ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) पाठ सार

CBSE Class 9 Hindi Chapter 4 “Aisi Bhi Baatein Hoti Hai (Lata Mangeshkar Se Sakshatkar)”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Ganga Book

प्रस्तुत पाठ कक्षा 9 की पुस्तक गंगा से लिया गया है। प्रस्तुत पाठ में लेखक ने लता मंगेशकर जी के साथ हुए एक साक्षात्कार का अद्धभुत वर्णन किया है। पाठ में बताया गया है कि अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्मी लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पपित रहीं। जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने संगीत और परिवार के प्रति अपने उतरदायित्व व को निभाया। 

 

ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) का संक्षिप्त अवलोकन (Aisi Bhi Baatein Hoti Hai Quick Overview)

विवरण जानकारी
पाठ शीर्षक ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार)
लेखक यतींद्र मिश्र
किताब गंगा (सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी)
पाठ नं. 4
कथावाचक लेखक, लता मंगेशकर
सेटिंग संवाद
विषय लता मंगेशकर से साक्षात्कार

 

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प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 4 – ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 4 – ‘ऐसी भी बातें होती हैं’  पाठ का सार लिखिए। 

उत्तर – प्रस्तुत पाठ में लेखक ने लता मंगेशकर जी के साथ हुए एक साक्षात्कार का अद्धभुत वर्णन किया है। पाठ में बताया गया है कि अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्मी लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पपित रहीं। जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने संगीत और परिवार के प्रति अपने उतरदायित्व व को निभाया। 

  • लता मंगेशकर जी की विनम्रता – लता मंगेशकर जी से जब उनके असंख्य अच्छा चाहने वालों, जो उनके संगीत को सुनने के लिए दीवानगी की हद तक अपने आप को सौंपने के लिए तैयार हो जाते थे और फिल्म संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले सभी देशवासियों की ओर से प्रश्न पूछने की आज्ञा माँगी जाती हैं तो उन्होंने कहा था कि वे पूरी कोशिश करेंगीं कि जो कुछ भी उन्होंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे वे बता सकें। यतींद्र मिश्र के माध्यम से ही उन्होंने अपने करोड़ों प्रशंसा करने वालों का एहसान माना था कि जो उन सभी ने उन्हें इतना प्रेम और सम्मान दिया। लता मंगेशकर जी को तो यह भी लगता था कि जितना प्रेम उन्हें मिला, शायद गाकर उतना एहसान वे अपने प्रशंसा करने वालों के प्रति जता नहीं पाई। अपनी सफलता का पूरा श्रय जनता को देना विनम्रता की मिसाल है। 
  • पिता की स्मृतियाँ – लता मंगेशकर जी और उनके भाई-बहन जब बहुत शरारत करते थे तब उनके पिता जी के बुलाए जाने मात्र से ही सभी बच्चों का रोना छूट जाता था। उनके पिताजी उस समय उनसे केवल पूछते थे कि वे समझ गए है न? और इस पर वे भाई-बहन केवल यही कह पाते थे कि वे समझ गए हैं।  इसके बाद पिताजी भाई-बहनों को बाहर जाकर खेलने को कहते थे। इस तरह उनके पिताजी बिना कुछ कहे ही सभी भाई-बहनों को डरा देते थे। 
  • पिता की सीख – लता मंगेशकर जी के पिताजी कमाल के आदमी थे, उन्होंने अपने पिता जी को हमेशा अपने काम और संगीत में ही पूरी तरह व्यस्थ देखा। उनके पिता जी की ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और समाप्त होते-होते देर रात दो से तीन बज जाते थे। एक बार जब लता मंगेशकर जी के पिताजी गाना शुरू करते थे, तो उनके गाने पर खूब सीटियाँ, तालियाँ और ‘वन्स मोर’ मिलता था। उन्होंने अपने पिता जी से सबसे ज्यादा आत्मसम्मान के साथ जीने की प्रेरणा ली। लता मंगेशकर जी के अनुसार उनके पिता जी उन्हें जो संस्कार दिए उससे लता मंगेशकर जी को जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। उन्होंने अपने पिता जी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। और लता मंगेशकर जी के पिताजी ने ही उन्हें सिखाया था कि अगर कोई बात उन्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। 
  • बचपन और उससे जुड़े फिल्मी किस्से – बचपन में फिल्में ही एक मनोरंजन का ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। लता मंगेशकर जी और उनके भाई-बहन, प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर ‘संत तुकाराम’ के दृश्यों की नकल करते हुए  को दोहराते हुए कमरे में पुरे घर के गद्दे, और तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे। वे बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि उनके पिताजी उन्हें धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा कोई दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। इस विषय पर उनका सख्त अनुशासन था। इसलिए फिल्मों की नकल उतारने जैसा काम चोरी चोरी तब होता था, जब उनके पिताजी घर के बाहर होते थे ताकि वे यह जान न पाएँ कि घर में बच्चों के द्वारा फिल्मों का खेल खेला जा रहा है।
  • लता मंगेशकर जी का फिल्मी सफ़र – लता मंगेशकर जी ने शुरू में तो फिल्मों में ही काम किया था और उन्होंने कुल छह या सात फिल्मों में काम किया था। वे उस समय बहुत छोटी थी, जब फिल्मों की दुनिया में उन्हें अभिनय का ज्ञान हुआ। उन्हें कभी मेकअप करना, लाइट के सामने जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ काफी लोग खड़े रहते थे, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं, कभी हँस रहे हैं, गा भी रहे हैं। यह सब उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा। उनके यहाँ एक फ़िल्म हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी ‘छत्रपति शिवाजी’। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें लता मंगेशकर जी बाबा कहती थी। लता मंगेशकर जी उनके पास गई, जबकि उस वक्त तक उन्होंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। फिर भी लता मंगेशकर जी ने उनसे खुद कहा कि वे इस फिल्म के आखिर के गाने की दो लाइनें दृश्य में आ कर गाना चाहती हैं। तो फिर लता मंगेशकर जी ने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में वे मौजूद भी हैं। 
  • काम की परिस्थितियाँ व् संघर्ष – लता मंगेशकर जी कभी परिस्थितियों पर ध्यान नहीं देती थी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। उनकी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और फिर तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही उनका पूरा दिन बीत जाता था। उन्हें अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की खबर ही नहीं रहती थी। लता मंगेशकर जी को रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से पड़ता था कि आने वाले कल में उनके कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं। या किसी फिल्म के खत्म होने के साथ उन्हें नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने हैं।
  • परिवार के प्रति समर्पण – लता मंगेशकर जी के दिमाग में बस यही बात घूमती थी कि किसी तरह बस अपने परिवार का ध्यान रखना है, फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय, वे इसी बात की चिंता में लगी रहती थी कि किस तरह वे अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हैं, इसी में उनका सारा वक्त निकल जाता था।  कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी को काम और अपने परिवार की जरूरतों के अलावा किसी और की चिंता नहीं रहती थी। 
  • लता मंगेशकर जी का बचपन का सपना – जब लता मंगेशकर जी के पिताजी जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ उन्हें लगाते थे। उस समय ऐसा जमाना था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। लता मंगेशकर जी ने कुमार गंधर्व जी को जब देखा तब वे काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात लता मंगेशकर जी को बहुत पसंद आई थी। लता मंगेशकर जी को तब हमेशा लगता था कि जब वे बड़ी हो जाएंगी, तब उन्हें भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर वे भी किसी कार्यक्रम में जाएंगी।
  • त्यौहार और संस्कृति – लता मंगेशकर जी व् इनके घर पर भी सब होली खेलते थे। उनके यहाँ होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन सभी तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे वे लोग ‘गुड़वड’ कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग-पंचमी आती है, उस दिन लता मंगेशकर जी की माँ और पिताजी उन सब भाई बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। लता मंगेशकर जी के घर में दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। उनके घर में नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन वे ‘गुड़ि पड़वा’ मनाते हैं, जिसका विशेष महत्व है। इसमें वे अपने घर में बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही ‘गुड़ि’ पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्यों में बाँट लिया जाता हैं। यह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है। लता मंगेशकर जी बताती हैं कि उनकी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर ‘गुड़ि’ बाँधी गई थी। तो लता मंगेशकर जी के यहाँ यह त्योहार राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दुर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। 
  • दीपावली की मिठाई और पुरानी यादें – पचास के दशक के दौरान, जब वे फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और उनका काम चलना शुरू हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था।  वे ठीक दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी।
    उनके यहाँ होली और दीवाली पर तो घरों में गीत-संगीत नहीं होता। परन्तु यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है। इस दौरान घरों में, पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। इसे मंगलागौर कहा जाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई ( पुराने रीतिरिवाजों के अनुसार) अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर धीरे-धीरे वह भी अब खत्म हो रहा है। 
  • सहयोगियों से सम्बन्ध – लता मंगेशकर  जी का कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। अर्थात जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल उनके अपने घर जैसी थीं। उन सबका लता मंगेशकर जी के घर में आना-जाना होता रहता था। लता मंगेशकर जी की बहन मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। लता मंगेशकर जी को याद है, कि सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का उन्हें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। उन दौरान स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं तो वे भली लडकियाँ जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अक्सर लता मंगेशकर जी भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह सब लता मंगेशकर जी उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हैं, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती थी। 
  • संगीत की असीम शक्ति – लता मंगेशकर जी यह मानती हैं कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि वह ऐसा कुछ जरूर रच देता है, जिसकी आशा किसी ने न की हो। इसका अनुभव भी कई बार लता मंगेशकर जी को हुआ है। कई बार अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी उन्हें कुछ ऐसा अनुभव होता था जिसकी आशा वो नहीं कर सकती थी। लता मंगेशकर जी उदाहरण देती हैं कि वे मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। वे श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी हुई अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और उनका वादन अत्यधिक मंत्रमुग्ध करने वाला था। लगभग पचास-साठ मिनट कि ‘ठन’ से उनके सरोद (बीन की तरह का एक प्रकार का बाजा) का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब लता मंगेशकर जी ने उनके वादन की प्रशंसा की और कहा कि काश वे पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते। इस पर अली अकबर जी ने कहा था कि जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है। इस प्रसंग से लता मंगेशकर जी को यह लगता है कि संगीत की सीमा इतनी गहरी है कि तार भी शुद्ध स्वर के प्रहार को सह नहीं पाया और टूटकर अलग हो गया। इन बातों से लता मंगेशकर जी का इस बात पर विश्वास करने का मन होता है कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे! 
  • लता मंगेशकर जी की कृतज्ञता – लता मंगेशकर जी मानती हैं कि उन्हें भगवान ने बहुत कुछ दिया है। उन्हें किसी बात की शिकायत नहीं है। वे बहुत खुश हैं। उनका गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं हो सकता। एक बात की उन्हें सबसे ज्यादा खुशी है कि उन्होंने अपने पिताजी का नाम थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया है। लता मंगेशकर जी को लगता है कि भगवान् ने उन्हें जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। वे चाहती हैं कि भगवान् ने कृपा की छाया से जैसे उन्हें छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखें। लता मंगेशकर जी सभी के लिए यही प्रार्थना करती हैं।

