भाषा का प्रश्न पाठ सार

Maharashtra State Board Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 5 “Bhasha Ka Prashn” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

भाषा का प्रश्न सार – Here is the Maharashtra State Board of Secondary and Higher Secondary Education (MSBSHSE) Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 5 Bhasha Ka Prashn Summary with detailed explanation of the lesson “Bhasha Ka Prashn” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, summary and difficult word meanings 

इस पोस्ट में हम आपके लिए महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षण मंडळ के कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती पुस्तक के पाठ 5 भाषा का प्रश्न से पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 10 भाषा का प्रश्न पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Bhasha Ka Prashn (भाषा का प्रश्न)

– महादेवी वर्मा

 

‘भाषा का प्रश्न’ निबंध में लेखिका महादेवी वर्मा ने भाषा के महत्त्व, उसकी शक्ति और मानव जीवन में उसकी आवश्यकता को सरल शब्दों में समझाया है। इस निबंध में लेखिका बताती हैं कि भाषा केवल बोलने का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है।

 

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भाषा का प्रश्न पाठ सार Bhasha Ka Prashn Summary

महादेवी वर्मा के इस निबंध ‘भाषा का प्रश्न’ में भाषा के महत्त्व, उसकी उत्पत्ति, विकास और मानव जीवन में उसकी भूमिका का अत्यंत सरल और गहरा वर्णन किया गया है। लेखिका बताती हैं कि भाषा मानव की सबसे रहस्यमयी और अनमोल उपलब्धि है। संसार में चारों ओर ध्वनियाँ मौजूद हैं। बिजली की गर्जना से लेकर फूल के खिलने तक, आँधी की तेज आवाज से लेकर बसंत की मधुर लहर तक। पशु-पक्षी भी अपनी-अपनी ध्वनियों से संवाद करते हैं, परंतु इन ध्वनियों को हम भाषा नहीं कहते, क्योंकि उनमें वह स्पष्ट अर्थ नहीं होता जो मन और बुद्धि दोनों को संतुष्टि दे सके।

मनुष्य ने अपनी रचनात्मक शक्ति से ध्वनियों को शब्दों का रूप दिया और शब्दों के माध्यम से अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करना सीखा। उसने केवल अपनी ही भावनाओं को नहीं, बल्कि अपने आसपास के संसार को भी शब्दों में बांध लिया। भाषा के द्वारा मनुष्य ने अपने ज्ञान, संस्कार और भावनाओं को इस प्रकार संजोया कि वे समय के साथ सुरक्षित रह सकें। इस तरह भाषा ने मानव चेतना को निरंतरता प्रदान की और जीवन को समझने का माध्यम बनी।

लेखिका कहती हैं कि भाषा मानव की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ साधन है। यह मनुष्य के अंदर और बाहर दोनों जीवन को निखारने का आधार है। भाषा के माध्यम से हम अपने विचारों और भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाते हैं और आपस में संबंध बनाते हैं। इसमें स्वर, अर्थ, भाव और समझ का ऐसा सुंदर मेल होता है, जो व्यक्ति की अभिव्यक्ति को व्यक्तिगत स्तर से समाज तक विस्तार देता है।

जैसे मनुष्य का व्यक्तित्व बाहरी परिस्थितियों और अंदरूनी अनुभवों से बनता है, वैसे ही उसकी भाषा भी अनेक प्रभावों से विकसित होती है। समय के साथ हमारे मन और बुद्धि से जुड़े भाव शब्दों में बस जाते हैं, और एक छोटा-सा शब्द भी कई भावनाओं को जगा सकता है। इसलिए भाषा केवल बोलने का साधन नहीं, बल्कि हमारे पूरे जीवन और संस्कृति का हिस्सा बन जाती है।

महादेवी वर्मा यह भी स्पष्ट करती हैं कि भाषा सीखना और भाषा को जीना अलग-अलग बातें हैं। हम कई भाषाएँ सीख सकते हैं, क्योंकि हर भाषा ज्ञान और भावनाओं से समृद्ध होती है, लेकिन जिस भाषा में हम अपनी संस्कृति, परंपरा और अनुभवों के साथ जीते हैं, वही हमारी सच्ची भाषा होती है। बचपन में शब्द हमारे लिए केवल ध्वनियाँ होते हैं, पर धीरे-धीरे हम उनके अर्थ समझने लगते हैं और बोलना सीखते हैं। इस प्रकार वाणी आत्मानुभूति की मूल अभिव्यक्ति है, जो आगे चलकर भाषा का रूप लेती है।

लेखिका पाणिनि के विचार का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि मनुष्य पहले बुद्धि से अर्थ को समझता है और फिर बोलने की इच्छा उत्पन्न होती है। यानी भाषा हमारे मन और बुद्धि दोनों से जुड़ी होती है। जिस प्रकार मनुष्य अपने प्राकृतिक वातावरण से प्रभावित होता है, उसी तरह उसकी भाषा भी अपनी भूमि और परिवेश से प्रभावित होती है। यही कारण है कि अलग-अलग स्थानों पर भाषाओं में भिन्नता दिखाई देती है, परंतु यह भिन्नता विभाजन का कारण नहीं बनती, बल्कि एकता को बनाए रखती है। यह भिन्नताएँ समुद्र की लहरों की तरह हैं, अलग दिखाई देती हैं, पर सब एक ही सागर का हिस्सा होती हैं।

