महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 14 “Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 14 Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra Summary with detailed explanation of the lesson “Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 14 महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा पाठ के बारे में जानते हैं।
Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra (महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा)
(प्रो० हरमहेन्द्र सिंह बेदी)
प्रो० हरमहेन्द्र सिंह बेदी द्वारा लिखित इस पाठ में ‘महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा’ के जीवन और बलिदान को बताया है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। इस निबंध में मदन लाल ढींगरा की सच्ची देशभक्ति, निडर स्वभाव और आत्मबल का प्रभावशाली चित्रण किया गया है। लेखक ने बताया है कि किस प्रकार उनके साहसिक कार्य ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा दी। यह पाठ पाठकों में देशप्रेम, आत्मविश्वास और निर्भीकता की भावना जगाता है।
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महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा पाठ सार Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra Summary
इस अध्याय में महान देशभक्त मदन लाल ढींगरा के जीवन, विचारों और बलिदान का सरल और प्रेरक वर्णन किया गया है। इसमें बताया गया है कि भारत को अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्त कराने के लिए अनेक वीरों ने अपने प्राण न्योछावर किए। पंजाब की धरती ने ऐसे अनेक साहसी सपूत दिए, जिनमें मदन लाल ढींगरा का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है। लेखक का मानना है कि भारतीय स्वतंत्रता की जो छोटी-सी चिंगारी थी, उसे आग में बदलने का काम मदन लाल ढींगरा जैसे क्रांतिकारियों ने किया। उनका जीवन सच्ची देशभक्ति, निडरता और आत्मबल का उदाहरण है, जो विद्यार्थियों और युवाओं को साहस और आत्मविश्वास की प्रेरणा देता है।
मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 सितम्बर 1883 को पंजाब में एक संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता साहिब गुरदित्ता मल एक सिविल सर्जन थे। परिवार में सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी मदन लाल बचपन से ही देश के लिए कुछ करने का सपना देखते थे। वे हर बात को सोच-समझकर, तर्क के आधार पर स्वीकार करते थे। उनके स्वभाव में आत्मविश्वास और दृढ़ता शुरू से ही दिखाई देती थी। यद्यपि उनके परिवार में देशभक्ति की कोई विशेष परंपरा नहीं थी, फिर भी उनका मन पूरी तरह राष्ट्रप्रेम से भरा हुआ था।
लाहौर कॉलेज में पढ़ते समय उनकी देशभक्ति खुलकर सामने आई। अँग्रेजी शासन के प्रति उनके विचार कॉलेज प्रशासन को पसंद नहीं आए, जिसके कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। कॉलेज छोड़ने के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने जीवन यापन के लिए मजदूरी की, रिक्शा और टांगा तक चलाया, लेकिन अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया। उनके परिवार में केवल उनके बड़े भाई ही उन्हें समझते और उनका साथ देते थे। बड़े भाई की सहायता से ही मदन लाल उच्च शिक्षा के लिए सन् 1906 में इंग्लैंड गए।
