क्या लिखूँ ? पाठ सार
CBSE Class 9 Hindi Chapter 2 “Kya Likhu”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Ganga Book
कक्षा 9 हिंदी की गंगा पुस्तक के पाठ “क्या लिखूँ?” के लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हैं। इस निबंध में लेखक ने निबंध लिखने की प्रक्रिया को बहुत सरल और रोचक ढंग से समझाया है। वह बताता है कि लिखना हमेशा आसान नहीं होता, क्योंकि कई बार लेखक को विषय, सामग्री और शैली को लेकर कठिनाई होती है। इस निबंध में लेखक ने “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार” जैसे विषयों के माध्यम से यह दिखाया है कि निबंध कैसे लिखा जाता है और उसमें आने वाली समस्याओं का सामना कैसे किया जाता है। यह निबंध आत्मपरक शैली में लिखा गया है, जिसमें लेखक अपने अनुभवों और विचारों को सीधे पाठकों से साझा करता है।
क्या लिखूँ ? का संक्षिप्त अवलोकन (Kya Likhoon Quick Overview)
| विवरण | जानकारी |
| शीर्षक | क्या लिखूँ ? |
| लेखक | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी |
| किताब | गंगा (सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी) |
| पाठ नं. | 2 |
| लेखन शैली | आत्मपरक शैली |
| विषय | निबंध लिखने की प्रक्रिया |
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प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” का सार क्या है?
उत्तर- निबंध का परिचय- “क्या लिखूँ?” निबंध में लेखक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध लेखन की प्रक्रिया को सरल और रोचक ढंग से समझाया है।
- लेखन की समस्या और गार्डिनर के विचार- लेखक बताता है कि उसे लिखना तो है, पर क्या लिखे यह सबसे बड़ी समस्या है। वह ए. जी. गार्डिनर के विचारों का उल्लेख करता है, लेकिन खुद मानता है कि उसे वैसी सहज प्रेरणा नहीं मिलती और उसे मेहनत करनी पड़ती है।
- निबंध के विषय और कठिनाई- लेखक को “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार” पर निबंध लिखना है। वह सोचता है कि इन कठिन विषयों पर लंबे निबंध लिखना आसान नहीं है।
- निबंधशास्त्र के नियम- लेखक विद्वानों के विचार पढ़ता है और जानता है कि निबंध छोटा होना चाहिए और उसके दो मुख्य अंग होते हैं-सामग्री और शैली।
- सामग्री की समस्या- लेखक के पास समय और साधन कम हैं, इसलिए वह सामग्री इकट्ठा नहीं कर पाता और अपने ज्ञान के आधार पर लिखने का निर्णय लेता है।
- रूपरेखा की कठिनाई- विद्वान निबंध से पहले रूपरेखा बनाने की सलाह देते हैं, लेकिन लेखक को यह काम कठिन लगता है और वह इसे बना नहीं पाता।
- भाषा और शैली पर विचार- लेखक बताता है कि भाषा सरल और प्रवाहयुक्त होनी चाहिए, लेकिन वह मज़ाक में कहता है कि वह अपनी विद्वता दिखाने के लिए लंबे और कठिन वाक्य भी लिख सकता है।
- मानटेन की पद्धति- लेखक मानटेन की पद्धति का उल्लेख करता है, जिसमें लेखक अपने अनुभव और भावनाओं को सरल और सच्चे रूप में लिखता है।
- अमीर खुसरो की कहानी से प्रेरणा- लेखक अमीर खुसरो की कहानी से प्रेरणा लेकर निर्णय करता है कि वह दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ देगा।
- “दूर के ढोल सुहावने” का अर्थ- लेखक समझाता है कि दूर की चीज़ें हमें अच्छी लगती हैं, क्योंकि उनकी कमियाँ दिखाई नहीं देतीं, जैसे ढोल की आवाज़ दूर से मधुर लगती है।
- जीवन में इस विचार का प्रयोग- लेखक बताता है कि युवा भविष्य को सुंदर मानते हैं और वृद्ध अतीत को, इसलिए दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
- समाज-सुधार का विचार- लेखक कहता है कि हर समय समाज में सुधार की आवश्यकता होती है और यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
- प्रगतिशील जीवन और परिवर्तन- जीवन में लगातार परिवर्तन होते रहते हैं। नई समस्याएँ आती हैं और नए सुधार किए जाते हैं, इसलिए जीवन को प्रगतिशील कहा जाता है।
- साहित्य और समय का प्रभाव- आज का नया साहित्य भविष्य में पुराना हो जाएगा और नई पीढ़ी फिर नए विचार लाएगी।
लेखक अंत में कहता है कि अतीत और भविष्य दोनों हमें इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि वे हमसे दूर होते हैं, इसलिए “दूर के ढोल सुहावने” होते हैं।
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क्या लिखूँ ? पाठ व्याख्या (Kya Likhu Lesson Explanation)
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” में नमिता और अमिता की लेखक से क्या अपेक्षा है?
