को देखकर हर आदमी उनसे प्रभावित हो जाता था। और अंत में उनके माता और बहन कमला ने उनके पिता से उन्हें आगे पढ़ाने की वकालत की और बचेंद्री पाल को नौवीं कक्षा में प्रवेश लेने की अनुमति मिल गई। बचेंद्री पाल ने सिलाई का काम भी सीख लिया और सलवार-कमीज के सूट सिलकर हर दिन पाँच से छह रुपये भी कमाने लगी।बचेंद्री पाल का प्रथम उद्देश्य उच्च शिक्षा प्राप्त करना था। इसलिए उन्होंने पर्वतों पर चढ़ने की अपनी इच्छा को अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक रोककर रखा। जब बचेंद्री पाल ने एम.ए., बी.एड. कर लिया तब उन्होंने अपने आपको पर्वतों पर चढ़ने के लिए पूरी तरह से सौंप दिया। घर में खाली बैठने की बदले उन्होंने नेहरू संस्थान के प्रारंभिक पर्वतारोही कोर्स में प्रवेश के लिए निवेदन किया। और उन्हें वहां प्रवेश मिल भी गया। उन्होंने चट्टान, बरफ और हिम पर चढ़ने की और अधिक उच्च तकनीकें सीखीं। अधिक ऊँचाई के रूप में बचेंद्री पाल ने, ‘ब्लैक पीक’ अथवा ‘काला नाग-6387 मीटर की चढ़ाई की। बचेंद्री पाल को सिखाने वाले उन्हें बहुत अधिक प्रोत्साहन देते थे और कहते थे कि उनके अंदर एक अच्छे पर्वतारोही के सभी लक्षण हैं। बचेंद्री पाल ने जब सुना कि ‘इंडियन माउन्टेनियरिंग फाउंडेशन’ (आई.एम.एफ.) ने 1984 में होने वाले एवरेस्ट अभियान के लिए आयोजित जाँच शिविर के लिए उन्हें चुना है तो अपने आप को और मजबूत बनाने के लिए घास चारे और सूखी लकड़ी के भारी से भारी गट्ठर घर लाना, रोज़ आने-जाने का रास्ता बदलना, अधिक कठिन और खराब रास्तों और घाटियों से होकर निकलना और जानबूझ कर पत्थरों के ऊपर से चलना शामिल कर दिया। इसके अलावा वे सीधी खड़ी ढलाऊ चट्टानों से उतरती थी जिससे कि वे और अधिक संतुलन प्राप्त कर सकें, और अपने ऊँचाई के डर को निकाल सकें। बचेंद्री पाल के इन सभी क्रियाकलापों का एकमात्र उद्देश्य एक सच्चा कुशल पर्वतारोही बनना था। एक बार तेनजिंग ने हँसते हुए उनसे कहा था कि वे एक पक्की पर्वतीय लड़की लगती हैं, उन्हें तो शिखर पर पहले ही प्रयास में पहुँच जाना चाहिए। उनके ये शब्द ही बचेंद्री पाल के साथी बन गए। मई 1984 तक शिखर पर चढ़ने की योजना को शुरू करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। उन्हें 8 मई को साउथ कोल पहुँचकर 9 मई को चोटी पर पहुँचने का प्रयास करना था। 9 मई को उन्होंने सुबह सात बजे शिखर कैंप से चलना शुरू किया। और 16 मई को सुबह आठ बजे तक वे कैंप II (दूसरे कैंप) तक पहुँच गये थे। शिखर पर उन्हें चढ़ाई करने के लिए बरफ काटने के कुदाल का इस्तेमाल करना पड़ा। दो घंटे से कम समय में ही वे शिखर कैंप पर पहुँच गये। 