संवादहीन पाठ सार
CBSE Class 9 Hindi Chapter 3 “Samvadheen”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Ganga Book
प्रस्तुत पाठ कक्षा 9 की पुस्तक गंगा से लिया गया है। प्रस्तुत पाठ में लेखक ने एक ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन को बहुत ही मार्मिक ढंग से दर्शाया है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है, जो उनके अकेलेपन का सहारा है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन – यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।
संवादहीन का संक्षिप्त अवलोकन (Samvadheen Quick Overview)
| विवरण | जानकारी |
| पाठ शीर्षक | संवादहीन |
| लेखक | शेखर जोशी |
| किताब | गंगा (सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी) |
| पाठ नं. | 3 |
| कथावाचक | लेखक |
| सेटिंग | गाँव के बीच में स्थित बड़े घर का सूना खंडहर |
| विषय | ताई का अकेलापन, लगाव, स्नेह, ज़िम्मेदारी, ताई और मिट्ठू के बीच का सम्बन्ध, ताई और मिट्ठू का वियोग |
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प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 3 – संवादहीन पाठ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 3 – संवादहीन पाठ का सार लिखिए।
उत्तर: ‘संवादहीन’ कहानी ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन की संवेदनशील कहानी है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है। इन दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद है तो कभी नोक-झोंक भी रहती है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन- यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।
- अकेलापन – ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। उनके इस बड़े घर में भी पुत्र – परिवार, बहू- -बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय – डंगर, सभी थे। परन्तु समय के साथ देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। बहू-बेटे गाँव का प्रेम छोड़कर शहरों में जा कर बस गए। बेटियाँ शादी करके अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गईं, गाँव में बसा कारबार किसके भरोसे संभलता। अर्थात गाँव के कारोबार को देखने वाला या संभालने वाला कोई नहीं रहा।
- नया सहारा – ताई के अकेलेपन को सहारा देने के लिए गनपत न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता अब उस मिट्ठू तोते पर बरस पड़ी थी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही परेशान रहने लगीं थी। जो ताई अपनी लिए चूल्हा जलाने में आलस कर जाती थीं, वही अब बिना आलस किए पूरे नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं थी। साथ ही साथ मिट्टू की वक्त-बेवक्त की आवश्यकता या इच्छा के लिए रोटी भी बचाकर रख लेती थी।
- ताई और मिट्ठू का अनोखा संबंध – तेज़ दिमाग वाले बच्चे की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए गए पाठ को न केवल ताई की ही तरह जैसे का तैसा दुहरा देता था बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और जब भी मौका मिलता ताई के सवालों का बिलकुल सही उत्तर दे देता था। सुबह के समय जैसे ही प्रकाश फैलने लगता था, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं थी तो मिट्ठू भी जैसे ताई को सुबह की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ हर हर गंगे ! हर हर गंगे !! सीताराम बोल ! सीताराम बोल !! मिट्ठू राम राम! मिट्ठू राम राम !! शुरू कर देते थे। मिट्ठू की आवाज सुनकर ताई चौंककर उठ बैठतीं थी। प्यार से मिट्ठू को देखकर आशीर्वाद देते हुए कहती थी कि जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ और मिट्ठू भी बदले में अपने आप को ताई की तरह बुजुर्ग दिखाते हुए ताई को आशीर्वाद देता था खुश रहो! खुश रहो!!
- ताई और मिट्ठू की नोक-झोक – कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!” फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
- ताई के समक्ष धर्म-संकट – ताई किसी भी हाल में मिट्ठू से दूर नहीं रहना चाहती थी। लेकिन एक ऐसी स्थिति आ पड़ी कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस संसार में ताई ने बहुत अच्छे-बुरे दिन देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी ताई के मन में घर कर जाती थी। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, ताई का भी उनके साथ अच्छा साथ बन रहा था। एक ओर तो प्रयाग में कुंभ-स्नान का लालच ताई को अपनी ओर खींच रहा था, वहीं दूसरी ओर मिट्ठू की चिंता उन्हें अपनी ओर खींच रही थी।
- मिट्ठू और अनहोनी – जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करके मिट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण देते और उसकी आजादी का आनंद खुद लेते। यह सब केवल तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिट्टू की नजर कमरे में ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज उत्सुकता के कारण वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने रोशनदान की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच गया। जगन मास्टर ‘गीता-रहस्य’ पढ़ रहे थे। मिट्टू के पंखों की फड़फड़ाहट सुनकर अचानक उनका ध्यान ‘गीता-रहस्य’ से हटकर मिट्ठू के पंखों की फड़फड़ाहट की ओर गया, और फिर उन्होंने रोशनदान पर बैठे मिट्ठू को देखा। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर ‘आ-आ’ की पुकार लगाकर मिट्ठू को बुला ही रहे थे कि मिट्टू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और फिर बाहर की ओर उड़ चला। इस समय मिट्टू अकेला नहीं उड़ा, मिट्ठू के साथ-साथ आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते भी उड़ गए। अर्थात मिट्ठू को बाहर उड़ता देख कर जगन मास्टर बुरी तरह घबरा गए।