इंग्लैंड जाकर उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। यह उनके जीवन का एक नया मोड़ था। वहाँ कुछ भारतीय राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने भी उनकी आर्थिक मदद की। लंदन में रहते हुए उनका संपर्क विनायक दामोदर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा जैसे महान राष्ट्रवादियों से हुआ। इन लोगों के विचारों ने मदन लाल के मन में देशभक्ति की भावना को और भी मजबूत कर दिया। सावरकर ने उन्हें ‘अभिनव भारत’ नामक क्रांतिकारी संस्था से जोड़ा और हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिलाया। वे ‘इंडिया हाउस’ में रहते थे, जहाँ भारतीय छात्रों में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार होता था।
उसी समय कई भारतीय क्रांतिकारियों को अँग्रेज सरकार ने फाँसी दे दी। इन घटनाओं ने मदन लाल ढींगरा के मन में अँग्रेजों के प्रति गहरा आक्रोश पैदा किया। उन्हें लगता था कि अँग्रेज अधिकारी निर्दोष भारतीयों पर अत्याचार कर रहे हैं और देश को गुलामी में जकड़े हुए हैं। इसी भावना के कारण उन्होंने एक साहसिक कदम उठाने का निश्चय किया।
1 जुलाई 1909 को लंदन में एक सार्वजनिक समारोह आयोजित हुआ, जिसमें कर्जन वायली नामक अँग्रेज अधिकारी भी आया। मदन लाल ढींगरा ने उसे भारतीयों के अत्याचार का प्रतीक माना। केवल 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने कर्जन वायली को गोली मार दी। यह घटना उनकी निडरता और देशप्रेम का प्रतीक बन गई। उन्होंने भागने की कोशिश नहीं की, बल्कि शांत भाव से अपने कृत्य की जिम्मेदारी स्वीकार की। यह घटना अँग्रेज सरकार के लिए एक स्पष्ट संदेश थी कि भारतीय अब अपनी आज़ादी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
मदन लाल ढींगरा ने खुले रूप से अदालत में कहा कि उन्हें गर्व है कि वे अपना जीवन भारत माता को समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि हर देशवासी को अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र कराने का अधिकार है। उन्होंने यह भी विश्वास जताया कि भारत के सुनहरे दिन आने वाले हैं और देश अवश्य स्वतंत्र होगा। उनके शब्दों में डर नहीं, बल्कि आत्मबल और विश्वास झलकता था।
17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटोबिले जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। उनकी शहादत ने न केवल भारतीयों को, बल्कि अन्य देशों के लोगों को भी प्रभावित किया। आयरलैंड के लोग उनकी हिम्मत की सराहना करते थे, क्योंकि वे स्वयं भी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे थे। कई महान नेताओं और विचारकों ने उनकी शहादत को नमन किया और कहा कि ऐसे बलिदान ही किसी देश को आज़ाद कराते हैं।
