पाजेब पाठ सार

PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 8 “Pajeb” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

पाजेब सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 8 Pajeb Summary with detailed explanation of the lesson “Pajeb” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary

इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड  कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 8 पाजेब पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 पाजेब पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Pajeb (पाजेब)

(जैनेंद्र कुमार)

 

‘पाजेब’ जैनेंद्र कुमार की प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक कहानी है, जिसमें लेखक ने बाल मनोविज्ञान को अत्यंत सूक्ष्मता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। इस कहानी में पाजेब के खो जाने जैसी एक साधारण-सी घटना के माध्यम से बच्चों की मासूम प्रवृत्ति, उनका भय, उनकी सच्चाई और बड़ों की कठोर तथा संदेहपूर्ण मानसिकता को बताया गया है। यह कहानी पाठकों को यह सोचने पर विवश करती है कि बच्चों की ‘अदालत’ में कई बार बड़े ही दोषी सिद्ध होते हैं। 

 

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पाजेब पाठ सार Pajeb Summary

यह कहानी एक साधारण-सी घटना के माध्यम से बच्चों के मनोविज्ञान, बड़ों की सोच, सामाजिक दबाव और अनजाने में होने वाली क्रूरता को बहुत गहराई से उजागर करती है। कहानी का केंद्र एक छोटी-सी चीज़ ‘पाजेब’ है, जो धीरे-धीरे एक बड़े पारिवारिक और सामाजिक संघर्ष का कारण बन जाती है।

कहानी में लेखक का पुत्र आशुतोष एक सीधा-सादा और संवेदनशील बालक है। घर में रखी चाँदी की पाजेब अचानक गायब हो जाती है। पूछने पर आशुतोष यह स्वीकार करता है कि उसने पाजेब अपने मित्र छुन्नू को दी थी ताकि वे उसे बेचकर पतंग खरीद सकें। यह सब बातें सुनकर पिता को गर्व होता है कि उसका बेटा सच बोल रहा है। माँ भी प्रसन्न होकर बच्चे को शाबाशी देती है। लेकिन यह प्रसन्नता अधिक देर तक नहीं टिकती, क्योंकि जब पाजेब वापस लाने की बात आती है, तो मामला उलझने लगता है।

आशुतोष बार-बार यही कहता है कि यदि पाजेब छुन्नू के पास नहीं है तो वह उसे कहाँ से देगा। यह बात पिता को जिद और टालमटोल लगती है। धीरे-धीरे पिता का व्यवहार सख्त होता जाता है। बच्चे से बार-बार पूछताछ की जाती है, डराया जाता है, डाँटा जाता है और यहाँ तक कि उसे मारकर कोठरी में बंद कर दिया जाता है। लेकिन आशुतोष फिर भी साफ़ और स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाता। वह डर और मानसिक दबाव में घिर जाता है। उसका चुप रहना और भ्रमित उत्तर देना पिता को और अधिक क्रोधित करता है।

इसी बीच छुन्नू और उसकी माँ भी इस विवाद में शामिल हो जाते हैं। छुन्नू पहले पाजेब देखने से इंकार करता है, फिर कहता है कि उसने पाजेब आशुतोष के हाथ में देखी थी और वह पतंग वाले को दे दी गई थी। इन सब बातों के कारण छुन्नू की माँ अपने बेटे को बुरी तरह पीटती है और रोते हुए उसे चोर तक कह देती है। पड़ोस की स्त्रियाँ भी इस मामले में अपनी-अपनी राय देने लगती हैं। छोटी-सी बात अब पूरे मोहल्ले की चर्चा बन जाती है।

लेखक इस पूरे घटनाक्रम में खुद को सही साबित करने और पाजेब वापस पाने की जिद में रहता है। वह यह समझ नहीं पाता कि बच्चा सच बोलते हुए भी भय, दबाव और उलझन में पड़ सकता है। वह बार-बार आशुतोष से कठोर प्रश्न करता है, उसे धमकाता है और दूसरों के सामने अपमानित करता है। बच्चे की मासूमियत, उसका डर और उसका मौन लेखक को दिखाई नहीं देता।

अंत में आशुतोष से यह पता चलता है कि पाजेब पतंग वाले को ग्यारह आने में दी गई थी और पाँच आने छुन्नू के पास हैं। यह बात देर से और बहुत प्रयास करने पर आशुतोष से निकलवाई जाती है। लेखक को तब जाकर संतोष होता है, लेकिन तब तक वह बच्चे के मन को गहरी ठेस पहुँचा चुका होता है। आशुतोष बाहर से शांत दिखाई देता है, लेकिन भीतर से वह टूट चुका होता है। पिता की शाबाशी भी उसे प्रसन्न नहीं कर पाती।

कहानी का सबसे मार्मिक मोड़ तब आता है जब अंत में बुआ के माध्यम से यह सच सामने आता है कि पाजेब वास्तव में चोरी हुई ही नहीं थी, बल्कि भूलवश बुआ के साथ चली गई थी। जिस पाजेब के लिए बच्चों को पीटा गया, अपमानित किया गया, पूरे मोहल्ले में हंगामा मचा और रिश्तों में कड़वाहट आई, वह शुरू से ही घर के भीतर सुरक्षित थी। यह सच्चाई लेखक को अंदर तक झकझोर देती है।

यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अक्सर बड़ों की जल्दबाज़ी, अहंकार और संदेह बच्चों के कोमल मन को कितना गहरा नुकसान पहुँचा सकते हैं। लेखक अंत में महसूस करता है कि उसने गुस्से और अधिकार के बल पर जो किया, वह गलत था। बच्चे को सच बोलने के बावजूद सजा मिली और असली दोष किसी का नहीं था, बल्कि बड़ों की असावधानी और अविश्वास ही पूरे संकट का कारण बना।

इस प्रकार यह कहानी केवल एक पाजेब की कहानी नहीं है, बल्कि यह बच्चों की मासूमियत, माता-पिता की जिम्मेदारी और सामाजिक हस्तक्षेप की परीक्षा की कहानी है। लेखक यह संदेश देता है कि बच्चों से व्यवहार करते समय धैर्य, प्रेम और विश्वास सबसे अधिक आवश्यक हैं, क्योंकि डर और हिंसा से सच्चाई सामने नहीं आती, बल्कि रिश्ते टूट जाते हैं।

 

पाजेब पाठ व्याख्या Pajeb Explanation

पाठ – बाज़ार में एक नयी तरह की पाजेब चली है। पैरों में पड़कर वह बड़ी अच्छी मालूम होती हैं। उसकी कड़ियाँ आपस में लचक के साथ जुड़ी रहती हैं कि पाजेब का मानो निज का आकार कुछ नहीं है, जिस पाँव में पड़े उसी के अनुकूल ही रहती हैं।
पास-पड़ोस में तो सब नन्हीं-बड़ी के पैरों में आप वही पाजेब देख लीजिए। एक ने पहनी कि फिर दूसरी ने भी पहनी। देखा-देखी में इस तरह उनका न पहनना मुश्किल हो गया है।
हमारी मुन्नी ने भी कहा कि बाबूजी, हम पाजेब पहनेंगे। बोलिए, भला कठिनाई से चार बरस की उम्र और पाजेब पहनेगी।
मैंने कहा कि कैसी पाजेब ?
बोली कि हाँ, वही जैसी रुकमन पहनती है, जैसी शीला पहनती है।
मैंने कहा कि अच्छा-अच्छा!
बोली कि मैं तो आज ही मँगा लूँगी।
मैंने कहा कि अच्छा, भाई, आज सही।
उस वक्त तो खैर मुन्नी किसी काम में बहल गई। लेकिन जब दोपहर आई मुन्नी की बुआ, तब वह मुन्नी सहज मानने वाली न थी ।
बुआ ने मुन्नी को मिठाई खिलाई और गोद में लिया और कहा कि अच्छा तो तेरी पाजेब अबके इतवार को जरूर लेती आऊँगी।

शब्दार्थ-
पाजेब- नुपूर, पायल
कड़ियाँ- छोटे-छोटे जोड़
लचक- लचीलापन, झुकने की क्षमता
निज- अपना
अनुकूल- अनुसार, जैसा ठीक लगे
पास-पड़ोस आसपास के घर
नन्हीं-बड़ी- छोटी और बड़ी उम्र की
देखा-देखी दूसरों को देखकर
खैर- ठीक है, फिलहाल
सहज आसानी से
अबके इस बार
इतवा रविवार

व्याख्या- इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि कैसे सामाजिक चलन का प्रभाव छोटी-सी बच्ची मुन्नी पर भी पड़ता है। वह भी दूसरों को देखकर पाजेब पहनने की इच्छा प्रकट करती है। लेखक बताता है कि बाज़ार में एक नई तरह की पाजेब चलन में आ गई है, जो पैरों में पहनने पर बहुत सुंदर लगती है। उसकी कड़ियाँ लचीली होती हैं, इसलिए वह किसी निश्चित आकार की न होकर जिस भी पैर में पहनी जाए, उसी के अनुसार ढल जाती है। पास-पड़ोस में छोटी-बड़ी सभी लड़कियों के पैरों में वही पाजेब देखी जा सकती है। एक के पहनते ही दूसरी भी उसे पहनने लगती है और देखते-देखते यह ऐसा चलन बन गया है कि न पहनना मुश्किल हो गया हो।
लेखक आगे बताता है कि चार वर्ष की छोटी बेटी मुन्नी भी अपने पिता से पाजेब पहनने की इच्छा प्रकट करती है। पिता उससे पूछता है कि वह कैसी पाजेब चाहती है। मुन्नी बताती है कि वह वही पाजेब चाहती है, जैसी रुकमन और शीला पहनती हैं। पिता उसकी बात मानने का संकेत देता है। मुन्नी कहती है कि वह आज ही पाजेब मँगा लेगी, जिस पर पिता उसे टालते हुए आज के लिए हाँ कर देता है। उस समय तो मुन्नी किसी काम में लगकर बहल जाती है, लेकिन दोपहर में जब उसकी बुआ आती है, तब मुन्नी अपनी ज़िद पर अड़ी रहती है। बुआ उसे मिठाई खिलाती है, गोद में लेती है और उसे विश्वास दिलाती है कि वह अगले इतवार को उसके लिए पाजेब अवश्य ले आएगी।

 

पाठ – इतवार को बुआ आयी और पाजेब ले आयी। मुन्नी उन्हें पहनकर खुशी के मारे यहाँ-से-वहाँ छुमकती फिरी। रुकमन के पास गयी और कहा-देख रुकमन, मेरी पाजेब। शीला को भी अपनी पाजेब दिखाई। सबने पाजेब पहनी देखकर उसे प्यार किया और तारीफ की। सचमुच, वह चाँदी की सफेद दो-तीन लड़ियाँ-सी टखनों को चारों ओर लिपटकर, चुपचाप बिछी हुई ऐसी सुबड़ लगती थी कि बहुत ही, और बच्ची की खुशी का ठिकाना न था।
और हमारे महाशय आशुतोष, जो मुन्नी के बड़े भाई थे, पहले तो मुन्नी को सजी-धजी देखकर बड़े खुश हुए। वह हाथ पकड़कर अपनी मुन्नी को पाजेब सहित दिखाने के लिए आस-पास ले गये। मुन्नी की पाजेब का गौरव उन्हें अपना भी मालूम होता था। वह खूब हँसे और ताली पीटी, लेकिन थोड़ी देर बाद वह ठुमकने लगे कि मुन्नी को पाजेब दी, सो हम भी बाईसिकिल लेंगे।

शब्दार्थ-
छुमकती उछल-कूद करते हुए चलना
फिरी घूमती रही
लड़ियाँ कड़ियों की पंक्तियाँ
टखना- पिंडली एवं एड़ी के बीच की दोनों ओर उभरी हड्डी
सुघड़ सुडौल, सुंदर
महाशय सम्मानसूचक शब्द
सजी-धजी अच्छे कपड़े और गहनों से सजी हुई
आस-पास- इधर-उधर
गौरव- गर्व, सम्मान
ताली पीटी खुशी प्रकट करने के लिए ताली बजाई
ठुमकने लगे- जिद करने लगे, अकड़ दिखाने लगे
बाईसिकिल साइकिल