हर भाषा को लेखिका एक त्रिवेणी के समान मानती हैं। इसकी एक धारा रोजमर्रा के जीवन में संवाद को सरल बनाती है। दूसरी धारा मनुष्य के ज्ञान और भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाती है। तीसरी धारा हमें किसी गहरे और सार्वभौमिक सत्य से जोड़ती है। इस प्रकार भाषा केवल व्यवहार का साधन नहीं, बल्कि मानवता को जोड़ने वाली शक्ति भी है।

भारत जैसे विशाल देश में अनेक भाषाएँ होना स्वाभाविक है। यहाँ की विविधता हमारी सांस्कृतिक एकता की पूरक है, विरोधी नहीं। अलग-अलग जीवन शैली, विचार और सौंदर्यबोध के बावजूद देश की मूल भावना एक ही है। किसी राष्ट्र के निर्माण के लिए केवल भूमि पर्याप्त नहीं होती, उसके लिए जागरूक और संस्कारी लोगों की आवश्यकता होती है, जो अपने प्रेम और समर्पण से उस भूमि को जीवंत बना दें।

भारत को लेखिका एक महान राष्ट्र के रूप में देखती हैं, जहाँ अनेक भाषाएँ एक वीणा के तारों की तरह हैं। हर तार की ध्वनि अलग होती है, पर सब मिलकर एक सुंदर राग पैदा करते हैं। इसी प्रकार सभी भारतीय भाषाओं ने अपने विचारों और भावनाओं से राष्ट्र जीवन को समृद्ध किया है। उनकी भिन्नता में ही उनकी सुंदरता और महत्त्व छिपा है।

लेखिका उदाहरण देकर समझाती हैं कि जैसे धरती की गहराई में कोयला हीरा बनता है और समुद्र की गहराई में सीप मोती बनाती है, वैसे ही अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित होने के बावजूद दोनों समान रूप से मूल्यवान होते हैं। इसी तरह विभिन्न भाषाएँ भी अपने-अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हैं।

आज के समय को लेखिका एक परिवर्तन का युग मानती हैं। वह कहती हैं कि मानव जीवन की सबसे बड़ी समस्या संवेदनशीलता की अधिकता नहीं, बल्कि उसकी कमी है। राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद भी हम मानसिक रूप से कई बार परतंत्र बने रहते हैं। यह मानसिक बंधन हमारे विकास में बाधा बन जाता है।

इतिहास में भारत ने कई कठिन समय देखे हैं, लेकिन हमारे विचारकों, संतों और साहित्यकारों ने अपने ज्ञान के प्रकाश से हमेशा सही मार्ग दिखाया है। इस प्रकाश को फैलाने का कार्य भाषा ने ही किया है। भाषा एक दीपक की तरह है, जो अंधकार में भी रास्ता दिखाती है और हमें भटकने से बचाती है।

अंत में महादेवी वर्मा यह संदेश देती हैं कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, एकता और प्रगति का आधार है। यह हमें एक-दूसरे से जोड़ती है, हमारी भावनाओं को अभिव्यक्ति देती है और समाज को दिशा प्रदान करती है। इसलिए हमें अपनी भाषा का सम्मान करना चाहिए और उसके माध्यम से ज्ञान और संवेदनशीलता को बढ़ाना चाहिए।
 

 

भाषा का प्रश्न पाठ व्याख्या Bhasha Ka Prashn Lesson Explanation

पाठ- भाषा मानव की सबसे रहस्यमय तथा मौलिक उपलब्धि है। वैसे बाह्य जगत भी ध्वनिसंकुल है तथा मानस जगत को भी अपने सुखद-दुखद जीवन स्थितियों को व्यक्त करने के लिए कंठ और स्वर प्राप्त हैं।
चेतन ही नहीं, जड़ प्रकृति के गत्यात्मक परिवर्तन भी ध्वनि द्वारा अपना परिचय देते हैं। वज्रपात से लेकर फूल के खिलने तक ध्वनि के जितने कठिन-कोमल आरोह-अवरोह हैं. निदाघ के हरहराते बवंडर से लेकर वासंती पुलक तक लय की विविधतामयी मूर्च्छना है, उसे कौन नहीं जानता। पशु-पक्षी जगत के सम-विषम स्वरों की संख्यातीत गीतिमालाओं से भी हम परिचित हैं परंतु ध्वनियों के इस संघात को हम भाषा की संज्ञा नहीं देते. क्योंकि इसमें वह अर्थवत्ता नहीं रहती जो हृदय और बुद्धि को समान रूप से तृप्ति तथा बोध दे सके।
मानव कंठ को परिवेश विशेष में जीवनाभिव्यक्ति के लिए जो ध्वनियाँ दावभाग में प्राप्त हुई थीं, उन्हें उसके अपनी सर्जनात्मक प्रतिभा से सर्वथा नवीन रूपों में अवतरित किया। उसने अपनी जीवनाभिव्यक्ति ही नहीं. उसके विस्तृत विविध परिवेश को भी ऐसे शब्द संकेतों में परिवर्तित कर लिया, जो विशेष ध्वनि मात्र से किसी वस्तु को ही नहीं, अशरीरी भाव और बोध को भी रूपायित कर सके और तब उस वाणी के द्वारा उसने अपने रागात्मक संस्कार तथा बौदधिक उपलब्धियों को इस प्रकार संग्रथित किया कि वे प्रकृति तथा जीवन के क्षण-क्षण परिवर्तित रूपों को मानव चेतना में अक्षर निरंतरता देने को रहस्यमयी क्षमता पा सके।