 
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ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) पाठ व्याख्या Aisi Bhi Baatein Hoti Hai Lesson Explanation

प्रश्न – यतींद्र मिश्र, लता मंगेशकर जी से उनकी किस यात्रा के बारे में पूछना चाहते हैं ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : दीदी, आपके संगीत की अप्रतिम यात्रा पर बातचीत शुरू करते हैं…
इस संवाद में मेरा प्रयास यह रहेगा कि मैं संगीत में आकंठ डूबे हुए आपके महान जीवन की उन दुर्लभ छवियों से उन करोड़ों प्रशंसकों को मिलवा सकूँ, जो आपको हर दिन सुनते हुए कहीं अपने जीवन को सार्थक ढंग से शुरू करने की प्रेरणा पाते हैं।
आप अगर तैयार हों, तो मैं ऐसे असंख्य शुभचिंतकों, आपके संगीत के प्रति दीवानगी की हद तक समर्पित श्रोताओं और फिल्म संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले तमाम देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए आपसे प्रश्न पूछना चाहूँगा…
लता मंगेशकर : जी, जरूर। आपका बेहद शुक्रिया कि आपका ऐसा कुछ करने का मन है। आप पूछिए, मैं आपके प्रश्नों का जवाब देने के लिए तैयार हूँ। मैं कोशिश करूँगी कि जो कुछ भी मैंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे आपको बता सकूँ। आपके माध्यम से ही मैं अपने करोड़ों प्रशंसकों का आभार व्यक्त करती हूँ, जो उन्होंने मुझे इतना प्रेम और सम्मान दे रखा है। मुझे तो यह भी लगता है कि जितना प्रेम मुझे मिला है, शायद गाकर उतना आभार मैं अपने प्रशंसकों के प्रति जता नहीं पाई हूँ…

शब्दार्थ –
अप्रतिम – बेजोड़, अनुपम
संवाद – बातचीत
प्रयास – कोशिश
आकंठ – कंठ तक, पूर्ण रूप से
दुर्लभ – जो आसानी से प्राप्त न हो
छवि – प्रतिबिंब, चमक, उज्जवल
सार्थक – सफल, उपयोगी, जिसका कोई अर्थ हो
असंख्य – जिनकी गिनती न की जा सके
शुभचिंतक – शुभ या भला चाहने वाला, भलाई की इच्छा रखने वाला, हितैषी
समर्पित – समर्पण किया हुआ, दिया हुआ, सौंपा हुआ,
आभार – एहसान, उपकार

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र ने लता मंगेशकर जी से उनके संगीत की अनुपम अथवा अद्धभुत यात्रा पर बातचीत शुरू की। उन्होंने लता मंगेशकर जी से कहा कि वे उन दोनों के बीच होने वाली बातचीत में पूरी कोशिश करेंगे कि वे संगीत में पूर्ण रूप से डूबे हुए लता मंगेशकर जी के महान जीवन के उन प्रतिबिंबों को, जिनको आसानी से प्राप्त नहीं किया जा सकता, उन्हें उन करोड़ों प्रशंसा करने वालों को मिलवा सकें, जो लता मंगेशकर जी को हर दिन सुनते हुए किसी न किसी मोड़ पर अपने जीवन को सफल ढंग से शुरू करने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
यतींद्र मिश्र ने लता मंगेशकर जी से उनके ऐसे असंख्य अच्छा चाहने वालों, जो उनके संगीत को सुनने के लिए दीवानगी की हद तक अपने आप को सौंपने के लिए तैयार हो जाते थे और फिल्म संगीत के प्रति आदर का भाव रखने वाले सभी देशवासियों की ओर से प्रणाम करते हुए प्रश्न पूछने की आज्ञा माँगी।
लता मंगेशकर जी ने भी हामी भरी और उनके द्वारा ऐसा करने का सोचने के लिए शुक्रिया कहा। और उनको प्रश्न पूछने के लिए कहा ताकि वे उनके प्रश्नों का उत्तर दे सकें। उन्होंने कहा कि वे पूरी कोशिश करेंगीं कि जो कुछ भी उन्होंने संगीत में रहते हुए जाना है, उसे वे बता सकें। यतींद्र मिश्र के माध्यम से ही उन्होंने अपने करोड़ों प्रशंसा करने वालों का एहसान माना कि जो उन सभी ने उन्हें इतना प्रेम और सम्मान दिया। लता मंगेशकर जी को तो यह भी लगता था कि जितना प्रेम उन्हें मिला, शायद गाकर उतना एहसान वे अपने प्रशंसा करने वालों के प्रति जता नहीं पाई।  

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी को अपने पिता की कौन सी यादें सुख देती हैं ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : आपके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो आज भी आपके स्मरण में जीवित हैं? जिनको याद करना आपको सुख से भरता है?
लता मंगेशकर : कई बातें हैं। जैसे हम लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे, तब पिताजी सबको बुलाकर अपने सामने खड़ा करते थे। वे बस हमको गंभीरता से देखते थे और इतने में ही हमारा रोना शुरू हो जाता था। मतलब वे कुछ कहते नहीं थे, न ही किसी बात पर डाँट पड़ती थी; मगर हम सभी समझ जाते थे कि हमको बुलाया किसलिए गया है। पिताजी उस समय पूछते थे, ‘समझ गए न?’ इस पर हम लोग कहते थे, ‘हाँ, हम लोग समझ गए।’ इसके बाद वे कहते थे कि ‘अच्छा अब जाओ, बाहर जाकर खेलो।’ इस तरह हमारे पिताजी था, जो बिना कुछ कहे ही हम भाई-बहनों को डरा देता था।
मेरे पिताजी कमाल के आदमी थे, जिन्हें मैंने हमेशा अपने काम और संगीत में डूबा हुआ ही देखा। उनकी ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और देर रात दो से तीन बजे तक जाकर समाप्त होते थे। इतनी देर एक नाटक में समय इसलिए लगता था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। फिर उसमें लंबी-लंबी रागदारी वाले गायन की भी परंपरा थी। एक बार पिताजी जब गाना शुरू करते थे, तो खूब सीटियाँ, तालियाँ और ‘वन्स मोर’ मिलता था। बाबा माइक पर थोड़ी तेज आवाज़ में गाते थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। मेरे पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि एक राग को गाते हुए उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे। मतलब एक राग गाते समय किसी भी सुर को ‘सा’ (षडज) बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके सुर में वापस लौट आते थे।
उस समय म्यूजिकल ड्रामा का बहुत चलन था। हमारे यहाँ कभी भी बिना म्यूजिक के कोई ड्रामा हुआ ही नहीं एक नई बात मेरे पिताजी के नाटकों में यह भी थी कि वे पहली बार मराठी रंगमंच में कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए। मतलब उन्होंने बाकायदा कर्नाटक जाकर वहाँ का कुछ गीत और संगीत सीखा था, जिसे अपने नाटकों में डाला।
मुझे यह भी याद है कि जिस दिन कोई ड्रामा नहीं होता था, उस दिन घर में संगीत की सभा होती थी और बहुत सारे लोग हमारे घर आते थे। फिर वे उसमें नाटक का कोई गीत नहीं गाते थे, बल्कि उस दिन सिर्फ शास्त्रीय संगीत होता था। मेरे पिताजी के गाए हुए शास्त्रीय संगीत के कई रेकॉर्ड एच.एम.वी. से रिलीज हुए हैं और जहाँ तक मुझे बाद पड़ता है कि एक रेकॉर्ड उन्होंने राग जयजयवंती का भी बनाया था, जिसे मेगाफोन कंपनी ने बाजार में उतारा।

शब्दार्थ –
स्मृतियाँ – यादें
स्मरण – याद, स्मृति, चिंता
गंभीरता – गहनता गांभीर्य, उदात्तता
रागदारी – ठीक राग गाने का ढंग या क्रिया
राग – विशिष्ट ताल-लययुक्त, ध्वनि, मन को प्रसन्न करना, प्रीति, अनुराग
सा’ (षडज) – संगीत के सात स्वरों में से प्रथम जिसका संकेत स है

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र ने लता मंगेशकर जी से पूछा कि उनके पिताजी पं. दीनानाथ मंगेशकर की वे कौन-सी स्मृतियाँ हैं, जो हमेशा उनकी यादों में जीवित हैं, जिनको याद करना उनको सुख से भरता है।
लता मंगेशकर जी ने उत्तर देते हुए कहा था कि ऐसी बहुत सी बातें हैं। जैसे – वे लोग बचपन में जब बहुत शरारत करते थे, तब उनके पिताजी सबको बुलाकर अपने सामने खड़ा कर देते थे। वे केवल उन सभी को गंभीरता से देखते थे कि इतने में ही सब भाई-बहनों का रोना शुरू हो जाता था। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी के पिता जी कुछ कहते नहीं थे, न ही किसी बात पर भाई-बहनों को डाँट पड़ती थी; मगर सभी भाई-बहन समझ जाते थे कि उनको बुलाया किसलिए गया। अर्थात लता मंगेशकर जी और उनके भाई-बहन जब बहुत शरारत करते थे तब उनके पिता जी के बुलाए जाने मात्र से ही सभी बच्चों का रोना छूट जाता था। उनके पिताजी उस समय उनसे केवल पूछते थे कि वे समझ गए है न? और इस पर वे भाई-बहन केवल यही कह पाते थे कि वे समझ गए हैं।  इसके बाद पिताजी भाई-बहनों को बाहर जाकर खेलने को कहते थे। इस तरह उनके पिताजी बिना कुछ कहे ही सभी भाई-बहनों को डरा देते थे।
लता मंगेशकर जी के अनुसार उनके पिताजी कमाल के आदमी थे, उन्होंने अपने पिता जी को हमेशा अपने काम और संगीत में ही पूरी तरह व्यस्थ देखा। उनके पिता जी की ड्रामा कंपनी के नाटक रात नौ बजे शुरू होते थे और समाप्त होते-होते देर रात दो से तीन बज जाते थे। इसका कारण यह था कि एक नाटक के पाँच अंक होते थे। और फिर उस समय नाटक में अच्छे ढंग से गाए जाने वाले लंबे-लंबे गायन की भी परंपरा थी। एक बार जब लता मंगेशकर जी के पिताजी गाना शुरू करते थे, तो उनके गाने पर खूब सीटियाँ, तालियाँ और ‘वन्स मोर’ मिलता था। उनके पिता माइक पर थोड़ी तेज आवाज़ में गाते थे, जो सुनने पर बहुत अच्छा लगता था। लता मंगेशकर जी के पिताजी की एक बड़ी विशेषता यह भी थी कि एक राग को गाते हुए वे उसमें सुर बदलकर भी अपना गायन करते थे। कहने का अभिप्राय यह है कि एक राग को गाते समय वे किसी भी सुर को ‘सा’ अर्थात संगीत के सात स्वरों में से प्रथम स्वर को बनाकर इस तरह राग को बदल देते थे कि वह कुछ नया हो जाता था और फिर उसी समय नए राग में गाते हुए दोबारा से पहले राग और उसके सुर में वापस लौट आते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी के पिताजी किसी भी राग को अपने तरीके से बदल कर उसे नए ढंग से प्रस्तुत करते थे।
उनके समय में म्यूजिकल ड्रामा का बहुत चलन था। लता मंगेशकर जी के यहाँ कभी भी बिना म्यूजिक के कोई ड्रामा नहीं हुआ करता था। लता मंगेशकर जी के पिताजी के नाटकों में एक नई बात यह भी थी कि वे पहली बार मराठी रंगमंच में कर्नाटक और पंजाब का संगीत लेकर आए थे। अर्थात उन्होंने ख़ास तौर पर कर्नाटक जाकर वहाँ का कुछ गीत और संगीत सीखा था, जिसे उन्होंने अपने नाटकों में डाला। अर्थात लता मंगेशकर जी के पिताजी अपने नाटकों में उस समय नयापन ले कर आए थे।
लता मंगेशकर जी को यह भी याद था कि जिस दिन कोई ड्रामा नहीं होता था, उस दिन उनके घर में ही संगीत की सभा होती थी और बहुत सारे लोग उनके घर आते थे। परन्तु वहाँ वे नाटक का कोई गीत नहीं गाते थे, बल्कि उस दिन सिर्फ शास्त्रीय संगीत होता था। लता मंगेशकर जी ने  बताया कि उनके पिताजी के गाए हुए शास्त्रीय संगीत के कई रेकॉर्ड एच.एम.वी. से रिलीज हुए थे और उन्हें यह भी याद आया कि एक रेकॉर्ड उनके पिता जी ने राग जयजयवंती का भी बनाया था, जिसे मेगाफोन कंपनी ने बाजार में उतारा था।