अथवा
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में ए. जी. गार्डिनर के अनुसार लेखन के लिए कैसी अवस्था आवश्यक होती है?
पाठ – मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए. जी. गार्डिनर का कथन है लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।
गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उत्थित हो जाते हैं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ। आज तो मुझे विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि मुझे कोई साधारण निबंध नहीं लिखना है। आज मुझे नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखना होगा। नमिता का आदेश है कि मैं ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ इस विषय पर लिखूँ । अमिता का आग्रह है कि मैं समाज-सुधार पर लिखूँ, ये दोनों ही विषय परीक्षा में आ चुके हैं और उन दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर मुझे उन दोनों को निबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा।
शब्दार्थ-
प्रसिद्ध– मशहूर, जाना-पहचाना
कथन- बात, विचार
विशेष– खास, अलग
मानसिक स्थित– मन की अवस्था
उमंग- उत्साह, खुशी
स्फूर्ति- फुरती, उत्तेजना, कंपन, उछलना, मन में प्रकट होना
मस्तिष्क– दिमाग
आवेग– बिना सोचे- विचारे कुछ कर बैठने की अंत:प्रेरणा, झोंक, अशांति, उतावली, एक संचारी भाव
उत्पन्न- पैदा होना
विषय- टॉपिक, जिस पर लिखा जाए
मनोभाव- मन की भावनाएँ
व्यक्त करना- प्रकट करना, बताना
उपयुक्त– सही, उचित
यथार्थता / यथार्थ- सत्य, प्रकृत, उचित
संदेह- शक
कठिनता- कठिनाई
अनुभव– महसूस करना
उत्थित– उठा हुआ, उठता हुआ, बल-वैभव में बढ़ा हुआ, उत्पन्न, ऊँचा, फैलाया हुआ
परिश्रम- मेहनत
साधारण- सामान्य
आदर्श– उत्तम, सबसे अच्छा
आदेश– हुक्म, कहना
आग्रह- ज़ोर देकर कहना
समाज-सुधार- समाज को बेहतर बनाने का कार्य
रहस्य- गुप्तभेद, गोपनीय विषय, मर्म
व्याख्या / उत्तर- इस गद्याँश में लेखक यह बताता है कि उसे आज हर हाल में निबंध लिखना पड़ेगा। वह अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंधकार ए. जी. गार्डिनर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहता है कि गार्डिनर के अनुसार लेखन के लिए एक विशेष मानसिक अवस्था होती है। उस अवस्था में मन में अपने-आप उत्साह पैदा होता है, हृदय में स्फूर्ति आती है और मस्तिष्क में विचारों का प्रवाह तेज हो जाता है। ऐसी स्थिति में लेखक बिना अधिक सोच-विचार के लिखने लगता है और उसे विषय की चिंता नहीं करनी पड़ती। वह किसी भी विषय को चुनकर उसमें अपने मन के भाव भर सकता है। गार्डिनर ने यह भी समझाया है कि जैसे टोपी टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम आ जाती है, उसी प्रकार अपने मन के भाव व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त हो सकता है। उनके अनुसार असली महत्त्व विषय का नहीं, बल्कि मन के भावों का होता है।
लेखक आगे बताता है कि उसे गार्डिनर की यह बात सही लगती है, लेकिन उसके लिए समस्या यह है कि उसे कभी ऐसी मानसिक अवस्था का अनुभव नहीं हुआ, जिसमें विचार अपने-आप आने लगें। वह कहता है कि उसे निबंध लिखने के लिए बहुत सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है और मेहनत करनी पड़ती है, तभी वह एक निबंध लिख पाता है। इस कारण उसे लेखन कार्य कठिन लगता है।
लेखक यह भी कहता है कि आज की स्थिति और भी कठिन है, क्योंकि उसे साधारण निबंध नहीं बल्कि आदर्श निबंध लिखना है। उसे नमिता और अमिता नाम की छात्राओं के लिए निबंध तैयार करने हैं। नमिता ने उससे “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” विषय पर निबंध लिखने के लिए कहा है, जबकि अमिता ने “समाज-सुधार” विषय पर लिखने का आग्रह किया है। ये दोनों विषय पहले परीक्षा में आ चुके हैं, इसलिए लेखक को इन विषयों पर अच्छे और आदर्श निबंध लिखकर उन्हें निबंध-लेखन की सही विधि समझानी है।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में लेखक को “दूर के ढोल सुहावने” विषय पर क्या कठिनाई लगती है?
