नाम चर्चा पाठ सार

Maharashtra State Board Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 3 “Naam Charcha” Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings

 

 नाम चर्चा सार – Here is the Maharashtra State Board of Secondary and Higher Secondary Education (MSBSHSE) Class 10 Hindi Kumarbharti Book Chapter 3 Naam Charcha Summary with detailed explanation of the lesson “Naam Charcha” along with meanings of difficult words. Given here is the complete explanation of the lesson, summary and difficult word meanings 

इस पोस्ट में हम आपके लिए महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक व उच्च माध्यमिक शिक्षण मंडळ के कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती पुस्तक के पाठ 3 नाम चर्चा से पाठ सार, पाठ व्याख्या और कठिन शब्दों के अर्थ लेकर आए हैं जो परीक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। हमने यहां प्रारंभ से अंत तक पाठ की संपूर्ण व्याख्याएं प्रदान की हैं क्योंकि इससे आप  इस कहानी के बारे में अच्छी तरह से समझ सकें। चलिए विस्तार से कक्षा 10 नाम चर्चा पाठ के बारे में जानते हैं।

 

Naam Charcha (नाम चर्चा )

‘नाम चर्चा’ एक हास्य-व्यंग्य निबंध है। जिसमें नरेंद्र कोहली जी ने ‘नामकरण की समस्या’ पर मनोरंजक प्रकाश डाला है। नवजात शिशु का नाम रखने के लिए लोग किस तरह से परेशान होते हैं, किस-किस तरह के नाम रखना चाहते हैं, इनका लेखक ने हास्य-व्यंग्यपूर्ण से वर्णन किया है।

 

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नाम चर्चा पाठ सार Naam Charcha Summary

‘नाम चर्चा’ एक हास्य-व्यंग्य निबंध है। नवजात शिशु का नाम रखने के लिए लोग किस तरह से परेशान होते हैं, नरेंद्र कोहली जी ने इस समस्या पर मनोरंजक प्रकाश डाला है। लेखक बताते हैं कि कुछ लोगों के अनुसार हिंदी के कथा साहित्य में भाषा सम्बन्धी बाधा आ गई है। इस बाधा से एक बहुत बड़ी समस्या दूसरे क्षेत्र में पैदा हो गई है। जितने भी हिंदी भाषी प्रदेश हैं उनमें नाम को लेकर समस्या आ गई है। जब किसी के घर में कोई संतान होती है तो बच्चे का नाम रखना कठिन हो जाता है। पहले जब कोई नाम पूछता था तब लेखक कोई भी पत्रिका उठा लेते थे, और उसमें जिस किसी कहानी की नायिका या नायक का नाम दिख जाता था, वही नाम उस बालक या बालिका को दे दिया जाता था। उस समय लोग भी बहुत सरल होते थे वे तुरंत उस नाम को पसंद भी कर लेते थे। अब हिंदी का कथा लेखक हर कहानी के नायक का नाम ‘वह’ रख देता है और किसी को अपनी संतान का नाम ‘वह’ रखने को कहा जाए तो कोई भी तैयार नहीं होता। लेखक के अनुसार हिंदी के कहानी लेखक के द्वारा नाम न रखना लेखक के लिए परेशानी खड़ी कर देता है। लेखक के भाई-बंधु, मित्र तथा ज्यादातर पड़ोसी पंजाबी थे। दूसरे प्रदेशों के लोग लेखक के पंजाबी अभिमान को कम ही सहते थे, इसलिए उनसे लेखक की अधिक बनती भी नहीं थी। एक कश्मीरी लेखक के पास आए। वे अपनी बच्ची का नाम कुछ ऐसा रखना चाहते थे जिसमें कश्मीर का सारा प्राकृतिक सौंदर्य साकार हो सके। लेखक ने अपनी क्षमता के अनुसार पूरा परिश्रम किया परन्तु वे कोई भी ऐसा नाम नहीं दे पाए। उन्होंने ही लेखक से कहा कि यदि वे कोई नया नाम नहीं दे सकते तो उनके सोचे हुए नाम का ही हिंदी में कोई अच्छा-सा समानार्थक शब्द दे, लेखक ने उनका सोचा हुआ नाम पूछा। तो उन्होंने “रोजलीना” बताया। कश्मीरी जन ने लेखक को बताया कि रोजलीना नाम अच्छा तो है परन्तु कठिनाई बस इतनी है कि यह नाम अंग्रेजी में है और उनके रिश्तेदार इसे पसंद नहीं कर पा रहे। इसलिए वे लेखक से इसका हिंदी या भारतीय समानार्थक नाम चाहते थे। लेखक ने बहुत सोचा, शब्दकोश उलट-पलट डाले और तब खोजकर उनको ‘रोजलीना’ का समानार्थक नाम दिया, ‘गुलाबो’। लेखक के द्वारा दिया गया गुलाबो नाम पंजाबी लग रहा था जो उन्हें कुछ ख़ास पसंद नहीं आया। लेखक को तब भी लगा था कि उनका प्रदेश के प्रति लगाव उनके कर्तव्य में बाधा खड़ी कर रहा है। लेखक के एक पंजाबी पड़ोसी भी अपने पुत्र के नाम के लिए लेखक के पास आए थे। लेखक ने उनसे कहा कि वे अपने पुत्र का नाम ‘निकुंज’ रख दें। लेखक के अनुसार यह बहुत बढ़िया नाम था और सारे मुहल्ले में किसी और का भी ऐसा नाम नहीं था। परन्तु वे दोनों हाथों से ताली पीटकर खिलखिलाए और लेखक से कहने लगे कि वे बहुत बढ़िया मजाक करते हैं क्योंकि उनके द्वारा चुना गया नाम उन्हें कुंभकरन जैसा लग रहा था फिर वे स्वयं ही बोले कि उन्होंने वेल्कम नाम सोचा है। वे अपने मकान का नाम भी इसी पुत्र के नाम पर वेल्कम बिल्डिंग रखेंगे। यह सुनकर लेखक की बुद्धि चक्कर खा गई। ऐसे नाम की तो लेखक ने कल्पना ही नहीं की थी। क्योंकि पिंकी – शिंकी तो लोग नाम रखने लगे थे। पर लेखक ने यह भी सुना था, कि किसी ने अपनी बेटी का नाम ‘ट्विंकल’ भी रखा था। लेखक के पड़ोस में एक साहब ने अपने बेटे को ‘प्रिंस’ घोषित किया था पर वेल्कम तो उससे भी ऊँचा नाम था। लेखक ने उन्हें उस पुत्र का नाम वेल्कम रखने को कहा और दूसरे का फेयरवेल रखने का सुझाव दिया। वे पडोसी भी एक साथ दो-दो नाम पसंद कर के चल पड़े। अर्थात उन्होंने लेखक के सुझाव को मान लिया। लेखक के मकान से चौथे मकान में रहने वाले उनके पड़ोसी अपने तीन वर्ष के लड़के के लिए अभी तक एक नाम तक नहीं खोज पाए थे। लेखक ने उनसे उनकी समस्या पूछी। अपनी समस्या बताते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे की माँ की जिद्द ही उनकी समस्या है। उसकी माँ कहती है कि उसका नाम उसके शोर मचाने पर ही रखेंगे। यह जिद्द सुन कर लेखक हैरान हो गया। क्योंकि लोग गुण पर तो नाम रखते ही हैं पर दोष को लेकर नाम रखना अजीब था। लेखक ने उन्हें “कोलाहल” नाम बताया। यह नाम उन्हें तो पसंद आया परन्तु उनके अनुसार बच्चे की माँ को यह नाम पसंद नहीं आना था। लेखक ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नाम उनके अपने देश या जगह जैसा होना चाहिए जैसे उनका अपना नाम रामखेलावन था। और वे चाहते थे कि बच्चे का नाम भी कुछ उसी तरह का हो। यह सुनकर लेखक की बुद्धि चकमक हो रही थी तो वे जल्दी से बोले कि रामखेलावन के जैसे आप बच्चे का नाम शोरमचावन रख दीजिए। यह नाम सुनते ही वे ख़ुशी से उछल पड़े कि वे तीन साल से ऐसा ही नाम तो खोज रहे थे। 

