पंच परमेश्वर पाठ सार
PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 7 “Panch Parmeshwar” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings
पंच परमेश्वर सार – Here is the PSEB Class 9 Hindi Book Chapter 7 Panch Parmeshwar Summary with detailed explanation of the lesson “Panch Parmeshwar” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, along with summary
इस पोस्ट में हम आपके लिए पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड कक्षा 9 हिंदी पुस्तक के पाठ 7 पंच परमेश्वर पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 9 पंच परमेश्वर पाठ के बारे में जानते हैं।
Panch Parmeshwar (पंच परमेश्वर)
प्रस्तुत कहानी में लेखक ने न्यायप्रियता और मित्रता का वर्णन किया है। जब कोई साधारण मानव पंच के आसन पर आसीन हो जाता है तो वह भी अपने-पराये, ईर्ष्या द्वेष के स्तर से ऊपर उठकर न्याय करने लगता है। न्याय के अतिरिक्त उसे कुछ नहीं सूझता। यह कहानी संदेश देती है कि निष्पक्ष न्याय को हर जगह सराहा जाता है। यदि कभी किसी को न्याय करने का उत्तरदायित्व दिया जाए तो उसे सभी सांसारिक बंधनों – काम क्रोध मद लोभ और मोह से ऊपर उठकर न्याय करना चाहिए।
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पंच परमेश्वर पाठ सार Panch Parmeshwar Summary
‘पंच-परमेश्वर’ मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक बहुत ही प्रसिद्ध कहानी है। यह कहना बिलकुल सार्थक होगा कि यह कहानी एक आदर्शवादी कहानी है। ‘पंच-परमेश्वर’ कहानी में जुम्मन शेख और अलगू चौधरी दोनों की बहुत गहरी मित्रता थी। दोनों मिलकर एक साथ खेती करते थे। दोनों को एक-दूसरे पर बहुत गहरा विश्वास था। दोनों में से जब किसी एक को कोई काम होता तो वह दूसरे के भरोसे अपना घर, सम्पत्ति छोड़ देता था। कहानी के अनुसार मित्रता का मूल मंत्र ही आपसी विचारों का मिलना है। जुम्मन शेख की एक बूढ़ी मौसी थी। मौसी के नाम थोड़ी-सी ज़मीन थी। किंतु उसका कोई निकट संबंधी नहीं था। इसी कारण जुम्मन ने मौसी से लम्बे-चौड़े वादे किए और उनकी ज़मीन को अपने नाम लिखवा लिया। जब तक कानूनी रूप से ज़मीन जुम्मन के नाम नहीं हुई थी तब तक जुम्मन तथा उसके परिवार ने मौसी का खूब आदर-सत्कार किया। परन्तु जिस दिन से रजिस्ट्री पर मोहर लगी, उसी समय से सभी प्रकार की सेवाओं पर भी मोहर लग गई। जुम्मन की पत्नी अब मौसी को बात-बात पर कोसती रहती थी। जुम्मन शेख भी मौसी का ध्यान नहीं रखते थे। एक दिन जब मौसी से सहा नहीं गया तो उसने जुम्मन से कहा कि वह उसे हर महीने रुपये दे दिया करे ताकि वह स्वयं अपना भोजन पकाकर खा सके। उसके परिवार के साथ अब उसका निर्वाह नहीं हो सकेगा। जब जुम्मन ने मौसी की बात को मानने से इंकार कर दिया तो मौसी ने पंचायत करने की धमकी दी। जिस पर जुम्मन मन ही मन खूब प्रसन्न हुआ क्योंकि उसे विश्वास था कि पंचायत में उसी की जीत होगी। इसका कारण यह था कि सारा इलाका उसका किसी न किसी कारण से ऋणी था। बूढ़ी मौसी कई दिनों तक लकड़ी का सहारा लिए गाँव-गाँव घूमती रही, वह सभी को अपनी दुःख भरी कहानी सुनाती रही। सारे गाँव में घूमने के बाद अंत में घूमते-घूमते मौसी अलगू चौधरी के पास जाकर उसे पंचायत में आने का निमंत्रण देने लगी। अलगू चौधरी मान तो गया परन्तु जुम्मन का पक्का मित्र होने के कारण उसने वहाँ चुप चाप बैठने का निश्चय किया। इस बात पर मौसी ने विरोध किया कि क्या वह मित्रता बिगड़ जाने के डर से सच का साथ भी नहीं देगा। मौसी द्वारा कहे गए शब्दों का अलगू के पास कोई उत्तर नहीं था। आखिरकार एक दिन शाम के समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। जुम्मन शेख ने पंचायत में आने वाले सभी लोगों के सत्कार का पूरा प्रबंध कर रखा था। पंचों के बैठने के बाद बूढ़ी मौसी अपने पक्ष में कहने लगी कि तीन वर्ष पहले उसने अपनी सारी जमीन व् सम्पति जुम्मन शेख के नाम लिख दी थी। जुम्मन शेख ने भी उसे उम्र भर रोटी कपड़ा देना स्वीकार किया था। साल भर तो किसी तरह रो-पीट कर दिन निकाल लिए लेकिन अब वह उनका अत्याचार नहीं सहन कर पा रही है। अब इस पर पंचों का जो भी आदेश होगा वह उसे स्वीकार कर लेगी। मौसी और सभी ने मिलकर अलगू चौधरी को सरपंच बना दिया। जुम्मन ने अपने भाव अपने मन में रखते हुए अलगू का सरपंच बनना स्वीकार किया। अलगू के सरपंच बनने पर रामधन मिश्र और जुम्मन के अन्य विरोधी लोग मौसी को अपने मन ही मन कोसने लगे। क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वह जुम्मन के हक़ में ही फैसला सुनाएगा। परन्तु अलगू ने सरपंच के पद की महिमा का आदर करते हुए अनेक प्रश्न किए और एक-एक प्रश्न जुम्मन को हथौड़े की एक-एक चोट के समान लग रहा था। अंत में अलगू चौधरी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि बूढ़ी मौसी की जायदाद से इतना लाभ अवश्य होगा कि उसे महीने का खर्च दिया जा सके। इसलिए जुम्मन को मौसी को महीने का खर्च देना ही होगा। यदि जुम्मन को फैसला अस्वीकार है तो जायदाद की रजिस्ट्री रद्द समझी जाए। सभी ने अलगू के फैसले की बहुत तारीफ की।
अलगू के इस फैसले ने जुम्मन के साथ उसकी दोस्ती की जड़ों को पूरी तरह से हिला दिया था। जुम्मन दिन-रात बदला लेने की सोचता रहता था। शीघ्र ही जुम्मन की प्रतिक्षा समाप्त हुई। क्योंकि अलगू चौधरी पिछले वर्ष ही बटेसर से बैलों की एक जोड़ी खरीद लाया था। बैल पछाही जाति के थे। दुर्भाग्यवश पंचायत के एक महीने बाद अलगू के बैलों की जोड़ी में से एक बैल मर गया। अकेला बैल अलगू के किसी काम का नहीं था। इसलिए उसने बैल समझू साहू को बेच दिया। बैल की कीमत एक महीने बाद देने की बात निश्चित हुई। नया व् स्वस्थ बैल मिलने से समझू साहू दिन में तीन-तीन, चार-चार चक्कर लगाने लगे। उन्हें केवल अपने काम और मुनाफे से मतलब था। बैल की देख-रेख तथा चारे से उन्हें कोई लेना-देना नहीं था। भोजन-पानी के अभाव व् अत्यधिक कठिन परिश्रम करने के कारण एक दिन सामान लाते हुए रास्ते में बैल ने दम तोड़ दिया। सामान अधिक व् कीमती होने के कारण समझू साहू को रास्ते में ही रात बितानी पड़ी। सुबह जब वह उठे तो उनके धन की थैली तथा तेल के कुछ कनस्तर चोरी हो चुके थे। समझू साहू रोते-पीटते घर पहुँचे। काफी दिनों के बाद अलगू चौधरी अपने बैल की कीमत लेने समझू साहू के घर गए, किंतु साहू ने पैसे देने के स्थान पर अलगू को भला बुरा कहना शुरू कर दिया। अतः अलगू न्याय के लिए पंचायत के पास गए। इस बार सरपंच जुम्मन शेख को चुना गया। सरपंच के पद पर आसीन होने पर जुम्मन शेख को सरपंच के उत्तदायित्व का एहसास हुआ और सरपंच के रूप जुम्मन ने न्याय संगत फैसला सुनाया। उसने समझू साहू को दोषी मानते हुए अलगू को बैल की कीमत लेने का हकदार बताया। क्योंकि जिस समय समझू साहू ने बैल खरीदा था। उस समय वह पूर्णत: स्वस्थ था। बैल की मृत्यु का कारण बीमारी न होकर अधिक परिश्रम करना था, जुम्मन के फैसले को सुनकर चारों तरफ ‘पंच परमेश्वर की जय’ के नारे गूँजने लगे। अलगू ने जुम्मन को गले से लगा लिया। दोनों के नेत्रों से गिरते आँसुओं ने दोनों के दिलों के मैल को धो दिया। दोनों की दोस्ती रूपी लता जो कभी मुरझा गई थी वह अब फिर से हरी-भरी हो गई थी।