शब्दार्थ-
रहस्यमय रहस्य से भरा हुआ, जिसे समझना कठिन हो
मौलिक मूल से संबंधित, बिल्कुल नया और स्वतः उत्पन्न
उपलब्धि- प्राप्त की हुई सफलता या विशेष प्राप्ति
बाह्य जगत बाहरी संसार
ध्वनिसंकुल- ध्वनियों से भरा हुआ
मानस जगत- मन का संसार, मानसिक दुनिया
जीवन स्थितियाँ- जीवन की परिस्थितियाँ
कंठ- गला, जिससे आवाज निकलती है
चेतन- जिसमें चेतना या समझ हो, जो सजीव हो
जड़ प्रकृति निर्जीव वस्तुएँ, जिनमें जीवन नहीं होता
गत्यात्मक गतिशील
वज्रपात बिजली गिरना
आरोह-अवरोह– ऊपर-नीचे होने वाली ध्वनि की गति
निदाघ- गरमी, ग्रीष्‍म ॠतु
बवंडर- तेज घूमती हुई हवा, चक्रवात
वासंती पुलक वसंत ऋतु की आनंददायक भावना
लय- ताल या गति का नियमित क्रम
विविधतामयी- अनेक प्रकार की, भिन्न-भिन्न
मूर्च्छना- मूर्च्छा
सम-विषम- समान और असमान
संख्यातीत जिसकी गिनती न की जा सके, असंख्य
संघात- समूह या मेल
संज्ञा- नाम या पहचान
अर्थवत्ता- अर्थपूर्ण होने की विशेषता
तृप्ति- संतोष, संतुष्टि
बोध ज्ञान या समझ
परिवेश- आसपास का वातावरण
जीवनाभिव्यक्ति- जीवन की अभिव्यक्ति, अपने भाव प्रकट करना
दायभाग- पैतृक धन, संपत्ति को उत्तराधिकारी में बांटने की व्यवस्था
सर्जनात्मक प्रतिभा- रचनात्मक क्षमता
सर्वथा पूरी तरह, बिल्कुल

व्याख्या- इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा भाषा के महत्त्व और उसकी विशेषता को स्पष्ट करती हैं। वे कहती हैं कि भाषा मानव की सबसे रहस्यमय और मूल उपलब्धि है। संसार में हर जगह ध्वनियाँ मौजूद हैं। बाहरी दुनिया में भी और मनुष्य के मन में भी। मनुष्य अपने सुख-दुख और जीवन की स्थितियों को व्यक्त करने के लिए आवाज और शब्दों का सहारा लेता है। केवल जीवित प्राणी ही नहीं, बल्कि जड़ प्रकृति भी ध्वनि के माध्यम से अपना परिचय देती है। बिजली की गड़गड़ाहट, आँधी की आवाज, फूल का खिलना या बसंत की मधुरता, इन सबमें अलग-अलग प्रकार की ध्वनियाँ और लय होती हैं।
हम पशु-पक्षियों की आवाजों से भी परिचित हैं, लेकिन इन ध्वनियों को भाषा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उनमें स्पष्ट अर्थ नहीं होता। भाषा वही है, जिसमें ऐसा अर्थ हो जो मन और बुद्धि दोनों को संतुष्टि दे और सही समझ प्रदान करे।
लेखिका आगे बताती हैं कि मनुष्य को जो ध्वनियाँ स्वाभाविक रूप से मिली थीं, उन्हें उसने अपनी रचनात्मक शक्ति से नए रूप में बदल दिया। उसने ध्वनियों को शब्दों में बदलकर अपने विचारों, भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करना शुरू किया। मनुष्य ने अपने आसपास के वातावरण को भी शब्दों के संकेतों में बांध लिया, ताकि केवल वस्तुओं को ही नहीं, बल्कि अदृश्य भावनाओं और विचारों को भी व्यक्त किया जा सके।
इस प्रकार वाणी के माध्यम से मनुष्य ने अपने भावनात्मक संस्कार और बौद्धिक ज्ञान को संजोकर रखा। भाषा में इतनी शक्ति है कि वह बदलती हुई प्रकृति और जीवन के अनुभवों को मानव चेतना में स्थायी रूप दे देती है। इसलिए भाषा को एक रहस्यमयी शक्ति कहा गया है, जो मानव जीवन को निरंतरता और अभिव्यक्ति प्रदान करती है।

 