लेखक के एक मित्र के साथ एक और साहब लेखक के पास आए थे। लेखक ने उनसे पूछा कि वे किस तरह का नाम रखना चाहते हैं। वे चाहते थे कि उसका कुछ ऐसा नाम रखा जाए कि उसका प्यारापन और सताना दोनों ही बातें उस नाम में समा जाएँ। लेखक ने प्रसाद जी को माध्यम बनाकर प्यार और जिद्द से भरे बचपन को ‘दुर्ललित’ अर्थात अत्यधिक प्यार से बिगड़ा हुआ बता कर यही नाम उनको बच्चे का भी रख देने को कहा। यह नाम उन्हें पसंद नहीं आया। क्योंकि उन्हें तो ऐसा नाम चाहिए, जो किसी फर्म का नाम भी हो सके। जैसे लटदाराम गेंदामल। उनकी शर्तों के मुताबिक लेखक ने बच्चे का नाम प्यारूभल सताऊभल रखने का सुझाव दिया। यह नाम फर्म का जरूर लगेगा, फिर बच्चे का चाहे न लगे। यह नाम उन्हें फार्म के लिए पसंद आ गया। 

परन्तु लेखक ने उसी दिन से नाम बताने का काम बंद कर दिया था। लोगों ने नामों का वर्गीकरण शुरू कर रखा है जैसे फर्मों के उपयुक्त नाम, नेताओं के उपयुक्त नाम, एक्टरों के उपयुक्त नाम इत्यादि। लेखक यह देखना चाहते है कि नामों के कितने वर्ग बनते हैं और फिर लेखक उनके अनुसार नामों की सूचियाँ बनाएंगे और फिर नाम बताने का ही काम शुरू कर देंगे। और उन नामों के अधिकार पत्र बनवा लेंगें। और फिर उन अधिकार पत्र वाले नामों का अधिकार शुल्क देकर ही लोग उनमें से कोई नाम रख सकेंगे। लेखक सभी से आग्रह करते हैं कि वे भी अपनी आवश्यकता लिखित रूप से लेखक को भेज सकते हैं। 

 

नाम चर्चा  पाठ व्याख्या  Naam Charcha Lesson Explanation

पाठ –  कहते हैं, हिंदी के कथा साहित्य में गतिरोध आ गया है। ऐसे संकट हिंदी साहित्य में पहले भी आए हैं और अकसर आते रहते हैं। हिंदी में आते हैं तो अन्य भाषाओं के साहित्य में भी आते होंगे पर फिर भी सारी दुनिया का काम चलता रहता है। यह कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जिसका कोई समाधान न हो।

इस गतिरोध से एक भयंकर समस्या दूसरे क्षेत्र में पैदा हो गई है। सारे हिंदी भाषी प्रदेशों में नाम को लेकर गतिरोध आ गया है। कहीं किसी के घर में कोई संतान हुई और मुसीबत उठ खड़ी हुई। कितनी भयंकर समस्या है कि बच्चे का नाम क्या रखें ?
इस कर्तव्य को पूरा करने में मुझे कोई परेशानी नहीं थी पर हिंदी कथा साहित्य के इस गतिरोध ने मेरी गति भी अवरुद्ध कर दी है। पहले यह होता था कि किसी ने नाम पूछा और हमने कोई भी पत्रिका उठा ली, जिस किसी कहानी की नायिका या नायक का नाम दिखा, वही टिका दिया। लोग होते भी इतने सरल थे कि झट वह नाम पसंद कर लेते थे।
अब हिंदी का कथा लेखक अपनी कहानियों में नाम रखने से कतराने लगा है। पचासों कहानियाँ पढ़ जाओ तो कहीं एकाध नाम मिलता है; नहीं तो लोग ‘यह’, ‘वह’ से काम चला लेते हैं। हर कहानी के नायक का नाम ‘वह’ और मेरी बात मान अपनी संतान का नाम ‘वह’ रखने को कोई भी तैयार नहीं। नाम हिंदी का कहानी लेखक नहीं रखता और परेशानी मेरे लिए खड़ी हो गई !
मेरे मस्तिष्क में एक साहित्यिक टोटका आया। मैंने सोचा, ‘कथा साहित्य में गतिरोध आने पर भी तो आखिर हिंदी कहानी पत्रिकाओं का संपादक अपना कार्य किसी प्रकार चला ही रहा है न। कैसे चलाता है वह ?’