पंच परमेश्वर पाठ व्याख्या Panch Parmeshwar Explanation
पाठ – जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाड़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुछ लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे और अलगू जब कभी बाहर जाते तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। उनमें न खान-पान का व्यवहार था, न धर्म का नाता केवल विचार मिलते थे। मित्रता का मूलमंत्र यही है।
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी खाला (मौसी ) थी। उसके पास कुछ थोड़ी-सी मिलकियत थी परंतु निकट संबंधियों में कोई न था। जुम्मन ने लंबे-चौड़े वादे करके वह मिलकियत अपने नाम लिखवा ली। जब तक उसकी रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया। हलवे पुलाव की वर्षा सी की गई पर रजिस्ट्री की मोहर ने इन खातिरदारियों पर मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज, तीखे सालन भी देने लगी।
शब्दार्थ –
गाड़ी – गहरी, पक्की
साझे – इकट्टे
अटल – दृढ़, पक्का
मूलमंत्र – मूख्य साधन, कुंजी
खाला – मौसी
मिलकियत – संपत्ति
रजिस्ट्री – जमीन-जायदाद बेचने-खरीदने के लिए की जाने वाली कानूनी लिखा-पढ़ी
खातिरदारी – सत्कार
सालन – साग आदि की मसालेदार तरकारी
व्याख्या – जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में बहुत गहरी मित्रता थी। खेती भी इकट्ठे ही होती थी। उनके कुछ लेन-देन में भी इकट्ठे ही हिसाब होता था। उन दोनों को एक – दूसरे पर दृढ़ व् पक्का विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब वे अपने घर की जिम्मेदारी अलगू को सौंप कर गए थे और अलगू भी जब कभी बाहर जाते तो जुम्मन पर अपने घर की जिम्मेदारी छोड़ देते थे। उन दोनों में न उनका खान-पान का व्यवहार समान था और न ही उनका धर्म एक समान था। उनके केवल आपस में विचार मिलते थे। और मित्रता का मूख्य साधन या कुंजी यही है कि दो लोगों के विचार मिलने चाहिए।
जुम्मन शेख की एक बूढ़ी मौसी थी। उस मौसी के पास थोड़ी-बहुत सम्पति थी। परंतु उसके निकट संबंधियों अथवा परिवार में कोई भी नहीं था। इसलिए जुम्मन ने उस मौसी से लंबे-चौड़े वादे करके वह सम्पति अपने नाम लिखवा ली थी। जब तक उस सम्पति को कानूनी रूप से जुम्मन के नाम नहीं लिखवा दिया गया, तब तक खालाजान अथवा मौसी का खूब आदर-सत्कार किया गया। उनके लिए हलवे पुलाव की तो जैसे वर्षा सी की गई। परन्तु जैसे ही सम्पति को कानूनी रूप से जुम्मन के नाम लिखवा दिया गया तब मौसी के सारे आदर-सत्कार भी ख़त्म हो गए। जुम्मन की पत्नी करीमन भी मौसी को जब रोटियाँ देती थी तो उसके साथ मसालेदार सब्जी या साग की जगह कड़वी बातें सुनाया करती थी।
पाठ – जुम्मन शेख भी निष्ठुर हो गए। अब बेचारी खालाजान को प्रायः नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं-
“बुढ़िया न जाने कब तक जिएगी! दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया मानो मोल ले लिया है! बघारी दाल के बिना रोटियाँ नहीं उतरतीं! जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से अब तक गाँव मोल ले लेते!”
कुछ दिन खालाजान ने सुना और सहा परंतु जब न सहा गया, तब जुम्मन से शिकायत की। जुम्मन ने स्थानीय कर्मचारी गृहस्वामिनी के प्रबंध में दखल देना उचित न समझा। अंत में एक दिन ख़ाला ने जुम्मन से कहा, “बेटा! तुम्हारे साथ मेरा निर्वाह न होगा। तुम मुझे रुपये दे दिया करो, मैं अपना पका खा लूँगी।”
जुम्मन ने धृष्टता के साथ उत्तर दिया, “रुपए क्या यहाँ फलते हैं?”
खाला ने नम्रता से कहा, “मुझे कुछ रूखा-सूखा चाहिए भी कि नहीं?”
जुम्मन ने गंभीर स्वर में जवाब दिया, “तो कोई यह थोड़े ही समझा था कि तुम मौत से लड़कर आई हो!”
खाला बिगड़ गई, उन्होंने पंचायत करने की धमकी दी। जुम्मन हँसे, जिस तरह कोई शिकार हिरन को जाल की तरफ जाते देखकर मन-ही-मन हँसता है। वह बोले, “हाँ, जरूर पंचायत करो। फ़ैसला हो जाए। मुझे भी यह रात-दिन की खटपट पसंद नहीं।”
शब्दार्थ –
निष्ठुर – कठोर
नित्य – हमेशा
ऊसर – बंजर
बघारी – तड़का, छाँक
गृहस्वामिनी – घर की मालकिन
निर्वाह – गुजारा
धृष्टता – ढिठाई, ढीठपन
खटपट – बहस
व्याख्या – मौसी की हालत देख कर भी अनदेखा करते हुए जुम्मन शेख का व्यवहार भी कठोर हो गया। अब बेचारी खालाजान को हमेशा ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थीं जैसे – बुढ़िया न जाने कब तक जिएगी! दो-तीन बीघे बंजर भूमि क्या दे दी, उसके मोल में तो मानो खाला ने सभी को खरीद ही लिया है! दाल में यदि तड़का न हो तो मौसी से रोटियाँ नहीं खाई जाती! जितना रुपया मौसी के पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गाँव खरीद लेते! कहने का अभिप्राय यह है कि हर दिन मौसी को इसी तरह के ताने सुनने पड़ते थे। कुछ दिन तो मौसी ने सुना और सहन किया, परंतु जब मौसी से ताने सहन नहीं हो पा रहे थे, तब उन्होंने जुम्मन से इसकी शिकायत की। परन्तु जुम्मन ने अपनी पत्नी अथवा घर की मालकिन के व्यवहार में दखल देना उचित नहीं समझा। अंत में परेशान हो कर एक दिन मौसी ने जुम्मन से कहा कि अब उन लोगो के साथ उनका गुजारा नहीं होगा। वे मौसी को रुपये दे दिया करें, जिससे वे अपना भोजन स्वयं पका कर खा लेंगीं।
मौसी की बातों का जुम्मन ने बड़े ही ढीठपन के साथ उत्तर दिया कि रुपए क्या यहाँ फलते हैं? अर्थात रूपए क्या जुम्मन के पास पेड़ पर उगते हैं? इस पर खाला ने नम्रता से कहा कि क्या उन्हें कुछ रूखा-सूखा भी नहीं चाहिए ? अर्थात मौसी अपने गुजारे के लिए जुम्मन से कुछ थोड़ा बहुत माँग कर रही थी। परन्तु इस पर जुम्मन ने गंभीर स्वर में कहा कि उसे यह थोड़े ही समझा था कि मौसी मौत से लड़कर आई है। अर्थात जुम्मन ने तो सोचा था कि मौसी बूढ़ी है तो वह जल्दी मर जाएगी। इस बात पर मौसी बिगड़ गई, और उन्होंने पंचायत करने की धमकी दी। इस बात पर जुम्मन ऐसे हँस दिया, जैसे कोई शिकार हिरन को जाल की तरफ जाते देखकर मन-ही-मन हँसता है। और वह बोला कि मौसी जरूर पंचायत करे। अब फ़ैसला हो जाए। उसे भी रात-दिन की बहस पसंद नहीं है।
पाठ – पंचायत में किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मन को कुछ भी संदेह न था। आसपास के गाँवों में ऐसा कौन था, जो उसके अनुग्रहों का ऋणी न हो? ऐसा कौन था, जो उसको शत्रु बनाने का साहस कर सके? किसमें इतना बल था, जो उसका सामना कर सके ? आसमान के फ़रिश्ते तो पंचायत करने आयेंगे नहीं!