पाठ– मनुष्य की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति में सबसे अधिक समर्थ और अक्षर भाषा ही होती है। वही मानव के आंतरिक तथा बाह्य जीवन के परिष्कार का आधार है, क्योंकि बौधिक क्रिया तथा मनोरागों की अभिव्यक्ति तथा उनके परस्पर संबंधों को संग्रथित करने में भाषा एक स्निग्ध किंतु अटूट सूत्र का कार्य करती है। भाषा में स्वर, अर्थ, रूप, भाव तथा बोध का ऐसा समन्वय रहता है, जो मानवीय अभिव्यक्ति को व्यष्टि से समष्टि तक विस्तार देने में समर्थ है।
मानव व्यक्तित्व के समान ही उसकी वाणी का निर्माण दोहरा होता है। जैसे मनुष्य का व्यक्तित्व बाह्य परिवेश के साथ उसके अंतर्जगत के घात-प्रतिघात अनुकूलता प्रतिकूलता समन्वय आदि विविध परिस्थितियों द्वारा निर्मित होता चलता है, उसी प्रकार उसकी भाषा असंख्य जटिल-सरल, अंतर-बाह्य प्रभावों में गल-ढलकर परिणति पाती है। कालांतर में हमारा समग्र अंतर्जगत, हमारी संपूर्ण बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता शब्द संकेतों से इस प्रकार संग्रोधित हो जाती है कि एक शब्द संकेत अनेक अप्रस्तुत मनोराग जगा देने की शक्ति पा जाता है।
भाषा सीखना तथा भाषा जीना एक-दूसरे से भिन्न हैं तो आश्चर्य की बात नहीं। प्रत्येक भाषा अपने ज्ञान और भाव की समृद्धि के कारण ग्रहण करने योग्य है. परंतु समग्र बौद्धिक तथा रागात्मक सत्ता के साथ जीना अपनी सांस्कृतिक भाषा के संदर्भ में ही सत्य है। कारण स्पष्ट हैं। ध्वनि का ज्ञान आत्मानुभव से तथा अर्थ का बुद्धि से प्राप्त होता है। शैशव में शब्द हमारे लिए ध्वनि संकेत मात्र होते हैं। यदि हम ध्वनि पहचानने से पहले उसके अर्थ से परिचित हो जायें तो हम संभवतः बोलना न सीख सकें।

शब्दार्थ-
सर्जनात्मक रचनात्मक, नया सृजन करने वाला
अभिव्यक्ति- विचारों और भावों को प्रकट करना
समर्थ- सक्षम, शक्ति रखने वाला
अक्षर- स्थायी, जो नष्ट न हो
आंतरिक- भीतर का, मन से संबंधित
बाह्य- बाहरी, बाहर का
परिष्कार- सुधार, शुद्धिकरण
बौद्धिक- बुद्धि से संबंधित
मनोराग- मन के भाव, भावनाएँ
परस्पर- एक-दूसरे के बीच
संग्रथित- एक सूत्र में बाँधना, व्यवस्थित करना
स्निग्ध- कोमल, मधुर
अटूट- जो टूटे नहीं, मजबूत
सूत्र- धागा, जोड़ने वाला माध्यम
समन्वय मेल, संतुलन
मानवीय- मनुष्य से संबंधित
व्यष्टि- व्यक्ति, एक इकाई
समष्टि- समाज या समूह का रूप
विस्तार फैलाव, बढ़ाव
व्यक्तित्व- व्यक्ति का स्वभाव और चरित्र
वाणी बोलने की शक्ति, भाषा
निर्माण- बनना या रचना
दोहरा- दो प्रकार का
परिवेश वातावरण, आसपास की परिस्थितियाँ
अंतर्जगत मन का आंतरिक संसार
घात-प्रतिघात टकराव और प्रतिक्रिया
अनुकूलता- अनुकूल स्थिति, सहायक परिस्थिति
प्रतिकूलता- विपरीत या बाधा देने वाली स्थिति
विविध- अनेक प्रकार के
असंख्य- जिनकी गिनती न हो सके
जटिल- कठिन, पेचीदा
अंतर-बाह्य- भीतर और बाहर दोनों
गल-ढलकर- अनुभवों से बदलकर परिपक्व होना
परिणति अंतिम रूप, परिणाम
कालांतर समय बीतने पर
समग्र- सम्पूर्ण, पूरा
सत्ता- अस्तित्व, शक्ति
अप्रस्तुत सीधे न कहे गए, अप्रकट
भिन्न अलग
समृद्धि- संपन्नता, भरपूरता
ग्रहण स्वीकार करना
सांस्कृतिक संस्कृति से संबंधित
संदर्भ- प्रसंग, संबंध
आत्मानुभव स्वयं का अनुभव
शैशव- बचपन
मात्र- केवल
परिचित- जाना-पहचाना
संभवतः शायद, संभव है