अँग्रेज सरकार ने उनकी देह को लावारिस बताकर दफना दिया, लेकिन वर्षों बाद उनकी अस्थियाँ भारत लाई गईं और उन्हें मातृभूमि का सम्मान मिला। मदन लाल ढींगरा का जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची देशभक्ति निडरता, त्याग और आत्मविश्वास से जन्म लेती है। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अमर अध्याय है, जो आज भी हमें देश के लिए ईमानदारी और साहस के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा पाठ व्याख्या Mahan Rashtrabhakt: Madan lal Dhingra Explanation
पाठ– भारतीय स्वतंत्रता की चिंगारी को अग्नि में बदलने का श्रेय महान शहीद मदन लाल ढींगरा को जाता है। मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 सितम्बर 1883 में पंजाब में एक सम्पन्न परिवार में हुआ। उनके पिता साहिब गुरदित्ता मल गुरदासपुर में सिविल सर्जन थे। सेवामुक्त होकर वे अमृतसर में रहने लगे।

मदन लाल शुरू से ही स्वतंत्रता प्रेमी थे। हर बात को वह तर्क के तराजू में तोल कर देखते थे। बचपन की कई ऐसी घटनाएँ मदन लाल ढींगरा के आत्मविश्वास को अभिव्यक्त करती हैं। भले ही मदन के परिवार में राष्ट्रभक्ति की कोई ऐसी परम्परा नहीं थी परन्तु वह खुद शुरू से ही देशभक्ति के रंग में रंगे गए थे। लाहौर कॉलेज में पढ़ते हुए उन्हें देशभक्ति के कारण कॉलेज छोड़ना पड़ा। कॉलेज छोड़कर उन्होंने कई धंधे किए, जिनमें कारखाने की मज़दूरी तथा अपना गुजारा करने के लिए रिक्शा और टांगा तक चलाना भी शामिल है। घर में केवल उनके बड़े भैया ही उनकी बात को सुनते व समझते थे। बड़े भैया के कारण ही वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए सन् 1906 में इंग्लैंड चले गए। वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में यांत्रिकी अभियांत्रिकी (मकैनिकल इंजीनियरिंग) में दाखिला ले लिया। यह मदन लाल ढींगरा के जीवन का नया मोड़ था। भाई की सहायता के बिना यह सब संभव न था । विदेश में रहकर अध्ययन करने में उनके बड़े भाई ने तो उनकी मदद की ही परंतु इसके साथ-साथ इंग्लैंड में रह रहे कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्त्ताओं ने भी उनकी आर्थिक सहायता की।
शब्दार्थ-
स्वतंत्रता– आज़ादी
चिंगारी– आग का एक छोटा कण या टुकड़ा
अग्नि- आग
श्रेय- अधिकार, यश
शहीद– देश के लिए प्राण देने वाला वीर
सम्पन्न- खुशहाल
सिविल सर्जन- सरकारी अस्पताल का वरिष्ठ डॉक्टर
सेवामुक्त- नौकरी से निवृत्त (रिटायर)
स्वतंत्रता प्रेमी– आज़ादी से प्रेम करने वाला
तर्क– सोच-विचार, कारण के आधार पर विचार
तराजू में तोलना– ठीक से जाँच-परख करना
अभिव्यक्त– प्रकट
राष्ट्रभक्ति- देश से प्रेम
परम्परा- रीति-रिवाज़, चली आ रही प्रथा
देशभक्ति के रंग में रंगे– पूरी तरह देशप्रेम में डूबे हुए
धंधे– काम-काज, रोज़गार
मज़दूरी– मेहनत का काम
गुजारा- जीवन चलाने का साधन
रिक्शा / टांगा- सवारी ढोने के साधन
उच्च शिक्षा– बड़ी पढ़ाई, आगे के पढ़ाई
यांत्रिकी अभियांत्रिकी (मकैनिकल इंजीनियरिंग)– मशीनों से संबंधित इंजीनियरिंग की पढ़ाई
दाखिला– प्रवेश, नाम लिखवाना
विदेश– अपने देश से बाहर का देश
अध्ययन- पढ़ाई
राष्ट्रवादी कार्यकर्ता– देश की आज़ादी के लिए काम करने वाला व्यक्ति
आर्थिक सहायता– पैसों से मदद