व्याख्या- लेखक बताता है कि इतवार को मुन्नी की बुआ आती है और उसके लिए पाजेब लाती है। मुन्नी पाजेब पहनकर अत्यधिक प्रसन्न हो जाती है और खुशी के मारे इधर-उधर छुमकती फिरती है। वह रुकमन के पास जाकर उसे अपनी पाजेब दिखाती है और फिर शीला को भी अपनी पाजेब दिखाती है। सब लोग मुन्नी की पाजेब देखकर उसे प्यार करते हैं और उसकी बहुत तारीफ़ करते हैं। लेखक कहता है कि सचमुच वह चाँदी की सफ़ेद दो-तीन लड़ियों जैसी पाजेब मुन्नी के टखनों के चारों ओर लिपटी हुई बहुत सुंदर और अच्छी बनावट की लगती है। इस कारण मुन्नी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहता।
लेखक आगे बताता है कि मुन्नी के बड़े भाई आशुतोष पहले तो उसे सजी-धजी देखकर बहुत खुश होते हैं। वह मुन्नी का हाथ पकड़कर पाजेब सहित उसे आस-पास घुमाकर दिखाने ले जाता है। मुन्नी की पाजेब को सबको दिखाना आशुतोष को गौरवान्वित लगता है। वे दोनों खूब हँसते हैं और ताली बजाते हैं। लेकिन थोड़ी देर बाद आशुतोष भी ज़िद करने लगता है और कहता है कि जब मुन्नी को पाजेब दी गई है, तो उसे भी अपने लिए साइकिल चाहिए।

 

पाठ – बुआ ने कहा कि अच्छा बेटा अबके जन्म-दिन को तुझे भी बाईसिकिल दिलवाएँगे।
आशुतोष बाबू ने कहा कि हम तो अभी लेंगे।
बुआ ने कहा, “छी-छी तू कोई लड़की है? जिद तो लड़कियाँ किया करती हैं, और लड़कियाँ रोती हैं। कहीं बाबू साहब लोग रोते हैं!”
आशुतोष बाबू ने कहा कि तो हम बाईसिकिल जरूर लेंगे जन्म-दिन वाले रोज। बुआ ने कहा कि हाँ, यह बात पक्की रही जन्म-दिन पर तुमको बाईसिकिल मिलेगी।
इस तरह वह इतवार का दिन हँसी-खुशी से पूरा हुआ। शाम होने पर बच्चों की बुआ ‘चली गयी। पाजेब का शौक घड़ीभर का था। वह फिर उतारकर रख दी गई; जिससे कहीं खो न जाये। पाजेब वह बारीक और सुबुक काम की थी और खासे दाम लग गए थे।
श्रीमती ने हमसे कहा कि क्यों जी लगती तो अच्छी है, मैं भी एक बनवा लूँ।
मैंने कहा कि क्यों न बनवाओ! तुम कौन चार बरस की नहीं हो।
खैर, यह हुआ। पर मैं रात को अपनी मेज पर था कि श्रीमती ने आकर कहा, “तुमने पाजेब तो नहीं देखी”?
मैंने आश्चर्य से कहा कि क्या मतलब?

शब्दार्थ-
अबके इस बार
छी-छी- नापसंदगी या डाँट प्रकट करने का शब्द
हँसी-खुशी आनंदपूर्वक
घड़ीभर का थोड़ी देर का
बारीक- सूक्ष्म
सुबुक हल्का
खासे- अधिक, अच्छे-खासे
आश्चर्य से- हैरानी के साथ

व्याख्या- लेखक बताता है कि बुआ आशुतोष से कहती है कि उसके अगले जन्मदिन पर उसे भी साइकिल दिलवा दी जाएगी। इस पर आशुतोष कहता है कि वह अभी साइकिल लेना चाहता है। तब बुआ उसे समझाती है और कहती है कि वह कोई लड़की नहीं है जो ज़िद करे या रोए, क्योंकि ज़िद करना और रोना लड़कियों का स्वभाव माना जाता है, बाबू साहब लोग ऐसा नहीं करते।
आशुतोष इसके उत्तर में कहता है कि वह साइकिल अवश्य लेगा, लेकिन जन्मदिन के दिन ही। तब बुआ उससे वादा करती है और कहती है कि यह बात पक्की रही कि उसके जन्मदिन पर उसे साइकिल मिलेगी। लेखक बताता है कि इस प्रकार इतवार का दिन हँसी-खुशी में पूरा हो जाता है और शाम को बच्चों की बुआ चली जाती है।
लेखक आगे बताता है कि पाजेब पहनने का शौक थोड़ी देर का ही होता है। बाद में पाजेब उतारकर सुरक्षित रख दी जाती है, ताकि वह कहीं खो न जाए, क्योंकि वह बहुत बारीक और नाज़ुक कारीगरी की होती है और उसके अच्छे दाम चुकाए गए होते हैं। इसके बाद श्रीमती लेखक से कहती हैं कि पाजेब अच्छी लगती है और वह भी अपने लिए एक बनवाना चाहती हैं। लेखक हँसते हुए उत्तर देता है कि क्यों न बनवाएँ, वह कोई चार वर्ष की बच्ची तो नहीं हैं।
अंत में लेखक बताता है कि रात को जब वह अपनी मेज़ पर बैठा होता है, तभी श्रीमती आकर उससे पूछती हैं कि क्या उसने पाजेब देखी है। यह सुनकर लेखक आश्चर्य से पूछता है कि इसका क्या अर्थ है।

 

पाठ – बोली, कि देखो, यहाँ मेज़-वेज़ पर तो नहीं हैं। एक तो है, पर दूसरे पैर की मिलती नहीं है। जाने कहाँ गयी?
मैंने कहा कि जायेगी कहाँ ? यहीं कहीं देख लो। मिल जायेगी।
उन्होंने मेरे मेज़ के कागज़ उठाने-धरने शुरू किये और अलमारी की किताबें टटोल डालने का भी मनसूबा दिखाया।
मैंने कहा कि यह क्या कर रही हो? यहाँ वह कहाँ से आई?
जवाब में वह मुझी से पूछने लगीं कि तो फिर कहाँ है?
मैंने कहा कि तुमने ही तो रक्खी होगी। कहाँ रक्खी थी ?
बतलाने लगी कि मैंने दोपहर के बाद कोई दो बजे उतारकर दोनों को अच्छी तरह सम्भाल कर उस नीचे वाले बॉक्स में रख दी थीं। अब देखा तो एक है, दूसरी गायब है।
मैंने कहा कि तो चलकर वह इस कमरे में कैसे आ जायेगी? भूल हो गयी होगी। एक रखी होगी, एक वहीं-कहीं फर्श पर छूट गयी होगी। देखो, मिल जायेगी। कहीं जा नहीं सकती।
इस पर श्रीमती कहा-सुनी करने लगीं कि तुम तो ऐसे ही हो। खुद लापरवाह हो, दोष उल्टे मुझे देते हो। कह तो रही हूँ कि मैंने दोनों संभाल कर रखी थीं।
मैंने कहा कि संभाल कर रखी थीं, तो फिर यहाँ-वहाँ क्यों देख रही हो? जहाँ रखी श्रीं वहीं से ले लो न। वहाँ नहीं है तो फिर किसी ने निकाली ही होगी।

शब्दार्थ-
मेज़-वेज़- मेज़ आदि जगहें
उठाने-धरने- इधर-उधर हटाने लगना
टटोल डालने ढूँढ़ने लगना, हाथ डालकर देखना
मनसूबा इरादा
रक्खी- रखी
बॉक्स- संदूक, डिब्बा
फर्श- ज़मीन
कहा-सुनी तकरार, बहस
दोष- गलती, आरोप
यहाँ-वहाँ इधर-उधर

व्याख्या- लेखक बताता है कि उनकी पत्नी कहती है कि उसने मेज़ पर देखा है, लेकिन वहाँ पाजेब नहीं है। दो में से एक पाजेब तो मिल जाती है, पर दूसरे पैर की पाजेब नहीं मिलती और वह आशंका व्यक्त करती है कि पता नहीं वह कहाँ चली गई है। इस पर लेखक उसे समझाते हुए कहता है कि पाजेब कहीं नहीं जा सकती और यहीं कहीं मिल जाएगी।
लेखक आगे बताता है कि उनकी पत्नी मेज़ पर रखे काग़ज़ों को उठाने-धरने लगती है और अलमारी की किताबें भी टटोलने का इरादा जताती है। तब लेखक उससे पूछता है कि वह ऐसा क्यों कर रही है और यह भी कहता है कि पाजेब वहाँ कैसे आ सकती है। इसके उत्तर में पत्नी उल्टा उसी से पूछने लगती है कि फिर वह कहाँ है। लेखक बताता है कि वह पत्नी से कहता है कि पाजेब उसी ने रखी होगी और वही बताए कि उसने कहाँ रखी थी। तब पत्नी बताती है कि उसने दोपहर के बाद लगभग दो बजे दोनों पाजेब उतारकर अच्छी तरह संभालकर नीचे वाले बॉक्स में रख दी थीं। अब देखने पर उसे वहाँ केवल एक ही पाजेब मिलती है और दूसरी गायब पाई जाती है
लेखक आगे कहता है कि यदि पाजेब बॉक्स में रखी गई थी, तो वह अपने आप चलकर इस कमरे में नहीं आ सकती। संभव है कोई भूल हो गई हो, एक रखी गई हो और दूसरी वहीं फर्श पर छूट गई हो। वह पत्नी को आश्वस्त करता है कि पाजेब यहीं कहीं मिल जाएगी, क्योंकि वह कहीं जा नहीं सकती।
इस पर पत्नी लेखक से कहा-सुनी करने लगती है और कहती है कि वह हमेशा लापरवाह रहते हैं और उल्टा उसी पर दोष डालती है। वह दोहराती है कि उसने दोनों पाजेब संभालकर ही रखी थीं। तब लेखक उत्तर देता है कि यदि पाजेब संभालकर रखी गई थीं, तो फिर यहाँ-वहाँ ढूँढने की क्या आवश्यकता है। वह कहता है कि जहाँ रखी थीं वहीं से ले लेनी चाहिए और यदि वहाँ नहीं हैं, तो किसी ने उन्हें निकाल लिया होगा।

 

पाठ – श्रीमती बोलीं कि मेरा भी यही ख्याल हो रहा है। हो न हो, बंसी नौकर ने निकाली है। मैंने रखी, तब वह वहाँ मौजूद भी था।
मैंने कहा कि तो उससे पूछा?
बोलीं कि वह तो साफ इंकार करता है।
मैंने कहा, “तो फिर?”
श्रीमती जोर से बोली कि तो फिर मैं क्या बताऊँ? तुम्हें तो किसी बात की फिकर है नहीं। डाँटकर कहते क्यों नहीं। हो, उसी बंसी को बुला कर ? जरूर पाजेब उसी ने ली है?
मैंने कहा कि अच्छा, तो उसे क्या कहना होगा? यह कहूँ कि ला भाई पाजेब दे दे!
श्रीमती झल्लाकर बोलीं कि हो चुका बस कुछ तुमसे। तुम्हीं ने तो उस नौकर को शहजोर बना रखा है। डाँट न फटकार, नौकर ऐसे सिर न चढ़ेगा तो क्या होगा।
बोलीं कि कह तो रही हूँ कि किसी ने उसे बॉक्स में से निकाला ही है। और सोलह में पन्द्रह आने यह बंसी है। सुन रहे हो न वही है ।
मैंने कहा कि मैंने बंसी से पूछा था। उसने नहीं ली मालूम होता है।
इस पर श्रीमती ने कहा कि तुम नौकरों को नहीं जानते। वे बड़े छंटे होते हैं। जरूर बंसी ही चोर है। नहीं तो क्या फरिश्ते लेने आते।