- मिट्ठू की तरह दिखने वाले तोते के साथ जगन मास्टर का प्रयास – मिट्ठू की तरह दिखने वाले तोते के साथ अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हो गया था। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि जब तक ताई आए तब तक वह भी मिट्ठू की तरह दो अक्षर बोलना सीख ले। जगन मास्टर ने इस बात की फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़ दिया था और घंटों पिंजरे के सामने बैठकर उस तोते को रटते रहते – मिट्ठू, राम राम , सीताराम सीताराम, हर गंगे, हर गंगे , राम राम, सीताराम। बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, पर वह दूसरा तोता पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो। अर्थात जगन मास्टर अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे थे कि वह दूसरा तोता भी मिट्ठू की तरह कुछ बोलना सीख ले ताकि ताई को कुछ पता न चले। परन्तु तोता कुछ भी नहीं बोल रहा था।
- ताई की वापसी और ‘एवजी’ – कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे अपने बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पर पहुँच गई। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, और पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ पिंजरे में मिट्ठू की जगह बैठे दूसरे मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर देखता रहा। ताई अपने मिट्ठू को पुकार-कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन उद्यानों में घूम रहा होगा। अर्थात ताई तो उस दूसरे मिट्ठू को अपना मिट्ठू समझकर पुकार रही थी परन्तु उनका अपना मिट्ठू तो न जाने कहाँ उड़ गया था। जिसका उन्हें आभास भी नहीं था।
संवादहीन पाठ व्याख्या Samvadheen Lesson Explanation
प्रश्न – गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के सूने खंडहर में कौन एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे?
पाठ – गहरी साँस लेकर ताई कहतीं, “भगवान! कैसे नैया पार लगेगी?” और बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता मिट्ठू उत्तर देता, “राम-राम कहो, सीताराम कहो ।”
ताई दुहरातीं— सीताराम ! सीताराम !
ताई और मिट्ठू
मिट्ठू और ताई ।
अब ये ही दो प्राणी गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस सूने खंडहर में एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। पूत- परिवार, बहू- -बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय – ढोर, क्या नहीं था बड़े घर में! देखते ही देखते क्या से क्या हो गया! बहू-बेटे गाँव का मोह छोड़कर शहरों के होकर रह गए। बेटियाँ अपने-अपने हाथ पीले कराकर अपनी गृहस्थी में रम गईं, किसके भरोसे कारबार संभलता। धीरे-धीरे सब पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं, कारबार नहीं, तो नौकर-चाकर किस दम पर टिकते! अपनी अकेली जान के लिए ताई दो जून का एक जून चूल्हा फूँक लेतीं, व्रत-उपवास के बहाने चौका-चूल्हा टाल जातीं, पेट की समस्या उनके लिए कभी समस्या नहीं रही, पर सूने घर की भाँय- भाँय जैसे उन्हें काटने को दौड़ती थी।
शब्दार्थ –
दुहरातीं – बात को फिर से कहना
खंडहर – किसी टूटे फूटे या गिरे हुए मकान का बचा हुआ भाग
पूत – बेटा, लडका, पुत्र
ढोर – पालतू गोजातीय पशुओं के लिए प्रयुक्त शब्द, चौपाया, डंगर
मोह – प्यार
हाथ पीले कराना – शादी कराना
जून – समय
उत्तर / व्याख्या – लेखक ताई के अकेलेपन का वर्णन करता हुआ कहता है कि ताई गहरी साँस लेकर भगवान् से कहतीं कि कैसे नैया पार लगेगी? तो बंद पिंजड़े में अपने पंखों को फड़फड़ाता, उछल-कूद मचाता हुआ मिट्ठू उनकी बात का उत्तर देते हुए कहता कि राम-राम कहो, सीताराम कहो। ताई भी उसकी बात को हुई सीताराम ! सीताराम ! कहती थी। ताई और मिट्ठू। मिट्ठू और ताई । अब गाँव के बीच में स्थित बड़े घर के उस खाली टूटे-फूटे मकान में ये ही दो प्राणी एक-दूसरे को सहारा देने के लिए रह गए थे। लेखक बताते हैं कि ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। उनके इस बड़े घर में भी पुत्र – परिवार, बहू- -बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय – डंगर, सभी थे। परन्तु समय के साथ देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। बहू-बेटे गाँव का प्रेम छोड़कर शहरों में जा कर बस गए। बेटियाँ शादी करके अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गईं, गाँव में बसा कारबार किसके भरोसे संभलता। अर्थात गाँव के कारोबार को देखने वाला या संभालने वाला कोई नहीं रहा। धीरे-धीरे सब कारोबार पराए हाथों में चला गया। जब खेती-बाड़ी नहीं रही, कारबार नहीं रहा, तो नौकर-चाकर किस वजह से उनके पास रहते। अब अपनी अकेली जान के लिए ताई दो वक्त का भोजन एक वक्त चूल्हा जलाकर बना लेती थी। व्रत-उपवास के बहाने कई बार चौका-चूल्हा टाल देती थी। लेखक बताते हैं ताई के लिए पेट की समस्या अर्थात भोजन बनाने की समस्या, कभी समस्या नहीं रही, परन्तु खाली घर की भाँय- भाँय अब उनसे सहन नहीं हो पाती थी।
प्रश्न – ताई का अकेलापन किसने और कैसे दूर किया ?