शब्दार्थ –
गतिरोध – रोक, रुकावट
समाधान – हल
अवरुद्ध – रुका या रोका हुआ
झट – जल्दी
एकाध – गिनती में बहुत कम, एक आध
साहित्यिक टोटका – साहित्य (कविता, गीत, मंत्र, लोककथा) का उपयोग करके किया जाने वाला छोटा उपचार

व्याख्यालेखक बताते हैं कि कुछ लोगों के अनुसार हिंदी के कथा साहित्य में बाधा आ गई है। ऐसे संकट हिंदी साहित्य में पहले भी कई बार आए हैं और अकसर ऐसे संकट आते ही रहते हैं। यदि हिंदी में ऐसे संकट आते हैं तो दूसरी भाषाओं के साहित्य में भी अवश्य आते होंगे। परन्तु फिर भी सारी दुनिया का काम चलता रहता है। क्योंकि यह कोई ऐसी कठिनाई नहीं है जिसका कोई हल न हो।
इस बाधा से एक बहुत बड़ी समस्या दूसरे क्षेत्र में पैदा हो गई है। जितने भी हिंदी भाषी प्रदेश हैं उनमें नाम को लेकर समस्या आ गई है। जब किसी के घर में कोई संतान होती है तो मुसीबत उठ खड़ी हो जाती है। यह समस्या कितनी भयंकर है कि बच्चे का नाम रखना कठिन हो जाता है। नाम रखने के इस कर्तव्य को पूरा करने में लेखक को कोई परेशानी नहीं थी परन्तु हिंदी कथा साहित्य में आई बाधा ने लेखक की गति को भी रोक दिया है। पहले जब कोई नाम पूछता था तब लेखक कोई भी पत्रिका उठा लेते थे, और उसमें जिस किसी कहानी की नायिका या नायक का नाम दिख जाता था, वही नाम उस बालक या बालिका को दे दिया जाता था। उस समय लोग भी बहुत सरल होते थे वे तुरंत उस नाम को पसंद भी कर लेते थे।
अब हिंदी का कथा लेखक अपनी कहानियों में नायिका या नायक का नाम रखने से अपने आप को दूर रखने लगा है। यदि आप कई पचासों कहानियाँ पढ़ लें, तब कहीं एक आध नाम मिलता है। नहीं तो लेखक ‘यह’, ‘वह’ से ही काम चला लेते हैं। हर कहानी के नायक का नाम ‘वह’ रखा जाता है और किसी को अपनी संतान का नाम ‘वह’ रखने को कहा जाए तो कोई भी तैयार नहीं होता। लेखक के अनुसार हिंदी के कहानी लेखक के द्वारा नाम न रखना लेखक के लिए परेशानी खड़ी कर देता है।
लेखक के मस्तिष्क में एक तरीका आया। उसने सोचा कि कथा साहित्य में बाधा आने पर भी तो आखिर हिंदी कहानी पत्रिकाओं का संपादक अपना कार्य किसी न किसी तरह से चला ही रहा है। वह किस तरह बिना नाम के भी काम चला रहा है यह लेखक जानना चाहता था। 

 

पाठ – थोड़ी-सी छानबीन से पता चला कि कोलकाता और बनारस में बहुत दूरी नहीं है। बस, कोलकाता से बाँग्ला कहानियाँ बनारस में आ जाती हैं। मैंने हजारों-लाखों बाँग्ला नामों को पीट-पीटकर खड़ा किया और खड़ी बोली के नाम बना लिए।
इस बार प्रादेशिकता आड़े आई। मेरे भाई-बंधु, मित्र तथा अधिकांशतः पड़ोसी पंजाबी हैं। दूसरे प्रदेशों के लोग मेरा पंजाबी अक्खड़पन कम ही सहते हैं, इसलिए अधिक निभती नहीं। एक कश्मीरी मेरे पास आए। कश्मीर बहुत सुंदर प्रदेश है। फिर उनकी बिटिया कश्मीर के सौंदर्य से भी अधिक प्यारी थी। उस बच्ची का नाम कुछ ऐसा ही होना चाहिए था, जिसमें कश्मीर का सारा प्राकृतिक सौंदर्य साकार हो सके। मैंने क्षमता भर परिश्रम किया किंतु किसी भी नाम से उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाया।
अंततः उन्होंने ही कहा कि यदि मैं कोई नया नाम नहीं दे सकता तो उनके सोचे हुए नाम का हिंदी में कोई अच्छा-सा पर्याय दे दूँ, जो कि उस बच्ची का नाम रखा जा सके।
मैंने उनकी बात मान ली, इसमें मुझे कोई परेशानी नहीं थी। मैंने उनका सोचा हुआ नाम पूछा।
“रोजलीना।” वे बोले, “इसमें कश्मीर का सौंदर्य, कश्मीर के गुलाब का सौंदर्य, सब कुछ आ जाता है। वैसे पंडित नेहरू भी कश्मीरी थे।” वे अत्यंत भावुक हो उठे- “रोजलीना शब्द से ही हमारी बेबी का चेहरा आँखों के सामने घिर जाता है।”
“नाम तो सुंदर है !” मैंने स्वीकार किया।

शब्दार्थ –
छानबीन – जाँच-पड़ताल
प्रादेशिकता – क्षेत्रीयता, प्रांतीयता या अपने विशेष क्षेत्र/प्रदेश के प्रति अत्यधिक मोह या लगाव की भावना है
आड़े – बाधा, रुकावट
अधिकांशतः – अधिकतर, ज्यादातर
अक्खड़पन – अशिष्टता, असभ्यता, अभिमान
निभती – रिश्ता या किसी स्थिति का ठीक तरह से चलते रहना
पर्याय – समानार्थक शब्द