शब्दार्थ-
ख्याल विचार
हो न हो- सम्भव है, अवश्य
मौजूद उपस्थित
साफ इंकार- बिल्कुल मना करना
फिकर चिंता
झल्लाकर गुस्से में
शहजोर बलवान
डाँट-फटकार- सख़्ती से डाँटना
सिर न चढ़ेगा ज़्यादा मनमानी नहीं करेगा
सोलह में पन्द्रह आने- लगभग पूरा विश्वास
छंटे- चालाक
फ़रिश्ता देवदूत

व्याख्या- लेखक बताता है कि उनकी पत्नी कहती है कि उसे भी यही संदेह हो रहा है कि पाजेब बंसी नामक नौकर ने ही निकाली है, क्योंकि जब उसने पाजेब बॉक्स में रखी थी, तब बंसी वहाँ मौजूद था। इस पर लेखक पूछता है कि क्या उससे पूछा गया है। पत्नी बताती है कि बंसी इस बात से साफ़ इनकार करता है। तब लेखक पूछता है कि फिर क्या किया जाए।
उनकी पत्नी ऊँची आवाज़ में कहती है कि वह और क्या बताए, क्योंकि लेखक को किसी बात की चिंता ही नहीं है। वह शिकायत करती है कि लेखक बंसी को बुलाकर डाँटते क्यों नहीं और दृढ़ता से क्यों नहीं कहते कि पाजेब उसी ने ली है। उसके अनुसार पाजेब अवश्य उसी ने चुराई है।

लेखक बताता है कि वह व्यंग्य में कहता है कि फिर उसे क्या कहना होगा। क्या यह कहना होगा कि वह पाजेब वापस कर दे। इस पर पत्नी झुँझलाकर कहती है कि उससे अब कुछ नहीं हो सकता और उसी ने नौकर को सिर पर चढ़ा रखा है। वह यह भी कहती है कि यदि नौकर को डाँट-फटकार न दी जाए, तो वह ज़रूर सिर चढ़ जाता है।

लेखक आगे बताता है कि पत्नी बार-बार दोहराती है कि किसी ने बॉक्स में से पाजेब निकाली ही है और सोलह आने में पंद्रह आने उसे पूरा विश्वास है कि यह काम बंसी ने ही किया है। वह लेखक से यह भी कहती है कि वह उसकी बात सुन रहा है या नहीं और बार-बार उसी पर संदेह जताती है।
लेखक बताता है कि वह कहता है कि उसने बंसी से पूछा है और उसे नहीं लगता कि उसने पाजेब ली है। इस पर पत्नी उत्तर देती है कि लेखक नौकरों को नहीं जानता, वे बहुत चालाक होते हैं और यदि बंसी ने नहीं ली है तो फिर जैसे कोई फरिश्ता आकर ले गया हो, ऐसा तो हो नहीं सकता।

 

पाठ – मैंने कहा कि तुमने आशुतोष से भी पूछा?
बोलीं, पूछा था। वह तो खुद ट्रंक और बॉक्स के नीचे घुस-घुसकर खोज लगाने में मेरी मदद करता रहा है। वह नहीं ले सकता।
मैंने कहा उसे पतंग का बड़ा शौक है।
बोली कि तुम तो उसे बताते-बरजते कुछ हो नहीं। उमर होती जा रही हैं। वह यों ही रह जायेगा। तुम्हीं हो उसे पतंग की शह देने वाले।
मैंने कहा कि जो कहीं पाजेब ही पड़ी मिल गयी हो तो ?
बोलीं कि नहीं, नहीं, नहीं! मिलती तो वह बता न देता?
खैर बातों-बातों में मालूम हुआ कि उस शाम आशुतोष पतंग और एक डोर का पिन्ना नया लाया है।
श्रीमती ने कहा कि यह तुम्हीं हो जिसने पतंग की उसे इजाजत दी। बस, सारे दिन पतंग-पतंग। यह नहीं कि कभी उसे बिठाकर सबक की भी कोई बात पूछो। मैं सोचती हूँ कि एक दिन तोड़-ताड़ दूँ उसकी सब डोर और पतंग। हाँ, तो सारे वक्त वही धुन!
मैंने कहा कि खैर; छोड़ो। कल सवेरे पूछताछ करेंगे।

शब्दार्थ-
घुस-घुसकर- बार-बार अंदर जाकर
खोज लगाना तलाश करना
शौक लगाव, रुचि
बताते-बरजते समझाते और रोकते
उमर- आयु
शह देना बढ़ावा देना
डोर का पिन्ना पतंग उड़ाने की डोरी का गुच्छा
इजाजत- अनुमति
सबक सीख
तोड़-ताड़ दूँ- नष्ट कर दूँ
धुन लगन, जुनून
सवेरे सुबह

व्याख्या- लेखक बताता है कि वह अपनी पत्नी से पूछता है कि क्या उसने आशुतोष से भी पाजेब के बारे में पूछा है। पत्नी उत्तर देती है कि उसने उससे पूछा है और वह तो ट्रंक और बॉक्स के नीचे घुस-घुसकर पाजेब ढूँढने में उसकी मदद करता रहा है, इसलिए वह पाजेब ले ही नहीं सकता।
लेखक कहता है कि आशुतोष को पतंग उड़ाने का बहुत शौक है। इस पर पत्नी उलाहना देती है कि लेखक उसे कभी समझाता-बुझाता नहीं है। वह कहती है कि उसकी उम्र बढ़ती जा रही है और वह इसी तरह बिगड़ता चला जाएगा। उसके अनुसार आशुतोष को पतंग उड़ाने की शह लेखक ही देता है।
लेखक आगे कहता है कि यदि कहीं पाजेब पड़ी मिल गई हो तो क्या होगा। इस पर पत्नी दृढ़ता से कहती है कि ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि यदि पाजेब मिल जाती, तो आशुतोष खुद बता देता।
लेखक बताता है कि बातों-बातों में यह पता चलता है कि उसी शाम आशुतोष एक नई पतंग और एक डोर का पिन्ना लेकर आया है। पत्नी कहती है कि पतंग उड़ाने की अनुमति लेखक ने ही दी है और अब वह पूरे दिन पतंग के पीछे लगा रहता है। वह शिकायत करती है कि लेखक कभी उसे बैठाकर पढ़ाई के बारे में नहीं पूछता। वह यहाँ तक कहती है कि वह एक दिन उसकी सारी डोर और पतंग तोड़ देने का मन बना रही है, क्योंकि उसके मन में हर समय वही धुन सवार रहती है। लेखक पत्नी को शांत करते हुए कहता है कि अब इस बात को छोड़ दिया जाए और अगले दिन सुबह पाजेब के बारे में पूछताछ की जाएगी।

 

पाठ – सवेरे बुलाकर मैंने गम्भीरता से उससे पूछा कि क्यों बेटा, एक पाजेब नहीं मिल रही है, तुमने तो नहीं देखी?
वह गुम हो आया। जैसे नाराज हो। उसने सिर हिलाया कि उसने नहीं ली। पर मुँह नहीं खोला।
मैंने कहा कि देखो बेटे, ली हो तो कोई बात नहीं, सच कह देना चाहिए।
उसका मुँह और भी फूल आया। और वह गुम-सुम बैठा रहा।
मेरे मन में उस समय तरह-तरह के सिद्धांत आए। मैंने स्थिर किया कि अपराध के प्रति करुणा ही होनी चाहिए। रोष का अधिकार नहीं है। प्रेम से ही अपराध-वृत्ति को जीता जा सकता है। आतंक से उसे दबाना ठीक नहीं है। बालक का स्वभाव कोमल होता है। और सदा ही उससे स्नेह से व्यवहार करना चाहिए, इत्यादि।
मैंने कहा कि बेटा आशुतोष, तुम घबराओ नहीं। सच कहने से घबराना नहीं चाहिए। ली हो तो खुलकर कह दो बेटा! हम कोई सच कहने की सजा थोड़े ही दे सकते हैं। बल्कि सच बोलने पर तो इनाम मिला करता है।
आशुतोष सब सुनता हुआ बैठा रह गया। उसका मुँह सूजा था। वह सामने मेरी आँखों में नहीं देख रहा था। रह-रहकर उसके माथे पर बल पड़ते थे।
“क्यों बेटे, तुमने ली तो नहीं ? “
उसने सिर हिला कर क्रोध से अस्थिर और तेज आवाज में कहा कि मैंने नहीं ली, नहीं ली, नहीं ली। यह कहकर वह रोने का हो आया, पर रोया नहीं। आँखों में आँसू रोक लिये।
उस वक्त मुझे प्रतीत हुआ, उग्रता दोष का लक्षण है।

शब्दार्थ-
गम्भीरता- गंभीर भाव
मुँह नहीं खोला- कुछ नहीं बोला
फूल आया- नाराज़, उदास हो गया
गुम-सुम चुपचाप, उदास
स्थिर किया निश्चय किया
अपराध गलती
करुणा- दया
रोष- क्रोध
अपराध-वृत्ति- गलती करने की प्रवृत्ति
आतंक- डर
स्नेह प्रेम
खुलकर बिना डर के
इनाम- पुरस्कार
सूजा फूला हुआ
माथे पर बल पड़ना- चिंता या तनाव के भाव
अस्थिर बेचैन
उग्रता अत्यधिक क्रोध
दोष- गलती
लक्षण– संकेत

व्याख्या- लेखक बताता है कि सुबह आशुतोष को बुलाकर वह गंभीरता से उससे पूछता है कि घर में एक पाजेब नहीं मिल रही है और क्या उसने उसे कहीं देखा है या ली है। यह सुनकर आशुतोष सकुचा जाता है और नाराज़-सा प्रतीत होता है। वह सिर हिलाकर संकेत देता है कि उसने पाजेब नहीं ली है, पर कुछ बोलता नहीं। लेखक आगे कहता है कि वह उसे समझाते हुए बताता है कि यदि उसने पाजेब ली हो, तो इसमें कोई बड़ी बात नहीं है और सच बोल देना चाहिए। इस पर आशुतोष और भी चुप हो जाता है तथा उदास मन से बैठा रहता है।
लेखक बताता है कि उस समय उसके मन में कई प्रकार के विचार आते हैं। वह यह निश्चय करता है कि अपराध के प्रति रोष नहीं, बल्कि करुणा होनी चाहिए। उसके अनुसार प्रेम के द्वारा ही अपराध की प्रवृत्ति को जीता जा सकता है और भय या आतंक से उसे दबाना उचित नहीं है। वह यह भी मानता है कि बालक का स्वभाव कोमल होता है, इसलिए उसके साथ सदैव स्नेहपूर्ण व्यवहार करना चाहिए। लेखक आगे बताता है कि वह आशुतोष को धैर्य बँधाते हुए कहता है कि उसे घबराने की आवश्यकता नहीं है और सच कहने से डरना नहीं चाहिए। यदि उसने पाजेब ली हो, तो वह खुलकर स्वीकार कर ले, क्योंकि सच बोलने पर दंड नहीं, बल्कि पुरस्कार मिलता है। लेखक बताता है कि आशुतोष यह सब सुनते हुए चुपचाप बैठा रहता है। उसका चेहरा सूजा हुआ दिखाई देता है। वह सामने लेखक की आँखों में नहीं देखता और बीच-बीच में उसके माथे पर चिंता की रेखाएँ उभर आती हैं।
अंत में लेखक बताता है कि जब वह उससे फिर पूछता है कि क्या उसने पाजेब ली है, तो आशुतोष सिर हिलाकर और अधिक गुस्से के साथ तेज़ आवाज़ में बार-बार कहता है कि उसने पाजेब नहीं ली है। वह रोने जैसा हो जाता है, लेकिन आँसुओं को रोक लेता है। उस समय लेखक को यह प्रतीत होता है कि अत्यधिक उग्रता कहीं न कहीं दोष का संकेत होती है।

 