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी के जीवन में माता-पिता की कौन सी सीख उनके बेहद काम आई ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : पिताजी से संगीत के अलावा आपने क्या क्या और सीखा?
लता मंगेशकर : सबसे ज्यादा तो स्वाभिमान से जीने की प्रेरणा। उन्होंने जो संस्कार दिए उससे जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। आज मुझे इस बात की खुशी है। कि मैंने किसी से यह नहीं कहा कि आप मुझे पाँच सौ रुपये दीजिए, फलाँ चीज ला दीजिए, मुझे उसकी जरूरत है। इस तरह जो चीज मैं कर पाई, उसमें मैं अपने बाबा का संस्कार मानती हूँ। मैंने पिताजी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। यह मेरे पिताजी ने ही मुझे सिखाया था कि अगर कोई बात तुम्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। इस तरह जब मैं याद करती हूँ, तो लगता है कि बाबा ऐसा कहते थे, बाबा ने यह कहा था, बाबा ने उस समय में इस तरह कोई निर्णय लिया था। यह सब मेरे बड़े काम आया है। हमने हर तरह के दिन देखे थे। पिताजी की कंपनी जब अच्छी चलती थी, तो हम सब लोग बड़े शान से रहते थे। फिर पिताजी के निधन के बाद हमें यह भी देखना पड़ा कि बुरे हालात में कैसे जीना है। मेरी माँ का भी वही संस्कार था कि कैसे भी स्वाभिमान के साथ जी लेना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं पसारना है।… और देखिए, ये सब बातें मेरे कितने काम आई हैं। आज मेरे पास पैसे हैं और नाम है। हम आज जहाँ रहते हैं, वह भले ही इतना छोटा-सा घर है, पर उसमें हम लोग बहुत खुश हैं। इस बात के लिए भी ईश्वर को धन्यवाद करते हैं कि बाबा ने जैसा सिखाया था, उस पर हम सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।
यतींद्र मिश्र : बचपन में आप सभी भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल उतारते थे। किसी खास फिल्म को देखकर उसकी नकल का स्मरण करेंगी?
लता मंगेशकर : (हँसते हुए) अरे! यह तो हम सब भाई-बहन बहुत करते थे। फिल्में ही थीं, जो मनोरंजन का एक ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। मुझे याद है कि प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर थी ‘संत तुकाराम’। फिल्म में दिखाया गया है कि तुकाराम सदेह बैकुंठ जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का विमान आता है। वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं— ‘अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा’ (मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए)। हम कमरे में घर भर के गद्दे, तकिये एक ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर मैं बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, मेरे फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के अनुयायी बनकर रोते थे और कहते थे— ‘हमें भी साथ ले लीजिए। हमें भी साथ ले चलिए ।’ (खिलखिलाकर हँसती हैं) उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी। तो यह सब होता था। हम बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि पिताजी धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। उनका सख्त अनुशासन था और यह सब काम चोरी चोरी तब होता था, जब पिताजी घर के बाहर हों और यह जान न पाएँ कि घर में फिल्मों का खेल खेला जा रहा है।

शब्दार्थ –
स्वाभिमान – आत्मसम्मान, अपनी प्रतिष्ठा का अभिमान
पसारना – फैलाना
सदेह – शरीर के साथ
बैकुंठ – स्वर्ग, एक ताल, संगीत
अनुयायी – पीछे चलने वाला, अनुगामी, समान

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र ने लता मंगेशकर जी से पूछा कि उन्होंने उनके पिताजी से संगीत के अलावा और क्या-क्या सीखा।
लता मंगेशकर जी ने उत्तर दिया कि उन्होंने अपने पिता जी से सबसे ज्यादा आत्मसम्मान के साथ जीने की प्रेरणा ली। लता मंगेशकर जी के अनुसार उनके पिता जी ने उन्हें जो संस्कार दिए थे उससे लता मंगेशकर जी को जिंदगी में सही बातों पर खड़े रहने की हिम्मत मिली। लता मंगेशकर जी को इस बात की खुशी रही कि उन्होंने किसी से यह नहीं कहा कि वे उन्हें पाँच सौ रुपये दे दें, या उनको किसी चीज की जरुरत है वे उन्हें ला कर दें। अर्थात लता मंगेशकर जी ने कभी किसी से कुछ नहीं माँगा और इस बात की उन्हें बहुत ख़ुशी रही। इस तरह जो भी चीजें लता मंगेशकर जी कर पाई, उसमें वे अपने बाबा का संस्कार मानती थी। उन्होंने अपने पिता जी में यह बात देखी थी कि हर हालात में कैसे रहना चाहिए। और लता मंगेशकर जी के पिताजी ने ही उन्हें सिखाया था कि अगर कोई बात उन्हें सही लगती है, तो उसे करो और किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं है। इस तरह जब लता मंगेशकर जी पिता को याद करती थी, तो उन्हें लगता था कि बाबा ऐसा कहते थे, बाबा ने यह कहा था, बाबा ने उस समय में इस तरह कोई निर्णय लिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी कठिनाई में लता मंगेशकर जी अपने पिता जी की बातों को याद करते हुए समस्यायों का हल खोजने का प्रयास करती थी। पिता जी की बातें और सलाह लता मंगेशकर जी के बहुत काम आया। लता मंगेशकर जी ने यह भी कहा कि उन्होंने हर तरह के दिन देखे थे। जब उनके पिताजी की कंपनी अच्छी चलती थी, तो वे सब लोग बड़े शान से रहते थे। फिर जब उनके पिताजी का निधन हो गया उसके बाद उन्हें बुरे हालात में कैसे जीना है, यह भी देखना पड़ा। लता मंगेशकर जी की माँ का भी वही संस्कार था कि चाहे कैसी भी परिस्थिति हो आत्मसम्मान के साथ ही जीना है, मगर किसी के आगे जाकर हाथ नहीं फैलाना है। अर्थात लता मंगेशकर जी की माँ ने भी उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीना सीखाया, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। और लता जी ने बड़े गर्व के साथ कहा कि उनके माता पिता की ये सब बातें उनके बहुत काम आई। जिनके कारण लता मंगेशकर जी के पास पैसे और नाम बना। वे जहाँ रहते थे, वह भले ही छोटा-सा घर था , पर उसमें वे लोग बहुत खुश थे। इस बात के लिए भी लता मंगेशकर जी ईश्वर को धन्यवाद करती थी कि उनके पिता ने जैसा सिखाया था, उस पर सभी भाई-बहनों ने चलने का प्रयास किया।
यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से पूछा कि बचपन में वे सभी भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल उतारते थे। क्या उन्हें किसी खास फिल्म को देखकर उसकी नकल करने का वाक्य याद है?
लता मंगेशकर जी भी ने हँसते हुए उनके प्रश्न का उत्तर दिया था कि वे सब भाई-बहन फिल्में देखकर उसकी नकल बहुत करते थे। उस समय फिल्में ही एक मनोरंजन का ऐसा माध्यम थीं जिनको देखकर बच्चे अपने ढंग से कुछ-कुछ करते रहते थे। लता मंगेशकर जी ने प्रभात फिल्म कंपनी की एक पिक्चर ‘संत तुकाराम’ को याद करते हुए बताया कि फिल्म में दिखाया गया था कि तुकाराम शरीर के साथ ही स्वर्ग जाते हैं और उन्हें लेने ईश्वर का वाहन आता है। उस फ़िल्म में वे यह गीत गाते हुए स्वर्ग जाते हैं— ‘अमी जातो अमचा गावा, अमचा राम-राम ध्यावा’ अर्थात मैं अपने गाँव जा रहा हूँ। सभी लोग मेरा राम-राम ले लीजिए। उस दृश्य को दोहराते हुए लता मंगेशकर जी और उनके भाई-बहन कमरे में पुरे घर के गद्दे, और तकिये एक के ऊपर एक रखकर ऊँचा स्वर्ग बनाते थे, जिस पर चढ़कर लता मंगेशकर जी बैठती थी और वहीं से यह गीत गाती थी। नीचे कमरे में मीना, उनके फूफा का बेटा पंढरीनाथ और आशा, ये तीनों तुकाराम के पीछे चलने वाले शिष्य बनकर रोते थे और कहते थे कि उन्हें भी साथ ले लीजिए। उन्हें भी साथ ले चलिए। यह सब याद करती हुई लता मंगेशकर जी खिलखिलाकर हँस पड़ी थी। उन्होंने बताया कि उस समय उषा बहुत छोटी थी, इसलिए वह इन नाटकों में नहीं रहती थी। लता मंगेशकर जी ने बताया कि यह सब तो होता रहता था। वे बहुत सारी फिल्मों की नकल उतारते थे, जिनमें धार्मिक फिल्में ज्यादा होती थीं क्योंकि उनके पिताजी उन्हें धार्मिक और देशभक्ति की फिल्मों के अलावा कोई दूसरी फिल्में नहीं देखने देते थे। इस विषय पर उनका सख्त अनुशासन था। इसलिए फिल्मों की नकल उतारने जैसा काम चोरी चोरी तब होता था, जब उनके पिताजी घर के बाहर होते थे ताकि वे यह जान न पाएँ कि घर में बच्चों के द्वारा फिल्मों का खेल खेला जा रहा है।

