CBSE Class 9 Hindi Chapter 5 Aakhri Chattan Tak आखिरी चट्टान तक Question Answers (Important) from Ganga Book
Class 9 Hindi Aakhri Chattan Tak Question Answers and NCERT Solutions– Looking for Aakhri Chattan Tak question answers for CBSE Class 9 Hindi Ganga Book Chapter 5? Look no further! Our comprehensive compilation of important question answers will help you brush up on your subject knowledge.
सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी गंगा के पाठ 5 आखिरी चट्टान तक प्रश्न उत्तर खोज रहे हैं? आगे कोई तलाश ना करें! महत्वपूर्ण प्रश्नों का हमारा व्यापक संकलन आपको अपने विषय ज्ञान को बढ़ाने में मदद करेगा। कक्षा 9 के हिंदी प्रश्न उत्तर का अभ्यास करने से परीक्षा में आपके प्रदर्शन में काफी सुधार हो सकता है। हमारे समाधान इस बारे में एक स्पष्ट विचार प्रदान करते हैं कि उत्तरों को प्रभावी ढंग से कैसे लिखा जाए। हमारे आखिरी चट्टान तक प्रश्न उत्तरों को अभी एक्सप्लोर करें उच्च अंक प्राप्त करने के अवसरों में सुधार करें।
- Aakhri Chattan Tak NCERT Solutions
- Aakhri Chattan Tak Extract Based Questions
- Aakhri Chattan Tak Multiple Choice Questions
- Aakhri Chattan Tak Extra Question Answers
Related:
Aakhri Chattan Tak Chapter 5 NCERT Solutions
रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा ?
(क) विवेकानंद चट्टान से
(ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
(ग) पच्छिमी क्षितिज से
(घ) सैंड हिल से
उत्तर – (ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से
तर्क – लेखक जब सैंड हिल पर पहुँचता है तब उसे आगे और भी ऊँचे टीले दिखाई देते हैं। सूर्योदय को और अधिक स्पष्ट और सुन्दर तरीके से देखने के लिए वह आगे के टीलों पर जाता है। हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया।
2. मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ।” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है?
(क) मौन हो जाना
(ख) विस्मित हो जाना
(ग) भ्रमित हो जाना
(घ) आशंकित होना
उत्तर – (ख) विस्मित हो जाना
तर्क – जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। उसे देखकर लेखक को ऐसा लग रहा था कि उसके दूसरी और कोई छोर ही न हो। तीनों ओर के क्षितिज को अपनी आँखों में समेटता हुआ लेखक कुछ देर यह भी भूला रहा कि वह एक जीवित व्यक्ति है, जो दूर से कन्याकुमारी की यात्रा करने आया यात्री है , एक दर्शक है। उस दृश्य के बीच में लेखक जैसे उसी दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा।
3. “मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है?
(क) करुणा
(ख) विनम्रता
(ग) आत्मीयता
(घ) संतुष्टि
उत्तर – (घ) संतुष्टि
तर्क – लेखक ने बहुत कोशिश करके उस आखरी टीले पर चढ़ाई की थी। जब लेखक टीले पर पहुंचा तब सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपनी कोशिश की सफलता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर इस तरह बैठ गया था जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और सिर्फ लेखक ने, उस चोटी पर पहली बार विजय हासिल की हो।
4. “शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है–
(क) बलखाती लहरों का
(ख) सागर की व्यापकता का
(ग) सूर्यास्त के दृश्य का
(घ) पच्छिमी क्षितिज का
उत्तर – (ख) सागर की व्यापकता का
तर्क – जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। उसे देखकर लेखक को ऐसा लग रहा था कि उसके दूसरी और कोई छोर ही न हो।
5. लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि-
(क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है।
(ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
(ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है।
(घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।
उत्तर – (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है।
तर्क – लेखक ने अपनी यात्रा का वर्णन केवल स्थान तक सिमित नहीं रखा। लेखक ने समुद्र, लहरों, टीलों , चट्टानों ,सूर्योदय व् सूर्यास्त का गहरी भावनाओं व् अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत किया। कहीं लेखक डर जाता है, कहीं विस्मित हो जाता है, कहीं लेखक के मन में संतुष्टि का अनुभव होता है। इन सभी से यह यात्रा वृत्तांत जीवंत व् वास्तविक लगता है।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए-
1. यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
उत्तर – सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो लेखक को दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो अरब सागर के विस्तार को रोक कर खड़ा था। लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार से पृष्ठभूमि पर देख सके, इसके लिए वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था। वह रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता हुआ वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए लेखक ने एक के बाद एक कई टीले पार किए। हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी कल्पना लेखक कर रहा था। यही कारण था कि यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा।
2. लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