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक ने महान देशभक्त मदन लाल ढींगरा के जीवन के प्रारंभिक चरण और उनके स्वभाव का वर्णन किया है। लेखक कहता है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की जो छोटी-सी शुरुआत थी, उसे एक प्रचंड आंदोलन का रूप देने का श्रेय मदन लाल ढींगरा को जाता है। उनका जन्म 18 सितम्बर 1883 को पंजाब के एक संपन्न परिवार में हुआ। उनके पिता साहिब गुरदित्ता मल गुरदासपुर में सिविल सर्जन थे और सेवानिवृत्ति के बाद अमृतसर में रहने लगे।
मदन लाल बचपन से ही स्वतंत्रता प्रेमी थे। वे हर बात को सोच-समझकर और तर्क के आधार पर स्वीकार करते थे। उनके जीवन की कई घटनाएँ यह दिखाती हैं कि उनमें आत्मविश्वास कूट-कूटकर भरा था। यद्यपि उनके परिवार में देशभक्ति की कोई विशेष परंपरा नहीं थी, फिर भी वे स्वयं पूरी तरह राष्ट्रप्रेम से रंगे हुए थे।
लाहौर कॉलेज में पढ़ते समय उनकी देशभक्ति खुलकर सामने आई, जिसके कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। कॉलेज छोड़ने के बाद उन्होंने कठिन परिश्रम करके जीवन यापन किया। उन्होंने कारखाने में मजदूरी की और यहाँ तक कि रिक्शा और टांगा भी चलाया, लेकिन अपने देशभक्ति के विचारों से कभी पीछे नहीं हटे। उनके परिवार में केवल उनके बड़े भाई ही उनकी भावनाओं को समझते थे और उनका साथ देते थे।
बड़े भाई की सहायता से ही मदन लाल ढींगरा सन् 1906 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड गए। वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया। यह उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था। बड़े भाई के सहयोग के बिना यह संभव नहीं था। इसके अलावा इंग्लैंड में रह रहे कुछ भारतीय राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने भी उनकी आर्थिक सहायता की।
पाठ – लंदन में मदन लाल ढींगरा भारत के प्रखर राष्ट्रवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर तथा श्याम जी कृष्ण वर्मा के संपर्क में आए। इन्होंने उनके संपर्क में आने पर जहाँ अपने को गौरवान्वित महसूस किया वहीं सावरकर तथा श्याम जी कृष्ण वर्मा भी मदन लाल ढींगरा की देशभक्ति से प्रभावित हुए। कहा जाता है कि सावरकर ने ही मदन लाल को ‘अभिनव भारत’ नामक क्रांतिकारी संस्था का सदस्य बनाया और उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी दिया। लंदन में श्याम जी कृष्ण वर्मा के संरक्षण में भारतीय छात्रों में राष्ट्रवादी विचारों के प्रचार के लिए ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना गयी। मदन लाल ‘इडिया हाउस’ में ही रहते थे। उन दिनों खुदीराम बोस, कन्हैया लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रांतिकारियों को अंग्रेज़ों ने मृत्युदंड दे दिया। इन घटनाओं ने मदन लाल ढींगरा और सावरकर जैसे देशभक्तों के मन में अंग्रेजों के प्रति नफ़रत और बदले की भावना को जन्म दिया।
1 जुलाई, 1909 को ‘भारतीय राष्ट्रीय संस्था’ के सदस्य (इनमें अंग्रेज भी सदस्य थे) वार्षिक दिवस मनाने के लिए एकत्र हुए। इसी समारोह में कर्जन वायली भी परिवार समेत आया। वह उस समय ‘स्टेट ऑफ इंडिया’ का सचिव सलाहकार था। मदन लाल ढींगरा ऐसे अधिकारियों से नफरत करते थे। मदन लाल ढींगरा का मानना था कि ऐसे नीच अधिकारियों ने हजारों भारतीयों को केवल गुलाम ही नहीं बनाया बल्कि बिना किसी कारण के मौत के घाट उतारा है। 22 वर्ष के नौजवान ने अपनी जेब से पिस्टल निकाला और कर्जन वायली को सात गोलियों से वहीं ढेर कर दिया। मदन लाल ढींगरा सच्चे देशभक्त थे। वे भागे नहीं बल्कि बड़े आराम से अपना चश्मा ठीक करते हुए उन्होंने भरी सभा में अपने देशभक्त होने का साक्ष्य दिया।