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी को फिल्मों में काम करना क्यों पसंद नहीं था ? किस फ़िल्म में वे स्वयं आने की इच्छुक थी ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : अगर किसी फिल्म में आपको अभिनय करने को कहा जाता, तो वह कौन-सी फिल्म होती जिसमें आप काम करना पसंद करतीं?
लता मंगेशकर : नहीं, मैंने शुरू में तो फिल्मों में काम ही किया था और कुल छह या सा फिल्मों में किया था। मैं बहुत छोटी थी उस समय, जब फिल्मों की दुनिया में अभिनय के मार्फ़त ही आई। मुझे कभी अच्छा नहीं लगा मेकअप करना, लाइट के सामने जाना और काफी लोग खड़े हैं, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं और कभी हँस रहे हैं। गा भी रहे हैं। मुझे वह कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर सराहने का जी जरूर करता है, मगर अभिनय करने के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। एक फिल्म हमारे यहाँ हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी ‘छत्रपति शिवाजी । उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें मैं बाबा कहती थी। मैं उनके पास गई, हालाँकि उस वक्त तक मैंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। मैने उनसे खुद कहा— ‘बाबा मैं चाहती हूँ कि इस फिल्म का आखिर का जो गाना है, उसमें दो लाइनें मैं भी आकर गाऊँ। तो फिर मैंने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में मैं मौजूद भी हूँ। मैं छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती हूँ, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए मेरा मन हुआ कि भले ही एक दृश्य में , मगर यहाँ रहा जा सकता है।
यतींद्र मिश्र : उस दौर में आपके काम की परिस्थितियाँ कैसी थीं? क्या वे आपके हिसाब से धीरे-धीरे अनुकूल होती गई अथवा वैसे ही हमेशा की तरह एक चुनौती का सबब बनी रहीं, जैसे कि वे संघर्ष के दिनों में थीं?
लता मंगेशकर : यह कह पाना मुश्किल होगा कि मेरी परिस्थितियाँ कभी बहुत अच्छी या बुरी रही हों। मैं इन सब बातों पर ध्यान नहीं देती थी। अलबत्ता मैं उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। मुझे याद है कि मेरी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही पूरा दिन बीत जाता था| मुझे अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की सुध नहीं रहती थी।
हमेशा यही बात दिमाग में घूमती थी कि किसी तरह बस मुझे अपने परिवार को देखना है। फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय । किस तरह मैं अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हूँ, इसी में सारा वक्त निकल जात था। आप मेरी परिस्थितियों के बारे में पूछ रहे हैं, तो सच बात तो यही है कि मुझे रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से कि आने वाले कल में मेरे कितने गीत रेकॉर्ड होने हैं। फलाँ फिल्म के खत्म होने के साथ मुझे नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने हैं।

शब्दार्थ –
अभिनय – अभिनेता या अभिनेत्री के द्वारा किये जाने वाला वह कार्य
मार्फ़त – माध्यम, ज्ञान
सराहने – प्रशंसा करना
सबब – कारण, अपादान कारण, हेतु
अलबत्ता – निस्संदेह
सुध – होश, ख्याल 

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से पूछा कि अगर उन्हें किसी फिल्म में अभिनय करने को कहा जाता, तो वह कौन-सी फिल्म होती जिसमें वे काम करना पसंद करतीं ।
लता मंगेशकर जी ने उत्तर दिया कि उन्होंने शुरू में तो फिल्मों में ही काम किया था और उन्होंने कुल छह या सात फिल्मों में काम किया था। वे उस समय बहुत छोटी थी, जब फिल्मों की दुनिया में उन्हें अभिनय का ज्ञान हुआ। लता मंगेशकर जी ने बताया कि उन्हें कभी मेकअप करना, लाइट के सामने जाना अच्छा नहीं लगा और वहाँ काफी लोग खड़े रहते थे, तो उनके सामने कभी रो रहे हैं, कभी हँस रहे हैं, गा भी रहे हैं। यह सब उन्हें कभी अच्छा नहीं लगा। अच्छी फिल्मों को देखकर उनकी प्रशंसा करने का मन जरूर करता था, परन्तु अभिनय करने के बारे में उन्होंने फिर कभी नहीं सोचा। उनके यहाँ एक फ़िल्म हिंदी और मराठी दोनों में बनी थी ‘छत्रपति शिवाजी’। उसमें भालजी पेंढारकर थे जिन्हें लता मंगेशकर जी बाबा कहती थी। लता मंगेशकर जी उनके पास गई, जबकि उस वक्त तक उन्होंने अभिनय का काम छोड़ दिया था। फिर भी लता मंगेशकर जी ने उनसे खुद कहा था कि वे इस फिल्म के आखिर के गाने की दो लाइनें दृश्य में आ कर गाना चाहती हैं। तो फिर लता मंगेशकर जी ने उसके हिंदी और मराठी, दोनों ही संस्करणों में बाद की दो पंक्तियाँ गाई हैं, जिन दृश्यों में वे मौजूद भी हैं। वे छत्रपति शिवाजी को बहुत पसंद करती थी, इसलिए बस इसी फिल्म के लिए उनका मन हुआ कि भले ही एक दृश्य हो, मगर इस फ़िल्म में रहा जा सकता है।
यतींद्र मिश्र ने लता मंगेशकर जी से उस समय में उनके काम की परिस्थितियों के बारे में पूछा कि क्या वे उनके हिसाब से धीरे-धीरे अनुकूल होती गई अथवा वैसे ही हमेशा की तरह एक चुनौती का कारण बनी रहीं, जैसे कि वे संघर्ष के दिनों में थीं।
लता मंगेशकर जी के अनुसार इस प्रश्न का उत्तर दे पाना मुश्किल था क्योंकि उन्हें नहीं ज्ञात कि उनकी परिस्थितियाँ कभी बहुत अच्छी या बुरी रही हों। क्योंकि वे इन सब बातों पर ध्यान नहीं देती थी। इसमें कोई संदेह नहीं था कि वे उस जमाने से लेकर बाद तक बहुत मेहनत से अपने काम करती थी। उन्होंने याद करते हुए कहा कि उनकी रेकॉर्डिंग सुबह से रात तक चलती रहती थी। एक स्टूडियो से दूसरे और फिर तीसरे स्टूडियो के चक्कर में ही उनका पूरा दिन बीत जाता था। उन्हें अपने गाने और रेकॉर्डिंग के अलावा किसी दूसरी चीज की खबर ही नहीं रहती थी। उन्हें किसी तरह बस अपने परिवार का ध्यान रखना था, उनके दिमाग में बस यही बात घूमती थी, फिर वह रेकॉर्डिंग का वक्त हो या घर का खाली समय, वे इसी बात की चिंता में लगी रहती थी कि किस तरह वे अपने परिवार के लिए ज्यादा से ज्यादा कमाकर उनकी जरूरतें पूरी कर सकती हैं, इसी में उनका सारा वक्त निकल जाता था। अपनी परिस्थितियों के बारे में लता मंगेशकर जी ने बताया कि उन्हें रेकॉर्डिंग से या उसकी तकलीफों से इतना फर्क नहीं पड़ता था, जितना इस बात से पड़ता था कि आने वाले कल में उनके कितने गीत रेकॉर्ड होंगे। या किसी फिल्म के खत्म होने के साथ उन्हें नए कॉन्ट्रेक्ट की दूसरी नई फिल्मों के गाने कब रेकॉर्ड करने को मिलेंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी को काम और अपने परिवार की जरूरतों के अलावा किसी और की चिंता नहीं रहती थी।

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी से जब उनके बचपन के किसी सपने के बारे में पूछा गया तब उन्होंने क्या बताया ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : बचपन का कोई ऐसा सपना जिसे पूरा करने की हसरत मन में बहुत दिनों तक पलती रही हो?
लता मंगेशकर : ऐसा कोई सपना तो खास नहीं है, मगर आपको बचपन की एक बात बताती हूँ। मेरे पिताजी उस समय जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ लगाते थे। वह जमाना ऐसा था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। मुझे जगह तो याद नहीं है, मगर यह ठीक से याद है कि पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जो सबसे पहले मैंने गाते हुए सुना है, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात मुझे बहुत पसंद आई। मुझे तब हमेशा वह लगता था कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तब मुझे भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर किसी कार्यक्रम में जाऊँगी।
यतींद्र मिश्र : अगर हम समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ, तो आपके फिल्मों से संबंधित सांगीतिक जीवन की शुरुआत में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल-भगतराम जैसे म्यूजिक डायरेक्टर आते हैं और आपको एक मजबूत जमीन बनाने के लिए ‘आएगा आने वाला’ (महल), ‘हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात) और ‘चले जाना नहीं नैन मिला के’ (बड़ी बहन) जैसे गाने मिलते हैं। इससे एक नए युग का सूत्रपात होता है, जो कहीं आपके कद को बड़ा बनाने में मददगार रहता है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि यदि उस जमाने में ए.आर. रहमान आए होते, जतिन-ललित आए होते, शंकर-एहसान-लॉय होते, तो ये सारे गाने कैसे बनते? उस समय ‘आएगा आने वाला’ की आमद कैसी होती?
लता मंगेशकर : (हँसते हुए) बड़ा मजेदार प्रश्न है आपका। कहना मुश्किल है इस पर क्या बोलूँ? समझ में नहीं आ रहा है कि वाकई अगर ऐसा हुआ होता, तो ये गाने कैसे बनते। यह विचार और कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर मैं पूरी तरह इसका आकलन नहीं कर सकती कि ‘आएगा आने वाला’ को ए. आर. रहमान ने बनाया होता या ‘हवा में उड़ता जाए को जतिन-ललित ने तो कैसा प्रभाव पैदा होता।… मगर मैं इतना जरूर जानती हूँ कि कुछ बहुत बढ़िया होता या बिल्कुल दूसरे अंदाज में सामने आता, जिसकी शायद धुनें और तर्ज भी अलग होते। मैं आपसे प्रश्न करती हूँ कि जो मेरे गाने रहमान ने बनाए या जतिन-ललित के लिए मैंने ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) गाया है, उसे श्याम सुंदर जी, नौशाद साहब या अनिल विश्वास ने रचा होता, तो आपके लिहाज से वह किस तरह बनता?
यह वाकई बहुत रोचक और सोचने वाली बात है कि समय के हेर-फेर से हमारे गीतों का स्वभाव कैसा होता? इतना जरूर मैं कहना चाहूँगी कि पुराने समयों में, जब मैंने ‘महल’, ‘बड़ी बहन’, ‘बरसात’, ‘तराना’, ‘बाजार’ और ‘संगदिल’ जैसी फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया था, उस समय तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं हुई थी। ‘आएगा आने वाला’ में मुझे हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रेकॉर्डिंग वाले माईक तक आना पड़ता था और उसी अनुपात में रेकॉर्डिंग के माईक पर स्वर का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था।
बहुत सारे ऐसे गाने मुझे याद हैं जिसमें कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। आज, जो स्थिति है और जिस तरह हमारी तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता। न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का ये लोग संगीत रच पाते, आप सोच सकते हैं। ठीक उसी तरह, जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं— रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग— अगर पीछे जाकर काम करते, तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते, इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। मेरे लिए भी यह कम चुनौती की बात नहीं कि मैं अनिल विश्वास की धुनों जैसा काम रहमान के साथ कर रही होती और उसी तरह इन नए लोगों की धुनों पर नौशाद साहब के लिए रेकॉर्ड करती, तो कैसा होता?