व्याख्या लेखक ने जब थोड़ी-सी जाँच-पड़ताल की तो उसे पता चला कि कोलकाता और बनारस में दूरी बहुत अधिक नहीं थी। बस, कोलकाता से बाँग्ला कहानियाँ ही बनारस में आ जाती थी। लेखक ने हजारों-लाखों बाँग्ला नामों को बदल-बदल कर खड़ी बोली के नाम बना लिए। इसमें लेखक को इस बार प्रदेश के प्रति अत्यधिक मोह या लगाव की भावना लेखक के लिए बाधा बन गई। लेखक के भाई-बंधु, मित्र तथा ज्यादातर पड़ोसी पंजाबी थे। दूसरे प्रदेशों के लोग लेखक के पंजाबी अभिमान को कम ही सहते थे, इसलिए उनसे लेखक की अधिक बनती भी नहीं थी। एक कश्मीरी लेखक के पास आए। जिस प्रकार कश्मीर बहुत सुंदर प्रदेश है। उनकी बेटी भी कश्मीर के सौंदर्य से अधिक प्यारी थी। उस बच्ची का नाम कुछ ऐसा ही होना चाहिए था, जिसमें कश्मीर का सारा प्राकृतिक सौंदर्य साकार हो सके। लेखक ने अपनी क्षमता के अनुसार पूरा परिश्रम किया परन्तु वे कोई भी ऐसा नाम नहीं दे पाए जिससे वे उन कश्मीरी जन को संतुष्ट कर पाएँ।
अंत में उन्होंने ही लेखक से कहा कि यदि वे कोई नया नाम नहीं दे सकते तो उनके सोचे हुए नाम का ही हिंदी में कोई अच्छा-सा समानार्थक शब्द दे, जो कि उस बच्ची का नाम रखा जा सके। लेखक ने उनकी बात मान ली, क्योंकि लेखक को इसमें कोई परेशानी नहीं थी। लेखक ने उनका सोचा हुआ नाम पूछा। तो उन्होंने “रोजलीना” बताया और कहा कि इस नाम में कश्मीर का सौंदर्य, कश्मीर के गुलाब का सौंदर्य, सब कुछ आ जाता है। वैसे पंडित नेहरू भी कश्मीरी थे। वे बहुत अधिक भावुक हो उठे क्योंकि उनके अनुसार रोजलीना शब्द से ही उनकी बेटी का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। लेखक ने भी स्वीकार किया कि रोजलीना नाम सुंदर है।

 

पाठ – “बस, कठिनाई इतनी है कि नाम अंग्रेजी में है और हमारे रिश्तेदार इसे हजम नहीं कर पा रहे। आप इसका हिंदी या भारतीय पर्याय दे दें, उन्होंने कहा।
मैंने बहुत सोचा, शब्दकोश उलट-पलट डाले और तब खोजकर उनको ‘रोजलीना’ का पर्याय दिया, ‘गुलाबो’।
उन्होंने मेरा चेहरा देखा और नाक सिकोड़कर बोले, ‘आखिर पंजाबी हो न !”
मुझे तब भी लगा था कि प्रादेशिकता मेरे कर्तव्य में बाधा खड़ी कर रही है।
अभी कल ही मेरे एक पंजाबी पड़ोसी आए थे। उनके घर पर परम परमेश्वर की किरपा से एक पुत्तर का जनम हो गया था। अतः वे चाहते थे कि मैं उनके सुपुत्तर के लिए कोई सोणा-सा नाम चुन दूँ।
मैं मान गया। वैसे इतनी जल्दी मैं सामान्यतः माना नहीं करता पर कल रात से एक बड़ा मधुर-सा नाम मेरे मन में चक्कर-भंबीरी काट रहा था। सोचा, ‘इनको वही नाम बता दूँ। इनके सुपुत्तर को नाम मिल जाएगा और मुझे उसकी चक्कर – भंबीरी से मुक्ति।’
मैंने कहा, “लाला जी ! इसका नाम तो आप रखे ‘निकुंज’। बढ़िया नाम है और सारे मुहल्ले में किसी का ऐसा नाम नहीं है।”
“आप मजाक बढ़िया करते हैं, मास्टर साहब !” वह दोनों हाथों से ताली पीटकर खिलखिलाए, “क्या नाम चुना है। कुंभकरन जैसा लगता है।” मैंने कुछ नहीं कहा, चुपचाप उन्हें देखता रहा।
“ऐसा करो”, वह बोले, “कोई बढ़िया-सा अंग्रेजी का नाम सोचो।
मैंने सोचा है, वेल्कम कैसा रहेगा ? वे खुशी से उछल पड़े। अपने मकान का नाम भी हम इसी पुत्तर के नाम पर वेल्कम बिल्डिंग रखेंगे।”
मेरी बुद्धि चक्कर खा गई। ऐसे नाम की तो मैंने कल्पना ही नहीं की थी। पिंकी – शिंकी तो लोग नाम रखने लगे हैं। सुना था, किसी ने अपनी बेटी का नाम ‘ट्विंकल’ भी रखा है। हमारे पड़ोस में एक साहब ने अपने बेटे को ‘प्रिंस’ घोषित किया है पर वेल्कम ऊँचा नाम था।
“पहला पुत्तर है न ?” मैंने पूछा। “हाँ जी ! पैल्ला, एकदम पैल्ला।” वह बोले। “तो ठीक है”, मैं बोला, “इसका नाम वेल्कम रखिए और दूसरे का फेयरवेल।”
वे एक साथ दो-दो नाम पसंद कर चल पड़े।

शब्दार्थ –
शब्दकोश – शब्दमाला या शब्दसागर
पुत्तर – पुत्र
सोणा-सा – अच्छा सा
भंबीरी – तेज़ी से घूमने 