पाठ – दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें? इसी प्रकार जिस समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है, उसको मैं पाँच पेज में कैसे लिख दूँ? मैंने सोचा कि सबसे पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति जान लूँ। पहले यह तो समझ लूँ कि आदर्श निबंध है क्या और वह कैसे लिखा जाता है, तब फिर मैं विषय की चिंता करूँगा । इसलिए मैंने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं।
एक विद्वान का कथन है कि निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती। इस कथन को मान लेने में ही मेरा लाभ है। मुझे छोटा ही निबंध लिखना है, बड़ा नहीं। पर लिखूँ कैसे? निबंधशास्त्र के उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं-
सामग्री और शैली। पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा। इसके लिए मुझे मनन करना चाहिए। यह तो सच है कि जिसने जिस विषय का अच्छा अध्ययन किया है, उसके मस्तिष्क में उस विषय के विचार आते हैं। पर यह कौन जानता था कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी। यदि यह बात पहले ज्ञात होती तो पुस्तकालय में जाकर इस विषय का अनुसंधान कर लेता; पर अब समय नहीं है। मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे। यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके। अब तो मुझे अपने ही ज्ञान पर विश्वास कर लिखना होगा।
शब्दार्थ-
सुहावने– अच्छे लगने वाले, आकर्षक
अवश्य- जरूर
अनादि काल– बहुत पुराने समय से, शुरुआत से
विज्ञों/विज्ञ- जानकार, समझदार, विद्वान
विरोध- असहमति, अलग राय
निबंधशास्त्र– निबंध लिखने के नियमों का ज्ञान
आचार्य– शिक्षक, विद्वान
सम्मति- सहमति, स्वीकृति, अनुमति, राय, मत, आदर, सम्मान
आदर्श– उत्तम, सबसे अच्छा
रचनाएँ- लिखी हुई पुस्तकें या लेख
अपेक्षा– तुलना में
रचना- लेखन, लिखी हुई चीज
प्रधान– मुख्य, सबसे महत्वपूर्ण
अंग- भाग
सामग्री– विषय से जुड़ी जानकारी और विचार
शैली- लिखने का तरीका
एकत्र- इकट्ठा करना
विचार-समूह- विचारों का संग्रह
संचित– जमा किया हुआ
मनन– सोच-विचार करना
अध्ययन- पढ़ाई, गहराई से समझना
आवश्यकता- ज़रूरत
ज्ञात– पता होना
पुस्तकालय– किताबों का स्थान (लाइब्रेरी)
अनुसंधान- अन्वेषण, खोज, जाँच-पड़ताल, प्रयत्न, योजना, आयोजन
विश्वकोश– वह ग्रंथ जिसमें संसार के सारे विषयों का विवरण हो, वह भंडार जिसमें विश्व की सारी वस्तुएँ संगृहीत हों
ग्रंथ- पुस्तक
उपलब्ध– मिलने वाली
विश्वास– भरोसा
व्याख्या / उत्तर- प्रस्तुत गद्याँश में लेखक बताता है कि “दूर के ढोल सुहावने” विषय अच्छा तो है, लेकिन वह सोचता है कि क्या इस विषय पर इतना लिखा जा सकता है कि पाँच पेज पूरे हो जाएँ। इसी तरह “समाज-सुधार” भी बहुत बड़ा और पुराना विषय है, जिस पर विद्वानों के अलग-अलग विचार हैं, इसलिए लेखक को यह समझ नहीं आता कि वह इसे कुछ पन्नों में कैसे लिखे।
लेखक आगे बताता है कि इस कठिनाई को दूर करने के लिए उसने पहले निबंध लिखने के नियम समझने का निर्णय लिया। वह कहता है कि उसने सोचा कि पहले यह जान लिया जाए कि आदर्श निबंध क्या होता है और उसे कैसे लिखा जाता है, उसके बाद ही विषय पर लिखना आसान होगा। इसलिए उसने निबंधशास्त्र के विद्वानों की रचनाएँ पढ़ीं और उनके विचारों को समझने की कोशिश की।
लेखक बताता है कि एक विद्वान के अनुसार निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि छोटे निबंध में सुंदरता बनी रहती है, जबकि बड़े निबंध में यह गुण कम हो जाता है। लेखक को यह बात अच्छी लगती है, क्योंकि उसे छोटा निबंध लिखना ही आसान लगता है। लेकिन उसके सामने समस्या यह रहती है कि वह लिखे कैसे।
इसके बाद लेखक बताता है कि उसी विद्वान के अनुसार निबंध के दो मुख्य भाग होते हैं पहला सामग्री और दूसरा शैली। सामग्री का अर्थ है विचारों का संग्रह, इसलिए लेखक को पहले विषय से संबंधित विचार एकत्र करने चाहिए। इसके लिए सोच-विचार और अध्ययन आवश्यक होता है। लेखक मानता है कि जिस व्यक्ति ने किसी विषय का अच्छा अध्ययन किया होता है, उसके मन में उस विषय के विचार आसानी से आ जाते हैं।
लेकिन लेखक अपनी कठिनाई भी बताता है कि उसे पहले से यह पता नहीं था कि “दूर के ढोल सुहावने” जैसे विषय पर भी निबंध लिखना पड़ेगा। यदि उसे पहले से पता होता, तो वह पुस्तकालय जाकर इस विषय पर जानकारी इकट्ठा कर लेता। अब उसके पास समय नहीं है और न ही उसके पास कोई पुस्तक या विश्वकोश है, जिससे वह सामग्री ले सके। अंत में लेखक कहता है कि उसे केवल दो घंटे में दो निबंध लिखने हैं, इसलिए अब उसे अपने ज्ञान और सोच पर भरोसा करके ही निबंध लिखना पड़ेगा।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में विद्वानों के अनुसार निबंध लिखने से पहले क्या करना चाहिए?