पाठ – मैंने कहा देखा बेटा, डरो नहीं; अच्छा जाओ। ढूँढ़ो, शायद कहीं पड़ी हुई वह पाजेब मिल जाये। मिल जायेगी तो हम तुम्हें इनाम देंगे।
वह चला गया और दूसरे कमरे में जाकर पहले तो एक कोने में खड़ा हो गया। कुछ देर चुपचाप खड़े रहकर वह फिर यहाँ-वहाँ पाजेब की तलाश में लग गया।
श्रीमती आकर बोलीं, “आशु से तुमने पूछ लिया? क्या ख्याल है?”
मैंने कहा कि संदेह तो मुझे होता है। नौकर का काम तो यह है नहीं!
श्रीमती ने कहा कि नहीं जी, आशु भला क्यों लेगा?
मैं कुछ बोला नहीं। मेरा मन जाने कैसे गंभीर प्रेम के भाव से आशुतोष के प्रति उमड़ रहा था। मुझे ऐसा मालूम होता था कि ठीक इस समय आशुतोष को हमें अपनी सहानुभूति से वंचित नहीं करना चाहिए। बल्कि कुछ अतिरिक्त स्नेह इस समय बालक को मिलना चाहिए। मुझे यह एक भारी दुर्घटना मालूम होती थी। मालूम होता था कि अगर आशुतोष ने चोरी की है तो उसका इतना दोष नहीं है बल्कि यह हमारे ऊपर बड़ा भारी इल्जाम है। बच्चे में चोरी की आदत भयानक हो सकती है। लेकिन बच्चे के लिए वैसी लाचारी उपस्थित हो आई, यह और भी कहीं भयावह है। यह हमारी आलोचना है। हम उस चोरी से बरी नहीं हो सकते।
मैंने बुलाकर कहा, “अच्छा सुनो। देखो, मेरी तरफ देखो, यह बताओ कि पाजेब तुमने छुन्नू को दी है न?”
वह कुछ देर तक कुछ नहीं बोला। उसके चेहरे पर रंग आया और गया। मैं एक-एक छाया ताड़ना चाहता था।
मैंने आश्वासन देते हुए कहा कि कोई बात नहीं। हाँ-हाँ, बोलो डरो नहीं। ठीक बताओ बेटा? कैसा हमारा सच्चा बेटा है।
मानो बड़ी कठिनाई के बाद उसने अपना सिर हिलाया ।
मैंने बहुत खुश होकर कहा कि दी है न छुन्नू को ?
उसने सिर हिला दिया।
अत्यन्त सांत्वना के स्वर में स्नेहपूर्वक मैंने कहा कि मुँह से बोलो। छुन्नू को दी है?
उसने कहा, “हाँ-आ”

शब्दार्थ-
कोना- कमरे का किनारा
चुपचाप- बिना बोले
तलाश- खोज
संदेह शक
भला क्यों- ऐसा क्यों
उमड़ रहा था- भर आना, बढ़ना
सहानुभूति हमदर्दी
वंचित दूर रखना
अतिरिक्त- सिवाय, अलावा
दुर्घटना बुरी घटना
इल्जाम दोष, आरोप
भयानक भयानक
लाचारी विवशता
आलोचना गुण-दोष विवेचन
बरी- मुक्त
ताड़ना ध्यान से देखना
आश्वासन भरोसा दिलाना
सांत्वना- ढाढ़स, दिलासा
स्नेहपूर्वक प्यार से

व्याख्या- लेखक आशुतोष से कहता है कि उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है और वह जाकर पाजेब ढूँढे, शायद वह कहीं पड़ी मिल जाए। वह यह भी कहता है कि यदि पाजेब मिल जाती है, तो उसे इनाम दिया जाएगा। इसके बाद आशुतोष वहाँ से चला जाता है और दूसरे कमरे में जाकर पहले कुछ देर एक कोने में चुपचाप खड़ा रहता है। थोड़ी देर बाद वह इधर-उधर पाजेब की तलाश करने लगता है।
लेखक आगे बताता है कि तभी उसकी पत्नी आकर उससे पूछती है कि क्या उसने आशु से पाजेब के बारे में पूछ लिया है और उसका क्या विचार है। लेखक उत्तर देता है कि उसे आशुतोष पर कुछ शक तो जरूर हो रहा है, क्योंकि यह काम किसी नौकर का नहीं लगता। इस पर पत्नी कहती है कि आशुतोष भला ऐसा क्यों करेगा। लेखक इस पर कुछ नहीं कहता।
लेखक बताता है कि उसके मन में आशुतोष के प्रति गहरा स्नेह और करुणा का भाव उमड़ आता है। उसे लगता है कि इस समय आशुतोष को अपने स्नेह और सहानुभूति से दूर नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे अतिरिक्त प्यार की आवश्यकता है। लेखक को यह घटना एक गंभीर दुर्घटना जैसी प्रतीत होती है। उसे लगता है कि यदि आशुतोष ने चोरी की है, तो यह केवल बच्चे का दोष नहीं है, बल्कि माता-पिता पर भी एक बड़ा आरोप है। बच्चे में चोरी की आदत लग जाना भयानक हो सकता है, लेकिन उससे भी अधिक भयावह यह है कि बच्चे को ऐसी विवशता का सामना करना पड़ा। लेखक मानता है कि यह स्थिति उनके पालन-पोषण पर प्रश्नचिह्न लगाती है और वे इस चोरी से स्वयं को पूरी तरह निर्दोष नहीं मान सकते।
लेखक आगे बताता है कि वह आशुतोष को बुलाकर उससे स्नेहपूर्वक कहता है कि वह उसकी ओर देखे और बताए कि क्या उसने पाजेब छुन्नू को दी है। आशुतोष कुछ देर तक कुछ नहीं कहता। उसके चेहरे के भाव बदलते रहते हैं और लेखक उसके चेहरे पर उभरने वाली हर छाया को समझने की कोशिश करता है।
लेखक बताता है कि वह उसे विश्वास दिलाते हुए कहता है कि इसमें कोई बात नहीं है और उसे डरने की आवश्यकता नहीं है। वह उससे सच्चाई बताने के लिए कहता है और उसे अपना सच्चा बेटा कहकर पुकारता है। बड़ी कठिनाई के बाद आशुतोष सिर हिलाकर संकेत देता है। लेखक प्रसन्न होकर फिरसे पूछता है कि उसने पाजेब छुन्नू को दी है और आशुतोष फिर से सिर हिला देता है। अंत में लेखक अत्यंत सांत्वना और स्नेह भरे स्वर में उससे कहता है कि वह मुँह से भी बता दे कि उसने पाजेब छुन्नू को दी है। तब आशुतोष धीरे से स्वीकार करता है कि हाँ, उसने पाजेब छुन्नू को दी है।

 

पाठ – मैंने अत्यन्त हर्ष के साथ दोनों बाँहों में लेकर उसे उठा लिया। कहा कि ऐसे ही बोल दिया करते हैं अच्छे लड़के आशू हमारा राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिये-लिये मैं उसकी माँ की तरफ गया। उल्लासपूर्वक बोला कि देखो हमारे बेटे ने सच कबूल किया है। पाजेब उसने छुन्नू को दी है।
सुनकर उसकी माँ खुश हो आई। उन्होंने उसे चूमा। बहुत शाबाशी दी और उसकी बलैयां लेने लगी!
आशुतोष भी मुस्करा आया अगरचे एक उदासी भी उसके चेहरे से दूर नहीं हुई थी।
उसके बाद अलग ले जाकर मैंने उससे प्रेम से पूछा कि पाजेब छुन्नू के पास है न? जाओ, माँग ला सकते हो उससे?
आशुतोष मेरी ओर देखता हुआ बैठा रह गया। मैंने कहा कि जाओ बेटे! ले आओ।
उसने जवाब में मुँह नहीं खोला।
मैंने आग्रह किया तो वह बोला कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
मैंने कहा कि तो जिसको उसने दी होगी उसका नाम बता देगा। सुनकर वह चुप हो गया। मेरे बार-बार कहने पर वह यही कहता रहा कि पाजेब छुन्नू के पास न हुई तो वह देगा कहाँ से?
अन्त में हारकर मैंने कहा कि वह कहीं तो होंगी। अच्छा, तुमने कहाँ से उठाई थी?
“पड़ी मिली थी।”
“और फिर नीचे जाकर वह तुमने छुन्नू को दिखाई?”
“हाँ!”
“फिर उसी ने कहा कि इसे बेचेंगे?”
“हाँ!”
“कहाँ बेचने को कहा?”
‘कहा मिठाई लाएँगे।”
“नहीं पतंग लाएँगे।”
‘अच्छा, पतंग को कहा?”
“हाँ!”
“सो पाजेब छुन्नू के पास रह गई?”
“हाँ।”
“तो उसी के पास होनी चाहिए न ? या पतंग वाले के पास होगी। जाओ बेटा, उससे ले आओ। कहना हमारे बाबू जी तुम्हें इनाम देंगे।”

शब्दार्थ-
अत्यन्त- बहुत अधिक
हर्ष- खुशी
बाँहें भुजाएँ
गर्व- अभिमान
उल्लासपूर्वक बहुत खुशी के साथ
कबूल स्वीकार
शाबाशी प्रशंसा
बलैया लेना बलिहारी जाना
अगरचे- यद्यपि
प्रेम से प्यार से
आग्रह ज़ोर देना

व्याख्या- लेखक बताता है कि वह अत्यंत प्रसन्न होकर आशुतोष को दोनों बाँहों में उठाकर गोद में ले लेता है और स्नेहपूर्वक कहता है कि अच्छे बच्चे ऐसे ही सच बोलते हैं तथा आशुतोष उनका राजा बेटा है। गर्व के भाव से उसे गोद में लिए हुए वह उसकी माँ के पास जाता है और खुशी-खुशी बताता है कि उनके बेटे ने सच्चाई स्वीकार कर ली है और उसने पाजेब छुन्नू को दी है।
लेखक आगे बताता है कि यह सुनकर आशुतोष की माँ बहुत खुश हो जाती है। वह उसे चूमती है, उसकी खूब प्रशंसा करती है और प्यार से उसकी बलैयाँ लेती है। आशुतोष भी मुस्करा देता है, यद्यपि उसके चेहरे से हल्की उदासी पूरी तरह दूर नहीं होती।
इसके बाद लेखक उसे अलग ले जाकर प्रेमपूर्वक पूछता है कि पाजेब क्या सचमुच छुन्नू के पास है और क्या वह उससे पाजेब माँगकर ला सकता है। आशुतोष लेखक की ओर देखता हुआ चुप बैठा रहता है। लेखक फिर उसे भेजने के लिए कहता है, लेकिन वह कुछ नहीं बोलता।
लेखक के आग्रह करने पर आशुतोष कहता है कि यदि पाजेब छुन्नू के पास नहीं होगी, तो वह उसे कहाँ से देगा। इस पर लेखक कहता है कि तब वह उस व्यक्ति का नाम बता दे, जिसे उसने पाजेब दी होगी। यह सुनकर आशुतोष चुप हो जाता है और बार-बार यही कहता रहता है कि यदि पाजेब छुन्नू के पास नहीं है, तो वह उसे कहाँ से देगा।
अंत में लेखक हार मानकर उससे पूछता है कि पाजेब उसे कहाँ से मिली थी। तब आशुतोष बताता है कि पाजेब उसे पड़ी हुई मिली थी। लेखक आगे पूछता है कि क्या उसने नीचे जाकर वह पाजेब छुन्नू को दिखाई थी और आशुतोष हाँ में जवाब देता है। लेखक फिर पूछता है कि क्या छुन्नू ने पाजेब बेचने की बात कही थी, जिस पर आशुतोष हाँ में उत्तर देता है। लेखक यह भी पूछता है कि क्या मिठाई या पतंग लेने की बात हुई थी और आशुतोष बताता है कि पतंग लेने की बात हुई थी।
लेखक अंत में बताता है कि पाजेब छुन्नू के पास ही रह गई है। वह आशुतोष को समझाता है कि पाजेब या तो छुन्नू के पास होगी या पतंग बेचने वाले के पास और उसे वहीं से लाने के लिए कहता है। साथ ही वह उसे यह भी कहने को कहता है कि उसके बाबूजी इनाम देंगे।

 