पाठ – भला हो गनपत का, जिसने ताई के सूनेपन को सहारा दे दिया था, वह न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता मिट्ठू पर बरस पड़ी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही बेचैन रहने लगीं। जो ताई अपनी खातिर चूल्हा जलाने में आलस्य कर जाती थीं, वही अब नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं। मिट्टू के वक्त-बेवक्त के तकाजों के लिए रोटी बचाकर रखतीं। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हैं।
कुशाग्र बुद्धि छात्रउत्तर / व्याख्या – की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए पाठ को न केवल हू-ब-हू दुहरा देता बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और मौके बे-मौके ताई के सवालों का सटीक उत्तर दे देता। बड़े घर का सूनापन धीरे-धीरे मिट्ठू की बातचीत से अब रौनक में बदल गया था, अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ बच्चों को गोदी में उठाकर मिट्ठू से उनका मन बहलाने के लिए आ जुटतीं और घर गुलजार हो जाता। सुबह पौ फटने लगती, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं तो मिट्ठू भी जैसे ताई को भोर की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ शुरू कर देते-
हर हर गंगे !
हर हर गंगे !!
सीताराम बोल !
सीताराम बोल !!
मिट्ठू राम राम!
मिट्ठू राम राम !!
ताई अचकचाकर उठ बैठतीं । लाड़ से मिट्ठू को निहारकर आशीष देतीं— “जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ” और मिट्ठू भी बदले में अपनी बुजुर्गी दिखाकर कहते-
खुश रहो!
खुश रहो!!
शब्दार्थ –
सूनेपन – अकेलेपन
बेचैन – परेशान
बेवक्त – बिना वक्त के
तकाजों – आवश्यकता, इच्छा, अनुरोध, कोई काम करने के लिए किसी से बार-बार कहना, माँगना
कुशाग्र – तीव्र, कुश की नोंक जैसा तीक्ष्ण
हू-ब-हू – जैसे को तैसा
सटीक – बिलकुल सही
पौ फटना – प्रातः काल का प्रकाश, तड़का होना
अचकचाकर – भौचक्का होना, चौंक उठना
उत्तर / व्याख्या – लेखक उस गनपत नाम के व्यक्ति का भला मानते हैं, जिसने ताई के अकेलेपन को सहारा देने के लिए न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता अब उस मिट्ठू तोते पर बरस पड़ी थी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही परेशान रहने लगीं थी। जो ताई अपनी लिए चूल्हा जलाने में आलस कर जाती थीं, वही अब बिना आलस किए पूरे नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं थी। साथ ही साथ मिट्टू की वक्त-बेवक्त की आवश्यकता या इच्छा के लिए रोटी भी बचाकर रख लेती थी। अब ताई को इस बात की पूरी जानकारी रहने लगी थी कि किसके खेत में हरी मिर्चें तैयार हो गई हैं और किस पेड़ में फसल के आखिरी अमरूद बचे हुए हैं। अर्थात मिट्ठू के आने के बाद ताई को मिट्ठू की सभी पसंद की चीजों का ख्याल रहने लगा था।
तेज़ दिमाग वाले बच्चे की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए गए पाठ को न केवल ताई की ही तरह जैसे का तैसा दुहरा देता था बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और जब भी मौका मिलता ताई के सवालों का बिलकुल सही उत्तर दे देता था। ताई के बड़े घर का अकेलापन अब धीरे-धीरे मिट्ठू की बातचीत से रौनक में बदल गया था, अड़ोस-पड़ोस की बहू-बेटियाँ अपने बच्चों को गोदी में उठाकर मिट्ठू से मिलाने आती थी ताकि बच्चों का मन बहल सके। इससे ताई का घर मानो गुलजार हो जाता था। सुबह के समय जैसे ही प्रकाश फैलने लगता था, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं थी तो मिट्ठू भी जैसे ताई को सुबह की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ हर हर गंगे ! हर हर गंगे !! सीताराम बोल ! सीताराम बोल !! मिट्ठू राम राम! मिट्ठू राम राम !! शुरू कर देते थे। मिट्ठू की आवाज सुनकर ताई चौंककर उठ बैठतीं थी। प्यार से मिट्ठू को देखकर आशीर्वाद देते हुए कहती थी कि जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ और मिट्ठू भी बदले में अपने आप को ताई की तरह बुजुर्ग दिखाते हुए ताई को आशीर्वाद देता था खुश रहो! खुश रहो!!