पाठ – विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। अतएव सबसे पहले मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने’ की रूपरेखा बनानी है। मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है। निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही वाक्यों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? क्या सचमुच हिंदी के सब विज्ञ लेखक पहले से अपने-अपने निबंधों के लिए रूपरेखा तैयार कर लेते हैं? ए.जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्होंने लिखा कि मैं लेख लिखता हूँ और शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ। उन्होंने यह भी लिखा है कि शेक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी कठिनाई नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबराकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रखा ‘जैसा तुम चाहो’। इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।
अब मुझे शैली निश्चित करनी है। आचार्य महोदय का कथन है कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से संबद्ध। यह तो बिल्कुल ठीक है । मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ। पर मैं हूँ मास्टर | अपनी विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए, अपना गौरव स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वाक्य कम- से-कम आधे पृष्ठ में तो समाप्त हों। बाणभट्ट ने कादंबरी में ऐसे ही वाक्य लिखे हैं। वाक्यों में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है। इसीलिए संस्कृत के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डाल दी हैं, जो अज्ञों से न सुलझ सकें और सेनापति ने भी अपनी कविता दुर्बोध कर दी है। तभी तो अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है। तब क्या किया जाए?
शब्दार्थ-
रूपरेखा– योजना, लिखने से पहले की तैयारी
अतएव- इसलिए
सारांश- संक्षेप, मुख्य बात
शीर्षक- नाम, हेडिंग
भार– जिम्मेदारी
नामकरण– नाम रखना
निश्चित करना– तय करना
शैली– लिखने का तरीका
आचार्य- विद्वान, शिक्षक
प्रवाह- सरलता से बहना, आसानी से चलना
संबद्ध- जुड़े हुए
विद्वता- ज्ञान, पांडित्य
प्रदर्शन- दिखाना
गौरव– प्रतिष्ठा, सम्मान
समाप्त– खत्म होना
अस्पष्टता- साफ़ न होना
दुर्बोधता / दुर्बोध- जो शीघ्र समझ में न आए, गूढ़
गांभीर्य– गंभीरता, गहराई, चित्त की स्थिरता, जटिलता
गुत्थी- उलझन, कठिनाई, तागे आदि में उलझने से पड़ी हुई गाँठ
अज्ञों / अज्ञ- ज्ञानरहित, नासमझ, अचेतन
अलंकार– भाषा को सुंदर बनाने वाले शब्द/शैली
मुहावरे- विशेष अर्थ वाले वाक्यांश
लोकोक्तियाँ– कहावतें
समावेश– साथ रहना, शामिल होना, मिलना, एकत्र होना, प्रवेश
उत्तर / व्याख्या – इस अंश में लेखक बताता है कि विद्वानों के अनुसार निबंध लिखने से पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। इसलिए वह सोचता है कि सबसे पहले “दूर के ढोल सुहावने” विषय की रूपरेखा बनाई जाए, लेकिन उसे समझ नहीं आता कि इस विषय की रूपरेखा कैसे तैयार की जाए। वह कहता है कि निबंध लिखने के बाद तो उसका सार कुछ वाक्यों में लिखा जा सकता है, पर पहले से ही कुछ शब्दों में पूरी योजना बनाना बहुत कठिन है।
लेखक को यह भी संदेह होता है कि क्या सच में सभी लेखक पहले से अपने निबंध की रूपरेखा बनाते हैं। वह उदाहरण देते हुए बताता है कि ए.जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक देने में ही कठिनाई होती थी और वे कई बार यह काम अपने मित्रों पर छोड़ देते थे। इसी प्रकार वह बताता है कि विलियम शेक्सपीयर को भी नाटकों के नाम रखने में कठिनाई हुई होगी, इसलिए उन्होंने अपने एक नाटक का नाम “जैसा तुम चाहो” रख दिया। इन उदाहरणों से लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि जब इतने बड़े लेखक भी रूपरेखा और शीर्षक तय करने में कठिनाई महसूस करते थे, तो उसके लिए रूपरेखा बनाना और भी कठिन है। इसलिए वह मान लेता है कि उससे रूपरेखा तैयार नहीं हो पाएगी।