23 मई, 1984 के दिन दोपहर के 1 बजकर सात मिनट पर बचेंद्री पाल एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचने वाली वे प्रथम भारतीय महिला थी। बचेंद्री पाल अपने घुटनों के बल बैठी, बरफ पर अपने माथे को लगाकर उन्होंने उस आकाश के माथे (सिर) या स्वर्ग के शिखर माउंट एवरेस्ट के ताज का चुंबन लिया। बिना उठे ही उन्होंने अपने थैले से दुर्गा माँ का चित्र और हनुमान चालीसा निकाला। उन्हें लाल कपड़े में लपेटा छोटी-सी-पूजा-अर्चना की और अपने गले के कफ (स्कार्फ) को हवा में लहराया। ख़ुशी के उस पल में बचेंद्री पाल को अपने माता-पिता का ध्यान आया। वह उठी, उन्होंने अपने हाथ जोड़े और अंग दोरजी के प्रति आदर भाव से झुकी। अंग दोरजी ने बचेंद्री पाल को गले से लगाया और कहा कि वे बचेंद्री पाल के लिए बहुत खुश हैं। बचेंद्री पाल ने शिखर पर 43 मिनट व्यतीत किये। बचेंद्री पाल का बचपन का वह सपना की वह कुछ बड़ा करके दिखाएगी, पूरा हो गया और अब वे संतुष्ट हैं और अब वे इससे ज्यादा अपनी जिंदगी में और कुछ नहीं चाहती।
बचेंद्री पाल पाठ व्याख्या Bachendri Pal Explanation
पाठ – मेरा जन्म 24 मई, 1954 को हुआ था। गढ़वाल में लड़की होने का क्या अर्थ है, यह मैं जानती हूँ। बचपन से ही मैंने निश्चय कर लिया था कि. मैं परिवार में किसी से पीछे नहीं रहूँगी और न केवल वह करूँगी जो लड़के करते थे, वरन् उनसे अच्छा करके दिखाऊँगी।
मैं एक बहुत बड़ी स्वप्नदृष्टा थी। मैंने कभी नहीं सोचा था कि कोई चीज़ मेरी पहुँच से बाहर है। दस साल की आयु में ही मैं जंगलों और पहाड़ी ढलानों पर प्रायः अकेली घूमा करती थी। प्रकृति के साथ मेरे खुलाब ने मुझे निडर और स्वतंत्र बना दिया था। बसंत के दिनों में मैं उन प्रवासी पक्षियों के झुंडों को देखने के लिए चुपचाप घर से बाहर निकल जाती थी जो सर्दियों में मैदानों में रहते थे।
मेरा परिवार बहुत गरीब था और न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करने में भी असमर्थ था। मेरे माता-पिता इस बात से दुखी थे कि उनके बच्चे ऐसे सपनों की दुनिया में रहते थे जो कभी साकार नहीं हो सकते। लेकिन परिवार के छोटे सदस्य मेरी कल्पनाओं में बहुत आनंद लेते थे और मुझे प्रेरित करते रहते थे। मैं उनसे कहती थी, “इंतज़ार करो, मैं तुम्हें सब कुछ करके दिखा दूँगी।”
शब्दार्थ –
गढ़वाल – उत्तराखंड का एक पहाड़ी भू-भाग
स्वप्नदृष्टा – स्वप्न देखने वाला
खुलाब – खुलापन
निडर – जो किसी से न डरे
प्रवासी – दूसरे स्थान का निवासी
न्यूनतम – कम से कम
व्याख्या – बचेंद्री पाल अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि उनका जन्म 24 मई, 1954 को हुआ था। उन्हें इसकी जानकारी थी कि गढ़वाल में यदि लड़की हो तो उसका क्या अर्थ होता है अर्थात बचेंद्री पाल को पता था कि गढ़वाल में यदि किसी के घर लड़की पैदा हो तो उसे बोझ माना जाता था। इसलिए बचेंद्री पाल ने बचपन से ही यह निश्चय कर लिया था कि वे परिवार में किसी से भी पीछे नहीं रहेगी और जो लड़के करते थे वह केवल वही नहीं करेगी, बल्कि उनसे भी अच्छा करके दिखाएगी। अर्थात बचेंद्री पाल अपने परिवार के लड़कों से भी बड़ा कुछ करना चाहती थी।