शब्दार्थ –
हसरत – अफसोस, शोक, दुःख
सूत्रपात – कार्य का आरंभ, माप वाले सूत से मापन का कार्य
आमद – आय, आना
पार्श्वगायन – किसी अन्य अभिनेता या अभिनेत्री के बदले में नेपथ्य में बैठकर गाने वाला, स्वरदान करने वाला

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से उनके बचपन के किसी ऐसे सपने के बारे में पूछा जिसे पूरा करने का अफ़सोस मन में बहुत दिनों तक पालती रही हो । तब लता मंगेशकर जी ने कहा था कि उनका खास ऐसा कोई सपना तो नहीं था, परन्तु उन्होंने बचपन की एक बात बताई, जब उनके पिताजी जीवित थे और जब वे अपने कार्यक्रमों के लिए तैयार होते थे, तो उनको जितने मेडल मिले थे, वे अपने कपड़ों पर सीने के बाईं तरफ उन्हें लगाते थे। उस समय ऐसा जमाना था, जिसमें यह प्रचलन रहा कि कलाकार लोग अपने प्रदर्शनों में मिले हुए मेडल पहनकर ही बैठते थे। लता मंगेशकर जी को जगह तो याद नहीं थी, परन्तु उन्हें यह ठीक से याद था कि उनके पिताजी के अलावा बाहर के किसी कलाकार को जिसे सबसे पहले उन्होंने गाते हुए सुना था, वह पंडित कुमार गंधर्व थे। कुमार गंधर्व जी जब काली शेरवानी पहनकर और अपने ढेर सारे मेडल लगाकर गाने के लिए बैठे, तो वह बात लता मंगेशकर जी को बहुत पसंद आई थी। लता मंगेशकर जी को तब हमेशा लगता था कि जब वे बड़ी हो जाएंगी, तब उन्हें भी ऐसे ही मेडल मिलेंगे, जिसे लगाकर वे भी किसी कार्यक्रम में जाएंगी।
यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से कहा कि अगर वे समय के चक्र (टाइम मशीन) को घुमाकर सन् 1949-50 में ले जाएँ, तो उनके फिल्मों से संबंधित सांगीतिक जीवन की शुरुआत में खेमचंद प्रकाश, शंकर-जयकिशन, हुस्नलाल-भगतराम जैसे म्यूजिक डायरेक्टर आते थे और उनको एक मजबूत जमीन बनाने के लिए ‘आएगा आने वाला’ (महल), ‘हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (बरसात) और ‘चले जाना नहीं नैन मिला के’ (बड़ी बहन) जैसे गाने मिले थे। इससे एक नए युग का आरम्भ हुआ, जो कहीं न कहीं लता मंगेशकर जी के कद को बड़ा बनाने में मददगार रहा। यतींद्र मिश्र यह जानना चाहते थे कि यदि उस जमाने में ए.आर. रहमान आए होते, जतिन-ललित आए होते, शंकर-एहसान-लॉय होते, तो ये सारे गाने कैसे बनते? उस समय ‘आएगा आने वाला’ को कैसे बनाया जाता?
लता मंगेशकर जी को उनका प्रश्न बड़ा मजेदार लगा और उन्होंने हँसते हुए कहा था कि इस प्रश्न पर वह क्या कहे, उनके लिए मुश्किल था। उन्हें भी समझ में नहीं आ रहा था कि यदि सच में ऐसा हुआ होता, तो ये गाने कैसे बनते। यह विचार और कल्पना तो सुनने में अच्छी लगती है, पर वे पूरी तरह इसका आकलन नहीं कर सकती कि ‘आएगा आने वाला’ को ए. आर. रहमान ने बनाया होता या ‘हवा में उड़ता जाए’ को जतिन-ललित ने बनाया होता तो गानों का कैसा प्रभाव पैदा होता। परन्तु वे इतना जरूर जानती थी कि जो भी होता कुछ बहुत बढ़िया होता या बिल्कुल दूसरे अंदाज में सामने आता, जिसकी शायद धुनें और तर्ज भी अलग होते। फिर लता मंगेशकर जी, ने यतींद्र मिश्र से प्रश्न किया कि जो उनके गाने रहमान ने बनाए या जतिन-ललित के लिए उन्होंने ‘मेरे ख्वाबों में जो आए’ (दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे) गाया, उसे यदि श्याम सुंदर जी, नौशाद साहब या अनिल विश्वास ने रचा होता, तो यतींद्र मिश्र के हिसाब से वे गाने किस तरह बनते?
यह सच में बहुत रोचक और सोचने वाली बात थी कि यदि समय का हेर-फेर होता तो उनके गीतों का स्वभाव कैसा होता? लता मंगेशकर जी इतना जरूर कहना चाहती थी कि पुराने समयों में, जब उन्होंने ‘महल’, ‘बड़ी बहन’, ‘बरसात’, ‘तराना’, ‘बाजार’ और ‘संगदिल’ जैसी फिल्मों के लिए स्वरदान किया था, उस समय तकनीकी रूप से सिनेमा में बहुत तरक्की नहीं हुई थी। ‘आएगा आने वाला’ में उन्हें हॉल में बहुत दूर से चलकर दबे पाँव रेकॉर्डिंग वाले माईक तक आना पड़ता था और उसी अनुपात में रेकॉर्डिंग के माईक पर स्वर का उतार-चढ़ाव कैद किया जाता था।
बहुत सारे ऐसे गाने उन्हें याद आए जिसमें कुछ विशेष प्रभावों को देने के लिए अनिल विश्वास, श्याम सुंदर, सज्जाद हुसैन, सलिल चौधरी और सी. रामचंद्र ने कुछ नए तरीके और अजीबोगरीब टोटके आजमाए थे, जिनसे गीतों में वह प्रभाव पैदा हो सका। अर्थात उस समय बहुत से ऐसे यंत्र नहीं थे जिनसे स्वरों में हेर-फेर आसानी से की जा सके या जिससे गाने को बनावटी रुपरेखा दे जा सके। लता मंगेशकर जी के अनुसार जिस तरह तकनीक विकसित हो चुकी है, उसमें अगर इन पुराने लोगों को काम करने का मौका मिलता, तब तो कमाल ही हो गया होता। अंदाजा लगाया जा सकता हैं कि, वे लोग न जाने कितना और अधिक एडवांस किस्म का संगीत रच पाते। ठीक उसी तरह, रहमान, जतिन-ललित और तमाम अन्य लोग जैसा सुंदर और स्तरीय संगीत आज के संगीतकार बना रहे हैं, अगर समय में पीछे जाकर काम करते, तो कितनी मुश्किलें आतीं और कितना संघर्ष करते हुए वे सब अपना गाना बनाते, इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है। लता मंगेशकर जी ने बताया कि उनके लिए भी यह कम चुनौती की बात नहीं होती कि वे अनिल विश्वास की धुनों जैसा काम रहमान के साथ कर रही होती और उसी तरह इन नए लोगों की धुनों पर नौशाद साहब के लिए रेकॉर्ड करती, तो कैसा होता? कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी अंदाजा नहीं लगा पा रही थी कि यदि पुराने संगीतकारों को आज के समय में मौका मिलता या नए संगीतकारों को पुराने समय में गाने का मौका मिलता तो वे किस तरह की परिस्तिथियों का सामना करते। 

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी किस तरह होली का त्यौहार मनाती थी ? 

पाठ –
यतींद्र मिश्र : इसी समय विषय परिवर्तन करते हुए आपसे कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने का मन हो रहा है। इस संदर्भ में आपके व्यक्तित्व को देखते हुए यह बात दिमाग में आती है कि आपने रंगों से हमेशा परहेज किया है। विशेषकर अपने पहनावे में भी इस बात का ध्यान रखा कि कहीं से भी रंगों की कोई भी दर्शना अभिव्यक्त न हो सके। आपकी सफेद रंग की साड़ियों पर मौजूद रंगीन धारियाँ, गुलबूटों और पल्लों का रंग छोड़कर कहीं भी रंग से दोस्ताना निभता नहीं दिखता। ऐसे में एक ख्याल मन में आता है कि आप रंगों का त्योहार होली कैसे मनाती होंगी? होली को लेकर कोई संस्मरण या व्यक्तिगत रुचि की कोई बात जो आप यहाँ साझा करना चाहें।
लता मंगेशकर : हम होली खेलते थे। यह बहुत पहले की बात है, जब मेरे पिताजी जीवित थे। आजकल तो मैंने होली खेलना ही बंद कर दिया है। पहले सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, अब यह सब सालों से अच्छा नहीं लगता है। यह जो होली पूरे देश में प्रचलित है, हम उसे होली की तरह नहीं मनाते थे। मेरा मतलब यह है कि होली के एक दिन पहले जब होली जलाते हैं और उस समय होलिका की पूजा होती है, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता है, उन तमाम तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते हैं। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता है, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर उसे तोड़कर प्रसाद लेते हैं। वह जो राख बनती है, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते हैं। इसे हम लोग ‘गुड़वड’ कहते हैं। होली के बाद पाँचवें दिन रंग-पंचमी आती है, उस दिन मेरी माँ और पिताजी हम सब भाई बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर हमें प्रसाद में खाने को मिलता था| हम सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी माँ उतारती थीं और इस तरह हमारे घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। वह होली जो आजकल प्रचलित है, इसका कोई प्रभाव हमारे घर में नहीं था।
हमारे यहाँ दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ हम लोगों के यहाँ मनती है। नवरात्रि के पहले दिन हम ‘गुड़ि पड़वा’ मनाते हैं, जिसका विशेष महत्व है। इसमें हम घर में बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते हैं और कलश स्थापना करते हैं। सूर्योदय के समय ही ‘गुड़ि’ पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती है, जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता है और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्य उसे लेते हैं। वह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन है हमारी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर ‘गुड़ि’ बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन ‘गुड़ि’ बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है।
…तो यह त्योहार हम राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दुर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। महाराष्ट्र में उस तरह नवरात्र नहीं मनता, जिस तरह गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दुर्गा की आराधना में यह त्योहार मनाया जाता है।

शब्दार्थ –
परहेज – किसी वस्तु से बचना, बीमार का हानिकर पदार्थ न खाना
दर्शना – दृष्टि, ज्ञान,अवलोकन
अभिव्यक्त – कथित, वाचित, प्रकट किया हुआ
संस्मरण – घटना, दृश्य
प्रचलित – प्रसिद्ध 