इसके बाद लेखक शैली के बारे में सोचता है। वह बताता है कि आचार्यों के अनुसार निबंध की भाषा सरल, प्रवाहयुक्त और स्पष्ट होनी चाहिए तथा वाक्य छोटे-छोटे और आपस में जुड़े होने चाहिए। लेखक मानता है कि वह छोटे वाक्य आसानी से लिख सकता है, लेकिन वह मज़ाक करते हुए कहता है कि वह एक शिक्षक है, इसलिए अपनी विद्वता दिखाने के लिए उसे लंबे-लंबे वाक्य लिखने चाहिए।
वह आगे उदाहरण देता है कि बाणभट्ट ने अपनी कृति “कादंबरी” में बहुत लंबे वाक्य लिखे हैं। इसी प्रकार संस्कृत के कवि श्रीहर्ष ने अपने काव्य को जान-बूझकर कठिन बनाया और सेनापति ने भी अपनी कविता को जटिल बना दिया, ताकि वह गंभीर लगे और हर कोई उसे आसानी से न समझ सके।
अंत में लेखक कहता है कि निबंध में अलंकार, मुहावरे और लोकोक्तियाँ भी होनी चाहिए, क्योंकि इससे भाषा सुंदर बनती है। लेकिन इन सभी नियमों को देखकर लेखक उलझन में पड़ जाता है और सोचता है कि आखिर वह निबंध किस प्रकार लिखे।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में अंग्रेजी के निबंधकारों ने किस प्रकार की पद्धति अपनाई है?
अथवा
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में इस नई पद्धति के जनक किसे माना जाता है?
पाठ – अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक दूसरी ही पद्धति को अपनाया है। उनके निबंध इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है। उस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबंध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें जीवन का गौरव भूलकर हम अपने में ही लीन हो जाते है, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ। पर मुझे तो दो निबंध लिखने होंगे।
शब्दार्थ-
निबंधकार– निबंध लिखने वाला लेखक
पद्धति– प्रथा, परिपाटी, मार्ग, पथ, रास्ता, प्रणाली
कसौटी– मापदंड, जाँचने का आधार
खरे सिद्ध होना– सही साबित होना
मान– सम्मान, प्रतिष्ठा
जन्मदाता- शुरू करने वाला, आरंभ करने वाला
लिपिबद्ध– लिखकर दर्ज करना
विशेषता– खास गुण
स्वच्छंद- स्वतंत्र, बिना बंधन के
उदात्त– ऊँचा, महान, श्रेष्ठ, उदार, प्रसिद्ध, प्रिय, ऊँचे स्वर में उच्चरित
आख्यायिका- सिलसिलेवार कहानी या वृत्तांत, शिक्षा देने वाली कल्पित कथा
सूक्ष्म- बारीक, गहराई से
तर्कपूर्ण- कारण और सोच के आधार पर
विवेचना- विश्लेषण, विस्तार से समझाना
अनुभूति- अनुभव, महसूस करना
अभिव्यक्ति– व्यक्त, प्रकट होना, प्रकाशन
उल्लास– खुशी, आनंद
गरिमा- महत्व, गंभीरता
महिमा– विशेषता, महानता
लीन होना- पूरी तरह डूब जाना
दृष्टि- नजर, देखने का तरीका
ग्रहण करना- स्वीकार करना, समझना
अनुसरण- पीछे चलना, अनुकरण, अभ्यास, अनुकूल आचरण
उत्तर / व्याख्या इस अंश में लेखक बताता है कि अंग्रेजी के निबंधकारों ने निबंध लिखने की एक अलग पद्धति अपनाई है। वह कहता है कि उनके निबंध भले ही पारंपरिक नियमों पर पूरी तरह खरे न उतरते हों, फिर भी अंग्रेजी साहित्य में उन्हें बहुत सम्मान मिला है। लेखक आगे बताता है कि इस पद्धति के प्रमुख प्रवर्तक माइकल डी मानटेन माने जाते हैं। लेखक के अनुसार मानटेन ने अपने निबंधों में वही लिखा जो उन्होंने स्वयं देखा, सुना और अनुभव किया। इस प्रकार के निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे मन की स्वतंत्र और स्वाभाविक अभिव्यक्ति होते हैं। उनमें न तो कवियों जैसी ऊँची कल्पना होती है, न कहानीकारों जैसी गहरी दृष्टि और न ही विद्वानों जैसी कठिन तर्कपूर्ण चर्चा होती है।
लेखक यह भी बताता है कि इन निबंधों में सबसे अधिक महत्त्व लेखक की सच्ची अनुभूति और उसके वास्तविक भावों का होता है। ऐसे निबंधों में लेखक अपने मन की बात सच्चाई और सरलता से कहता है और उसमें उसका आनंद भी दिखाई देता है। यह लेखन उस मानसिक अवस्था में होता है, जब व्यक्ति न तो अपने ज्ञान का प्रदर्शन करता है और न ही कल्पना का, बल्कि वह अपने भीतर की भावनाओं में डूबकर संसार को अपनी दृष्टि से देखता है।
अंत में लेखक कहता है कि उसे यह पद्धति बहुत अच्छी लगती है और वह भी इसी तरीके से निबंध लिखना चाहता है, लेकिन उसकी समस्या यह है कि उसे एक नहीं बल्कि दो निबंध लिखने हैं, इसलिए वह फिर से दुविधा में पड़ जाता है।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं क्योंकि?