पाठ – वह जाना नहीं चाहता था। उसने फिर कहा कि छन्नू के पास नहीं हुई तो कहाँ से देगा?
मुझे उसकी जिद बुरी मालूम हुई। मैंने कहा कि तो कहीं तुमने उसे गाड़ दिया है? क्या किया है? बोलते क्यों नहीं?
वह मेरी ओर देखता रहा और कुछ नहीं बोला।
मैंने कहा, “कुछ कहते क्यों नहीं?”
वह गुम-सुम रह गया। और नहीं बोला।
मैंने उपटकर कहा कि जाओ, जहाँ हो वहीं से पाजेब लेकर आओ।
जब वह अपनी जगह से नहीं उठा और नहीं गया तो मैंने उसे कान पकड़कर उठाया। कहा कि सुनते हो? जाओ, पाजेब लेकर आओ। नहीं तो घर में तुम्हारा काम नहीं है।
उस तरह उठाया जाकर वह उठ गया और कमरे से बाहर निकल गया। निकलकर बरामदे के एक कोने में रूठा मुँह बनाकर खड़ा रह गया।
मुझे बड़ा क्षोभ हो रहा था। यह लड़का सच बोलकर अब किस बात से घबरा रहा है, यह मैं कुछ समझ न सका। मैंने बाहर आकर जरा धीरे से कहा कि जाओ भाई, जाकर छुन्नू से कहते क्यों नहीं हो?
पहले तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और जवाब दिया तो बार-बार कहने लगा कि छुन्नू के पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
मैंने कहा कि जितने में उसने बेची होगी वह दाम दे देंगे। समझे न जाओ, तुम कहो तो।
छुन्नू की माँ तो कह रही हैं कि उसका लड़का ऐसा काम नहीं कर सकता। उसने पाजेब नहीं देखी।
जिस पर आशुतोष की माँ ने कहा कि नहीं तुम्हारा छुन्नू झूठ बोलता है। क्यों रे आशुतोष तेने दी थी न?
आशुतोष ने धीरे से कहा कि हाँ दी थी।
दूसरी ओर से छुन्नू बढ़कर आया और हाथ फटकारकर बोला कि मुझे नहीं दी। क्यों रे मुझे कल दी थी?
आशुतोष ने जिद्द बाँधकर कहा कि दी तो थी। कह दो नहीं दी थी?
नतीजा यह हुआ कि छुन्नू की माँ ने छुन्नू को खूब पीटा और खुद भी रोने लगी। कहती जाती कि हाय रे, अब हम चोर हो गये, यह कुलच्छिनी औलाद जाने कब मिटेगी?
बात दूर तक फैल चली। पड़ोस की स्त्रियों में पवन पड़ने लगी। और श्रीमती ने घर लौटकर कहा कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक से हैं।
मैंने कहा कि तुमने तेजा-तेजी क्यों कर डाली? ऐसे कोई बात भला कभी सुलझती है।
बोली कि हाँ, मैं तेज बोलती हूँ। अब जाओ ना, तुम्हीं उसके पास से पाजेब निकालकर लाते क्यों नहीं? तब जानूँ जब पाजेब निकलवा दो।
मैंने कहा कि पाजेब से बढ़कर शांति है। और अशांति से तो पाजेब मिल नहीं जायेगी।
श्रीमती बुदबुदाती हुई नाराज होकर मेरे सामने से चली गई।

शब्दार्थ-
गाड़ दिया ज़मीन में दबा दिया
गुम-सुम- चुपचाप, उदास
उपटकर झुँझलाकर, गुस्से में
बरामदा- कमरे के बाहर खुली जगह
क्षोभ गहरा दुख, ग्लानि
जवाब- उत्तर
दाम- कीमत
तेजा-तेजी जल्दबाज़ी
हाथ फटकारकर– झटके से हाथ हिलाकर
नतीजा परिणाम
कुलच्छिनी- अपशकुनी
बुदबुदाती हुई धीमे-धीमे बोलते हुए

व्याख्या- लेखक बताता है कि आशुतोष जाना नहीं चाहता और बार-बार यही कहता रहता है कि यदि पाजेब छुन्नू के पास नहीं है, तो वह उसे कहाँ से देगा। लेखक को उसकी यह ज़िद बुरी लगती है। वह उससे पूछता है कि कहीं उसने पाजेब गाड़ तो नहीं दी है या कुछ और तो नहीं कर दिया, और यह भी कहता है कि वह बोल क्यों नहीं रहा है। आशुतोष लेखक की ओर देखता रहता है, लेकिन कुछ नहीं कहता और गुमसुम बना रहता है।
लेखक बताता है कि वह उससे फिर पूछता है कि वह कुछ बोल क्यों नहीं रहा है। जब आशुतोष फिर भी चुप रहता है, तो लेखक झुंझलाकर उसे आदेश देता है कि जहाँ भी पाजेब हो, वहीं से लेकर आ जाए। जब आशुतोष अपनी जगह से नहीं उठता, तो लेखक उसे कान पकड़कर उठाता है और कड़े शब्दों में कहता है कि वह जाकर पाजेब लेकर आए, नहीं तो घर में उसका कोई काम नहीं रहेगा। इस तरह डराकर उठाने पर आशुतोष उठ जाता है और कमरे से बाहर निकल जाता है। बाहर जाकर वह बरामदे के एक कोने में रूठे हुए चेहरे के साथ खड़ा हो जाता है।
लेखक बताता है कि उसे बहुत क्षोभ होता है। वह समझ नहीं पाता कि सच बोल देने के बाद भी यह लड़का किस बात से घबरा रहा है। वह बाहर आकर धीरे से आशुतोष से कहता है कि वह जाकर छुन्नू से बात क्यों नहीं करता। पहले तो आशुतोष कोई उत्तर नहीं देता और जब उत्तर देता है, तो फिर वही बात दोहराता है कि यदि पाजेब छुन्नू के पास नहीं है, तो वह उसे कहाँ से देगा।
लेखक आशुतोष को समझाता है कि जितने में पाजेब बेची गई होगी, उतना पैसा दे दिया जाएगा और उसे जाकर साफ़-साफ़ कह देना चाहिए। तभी यह बात सामने आती है कि छुन्नू की माँ कहती है कि उसका बेटा ऐसा काम नहीं कर सकता और उसने पाजेब देखी ही नहीं है। इस पर आशुतोष की माँ कहती है कि छुन्नू झूठ बोलता है और आशुतोष से पूछती है कि क्या उसने पाजेब उसे दी थी। आशुतोष धीरे से स्वीकार करता है कि उसने पाजेब दी थी।
लेखक बताता है कि तभी छुन्नू आगे बढ़कर कहता है कि उसे पाजेब नहीं दी गई है और वह आशुतोष से उल्टा पूछता है कि क्या उसने उसे कल दी थी। इस पर आशुतोष ज़िद पकड़कर कहता है कि उसने पाजेब दी थी और उससे झूठ बोलने को कहता है। इसका परिणाम यह होता है कि छुन्नू की माँ छुन्नू को बहुत पीटती है और स्वयं भी रोने लगती है। वह दुख में कहती जाती है कि अब उनका बच्चा चोर कहलाने लगा है और ऐसी औलाद का क्या होगा।
लेखक बताता है कि यह बात दूर-दूर तक फैल जाती है और पड़ोस की स्त्रियों में चर्चा होने लगती है। घर लौटकर लेखक की पत्नी कहती है कि छुन्नू और उसकी माँ दोनों एक जैसे हैं। इस पर लेखक कहता है कि उसने इतनी तेज़ी क्यों दिखाई, क्योंकि इस तरह किसी बात का समाधान नहीं होता। पत्नी उत्तर देती है कि वह तेज़ बोलती है और लेखक से कहती है कि वह स्वयं जाकर छुन्नू के पास से पाजेब निकलवाकर लाए, तभी उसे विश्वास होगा।
अंत में लेखक बताता है कि वह कहता है कि पाजेब से बढ़कर शांति है और अशांति से पाजेब भी नहीं मिल सकती। यह सुनकर उसकी पत्नी बुदबुदाती हुई नाराज़ होकर उसके सामने से चली जाती है।

 

पाठ – थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ हमारे घर आई। श्रीमती उन्हें लाई थीं। अब उनके बीच गर्मी नहीं थी, उन्होंने मेरे सामने आकर कहा कि छुन्नू तो पाजेब के लिए इंकार करता है। वह पाजेब कितने की थी मैं उसके दाम भर सकती हूँ।
मैंने कहा, “यह आप क्या कहती हैं। बच्चे, – बच्चे हैं। आपने छुन्नू से सहूलियत से पूछा भी?”
उन्होंने उसी समय छुन्नू को बुलाकर मेरे सामने कर दिया। कहा कि क्यों रे, बता क्यों नहीं देता जो तैने पाजेब देखी हो?
छुन्नू ने जोर से सिर हिलाकर इन्कार किया और बताया कि पाजेब आशुतोष के हाथ में मैंने देखी थी और वह पतंग वाले को दे आया है। मैंने खूब देखी थी वह चाँदी की थी।
“तुम्हें ठीक मालूम है?”
“हाँ, वह मुझसे कह रहा था कि तू भी चल पतंग लाएँगे।”
“पाजेब कितनी बड़ी थी? बताओ तो।”
छुन्नू ने उसका आकार बताया। जो ठीक ही था।
मैंने उसकी माँ की तरफ देखकर कहा कि देखिए न पहले यही कहता था कि मैंने पाजेब देखी तक नहीं। अब कहता है कि देखी है।
माँ ने मेरे सामने छुन्नू को खींचकर तभी धम्म-धम्म पीटना शुरू कर दिया। कहा कि क्यों रे, झूठ बोलता है? तेरी चमड़ी न उधेड़ी तो मैं नहीं।
मैंने बीच-बचाव करके छन्नू को बचाया। वह शहीद की भाँति पिटता रहा था। रोया बिल्कुल नहीं था और एक कोने में खड़े आशुतोष को जाने किस भाव से वह देख रहा था।
खैर, मैंने सबको छुट्टी दी। कहा कि जाओ बेटा छुन्नू खेलो। उसकी माँ को कहा कि आप उसे मारिएगा नहीं। और पाजेब कोई ऐसी बड़ी चीज नहीं है।
छुन्नू चला गया। तब उसकी माँ ने पूछा कि आप उसे कसूरवार समझते हो।
मैंने कहा कि मालूम तो होता है कि उसे कुछ पता है। और वह मामले में शामिल है।
इस पर छुन्नू की माँ ने पास बैठी हुई मेरी पत्नी से कहा, “चलो बहन जी, मैं तुम्हें अपना सारा घर दिखाये देती हूँ। एक-एक चीज देख लो। होगी पाजेब तो जायेगी कहाँ?”
मैंने कहा, “छोड़िए भी। बेबात की बात बढ़ाने से क्या फायदा!” सो ज्यों-त्यों मैंने उन्हें दिलासा दिया। नहीं तो वह छुन्नू को पीट-पाट हाल-बेहाल कर डालने का प्रण ही उठाये ले रही थी। कुलच्छनी, आज उसी धरती में नहीं गाड़ दिया, यो मेरा नाम नहीं।

शब्दार्थ-
दाम- कीमत
सहूलियत से- आराम से
मालूम जानकारी
म्म-धम्म पीटना– जोर-जोर से मारना
चमड़ी उधेड़ना बहुत बुरी तरह मारना
बीच-बचाव- रोक-टोक
शहीद की भाँति- चुपचाप सहते हुए
भाव- भावना
कसूरवार दोषी
बेबात की बात बेकार की चर्चा
ज्यों-त्यों- जैसे-तैसे
दिलासा- तसल्ली
हाल-बेहाल बहुत बुरी हालत
प्रण दृढ़ निश्चय