बचेंद्री पाल बताती हैं कि वह एक बहुत बड़ी स्वप्न देखने वाली लड़की थी। उन्होंने कभी किसी चीज़ को अपनी पहुँच से बाहर नहीं समझा। जब वे सिर्फ दस साल की थी तभी से वे जंगलों और पहाड़ी ढलानों पर अक्सर अकेली घूमा करती थी। प्रकृति के साथ उनके ऐसे खुलेपन ने उन्हें निडर और स्वतंत्र बना दिया था। बसंत के दिनों में वे उन दूसरे स्थानों से आए पक्षियों के झुंडों को देखने के लिए चुपचाप घर से बाहर निकल जाती थी जो सर्दियों में मैदानों में रहते थे और बसंत में उनके पहाड़ी इलाकों में आ जाते थे।
बचेंद्री पाल बताती है कि उनका परिवार बहुत गरीब था और कम से कम आवश्यकताओं को पूरा करने में भी असमर्थ था। उनके माता-पिता इस बात से बहुत दुखी रहते थे कि उनके बच्चे ऐसे सपनों की दुनिया में रहते थे जिन्हें वे गरीबी के कारण कभी पूरा नहीं कर सकते थे। लेकिन परिवार के छोटे सदस्य बचेंद्री पाल की कल्पनाओं में बहुत आनंद लेते थे और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहते थे। बचेंद्री पाल उनसे अक्सर कहती थी कि वे इंतज़ार करे, वे उन्हें सब कुछ करके दिखा देगी।

पाठ – मैं हर तरह की बाहरी क्रीड़ा में विशिष्टता हासिल करना चाहती थी, विशेष रूप से लड़कों के साथ होने वाली प्रतियोगिताओं में। मैं दौड़ की वार्षिक प्रतियोगिताओं जैसे कि तीन टैगड़ी, सुई-धागे वाली दौड़, बोरा दौड़ तथा सिर पर पानी भरा मटका रखकर होने वाली दौड़ आदि का अभ्यास प्रतियोगिताओं के शुरू होने से पहले पूरे परिश्रम से करती थी। मैं पढ़ाई में काफी अच्छी थी, लेकिन खेल-कूद में और भी बेहतर। जिन-जिन खेलों में मैंने भाग लिया, अधिकांश में प्रथम रही और मैदानी खेलों जैसे कि गोला फेंक, डिस्क फेंक व लम्बी दौड़ में अनेक कप जीते।
मैं लगभग तेरह वर्ष की थी और आठवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी, तभी मेरे पिता ने कहा कि वे अब मुझे स्कूल में भेजने का खर्च बर्दाश्त नहीं कर सकते और अब मुझे घर के काम में मदद करनी चाहिए। मैंने अपने मन में ऊँची शिक्षा प्राप्त करने का निश्चय कर लिया था, इसलिए मैं दिन के समय न केवल अपने हिस्से का, बल्कि उससे कहीं अधिक घर का काम करती थी और अपने मित्रों से स्कूल की किताबें उधार लेकर देर रात तक बैठकर अध्ययन करती थी। मेरे तीव्र उत्साह और दृढ़ संकल्प को देखकर हर आदमी प्रभावित था। और अंत में मेरी माता और बहन कमला ने मेरे पिता से मुझे आगे पढ़ाने की वकालत की और मुझे नौवीं कक्षा में दाखिला लेने की अनुमति मिल गई। मैंने सिलाई का काम सीख लिया और सलवार-कमीज के सूट सिलकर पाँच से छह रुपये प्रतिदिन कमाने लगी।
शब्दार्थ –
क्रीड़ा – खेल
विशिष्टता – विशेषता