प्रश्न – ताई मिट्ठू को अपने पुराने दिनों के बारे में क्या-क्या बताती थी ?
पाठ – ताई निहाल हो जातीं। वृद्धावस्था का शरीर और उस पर नई गृहस्थी का भार, काम-काज से थककर ताई जब कभी पिंजरे को बगल में रखकर सुस्ताने लगतीं तो अनायास ही मिट्ठू से सवाल कर बैठतीं, “मिट्ठू! अब कैसे कटेगी?” और नौजवान मिट्ठू ताई के बुढ़ापे का सहारा बनकर दम-खम के साथ उन्हें दिलासा देते-
कटेगी! कटेगी !! कटेगी !!!
ताई के थके शरीर में प्राण लौट आते, और तब उस अलस दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। वैभव और सत्ता के बीते दिनों की गाथा । काल की अतल गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा ताई को नए-नए प्रसंगों की याद दिला देता- जमींदार साहब का रोबीला चेहरा, उनके उपकारों से दबी प्रजा के अनगिनत चेहरे, वे हाथी, वे घोड़े, वे खेल-तमाशे, वे ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, जन्म और मृत्यु- पर्व, वे भोज, वे दावतें, जमींदार साहब के दरबार की रौनक, उनकी गुणग्राहकता, उनकी तुनकमिजाजी, उनका गुस्सा, उनके इशारे पर मर मिटने वाले लोग … ताई घंटों तक मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाती रहतीं और वह अपनी गर्दन टेढ़ी कर कभी धैर्यवान श्रोता बना रहता और कभी अपनी समझ के अनुसार बीच-बीच में कुछ टीका-टिप्पणी कर देता ।
ऐसा नहीं कि ताई और मिट्ठू का संवाद हमेशा प्रेमपूर्ण ही रहता हो, कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!” फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
शब्दार्थ –
निहाल – प्रसन्न, हर तरह से तृप्त
अनायास – अचानक
वैभव – ऐश्वर्य, महिमा, प्रभुत्व
सत्ता – अस्तित्व, यथार्थता, अधिकार, प्रभुत्व, प्रभुसत्ता
अतल – अथाह, तलहीन
प्रसंग – प्रकरण, संबंध, विषय का तारतम्य, एक प्रकार की संगति, लगाव
रोबीला – प्रभावशाली
गुणग्राहकता – क़दर जानने या करने की क्रिया
तुनकमिजाज – जो झटपट या छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाए, नाजुक मिजाज, चिड़चिड़ा
संवाद – बातचीत
खीझ – क्रोध
मान-मनौवल – मनौती, रूठने और मनाने की क्रिया
उत्तर / व्याख्या – मिट्ठू की बातों से ताई प्रसन्न हो जातीं। ताई का का शरीर अब वृद्धावस्था में आ चूका था और उस पर मिट्ठू के साथ नई गृहस्थी का भार और काम-काज से थककर ताई जब कभी मिट्ठू के पिंजरे को बगल में रखकर थोड़ा सुस्ताने लगतीं या आराम करने लगती, तब अचानक ही मिट्ठू से सवाल कर बैठतीं, कि अब जिंदगी कैसे कटेगी? और उनके इस प्रश्न का उत्तर नौजवान मिट्ठू ताई के बुढ़ापे का सहारा बनकर दम-खम के साथ उन्हें दिलासा देते हुए कहता कि कटेगी! कटेगी !! कटेगी !!! मिट्ठू की बातों से ताई के थके शरीर में मानो प्राण लौट आते, और तब उस अलस भरी दोपहरी में ताई मिट्ठू को अपनी राम-कहानी सुनाने लगतीं। अर्थात अपने बीते दिनों के ऐश्वर्य और अपनी प्रभुसत्ता के दिनों की कहानी सुनाने लगती। समय की अथाह गहराइयों से झाँकता एक-एक चेहरा ताई को नए-नए संबंधों अथवा विषयों की याद दिला देता। जैसे – ताई के पति जमींदार साहब का रोबीला चेहरा, उनके द्वारा किए गए उपकारों से दबी प्रजा के अनगिनत चेहरे, हाथी, घोड़े, खेल-तमाशे, ब्याह-शादियाँ, तीज-त्योहार, जन्म और मृत्यु – पर्व, भोज, दावतें, जमींदार साहब के दरबार की रौनक, उनकी क़दर जानने या करने की प्रवृति, उनका छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाना, उनका गुस्सा, उनके इशारे पर मर मिटने वाले लोग इत्यादि किस्सों को याद करते हुए ताई घंटों तक मिट्ठू को अपनी जीवन-गाथा सुनाती रहतीं थी। और मिट्ठू भी अपनी गर्दन टेढ़ी कर के कभी धैर्यवान श्रोता बना रहता और कभी अपनी समझ के अनुसार बीच-बीच में कुछ टीका-टिप्पणी कर देता । अर्थात ताई मिट्ठू से अपनी यादों को सांझा करती और मिट्ठू भी उनकी बातों को ध्यान से सुनता और बीच-बीच में कुछ कहता भी जाता।
लेखक बताते हैं कि ऐसा बिलकुल नहीं है कि ताई और मिट्ठू के बीच होने वाली बातचीत हमेशा प्रेमपूर्ण रहती हो, कभी-कभी ताई जब काम से थक कर लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देता। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देता, तो गुस्से से ताई उसे कोसतीं कि वह उनकी जान खाने के लिए आ गया है, मर जा! और मिट्ठू भी उतने ही गुस्से के साथ ताई पर हमला बोलते हुए ताई की बात को दोहराता कि मर जा ! मर जा ! मर जा! कुछ समय बाद फिर रूठने-मनाने का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।अर्थात ताई और मिट्ठू में कभी-कभी आपस में रूठने और मनाने की प्रक्रिया चली रहती।
प्रश्न – ताई के समक्ष क्या धर्म-संकट आ गया था और उसका निवारण कैसे हुआ?