व्याख्या- इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा भाषा की शक्ति और मानव जीवन में उसके महत्त्व को समझाती हैं। वे कहती हैं कि मनुष्य की रचनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे समर्थ और स्थायी साधन भाषा है। यही भाषा मनुष्य के आंतरिक तथा बाह्य जीवन को सुधारने और विकसित करने का आधार बनती है। भाषा के माध्यम से मनुष्य अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करता है तथा उनके बीच संबंध स्थापित करता है। यह एक कोमल लेकिन मजबूत धागे की तरह कार्य करती है, जो मन और बुद्धि को जोड़कर रखती है। भाषा में स्वर, अर्थ, रूप, भाव और समझ का सुंदर मेल होता है, जिसके कारण मनुष्य अपनी बात को व्यक्तिगत स्तर से समाज तक पहुँचा सकता है।
लेखिका आगे बताती हैं कि जैसे मनुष्य का व्यक्तित्व बाहरी वातावरण और अंदरूनी अनुभवों से मिलकर बनता है, वैसे ही उसकी वाणी भी अनेक प्रभावों से विकसित होती है। जीवन की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियाँ, संघर्ष और अनुभव भाषा को आकार देते हैं। धीरे-धीरे हमारे मन, बुद्धि और भावनाएँ शब्दों में बस जाती हैं, और एक छोटा-सा शब्द भी कई छिपी हुई भावनाओं को जगा सकता है।
महादेवी वर्मा यह भी स्पष्ट करती हैं कि भाषा सीखना और भाषा को जीना अलग बातें हैं। हर भाषा ज्ञान और भावनाओं से भरपूर होती है, इसलिए उसे सीखना उपयोगी है, लेकिन जिस भाषा में हमारी संस्कृति, परंपराएँ और अनुभव जुड़े होते हैं, उसी में हम अपने पूरे मन और भावनाओं के साथ जी पाते हैं। इसका कारण यह है कि ध्वनि का अनुभव हम अपने जीवन से प्राप्त करते हैं, जबकि शब्दों का अर्थ हमारी बुद्धि समझती है। बचपन में शब्द हमारे लिए केवल आवाज होते हैं, पर धीरे-धीरे हम उनके अर्थ समझने लगते हैं। यदि हम ध्वनि को पहचाने बिना ही अर्थ जान लें, तो शायद हम बोलना सीख ही न सकें। इस प्रकार भाषा हमारे अनुभव, समझ और संस्कृति से जुड़ी हुई एक जीवंत शक्ति है, जो हमारे व्यक्तित्व और जीवन को पूर्णता प्रदान करती है।

 

पाठ– अतः यह कहना सत्य है कि वाणी आत्मानुभूति की मौलिक अभिव्यक्ति है. जो समष्टिभाव से अपने विस्तार के लिए भाषा का रूप धारण करती है। इसीलिए पाणिनि ने कहा है:- “आत्मा बुद्ध्या समेत्वार्थान् मनोयुक्त विवक्षया।” अर्थात बुद्धि के द्वारा सब अर्थों का आकलन करके मन में बोलने की इच्छा उत्पन्न करती है।
मानव व्यक्तित्व जैसे प्राकृतिक परिवेश से प्रभावित होता है, उसी प्रकार उसकी भाषा भी अपनी धरती से प्रभाव ग्रहण करती है और यह प्रभाव भिन्नता का कारण हो जाता है। भाषा संबंधी बाह्य भिन्नताएं पर्वत की ऊँची-नीची अनमिल श्रेणियों न होकर एक ही सागरतल पर बनने वाली लहरों से समानता रखती हैं। उनकी भिन्नता समष्टि की गति की निरंतरता बनाए रखने का लक्ष्य रखती है, उसे खंडित करने का नहीं।
प्रत्येक भाषा ऐसी त्रिवेणी है, जिसकी एक धारा व्यावहारिक जीवन के आदान-प्रदान सहज करती है. दूसरी मानव की बुद्धि और हृदय की समृद्धि को अन्य मानवों के बुद्धि तथा हृदय के लिए संप्रेषणशील बनाती है और तीसरी अंत:सलिला के समान किसी भेदातीत स्थिति की संयोजिका है।
हमारे विशाल देश की रूपात्मक विविधता उसकी सांस्कृतिक एकता की पूरक रही है, उसकी विरोधिनी नहीं। इसी से विशेष जीवन पद्धति चिंतन, रागात्मक दृष्टि, सौंदर्य बोध आदि के संबंध में तत्त्वगत एकता ने देश के व्यक्तित्व को इतने विघटनधर्मा विवर्तनों में भी संश्लिष्ट रखा है।

शब्दार्थ-
अतः- इसलिए, इस कारण
आत्मानुभूति स्वयं के अनुभव की अनुभूति
समष्टिभाव सामूहिक भावना, सबको साथ लेकर चलने का भाव
विस्तार- फैलाव, बढ़ाव
धारण करना अपनाना, स्वीकार करना
आकलन मूल्यांकन, समझकर निर्णय करना
उत्पन्न- पैदा होना, जन्म लेना
प्राकृतिक प्रकृति से संबंधित
प्रभावित असर पड़ना
प्रभाव- असर, परिणाम
भिन्नता- अंतर, अलगाव
भाषा संबंधी भाषा से जुड़ा हुआ
बाह्य बाहरी
अनमिल- जो आपस में मेल न खाए
श्रेणियाँ- स्तर या पंक्तियाँ
सागरतल समुद्र का तल
समानता- बराबरी, एक जैसा होना
निरंतरता लगातार बने रहने की स्थिति
लक्ष्य उद्देश्य
खंडित टूटना, विभाजित होना
त्रिवेणी- तीन धाराओं का संगम
धारा- प्रवाह, दिशा
व्यावहारिक व्यवहार से संबंधित, उपयोगी|
आदान-प्रदान लेन-देन
सहज- सरल, स्वाभाविक
समृद्धि संपन्नता, भरपूर विकास
संप्रेषणशील- दूसरों तक पहुँचाने योग्य
अंत:सलिला भीतर बहने वाली धारा
भेदातीत भेद से परे, जिसमें कोई अंतर न हो
संयोजिका जोड़ने वाली
विशाल- बहुत बड़ा
रूपात्मक रूप से संबंधित
विविधता अनेक प्रकार होना
सांस्कृतिक संस्कृति से संबंधित
एकता- एक होने की स्थिति
पूरक- सहायक, पूरा करने वाला
विरोधिनी विरोध करने वाली
जीवन पद्धति जीवन जीने का तरीका
चिंतन- विचार, मनन
रागात्मक भावनात्मक
सौंदर्य बोध सुंदरता को समझने की क्षमता
तत्त्वगत मूल तत्व से संबंधित
विघटनधर्मा- टूटने या बिखरने की प्रवृत्ति वाला
विवर्तन घूमना, चक्कर
संश्लिष्ट संश्लेषित (जोड़ना, मिलाना)