बेहतर – अच्छा
अधिकांश – ज्यादातर
बर्दाश्त – सहन करने की शक्ति
तीव्र – तेज़
दृढ़ संकल्प – पक्का इरादा
व्याख्या – बचेंद्री पाल बताती हैं कि वे हर तरह की बाहरी खेलों में विशेषता प्राप्त करना चाहती थी, खास कर के लड़कों के साथ होने वाली प्रतियोगिताओं में वे सभी से अच्छा करने का प्रयास करती थी। वे दौड़ की वार्षिक प्रतियोगिताओं में जैसे कि तीन टैगड़ी, सुई-धागे वाली दौड़, बोरा दौड़ तथा सिर पर पानी भरा मटका रखकर होने वाली दौड़ आदि का अभ्यास प्रतियोगिताओं के शुरू होने से पहले ही पूरे परिश्रम से करना शुरू कर देती थी। बचेंद्री पाल पढ़ाई में भी काफी अच्छी थी, लेकिन खेल-कूद में वे और भी ज्यादा अच्छी थी। जिन-जिन खेलों में बचेंद्री पाल ने भाग लिया, अधिकतर खेलों में वे प्रथम रहती थी और मैदान में खेले जाने वाले खेलों जैसे कि गोला फेंक, डिस्क फेंक व लम्बी दौड़ में भी उन्होंने अनेक कप जीते थे।
बचेंद्री पाल जब लगभग तेरह वर्ष की थी और आठवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की थी, तभी उनके पिता ने कह दिया था कि वे अब बचेंद्री पाल को स्कूल में भेजने का खर्च सहन नहीं कर सकते और अब बचेंद्री पाल को घर के काम में मदद करनी चाहिए। बचेंद्री पाल ने अपने मन में ऊँची शिक्षा प्राप्त करने का निश्चय कर लिया था, इसलिए वे दिन के समय में न केवल अपने हिस्से का, बल्कि उससे कहीं अधिक घर का काम करती थी और अपने मित्रों से स्कूल की किताबें उधार लेकर देर रात तक बैठकर पढ़ाई भी करती थी। उनके इस तीव्र उत्साह और पक्के इरादे को देखकर हर आदमी उनसे प्रभावित हो जाता था। और अंत में उनके माता और बहन कमला ने उनके पिता से उन्हें आगे पढ़ाने की वकालत की और बचेंद्री पाल को नौवीं कक्षा में प्रवेश लेने की अनुमति मिल गई। बचेंद्री पाल ने सिलाई का काम भी सीख लिया और सलवार-कमीज के सूट सिलकर हर दिन पाँच से छह रुपये भी कमाने लगी।
पाठ – उच्च शिक्षा प्राप्त करना मेरा प्रथम उद्देश्य था। इसलिए मैंने पर्वतारोहण की अपनी इच्छा को रोककर रखा। जब मैंने एम.ए., बी.एड. कर लिया तब मैंने अपने आपको पर्वतारोहण के लिए पूरी तरह समर्पित कर दिया।
घर में खाली बैठने की बजाय मैंने नेहरू संस्थान के प्रारंभिक पर्वतारोही कोर्स में प्रवेश के लिए आवेदन किया। मुझे प्रवेश मिल गया और मैंने वहाँ बरफ और चट्टानों पर चढ़ने के तरीकों का अध्ययन किया और रैपलिंग’ के रोमांच का अनुभव किया। रैपलिंग का अर्थ है – ऊँची चट्टान अथवा हिमखंड से एक नाईलौन की रस्सी के सहारे कुछ ही क्षणों में नीचे आना।
हमने चट्टान, बरफ और हिम पर चढ़ने की और अधिक उच्च तकनीकें सीखीं। हमें अभियान को आयोजित करने का भी प्रशिक्षण दिया गया। अधिक ऊँचाई के रूप में मैंने, ‘ब्लैक पीक’ अथवा ‘काला नाग-6387 मीटर की चढ़ाई की।