शब्दार्थ-
प्रखर– अत्यंत तेज, प्रभावशाली
राष्ट्रवादी नेता- देश की आज़ादी और हितों के लिए कार्य करने वाला नेता
संपर्क में आना- मिलना, संबंध होना
गौरवान्वित– महिमा से युक्त
प्रभावित– असर पड़ना
अभिनव– बिल्कुल नया।
क्रांतिकारी– देश की आज़ादी के लिए सशस्त्र संघर्ष करने वाला
संस्था- संगठन
सदस्य– किसी संगठन से जुड़ा व्यक्ति
प्रशिक्षण– सिखलाई, ट्रेनिंग
संरक्षण– देखरेख
प्रचार– फैलाना
स्थापना– किसी चीज़ को स्थापित करना, बनाना
इंडिया हाउस– लंदन में भारतीय राष्ट्रवादियों का केंद्र
मृत्युदंड– फाँसी की सज़ा
वार्षिक दिवस– सालाना समारोह
एकत्र हुए- इकट्ठा हुए
समारोह– उत्सव, आयोजन
सचिव सलाहकार- उच्च पदाधिकारी, परामर्श देने वाला अधिकारी
नीच– दुष्ट, अत्याचारी
गुलाम बनाना– पराधीन करना
मौत के घाट उतारना– मार देना
नौजवान– युवा
पिस्टल– छोटी बंदूक
ढेर कर दिया- मार गिराया
साक्ष्य– सबूत
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक ने बताया है कि लंदन में रहते हुए मदन लाल ढींगरा का संपर्क भारत के महान राष्ट्रवादी नेताओं विनायक दामोदर सावरकर और श्याम जी कृष्ण वर्मा से हुआ। इन दोनों नेताओं से मिलकर मदन लाल को बहुत गर्व महसूस हुआ और दूसरी ओर सावरकर तथा श्याम जी कृष्ण वर्मा भी मदन लाल की गहरी देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। कहा जाता है कि सावरकर ने ही मदन लाल को ‘अभिनव भारत’ नामक क्रांतिकारी संगठन का सदस्य बनाया और उन्हें हथियार चलाने का प्रशिक्षण दिया, ताकि वे देश की आज़ादी के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष कर सकें।
श्याम जी कृष्ण वर्मा के संरक्षण में लंदन में ‘इंडिया हाउस’ की स्थापना की गई थी, जहाँ भारतीय छात्रों को राष्ट्रवादी विचारों से जोड़ने का काम होता था। मदन लाल ढींगरा भी वहीं रहते थे। उसी समय कई भारतीय क्रांतिकारियों को अँग्रेज सरकार ने फाँसी की सज़ा दी। इन घटनाओं से मदन लाल ढींगरा और सावरकर जैसे देशभक्तों के मन में अँग्रेजों के अत्याचारों के प्रति गहरा आक्रोश और बदले की भावना पैदा हो गई।
आगे लेखक बताता है कि 1 जुलाई 1909 को ‘भारतीय राष्ट्रीय संस्था’ का वार्षिक समारोह आयोजित किया गया, जिसमें अँग्रेज सदस्य भी शामिल थे। इसी सभा में कर्जन वायली अपने परिवार के साथ आया। वह उस समय ‘स्टेट ऑफ इंडिया’ का सचिव सलाहकार था। मदन लाल ढींगरा ऐसे अँग्रेज अधिकारियों से घृणा करते थे, क्योंकि उनका मानना था कि इन्हीं अधिकारियों ने हजारों भारतीयों को गुलाम बनाया और बिना किसी कारण के मरवा दिया। इसी सोच के कारण केवल 22 वर्ष की आयु में मदन लाल ढींगरा ने साहस दिखाते हुए अपनी जेब से पिस्टल निकाली और कर्जन वायली को गोली मार दी।
इस घटना के बाद मदन लाल ढींगरा भागे नहीं। वे शांत भाव से खड़े रहे और अपना चश्मा ठीक करते हुए भरी सभा में यह साबित किया कि उन्होंने यह कार्य देशभक्ति की भावना से किया है।