पाठ – ताई को घड़ी-भर के लिए भी मिट्ठू का वियोग सहन नहीं हो सकता था। कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी न्यौते – बुलावे में जातीं, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की साँकलें टोहकर देखतीं, कंजूस के धन की तरह मिट्ठू को छिपाकर रखतीं और जल्दी लौट आने का दिलासा देकर देहरी से पाँव बाहर निकालतीं। लेकिन एक संयोग आ पड़ा कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस लोक में ताई ने बहुत ऊँच-नीच देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी मन में घर कर जाती । गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, अच्छा साथ बन रहा था। प्रयाग में कुंभ-स्नान का लोभ जहाँ उन्हें अपनी ओर खींच रहा था, वहीं मिट्ठू की चिंता अपनी ओर खींच रही थी। हँसी-हँसी में किसी ने सलाह दी, “ताई, मिट्ठू को भी साथ ले चलो, उसे भी गंगा स्नान करा देना।” किसी दूसरे ने टोक दिया कि रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, आखिर वह भी तो बोलता – बतियाता प्राणी है। ताई पशोपेश में पड़ गईं। टिकट का पैसा भी वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था, अंत में जगन मास्टर की घरवाली ने उनकी चिंता दूर कर दी। वह ताई के लौटने तक मिट्ठू को अपने पास रखने के लिए सहमत हो गई थी। विदा के दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुकती थी। बार-बार वह मिट्ठू को पुचकारतीं, जल्दी लौट आने का दिलासा देतीं। मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में ‘हर हर गंगे’, ‘राम राम सीताराम’ कहकर उन्हें भरोसा देते रहे कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेंगे।
शब्दार्थ –
घड़ी-भर – थोड़ी देर के लिए
वियोग – विच्छेद, विरह, अभाव, छुटकारा
साँकल – जंजीर, सिकड़ी, श्रृंखला
टोह – खोज, अनुसंधान, पता, देखभाल
दिलासा – तसल्ली, ढाढस, आश्वासन, धैर्य, प्रबोध
देहरी / देहली – दरवाजे की चौखट में नीचे वाली लकड़ी जिसे लाँघकर घर में घुसते-निकलते हैं, देहली पर रखा हुआ
संयोग – आकस्मिक रूप से आने वाली वह स्थिति जिसमें एक घटना के साथ ही दूसरी घटना भी घटित हो
बतियाता – बात करने वाला
पशोपेश – सोच विचार, दुबिधा, अंदेश
उत्तर / व्याख्या – लेखक बताते हैं कि ताई को थोड़ी देर के लिए भी मिट्ठू से बिछड़ना सहन नहीं हो सकता था। जब कभी-कभार गाँव में थोड़ी देर के लिए भी किसी के घर न्यौते – बुलावे में जातीं थी, तो दस बार खिड़की-दरवाजों की जंजीरों को अच्छे से संभालकर देखतीं थी, जिस तरह कंजूस अपने धन को छिपा कर रखता है ताई भी उसी तरह मिट्ठू को छिपाकर रखतीं थी और जल्दी लौट आने की तसल्ली देकर ही घर की दहलीज़ से पाँव बाहर निकालतीं थी। कहने का आशय यह है कि ताई किसी भी हाल में मिट्ठू से दूर नहीं रहना चाहती थी। लेकिन एक ऐसी स्थिति आ पड़ी कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस संसार में ताई ने बहुत अच्छे-बुरे दिन देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी ताई के मन में घर कर जाती थी। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, ताई का भी उनके साथ अच्छा साथ बन रहा था। एक ओर तो प्रयाग में कुंभ-स्नान का लालच ताई को अपनी ओर खींच रहा था, वहीं दूसरी ओर मिट्ठू की चिंता उन्हें अपनी ओर खींच रही थी। उनकी चिंता पर किसी ने हँसी-हँसी में उन्हें सलाह दी कि वे मिट्ठू को भी साथ ले चलें। उसे भी गंगा स्नान करा देना। वहीं किसी दूसरे ने टोक दिया कि रेलगाड़ी में उसका भी टिकट लगेगा, क्योंकि आखिर कार वह भी तो बात करने वाला प्राणी है। ताई सब की बात सुनकर सोच-विचार में पड़ गईं। यदि केवल टिकट का पैसे की बात होती तो वह मिट्ठू की खातिर खर्च कर देतीं लेकिन मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में उसकी सुरक्षा के बारे में उन्हें पूरा भरोसा नहीं था। अंत में उनकी चिंता जगन मास्टर की घरवाली ने दूर कर दी। वह ताई के लौटने तक मिट्ठू को अपने पास रखने के लिए मान गई थी। जब जाने का समय आया तो उस दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुक रही थी। बार-बार वह मिट्ठू को प्यार-दुलार कर रही थी, जल्दी लौट आने की सांत्वना देती जा रही थी। और मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में ‘हर हर गंगे’, ‘राम राम सीताराम’ कहकर मानो उन्हें भरोसा दे रहा था कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेगा।
प्रश्न – जगन मास्टर के लिए मिट्ठू की कौन सी यातना असह्य हो गई थी और उन्होंने कैसे उसका निवारण किया ?