व्याख्या- इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा भाषा की उत्पत्ति, उसके स्वरूप और समाज में उसकी भूमिका को स्पष्ट करती हैं। वे कहती हैं कि वाणी मनुष्य की आत्मानुभूति अर्थात अपने भीतर के अनुभवों और भावनाओं की मूल अभिव्यक्ति है, जो समाज से जुड़कर भाषा का रूप ले लेती है। अर्थात जब व्यक्ति अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाना चाहता है, तो वाणी विकसित होकर भाषा बन जाती है। इसी संदर्भ में पाणिनि का कथन दिया गया है, जिसका अर्थ है कि मनुष्य पहले बुद्धि से अर्थ को समझता है, फिर उसके मन में बोलने की इच्छा उत्पन्न होती है। इससे स्पष्ट होता है कि भाषा का संबंध मन, बुद्धि और आत्मानुभव तीनों से है।
लेखिका आगे बताती हैं कि जैसे मनुष्य का व्यक्तित्व अपने प्राकृतिक वातावरण से प्रभावित होता है, वैसे ही उसकी भाषा भी अपनी धरती और परिवेश से प्रभावित होती है। यही कारण है कि अलग-अलग स्थानों पर भाषाओं में भिन्नता दिखाई देती है। परंतु यह भिन्नता विभाजन का कारण नहीं है। भाषाओं की यह विविधता ऊँचे-नीचे पर्वतों की तरह अलगाव पैदा करने वाली नहीं, बल्कि समुद्र की लहरों के समान है, जो अलग दिखाई देते हुए भी एक ही सागर का हिस्सा होती हैं। इनका उद्देश्य समाज की गति और एकता को बनाए रखना है, न कि उसे तोड़ना।
महादेवी वर्मा प्रत्येक भाषा को त्रिवेणी के समान मानती हैं। इसकी पहली धारा दैनिक जीवन के व्यवहार और लेन-देन को सरल बनाती है। दूसरी धारा मनुष्य के ज्ञान और भावनाओं को दूसरों तक पहुँचाकर बौद्धिक और हृदयगत समृद्धि बढ़ाती है। तीसरी धारा एक गहरे आंतरिक स्तर पर मनुष्यों को जोड़ती है, जहाँ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं रहता। इस प्रकार भाषा केवल संचार का साधन नहीं, बल्कि लोगों को एकता के सूत्र में बाँधने वाली शक्ति भी है।
अंत में लेखिका कहती हैं कि हमारे विशाल देश भारत में रूप और परंपराओं की विविधता हमेशा सांस्कृतिक एकता की पूरक रही है, विरोधी नहीं। अलग-अलग जीवनशैली, विचारधारा, भावनात्मक दृष्टि और सौंदर्यबोध होने के बावजूद देश की मूल भावना एक ही बनी रही है। यही तत्त्वगत एकता भारत को अनेक परिवर्तन और चुनौतियों के बीच भी एक सूत्र में बाँधे रखती है और उसके राष्ट्रीय व्यक्तित्व को मजबूत बनाती है।

 

पाठ– धरती का कोई खंड, नदी, पर्वत, समतल आदि का संघात कहा जा सकता है। मनुष्यों की आकस्मिक रूप से एकत्र भीड़ मानव समूह की संज्ञा पा सकती है। राष्ट्र की गरिमा पाने के लिए भूमिखंड विशेष की ही नहीं, एक सांस्कृतिक दायभाग के अधिकारी और प्रबुद्ध मानव समाज की भी आवश्यकता होती है. जो अपने अनुराग की दीप्ति से उस भूमिखंड के हर कण को इस प्रकार उद्भासित कर दे कि वह एक चिर नवीन सौंदर्य में जीवित और लयवान हो सके।
कहने की आवश्यकता नहीं कि हिमकिरीटिनी भारत भूमि ऐसी ही राष्ट्र प्रतिमा है। ऐसे महादेश में अनेक भाषाओं की स्थिति स्वाभाविक है, किंतु उनमें से प्रत्येक भाषा एक वीणा के ऐसे सधे तार के समान रहकर ही सार्थकता पाती है. जो रागिनी की संपूर्णता के लिए ही अपनी झंकार में अन्य तारों से भिन्न है।
सभी भारतीय भाषाओं ने अपनी चिंतना तथा भावना की उपलब्धियों से राष्ट्र जीवन को समृद्ध किया है। उनकी देशगत भिन्नता, उनकी तत्त्वगत एकता से प्राणवती होने के कारण महार्थ है।