इसके बाद कई दिन तक बूढ़ी खाला हाथ में एक लकड़ी लिए आसपास के गाँवों में दौड़ती रहीं। कमर झुककर कमान हो गई थी।
बिरला ही कोई भला आदमी होगा, जिसके सामने बुढ़िया ने दुःख के आँसू न बहाए हों। ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीन-वत्सल पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने उस अबला के दुखड़े को गौर से सुना हो और उसको सांत्वना दी हो। चारों ओर घूम-घामकर बेचारी अलगू चौधरी के पास आई, “बेटा, तुम भी दमभर के लिए मेरी पंचायत में चले आना।“
अलगू – यों आने को आ जाऊँगा; मगर पंचायत में मुँह न खोलूंगा।
खाला – क्यों बेटा?
अलगू – अब इसका क्या जवाब दूँ? अपनी खुशी! जुम्मन मेरा पुराना मित्र है। उससे बिगाड़ नहीं कर सकता।
खाला – बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे ?
हमारे सोए हुए धर्मज्ञान की सारी संपत्ति लुट जाए तो उसे खबर नहीं होती परंतु ललकार सुनकर वह सचेत हो जाता है, फिर उसे कोई जीत नहीं सकता। अलगू इस सवाल का कोई उत्तर न दे सका पर उसके हृदय में ये शब्द गूँज रहे थे-
‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?’
संध्या समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही फ़र्श बिछा रखा था। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के तंबाकू आदि का प्रबंध भी किया था। हाँ, स्वयं अलबत्ता अलगू चौधरी के साथ जरा दूर पर बैठे हुए थे। जब पंचायत में कोई आ जाता था, तब दबे हुए सलाम उसका स्वागत करते थे।
शब्दार्थ –
संदेह – शक
अनुग्रहों – कृपा
ऋणी – कर्जदार
साहस – हिम्मत
फ़रिश्ते – देवदूत
कमान – धनुष
बिरला – बहुत कम मिलने वाला
दीन-वत्सल – दीनों से प्रेम करने वाले
अबला – बेचारी
दुखड़े – दुःख
सांत्वना – दिलासा, ढास बंधाना
दमभर के लिए – थोड़ी देर के लिए
ईमान – धर्म सत्य
सचेत – सजग, सावधान, होशियार
अलबत्ता – अवश्य, जरूर, लेकिन, बेशक
व्याख्या – यदि मौसी पंचायत जाती है, तो पंचायत में किसकी जीत होगी, इस विषय में जुम्मन को कुछ भी शक नहीं था। आसपास के गाँवों में ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं था, जिस पर जुम्मन ने कृपा न की हो अर्थात जुम्मन ने हर किसी को अपना ऋणी बना रखा था। ऐसा कोई भी नहीं था, जो जुम्मन को अपना शत्रु बनाने की हिम्मत कर सकता था। किसी में इतना बल नहीं था, जो जुम्मन का सामना कर सके। और आसमान से देवदूत तो पंचायत में फैसला करने आयेंगे नहीं, जो सच्चाई सामने लाएँ। इसी कारण जुम्मन को पंचायत का कोई डर नहीं था।
इसके बाद कई दिन तक बूढ़ी मौसी हाथ में एक लकड़ी लिए आसपास के गाँवों में न्याय के लिए दौड़ती रहीं। उनकी कमर झुककर किसी धनुष की तरह हो गई थी। शायद ऐसा कोई भी भला आदमी नहीं होगा, जिसके सामने बुढ़िया ने दुःख के आँसू न बहाए हों। अर्थात मौसी ने लगभग सभी को अपनी दुःख भरी दास्ताँ सूना दी थी। ऐसे न्यायप्रिय, दयालु, दीनों से प्रेम करने वाले पुरुष बहुत कम थे, जिन्होंने उस बेचारी बुढ़िया के दुखड़े को गौर से सुना हो और उसको तसल्ली दी हो। सभी को दुःख भरी दास्ताँ सुनाते-सुनाते घूम-घामकर बेचारी अलगू चौधरी के पास आई और उसे भी थोड़ी देर के लिए पंचायत में चले आने का आग्रह किया। अलगू ने भी कह दिया था कि आने को तो वह आ जाएगा, मगर पंचायत में वह कुछ नहीं बोलेगा। जब मौसी ने इसका कारण पूछा तो अलगू ने इसे अपनी खुशी बता दिया क्योंकि जुम्मन उसका पुराना मित्र है। वह उससे अपनी मित्रता बिगाड़ नहीं सकता। उसका ये कारण सुनकर मौसी ने उससे कहा कि क्या वह मित्रता के बिगड़ने के डर से सच्ची बात भी नहीं कहेगा?
व्यक्ति को धर्म का ज्ञान अवश्य होता है परन्तु व्यक्ति धर्म के अनुसार चलने से कतराता है और धर्म को अनदेखा करने पर व्यक्ति का अंतर्मन भी कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। परन्तु यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके धर्म-ज्ञान पर संदेह करे तो व्यक्ति चौकन्ना हो जाता है, और फिर जब व्यक्ति धर्म के रास्ते पर चलने की ठान लेता है तो फिर कोई उसे हरा नहीं सकता। अलगू भी मौसी के सवाल का कोई उत्तर न दे सका पर उसके मन में मौसी के शब्द गूँज रहे थे कि क्या वह मित्रता के बिगड़ने के डर से सच्ची बात भी नहीं कहेगा?