उत्तर – कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी है और उनमें कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य काम नौकरियों के लिए आवेदन देना और आपस में बैठकर बहस करना है। वे आजीविका के लिए फोटो एल्बम बेचने जैसे छोटे-मोटे काम करते हैं। वे लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं।
3. “अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर – “अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से लेखक का अभिप्राय यह है कि हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी कल्पना लेखक कर रहा था। उस टीले से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह उस टीले से समुद्र में उतरने का कोई रास्ता हो। जब लेखक टीले पर पहुंचा तब सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपनी कोशिश की सफलता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर इस तरह बैठ गया था जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और सिर्फ लेखक ने, उस चोटी पर पहली बार विजय हासिल की हो।
4. यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
उत्तर – कन्याकुमारी की यात्रा-वृत्तांत में अनेक दृश्यों का अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था। जैसे – अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के समागम या मिलान का स्थान लेखक के लिए अनोखा था। लेखक ने शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति को महसूस किया। जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। तीनों ओर के क्षितिज को अपनी आँखों में समेटता हुआ लेखक कुछ देर यह भी भूला रहा कि वह एक जीवित व्यक्ति है, जो दूर से कन्याकुमारी की यात्रा करने आया यात्री है , एक दर्शक है। समुद्री रेत के कई अनाम रंगों को देखना भी लेखक के लिए किसी रोमांच से कम नहीं था। “विवेकानंद चट्टान तक नाव से पहुँचने का अनुभव लेखक के लिए विस्मर्णीय था।
5. यात्रा वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
उत्तर – यात्रा वृत्तांत से ऐसे दो अंश निम्नलिखित हैं जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है-
पहला अंश वह है जब लेखक सभी यात्रियों के साथ ‘सैंड हिल’ पर पहुंचा परन्तु वहाँ से सूर्यास्त देखने में उसे संतुष्टि का अनुभव नहीं हुआ। इसलिए और अधिक आकर्षक दृश्य देखने के लिए लेखक ने एक के बाद एक टीलों को पार करने का फैसला किया जब तक वह आखरी टीले तक नहीं पहुँच गया। ” टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था।” यह वाक्य लेखक की मानसिक दृढ़ता को दर्शाता है।
दूसरा अंश वह है जब समुद्र का पानी बढ़ने लगता है और लेखक को खतरे का आभास होता है। उस समय लेखक घबराता नहीं बल्कि हिम्मत जुटाकर आगे बढ़ता है। “मैं दौड़ने लगा। दो-एक और लहरें पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। मैंने जूता उतारकर हाथ में ले लिया। एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो।” इस वाक्य से लेखक के हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
क्रिया-विशेषण की पहचान और रेखांकन
“समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी । ”
उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पद ‘धीरे-धीरे’ कम होना क्रिया की विशेषता बता रहा है। यहाँ कम होने की क्रिया धीमी गति से हो रही है।
जिस प्रकार संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं, उसी प्रकार क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द ‘क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इस वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ पद व्याकरणिक दृष्टि से क्रिया-विशेषण है।
नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनमें क्रिया-विशेषण पदों की पहचान कीजिए तथा दिए गए उदाहरण के अनुसार लिखिए।
वाक्य
(क) बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।
(ख) यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं।
(ग) मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा।
उदाहरण-
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
| मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। | जल्दी-जल्दी | ‘चलने लगा’ क्रिया की विशेषता |
उत्तर –
| वाक्य | क्रिया-विशेषण | क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है |
| बल खाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं। | कटती हुई | आती थीं |
| यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। | उस दिशा में | जा रही थीं |
| मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। | देर तक | देखता रहा |
आओ नए वाक्य बनाएँ
पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों का अर्थ बताते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
वाक्य
तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी पानी था।
पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे।
दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी।
पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी।
सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी।
उत्तर –
| वाक्य | रेखांकित शब्दों का अर्थ | नए वाक्य |
| तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी पानी था। | वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं, दृष्टि – सीमा | दूर क्षितिज पर ऐसा लगता है जैसे आसमान और धरती एक साथ मिल रहे हों। |
| पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। | समूह, मंडली | पहाड़ों में पेड़ों के झुरमुटों में कई जानवरों का निवास होता है। |
| दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी। | वह जगह जो बराबर नीची होती चली गयी हो | पहाड़ी ढलानों को सफलता पूर्वक पार करना हर किसी के बस में नहीं होता। |
| पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी। | श्रेणी, कतार | हिमालय की पहाड़ियों की श्रृंखला दूर तक फैली होने के कारण अत्यंत आकर्षक लगती है। |
| सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। | ऊबड़-खाबड़, विकट, विभक्त | रेगिस्तान के बीहड़ों को पार करना बहुत मुसीबत का काम है। |
Class 9 Hindi Aakhri Chattan Tak – Extract Based Questions (गद्यांश पर आधारित प्रश्न)
1 –
कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि।
केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से उभरी स्याह चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा । पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के संगम-स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगायी थी, हर तरफ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था— शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा- बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया । मैंने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।
प्रश्न 1 – सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि किसे कहा गया है?
(क) सैंड हील
(ख) कन्याकुमारी
(ग) आखरी चट्टान
(घ) विवेकानंन्द चट्टान
उत्तर – (ख) कन्याकुमारी
प्रश्न 2 – लेखक देर तक क्या देखता रहा?
(क) आखिरी चट्टान
(ख) सूर्योदय
(ग) सूर्यास्त
(घ) समुद्री लहरों
उत्तर – (क) आखिरी चट्टान
प्रश्न 3 – तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता लेखक कुछ देर क्या भूला रहा?
(क) कि वह एक जीवित व्यक्ति है
(ख) कि वह दूर से आया यात्री है
(ग) कि वह एक दर्शक है
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी
प्रश्न 4 – अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के संगम-स्थल के रूप में किसे बताया गया है?
(क) आखरी चट्टान को
(ख) कन्याकुमारी को
(ग) आखरी भूभाग को
(घ) आखरी भू स्थली को
उत्तर – (क) आखरी चट्टान को
प्रश्न 5 – लेखक का पूरा शरीर क्यों सिहर गया?
(क) जब लेखक ने अपनी आँखों से सूर्योदय का अद्धभुत नजारा देखा
(ख) जब लेखक ने सूर्यास्त का दृश्य देखा
(ग) जब लेखक ने अपनी चट्टान को बढ़ते पानी में घिरा पाया
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (ग) जब लेखक ने अपनी चट्टान को बढ़ते पानी में घिरा पाया
2 –
यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। हम लोग टीले पर पहुँच गए। यह वह ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा मैं वहाँ पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे। आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति। वे शायद सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी । कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ बैठ गईं— उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह। उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया – वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो । सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया- ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो।
प्रश्न 1 – यात्रियों की टोलियाँ सूर्यास्त देखने कहाँ जा रही थीं?
(क) सैंड हिल
(ख) आखरी चट्टान
(ग) विवेकानंद चट्टान
(घ) आखरी टीले
उत्तर – (क) सैंड हिल
प्रश्न 2 – सैंड हिल पर बैठी युवतियाँ कैसी लग रही थी?
(क) कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ फूलों की तरह
(ख) कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बूंदों की तरह
(ग) कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह
(घ) कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ पत्तियों की तरह
उत्तर – (ग) कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह
प्रश्न 3 – लेखक कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे टीले की तरफ क्यों चल दिया?
(क) सूर्योदय पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके
(ख) सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके
(ग) क्योंकि वह रेत पर चलने का आनंद लेना चाहता था
(घ) वह लोगों की भीड़ से दूर कुछ समय अकेले रहना चाहता था
उत्तर – (ख) सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके
प्रश्न 4 – लेखक हर अगले टीले पर पहुँचने पर क्या आशा कर रहा था?
(क) कि पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा
(ख) कि पूर्वी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा
(ग) कि उत्तरी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा
(घ) कि दक्षिणी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा
उत्तर – (क) कि पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा
प्रश्न 5 – लेखक अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर टीले पर क्यों बैठ गया?