व्याख्या- लेखक बताता है कि थोड़ी देर बाद छुन्नू की माँ उनके घर आती है। उन्हें लेखक की पत्नी साथ लाती है। अब उनके बीच पहले जैसी कड़वाहट नहीं रहती। छुन्नू की माँ लेखक से कहती है कि छुन्नू पाजेब लेने से साफ़ इंकार कर रहा है और यदि पाजेब की कीमत बताई जाए तो वह उसके पैसे देने को तैयार है।
लेखक उत्तर देता है कि बच्चे तो बच्चे होते हैं और उनसे प्यार से पूछना चाहिए। वह यह भी पूछता है कि क्या उसने छुन्नू से आराम से पूछा है। तभी छुन्नू की माँ उसी समय छुन्नू को बुलाकर लेखक के सामने खड़ा कर देती है और उससे पूछती है कि यदि उसने पाजेब देखी हो तो सच क्यों नहीं बताता।
लेखक बताता है कि छुन्नू ज़ोर से सिर हिलाकर इंकार करता है, लेकिन फिर यह भी कहता है कि उसने पाजेब आशुतोष के हाथ में देखी थी और आशुतोष उसे पतंग वाले को दे आया था। वह यह भी बताता है कि उसने पाजेब अच्छी तरह देखी थी और वह चाँदी की थी। लेखक उससे पूछता है कि क्या उसे यह ठीक-ठीक मालूम है। छुन्नू कहता है कि आशुतोष उससे पतंग लाने की बात भी कर रहा था। जब लेखक पाजेब का आकार पूछता है, तो छुन्नू पाजेब के बारे में सही-सही बता देता है।
लेखक उसकी माँ की ओर देखकर कहता है कि पहले छुन्नू यह कह रहा था कि उसने पाजेब देखी तक नहीं, और अब वह कह रहा है कि उसने देखी है। यह सुनते ही छुन्नू की माँ गुस्से में आकर उसके सामने ही छुन्नू को खींचकर पीटने लगती है और उसे झूठा कहती है।
लेखक बीच-बचाव करके छुन्नू को बचाता है। वह बताता है कि छुन्नू शहीद की तरह मार खाता रहता है, लेकिन रोता नहीं है और एक कोने में खड़े आशुतोष को किसी अनजाने भाव से देखता रहता है।
इसके बाद लेखक सबको शांत करते हुए भेज देता है। वह छुन्नू से खेलने जाने को कहता है और उसकी माँ से निवेदन करता है कि वह बच्चे को न मारे, क्योंकि पाजेब कोई बहुत बड़ी चीज़ नहीं है। छुन्नू चला जाता है।
तब छुन्नू की माँ लेखक से पूछती है कि क्या वह छुन्नू को दोषी समझता है। लेखक कहता है कि ऐसा लगता है कि छुन्नू को कुछ न कुछ अवश्य पता है और वह इस मामले में कहीं न कहीं शामिल है।
इसके बाद छुन्नू की माँ लेखक की पत्नी से कहती है कि वह अपना पूरा घर दिखा देती है और हर चीज़ देख ली जाए, क्योंकि पाजेब कहीं जाएगी तो नहीं। लेखक उन्हें समझाता है कि बेवजह बात बढ़ाने से कोई लाभ नहीं है और वह किसी तरह उन्हें दिलासा देता है क्योंकि वह गुस्से में छुन्नू को बहुत अधिक मारने का निश्चय किए बैठी रहती है और क्रोध में कठोर बातें कहती रहती है।

 

पाठ – खैर, जिस-जिस भाँति बखेड़ा टाला। में इस झंझट में दफ्तर भी समय पर नहीं जा सका। जाते वक्त श्रीमती को कह गया कि देखो आशुतोष को धमकाना मत। प्यार से सारी बातें पूछना। धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और हाथ कुछ नहीं आता। समझी न?
शाम को दफ्तर से लौटा तो श्रीमती ने सूचना दी कि आशुतोष ने सब बतला दिया है। ग्यारह आने पैसे में वह पाजेब पतंग वाले को दे दी है। पैसे उसने थोड़े-थोड़े करके देने को कहे हैं। पाँच आने जो दिये वह छुन्नू के पास हैं। इस तरह रत्ती रत्ती बात उसने कह दी है।
कहने लगीं कि बड़े मैंने प्यार से पूछ-पूछकर यह सब उसके पेट में से निकला है। दो-तीन घंटे में मगज मारती रही। हाय राम, बच्चे का भी क्या जी होता है।
मैं सुनकर खुश हुआ। मैंने कहा कि चलो अच्छा है, अब पाँच आने भेजकर पाजेब मँगा लेंगे। लेकिन यह पतंग वाला भी कितना बदमाश है, बच्चों के हाथ से ऐसी चीजें लेता है। उसे पुलिस में दे देना चाहिए। उचक्का कहीं का!
फिर मैंने पूछा कि आशुतोष कहाँ है?
उन्होंने बताया की बाहर ही कहीं खेल-खाल रहा होगा।
मैंने कहा की बंसी, जाकर उसे बुला तो लाओ।
बंसी गया और उसने आकर कहा कि वह अभी आते हैं।
“क्या कर रहा है?”
“छुन्नू के साथ गिल्ली-डण्डा खेल रहे हैं।”
थोड़ी देर में आशुतोष आया। तब मैंने उसे गोद में लेकर प्यार किया। आते-आते उसका चेहरा उदास हो गया था और गोद में लेने पर भी वह विशेष प्रसन्न मालूम नहीं हुआ।
उसकी माँ ने खुश होकर कहा कि हमारे आशुतोष ने सब बातें अपने आप पूरी-पूरी बता दी हैं। हमारा आशुतोष बड़ा सच्चा लड़का है।

शब्दार्थ-
खैर- अच्छा, ठीक है
जिस-जिस भाँति- जिस तरह-तरह से
बखेड़ा- झगड़ा
झंझट परेशानी
धमकाना डराना
हाथ कुछ नहीं आता– कोई परिणाम नहीं निकलता
सूचना दी जानकारी दी
बतला दिया बता दिया
ग्यारह आने पुराने समय की मुद्रा
रत्ती-रत्ती बात- एक-एक छोटी बात
मगज- दिमाग
बदमाश बुरा व्यक्ति
उचक्का ठग, चालाक चोर
गिल्ली-डण्डा खेल का नाम
विशेष प्रसन्न- बहुत अधिक खुश
अपने आप- खुद 

व्याख्या- लेखक बताता है कि वह जैसे-तैसे इस सारे बखेड़े को टालता है और इसी झंझट के कारण वह दफ़्तर भी समय पर नहीं जा पाता। दफ़्तर जाते समय वह अपनी पत्नी से कहता है कि वह आशुतोष को डाँटे या धमकाए नहीं, बल्कि प्यार से सारी बातें पूछे, क्योंकि धमकाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं और किसी बात का सही परिणाम नहीं निकलता।
लेखक आगे बताता है कि शाम को दफ़्तर से लौटने पर उसकी पत्नी उसे सूचना देती है कि आशुतोष ने सब कुछ बता दिया है। वह बताती है कि ने आशुतोष ग्यारह आने में पाजेब पतंग वाले को बेच दी है और उसने पैसे थोड़े-थोड़े करके देने की शर्त रखी है। पाँच आने छुन्नू के पास हैं। इस प्रकार वह एक-एक बात स्पष्ट रूप से बता देता है। पत्नी यह भी कहती है कि उसने बहुत प्यार से और लगातार पूछकर यह सारी बातें उसके मुँह से निकलवाई हैं और इसमें उसे दो-तीन घंटे लग गए। वह यह भी कहती है कि बच्चे का मन कितना नाज़ुक होता है।
लेखक को यह सुनकर खुशी होती है। वह कहता है कि अब पाँच आने रुपये भेजकर पाजेब मँगवा ली जाएगी, लेकिन साथ ही वह पतंग वाले को बहुत बदमाश कहता है, जो बच्चों से ऐसी चीज़ें लेता है, और यह भी कहता है कि ऐसे व्यक्ति को पुलिस के हवाले कर देना चाहिए।
इसके बाद लेखक पूछता है कि आशुतोष कहाँ है। पत्नी बताती है कि वह बाहर कहीं खेल रहा होगा। तब लेखक बंसी से कहता है कि वह जाकर आशुतोष को बुला लाए। बंसी जाकर लौटकर बताता है कि आशुतोष अभी आ रहा है। जब लेखक पूछता है कि वह क्या कर रहा है, तो बंसी बताता है कि वह छुन्नू के साथ गिल्ली-डंडा खेल रहा है।
थोड़ी देर बाद आशुतोष आ जाता है। लेखक उसे गोद में लेकर प्यार करता है, लेकिन आशुतोष का चेहरा उदास रहता है और गोद में लेने पर भी वह विशेष प्रसन्न दिखाई नहीं देता। तभी उसकी माँ खुशी से कहती है कि आशुतोष ने सारी बातें अपने आप पूरी तरह बता दी हैं और वह एक सच्चा लड़का है।

 

पाठ – आशुतोष मेरी गोद में टिका रहा। लेकिन अपनी बड़ाई सुनकर भी उसको कुछ हर्ष नहीं हुआ प्रतीत होता था।
मैंने कहा कि आओ चलो। अब क्या बात है क्यों हजरत तुमको पाँच ही आने ही तो मिले हैं न? हम से पाँच आने पैसे माँग लेते तो क्या हम न देते? सुनो, अब से ऐसा मत करना, बेटे!
कमरे में ले जाकर मैंने उससे फिर पूछताछ की, “क्यों बेटा, पतंग वाले ने पाँच आने तुम्हें दिये न?”
“हाँ।”
“और वह छुन्नू के पास है न?”
“हाँ।”
“अभी तो उसके पास होंगे न?”
“नहीं।”
“खर्च कर दिए?”
“नहीं।”
“नहीं, खर्च किये?”
“हाँ।”
“खर्च किये कि नहीं खर्च किए?”
उस ओर से प्रश्न करने पर वह मेरी ओर देखता रहा, उत्तर नहीं दिया।
“बताओ, खर्च कर दिये कि अभी हैं?”
जवाब में उसने एक बार ‘हाँ’ कहा तो दूसरी बार ‘नहीं’ कहा।
मैंने कहा कि तो यह क्यों नहीं कहते कि तुम्हें नहीं मालूम है?
“हाँ।”
“बेटा, मालूम है न?”
“हाँ!”
“पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिये हैं न?”
“हाँ।”
“तुमने क्यों नहीं लिये?”
वह चुप।
“पाँचों इकन्नी थीं, या दुअन्नी और पैसे भी थे?”
वह चुप!
“बतलाते क्यों नहीं हो?”
चुप!
“इकन्नियाँ कितनी थीं, बोलो?”
“दो।”
“बाकी पैसे थे?”
“हाँ।”
“दुअन्नी नहीं थी?”
“हाँ।”
“दुअन्नी थी?”
“हाँ।”

शब्दार्थ-
गोद में टिका रहा- गोद में सटा हुआ बैठा रहा
हर्ष प्रसन्नता
प्रतीत ज्ञात
हजरत- सम्मान सूचक संबोधन
आने पुराने समय की मुद्रा
इकन्नी- एक आने का सिक्का
दुअन्नी दो आने का सिक्का
स्पष्ट- साफ़ 

व्याख्या- लेखक बताता है कि आशुतोष उसकी गोद में बैठा रहता है, लेकिन अपनी प्रशंसा सुनकर भी उसे कोई विशेष खुशी नहीं होती। लेखक उससे स्नेहपूर्वक कहता है कि अब बताने में क्या हर्ज है और उसे समझाता है कि यदि उसे केवल पाँच आने ही मिले थे, तो वह उनसे सीधे पैसे माँग सकता था, वे अवश्य दे देते। वह आशुतोष को आगे से ऐसा न करने की सीख देता है।
इसके बाद लेखक उसे कमरे में ले जाकर फिर से प्यार से पूछताछ करता है। वह उससे पूछता है कि क्या पतंग वाले ने उसे पाँच आने दिए थे। आशुतोष हाँ में उत्तर देता है। लेखक पूछता है कि क्या वे पैसे छुन्नू के पास हैं, तो वह फिर हाँ कहता है। जब लेखक यह पूछता है कि क्या पैसे अभी भी छुन्नू के पास हैं, तो आशुतोष मना कर देता है। लेखक जानना चाहता है कि क्या पैसे खर्च कर दिए गए हैं, तो पहले वह इंकार करता है और फिर स्वीकार कर लेता है।
आशुतोष से बार-बार पूछे जाने पर भी वह साफ़ उत्तर नहीं देता और कभी ‘हाँ’ तो कभी ‘नहीं’ कहता रहता है। लेखक उसे समझाता है कि यदि उसे ठीक-ठीक याद नहीं है, तो उसे साफ़ कह देना चाहिए कि उसे मालूम नहीं है। इस पर आशुतोष स्वीकार करता है कि उसे पूरा पता नहीं है।
लेखक आगे पूछता है कि क्या पतंग वाले से पैसे छुन्नू ने लिए थे और आशुतोष हाँ में जवाब देता है। जब उससे पूछा जाता है कि उसने स्वयं पैसे क्यों नहीं लिए, तो वह चुप रह जाता है। लेखक पैसे के प्रकार के बारे में भी पूछता है कि क्या पाँचों इकन्नी थीं या उनमें दुअन्नी और अन्य पैसे भी थे। आशुतोष पहले चुप रहता है, फिर धीरे-धीरे उत्तर देता है कि दो इकन्नी थीं, बाकी पैसे भी थे और दुअन्नी भी शामिल थी।