पाठ – ताई तो कुंभ-स्नान के लिए चल दीं। लेकिन जगन मास्टर के घर में महाकुंभ हो गया ।
अपने पति से सलाह लिए बिना मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था। जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे। स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती। जब-जब मिट्टू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।
जगन मास्टर के लिए जब मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्टू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें। मिट्टू अब पिंजरे में रहने के इतने आदी हो चुके थे कि उन्होंने बाहर आने की कोई इच्छा नहीं प्रकट की । जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे। निकट ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लेकर पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर उसे देखते रहे। मिट्ठू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने संतोष की साँस ली। मिट्टू फिर पिंजरे की छत पर बैठ गए। एक दो घंटे बाद जगन मास्टर ने उन्हें पकड़कर फिर पिंजरे में बंद कर दिया और चैन की साँस लेकर पिंजरे को बरामदे में टाँग दिया।
शब्दार्थ –
सलाह – परामर्श, राय
मिजाज – स्वभाव, तबीयत, प्रकृति, आदत, गर्व, घमंड
भरसक – पूरी तरह से
बेचैनी – परेशानी
यातना – बहुत अधिक कष्ट, तकलीफ, पीड़ा
असह्य – जो सहन न हो
प्रायश्चित – शोधन, वह शास्त्र – विहित कर्म जो पाप का मार्जन करने के लिए किया जाए
उत्तर / व्याख्या – मिट्ठू को जगन मास्टर की घरवाली के भरोसे छोड़कर ताई तो कुंभ-स्नान के लिए चली गई। लेकिन जगन मास्टर के घर में महाकुंभ हो गया । क्योंकि
अपने पति से परामर्श किए बिना ही मास्टराइन ने ताई का भार अपना लिया था। जगन मास्टर थोड़े दूसरे स्वभाव के व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन में अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और वे पूरा प्रयास करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे। वे बहुत ही स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति थे। वे कभी भी दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। जिस कारण पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें परेशानी होने लगती थी। जब-जब वे मिट्टू को देखते, तब-तब अपनी पत्नी की बुद्धि पर उन्हें तरस आता और अपने आप को भी वे दोषी अनुभव करते। कहने का तात्पर्य यह है कि जगन मास्टर किसी को भी कैद में नहीं देख सकते थे जिस कारण उन्हें मिट्ठू को पिंजरे में कैद देखकर परेशानी होती थी। जब जगन मास्टर के लिए मिट्ठू का कैद में रखे हुए देखना सहन नहीं हुआ , तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्टू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि मिट्ठू कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आ सके और उसे यह मौका देकर जगन मास्टर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लेना चाहते थे। परन्तु मिट्टू को अब पिंजरे में रहने की इतनी आदत हो चुकी थी कि उसने बाहर आने की कोई इच्छा प्रकट नहीं की। परन्तु जगन मास्टर ने भी पक्का इरादा कर लिया था। उनके नजदीक ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लिया और पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर मिट्ठू की हरकते देखते रहे। मिट्ठू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने थोड़ी चैन की साँस ली। फिर मिट्टू पिंजरे की छत पर बैठ गया। एक दो घंटे बाद जगन मास्टर ने मिट्ठू को पकड़कर फिर पिंजरे में बंद कर दिया और चैन की साँस लेकर पिंजरे को बरामदे में टाँग दिया। कहने का तात्पर्य यह है कि जगन मास्टर किसी को भी कैद में नहीं देख सकते थे। इसलिए उन्होंने मिट्ठू को बंद कमरे में खुला छोड़ने का निर्णय लिया ताकि वे मिट्ठू को अपने घर में कैद होने के दोष का प्रायश्चित कर सकें।
प्रश्न – ऐसी कौन सी अनहोनी घटना घट गई थी जिससे सभी परेशान हो गए थे ?