इस कोर्स में भी मुझे ‘ए’ ग्रेड मिला और अभियानों में भाग लेने के लिए मेरी संस्तुति की गई। मेरे प्रशिक्षक बहुत अधिक प्रोत्साहन देने वाले थे और कहते थे मेरे अंदर अच्छे पर्वतारोही के लक्षण हैं।
शब्दार्थ –
उद्देश्य – लक्ष्य
पर्वतारोहण – पर्वतों पर चढ़ना
समर्पित – खुद को सौंप देना
बजाय – बदले में
आवेदन – निवेदन, प्रार्थना करना
प्रशिक्षण – नियमित रूप से दी जानेवाली व्यावहारिक शिक्षा, ट्रेनिंग
संस्तुति – प्रशंसा
व्याख्या – बचेंद्री पाल का प्रथम उद्देश्य उच्च शिक्षा प्राप्त करना था। इसलिए उन्होंने पर्वतों पर चढ़ने की अपनी इच्छा को अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक रोककर रखा। जब बचेंद्री पाल ने एम.ए., बी.एड. कर लिया तब उन्होंने अपने आपको पर्वतों पर चढ़ने के लिए पूरी तरह से सौंप दिया।
घर में खाली बैठने की बदले उन्होंने नेहरू संस्थान के प्रारंभिक पर्वतारोही कोर्स में प्रवेश के लिए निवेदन किया। और उन्हें वहां प्रवेश मिल भी गया और उन्होंने वहाँ बरफ और चट्टानों पर चढ़ने के तरीकों का अध्ययन किया और रैपलिंग’ अर्थात ऊँची चट्टान अथवा हिमखंड से एक नाईलौन की रस्सी के सहारे कुछ ही क्षणों में नीचे आने के रोमांच का अनुभव किया।
उन्होंने चट्टान, बरफ और हिम पर चढ़ने की और अधिक उच्च तकनीकें सीखीं। उन्हें वहां अभियान को आयोजित करने की नियमित रूप से दी जाने वाली व्यावहारिक शिक्षा भी दी गई। अधिक ऊँचाई के रूप में बचेंद्री पाल ने, ‘ब्लैक पीक’ अथवा ‘काला नाग-6387 मीटर की चढ़ाई की।
इस कोर्स में भी बचेंद्री पाल को ‘ए’ ग्रेड मिला और अभियानों में भाग लेने के लिए उनकी प्रशंसा की गई। बचेंद्री पाल को सिखाने वाले उन्हें बहुत अधिक प्रोत्साहन देते थे और कहते थे कि उनके अंदर एक अच्छे पर्वतारोही के सभी लक्षण हैं।
पाठ – जब मैंने सुना कि ‘इंडियन माउन्टेनियरिंग फाउंडेशन’ (आई.एम.एफ.) ने 1984 में होने वाले एवरेस्ट अभियान के लिए आयोजित जाँच शिविर के लिए मुझे चुना है तो मैं जैसे एक बदली हुई इंसान बन गई। अपने आप को मजबूत बनाने के लिए मैं घास चारे और सूखी लकड़ी के भारी से भारी गट्ठर घर लाने लगी। मैं रोज़ आने-जाने का रास्ता भी बदल देती थी। मैं अधिक दुर्गम रास्तों और घाटियों से होकर निकलती और जानबूझ कर पत्थरों के ऊपर से चलती अथवा सीधी खड़ी ढलाऊ चट्टानों से उतरती जिससे कि मैं बेहतर संतुलन प्राप्त कर सकूँ, ऊँचाई के डर को निकाल सकूँ। मेरे सभी क्रियाकलापों का एकमात्र उद्देश्य एक सच्चा दक्ष पर्वतारोही बनना था।
एक बार तेनजिंग ने हँसते हुए मुझसे कहा था कि “तुम एक पक्की पर्वतीय लड़की लगती हो, तुम्हें तो शिखर पर पहले ही प्रयास में पहुँच जाना चाहिए।” ये शब्द ही मेरे साथी बने।