शाम के समय एक पेड़ के नीचे पंचायत बैठी। शेख जुम्मन ने पहले से ही वहां फ़र्श बिछा रखा था। उन्होंने पान, इलायची, हुक्के तंबाकू आदि का प्रबंध भी किया था। वहां बेशक स्वयं अलगू चौधरी जुम्मन से थोड़ा दूर बैठे हुए थे। जब पंचायत में कोई आ जाता था, तब धीरे से दबे हुए सलाम करके उसका स्वागत करते थे।

पाठ – पंच लोग बैठ गए, तो बूढ़ी खाला ने उनसे विनती की-
“पंचो, आज तीन साल हुए, मैंने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुम्मन के नाम लिख दी थी। इसे आप लोग जानते ही होंगे। जुम्मन ने मुझे ता-हयात रोटी-कपड़ा देना कबूल किया। सालभर तो मैंने इसके साथ रो-धोकर काटा पर अब रात-दिन का रोना नहीं सहा जाता। मुझे न पेट की रोटी मिलती है, न तन का कपड़ा बेकस बेवा हूँ। कचहरी दरबार नहीं कर सकती। तुम्हारे सिवा और किससे अपना दुख सुनाऊँ? तुम लोग जो राह निकाल दो, उसी राह पर चलूँ। मैं पंचों का हुक्म सिर-माथे पर चढ़ाऊँगी।”
रामधन मिश्र, जिनके कई असामियों को जुम्मन ने अपने गाँव में बसा लिया था, , बोले, “जुम्मन मियाँ, किसे पंच बदते हो? अभी से इसका निपटारा कर लो फिर जो कुछ पंच कहेंगे, वही मानना पड़ेगा।”
जुम्मन को इस समय सदस्यों में विशेषकर वे ही लोग दीख पड़े, जिनसे किसी-न-किसी कारण उनका वैमनस्य था । जुम्मन बोले, “पंचों का हुक्म अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहें, उसे पंच बनाएँ।”
खाला ने चिल्लाकर कहा, “अरे अल्लाह के बंदे! पंचों का नाम क्यों नहीं बता देता ? कुछ मुझे भी तो मालूम हो।”
जुम्मन ने क्रोध से कहा, “अब इस वक्त मेरा मुँह न खुलवाओ। तुम जिसे चाहे पंच बना लो।”
खालाजान जुम्मन के आरोप को समझ गई, वह बोली, “बेटा, ख़ुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, न किसी के दुश्मन कैसी बात कहते हो! और तुम्हारा किसी पर विश्वास न हो, तो जाने दो अलगू चौधरी को तो मानते हो? लो, मैं उन्हीं को सरपंच बनाती हूँ।”
जुम्मन शेख आनंद से फूल उठे परंतु भावों को छिपाकर बोले, “अलगू ही सही, मेरे लिए जैसे रामधन वैसे अलगू।”
अलगू इस झमेले में फँसना नहीं चाहते थे। वे कन्नी काटने लगे। बोले, “खाला, तुम जानती हो कि मेरी जुम्मन से गाड़ी दोस्ती है।”
खाला ने गंभीर स्वर में कहा, “बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंचों के दिल में ख़ुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो बात निकलती है, वह ख़ुदा की तरफ से निकलती है।”
शब्दार्थ –
ता-हयात – तमाम उम्र
कबूल – मंजूर
बेकस – निस्सहाय
बेवा – विधवा
कचहरी – न्यायालय, अदालत
सिवा – अलावा
असामियों – किसी महाजन या दुकानदार से लेन देन
वैमनस्य – बैर, विरोध
झमेले – झगड़ा, बखेड़ा, समस्या
कन्नी काटना – सामने आने से बचना, कतरा कर निकल जाना, आँख बचाकर भाग जाना
व्याख्या – जब पंचायत में पंच लोग बैठ गए, तो बूढ़ी मौसी ने उनसे प्रार्थना की कि आज इस बात को तीन साल हो गए है, कि उसने अपनी सारी जायदाद अपने भानजे जुम्मन के नाम लिख दी थी। इसे तो सभी लोग जानते ही होंगे। उस जायदाद के बदले जुम्मन ने उसे सारी उम्र रोटी-कपड़ा देना मंजूर किया था। सालभर तो उसने जुम्मन के परिवार साथ रो-धोकर काटा पर अब उससे रात-दिन का रोना सहा नहीं जाता। जुम्मन के घर न तो उसे भर पेट रोटी मिलती है, न ही शरीर का कपड़ा। वह निस्सहाय विधवा है। न्यायालय के चक्कर नहीं लगा सकती। पंचायत के अलावा और किससे वह अपना दुख सूना सकती है। पंच लोग जो रास्ता निकाल देंगे, वह उसी रास्ते पर चलने को तैयार है। वह पंचों का हुक्म बिना किसी बहस के मान लेगी।
पंचों में रामधन मिश्र एक था, जिनके कई महाजन या दुकानदारों को जुम्मन ने अपने गाँव में बसा लिया था, अर्थात वह भी जुम्मन का ऋणी था। वह जुम्मन से बोला कि वह बता दे कि वह किसे पंच चुनता है, इसी समय इस बात का निर्णय ले लो फिर बाद में जो कुछ पंच कहेंगे, उसे वही मानना पड़ेगा। जुम्मन को इस समय वहां मौजूद सदस्यों में विशेषकर वे ही लोग दिख रहे थे, जिनसे किसी-न-किसी कारण उनका विरोध था। उन्हें देखकर जुम्मन बोला कि पंचों का हुक्म अल्लाह का हुक्म है। खालाजान जिसे चाहें, उसे पंच बना दे। खाला ने भी चिल्लाकर कहा कि अरे अल्लाह के बंदे! पंचों का नाम क्यों नहीं बता देता ? जिससे कुछ उसे भी तो मालूम हो। जुम्मन ने भी गुस्से से कहा कि अब इस वक्त मौसी उसका मुँह न खुलवाए। वह जिसे चाहे पंच बना ले। खालाजान जुम्मन के आरोप को समझ गई थी कि वहां मौजूद लोगों में ज्यादातर जुम्मन के विरोधी हैं और जुम्मन को लग राह है कि मौसी उसके विरोधियों को ही पंच चुनेगी इसलिए वह बोली कि बेटा, ख़ुदा से डरो। पंच न किसी के दोस्त होते हैं, न किसी के दुश्मन कैसी बात कहते हो! और अगर उसका किसी पर विश्वास नहीं है, तो जाने दो वह अलगू चौधरी को तो मानता है, इसलिए मौसी उसी को ही सरपंच चुनती है।
जुम्मन शेख यह सुनकर बहुत खुश हो गया क्योंकि अलगू चौधरी उसका पक्का मित्र है और वह उसी का साथ देगा। परंतु अपने भावों को छिपाकर वह बोला कि अलगू ही सही, क्योंकि उसके लिए तो जैसे रामधन है वैसे ही अलगू है।
अलगू मौसी और जुम्मन के इस झगडे में नहीं फँसना चाहता था। इसलिए अलगू सरपंच न बनने के बहाने बनाने लगा कि मौसी को पता है कि अलगू और जुम्मन की पक्की दोस्ती है। परन्तु मौसी ने गंभीर स्वर में कहा कि बेटा, दोस्ती के लिए कोई अपना ईमान नहीं बेचता। पंचों के दिल में ख़ुदा बसता है। पंचों के मुँह से जो बात निकलती है, वह ख़ुदा की तरफ से निकलती है। अर्थात मौसी ने अगलू पर पूरा विश्वास दिखाया।
पाठ – अलगू चौधरी सरपंच हुए। रामधन मिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों ने बुढ़िया को मन में बहुत कोसा।
अलगू चौधरी बोले, “शेख जुम्मन ! हम और तुम पुराने दोस्त हैं। जब काम पड़ा, तुमने हमारी मदद की है और हम भी जो कुछ बन पड़ा, तुम्हारी सेवा करते रहे हैं मगर इस समय तुम और बूढ़ी खाला, दोनों हमारी निगाह में बराबर हो। तुमको पंचों से जो कुछ अर्जार्ज करनी हो, करो।”
जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अब बाजी मेरी है। अलगू यह सब दिखावे की बातें कर रहा है। अतएव शांत चित्त होकर बोले, “पंचो, तीन साल हुए, खालाजान ने अपनी जायदाद मेरे नाम लिख दी थी। मैंने उन्हें ता-हयात खाना-कपड़ा देना कबूल किया था। ख़ुदा गवाह है, आज तक मैंने खालाजान को कोई तकलीफ नहीं दी। मैं उन्हें अपनी माँ के समान समझता हूँ। उनकी ख़िदमत करना मेरा फर्ज़ है; मगर औरतों में जरा अनवन रहती है, इसमें मेरा क्या बस है? खालाजान मुझसे माहवार खर्च अलग माँगती हैं। जायदाद जितनी है, वह पंचों से छिपी नहीं। उससे इतना मुनाफ़ा नहीं होता कि माहवार खर्च दे सकूँ।”
अलगू चौधरी को हमेशा कचहरी से काम पड़ता था। अतएव वह पूरा कानूनी आदमी था। उसने जुम्मन से जिरह शुरू की एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़े की चोट की तरह पड़ता था। रामधन मिश्र इन प्रश्नों पर मुग्ध हुए जाते थे। जुम्मन चकित थे कि अलगू को हो क्या गया। अभी यह अलगू मेरे साथ बैठा हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था। इतनी ही देर में ऐसा कायापलट हो गया कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है न मालूम कब की कसर यह निकाल रहा है? क्या इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम न आवेगी?