पाठ – अब जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करते। मिट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण देते और उनकी आजादी का सुख स्वयं भोगते। यह क्रम तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिट्टू की नजर ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज कौतूहलवश वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने लक्ष्य की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच लिए। जगन मास्टर का ध्यान अचानक ‘गीता-रहस्य’ से हटकर मिट्टू के पंखों की फड़फड़ाहट पर गया, फिर रोशनदान पर बैठे मिट्ठू पर। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर ‘आ-आ’ की गुहार लगा ही रहे थे कि मिट्टू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और ये गए ! वो गए!! अकेले मिट्टू क्या उड़े, आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते उड़ गए। ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास, ‘मिट्ठू आ! मिट्ठू आ!!’ पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख तौलने में मशगूल रहे।
ताई के लौटने का दिन निकट आ रहा था। गाँव में सभी के मन में इस अनहोनी घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे दिया था। ताई के तेज स्वभाव के अतिरिक्त मिट्ठू के प्रति उनके लगाव को सभी जानते थे और लौटकर मिट्ठू को न पाने पर उनकी क्या दशा हो सकती है, इसका अनुमान वे भली-भाँति लगा सकते थे। बहुत सोच-विचार के बाद आखिर गनपत ने ही एक सुझाव दिया कि मिट्ठू की ही सूरत शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जाए, ताकि ताई को भ्रम में रखा जा सके और दूसरे दिन सच ही वह तोता लेकर हाजिर हो गया।
शब्दार्थ –
कौतूहलवश – उत्सुकता, अचंभा, कुतूहल, त्योहार, उत्सव
गुहार – पुकार
हाथ के तोते उड़ना (मुहावरा) – घबरा जाना
मशगूल – कार्यरत, किसी काम या शगल में लगा हुआ
अनहोनी – जो संभव न हो, असंभव
भ्रम – धोखा
उत्तर / व्याख्या – लेखक बताते हैं कि अब जगन मास्टर हर रोज कमरा बंद करके मिट्ठू को बाहर आने का आमंत्रण देते और उसकी आजादी का आनंद खुद लेते। यह सब केवल तीन-चार दिन तक चला ही था कि एक दिन मिट्टू की नजर कमरे में ऊपर खुले रोशनदान पर पड़ गई और सहज उत्सुकता के कारण वह पिंजरे की छत से तिरछी आँख अपने रोशनदान की ओर देखकर रोशनदान पर पहुँच गया। जगन मास्टर ‘गीता-रहस्य’ पढ़ रहे थे। मिट्टू के पंखों की फड़फड़ाहट सुनकर अचानक उनका ध्यान ‘गीता-रहस्य’ से हटकर मिट्ठू के पंखों की फड़फड़ाहट की ओर गया, और फिर उन्होंने रोशनदान पर बैठे मिट्ठू को देखा। जगन मास्टर हाथ में अनाज लेकर ‘आ-आ’ की पुकार लगाकर मिट्ठू को बुला ही रहे थे कि मिट्टू ने फिर तिरछी आँख से रोशनदान के बाहर की दुनिया की ओर देखा और फिर बाहर की ओर उड़ चला। इस समय मिट्टू अकेला नहीं उड़ा, मिट्ठू के साथ-साथ आदर्शवादी जगन मास्टर के हाथों के सभी तोते भी उड़ गए। अर्थात मिट्ठू को बाहर उड़ता देख कर जगन मास्टर बुरी तरह घबरा गए। अपनी ढीली धोती को दोनों हाथों से सँभालते हुए वह बाग में एक पेड़ से दूसरे पेड़ के पास मिट्ठू को पुकारते हुए पसीना-पसीना होते रहे और मिट्ठू एक डाल से दूसरी डाल पर, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर अपने पंख को फैलाने में पूरी तरह व्यस्त था। अर्थात मिट्ठू जगन मास्टर की पहुँच से दूर उड़ गया। ताई के लौटने का दिन नजदीक आ रहा था। गाँव में सभी के मन में इस असंभव घटना ने एक गहरी आशंका को जन्म दे दिया था। ताई के तेज स्वभाव के साथ – साथ सभी लोग ताई का मिट्ठू के प्रति लगाव व् प्रेम को जानते थे और जब वे लौटकर मिट्ठू को नहीं देखेंगी तो उनकी क्या स्थिति हो सकती है, इसका अंदाजा वे सभी भली-भाँति लगा सकते थे। इस समस्या पर बहुत सोच-विचार करने के बाद आखिर में गनपत ने ही एक उपाय सुझाया कि मिट्ठू की ही सूरत शक्ल का एक दूसरा तोता ले आया जा सकता है, ताकि ताई को धोखे में रखा जा सके और दूसरे दिन सच ही वह तोता लेकर हाजिर भी हो गया। अर्थात मिट्ठू के उड़ जाने से कहीं ताई को बूरा न लगे इसके लिए मिट्ठू की तरह दूसरे तोते को लाया गया।
प्रश्न – मिट्ठू की तरह दिखने वाले तोते को मिट्ठू की तरह बनाने में जगन मास्टर ने क्या प्रयास किए ? क्या वे सफल हुए ?