व्याख्या – कश्मीरी जन ने लेखक को बताया कि रोजलीना नाम अच्छा तो है परन्तु कठिनाई बस इतनी है कि यह नाम अंग्रेजी में है और उनके रिश्तेदार इसे पसंद नहीं कर पा रहे। इसलिए वे लेखक से इसका हिंदी या भारतीय समानार्थक नाम चाहते थे। लेखक ने बहुत सोचा, शब्दकोश उलट-पलट डाले और तब खोजकर उनको ‘रोजलीना’ का समानार्थक नाम दिया, ‘गुलाबो’। कश्मीरी जन ने लेखक का चेहरा देखा और नाक सिकोड़कर लेखक से कहा कि आखिर वह पंजाबी ही है। कहने का आशय यह है कि उन्हें लेखक के द्वारा दिया गया गुलाबो नाम पंजाबी लग रहा था जो उन्हें कुछ ख़ास पसंद नहीं आया। लेखक को तब भी लगा था कि उनका प्रदेश के प्रति लगाव उनके कर्तव्य में बाधा खड़ी कर रहा है।
लेखक पिछले दिन की ही बात बताते हैं कि उनके एक पंजाबी पड़ोसी उनके पास आए थे। उनके घर पर परम परमेश्वर की कृपा से एक पुत्र का जन्म हुआ था। इसलिए वे चाहते थे कि लेखक ही उनके सुपुत्र के लिए कोई अच्छा-सा नाम चुन दें। लेखक भी इसके लिए मान गया। वैसे इतनी जल्दी लेखक किसी काम के लिए नहीं मानते थे, परन्तु उस रात से एक बड़ा अच्छा-सा नाम उनके मन में चक्कर काट रहा था। इसलिए उन्होंने सोचा कि उसी को वे उन्हें बता दें। इससे उनके सुपुत्र को नाम मिल जाएगा और लेखक को उस नाम के चक्कर से मुक्ति मिल जाएगी।
लेखक ने उनसे कहा कि वे अपने पुत्र का नाम ‘निकुंज’ रख दें। लेखक के अनुसार यह बहुत बढ़िया नाम था और सारे मुहल्ले में किसी और का भी ऐसा नाम नहीं था।
परन्तु वे दोनों हाथों से ताली पीटकर खिलखिलाए और लेखक से कहने लगे कि वे बहुत बढ़िया मजाक करते हैं क्योंकि उनके द्वारा चुना गया नाम उन्हें कुंभकरन जैसा लग रहा था। लेखक ने कुछ नहीं कहा, और चुपचाप उन्हें देखता रहा।
फिर वे बोले कि लेखक कोई बढ़िया-सा अंग्रेजी का नाम सोच कर बताएं।
और फिर वे खुशी से उछल कर स्वयं ही बोले कि उन्होंने वेल्कम नाम सोचा है। वे अपने मकान का नाम भी इसी पुत्र के नाम पर वेल्कम बिल्डिंग रखेंगे। यह सुनकर लेखक की बुद्धि चक्कर खा गई। ऐसे नाम की तो लेखक ने कल्पना ही नहीं की थी। क्योंकि पिंकी – शिंकी तो लोग नाम रखने लगे थे। पर लेखक ने यह भी सुना था, कि किसी ने अपनी बेटी का नाम ‘ट्विंकल’ भी रखा था। लेखक के पड़ोस में एक साहब ने अपने बेटे को ‘प्रिंस’ घोषित किया था पर वेल्कम तो उससे भी ऊँचा नाम था।
लेखक के पूछने पर कि क्या वह पुत्र उनका पहला पुत्र है? उन्होंने हामी भरी कि वह उनका पहला ही पुत्र है। इस पर लेखक ने उन्हें उस पुत्र का नाम वेल्कम रखने को कहा और दूसरे का फेयरवेल रखने का सुझाव दिया। वे पडोसी भी एक साथ दो-दो नाम पसंद कर के चल पड़े। अर्थात उन्होंने लेखक के सुझाव को मान लिया। 

 

पाठ – अभी पिछले दिनों ही क्षेत्रीयता ने मुझे एक बार और पछाड़ दिया। हमारे मकान से चौथे मकान में रहने वाले मेरे पड़ोसी का लड़का तीन वर्ष का हो गया था, पर वे अभी तक उसके लिए एक नाम तक नहीं खोज पाए थे। जैसे-जैसे दिन निकलते जाते थे, उनकी चिंता और भी गहरी होती जाती थी। जब अपने लड़के के लिए एक उपयुक्त नाम तक नहीं ढूंढ पा रहे थे तो उसके योग्य कन्या और नौकरी कहाँ से खोज पाएँगे।
मुझसे मिले तो अपनी चिंता गाथा ले बैठे। जब वे बहुत रो चुके और बहुत रोकने पर भी मेरा हृदय पूरा गल गया और फेफड़ों की बारी आ गई तो मैंने पूछा, “आखिर समस्या क्या है ?”
“समस्या क्या है ?” वह बोले, “बबुआ की महतारी का हठ और क्या ?” “क्या हठ है ?” बहुत चाहने पर भी उनका घरेलू रहस्य पूछने से मैं स्वयं को न रोक सका।
वह बोले, “हमारा बबुआ बहुत शोर मचाता है, बहुत ज्यादा। उसकी महतारी कहती है कि उसका नाम उसके शोर मचाने पर ही रखेंगे।”
मैं चकित हो गया, हठ को सुनकर। यह भी क्या हठ ! लोग गुण पर तो नाम रखते ही हैं पर दोष को लेकर नाम !
मुझे चिंतित देखकर वह बोले, “कोई नाम सोच रहे हैं क्या ?” मैंने कहा, “एक नाम सूझा है। आपके बबुआ के शोर मचाने से मिलता-जुलता नाम। शायद आपको पसंद आए।”
“हमारी पसंद क्या है”, उनका मुँह लटका ही रहा, “पसंद तो बबुआ की महतारी को होना चाहिए। बोलिए, क्या नाम सूझा है आपको ?” “कोलाहल !” मैंने बताया।
“कोलाहल !” उन्होंने दुहराया, “वैसे तो सुंदर है, पर बबुआ की संभाषणीय भारत में सघन वन किन स्थानों पर बचे हैं, इसकी जानकारी के आधार पर आपस में चर्चा कीजिए।
महतारी को पसंद नहीं आवेगा।”
“क्यों ?” मैंने पूछा।
बोले, नाम तो कोई हमारे देसवा जैसा ही होना चाहिए। जैसे हमारा नाम है रामखेलावन। कोई ऐसन ही नाम हो।”
मेरी बुद्धि चकमक हो रही थी। जल्दी से बोला, “रामखेलावन के तोल पर आप शोरमचावन रख दीजिए।”
“शोरमचावन !” वह उछल पड़े, “बहुत बढ़िया। हम तीन बरिस से एही नाम तो खोज रहे थे। आप सचमुच बहुत बुद्धिमान हैं, मास्टर साहब’ और वे चले गए।
बच्चे के गुण-दुर्गुण पर नाम रखने वाले वे अकेले ही नहीं थे।