शब्दार्थ –
अर्जार्ज – प्रार्थना
ख़िदमत – सेवा
फर्ज़ – कर्तव्य
माहवार – हर महीने, मासिक, प्रतिमास
मुनाफ़ा – फायदा
जिरह – बहस
कायापलट – बहुत बड़ा परिवर्तन
व्याख्या – सभी की सहमति से पंचायत में अलगू चौधरी सरपंच घोषित हुए। रामधन मिश्र और जुम्मन के दूसरे विरोधियों ने बुढ़िया मौसी को अपने मन में बहुत कोसा। क्योंकि उन्हें लगा कि अगलू जुम्मन का अच्छा दोस्त है इसलिए अब वह फैसला जुम्मन के ही हक़ में करेगा। अलगू चौधरी शेख जुम्मन से बोले कि वे और जुम्मन पुराने दोस्त हैं। जब कभी अलगू को कोई काम पड़ा तब जुम्मन ने अलगू की मदद की है और अलगू भी अपनी पूरी सामर्थ्य से जुम्मन की सेवा करते रहे हैं, मगर इस समय जुम्मन और बूढ़ी खाला, दोनों उसकी नज़र में एक बराबर हैं। उसे पंचों से जो कुछ प्रार्थना करनी हो, वह कर ले।
जुम्मन को पूरा विश्वास था कि अब बाज़ी उसी की है। अलगू यह सब बातें लोगों को दिखाने के लिए कर रहा है ताकि किसी को कोई संदेह न हो। इसलिए उसने शांत मन से अपनी बात पंचो के सामने रखी कि तीन साल पहले खालाजान ने अपनी जायदाद उसके नाम लिख दी थी। उसके बदले में उसने मौसी को पूरी उम्र खाना-कपड़ा देना मंजूर किया था। ख़ुदा इस बात का साक्षी है कि आज तक उसने खालाजान को कोई तकलीफ नहीं दी। वह मौसी को अपनी माँ के समान समझता है। उनकी सेवा करना उसका फर्ज़ है परन्तु औरतों में जरा अनवन रहती है, इसमें वह कुछ नहीं कर सकता। खालाजान उससे हर महीने का खर्च अलग माँगती हैं। मौसी की जायदाद जितनी है, वह पंचों से छिपी हुई नहीं है। उससे इतना फायदा नहीं होता कि वह मौसी को हर महीने खर्च दे सके।
अलगू चौधरी को हमेशा न्यायलय से काम पड़ता ही रहता था। इसलिए वह पूरा कानूनी आदमी बन गया था। उसने जुम्मन से बहस शुरू कर दी। उसके द्वारा पूछे गए एक-एक प्रश्न जुम्मन के हृदय पर हथौड़े की चोट की तरह पड़ता था। क्योंकि उसने अलगू से यह उम्मीद नहीं की थी। रामधन मिश्र अलगू के द्वारा पूछे गए प्रश्नों पर मुग्ध हो जाते थे। जुम्मन हैरान हो गया था कि अलगू को हो क्या गया है। अभी कुछ समय पहले अलगू उसके साथ बैठा हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था। और इतनी ही देर में ऐसा परिवर्तन हो गया कि वह उसकी जड़ खोदने पर तुला हुआ है अर्थात अलगू जुम्मन की चालाकी को सभी के सामने लाने का प्रयत्न कर रहा था। जुम्मन को लग रहा था जैसे अलगू उससे किसी समय का बदला ले रहा है। वह सोच में पड़ गया कि क्या इस समय उसकी और अलगू की इतने दिनों की दोस्ती कुछ भी काम नहीं आएगी। अर्थात जुम्मन को संदेह हो रहा था कि अलगू उससे कोई बदला ले रहा है और आज पंचायत में वह उसका साथ नहीं देगा।
पाठ – जुम्मन शेख तो इसी संकल्प-विकल्प में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फ़ैसला सुनाया-
“जुम्मन शेख ! पंचों ने इस मामले पर विचार किया। उन्हें नीति-संगत मालूम होता है कि खालाजान को माहवार खर्च दिया जाए। हमारा विचार है कि खाला की जायदाद से इतना मुनाफ़ा अवश्य होता है कि माहवार खर्च दिया जा सके। बस, यही हमारा फ़ैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर न हो, तो संपत्ति की वह रजिस्ट्री रद्द समझी जाए।”
यह फ़ैसला सुनते ही जुम्मन सन्नाटे में आ गए। मगर रामधन मित्र और अन्य पंच अलगू चौधरी की इस नीति-परायणता की प्रशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे कहते थे – इसका नाम पंचायत है! दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। दोस्ती दोस्ती की जगह है किंतु धर्म का पालन करना मुख्य है। ऐसे ही सत्यवादियों के बल पर पृथ्वी ठहरी हैं, नहीं तो वह कब की रसातल में चली जाती।
इस फ़ैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ बातें करते नहीं दिखाई देते। इतना पुराना मित्रता रूपी वृक्ष सत्य का एक झोंका भी न सह सका। सचमुच, वह बालू की ही जमीन पर खड़ा था।
उनमें अब शिष्टाचार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक-दूसरे की आवभगत ज्यादा करने लगे। वे मिलते-जुलते थे, मगर उसी तरह, जैसे तलवार से ढाल मिलती है।
शब्दार्थ –
संकल्प-विकल्प – सोच-विचार
नीति-संगत – नीति के अनुरूप
सन्नाटे – परेशानी
नीति-परायणता – नीति का पालन करना
सत्यवादियों – सदा सत्य बोलने वाले
रसातल – ज़मीन के नीचे के सात तलों में से छठा तल
शिष्टाचार – सभ्य व्यवहार
आवभगत – आदर-सत्कार
व्याख्या – अलगू के सरपंच पद पर से किए गए व्यवहार से अभी जुम्मन शेख सोच-विचार में पड़े हुए थे कि इतने में अलगू ने फ़ैसला सुना दिया कि पंचों ने जुम्मन और खाला के मामले पर विचार किया। पंचों को यह नीति के अनुरूप मालूम होता है कि खालाजान को महीने का खर्च दिया जाए। पंचों का विचार है कि खाला की जायदाद से इतना मुनाफ़ा अवश्य होता है कि महीने का खर्च दिया जा सके। यही पंचायत का फ़ैसला है। अगर जुम्मन को खर्च देना मंजूर नहीं है, तो संपत्ति की वह रजिस्ट्री रद्द समझी जाएगी जो खाला ने जुम्मन के नाम की थी।
यह फ़ैसला सुनते ही जुम्मन परेशानी में आ गए। परन्तु रामधन मित्र और अन्य पंच अलगू चौधरी की इस तरह नीति का पालन करने की प्रशंसा जी खोलकर कर रहे थे। वे सब यही कह रहे थे कि इसका नाम पंचायत है! यहाँ हर समस्या का दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता है। दोस्ती दोस्ती की जगह है किंतु धर्म का पालन करना मुख्य है। अलगू जैसे सत्य का पालन करने वालों के बल पर ही पृथ्वी ठहरी हैं, नहीं तो वह कब की रसातल जैसे पाताल में चली जाती।