पाठ – 1909 में अंग्रेज़ों के लिए यह पहली साहसपूर्ण चेतावनी थी कि भारतीय अपना देश आजाद करवाना चाहते हैं तथा आज़ादी के लिए हर कीमत चुकाने के लिए तैयार हैं। मदन लाल ढींगरा ने बंग-भंग आंदोलन के समय भी लंदन की गलियों को ‘वंदे मातरम्’ से गुंजाया था। वे अपनी कमीज़ के ऊपर ‘वंदे मातरम्’ लिखकर लंदन के बाजारों में घूमा करते थे। अपनी हर पुस्तक के ऊपर मदन लाल ढींगरा न लिखकर ‘वंदे मातरम्’ लिखा करते थे। मदन लाल ढींगरा उच्च आदशों के स्वामी थे। वे भारतीय संस्कृति के मूल्यों का अनुपालन करना भी खूब जानते थे।
कर्जन वायली की हत्या के आरोप में उन पर 22 जुलाई, 1909 को अभियोग चलाया गया। मदन लाल ढींगरा ने अदालत में बड़े खुले शब्दों में कहा कि ‘मुझे गर्व है कि मैं अपना जीवन भारत माँ को समर्पित कर रहा हूँ। आप याद रखना कि भारत के सुनहरे दिन आने वाले हैं। बहुत जल्दी ही भारत माँ स्वतंत्र होगी।’ उन्होंने कहा कि ‘दुनिया के हर नागरिक को अपनी मातृभूमि स्वतंत्र कराने का अधिकार है। अंग्रेजों को कोई हक नहीं कि वे बिना किसी कारण भारतीयों को गुलाम बनाकर रखें।’
17 अगस्त, 1909 को मदन लाल ढींगरा को पेंटोबिले की जेल, लंदन में फाँसी की सजा दी गई थी। यह वही जेल थी जहाँ शहीद ऊधमसिंह को भी फाँसी दी गयी थी। आयरिश लोगों ने मदन लाल ढींगरा की हिम्मत को सराहा क्योंकि वे खुद इंग्लैंड में रहकर अपनी आज़ादी के लिए जूझ रहे थे। मिस्टर वी. एस. बलंट, जो उस समय इंग्लैंड के मेंबर पालमेंट थे, ने अपने संस्मरणों में लिखा है कि ‘मैंने किसी ईसाई को भी इतने आत्मसम्मान और आत्मबल के साथ न्यायपालिका का सामना करते हुए नहीं देखा।’
शब्दार्थ-
साहसपूर्ण– हिम्मत भरा
चेतावनी- सावधान करने का संकेत
हर कीमत चुकाना– कोई भी बलिदान देने को तैयार होना
बंग-भंग आंदोलन– बंगाल के विभाजन के विरोध में चला आंदोलन
गुंजाया– गूँज पैदा की
वंदे मातरम्- मातृभूमि की वंदना का नारा
उच्च आदर्श– महान विचार और मूल्य
स्वामी– मालिक
भारतीय संस्कृति- भारत की परंपराएँ और सभ्यता
मूल्य- नैतिक सिद्धांत
अनुपालन– रक्षण
आरोप– इल्ज़ाम
अभियोग– मुकद्दमा
अदालत- न्यायालय
गर्व- अहंभाव, घमंड
समर्पित करना– अर्पित करना
सुनहरे दिन- अच्छे और उज्ज्वल समय
स्वतंत्र– आज़ाद
मातृभूमि- जन्मभूमि, देश
अधिकार– हक
जेल- कारागार
हिम्मत– साहस
सराहा– प्रशंसा की
जूझ रहे थे- संघर्ष कर रहे थे
मेंबर पार्लीमैंट– संसद सदस्य
संस्मरण– यादें, स्मृतियाँ
आत्मसम्मान– खुद का सम्मान
आत्मबल– मन की शक्ति
न्यायपालिका- न्याय देने वाली संस्था
व्याख्या- इस गद्याँश में लेखक ने बताया है कि सन् 1909 में मदन लाल ढींगरा का साहसिक कार्य अँग्रेजों के लिए एक कड़ी चेतावनी था। इससे यह स्पष्ट हो गया कि भारतीय अब अपनी आज़ादी के लिए पूरी तरह जाग चुके हैं और स्वतंत्रता पाने के लिए किसी भी तरह का बलिदान देने को तैयार हैं। मदन लाल ढींगरा केवल हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि वे अपने व्यवहार और जीवनशैली से भी देशप्रेम प्रकट करते थे। बंग-भंग आंदोलन के समय उन्होंने लंदन की सड़कों और गलियों में ‘वंदे मातरम्’ का नारा लगाया। वे अपनी कमीज़ पर ‘वंदे मातरम्’ लिखकर बाजारों में घूमते थे और अपनी पुस्तकों पर अपना नाम लिखने के स्थान पर भी ‘वंदे मातरम्’ लिखा करते थे। इससे उनके मन में बसे गहरे राष्ट्रप्रेम का पता चलता है।