मई 1984 तक आरोहण योजना को शुरू करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। हमें 8 मई को साउथ कोल पहुँचकर 9 मई को चोटी पर पहुँचने का प्रयास करना था। 9 मई को हमने प्रात: सात बजे शिखर कैंप से प्रस्थान किया।
16 मई को प्रातः आठ बजे तक हम कैंप II तक पहुँच गये थे। मैंने अगले दिन की महत्वपूर्ण चढ़ाई की तैयारी शुरू कर दी।
सुबह 6:20 पर जब अंग दोरजी और मैं साउथ कोल से बाहर निकले तो दिन ऊपर चढ़ आया था। हल्की-हल्की हवा चल रही थी लेकिन ठंड भी बहुत अधिक थी। मैं अपने आरोही उपस्कर में काफी सुरक्षित और गरम थी। हमने बगैर रस्सी के ही चढ़ाई की। अंग दोरजी एक निश्चित गति से ऊपर चढ़ते गए और मुझे उनके साथ चलने में कोई कठिनाई। नहीं हुई।
शब्दार्थ –
दुर्गम – कठिन
आरोहण – चढ़ना
प्रस्थान – जाना, रवानगी, कूच
आरोही – चढ़ने या ऊपर जाने वाला
उपस्कर – घर का सामान, सामग्री, उपकरण या रसद
व्याख्या – बचेंद्री पाल ने जब सुना कि ‘इंडियन माउन्टेनियरिंग फाउंडेशन’ (आई.एम.एफ.) ने 1984 में होने वाले एवरेस्ट अभियान के लिए आयोजित जाँच शिविर के लिए उन्हें चुना है तो वे जैसे एक बदली हुई इंसान बन गई। अपने आप को और मजबूत बनाने के लिए वे घास चारे और सूखी लकड़ी के भारी से भारी गट्ठर घर लाने लगी। वे रोज़ अपने आने-जाने का रास्ता भी बदल देती थी। वे अधिक कठिन और खराब रास्तों और घाटियों से होकर निकलती थी और जानबूझ कर पत्थरों के ऊपर से चलती थी। इसके अलावा वे सीधी खड़ी ढलाऊ चट्टानों से उतरती थी जिससे कि वे और अधिक संतुलन प्राप्त कर सकें, और अपने ऊँचाई के डर को निकाल सकें। बचेंद्री पाल के इन सभी क्रियाकलापों का एकमात्र उद्देश्य एक सच्चा कुशल पर्वतारोही बनना था।
एक बार तेनजिंग ने हँसते हुए उनसे कहा था कि वे एक पक्की पर्वतीय लड़की लगती हैं, उन्हें तो शिखर पर पहले ही प्रयास में पहुँच जाना चाहिए। उनके ये शब्द ही बचेंद्री पाल के साथी बन गए।
मई 1984 तक शिखर पर चढ़ने की योजना को शुरू करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी। उन्हें 8 मई को साउथ कोल पहुँचकर 9 मई को चोटी पर पहुँचने का प्रयास करना था। 9 मई को उन्होंने सुबह सात बजे शिखर कैंप से चलना शुरू किया। और 16 मई को सुबह आठ बजे तक वे कैंप II (दूसरे कैंप) तक पहुँच गये थे। वहां पहुँचते ही उन्होंने अगले दिन की महत्वपूर्ण चढ़ाई की तैयारी शुरू कर दी थी।
सुबह 6:20 पर जब अंग दोरजी और बचेंद्री पाल साउथ कोल से बाहर निकले तो दिन ऊपर चढ़ आया था। हल्की-हल्की हवा चल रही थी लेकिन ठंड भी बहुत अधिक थी। बचेंद्री पाल अपने शिखर पर चढ़ने में सहायक उपकरणों के साथ काफी सुरक्षित और गरम थी। उन्होंने बिना रस्सी के ही चढ़ाई की। अंग दोरजी एक निश्चित गति से ऊपर चढ़ते गए और बचेंद्री पाल बताती हैं कि उन्हें उनके साथ चलने में कोई कठिनाई नहीं हुई। कहने का आशय यह है कि बचेंद्री पाल के पहले के किए गए अभ्यासों के कारण उन्हें अंग दोरजी के साथ चढ़ाई करने में कोई कठिनाई नहीं हो रही थी।