अथवा
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में दूर बैठे व्यक्ति को ढोल की आवाज़ कैसी लगती है?
पाठ – मुझे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई। एक बार प्यास लगने पर वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर पहले उनमें से एक ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी। उन्होंने कहा—
खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।
मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।
दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती । जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं। सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत, ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यंत मधुर बन जाती है।
शब्दार्थ-
चरखा– सूत कातने का यंत्र
प्रतिभावान- बहुत गुणी, होशियार
पद्य- कविता की पंक्तियाँ
पूर्ति– पूरा करना
जतन– मेहनत, कोशिश
पद्धति– तरीका
स्वीकार करना– अपनाना
सुहावने- अच्छे लगने वाले
कर्कशता– कठोर या तीखी आवाज़
संध्या- शाम का वह समय जब दिन के दो भागों का मेल होता है, साँझ, योग, मेल, ठहराव, सीमा
मधुरता- मिठास, अच्छा लगने वाला स्वर
संचार– फैलना, पहुँचाना
विवाहोत्सव- शादी का उत्सव
अंकित- लिखित, चिह्नित, चित्रित, गिना हुआ
कोलाहल– बहुत से लोगों के एक साथ बोलने से होने वाला शोर, हंगामा, हल्ला
लज्जाशील– शर्मीला
नव-वधू- नई दुल्हन
कल्पना– सोच में चित्र बनाना
उल्लास- खुशी
संकोच- झिझक
आशंका- डर, चिंता
विषाद- अवसाद, उदासी, तंद्रा
कंपन- हलचल, धड़कन
ध्वनि- आवाज़
कलरव– मधुर ध्वनि, कोमल
प्रमोद- आनंद, खुशी
समीपस्थ- पास के
कटु– कड़वा, बुरा लगने वाला
दूरस्थ– दूर रहने वाले
उत्तर / व्याख्या – इस अंश में लेखक बताता है कि उसे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आती है। वह कहता है कि एक बार खुसरो को प्यास लगी, तो वे एक कुएँ के पास पहुँचे, जहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। जब उन्होंने पानी माँगा, तो उन औरतों ने उनसे अलग-अलग विषयों पर कविता सुनाने की शर्त रखी। एक ने खीर पर, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर कविता सुनाने को कहा। लेखक बताता है कि खुसरो बहुत प्रतिभाशाली थे, इसलिए उन्होंने एक ही कविता में चारों विषयों को जोड़कर उनकी इच्छा पूरी कर “खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।” रचना की।
लेखक आगे कहता है कि उसमें खुसरो जैसी प्रतिभा तो नहीं है, लेकिन वह उनकी इस पद्धति को अपनाकर अपनी समस्या हल कर सकता है। इसलिए वह सोचता है कि वह भी अपने दोनों विषय “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार” को एक ही निबंध में जोड़ देगा, जिससे उसकी कठिनाई कम हो जाएगी।
इसके बाद लेखक “दूर के ढोल सुहावने” कहावत का अर्थ समझाता है। वह बताता है कि ढोल की आवाज़ पास में सुनने पर बहुत तेज और कर्कश लगती है, जिससे लोगों को परेशानी होती है, लेकिन वही आवाज़ जब दूर से सुनाई देती है, तो वह मधुर और अच्छी लगती है।
लेखक यह भी बताता है कि दूर बैठे व्यक्ति उस आवाज़ को सुनकर अपने मन में सुंदर कल्पनाएँ करने लगता है। वह किसी विवाह का दृश्य सोचता है, जहाँ खुशियाँ और उत्सव का माहौल होता है। वह यह भी कल्पना करता है कि घर के एक कोने में बैठी एक शर्मीली नववधू है, जिसके मन में प्रेम, खुशी, संकोच और कुछ चिंता जैसे भाव हैं। ये सभी भाव मिलकर ढोल की कर्कश आवाज़ को भी मधुर बना देते हैं।
अंत में लेखक यह निष्कर्ष निकालता है कि ढोल की आवाज़ में केवल ध्वनि ही नहीं होती, बल्कि उसमें आनंद, उत्सव और प्रेम का भाव भी जुड़ा होता है। इसी कारण जो आवाज़ पास में कर्कश लगती है, वही दूर से सुनने पर बहुत मधुर और सुहावनी प्रतीत होती है।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में तरुण और वृद्ध किससे असंतुष्ट रहते हैं?