 

पाठ – मुझे क्रोध आने लगा। डपटकर कहा कि सच क्यों नहीं बोलते जी? सच तो बताओ कितनी इकन्नियाँ थीं और कितना क्या था?
वह गुम-सुम खड़ा रहा, कुछ नहीं बोला।
“बोलते क्यों नहीं?”
वह नहीं बोला।
“सुनते हो! बोलो … नहीं तो ….”
आशुतोष डर गया। और कुछ नहीं बोला?
“सुनते नहीं, मैं क्या कह रहा हूँ?”
इस बार भी वह नहीं बोला तो मैंने पकड़कर उसके कान खींच लिये। वह बिना आँसू लाये गुम-सुम खड़ा रहा!
“अब भी नहीं बोलोगे?”
वह डर के मारे पीला हो आया। लेकिन बोल नहीं सका। मैंने जोर से बुलाया, “बंसी, यहाँ आओ, इसको ले जाकर कोठरी में बन्द कर दो।”
बंसी नौकर उसे उठाकर ले गया और कोठरी में मूँद दिया।
दस मिनट बाद मैंने फिर उसे पास बुलवाया। उसका मुँह सूजा हुआ था। बिन कुछ बोले उसके ओंठ हिल रहे थे। कोठरी में बन्द होकर भी वह रोया नहीं।
मैंने कहा, “क्यों रे, अब तो अकल आई?”
वह सुनता हुआ गुम-सुम खड़ा रहा।
“अच्छा पतंग – वाला कौन सा है? दाई तरफ का वह चौराहे वाला?”
उसने कुछ ओठों में ही बड़बड़ा दिया। जिसे मैं कुछ न समझ सका।
“वह चौराहे वाला? बोलो -“
“हाँ।”
“देखो, अपने चाचा के साथ चले जाओ। बता देना कि कौन-सा है। फिर उसे स्वयं भुगत लेंगे। समझते हो न?”
यह कहकर मैंने अपने भाई को बुलवाया। सब बात समझाकर कहा, “देखो, पाँच आने के पैसे ले जाओ। पहले तुम दूर रहना। आशुतोष पैसे ले जाकर उसे देगा और अपनी पाजेब माँगेगा। अव्वल तो वह पाजेब लौटा ही देगा। नहीं तो उसे डाँटना और कहना कि तुझे पुलिस के सुपुर्द कर दूँगा। बच्चों से माल ठगता है? समझे? नरमी की जरूरत नहीं है।”
“और आशुतोष अब जाओ अपने चाचा के साथ जाओ।” वह अपनी जगह पर खड़ा था सुनकर भी टस-से-मस होता दिखाई नहीं दिया।
“नहीं जाओगे?”
उसने सिर हिला दिया कि नहीं जाऊँगा।
मैंने तब उसे समझाकर कहा कि “भैया घर की चीज है, दाम लगे हैं। भला पाँच आने में रुपया का माल किसी के हाथ खो दोगे। जाओ, चाचा के संग जाओ। तुम्हें कुछ नहीं कहना होगा। हाँ, पैसे दे देना और अपनी चीज वापस माँग लेना। दे दे, नहीं दे, नहीं दे। तुम्हारा इससे सरोकार नहीं सच है न बेटे! अब जाओ।”
पर वह जाने को तैयार ही नहीं दीखा। मुझे लड़के की गुस्ताखी पर बड़ा बुरा मालूम हुआ। बोला, “इसमें बात क्या है। इसमें मुश्किल कहाँ है? समझाकर बात कर रहे हैं सो समझता ही नहीं, सुनता ही नहीं।”
मैंने कहा कि, “क्यों रे, नहीं जाएगा?”
उसने फिर सिर हिला दिया कि नहीं जाऊँगा।

शब्दार्थ-
क्रोध- गुस्सा
डपटकर डाँटते हुए
पीला पड़ जाना- डर से चेहरा पीला हो जाना
कोठरी छोटा बंद कमरा
मूँद दिया- बंद कर दिया
सूजा हुआ फूला हुआ
बड़बड़ाना धीमे-धीमे बोलना
चौराहा- जहाँ कई रास्ते मिलते हों
भुगत लेंगे- सामना करेंगे
सुपुर्द- सौंपना
नरमी- कोमलता
टस-से-मस होना– ज़रा भी हिलना
सरोकार संबंध, मतलब
गुस्ताखी अशिष्टता, उदंडता

व्याख्या- लेखक बताता है कि उसे धीरे-धीरे क्रोध आने लगता है। वह आशुतोष को डाँटते हुए कहता है कि वह सच क्यों नहीं बोल रहा है और उससे स्पष्ट रूप से पूछता है कि कितनी इकन्नियाँ थीं और कुल कितना पैसा था। आशुतोष चुपचाप गुम-सुम खड़ा रहता है और कोई उत्तर नहीं देता। लेखक बार-बार उससे बोलने को कहता है और चेतावनी भी देता है, लेकिन वह फिर भी मौन रहता है। इससे आशुतोष डर जाता है, फिर भी वह कुछ नहीं कह पाता।
लेखक बताता है कि जब आशुतोष बार-बार पूछने पर भी उत्तर नहीं देता, तो वह गुस्से में आकर उसके कान खींच लेता है। इसके बावजूद आशुतोष बिना रोए चुपचाप खड़ा रहता है। वह डर के कारण पीला पड़ जाता है, लेकिन फिर भी बोल नहीं पाता। तब लेखक नौकर बंसी को बुलाकर आदेश देता है कि आशुतोष को कोठरी में बंद कर दिया जाए। बंसी उसे उठाकर कोठरी में बंद कर देता है।
कुछ समय बाद लेखक उसे फिर बुलवाता है। वह देखता है कि आशुतोष का मुँह सूजा हुआ है और उसके होंठ बिना आवाज़ के हिल रहे हैं, लेकिन वह अब भी रोता नहीं है। लेखक उससे पूछता है कि क्या अब उसे अक्ल आई है, पर वह फिर भी गुम-सुम खड़ा रहता है। लेखक यह जानने की कोशिश करता है कि पतंग वाला कौन-सा है और चौराहे वाले का ज़िक्र करता है। आशुतोष बहुत धीमे स्वर में कुछ बुदबुदाता है, जिसे लेखक समझ नहीं पाता, फिर वह ‘हाँ’ में उत्तर देता है।
इसके बाद लेखक अपने भाई को बुलाकर सारी बात समझाता है और निर्देश देता है कि वह पाँच आने पैसे लेकर जाएँ। वह कहता है कि आशुतोष पैसे देगा और अपनी पाजेब माँगेगा, और यदि पतंग वाला मना करे तो उसे डाँटना और पुलिस में देने की धमकी देना। लेखक आशुतोष को भी अपने चाचा के साथ जाने के लिए कहता है, लेकिन वह अपनी जगह से हिलता भी नहीं है। बार-बार पूछने पर भी वह सिर हिलाकर मना कर देता है।
लेखक उसे समझाता है कि यह घर की चीज़ है और पाँच आने में रुपये का सामान किसी को देना ठीक नहीं है। वह आशुतोष से कहता है कि उसे कुछ बोलने की ज़रूरत नहीं है, बस पैसे देकर अपनी चीज़ वापस माँग ले। फिर भी आशुतोष जाने को तैयार नहीं होता। लेखक को उसकी इस ज़िद और गुस्ताखी पर बहुत बुरा लगता है और वह मन ही मन सोचता है कि इतनी सरल बात को भी वह न तो समझ रहा है और न ही सुन रहा है। 

 

पाठ – मैंने प्रकाश, अपने छोटे भाई को बुलाया। कहा, “प्रकाश इसे पकड़कर ले जाओ।”
प्रकाश ने उसे पकड़ा और आशुतोष अपने हाथ-पैरों से उसका प्रतिकार करने लगा। वह साथ जाना नहीं चाहता था।
मैंने अपने ऊपर बहुत जब्र करके फिर आशुतोष को पुचकारा, कहा कि जाओ भाई! डरो नहीं। अपनी चीज घर में आयेगी। इतनी-सी बात समझते नहीं। प्रकाश इसे गोदी में ले जाओ और जो चीज़ माँगे उसे बाजार से दिलवा देना। जाओ भाई, आशुतोष!
पर उसका मुँह फूला हुआ था। जैसे-तैसे बहुत समझाने पर वह प्रकाश के साथ चला। ऐसे चला मानो पैर उठाना उसे भारी हो रहा हो आठ बरस का यह लड़का होने आया फिर भी देखो न किसी भी बात की उसमें समझ नहीं है। मुझे जो गुस्सा आया तो क्या बतलाऊँ। लेकिन यह याद करके कि गुस्से से बच्चे संभलने की जगह बिगड़ते हैं। मैं अपने को दबाता चला गया। खैर, वह गया तो मैंने चैन की सांस ली।
लेकिन देखता क्या हूँ कि कुछ देर में प्रकाश लौट आया है।
मैंने पूछा, “क्यों?”बोला कि आशुतोष भाग आया है।
मैंने कहा कि, “अब वह कहाँ है?”
“वह रूठा खड़ा है घर में नहीं आता।”
“जाओ पकड़कर तो लाओ।”
वह पकड़ा हुआ आया। मैंने कहा, “क्यों रे, तू शरारत से बाज नहीं आयेगा? बोल, “जायेगा कि नहीं?”
वह नहीं बोला, तो मैंने कसकर उसे दो चांटे दिये। थप्पड़ लगते ही वह एकदम चीखा, पर फौरन चुप हो गया। वह वैसे ही मेरे सामने खड़ा रहा।
मैंने उसे देखकर मारे गुस्से से कहा कि ले जाओ इसे मेरे सामने से। जाकर कोठरी में बन्द कर दो। दुष्ट!
इस बार वह आध-एक घंटे बन्द रहा। मुझे ख्याल आया कि मैं ठीक नहीं कर रहा हूँ, लेकिन जैसे कि दूसरा रास्ता न दीखता था। मार-पीटकर मन को ठिकाना देने की आदत पड़ गई थी, और कुछ अभ्यास न था।
खैर, मैंने इस बीच प्रकाश को कहा कि तुम दोनों पतंग वाले के पास जाओ। मालूम करना कि किसने पाजेब ली है। होशियारी से मालूम करना। मालूम होने पर सख्ती करना। मुरौव्वत की जरूरत नहीं समझे?
प्रकाश गया पर लौटने पर बताया कि किसी के पास पाजेब नहीं है।
सुनकर मैं झल्ला आया, कहा कि तुमसे कुछ काम नहीं हो सकता। जरा-सी बात नहीं हुई, तुमसे क्या उम्मीद रखी जाये?
वह अपनी सफाई देने लगा। मैंने कहा, “बस तुम जाओ।”

शब्दार्थ-
प्रतिकार- कार्य आदि को रोकने के लिए किया जाने वाला प्रयत्न
जबर- ज़ोर, बल
पुचकारा प्यार से समझाया
मुँह फूला हुआ- नाराज़ और उदास चेहरा
जैसे-तैसे- बड़ी मुश्किल से
चैन की साँस ली- राहत महसूस की
रूठा- नाराज़
शरारत बदमाशी
बाज़ नहीं आएगा– मानेगा नहीं
दुष्ट शरारती, बुरा
आध-एक घंटा लगभग आधा घंटा
ख्याल आया- ध्यान आया
मार-पीट पिटाई
मन को ठिकाना देना- गुस्सा निकालना
अभ्यास आदत
होशियारी से समझदारी से
सख्ती- कठोरता
मुरौव्वत- उदारता
झल्ला आया- बहुत गुस्सा आया
उम्मीद- आशा
सफाई देना अपना पक्ष रखना