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र का विषय परिवर्तन करते हुए लता मंगेशकर जी से कुछ व्यक्तिगत सवाल पूछने का मन हो रहा था। इस विषय में लता मंगेशकर जी के व्यक्तित्व को देखते हुए यतींद्र मिश्र के दिमाग में यह बात आई कि लता मंगेशकर जी ने रंगों से हमेशा दूरी बना कर रखी। खासकर अपने पहनावे में भी इस बात का ध्यान रखा कि कहीं से भी रंगों की कोई भी दृष्टि मात्र उनपर न पड़ सके। उनकी सफेद रंग की साड़ियों पर मौजूद रंगीन धारियाँ, गुलबूटों और पल्लों का रंग छोड़कर कहीं भी रंग के साथ कोई सम्बन्ध नहीं दिखता। ऐसे में एक ख्याल सभी के मन में आता है कि लता मंगेशकर जी रंगों का त्योहार होली कैसे मनाती होंगी? यतींद्र मिश्र होली को लेकर कोई घटना या व्यक्तिगत रुचि की कोई बात लता मंगेशकर जी से सभी के साथ साझा करने को कहा।
लता मंगेशकर जी ने बताया कि वे भी होली खेलते थे। यह उस समय की बात थी, जब उनके पिताजी जीवित थे। बाद में तो उन्होंने होली खेलना ही बंद कर दिया था। पहले वे सारा दिन रंग खेलना और भीगना और बाद में जाकर देर शाम तक नहाना, आदि किया करते थे परन्तु बाद के सालों में उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगा। जिस प्रकार की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है, वे उस तरह की होली नहीं मनाते थे। उनके कहने का अर्थ था कि उनके यहाँ होली के एक दिन पहले जब होली जलाते थे और उस समय होलिका की पूजा होती थी, उसमें जो प्रसाद चढ़ाया जाता था, उन सभी तरह की मिठाइयों को होलिका में डालते थे। नारियल भी होलिका में आखिरी में जलाया जाता था, जिसे जल जाने के बाद आग से निकालकर तोड़कर प्रसाद लेते थे। जो राख बनती थी, उसे उठाकर दूसरे दिन एक-दूसरे पर डालते थे । इसे वे लोग ‘गुड़वड’ कहते थे। होली के बाद पाँचवें दिन रंग-पंचमी आती है, उस दिन लता मंगेशकर जी की माँ और पिताजी उन सब भाई बहनों पर केसर घोलकर थोड़ा छिड़कते थे। माँ घर में कुछ मीठा बनाती थीं, जो भगवान को चढ़ाकर सभी बच्चों को प्रसाद में खाने को मिलता था। माँ उन सभी की अलग-अलग आरतियाँ भी उतारती थीं और इस तरह लता मंगेशकर जी के घर में बचपन में होली का त्योहार मनता था। वह होली जो आजकल प्रसिद्ध है, इसका कोई प्रभाव उनके घर में नहीं था। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी के घर में होली आधुनिक तरीके से नहीं बल्कि पुराने रीतिरिवाजों के अनुसार मनाई जाती थी।
लता मंगेशकर जी के घर में दशहरा और दीवाली का ज्यादा महत्व था। उनके घर में नवरात्रि भी बहुत धूमधाम के साथ मनाई जाती थी । नवरात्रि के पहले दिन वे ‘गुड़ि पड़वा’ मनाते थे , जिसका विशेष महत्व है। इसमें वे अपने घर में बाहर ‘गुड़ि’ बाँधते थे और कलश स्थापना करते थे । सूर्योदय के समय ही ‘गुड़ि’ पर बताशों की माला या हार बनाकर चढ़ाई जाती थी , जिसे सूर्यास्त होने तक उतार लिया जाता था और प्रसाद के रूप में घर के सभी सदस्यों में बाँट लिया जाता था । यह एक बहुत महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता था । लता मंगेशकर जी ने बताया कि उनकी तरफ और ऐसी मान्यता है कि भगवान राम चौदह वर्ष बाद जब अयोध्या लौटे थे, तो हर घर में ऐसे ही बताशों की लड़ी सजाकर ‘गुड़ि’ बाँधी गई थी। महाराष्ट्र में ऐसा ही कहा जाता है। पहले दिन ‘गुड़ि’ बाँधने के बाद नौ दिन तक उत्सव मनाया जाता है, जिसके अंत में नवमी पर राम जी के जन्म की तिथि रामनवमी आती है। तो लता मंगेशकर जी के यहाँ यह त्योहार राम आगमन मानकर मनाते हैं, जबकि बाकी जगहों पर दुर्गा की आराधना में नवरात्र होता है। महाराष्ट्र में उस तरह नवरात्र नहीं मनता, जिस तरह गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में दुर्गा की आराधना में यह त्योहार मनाया जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि लता मंगेशकर जी के यहाँ दशहरा और दीवाली को अन्य जगहों से अलग तरह से मनाया जाता है। 

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी का त्यौहारों के प्रति कैसा व्यवहार रहा?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : त्योहारों की ऐसी कोई खास बात, जो आपके शुरुआती जीवन में परंपरा की तरह निभती रही हो और जिसे आपने बाद में भी पूरी आत्मीयता के साथ निभाना जारी रखा|
लता मंगेशकर : ऐसी कोई खास बात मुझे याद नहीं आती। अलबत्ता इतना जरूर कहूँगी कि पचास का दशक रहा होगा, जब मैं फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और मेरा काम कुछ चल निकलना शुरू हुआ था। उस दौरान मैंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था। आप सुनकर हैरान होंगे कि मैं ऐन दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी।
एक बार बड़ा मजेदार वाकया हुआ कि मैं नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई और जब कॉलबेल बजाया, तो उनींदे से नौशाद साहब मुझे गेट पर खड़ा देखकर डर गए। वे डरकर पूछने लगे— “लता बाई सब खैरियत तो है, इतने सबेरे क्या मुसीबत आन पड़ी?” मैंने उन्हें हँसकर कहा, “कुछ नहीं नौशाद साहब, आज दीवाली है तो आपको बधाई देने और मिठाई पहुँचाने चली आई।” इस पर वे बोले, “अरे इतनी सुबह क्यों परेशान हुई?” तब मैंने उनको हँसते हुए जवाब दिया कि नौशाद साहब आपके अलावा मुझे अभी दो-तीन जगह — अनिल विश्वास जी, रोशनलाल, मदन भैया और बर्मन दादा के यहाँ भी जाना है। इस पर वे लाइ से भरकर बोले— “हाँ। मैं बिल्कुल भूल गया! लेकिन पहले बैठो, चाय पियो और मुँह मीठा करो, फिर जाने देंगे। फिर बोले, “लता, तुम हम सबको मिठाई बाँट रही हो, लेकिन हम सारे संगीतकारों को मिलकर तो तुम्हें मिठाई खिलानी चाहिए, जो तुमने हमारी धुनों में इतनी मिठास घोली है।” नौशाद साहब से मैंने यही इतना भर कहा कि आप आशीर्वाद दीजिए कि आगे भी जीवन में हर दीवाली के साथ मैं और मधुर से मधुर गीत गा सकूँ।
यतींद्र मिश्र : त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आती है कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से संदर्भित घर-घर गीत गाए जाने का प्रचलन रहा है। उदाहरण के लिए होली के मौके पर फाग और धमार, बिहार में छठ पूजा पर छठ के गीत, जन्माष्टमी और रामनवमी में ईश्वर के जन्म के कारण सोहर और बधावा आदि गाने का मामला। ये गीत ज्यादातर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ ही गाती हैं, गायन एक रिवाज की तरह कायम है। ऐसे में महाराष्ट्र के संदर्भ में आपके देखे ऐसे कौन-से अवसर आए हैं?
लता मंगेशकर : (हँसते हुए) हमारे यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत नहीं होता। यह जरूर है कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है। घरों में, जिसमें पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। वह मंगलागौर कहलाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर आहिस्ता आहिस्ता वह भी अब खत्म हो रहा है मुझे अच्छी तरह से बाद है, जब मैं बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में किसी की भी शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और हम सभी लोग उसमें खूब नाचते-गाते थे। उनमें स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। मतलब कोई कुछ भी रूप धरकर नाचता था|

शब्दार्थ –
पचास के दशक के दौरान – 1950 के दौरान
आत्मीयता – अपनापन, घनिष्ठता, मैत्री
ऐन – ठीक
वाकया – घटना, दुर्घटना, युद्ध
उनींदे – आधी नींद में
खैरियत – कुशल, भलाई, नेकी
फाग – फागुन में गाया जाने वाला गीत, फागुन में होने वाला राग-रंग, होली
धमार – फाग का एक भेद (संगीत), एक ताल
सोहर – बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला एक मंगलगीत
बधावा – मंगलाचार, बधाई, बच्चे के जन्म आदि के अवसर पर भेजा जाने वाला उपहार

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से त्योहारों की कोई ऐसी खास बात बताने का आग्रह किया , जिनके वे उनके शुरुआती जीवन में परंपरा की तरह निभती रही हो और जिसे उन्होंने बाद में भी पूरे अपनेपन के साथ निभाना जारी रखा हो।
लता मंगेशकर जी ने बताया था कि इस तरह की कोई खास बात उन्हें याद नहीं । लेकिन इतना जरूर बताया कि पचास के दशक (1950) के दौरान, जब वे फिल्म इंडस्ट्री में नई-नई आई थी और उनका काम चलना शुरू हुआ था। उस दौरान उन्होंने कुछ सालों तक दीवाली के दिन अपने सीनियर म्यूजिक डायरेक्टर्स के यहाँ मिठाई लेकर जाने का चलन शुरू किया था। उन्होंने बताया कि वे ठीक दीवाली के दिन तड़के पाँच बजे ही नहा-धोकर बहुत सारे संगीतकारों के घर मिठाई लेकर पहुँच जाती थी।
उन्होंने एक बार का मजेदार किस्सा सुनाया कि वे नौशाद साहब के घर सुबह करीब साढ़े पाँच बजे पहुँच गई और जब उन्होंने कॉलबेल बजाया, तो आधी नींद में उठे नौशाद साहब लता मंगेशकर जी को गेट पर खड़ा देखकर डर गए। उन्होंने डरते हुए लता मंगेशकर जी से हालचाल पूछते हुए इतने सबेरे आने का कारण पूछा। लता मंगेशकर जी ने उन्हें हँसकर बताया था कि उस दिन दीवाली थी तो उनको बधाई देने और मिठाई पहुँचाने वे चली आई थी। लता मंगेशकर जी की बात सुकर उन्होंने लता जी का इतनी सुबह परेशान होने का कारण पूछा। तब लता मंगेशकर जी ने उनको हँसते हुए जवाब दिया था कि उनके अलावा उन्हें अभी – अनिल विश्वास जी, रोशनलाल, मदन भैया और बर्मन दादा के वहाँ भी जाना था। इस पर उन्होंने लता मंगेशकर जी को चाय पीने और मुँह मीठा करके ही जाने को कहा। उन्होंने लता मंगेशकर जी  की प्रशंसा की कि वे उन सबको मिठाई बाँट रही थी, लेकिन उन सारे संगीतकारों को मिलकर तो लता मंगेशकर जी को मिठाई खिलानी चाहिए थी, जो उनकी धुनों में इतनी मिठास घोली देती थी। नौशाद साहब से लता मंगेशकर जी ने केवल इतना ही कहा था कि वे उन्हें आशीर्वाद दें कि आगे भी जीवन में हर दीवाली के साथ वे और मधुर से मधुर गीत गा सकें। अर्थात लता मंगेशकर जी को हर तरह से केवल अपने संगीत और काम से प्यार था।
यतींद्र मिश्र की त्योहारों के संदर्भ में एक बात और ध्यान में आई कि अधिकांश प्रदेशों में पर्वों व अनुष्ठानों से सम्बंधित गीत घर-घर में गाए जाने का प्रचलन रहा है। उदाहरण के लिए होली के मौके पर फागुन में गाया जाने वाला गीत और धमार (फाग का एक भेद (संगीत)), बिहार में छठ पूजा पर छठ के गीत, जन्माष्टमी और रामनवमी में ईश्वर के जन्म के कारण सोहर (बच्चे के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला एक मंगलगीत और बधावा (बच्चे के जन्म आदि के अवसर पर भेजा जाने वाला उपहार) आदि गाने का प्रचलन है। इन गीतों को ज्यादातर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ ही गाती हैं, और इनका गायन एक रिवाज की तरह कायम है। यतींद्र मिश्र ने प्रश्न किया कि ऐसे में महाराष्ट्र के संदर्भ में लता मंगेशकर जी के द्वारा देखे गए ऐसे कौन-से अवसर आए ।
लता मंगेशकर जी ने हँसते हुए बताया कि उनके यहाँ होली और दीवाली पर तो इस तरह घरों में गीत-संगीत नहीं होता। परन्तु यह जरूर बताया कि विवाह के बाद जब नई बहू घर में आती है, तब एक पूजा होती है। इस दौरान घरों में, पास-पड़ोस की बहुत सारी औरतें आती हैं। इसे मंगलागौर कहा जाता है। सारी औरतें बिल्कुल मुग्ध भाव से गीत गाती हैं और नाचती भी हैं। बिल्कुल ठेठ गँवई (पुराने रीतिरिवाजों के अनुसार) अंदाज में यह मंगलागौर का उत्सव मनाया जाता है, मगर धीरे-धीरे वह भी अब खत्म हो रहा है। लता मंगेशकर जी ने याद करते हुए बताया  कि, जब वे बहुत छोटी थी, तब घर-परिवार या पड़ोस में हर किसी की शादी के बाद यह मंगलागौर मनाया जाता था और वे सभी लोग उसमें खूब नाचते-गाते थे। उन मंगलागौर उत्सवों में स्त्रियाँ नौटंकी और तमाशा की तरह भी कुछ-कुछ करती थीं। अर्थात उस उत्सव में कोई कुछ भी रूप बनाकर नाचता था। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी को अपने बचपन के त्योहारों में नाचना-गाना बहुत पसंद था। 