शब्दार्थ-
खंड भाग, टुकड़ा
समतल सपाट भूमि
संघात समूह, एक साथ बना हुआ रूप
आकस्मिक अचानक, बिना योजना के
एकत्र इकट्ठा
राष्ट्र- देश, एक संगठित जनसमूह वाला राज्य
गरिमा- गौरव, सम्मान
भूमिखंड भूमि का विशेष भाग
सांस्कृतिक संस्कृति से संबंधित
अधिकारी हकदार, अधिकार रखने वाला
प्रबुद्ध जागा हुआ, ज्ञानी
अनुराग प्रेम, गहरा लगाव
दीप्ति चमक, प्रकाश
उद्भासित प्रकाशित , सुशोभित, चमकता हुआ
चिर- लंबे समय तक रहने वाला, सदैव
नवीन- नया, ताज़ा
लयवान- ताल और गति से युक्त, जीवंत
हिमकिरीटिनी- हिम (बर्फ) का मुकुट धारण करने वाली, हिमालय से सुशोभित
राष्ट्र प्रतिमा- राष्ट्र का आदर्श रूप या प्रतीक
महादेश बहुत बड़ा देश या भूभाग
स्वाभाविक प्राकृतिक, सहज
किंतु- लेकिन
सधे ठीक से मिलाए हुए, संतुलित
सार्थकता- अर्थपूर्णता, उपयोगिता
रागिनी- मधुर संगीत की धुन
संपूर्णता- पूर्णता, पूरा होना
झंकार मधुर ध्वनि
भिन्न- अलग
चिंतना- विचारधारा, सोच
उपलब्धियाँ- प्राप्त सफलताएँ
समृद्ध संपन्न, विकसित
देशगत देश से संबंधित
तत्त्वगत- मूल तत्व से संबंधित
प्राणवती- जीवंत, जीवन से भरपूर
महार्थ महान अर्थ या विशेष महत्त्व

व्याख्या- इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा राष्ट्र, संस्कृति और भाषाओं के संबंध को सरल रूप में समझाती हैं। वे कहती हैं कि केवल धरती का कोई टुकड़ा, जिसमें नदियाँ, पर्वत और मैदान हों, उसे मात्र एक भौगोलिक क्षेत्र कहा जा सकता है। उसी प्रकार लोगों की अचानक एकत्रित भीड़ को केवल मानव समूह कहा जा सकता है। परंतु किसी स्थान को राष्ट्र बनने के लिए केवल भूमि पर्याप्त नहीं होती, इसके लिए एक जागरूक, संस्कारी और बुद्धिमान समाज की आवश्यकता होती है, जो उस भूमि से प्रेम करे और अपने समर्पण से उसे उज्ज्वल बना दे। जब लोग अपने स्नेह और कर्तव्यभाव से उस भूमि के प्रत्येक कण को महत्त्व देते हैं, तब वह राष्ट्र हमेशा नवीन, जीवंत और सुंदर बना रहता है।
लेखिका आगे कहती हैं कि भारत ऐसी ही महान राष्ट्र-प्रतिमा है, जिसे ‘हिमकिरीटिनी’ अर्थात हिमालय से सुशोभित भूमि कहा गया है। इतने विशाल देश में अनेक भाषाओं का होना स्वाभाविक है। लेकिन इन भाषाओं का महत्त्व तभी है, जब वे आपस में समन्वय बनाकर रहें। लेखिका भाषाओं की तुलना वीणा के तारों से करती हैं। हर तार की ध्वनि अलग होती है, परंतु सभी मिलकर ही मधुर संगीत उत्पन्न करते हैं। उसी प्रकार हर भाषा अपनी अलग पहचान रखते हुए भी राष्ट्र की समग्रता को सुंदर बनाती है।
अंत में वे बताती हैं कि सभी भारतीय भाषाओं ने अपने विचारों और भावनाओं से राष्ट्र के जीवन को समृद्ध किया है। फिरभी वे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी हैं, फिर भी उनके भीतर एक मूलभूत एकता है। यही एकता उन्हें जीवन्त और महत्वपूर्ण बनाती है। इसलिए भाषाओं की विविधता हमारे राष्ट्र के लिए बाधा नहीं, बल्कि उसकी शक्ति और गौरव का कारण है।

 

पाठ– ज्वाला धरती की गहराई में कोयले को हीरा बनाने की क्रिया में संलग्न रहती है, और सीप जल की अतल गहनता में स्वाति की बूंद से मोती बनाने की साधना करती है। न हीरक धरती की ज्वाला को साथ लाता है, न मुक्ता जल की गहराई को, परंतु वे समान रूप से मूल्यवान रहेंगे।
हम जिस संक्रांति के युग का अतिक्रमण कर रहे हैं, उसमें मानव जीवन की त्रासदी का कारण संवेदनशीलता का आधिक्य न होकर उसका अभाव है। हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ हमारी मानसिक परतंत्रता का ऐसा ग्रंथि बंधन हुआ है, जिसे न हम खोल पाते हैं, न काट पाते हैं। परिणामतः हमारे विकास के मार्ग को हमारी छाया ही अवस्ध कर रही है।
अतीत में हमारे देश ने अनेक अंधकार के आयाम पार किए हैं. परंतु इसके चिंतकों, साधकों तथा साहित्य सृष्टाओं की दृष्टि के आलोक ने ही पथ की सीमाओं को उज्ज्वल रखकर उसे अंधकार में खोने से बचाया है।
भाषा ही इस आलोक के लिए संचारिणी दीपशिखा रही है।
पावका नः सरस्वती।