पाठ – जमी हुई बरफ की सीधी व डलाऊ चट्टानें इतनी सख्त और भुरभुरी थीं मानो शीशे की चादरें बिछी हों। हमें बरफ काटने के फावड़े का इस्तेमाल करना पड़ा और मुझे बड़ी सख्ती से फावड़ा चलाना पड़ा जिससे कि उस जमी हुई बरफ की धरती को फावड़े के दाँत काट सकें।
दो घंटे से कम समय में ही हम शिखर कैंप पर पहुँच गये। अंग दोरजी ने पीछे मुड़कर देखा और मुझसे कहा कि क्या मैं थक गई हूँ? मैंने जवाब दिया, “नहीं” जिसे सुनकर वे बहुत। अधिक आश्चर्यचकित और आनंदित हुए। उन्होंने कहा कि पहले वाले दल ने तो शिखर कैंप पर पहुँचने में चार घंटे लगाये थे और यदि इसी गति से चलते रहे तो हम शिखर पर दोपहर 1 बजे तक पहुँच जाएंगे।
मेरी सांस मानो रुक गई थी। मुझे लगा कि सफलता बहुत नजदीक है। 23 मई, 1984 के दिन दोपहर के 1 बजकर सात मिनट पर मैं एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचने वाली मैं प्रथम भारतीय महिला थी।
मैं अपने घुटनों के बल बैठी, बरफ पर अपने माथे को लगाकर मैंने सागरमाथे के ताज का चुंबन लिया। बिना उठे ही मैंने अपने थैले से दुर्गा माँ का चित्र और हनुमान चालीसा निकाला। उन्हें लाल कपड़े में लपेटा छोटी-सी-पूजा-अर्चना की और कफ में हवा दिया।
आनंद के उस क्षण में मुझे अपने माता-पिता का ध्यान आया। मैं उठी, मैंने अपने हाथ जोड़े और अंग दोरजी के प्रति आदर भाव से झुकी। उन्होंने मुझे गले से लगाया और कहा, “मैं बहुत खुश हूँ।”
हमने शिखर पर 43 मिनट व्यतीत किये। लहोत्से, नुपत्से और नकाचू जैसी विशाल पर्वत श्रेणियाँ अब हमारे पर्वत के सामने बौनी लग रही थीं। मैंने चोटी के समीप एक छोटे-से खुले स्थान से पत्थरों के कुछ नमूने एकत्र किए और अपनी वापिसी यात्रा शुरू कर दी।
मुझे पर्वतारोहण में श्रेष्ठता के लिए, भारतीय पर्वतारोहण संघ का प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक तथा अन्य अनेक सम्मान और पुरस्कार प्रदान किये गये। पद्मश्री और प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार की भी घोषणा की गई।
एवरेस्ट चढ़ाई से मेरी हार्दिक इच्छाओं की पूर्ति हुई है और मुझे वह सभी कुछ मिला है जो मेरे पास है। मैं इससे अधिक कुछ नहीं चाहती।
शब्दार्थ –
रोमांच – रोंगटे खड़े होना
फावड़ा – कुदाल
सागरमाथा – आकाश का माथा (सिर), स्वर्ग का शिखर, और यह नेपाल में माउंट एवरेस्ट का नेपाली नाम है
व्याख्या – बचेंद्री पाल बताती हैं कि शिखर पर जमी हुई बरफ की सीधी व डलाऊ चट्टानें इतनी सख्त और भुरभुरी थीं कि ऐसा लग रहा था जैसे मानो शिखर पर शीशे की चादरें बिछी हुई हों। उन्हें चढ़ाई करने के लिए बरफ काटने के कुदाल का इस्तेमाल करना पड़ा और बचेंद्री पाल को बड़ी सख्ती से कुदाल चलाना पड़ा जिससे कि उस जमी हुई बरफ की धरती को कुदाल के दाँत काट सकें।