अथवा
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में किन-किन महान व्यक्तियों को सुधारक के रूप में बताया गया है?
पाठ – यह बात सच है कि दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि जो तरुण संसार के जीवन संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है; जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अंत कब हुआ है? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।
हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
शब्दार्थ-
यथार्थता- सच्चाई, वास्तविकता
अनुभव- महसूस करना
तरुण– युवा, नौजवान
जीवन संग्राम- जीवन का संघर्ष
मनमोहक– आकर्षक, अच्छा लगने वाला
वृद्ध- बूढ़े लोग
बाल्यावस्था– बचपन
अतीतकाल– बीता हुआ समय
स्मृति– याद
सुखद– अच्छा लगने वाला
स्वप्न- सपना
उज्ज्वल- चमकदार, अच्छा भविष्य
वर्तमान- आज का समय
असंतोष- संतुष्टि न होना
क्रांति– बड़ा परिवर्तन
समर्थक– साथ देने वाला
संरक्षक– रक्षा करने वाला
अतीत-गौरव– पुराने समय का सम्मान/गौरव
क्षुब्ध– अशांत, परेशान
सुधार– बेहतर बनाने का प्रयास
मनुष्य जाति– मानव समाज
इतिहास- बीते समय की घटनाएँ
सुधारक- समाज में सुधार करने वाला व्यक्ति
गणना- गिनती
उत्पन्न– पैदा होना
दोष- कमी, बुराई
नव सुधार– नया सुधार
प्रगतिशील– आगे बढ़ने वाला
निर्माण- बनाना|
निहित– छिपा हुआ, शामिल
स्मारक– यादगार
स्थान- जगह
सुखद– आनंददायक
उत्तर / व्याख्या – प्रस्तुत गद्याँश में लेखक समझाता है कि जब कोई चीज़ हमसे दूर होती है, तो हमें उसकी वास्तविक कठिनाइयाँ दिखाई नहीं देतीं। इसलिए वह कहता है कि जो युवा (तरुण) लोग अभी जीवन के संघर्षों से दूर हैं, उन्हें दुनिया बहुत सुंदर और आकर्षक लगती है। वहीं जो लोग बूढ़े हो चुके हैं और अपने बचपन व युवावस्था से दूर आ गए हैं, उन्हें अपना बीता हुआ समय बहुत अच्छा लगता है। वे बार-बार अतीत को याद करते हैं और उसी के बारे में सोचते रहते हैं।
लेखक आगे बताता है कि युवाओं के लिए भविष्य बहुत उज्ज्वल और आशापूर्ण दिखाई देता है, जबकि वृद्ध लोगों के लिए अतीत ही सबसे प्रिय होता है। दोनों ही वर्तमान से संतुष्ट नहीं रहते। युवा चाहते हैं कि उनका सुंदर भविष्य जल्दी से वर्तमान बन जाए, जबकि वृद्ध लोग अपने पुराने अच्छे दिनों को फिर से वर्तमान में लाना चाहते हैं। इसी कारण युवा परिवर्तन और क्रांति के पक्ष में होते हैं, जबकि वृद्ध लोग पुराने परंपराओं और गौरव को बनाए रखना चाहते हैं। इन दोनों के विचारों के कारण वर्तमान समय में हमेशा अस्थिरता बनी रहती है और इसी वजह से समाज में लगातार सुधार होते रहते हैं।
लेखक कहता है कि मानव इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं रहा, जब सुधार की आवश्यकता न पड़ी हो। हर युग में सुधारक हुए हैं। वह उदाहरण देते हुए बताता है कि गौतम बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, आदि शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती और महात्मा गांधी जैसे अनेक सुधारक हुए हैं, लेकिन सुधार कभी समाप्त नहीं हुए।
लेखक यह भी बताता है कि जीवन में लगातार नई-नई समस्याएँ पैदा होती रहती हैं और उनके समाधान के लिए नए सुधार किए जाते हैं। न तो दोषों का अंत होता है और न ही सुधारों का। कई बार जो बातें पहले सुधार मानी जाती थीं, वे बाद में गलत या दोषपूर्ण लगने लगती हैं, और फिर उन्हें बदलने के लिए नए सुधार किए जाते हैं। इसी कारण जीवन को हमेशा आगे बढ़ने वाला यानी प्रगतिशील कहा जाता है।