इस फ़ैसले ने अलगू और जुम्मन की दोस्ती की जड़ हिला दी। अब वे साथ-साथ बातें करते हुए नहीं दिखते थे। ऐसा लग रहा था जैसे उनके इतने पुराने मित्रता रूपी वृक्ष को सत्य के एक झोंकें ने मिटा दिया। उनकी मित्रता तो मानों बालू की ही जमीन पर खड़ी थी। अर्थात केवल सत्य का साथ देने के कारण जुम्मन ने अलगू से मित्रता मानों तोड़ दी थी। उनमें अब सभ्य व्यवहार का अधिक व्यवहार होने लगा। एक-दूसरे का अधिक आदर-सत्कार करने लगे। वे दोनों मिलते-जुलते जरूर थे, परन्तु अब वे मित्रता के भाव से नहीं बल्कि तलवार से ढाल जैसे अर्थात शत्रुता के भाव से मिलते थे।
पाठ – जुम्मन के चित्त में मित्र की कुटिलता आठों पहर खटा करती थी। उसे हर घड़ी यही चिंता रहती थी कि किसी तरह बदला लेने का अवसर मिले।
अच्छे कामों की सिद्धि में बड़ी देर लगती है परंतु बुरे कामों की सिद्धि में यह बात नहीं होती; जुम्मन को भी बदला लेने का अवसर जल्द ही मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी जोड़ी मोल लाए थे। बैल पछाही जाति के सुंदर, बड़े-बड़े सींगोंवाले थे। महीनों तक आसपास के गाँव के लोग उनके दर्शन करते रहे। दैवयोग से जुम्मन की पंचायत के एक महीने बाद इस जोड़ी का एक बैल मर गया। जुम्मन ने दोस्तों से कहा, “यह दगाबाजी की सजा है। इनसान सब्र भले ही कर जाए पर ख़ुदा नेक-बद सब देखता है।”
अब अकेला बैल किस काम का? उसका जोड़ बहुत ढूँढ़ा गया पर न मिला। तो निश्चय हुआ कि इसे बेच डालना चाहिए। गाँव में एक समझू साहू थे, वे इक्का-गाड़ी हाँकते थे। गाँव से गुड़-घी लादकर मंडी ले जाते, मंडी से तेल-नमक भर लाते और गाँव में बेचते। इस बैल पर उनका मन लहराया। उन्होंने सोचा, यह बैल हाथ लगे तो दिनभर में बेखटके तीन खेप हों। आजकल तो एक ही खेप में लाले पड़े रहते हैं। बैल देखा, गाड़ी में दौड़ाया, मोल-तोल किया और उसे लाकर द्वार पर बाँध ही दिया। एक महीने में दाम चुकाने का वादा ठहरा चौधरी को भी गरज थी ही, घाटे की परवाह न की।
समझू साहू ने नया बैल पाया, तो लगे उसे रगेदने वह दिन में तीन-तीन, चार-चार खेपें करने लगे। न चारे की फ़िक्र थी न पानी की बस खेपों से काम था। मंड़ी ले गए, वहां कुछ रूखा भूसा सामने डाल दिया। बेचारा जानवर अभी दम भी न लेने पाता था कि फिर जौत दिया । इक्के का जुआ देखते ही बैल का लहू सूख जाता था। एक-एक पग चलना दूभर था। हड्डियाँ निकल आई थीं परंतु था वह पानीदार मार की बरदाशत न थी।
शब्दार्थ –
कुटिलता – धोखेबाजी, दुष्टता
मोल – खरीद
दैवयोग – भाग्य से
दगाबाजी – छल बाजी, धोखा
सब्र – सहन, धैर्य
नेक-बद – भला-बुरा
बेखटके – बिना संकोच के, बेधड़क
खेप – एक फेरा, एक बार में ढोया जाने वाला बोझ
रगेदने – भगाना, दौड़ाना
इक्का-गाड़ी – अकेले पशु द्वारा खींची जाने वाली एक गाड़ी
व्याख्या – जुम्मन के मन में अलगू द्वारा दोस्ती में की गई धोखेबाज़ी हर समय चुभती रहती थी। वह हर समय बस इसी चिंता में रहता था कि उसे भी किसी तरह अलगू से बदला लेने का मौका मिले। जैसे कहा भी गया है कि अच्छे कामों को पूरा होने में बड़ी देर लगती है परंतु बुरे कामों को पूरा होने में यह बात नहीं होती अर्थात अच्छे कामों को सफल होने में देर लगती है परन्तु बुरे काम जल्दी ही पुरे हो जाते हैं। जुम्मन को भी अलगू से बदला लेने का मौका जल्द ही मिल गया। पिछले साल अलगू चौधरी बटेसर से बैलों की एक बहुत अच्छी जोड़ी खरीद कर लाए थे। बैल पछाही जाति के थे, जो बहुत ही सुंदर और बड़े-बड़े सींगों वाले थे। कई महीनों तक आसपास के गाँव के लोग उन बैलों को देखने आते रहते थे। जुम्मन के अच्छे भाग्य के कारण जुम्मन की पंचायत के एक महीने बाद ही इस जोड़ी का एक बैल मर गया। जुम्मन ने दोस्तों से कहना शुरू किया कि यह सब अलगू को धोखेबाजी की सजा मिली है। इनसान सहन भले ही कर जाए पर ख़ुदा भला-बुरा सब देखता है। अर्थात जुम्मन ने यह अवसर अपने आप को बेचारा और सच्चा साबित करने में लगा दिया था।
अब अकेला बैल अलगू के किसी काम का नहीं था। उसने उसका जोड़ बहुत ढूँढ़ा परन्तु वह नाकामयाब रहा। इसलिए उसने निश्चय किया कि बचे हुए एक बैल को बेच डालना चाहिए। गाँव में एक समझू साहू थे, वे इक्का-गाड़ी चलाते थे। वे पहले गाँव से गुड़-घी गाड़ी पर लादकर मंडी जाते और वापसी में मंडी से तेल-नमक को गाड़ी में भर कर गाँव लाते और गाँव में उन्हें बेच देते। इस अच्छी नस्ल के बैल पर उनका मन ललचा गया। उन्होंने सोचा, यह बैल यदि उनके पास होगा तो दिनभर में बिना किसी रोक-टोक के तीन चक्कर लग सकते हैं। आजकल तो एक ही चक्कर लगाना मुश्किल हो जाता हैं। समझू साहू ने अगलू का बैल देखा, उसे परखने के लिए गाड़ी में दौड़ाया, मोल-भाव किया और फिर उसे लाकर अपने द्वार पर बाँध ही दिया। अर्थात समझू साहू ने अगलू का बैल खरीद दिया। समझू साहू और अगलू के बीच एक महीने में बैल का दाम चुकाने का वादा पक्का हुआ। अगलू चौधरी को भी जरुरत थी, इसलिए उसने घाटे की परवाह नहीं की। और सभी शर्तें मान गया।
समझू साहू को भी नया बैल मिल गया था, तो वह उसे खूब दौड़ाने लगा। वह दिन में तीन-तीन, चार-चार चक्कर लगाने लगा। वह न तो बैल के चारे का ध्यान रखता और न ही उसे समय से पानी देता, उसे तो बस चक्करों से मतलब था। वह उसे मंडी ले जाता, वहां कुछ रूखा भूसा उसके सामने खाने को डाल देता। बेचारे जानवर को अभी थोड़ा सा भी आराम नहीं मिल पाता था कि उसे फिर से गाड़ी में जौत दिया जाता था। इक्के का जुआ देखते ही बैल बहुत ज्यादा घबरा जाता था। एक-एक कदम चलना उसके लिए मुश्किल हो जाता था। अच्छी देखभाल न मिलने व् कठिन परिश्रम के कारण उसकी हड्डियाँ निकल आई थीं परंतु फिर भी उस पर बिना रहम किए काम करवाया जाता था।