दो घंटे से कम समय में ही वे शिखर कैंप पर पहुँच गये। अंग दोरजी ने जब पीछे मुड़कर देखा और बचेंद्री पाल से पूछा कि क्या वह थक गई हैं तब बचेंद्री पाल ने जवाब में नहीं कहा और उनका जवाब सुनकर अंग दोरजी बहुत अधिक आश्चर्यचकित और खुश हो गए थे। उन्होंने बताया कि उनसे पहले वाले दल ने तो शिखर कैंप पर पहुँचने में चार घंटे लगाये थे और यदि वे इसी गति से चलते रहे तो वे शिखर पर दोपहर 1 बजे तक पहुँच जाएंगे।
यह सुनकर बचेंद्री पाल की सांस मानो रुक गई थी। क्योंकि उन्हें सफलता बहुत नजदीक लग रही थी। 23 मई, 1984 के दिन दोपहर के 1 बजकर सात मिनट पर बचेंद्री पाल एवरेस्ट की चोटी पर खड़ी थी। एवरेस्ट की चोटी पर पहुँचने वाली वे प्रथम भारतीय महिला थी।
बचेंद्री पाल अपने घुटनों के बल बैठी, बरफ पर अपने माथे को लगाकर उन्होंने उस आकाश के माथे (सिर) या स्वर्ग के शिखर माउंट एवरेस्ट के ताज का चुंबन लिया। बिना उठे ही उन्होंने अपने थैले से दुर्गा माँ का चित्र और हनुमान चालीसा निकाला। उन्हें लाल कपड़े में लपेटा छोटी-सी-पूजा-अर्चना की और अपने गले के कफ (स्कार्फ) को हवा में लहराया।
ख़ुशी के उस पल में बचेंद्री पाल को अपने माता-पिता का ध्यान आया। वह उठी, उन्होंने अपने हाथ जोड़े और अंग दोरजी के प्रति आदर भाव से झुकी। अंग दोरजी ने बचेंद्री पाल को गले से लगाया और कहा कि वे बचेंद्री पाल के लिए बहुत खुश हैं।
बचेंद्री पाल ने शिखर पर 43 मिनट व्यतीत किये। लहोत्से, नुपत्से और नकाचू जैसी विशाल पर्वत श्रेणियाँ अब माउंट एवरेस्ट पर्वत के सामने बौनी लग रही थीं। बचेंद्री पाल ने चोटी के समीप एक छोटे-से खुले स्थान से पत्थरों के कुछ नमूने एकत्र किए और अपनी वापिसी यात्रा शुरू कर दी।
बचेंद्री पाल को पर्वतारोहण में श्रेष्ठता के लिए, भारतीय पर्वतारोहण संघ का प्रतिष्ठित स्वर्ण पदक तथा अन्य अनेक सम्मान और पुरस्कार प्रदान किये गये। पद्मश्री और प्रतिष्ठित अर्जुन पुरस्कार की भी घोषणा की गई।
बचेंद्री पाल मानती हैं कि एवरेस्ट चढ़ाई से उनकी हार्दिक इच्छाओं की पूर्ति हुई है और उन्हें वह सभी कुछ मिला है जो उनके पास अभी मौजूद है। बचेंद्री पाल इससे अधिक कुछ नहीं चाहती। अर्थात बचेंद्री पाल का बचपन का वह सपना की वह कुछ बड़ा करके दिखाएगी, पूरा हो गया और अब वे संतुष्ट हैं और अब वे इससे ज्यादा अपनी जिंदगी में और कुछ नहीं चाहती।
Conclusion
बचेंद्री ने एवरेस्ट विजय की अपनी पर्वतारोहण-यात्रा को स्वयं लिखा है। प्रस्तुत पाठ उनके उसी विवरण में से लिया गया है। इस पाठ में इन्होंने अपनी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा और पर्वतारोहण की यात्रा को प्रस्तुत किया है। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 16 ‘बचेंद्री पाल’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।