प्रश्न  – लता मंगेशकर जी का कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ कैसा सम्बन्ध था ?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : दीदी कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ आपके कैसे रिश्ते रहे? क्या सब भी आप लोगों की गायिकी में कोई सहयोग करती थीं या उनका एक अलग ही विभाग होता था, जो मुख्य पार्श्वगायक-गायिकाओं से अलग रहता था?
लता मंगेशकर : उस वक्त एक ऐसा ग्रुप था, जो सब जगह जाता था। नौशाद साहब के यहाँ, मदन मोहन जी के यहाँ। शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल— ये जितने भी लोग थे, सभी के यहाँ एक ही ग्रुप की लड़कियाँ थीं, जो कोरस में गाने जाती थीं। इसलिए सबसे मेल-मुलाकात भी गहरी पहचान में बदल गई थी। मेरा कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। मतलब जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल मेरे घर जैसी थीं। सबका ही घर में आना-जाना होता था। मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का हमें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। 1980 के पास जाकर वह बदला गया। फिर उनमें कुछ लड़कियों ने गाना बंद कर दिया था और कुछ लोगों ने छोड़ दिया।
फिर अस्सी के बाद तो यह भी हो गया था कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रेकॉर्ड हो जाता था| बाद में हम लोग जाकर अपने गाने गा आते थे। उससे पहले के दौर में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस हम लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांग। अकसर मुकेश भैया और मेरे गाने या किशोर कुमार और मेरे गानों में कोरस की लड़कियाँ साथ ही गाती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं। कुछ एक लड़कियाँ बहुत सुरीला गाती थीं, जिनमें कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा थीं। यह सब मुझे बड़ी भली और अच्छी लगती थीं। कविता और गांधारी बहनें थीं और दोनों साथ ही कोरस में गाती थीं। रेखा शादी-शुदा बाल-बच्चों वाली औरत थी, जो अच्छी तरीके से कोरस में साथ देती थी। कल्याणी की भी आवाज़ सुंदर थी। यह सब इतनी भली थीं कि जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो अक्सर वहाँ स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं। वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अक्सर मैं भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह मैं उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हूँ, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती रही हैं। आजकल का मुझे कुछ मालूम नहीं है। अब कौन-कौन से लोग हैं और उनका सिंगर्स के साथ में गाना रेकॉर्ड होता है या अलग से? यह मुझे मालूम नहीं है। मुझसे मिलने वाले जितने लड़के और लड़कियाँ थीं, उन सबने बहुत बाद तक बनाया हुआ था।

शब्दार्थ –
कोरस – दो से अधिक व्यक्तियों का सामूहिक रूप से गान अथवा सहगान मंडली

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र लता मंगेशकर जी से उनके कोरस में गाने वाली लड़कियों के साथ संबंधों के बारे में पूछते हैं ।  वे पूछते हैं कि क्या वे सब भी उनकी गायिकी में कोई सहयोग करती थीं या उनका कोई अलग ही विभाग होता था, जो मुख्य पार्श्वगायक-गायिकाओं से अलग रहता था ।
लता मंगेशकर जी ने बताया कि उस वक्त एक ऐसा ग्रुप था, जो सब जगह जाता था। नौशाद साहब, मदन मोहन जी, शंकर-जयकिशन, एस.डी. बर्मन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल – ये जितने भी लोग थे, सभी के यहाँ एक ही ग्रुप की लड़कियाँ थीं, जो कोरस में गाने जाती थीं। इसलिए उन सबसे लता मंगेशकर जी की मेल-मुलाकात भी गहरी पहचान में बदल गई थी। लता मंगेशकर जी का कोरस की लड़कियों के साथ बहुत अच्छा संबंध था। अर्थात जितनी भी लड़कियाँ थीं, वो बिल्कुल उनके अपने घर जैसी थीं। उन सबका लता मंगेशकर जी के घर में आना-जाना होता रहता था। लता मंगेशकर जी की बहन मीना की शादी जब कोल्हापुर में हुई, तो कोरस की सारी लड़कियाँ और लड़के वहाँ आए थे और उन लोगों ने वहाँ खूब गाने गाए और डांस किया था। लता मंगेशकर जी को याद था , कि सन् 1960 में जो ग्रुप कोरस गाने वालों का उन्हें मिला था, वह लगभग अस्सी तक वैसे ही चला है। 1980 के आस-पास जाकर वह बदला गया था। क्योंकि उनमें कुछ लड़कियों ने गाना बंद कर दिया था और कुछ लोगों ने छोड़ दिया था। कहने का तात्पर्य यह है कि लता मंगेशकर जी और उनके कोरस में गाना गाने वालों के अच्छे सम्बन्ध रहे थे।
अस्सी के बाद की बात बताते हुए लता मंगेशकर जी ने बताया कि अस्सी के बाद तो यह भी हो गया था कि कोरस वालों का म्यूजिक पहले रेकॉर्ड हो जाता था।  और संगीतकार बाद में जाकर अपने गाने गा आते थे। अस्सी से पहले के समय में पुरुष और स्त्री आवाज़ों के कोरस संगीतकार लोगों के गीतों के साथ ही रेकॉर्ड होते थे। भले ही वह गाना डुएट हो या फिर कोई सोलो सांग हो। लता मंगेशकर जी ने बताया कि अकसर मुकेश जी और उनके गाने या किशोर कुमार और उनके गानों में कोरस की लड़कियाँ साथ ही गाती थीं। उनमें से कुछ के नाम तो लता मंगेशकर जी को हमेशा याद रहे। उनके नाम बताते हुए उन्होंने कहा कि कुछ एक लड़कियाँ बहुत सुरीला गाती थीं, जिनमें कविता, गांधारी, कल्याणी, सुमन और रेखा थीं। यह सब उन्हें बड़ी भली और अच्छी लगती थीं। कविता और गांधारी बहनें थीं और दोनों साथ ही कोरस में गाती थीं। रेखा शादी-शुदा बाल-बच्चों वाली औरत थी, जो अच्छी तरीके से कोरस में साथ देती थी। कल्याणी की भी आवाज़ सुंदर थी। उन दौरान स्टूडियो में ज्यादा कुर्सियाँ नहीं होती थीं तो वे भली लडकियाँ जब रेकॉर्डिंग के लिए आती थीं, तो वे सब बड़े मजे से जमीन पर बैठती थीं और अक्सर लता मंगेशकर जी भी रेकॉर्डिंग में आकर वहीं जमीन पर बैठकर उन सभी के साथ बातें करती थी। यह सब लता मंगेशकर जी उन कोरस गाने वाली लड़कियों की बात कर रही हैं, जो बहुत शुरुआती दौर में लगभग पचास और साठ के दशक में संगीतकारों के यहाँ कोरस गाने के लिए जाती थी। वर्तमान का लता मंगेशकर जी को कुछ मालूम नहीं। कि अब कौन-कौन से लोग हैं और उनका सिंगर्स के साथ में गाना रेकॉर्ड होता है या अलग से, यह उन्हें मालूम नहीं। लता मंगेशकर जी से मिलने वाले जितने लड़के और लड़कियाँ थीं, उन सबने बहुत बाद तक उनके साथ अपना सम्बन्ध व् साथ बनाया हुआ था। यही कारण था कि लता मंगेशकर जी का अपने कोरस में गाना गाने वाले लड़के-लड़कियों के साथ सम्बन्ध अच्छे थे। 

 

प्रश्न – लता मंगेशकर जी संगीत की प्राचीन परंपरा में प्रचलित जनश्रुतियों और कहानियों के बारे में किस तरह सोचती हैं?