मदन लाल ढींगरा उच्च आदर्शों वाले व्यक्ति थे। वे भारतीय संस्कृति और उसके मूल्यों का पूरा सम्मान करते थे और अपने जीवन में उनका पालन भी करते थे। कर्जन वायली की हत्या के आरोप में 22 जुलाई 1909 को उन पर मुकदमा चलाया गया। अदालत में मदन लाल ढींगरा ने बिना किसी डर के साफ शब्दों में कहा कि उन्हें इस बात का गर्व है कि वे अपना जीवन भारत माता को समर्पित कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत के अच्छे दिन आने वाले हैं और बहुत जल्द देश स्वतंत्र होगा। उनके अनुसार दुनिया के हर नागरिक को अपनी मातृभूमि को आज़ाद कराने का अधिकार है और अँग्रेजों को यह अधिकार नहीं कि वे भारतीयों को बिना कारण गुलाम बनाकर रखें।
अंत में लेखक बताता है कि 17 अगस्त 1909 को लंदन की पेंटोबिले जेल में मदन लाल ढींगरा को फाँसी दे दी गई। यह वही जेल थी जहाँ बाद में शहीद ऊधम सिंह को भी फाँसी दी गई। उनकी बहादुरी और आत्मबल से आयरिश लोग भी बहुत प्रभावित हुए, क्योंकि वे स्वयं भी अँग्रेज शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। इंग्लैंड के संसद सदस्य मिस्टर वी. एस. बलंट ने भी उनकी प्रशंसा करते हुए लिखा कि उन्होंने किसी व्यक्ति को इतने आत्मसम्मान और साहस के साथ अदालत का सामना करते हुए कभी नहीं देखा।
पाठ– ढींगरा की महान् शहादत को याद करते हुए लाला हरदयाल ने कहा कि ‘ढींगरा की शहीदी उन राजपूतों और सिक्खों की कुर्बानियों का स्मृति पुंज है जिसके कारण शहादत अमर बन जाती है। अंग्रेज सोचते होंगे कि उन्होंने मदन लाल ढींगरा को फाँसी देकर सदा 1 के लिए स्वतंत्रता की आवाज को दबा दिया है परंतु वास्तविकता यह है कि यही आवाज़ भारत को स्वतंत्र बनाएगी।’ श्रीमती ऐनी बेसेंट ने मदन लाल की शहीदी पर कहा था कि “हमें देश की स्वतंत्रता के लिए अनेक मदन लालों की जरूरत है।” मदन लाल की शहीदी से प्रभावित हो कर वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने उनकी स्मृति में ‘मदन तलवार’ नामक पत्रिका निकाली। बाद में यह पत्रिका क्रांतिकारियों की विचारधारा की संवाहक बनी। 16 अगस्त, 1909 के ‘डेली न्यूज’ समाचारपत्र में मदन लाल ढींगरा का जोशभरा वक्तव्य छपा जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘एक हिन्दू होने के नाते मैं अनुभव करता हूँ कि गुलामी राष्ट्र देवता का अपमान है। राष्ट्र पूजा ही राम और कृष्ण की पूजा है। मैं तब तक बार-बार जन्म लेना चाहूँगा जब तक भारत माँ स्वतंत्र न हो जाए।’
ब्रिटिश सरकार ने मदन लाल ढींगरा की देह को लावारिस करार देकर दफना दिया। वीर सावरकर जी ने ढींगरा की देह को प्राप्त करने के लिए अनथक प्रयत्न किए, परन्तु वे सफल नहीं हुए, क्योंकि सरकार का कहना था कि वे उनके संबंधी नहीं हैं। कई वर्षों बाद जब 13 दिसम्बर, 1976 को महान शहीद ऊधम सिंह की अस्थियाँ भारत लाई गईं, उसी समय मदन लाल ढींगरा की अस्थियों को भी मातृभूमि का स्नेह प्राप्त हुआ।
शब्दार्थ-