व्याख्या- लेखक बताता है कि वह अपने छोटे भाई प्रकाश को बुलाता है और उससे कहता है कि वह आशुतोष को पकड़कर ले जाए। प्रकाश उसे पकड़ता है, लेकिन आशुतोष हाथ-पैर मारकर विरोध करता है, क्योंकि वह उसके साथ जाना नहीं चाहता। लेखक बताता है कि वह अपने ऊपर बहुत ज़ोर डालकर फिर आशुतोष को प्यार से समझाता है और उससे कहता है कि वह डरे नहीं और अपनी चीज़ वापस घर आ जाएगी। वह उसे समझाता है कि इतनी-सी बात वह क्यों नहीं समझ पा रहा है और प्रकाश से कहता है कि वह आशुतोष को गोद में ले जाए और रास्ते में जो चीज़ वह माँगे, उसे बाजार से दिलवा दे।
फिर भी आशुतोष का मुँह फूला रहता है। बहुत समझाने-बुझाने के बाद वह भारी मन से प्रकाश के साथ चला जाता है, मानो उसके लिए पैर उठाना भी कठिन हो। लेखक मन ही मन सोचता है कि आठ वर्ष का होने पर भी उसमें समझ नहीं है और उसे बहुत गुस्सा आता है, लेकिन वह यह याद करके अपने क्रोध को दबाता रहता है कि गुस्से से बच्चे सुधरने के बजाय बिगड़ जाते हैं। जब आशुतोष चला जाता है, तो लेखक चैन की साँस लेता है।
कुछ देर बाद लेखक देखता है कि प्रकाश अकेला लौट आया है। पूछने पर वह बताता है कि आशुतोष भाग आया है और घर के बाहर रूठा खड़ा है। लेखक उसे पकड़कर लाने का आदेश देता है। आशुतोष को पकड़कर लाया जाता है। लेखक उससे पूछता है कि क्या वह शरारत छोड़ देगा, लेकिन जब वह चुप रहता है, तो लेखक गुस्से में उसे दो थप्पड़ मार देता है। थप्पड़ लगते ही वह चीखता है, फिर तुरंत चुप हो जाता है और उसी तरह सामने खड़ा रहता है।
लेखक अत्यधिक क्रोध में उसे अपने सामने से हटाने और कोठरी में बंद करने का आदेश देता है। इस बार आशुतोष आधे से एक घंटे तक बंद रहता है। लेखक स्वीकार करता है कि उसे भीतर से लगता है कि वह ठीक नहीं कर रहा, लेकिन उसे कोई दूसरा रास्ता दिखाई नहीं देता, क्योंकि मार-पीट से मन का गुस्सा निकालने की उसे आदत पड़ गई है।
इसके बाद लेखक प्रकाश को निर्देश देता है कि वह दोनों पतंग वाले के पास जाकर होशियारी से पता लगाए कि पाजेब किसने ली है और जानकारी मिलने पर सख्ती करे, नरमी न बरते। प्रकाश जाकर लौटता है और बताता है कि किसी के पास पाजेब नहीं है। यह सुनकर लेखक झल्ला जाता है और कहता है कि प्रकाश से कोई काम नहीं हो सकता और उससे किसी उम्मीद का कोई लाभ नहीं है। जब प्रकाश अपनी सफाई देने लगता है, तो लेखक उसे चुप करा कर जाने के लिए कह देता है।

 

पाठ – प्रकाश मेरा बहुत लिहाज मानता था। वह मुँह डालकर चला गया। कोटरी खुलवाने पर आशुतोष को फर्श पर सोता पाया। उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं थे। सच पूछो तो मुझे उस समय बालक पर करुणा हुई। लेकिन आदमी में एक ही साथ जाने क्या-क्या विरोधी भाव उठते हैं।
मैंने उसे जगाया। वह हड़बड़ाकर उठा। मैंने कहा, “कहो, क्या हालत है?”
थोड़ी देर तक वह समझा ही नहीं। फिर शायद पिछला सिलसिला याद आया। झट उसके चेहरे पर वही जिद, अकड़ और प्रतिरोध के भाव दिखाई देने लगे।
मैंने कहा कि या तो राजी-राजी चले जाओ, नहीं तो इस कोठरी में फिर बन्द किए देते हैं।
आशुतोष पर इसका विशेष प्रभाव पड़ा हो, ऐसा नहीं मालूम हुआ ।
खैर, उसे पकड़कर लाया और समझाने लगा। मैंने निकालकर उसे एक रुपया दिया और कहा, “बेटा, इसे पतंग वाले को देना और पाजेब माँग लेना। कोई घबराने की बात नहीं। तुम तो समझदार लड़के हो।”
उसने कहा कि जो पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह कहाँ से देगा?
“इसका क्या मतलब, तुमने कहा न कि पाँच आने में पाजेब दी है! न हो छुन्नू को भी साथ ले लेना। समझे?”
वह चुप हो गया। आखिर समझाने पर जाने को तैयार हुआ। मैंने प्रेम पूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने को कहा। उसका मुँह भारी देखकर डाँटने वाला ही था कि इतने में सामने उसकी बुआ दिखाई दी।
बुआ ने आशुतोष के सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहाँ जा रहे हो, मैं तो तुम्हारे लिए केले और मिठाई लाई हूँ।
आशुतोष का चेहरा रूठा ही रहा। मैंने बुआ से कहा कि उसे रोको मत, जाने दो।
आशुतोष रुकने को उद्यत था। वह चलने में आनाकानी दिखाने लगा।
बुआ ने पूछा, “क्या बात है?”
मैंने कहा, “कोई बात नहीं जाने दो न उसे । “
पर आशुतोष मचलने पर आ गया था। मैंने डाँटकर कहा, “प्रकाश, इसे ले क्यों नहीं जाते हो।”
बुआ ने कहा कि “बात क्या है? क्या बात है?”
मैंने पुकारा, “तू बंसी- भी साथ जा। बीच से लौटने न पावे।” सो मेरे आदेश पर दोनों आशुतोष को जबरदस्ती उठाकर सामने से ले गए। बुआ ने कहा, “क्यों उसे सता रहे हो?”
मैंने कहा कि कुछ नहीं, जरा यों ही-
फिर मैं उनके साथ इधर-उधर की बातें ले बैठा। राजनीति राष्ट्र की ही नहीं होती मुहल्ले में भी राजनीति होती है। यह भार स्त्रियों पर टिकता है। कहाँ क्या हुआ, क्या होना चाहिए इत्यादि चर्चा स्त्रियों को लेकर रंग फैलाती है। इसी प्रकाश की कुछ बातें हुई, फिर छोटा-सा बक्सा सरकाकर बोली, इनमें वह कागज है तो तुमने माँगे थे और यहाँ-
यह कहकर उन्होंने अपनी बास्कट की जेब में हाथ डालकर पाजेब निकालकर सामने की, जैसे सामने बिच्छू हो। मैं भयभीत भाव से कह उठा कि यह क्या?

Pajeb Summary img 1

बोली कि उस रोज भूल से यह एक पाजेब मेरे साथ ही चली गयी थी।

शब्दार्थ-
लिहाज़ मानता था– आदर करता था, सम्मान करता था
मुँह डालकर उदास होकर
फर्श- ज़मीन
करुणा दया
विरोधी भाव- उल्टी भावनाएँ
हड़बड़ाकर- घबराकर, जल्दी से
सिलसिला- घटना-क्रम
प्रतिरोध विरोध
अकड़ कठोरता
राज़ी-राज़ी- खुशी से, बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती
विशेष प्रभाव खास असर
खैर- ठीक है
पाजेब- पायल
प्रेमपूर्वक प्यार से
रूठा- नाराज़
उद्यत तैयार
आनाकानी टालमटोल, हिचकिचाहट
मचलना- ज़िद करने लगना
भयभीत डरा हुआ
बास्कट वेस्टकोट 

व्याख्या- लेखक बताता है कि प्रकाश उसका बहुत आदर करता है, इसलिए वह उदास मुँह बनाकर चला जाता है। कोठरी खुलवाने पर लेखक आशुतोष को फर्श पर सोता हुआ पाता है और उसके चेहरे पर अब भी आँसू नहीं होते। लेखक स्वीकार करता है कि उस समय उसे बालक पर करुणा आती है, पर साथ ही यह भी अनुभव करता है कि मनुष्य के भीतर एक साथ अनेक विरोधी भाव उठते रहते हैं।
लेखक आशुतोष को जगाता है। वह घबराकर उठता है। लेखक उससे उसकी हालत पूछता है। कुछ देर तक वह स्थिति को समझ नहीं पाता, फिर उसे पिछली घटनाएँ याद आ जाती हैं और उसके चेहरे पर फिर से जिद, अकड़ और विरोध के भाव दिखाई देने लगते हैं। लेखक उसे चेतावनी देता है कि या तो वह अपनी मर्जी से चले या फिर उसे दोबारा कोठरी में बंद कर दिया जाएगा, पर इसका उस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता।
इसके बाद लेखक उसे पकड़कर बाहर लाता है और समझाने लगता है। वह आशुतोष को एक रुपया देता है और उससे कहता है कि वह यह पैसा पतंग वाले को दे और पाजेब माँग ले, तथा घबराने की कोई बात नहीं है क्योंकि वह समझदार लड़का है। आशुतोष कहता है कि अगर पाजेब उसके पास नहीं हुई तो वह उसे कहाँ से देगा। लेखक उसे याद दिलाता है कि उसने स्वयं कहा है कि पाँच आने में पाजेब दी गई थी और उसे सलाह देता है कि चाहे तो छुन्नू को भी साथ ले जाए। इस पर आशुतोष चुप हो जाता है और अंत में समझाने पर जाने के लिए तैयार हो जाता है। लेखक प्रेमपूर्वक उसे प्रकाश के साथ जाने के लिए कहता है।
इसी बीच आशुतोष की बुआ सामने आ जाती है। वह उसके सिर पर हाथ रखकर पूछती है कि वह कहाँ जा रहा है और बताती है कि वह उसके लिए केले और मिठाई लाई है। आशुतोष का चेहरा फिर भी रूठा रहता है। लेखक बुआ से कहता है कि वह उसे न रोके और जाने दे। आशुतोष रुकने की कोशिश करता है और चलने में आनाकानी दिखाता है। बुआ कारण पूछती है, पर लेखक टाल देता है और प्रकाश को डाँटकर उसे ले जाने को कहता है। फिर वह बंसी को भी साथ भेज देता है ताकि आशुतोष बीच रास्ते से लौट न सके। आदेश के अनुसार दोनों उसे जबरदस्ती ले जाते हैं।
बुआ लेखक से पूछती है कि वह बच्चे को क्यों सता रहा है। लेखक बात टाल देता है और फिर इधर-उधर की बातें करने लगता है। वह टिप्पणी करता है कि राजनीति केवल राष्ट्र की ही नहीं होती, बल्कि मुहल्ले में भी होती है और इसका भार प्रायः स्त्रियों पर ही टिकता है। बातचीत के दौरान बुआ एक छोटा बक्सा सरकाकर बताती है कि उसमें वे कागज हैं जो लेखक ने माँगे थे। इसके बाद वह अपनी बास्कट की जेब से पाजेब निकालकर सामने रख देती है। लेखक भय और आश्चर्य से पूछता है कि यह क्या है। तब बुआ बताती है कि उस दिन भूल से यह एक पाजेब उसके साथ चली गई थी।

 

Conclusion

इस पोस्ट में ‘पाजेब’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ PSEB कक्षा 9 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। रचनाकार जैनेंद्र कुमार ने इस कहानी में पाजेब के खो जाने जैसी एक साधारण-सी घटना के माध्यम से बच्चों की मासूम प्रवृत्ति, उनका भय, उनकी सच्चाई और बड़ों की कठोर तथा संदेहपूर्ण मानसिकता को बताया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।