पाठ – अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हुआ। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि ताई के आने तक वह भी दो अक्षर सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिट्ठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि गंगा-स्नान का पुण्य अर्जन कर लौटी हुई ताई अपने मिट्ठू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन वह अनहोनी हो गई और अब जगन मास्टर अपनी फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़कर घंटों पिंजरे के सामने बैठकर रटते-
मिट्ठू, राम राम
सीताराम सीताराम
हर गंगे, हर गंगे
राम राम, सीताराम
बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, मास्टराइन भोजन ठंडा होने की शिकायत करतीं, तो आग्नेय दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर दुहराते –
राम राम
सीताराम, हर गंगे…..
फिर खीझकर कहते — मर जा ! मर जा !!
पर वह पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो ।
कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पहुँचीं । ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ बैठे एवजी मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर ताकता रहा।
ताई अपने मिट्ठू को गुहार कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन अमराइयों में घूम रहा होगा।
शब्दार्थ –
अर्जन – कमाना, संग्रह करना
एवजी – बदले में काम करने वाला, स्थानापन्न
आग्नेय – अग्नि से उत्पन्न, अग्नि जैसा, अग्नि-संबंधी, अग्नि को अर्पित
अमराइयों – उद्यानों
उत्तर / व्याख्या – मिट्ठू की तरह दिखने वाले तोते के साथ अब जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हो गया था। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि जब तक ताई आए तब तक वह भी मिट्ठू की तरह दो अक्षर बोलना सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिट्ठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि जब ताई गंगा-स्नान का पुण्य कमाकर लौट आए तो अपने मिट्ठू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन मिट्टू के उड़ जाने वाली असंभव घटना घट गई और अब जगन मास्टर ने इस बात की फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़ दिया था और घंटों पिंजरे के सामने बैठकर उस तोते को रटते रहते – मिट्ठू, राम राम , सीताराम सीताराम, हर गंगे, हर गंगे , राम राम, सीताराम। बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता, और मास्टराइन उनसे भोजन ठंडा होने की शिकायत करतीं, तो आग की तरह तेज़ दृष्टि से उनकी ओर देखकर पानी पीकर फिर से दुहराने लगते – राम राम, सीताराम, हर गंगे…. फिर कभी गुस्से में आकर कहते – मर जा ! मर जा !! पर वह दूसरा तोता पिंजरे के अंदर से टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता या शायद उनकी बेवकूफी पर हँसता रहता हो। अर्थात जगन मास्टर अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे थे कि वह दूसरा तोता भी मिट्ठू की तरह कुछ बोलना सीख ले ताकि ताई को कुछ पता न चले। परन्तु तोता कुछ भी नहीं बोल रहा था।
कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे अपने बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पर पहुँच गई। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, और पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ पिंजरे में मिट्ठू की जगह बैठे दूसरे मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर देखता रहा।
ताई अपने मिट्ठू को पुकार-कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन उद्यानों में घूम रहा होगा। अर्थात ताई तो उस दूसरे मिट्ठू को अपना मिट्ठू समझकर पुकार रही थी परन्तु उनका अपना मिट्ठू तो न जाने कहाँ उड़ गया था। जिसका उन्हें आभास भी नहीं था।
Samvadheen FAQs
प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ संवादहीन के लेखक कौन हैं?
उत्तर- कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज के पाठ दो बैलों की कथा के लेखक शेखर जोशी हैं।
प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ संवादहीन का विषय क्या है?
उत्तर- संवादहीन’ पाठ में लेखक ताई और मिट्ठू के सम्बन्ध को उजागर करते हैं। लेखक ने पाठ में ताई के अकेलेपन और उस अकेलेपन को दूर करने वाले मिट्ठू से ताई के लगाव, स्नेह, उसे प्रति ज़िम्मेदारी , ताई और मिट्ठू के बीच के सम्बन्ध और ताई और मिट्ठू के वियोग का मार्मिक वर्णन किया है।
प्रश्न: ‘संवादहीन’ किस विषय पर आधारित है?
उत्तर- शेखर जोशी जी द्वारा लिखित यह कहानी “संवादहीन” ग्रामीण वृद्ध स्त्री के अकेलेपन की संवेदनशील कहानी है। कहानी के दो मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू ताई के लिए केवल एक तोता नहीं बल्कि संवाद का माध्यम और ममता का केंद्र है। इन दोनों के बीच कभी प्रेमपूर्ण संवाद है तो कभी नोक-झोंक भी रहती है। मनुष्य और पशु-पक्षी के संबंधों को दर्शाने के साथ ही यह कहानी समकालीन जीवन- यथार्थ की विसंगतियों, जैसे- पलायन, अकेलेपन और आदर्श एवं यथार्थ के द्वंद्व को अभिव्यक्त करती है।