महान् शहादत– देश के लिए दिया गया सर्वोच्च बलिदान
शहीदी/ शहादत- देश के लिए प्राण त्याग
स्मृति पुंज– यादों का समूह
कुर्बानी– बलिदान
अमर– जो कभी न मरे, सदा जीवित रहने वाला
स्वतंत्रता की आवाज़– आज़ादी की पुकार
दबा दिया– समाप्त कर दिया
वास्तविकता- सच्चाई
स्वतंत्र बनाएगी– आज़ाद करेगी
आवश्यकता– ज़रूरत
प्रभावित- असर
स्मृति में- याद में
पत्रिका– नियमित रूप से निकलनेवाली पुस्तिका
विचारधारा- सोच, विचारों की दिशा
संवाहक– आगे ले जाने वाली
जोशभरा- उत्साह से भरा हुआ
वक्तव्य- कथन
अनुभव– महसूस
राष्ट्र देवता– राष्ट्र को ईश्वर के समान मानना
अपमान– बेइज्जती, तिरस्कार
राष्ट्र पूजा– देश की भक्ति
देह– शरीर
लावारिस– जिसका कोई दावा न करे
करार देना– घोषित करना
दफना दिया– मिट्टी में दबा देना
अनथक– बिना थके
प्रयत्न- प्रयास
संबंधी– रिश्तेदार
अस्थियाँ– हड्डियाँ
स्नेह- प्रेम
व्याख्या- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक ने मदन लाल ढींगरा की शहादत के महत्त्व और उसके प्रभाव का वर्णन किया है। लाला हरदयाल ने उनकी शहादत को याद करते हुए कहा कि ढींगरा का बलिदान राजपूतों और सिखों की महान कुर्बानियों की याद दिलाता है, जिनके कारण शहादत अमर हो जाती है। उनका मानना था कि अँग्रेज यह सोचते होंगे कि मदन लाल ढींगरा को फाँसी देकर उन्होंने स्वतंत्रता की आवाज़ को हमेशा के लिए दबा दिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यही बलिदान आगे चलकर भारत को स्वतंत्र बनाएगा।
महान समाज सुधारक श्रीमती ऐनी बेसेंट ने भी मदन लाल ढींगरा की शहादत की सराहना करते हुए कहा कि देश की आज़ादी के लिए हमें मदन लाल जैसे अनेक साहसी युवाओं की आवश्यकता है। उनकी शहादत से प्रेरित होकर वीरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने उनकी स्मृति में ‘मदन तलवार’ नामक पत्रिका शुरू की। आगे चलकर यह पत्रिका क्रांतिकारियों के विचारों और देशभक्ति की भावना को फैलाने का माध्यम बनी।
लेखक यह भी बताता है कि 16 अगस्त 1909 के ‘डेली न्यूज’ समाचारपत्र में मदन लाल ढींगरा का जोशीला वक्तव्य प्रकाशित हुआ था। उसमें उन्होंने कहा था कि एक हिंदू होने के नाते उन्हें लगता है कि गुलामी राष्ट्र देवता का अपमान है। उनके अनुसार राष्ट्र की पूजा ही राम और कृष्ण की सच्ची पूजा है। उन्होंने यह भी कहा कि वे तब तक बार-बार जन्म लेना चाहेंगे, जब तक भारत माता स्वतंत्र नहीं हो जाती।
अंत में लेखक बताता है कि ब्रिटिश सरकार ने मदन लाल ढींगरा के शव को लावारिस घोषित करके दफना दिया। वीर सावरकर ने उनकी देह को प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन सरकार ने यह कहकर मना कर दिया कि वे उनके रिश्तेदार नहीं हैं। कई वर्षों बाद, 13 दिसम्बर 1976 को, जब शहीद ऊधम सिंह की अस्थियाँ भारत लाई गईं, उसी अवसर पर मदन लाल ढींगरा की अस्थियों को भी मातृभूमि का सम्मान और अपनापन मिला।
Conclusion
इस पोस्ट में ‘महान राष्ट्रभक्त: मदन लाल ढींगरा’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। प्रो० हरमहेन्द्र सिंह बेदी द्वारा लिखित इस पाठ में मदन लाल ढींगरा के जीवन और बलिदान को बताया है, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।