शब्दार्थ –
क्षेत्रीयता – किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र, भाषा, संस्कृति या प्रदेश के प्रति अत्यधिक लगाव, निष्ठा या स्वामित्व की भावना होना
पछाड़ – हराना
उपयुक्त – ठीक, अच्छा
गाथा – कथा, वृत्तांत
बबुआ – बेटे
महतारी – माँ
हठ – जिद
देसवा – देश
ऐसन – ऐसा
बरिस – साल
एही – यही 

व्याख्या लेखक बताते हैं कि कुछ समय पहले ही प्रदेश के प्रति अत्यधिक लगाव ने उन्हें एक बार फिर से पीछे कर दिया था। उनके मकान से चौथे मकान में रहने वाले उनके पड़ोसी अपने तीन वर्ष के लड़के के लिए अभी तक एक नाम तक नहीं खोज पाए थे और जैसे-जैसे दिन निकलते जाते थे, उनकी चिंता और भी गहरी होती जाती थी। लेखक बताते हैं कि जब वे अपने लड़के के लिए एक अच्छा सा नाम तक नहीं ढूंढ पा रहे थे तो उसके योग्य कन्या और नौकरी कहाँ से खोज पाएँगे।
जब वे लेखक से मिले तो लेखक के समक्ष अपनी चिंता की कथा ले कर बैठ गए। जब वे बहुत रो चुके थे और बहुत रोकने पर भी लेखक का हृदय पूरा भर गया और फेफड़ों की बारी आ गई तो लेखक ने उनसे उनकी समस्या पूछी। अपनी समस्या बताते हुए उन्होंने कहा कि बच्चे की माँ की जिद्द ही उनकी समस्या है। बहुत चाहने पर भी उनका घरेलू रहस्य पूछने से लेखक स्वयं को न रोक सका और बच्चे की माँ की जिद्द के बारे में पूछ बैठा। उन्होंने बताया कि उनका बच्चा बहुत ज्यादा शोर मचाता है। उसकी माँ कहती है कि उसका नाम उसके शोर मचाने पर ही रखेंगे।
यह जिद्द सुन कर लेखक हैरान हो गया। यह कैसी जिद्द थी, लेखक को समझ नहीं आ रहा था। क्योंकि लोग गुण पर तो नाम रखते ही हैं पर दोष को लेकर नाम रखना अजीब था।
लेखक को चिंतित देखकर वे बोले कि क्या लेखक कोई नाम सोच रहे हैं। लेखक ने भी उन्हें बताया कि लेखक को उनके बच्चे के शोर मचाने से मिलता-जुलता नाम सूझा है जो शायद उनको पसंद आ सकता है। परन्तु उनका मुँह लटका ही रहा क्योंकि उनकी पसंद कोई मायने नहीं रखती थी। नाम तो बच्चे की माँ को पसंद आना चाहिए था। फिर भी उन्होंने लेखक के सोचे हुए नाम के बारे में पूछा तो लेखक ने “कोलाहल” नाम बताया। यह नाम उन्हें तो पसंद आया परन्तु उनके अनुसार बच्चे की माँ को यह नाम पसंद नहीं आना था। लेखक ने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नाम उनके अपने देश या जगह जैसा होना चाहिए जैसे उनका अपना नाम रामखेलावन था। और वे चाहते थे कि बच्चे का नाम भी कुछ उसी तरह का हो। 
यह सुनकर लेखक की बुद्धि चकमक हो रही थी तो वे जल्दी से बोले कि रामखेलावन के जैसे आप बच्चे का नाम शोरमचावन रख दीजिए।
यह नाम सुनते ही वे ख़ुशी से उछल पड़े कि वे तीन साल से ऐसा ही नाम तो खोज रहे थे। और लेखक को बुद्धिमान कह कर वे चले गए। लेखक बताते हैं कि बच्चे के गुण-दुर्गुण पर नाम रखने वाले वे अकेले ही नहीं थे। अर्थात लेखक के पास ऐसे बहुत से लोग आते थे जो बच्चे के गुण-दुर्गुण पर नाम रखने की गुजारिश करते थे। 

 