शब्दार्थ-
ज्वाला आग की तीव्र लपट
गहराई बहुत नीचे या भीतर की अवस्था
संलग्न किसी कार्य में लगा हुआ
सीप समुद्र में मिलने वाला खोल, जिसमें मोती बनता है
अतल जिसकी गहराई का अंत न हो
स्वाति एक नक्षत्र, जिसकी वर्षा की बूंद को मोती बनने का कारण माना जाता है
मुक्ता- मोती
समान- एक जैसा
मूल्यवान कीमती, महत्त्वपूर्ण
संक्रांति परिवर्तन या बदलाव का समय
अतिक्रमण–  उल्लंघन
त्रासदी- दुखद स्थिति या बड़ी पीड़ा
संवेदनशीलता भावनाओं को समझने और महसूस करने की क्षमता
आधिक्य अधिकता, ज्यादा होना
अभाव- कमी
परतंत्रता दूसरों पर निर्भर रहने की अवस्था
ग्रंथि बंध- मजबूत गाँठ या जकड़न
परिणामतः फलस्वरूप, इसके कारण
अवरुद्ध- रुकावट, बाधा
आयाम पहलू, रूप
चिंतक- गहराई से सोचने वाला व्यक्ति
साधक लक्ष्य प्राप्ति के लिए प्रयास करने वाला
साहित्य सृष्टा साहित्य रचने वाला, लेखक
आलोक प्रकाश, उजाला
उज्ज्वल चमकदार, प्रकाशमान
संचारिणी फैलाने या पहुँचाने वाली
दीपशिखा- दीपक की लौ, प्रकाश देने वाली ज्योति

व्याख्या- इन पंक्तियों में महादेवी वर्मा गहरे उदाहरणों के माध्यम से भाषा, समाज और मानव जीवन की स्थिति को स्पष्ट करती हैं। वे कहती हैं कि धरती की गहराई में अग्नि कोयले को हीरा बना देती है और समुद्र की गहराई में सीप स्वाति की बूंद से मोती का निर्माण करती है। हीरा अपने साथ धरती की आग को नहीं लाता और मोती भी समुद्र की गहराई को साथ नहीं लाता, फिर भी दोनों अत्यंत मूल्यवान होते हैं। इस उदाहरण के द्वारा लेखिका समझाना चाहती हैं कि अलग-अलग परिस्थितियों में विकसित होने वाली वस्तुएँ या तत्व अपनी विशेषता और महत्त्व बनाए रखते हैं। इसी प्रकार विभिन्न भाषाएँ और संस्कृतियाँ भले ही अलग परिवेश में पली-बढ़ी हों, पर उनका मूल्य समान होता है।
आगे लेखिका वर्तमान समय को परिवर्तन का युग बताती हैं और कहती हैं कि आज मानव जीवन की सबसे बड़ी दुखद स्थिति संवेदनशीलता की अधिकता नहीं, बल्कि उसकी कमी है। अर्थात लोग दूसरों के दुख-सुख को समझने और महसूस करने की क्षमता खोते जा रहे हैं। भारत को राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई है, लेकिन मानसिक रूप से हम अभी भी कई बंधनों में जकड़े हुए हैं। यह मानसिक पराधीनता ऐसी गाँठ बन गई है, जिसे हम न तो खोल पा रहे हैं और न ही तोड़ पा रहे हैं। परिणामस्वरूप हमारे विकास के रास्ते में हमारी अपनी सोच और कमजोरियाँ ही बाधा बन रही हैं।
लेखिका याद दिलाती हैं कि हमारे देश ने इतिहास में कई कठिन और अंधकारमय समयों का सामना किया है, लेकिन हमारे महान चिंतकों, संतों और साहित्यकारों ने अपने ज्ञान और विचारों के प्रकाश से हमेशा सही मार्ग दिखाया है। उनके विचारों ने समाज को भटकने से बचाया और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। इस प्रकाश को फैलाने का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम भाषा रही है। भाषा एक जलती हुई दीपशिखा की तरह है, जो ज्ञान का प्रकाश फैलाकर अज्ञानता के अंधकार को दूर करती है। अंत में ‘पावका नः सरस्वती’ कहकर लेखिका ज्ञान और वाणी की देवी सरस्वती से प्रार्थना करती हैं कि वे हमारी वाणी को शुद्ध, उज्ज्वल और प्रेरणादायक बनाए रखें, ताकि समाज सही दिशा में आगे बढ़ता रहे।
 

 

Conclusion

इस पोस्ट में ‘भाषा का प्रश्न’ पाठ का सारांश, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। यह पाठ MSBSHSE कक्षा 10 के पाठ्यक्रम में हिंदी की पाठ्यपुस्तक से लिया गया है। ‘भाषा का प्रश्न’ निबंध में लेखिका महादेवी वर्मा ने भाषा के महत्त्व, उसकी शक्ति और मानव जीवन में उसकी आवश्यकता को सरल शब्दों में समझाया है। यह पोस्ट विद्यार्थियों को पाठ को सरलता से समझने, उसके मुख्य संदेश को ग्रहण करने और परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर देने में सहायक सिद्ध होगा।