पाठ – एक दिन चौथी खेप में साहूजी ने दूना बोझा लादा। दिनभर का थका जानवर, पैर न उठते थे। कोड़े खाकर कुछ दूर दौड़ा, धरती पर गिर पड़ा, और ऐसा गिरा कि फिर न उठा। कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी उन्होंने बेचे थे, दो-ढाई सौ रुपए कमर में बंधे थे। इसके सिवा गाड़ी पर कई बोरे नमक के थे, अतएव छोड़कर जा भी न सकते थे। लाचार बेचारे गाड़ी पर लेट गए। वहीं रतजगा करने की ठान ली। आधी रात तक नींद को बहलाते रहे। सुबह जब नींद टूटी और कमर पर हाथ रखा, तो थैली गायब! घबराकर इधर-उधर देखा, तो कई कनस्तर तेल भी नदारद। प्रातः काल रोते-बिलखते घर पहुँचे। सहुआइन ने जब यह बुरी सुनावनी सुनी, तब पहले तो रोई, फिर अलगू चौधरी को गालियाँ देने लगी – “निगोड़े ने ऐसी कुलच्छनी बैल दिया कि जन्म-भर की कमाई लुट गई।”
इस घटना को हुए कई महीने बीत गए। अलगू जब अपने बैलों के दाम माँगते, तब साहू और सहुआइन दोनों ही झल्ला उठते। चौधरी के अशुभ चिंतकों की कमी न थी। ऐसे अवसरों पर वे भी एकत्र होते आते और साहू जी के बर्राने की पुष्टि करते।
डेढ़ सौ रुपए से इस तरह हाथ धो लेना अलगू चौधरी के लिए आसान न था। एक बार वे भी गरम पड़े। साहू जी बिगड़कर लाठी ढूँढ़ने घर चले गए! अब सहुआइन ने मैदान लिया। प्रश्नोत्तर होते-होते हाथा-पाई की नौबत आ पहुँची। सहुआइन ने घर में घुसकर किवाड़ बंद कर लिए। शोरगुल सुनकर गाँव के भलेमानस जमा हो गए। उन्होंने दोनों को समझाया। साहू जी को दिलासा देकर घर से निकाला। लोगों ने परामर्श दिया कि इस तरह से काम न चलेगा। पंचायत कर लो। जो कुछ तय हो जाए, उसे स्वीकार कर लो। साहू जी राज़ी हो गए। अलगू ने भी हामी भर ली।
शब्दार्थ –
रतजगा – रात भर जागना
नदारद – गायब, लुप्त
निगोड़े – निकम्मा, नाकारा
कुलच्छनी – कुल का नाश करने वाली
बर्राने – क्रोध में बोलना
किवाड़ – दरवाजा
व्याख्या – एक दिन चौथे चक्कर में साहू जी ने दो गुना बोझा लाद दिया। दिनभर का थका हुआ जानवर, अब पैर भी नहीं उठा पा रहा था। फिर भी कोड़े की मार खाकर कुछ दूर तक दौड़ा और फिर धरती पर गिर पड़ा, और इस बार वह ऐसा गिरा कि फिर नहीं उठा। अर्थात वहीं पर गिरते ही बैल की जान चली गई। उस दिन उन्होंने कई बोरे गुड़ और कई पीपे घी बेचे थे और अभी दो-ढाई सौ रुपए का सामान उसकी कमर में बँधी हुई गाड़ी पर लदा हुआ था। इसके अलावा गाड़ी पर कई बोरे नमक के थे, इसलिए उसे छोड़कर समझू साहू जा भी नहीं सकते थे। अर्थात उस चौथे चक्कर में बेचारे बैल की कमर से बहुत ज्यादा सामान बँधा हुआ था और अब बैल के मर जाने से इतना सारा सामान समझू साहू छोड़ कर कहीं जा भी नहीं सकता था। लाचार होकर बेचारे को वहीं गाड़ी पर लेट जाना पड़ा। वहीं रात भर जागना ही उसने ठीक समझा। आधी रात तक वह नींद को भगाते रहे। परन्तु फिर उनकी आँख लग गई और सुबह जब नींद टूटी और कमर पर हाथ रखा, तो उनके पैसों की थैली गायब थी। घबराकर जब इधर-उधर देखा, तो कई कनस्तर तेल भी गायब थे। प्रातः काल रोते-बिलखते वे अपने घर पहुँचे। साहू की पत्न्नी ने जब यह बुरी खबर सुनी, तब पहले तो रोने लगी, फिर अलगू चौधरी को गालियाँ देने लगी – कि उस बेकार आदमी ने ऐसा कुल का नाश करने वाला बैल दिया कि उनके जन्म-भर की कमाई लुट गई। अर्थात अब वे सारा दोष अलगू को देने लगे।
इस घटना को हुए अब कई महीने बीत गए थे। अलगू जब अपने बैल के दाम माँगने साहू के घर जाते, तब साहू और सहुआइन दोनों ही उस पर चिल्लाने लगते। अलगू चौधरी का बुरा सोचने वालों की कोई कमी न थी। ऐसे मौकों पर वे भी इकठ्ठे हो जाते और साहू जी के गुस्से को ही सही ठहराते।
डेढ़ सौ रुपए का इस तरह से नुक्सान होना अलगू चौधरी के लिए आसान नहीं था। एक बार जब उन्होंने भी गुस्सा दिखाया तब साहू जी भी उत्तर में बिगड़कर लाठी ढूँढ़ने घर चले गए। अब सहुआइन ने आ कर अलगू चौधरी से बहस शुरू कर दी। प्रश्नोत्तर होते-होते हाथा-पाई की नौबत आ पहुँची। सहुआइन ने फिर घर में घुसकर दरवाजे बंद कर लिए। शोरगुल सुनकर गाँव के भले लोग वहाँ जमा हो गए। उन्होंने दोनों को समझाया। साहू जी को दिलासा देकर घर से निकाला। लोगों ने आपस में बात-चीत की कि इस तरह से काम नहीं चलेगा। इसके लिए पंचायत कर लो। जो कुछ पंचायत में तय हो जाए, उसे दोनों स्वीकार कर लो। साहू जी भी राज़ी हो गए। और अलगू भी इस बात के लिए मान गए।
पाठ – पंचायत की तैयारियाँ होने लगीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने दल बनाने शुरू किए। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नीचे पंचायत बैठी।
पंचायत बैठ गई, तो रामधन मिश्र ने कहा, “अब देरी क्या है? पंचों का चुनाव हो जाना चाहिए। बोलो चौधरी, किस-किसको पंच बनाते हो?”
अलगू ने दीन भाव से कहा, “समझू साहू ही चुन लें।”
समझू खड़े हुए और कड़ककर बोले, “मेरी और से जुम्मन शेख।”
जुम्मन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का कलेजा ‘धक्-धक्’ करने लगा, मानो किसी ने अचानक थप्पड़ मार दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। वह बात तो वाड़ गए। पूछा, “क्यों चौधरी, तुम्हें कोई उड़ तो नहीं?”
चौधरी ने निराश होकर कहा, “नहीं, मुझे क्या उन होगा!”
अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधार होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं, तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।
जुम्मन शेख के मन में भी सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ। उसने सोचा, ‘मैं इस समय न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हूँ। मेरे मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देववाणी के सदृश है और देववाणी में मेरे बुरे विचारों का कदापि समावेश न होना चाहिए। मुझे सत्य से जौ भर भी टलना उचित नहीं।’
शब्दार्थ –
वाड़ गए – समझ गए
उड़ – परेशानी
उन – तकलीफ
बहुधा – प्रायः, अकसर
संकुचित – तंग
पथ-प्रदर्शक – राह दिखाने वाला
सर्वोच्च – सबसे ऊँचा
देववाणी – देवताओं की वाणी
सदृश – समान, तुल्य
समावेश – एक साथ या एक जगह रहना
जौ भर – रति भर, थोड़ी देर
व्याख्या – अलगू और साहू के झगड़े को सुलझाने के लिए पंचायत की तैयारियाँ होने लगीं। दोनों पक्षों ने अपने-अपने दल बनाने शुरू कर दिए जो बहस में उनका साथ दे। इसके बाद तीसरे दिन उसी वृक्ष के नीचे पंचायत बैठी जहाँ जुम्मन और मौसी के समय बैठी थी।
पंचायत बैठ गई, तो रामधन मिश्र ने देरी का कारण पूछा। और बताया की फैसले के लिए पंचों का चुनाव हो जाना चाहिए। अलगू चौधरी से पूछा गया कि वह किस-किसको पंच बनाना चाहता है। अलगू ने दीन भाव से कहा कि समझू साहू ही पंच चुन लें। समझू जानते थे कि जुम्मन अब अलगू का शत्रु है इसलिए वे खड़े हुए और कड़ककर बोले कि उनकी ओर से जुम्मन शेख सरपंच होगा।
जुम्मन का नाम सुनते ही अलगू चौधरी का दिल ‘धक्-धक्’ करने लगा, मानो किसी ने अचानक उन्हें थप्पड़ मार दिया हो। रामधन अलगू के मित्र थे। इसलिए वे अलगू के हावभाव देख कर बात तो भांप गए। उन्होंने अलगू से पूछा कि क्या जुम्मन के सरपंच बनने पर उसे कोई आपत्ति तो नहीं है। चौधरी ने निराश होकर न में उत्तर दिया और कहा कि उसे क्या परेशानी होगी। अर्थात वह जुम्मन को सरपंच स्वीकार करता है।
जब हमें अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान हो जाता है तब अक्सर हमारे संकुचित व्यवहारों में भी सुधार होता है। जब हम राह भूलकर भटकने लगते हैं, तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय मित्र बनकर हमें राह दिखाता है। इसी वजह से जुम्मन शेख के मन में भी सरपंच का उच्च स्थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्मेदारी का भाव पैदा हुआ। उसने सोचा कि वह इस समय न्याय और धर्म के सर्वोच्च आसन पर बैठा हुआ है। उसके मुँह से इस समय जो कुछ निकलेगा, वह देवताओं की वाणी के समान होगा और देववाणी में उसके बुरे विचारों का कदापि समावेश नहीं होना चाहिए। उसका सत्य से रति भर भी टलना उचित नहीं होगा। अर्थात जुम्मन को भी सरपंच बनते ही जिम्मेदारी का एहसास होने लगा।
पाठ – पंचों ने दोनों पक्षों से सवाल-जवाब करने शुरू किए। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते रहे। यह तो सब चाहते ही थे कि समझू को बैल का मूल्य देना चाहिए परंतु दो महाशय इस कारण रिआयत करना चाहते थे कि बैल के मर जाने से समझ की हानि हुई । सभ्य व्यक्ति समझू को दंड भी देना चाहते थे, जिससे फिर किसी को पशुओं के साथ ऐसी निर्दयता करने का साहस न हो। अंत में जुम्मन ने फ़ैसला सुनाया-
“अगलू चौधरी और समझू साहू ! पंचों ने तुम्हारे मामले पर अच्छी तरह विचार किया। समझू को उचित है कि बैल का पूरा दाम दें। जिस वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी न थी। अगर उसी समय दाम दे दिए जाते, तो झगड़ा ही खत्म हो जाता। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बड़ा कठिन परिश्रम लिया गया और उसके दाने – चारे का कोई अच्छा प्रबंध न किया गया।”
रामधन मिश्र बोले, ” समझू ने बैल को जान-बूझकर मारा है, अतएव उनसे दंड लेना चाहिए।”
जुम्मन बोले, “यह दूसरा सवाल है! हमको इससे कोई मतलब नहीं।”
झगडू साहू ने कहा, ” समझू के साथ कुछ रिआयत होनी चाहिए।”
जुम्मन बोले, “यह अलगू चौधरी की इच्छा पर निर्भर है। यह रिआयत करें, तो उनकी भलमनसी।”
अलगू चौधरी फूले न समाए। उठ खड़े हुए और जोर से बोले, “पंच-परमेश्वर की जय।”
इसके साथ ही चारों ओर प्रतिध्वनि हुई, “पंच-परमेश्वर की जय!”
प्रत्येक मनुष्य जुम्मन की नीति को सराहता था।- “इसे कहते हैं न्याय! यह मनुष्य का काम नहीं, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा है। पंच के सामने खोटे को कौन खरा कह सकता है!”
थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपटकर बोले, “भैया, जब से तुमने मेरी पंचायत की, तब से मैं तुम्हारा प्राणघातक शत्रु बन गया था परंतु आज मुझे ज्ञान हुआ कि पंच के पद पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता। आज मुझे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से ख़ुदा बोलता है।” अलगू रोने लगे। इस पानी से दोनों के दिल का मैल धुल गया। मित्रता की मुरझाई हुई लता फिर हरी हो गई।
शब्दार्थ –
रिआयत – कोमल और दयापूर्ण व्यवहार, नरमी
निर्दयता – बेरहमी, निष्ठुरता
भलमनसी – सज्जनता
प्राणघातक – जान लेने वाला
व्याख्या – पंचों ने अलगू और साहू दोनों पक्षों से सवाल-जवाब करने शुरू किए। बहुत देर तक दोनों दल अपने-अपने पक्ष का समर्थन करते रहे। यह तो सब चाहते ही थे कि समझू को अलगू के बैल का मूल्य देना चाहिए परंतु पंचों में दो महाशय इस बात को कारण बनाकर साहू को छूट देना चाहते थे कि बैल के मर जाने से समझू की भी हानि हुई है। परन्तु सभ्य व्यक्ति समझू को बैल के साथ की गई निष्ठुरता का दंड भी देना चाहते थे, जिससे फिर किसी को पशुओं के साथ ऐसी निर्दयता करने का साहस न हो। अंत में पूरी बात समझ कर जुम्मन ने फ़ैसला सुनाया कि अगलू चौधरी और समझू साहू के मामले पर पंचों ने अच्छी तरह से विचार किया। यह उचित है कि समझू बैल का पूरा दाम अलगू को दें। क्योंकि जिस वक्त उन्होंने बैल लिया, उसे कोई बीमारी नहीं थी। अगर उसी समय दाम दे दिए जाते, तो झगड़ा ही खत्म हो जाता। बैल की मृत्यु केवल इस कारण हुई कि उससे बहुत कठिन परिश्रम लिया गया और उसके खाने-पीने का कोई अच्छा प्रबंध नहीं किया गया।
रामधन मिश्र इस पर बोले कि समझू ने बैल को जान-बूझकर मारा है, इस अपराध का उसे दंड मिलना चाहिए। इस बात पर जुम्मन का कहना था कि यह दूसरा सवाल है! पंचायत को इससे कोई मतलब नहीं। क्योंकि पंचायत बैल के दाम को लेकर की गई थी। झगडू साहू ने कहा कि समझू को कुछ छूट होनी चाहिए। परन्तु इस पर जुम्मन बोले कि यह अलगू चौधरी की इच्छा पर निर्भर करता है। यदि वह भले इंसान की तरह छूट देना चाहे तो।
अलगू चौधरी जुम्मन के इस फैसले से बहुत खुश हुए। वे उठ खड़े हुए और जोर से बोले, “पंच-परमेश्वर की जय।” इसके साथ ही चारों ओर पंच-परमेश्वर की जय की आवाजें गूँजने लगी।
वहाँ मौजूद सभी मनुष्य जुम्मन की नीति को सराह रहा था। और बातें कर रहा था कि इसे न्याय कहा जाता है। इस तरह का न्याय देना मनुष्य का काम नहीं है, पंच में परमेश्वर वास करते हैं, यह उन्हीं की महिमा है। पंच के सामने कोई झूठे को सच्चा नहीं कह सकता है।
पंचायत हो जाने के थोड़ी देर बाद जुम्मन अलगू के पास आए और उनके गले लिपटकर उनसे कहने लगे कि जब से अलगू ने जुम्मन की पंचायत की, तब से जुम्मन अलगू के प्राण का शत्रु बन गया था परंतु आज उसे ज्ञान हुआ कि पंच के पद पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। न्याय के सिवा उसे और कुछ नहीं सूझता। आज उसे विश्वास हो गया कि पंच की जबान से ख़ुदा बोलता है। अलगू भी रोने लगे। इस तरह दोनों के आंसुओं के पानी से दोनों के दिल का मैल धुल गया। और उनकी मित्रता की मुरझाई हुई लता फिर हरी हो गई। अर्थात जुम्मन को अपनी गलती का एहसास हो गया और वे फिर से मित्र बन गए।
Conclusion
‘पंच परमेश्वर’ कहानी में लेखक ने न्यायप्रियता और मित्रता का वर्णन किया है। जब कोई साधारण मानव पंच के आसन पर आसीन हो जाता है तो वह भी अपने-पराये, ईर्ष्या द्वेष के स्तर से ऊपर उठकर न्याय करने लगता है। PSEB Class 9 Hindi – पाठ – 7 ‘पंच परमेश्वर’ की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।