पाठ – मेरे एक मित्र का पल्ला पकड़कर एक और साहब आए। पता नहीं लोगों को कहाँ-कहाँ से मालूम हो जाता है कि मैं बच्चों के नाम रखने में बहुत दक्ष हूँ ! मैंने उन्हें चलते से दो-तीन नाम सुझाकर पीछा छुड़ाना चाहा तो वह खुले। बोले, “ऐसे नहीं चलेगा, साहब ! हम तो आपको नाम का विशेषज्ञ समझकर आए हैं।”
“आपको कैसा नाम चाहिए ?” मैं ऐसे अवसरों पर स्वयं को उस दुकानदार की स्थिति में पाता हूँ, जो ग्राहक को तैयार माल से संतुष्ट न कर पाने के कारण, ऑर्डर पर माल बनवा देने का प्रस्ताव रखता है।
“बात यह है, साहब !” वह बोले, “आप जानते हैं, किसको अपना बच्चा प्यारा नहीं लगता। हमें भी अपना बच्चा प्यारा है। वैसे आप उसे देखें तो आप भी मानेंगे कि वह बहुत प्यारा है। क्यों भाई साहब।” उन्होंने मेरे मित्र को टोका दिया, “ठीक कह रहा हूँ न ?”
“जी हाँ ! जी हाँ ! बहुत प्यारा बच्चा है,” मेरे मित्र ने कहा।
“पर साहब !” वह फिर बोले, “बहुत सताता भी है। हम चाहते हैं। कि उसका कुछ ऐसा नाम रखा जाए कि उसका प्यारापन और सताना दोनों ही बातें कवर हो जाएँ। काम तो कठिन है, पर आप विद्वान हैं। कोई-न-कोई नाम तो सुझा ही देगें।”
मैंने सोचा, काम वस्तुतः बीहड़ था। लोग भी कैसे-कैसे मूर्ख होते हैं। क्या शर्तें लाए हैं ! पर ठीक है, मैं भी विद्वान हूँ।
मेरी बुद्धि ने एक चमत्कार किया। ऐसे चमत्कार वैसे कभी-कभी ही होते हैं पर हो जाते हैं।

शब्दार्थ
दक्ष – निपुण
विशेषज्ञ – विषय का विशेष ज्ञान रखनेवाला
प्रस्ताव – सुझाव, विचार
सताता – परेशान
वस्तुतः – सचमुच, वास्तव में
बीहड़ – बहुत विकट

व्याख्या लेखक बताते हैं कि उनके एक मित्र के साथ एक और साहब लेखक के पास आए थे। लेखक को यह कभी पता नहीं चला कि लोगों को कहाँ-कहाँ से मालूम हो जाता था कि लेखक बच्चों के नाम रखने में बहुत निपुण थे। लेखक ने उन साहब को जल्दी से दो-तीन नामों के सुझाव देकर अपना पीछा छुड़ाना चाहा तो वे लेखक से बोले कि ऐसे नहीं चलेगा, वे तो लेखक को नाम के विषय का ज्ञाता समझकर आए थे। लेखक बताते हैं कि वे ऐसे अवसरों पर स्वयं को उस दुकानदार की स्थिति में रखते हैं, जो ग्राहक को तैयार माल से संतुष्ट न कर पाने के कारण, ऑर्डर पर माल बनवा देने का प्रस्ताव रखता है। इसी कारण लेखक ने उनसे पूछा कि वे किस तरह का नाम रखना चाहते हैं। इस पर वे अपने बच्चे की तारीफ करते हुए कहने लगे कि वैसे तो सभी को अपना बच्चा प्यारा लगता है परन्तु उनका बच्चा बहुत ही प्यारा है और लेखक के मित्र भी उनकी बातों में हामी भरने लगे। परन्तु वे आगे कहने लगे कि उनका बच्चा उन्हें बहुत परेशान करता है। और वे चाहते हैं कि उसका कुछ ऐसा नाम रखा जाए कि उसका प्यारापन और सताना दोनों ही बातें उस नाम में समा जाएँ। वे लेखक से कहने लगे कि उन्हें पता है कि यह काम कठिन है, परन्तु लेखक तो विद्वान हैं। वे कोई-न-कोई नाम तो सुझा ही देगें। लेखक ने सोचा कि यह काम सच में बहुत कठिन था। क्योंकि लोग भी कैसे-कैसे मूर्ख होते हैं। नाम के लिए क्या शर्तें लाए हैं ! परन्तु ठीक है, लेखक भी अपने आप को विद्वान मानता है।
लेखक की बुद्धि ने एक चमत्कार किया। और ऐसे चमत्कार वैसे कभी-कभी ही होते हैं परन्तु हो जाते हैं। अर्थात लेखक भी अपने आप को नाम रखने में विद्वान मानते थे और लोगो के मन के अनुसार नाम ढूंढने में उनकी बुद्धि कभी-कभी चमत्कार की तरह काम करती थी। 

 

पाठ – मैं बोला, “आपकी शर्त बहुत कठिन है फिर भी प्रयत्न करना हमारा धर्म है। मेरे मन में एक नाम है। नाम अत्यंत साहित्यिक है और हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार, कवि तथा नाटककार जयशंकर ‘प्रसाद’ की अलौकिक प्रतिभा की उपज है।” मैंने देखा, वे श्रद्धा से नत होकर मेरी बात सुन रहे थे। मैं फिर बोला, “प्रसाद जी ने भी बचपन के इन्हीं दोनों पक्षों को एक साथ देखा था और अपने एक गीत ‘उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर’ में उन्होंने प्यार और हठीले बचपन को ‘दुर्ललित’ कहा है। आप यही नाम अपने बच्चे का भी रख दें।”
उनके चेहरे के भाव नहीं बदले। वे वैसे ही जड़ मुद्रा में बैठे रहे।
“साहब ! हम नौकरी पेशा लोग तो हैं नहीं।” कुछ देर बाद, बड़ी खीझ के साथ बोले, “फैशनेबल नाम हमारे घरों में नहीं चलते। हमारे बच्चे को तो बड़े होकर आढ़त का काम करना है, फर्म खोलनी है। हमें तो ऐसा नाम चाहिए, जो किसी फर्म का नाम भी हो सके। लटदाराम गेंदामल वगैरह-वगैरह। कोई ऐसा ही नाम बताइए।”
मैं फिर चिंता में पड़ गया। ठीक है, नाम को लेकर जहाँ क्षेत्रीय आग्रह हैं, वहाँ व्यावसायिक आग्रह भी होंगे। आखिर किसी फिल्म एक्टर का नाम बिछावनमल तो नहीं हो सकता न ! उसी तरह फर्म का नाम… और फिर उनकी शर्तें !
मैं बोला, “आप ऐसा करें, बच्चे का नाम प्यारूभल सताऊभल रख दें। फर्म का नाम जरूर लगेगा, बच्चे का चाहे न लगे।”
उनकी आँखों का भाव पहली बार बदला और वह चमककर बोले, ” मारा ! अब ठीक है। वाह प्यारूभल सताऊभल एंड संस ! वाह भई, वाह !”
पर मैंने उसी दिन से नाम बताने का काम स्थगित कर दिया है। अब नामों का वर्गीकरण आरंभ कर रखा है-फर्मों के उपयुक्त नाम, नेताओं के उपयुक्त नाम, एक्टरों के उपयुक्त नाम इत्यादि। देखना यह है कि कितने वर्ग बनते हैं और फिर उनके अनुसार नामों की सूचियाँ बनाऊँगा और फिर नाम बताने का ही धंधा आरंभ कर दूँगा। उन नामों को पेटेंट करवा लूंगा और फिर उन पेटेंट नामों की रॉयल्टी देकर ही लोग उनमें से कोई नाम रख सकेंगे। आप अपनी आवश्यकता लिखित रूप से भेजें !