अंत में लेखक साहित्य के बारे में कहता है कि हिंदी में भी प्रगतिशील साहित्य लिखा जा रहा है। आज के लेखक मानते हैं कि उनका साहित्य भविष्य में बहुत महत्त्वपूर्ण होगा, लेकिन समय के साथ वही साहित्य पुराना हो जाएगा और अतीत का हिस्सा बन जाएगा। आज के युवा जब बूढ़े होंगे, तो वे भी अपने समय को याद करके खुश होंगे, और उनकी जगह नई पीढ़ी आ जाएगी, जो भविष्य के सपने देखेगी। लेखक निष्कर्ष निकालता है कि चाहे अतीत हो या भविष्य, दोनों ही हमें इसलिए अच्छे लगते हैं क्योंकि वे हमसे दूर होते हैं, और इसी कारण “दूर के ढोल सुहावने” होते हैं।
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Kya Likhu FAQs
प्रश्न- “क्या लिखूं” किसकी रचना है?
उत्तर- “क्या लिखूं” पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की रचना है।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” में बक्शी जी का पूरा नाम क्या था?
उत्तर- बक्शी जी का पूरा नाम पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी था।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ के आधार पर पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं?
उत्तर- बख्शीजी की कृतियों का विवरण इस प्रकार है-
(i) निबन्ध-संग्रह- ‘प्रबन्ध पारिजात’, ‘पंचपात्र’, ‘पद्मवन’, ‘मकरन्द बिन्दु’, ‘कुछ बिखरे पन्ने’, ‘मेरा देश’ आदि।
(ii) कहानी संग्रह- ‘झलमला’, ‘अञ्जलि’ ।
(iii) आलोचना- ‘विश्व साहित्य’, ‘हिन्दी साहित्य विमर्श’, ‘साहित्य शिक्षा’, ‘हिन्दी उपन्यास साहित्य’, ‘हिन्दी कहानी साहित्य’, विश्व साहित्य, प्रदीप (प्राचीन तथा अर्वाचीन कविताओं का आलोचनात्मक अध्ययन), समस्या, समस्या और समाधान, पंचपात्र, पंचरात्र, नवरात्र, यदि मैं लिखता।
(iv) नाटक- अन्नपूर्णा का अनुवाद (मौरिस मैटरलिंक के नाटक ‘सिस्टर बीट्रिस’ का अनुवाद) ‘उन्मुक्ति का बंधन’ (मौरिस मैटरलिंक के नाटक ‘दी यूजलेस डेलिवरेन्स’ का अनुवाद)।
(v) काव्य-संग्रह- ‘शतदल’, ‘अश्रुदल’, ‘पंचपात्र’ ।
(vi) उपन्यास- कथाचक्र, भोला (बाल उपन्यास), वे दिन (बाल उपन्यास)।
(vii) आत्मकथा संस्मरण- मेरी अपनी कथा, जिन्हें नहीं भूलूँगा, अंतिम अध्याय ।
(viii) साहित्य समग्र- बख्शी ग्रन्थावली (आठ खण्डों में)।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ के आधार पर पदुमलाल बख्शी का हिंदी साहित्य में क्या योगदान था?
उत्तर- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। वे विशेष रूप से अपने ललित निबंधों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी लेखन शैली सरल, प्रभावशाली और रोचक है, जिसमें शिष्ट हास्य और व्यंग्य का सुंदर प्रयोग मिलता है। उन्होंने जीवन, समाज, धर्म, संस्कृति और साहित्य जैसे अनेक विषयों पर उच्च कोटि के निबंध लिखे।
बख्शीजी ने ‘सरस्वती’ पत्रिका का 1920 से 1927 तक सफल संपादन किया और ‘छाया’ पत्रिका का भी संपादन किया। उन्होंने निबंध, आलोचना, कहानी, कविता और अनुवाद जैसे कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके लेखन में गहन अध्ययन और व्यापक दृष्टिकोण दिखाई देता है। हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए उन्हें 1949 में ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
प्रश्न- CBSE कक्षा 9 हिंदी (गंगा) के पाठ 2 “क्या लिखूँ” पाठ में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा संपादित पत्रिका का नाम क्या था?
उत्तर- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा संपादित पत्रिका का नाम ‘सरस्वती’ था।
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