पाठ –
यतींद्र मिश्र : संगीत की प्राचीन परंपरा में बहुत सारी जनश्रुतियाँ और कहानियाँ संगीत को गरिमा और शिखर देने के संदर्भ में कही जाती रही हैं या हम इस तरह कह सकते हैं कि परंपरा में व्याप्त रही हैं। मसलन स्वामी हरिदास और तानसेन के युग की बहुत सारी कथाओं में यह मान्यताएँ भी प्रचलित रहीं कि तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जल उठे या कि उनकी पुत्रियों ताना-री के मेघ राग गाने से वर्षा होने लगी। इस तरह की अवधारणाओं पर आप किस तरह सोचती हैं?
लता मंगेशकर : यह जिस जमाने की कथाएँ हैं, जिसमें हरिदास बाबा और तानसेन जैसे महान संगीतकारों के लिए ऐसा कहा गया, तो हो सकता है कि उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ लगी होगी, तो ऐसा कुछ घट गया होगा, ऐसा हम आदर में मान लेते हैं। परंतु यह निश्चित ही हुआ होगा, यह कम से कम मैं नहीं कह सकती क्योंकि ऐसा मेरा कोई अनुभव नहीं है। हालाँकि मैं यह मानती हूँ कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि कुछ अप्रत्याशित वह जरूर रच देता है, जिसका अनुभव भी कई बार हमें हुआ है। कई बार अपने बाबा पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी मैं कुछ अप्रत्याशित अनुभव करती थी।
आपको एक वाकया बताती हूँ। मैं मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। मैं श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और वे अत्यंत मंत्रमुग्ध किस्म का वादन कर रहे थे। तभी कुछ समय बीता होगा, मसलन पचास-साठ मिनट कि ‘ठन’ से उनके सरोद का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब वे उठकर पीछे ग्रीन रूम में गए, तो उनसे मिलने मैं भी वहाँ गई। मैंने बोला, “आप बहुत सुंदर बजा रहे थे, काश कि यह तार न टूटता और हम पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते। इस पर अली अकबर भाई ने एक बड़ी मार्मिक बात कही, जो आज तक मुझे भूलती नहीं। वे बोले – “बहन, जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है।” उन्होंने अपने सुर को इतने पवित्र भाव से इतना डूबकर लगाया कि सरोद का तार टूट गया। इस प्रसंग से मुझे यह लगता है कि संगीत की सीमा इतनी अनंत है कि तार भी शुद्ध स्वर के आघात को सह नहीं पाता, टूटकर अलग हो जाता है। आज जब उस्ताद अली अकबर खाँ या पंडित रविशंकर के संदर्भ में इन बातों को सोचती हूँ, तो इस बात पर विश्वास करने का मन होता है कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे!
यतींद्र मिश्र : दीदी, आप तो घर-घर में व्याप्त हैं। आपकी आवाज़ से लोगों की सुबह होती है। अगर मैं अतिरेक नहीं कर रहा, तो यह कहना वाजिब है कि आप अमर हैं और दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं है…
लता मंगेशकर : मुझे भगवान ने बहुत कुछ दिया है। मुझे किसी बात की शिकायत नहीं है। मैं बहुत खुश हूँ। आप जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि मैं अमर हूँ, तो यह मुझे मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है, जो दुनिया ने मुझे दिया है।… मेरा गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं। उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल कल नहीं तो परसों या किसी न किसी दिन…| इस बा पर मुझे कोई अफसोस नहीं होता। वह तो होकर रहेगा। हमारे यहाँ यही कहा जाता है— “गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’। मतलब गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है। मैं इसको हमेशा से मानती रही हूँ। एक बात की मुझे सबसे ज्यादा खुशी है कि मैंने अपने पिताजी का नाम थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।
आज मुझे लगता है कि हे प्रभु! तुमने जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। अपनी कृपा की छाया से जैसे मुझे छाँह दी है, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखना… यही प्रार्थना है।

शब्दार्थ –
जनश्रुतियाँ – लोगो द्वारा सुनाई गई कहानियां
मसलन – उदाहरण रूप में
अप्रत्याशित – जिसकी आशा न रही हो, अनसोचा, आकस्मिक
सरोद – बीन की तरह का एक प्रकार का बाजा
व्याप्त – भरा हुआ, ढका हुआ, आच्छा- दित, सर्वत्र फैला हुआ या प्रसृत
अतिरेक – आवश्यकता से अधिक, अंतर आधिक्य
वाजिब – उचित, कर्तव्य

उत्तर / व्याख्या – यतींद्र मिश्र, ने लता मंगेशकर जी से पूछा कि संगीत की प्राचीन परंपरा में लोगो द्वारा कही और सुनी गई बहुत सारी बातें और कहानियाँ संगीत को गरिमा और शिखर देने के संदर्भ में कही जाती रही हैं या हम इस तरह कह सकते हैं कि लोगो द्वारा कही और सुनी गई बहुत सारी बातें और कहानियाँ परंपरा में फैली रही हैं। उदाहरण के लिए – स्वामी हरिदास और तानसेन के युग की बहुत सारी कथाओं में यह मान्यताएँ भी प्रसिद्ध रहीं हैं कि तानसेन के दीपक राग गाने से दीये जल उठे या उनकी पुत्रियों ताना-री के मेघ राग गाने से वर्षा होने लगी। इस तरह की अवधारणाओं पर लता मंगेशकर जी किस तरह सोचती हैं।
लता मंगेशकर जी ने इसका उत्तर देते हुए बताया कि यह जिस जमाने या समय की कथाएँ हैं, जिसमें हरिदास बाबा और तानसेन जैसे महान संगीतकारों के लिए ऐसा कहा गया, तो ऐसा कुछ घटने का कारण हो सकता है कि उनकी कला में कोई सच्चा सुर या आत्मा की आवाज़ हो , ऐसा हम सभी उनके प्रति आदर भाव में मान सकते हैं। परंतु यह निश्चित ही हुआ होगा, यह कम से कम लता मंगेशकर जी नहीं कह सकती क्योंकि ऐसा उनके साथ कोई अनुभव नहीं हुआ। जबकि वे यह मानती थी कि संगीत में वह असीम शक्ति है कि वह ऐसा कुछ जरूर रच देता है, जिसकी आशा किसी ने न की हो। इसका अनुभव भी कई बार लता मंगेशकर जी को हुआ था। कई बार अपने पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर को सुनते हुए भी उन्हें कुछ ऐसा अनुभव होता था जिसकी आशा वो नहीं कर सकती थी।
लता मंगेशकर जी ने एक घटना का ज़िक्र किया कि वे मुंबई में उस्ताद अली अकबर खाँ और पंडित रविशंकर का एक कंसर्ट सुन रही थी। वे श्रोताओं की पंक्ति में बिल्कुल आगे बैठी हुई अली अकबर भाई का वादन सुन रही थी और उनका वादन अत्यधिक मंत्रमुग्ध करने वाला था। उदाहरण के लिए अभी कुछ समय बीता होगा लगभग पचास-साठ मिनट कि ‘ठन’ से उनके सरोद (बीन की तरह का एक प्रकार का बाजा) का एक तार टूटा और उन्हें बजाना बंद करना पड़ा। जब वे उठकर पीछे ग्रीन रूम में गए, तो उनसे मिलने लता मंगेशकर जी भी वहाँ गई। लता मंगेशकर जी ने उनके वादन की प्रशंसा करते हुए कहा कि काश कि यह तार न टूटता और वे पूरी तरह राग को अंत तक सुन पाते। इस पर अली अकबर जी ने एक बड़ी मन को छूने वाली बात कही थी , जो लता मंगेशकर जी कभी नहीं भूली। उन्होंने कहा था कि जब बहुत सुर में तार लगता है, तो टूट जाता है। उन्होंने अपने सुर को इतने पवित्र भाव से इतना डूबकर लगाया कि सरोद का तार टूट गया। इस प्रसंग से लता मंगेशकर जी को यह लगता था कि संगीत की सीमा इतनी गहरी है कि तार भी शुद्ध स्वर के प्रहार को सह नहीं पाया और टूटकर अलग हो गया। उस्ताद अली अकबर खाँ या पंडित रविशंकर के संदर्भ में इन बातों को जब लता मंगेशकर जी सोचती थी, तो उनका इस बात पर विश्वास करने का मन होता था कि हो सकता है मियाँ तानसेन से कोई ऐसा सच्चा सुर जरूर लगा होगा कि बारिश हो गई या दीपक जल उठे! अर्थात लता मंगेशकर जी अपने अनुभवों के आधार पर ही जनश्रुतियों और कहानियों पर विश्वास करती थी।
यतींद्र मिश्र ने  लता मंगेशकर जी से कहा कि वे तो घर-घर में विध्यमान हैं। उनकी आवाज़ से लोगों की सुबह होती है। अगर वे अधिक नहीं कह रहे हैं, तो यह कहना उचित है कि लता मंगेशकर जी अमर हैं और दूसरी लता मंगेशकर होना इस दुनिया में संभव नहीं है।
लता मंगेशकर जी ने यतींद्र मिश्र की इस बात पर कहा था कि उन्हें भगवान ने बहुत कुछ दिया । उन्हें किसी बात की शिकायत नहीं । वे अपने जीवन से बहुत खुश थी । उन्हें लगता था कि यतींद्र मिश्र जैसे लोग अगर यह मानते हैं कि लता मंगेशकर जी अमर हैं, तो यह उन्हें मिलने वाले उस प्यार जैसा ही है, जो दुनिया ने उन्हें दिया है। उनका गाना अमर है, पर शरीर तो अमर नहीं हो सकता। उसे तो जाना ही है, आज नहीं तो कल कल नहीं तो परसों या किसी न किसी दिन। इस बात पर लता मंगेशकर जी को कोई अफसोस नहीं होता। क्योंकि शरीर तो एक दिन जाना ही है। लता मंगेशकर जी ने अपने यहाँ कही जाने वाली काहवत बताई कि “गाव गेला वाहुन, नाव गेला राहुन’। अर्थात गाँव तो बह जाता है, लेकिन जो नाम है, वह रह जाता है। लता मंगेशकर जी इसको हमेशा से मानती रही। एक बात की उन्हें सबसे ज्यादा खुशी थी कि उन्होंने अपने पिताजी का नाम थोड़ा ही सही मगर, आगे बढ़ाया।
लता मंगेशकर जी को लगता था कि भगवान् ने उन्हें जो भी दिया, वह बहुत दिया, दूसरों से कहीं ज्यादा दिया। वे चाहती थी कि भगवान् ने कृपा की छाया से जैसे उन्हें छाँह दी, वैसे ही हर एक कलाकार और नेक इंसानों के ऊपर भी रखें। लता मंगेशकर जी सभी के लिए यही प्रार्थना करती थी।
 
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Conclusion

प्रस्तुत पाठ में लेखक ने लता मंगेशकर जी के साथ हुए एक साक्षात्कार का अद्धभुत वर्णन किया है। पाठ में बताया गया है कि अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। पाठ के बताया गया है कि किस तरह जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने संगीत और परिवार के प्रति अपने उतरदायित्व को निभाया। पाठ में पाठ सार, व्याख्या, शब्दार्थ, अभ्यास, अन्य प्रश्न, पठित गद्यांश व् बहुविकल्पात्मक प्रश्न दिए गए है जो परीक्षा के दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। 
 
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Aisi Bhi Baatein Hoti Hai – FAQs

प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ के लेखक कौन हैं?

उत्तर-  कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज के पाठ दो बैलों की कथा के लेखक यतींद्र मिश्र हैं।

प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ का विषय क्या है? 

उत्तर-  ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ पाठ में लेखक ने लता मंगेशकर से साक्षात्कार कर उनके जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों को उनके प्रशंसकों के समक्ष रखने का भरसक प्रयास किया है। जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने संगीत और परिवार के प्रति अपने उतरदायित्व व को निभाया, यह पाठ का मुख्य विषय है।

प्रश्न:  ”ऐसी भी बातें होती हैं” पाठ में लता जी के बारे में क्या बताया गया है?

उत्तर-  ‘ऐसी भी बातें होती हैं’ पाठ में लेखक ने लता मंगेशकर जी के साथ हुए एक साक्षात्कार का अद्धभुत वर्णन किया है। पाठ में बताया गया है कि अपनी आवाज़ से भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कोने-कोने में अपनी पहचान बनाने वाली ‘भारत रत्न’ लता मंगेशकर संगीत के संसार का वह नाम हैं जिनके विषय में यदि बात न हो तो भारतीय संगीत की बात अधूरी रह जाएगी। इंदौर, मध्यप्रदेश में जन्मी लता मंगेशकर ने मात्र पाँच वर्ष की आयु में अपने पिता से संगीत की प्रारंभिक शिक्षा ली और जीवनपर्यंत संगीत के प्रति समर्पपित रहीं। जीवन के अनेक उतार-चढ़ाव व संघर्षों के होते हुए भी लता मंगेशकर ने संगीत और परिवार के प्रति अपने उतरदायित्व व को निभाया। 
 
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