शब्दार्थ –
प्रयत्न – कोशिश
मूर्धन्य – मूर्धा (मुँह के भीतर तालु का ऊपरी कठोर भाग) से संबंधित” या “सर्वोच्च/श्रेष्ठ”
अलौकिक – अद्‌भुत, अपूर्व
प्रतिभा – विलक्षण बौद्धिक शक्ति, बुद्धि
हठीले – हाथ का वह निचला, चौड़ा, चिकना हिस्सा होता है जहाँ उँगलियाँ जुड़ती हैं
दुर्ललित – अत्यधिक प्यार से बिगड़ा हुआ
खीझ – क्रोध, कोप, ग़ुस्सा
स्थगित – रोक 

व्याख्याउन साहब की शर्त सुनकर लेखक बोले कि उनकी शर्त बहुत कठिन है फिर भी कोशिश करना उनका धर्म है। लेखक ने बताया कि उनके मन में एक नाम है। और नाम बहुत साहित्यिक है और हिंदी साहित्य के सर्वोच्च/श्रेष्ठ साहित्यकार, कवि तथा नाटककार जयशंकर ‘प्रसाद’ की अद्धभुत बुद्धि की उपज है।लेखक ने देखा, कि वे श्रद्धा से नत होकर लेखक की बात सुन रहे थे। लेखक ने फिर से कहा कि प्रसाद जी ने भी बचपन के इन्हीं दोनों पक्षों को एक साथ देखा था और अपने एक गीत ‘उठ-उठ री लघु-लघु लोल लहर’ में उन्होंने प्यार और जिद्द से भरे बचपन को ‘दुर्ललित’ अर्थात अत्यधिक प्यार से बिगड़ा हुआ कहा है। वे यही नाम अपने बच्चे का भी रख सकते हैं।
लेखक की बात सुनकर उनके चेहरे के भाव नहीं बदले। वे जैसे बैठे थे वैसे ही जड़ मुद्रा में बैठे रहे। और बोले कि वे नौकरी पेशा करने वाले लोग तो हैं नहीं।और कुछ देर बाद, बड़े गुस्से के साथ बोले कि फैशनेबल नाम उनके घरों में नहीं चलते। उनके बच्चे को तो बड़े होकर आढ़त का काम करना है, फर्म खोलनी है। उन्हें तो ऐसा नाम चाहिए, जो किसी फर्म का नाम भी हो सके। जैसे लटदाराम गेंदामल। वे लेखक को भी कुछ ऐसा ही नाम बताने को कहते हैं।
उनकी बातें सुनकर लेखक फिर से चिंता में पड़ गए। लेखक भी मानते हैं कि नाम को लेकर जहाँ क्षेत्रीय आग्रह हैं, वहीं व्यावसायिक आग्रह भी होते हैं। आखिरकार किसी फिल्म एक्टर का नाम बिछावनमल तो नहीं हो सकता। उसी तरह किसी की शर्त होती है कि फर्म का नाम बच्चे के नाम से मेल खाता होना चाहिए, और भी न जाने क्या क्या शर्तें ले कर लोग आ जाते हैं।
उनकी शर्तों के मुताबिक लेखक ने बच्चे का नाम प्यारूभल सताऊभल रखने का सुझाव दिया। यह नाम फर्म का जरूर लगेगा, फिर बच्चे का चाहे न लगे।
लेखक की बात सुनकर उनकी आँखों का भाव पहली बार बदला और वह चमककर बोले कि अब ठीक है। प्यारूभल सताऊभल एंड संस ! यह नाम उन्हें फार्म के लिए पसंद आ गया।
परन्तु लेखक ने उसी दिन से नाम बताने का काम बंद कर दिया था। लोगों ने नामों का वर्गीकरण शुरू कर रखा है जैसे फर्मों के उपयुक्त नाम, नेताओं के उपयुक्त नाम, एक्टरों के उपयुक्त नाम इत्यादि। लेखक यह देखना चाहते है कि नामों के कितने वर्ग बनते हैं और फिर लेखक उनके अनुसार नामों की सूचियाँ बनाएंगे और फिर नाम बताने का ही काम शुरू कर देंगे। और उन नामों के अधिकार पत्र बनवा लेंगें। और फिर उन अधिकार पत्र वाले नामों का अधिकार शुल्क देकर ही लोग उनमें से कोई नाम रख सकेंगे। लेखक सभी से आग्रह करते हैं कि वे भी अपनी आवश्यकता लिखित रूप से लेखक को भेज सकते हैं। 

 

Conclusion

‘नाम चर्चा’ (व्यंग्य) में नाम के बजाय गुणों के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। इस पाठ के मुख्य समाधान में व्यक्ति की पहचान उसके कार्यों से होने, महानुभावों के उदाहरणों और ‘नाम’ के पीछे भागने के बजाय व्यक्तित्व विकास (गुणों) को प्रमुखता देने के विचारों को स्पष्ट किया गया है।  MSBSHSE कक्षा 10 हिंदी कुमारभारती ch 3 ‘नाम चर्चा’ (व्यंग्य) की इस पोस्ट में सार, व्याख्या और शब्दार्थ दिए गए हैं। छात्र इसकी मदद से पाठ को तैयार करके परीक्षा में पूर्ण अंक प्राप्त कर सकते हैं।