(क) क्योंकि टीले पर पहुँचकर वह बहुत अधिक थक गया था और आगे जाने की हिम्मत नहीं थी
(ख) क्योंकि टीले पर पहुँचकर वह अकेले सूर्यास्त का आनंद ले सकता था जैसा उसने सोचा था
(ग) क्योंकि टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी लेखक ने आशा की थी
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (ग) क्योंकि टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी लेखक ने आशा की थी
3 –
अचानक खयाल आया कि मुझे वहाँ से लौटकर भी जाना है। इस खयाल से ही शरीर में कँपकँपी भर गई। दूर सैंड हिल की तरफ देखा । वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते नजर आ रहे थे। मैंने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर सकना संभव नहीं था। मेरे और उन रंगों के बीच स्याह पड़ती रेत के कितने ही टीले थे। मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले मैं उन सब टीलों को पार करके जा सकूँगा? कुछ कदम उस तरफ बढ़ा भी पर लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाऊँगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाऊँगा । इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाऊँ- तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात भूला रहा। कारण था तट की रेत । यूँ पहले भी समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत देखी थी— सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे मैंने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग…. और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ थे— और उनके अतिरिक्त भी बहुत-से रंग थे। मैंने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। मन था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत अपने पास रख लूँ। पर उसका कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को बटोरूँगा, मैं उदास मन से वहाँ से आगे चल दिया।
प्रश्न 1 – किस खयाल से ही लेखक के शरीर में कँपकँपी भर गई?
(क) कि उसे लौटकर भी जाना है
(ख) कि उसे अँधेरे से डर लगता है
(ग) कि उसे पानी से डर लगता है
(घ) कि वह अकेले बहुत दूर आ गया है और भटक सकता है
उत्तर – (क) कि उसे लौटकर भी जाना है
प्रश्न 2 – कुछ कदम बढ़ाने पर जब लेखक को लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाएगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाएगा। तो लेखक ने क्या उपाय सोचा?
(क) वापिस समुद्र तट से जाने का
(ख) किसी के उसे ढूंढते हुए आने का
(ग) नीचे समुद्र तट पर उतर जाने का
(घ) किसी को आवाज लगाकर बुलाने का
उत्तर – (ग) नीचे समुद्र तट पर उतर जाने का
प्रश्न 3 – तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात लेखक क्यों भूला रहा। इसका क्या कारण था?
(क) समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत
(ख) समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की सीपियाँ
(ग) समुद्र-तट पर कई-कई रंगों के नज़ारे
(घ) समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की पानी की परछाइयाँ
उत्तर – (क) समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत
प्रश्न 4 – समुद्र-तट पर कितने अनाम रंग थे। लेखक कैसे स्पष्ट करता है?
(क) एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग रंग थे
(ख) एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए थे
(ग) काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ थे
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी
प्रश्न 5 – रेत के अलग-अलग रंगों को देखकर लेखक ने क्या किया?
(क) कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर नीचे गिर जाने दिया
(ख) जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया
(ग) (क) और (ख) दोनों
(घ) केवल (क)
उत्तर – (ग) (क) और (ख) दोनों
4 –
सूर्योदय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है- वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस । नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। पर जब चट्टानं पर पहुँच गए, तो डर मेरी टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थीं।
ग्रेजुएट नवयुवक मुझे बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्ज़ियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना। वह खुद वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। “हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”, वह कह रहा था। “इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।” मुझे दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया।
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एकत्रित थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखला रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे– मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन।
प्रश्न 1 – लेखक सूर्योदय कहाँ से देख रहा था?
(क) आखरी टीले
(ख) विवेकानंद चट्टान
(ग) समुद्र तट
(घ) कन्याकुमारी मंदिर
उत्तर – (ख) विवेकानंद चट्टान
प्रश्न 2 – विवेकानंद चट्टान तक लेखक को कौन लेकर आए थे?
(क) मछुआ
(ख) लेखक स्वयं
(ग) ग्रेजुएट नवयुवक
(घ) चार मल्लाह
उत्तर – (घ) चार मल्लाह
प्रश्न 3 – ग्रेजुएट नवयुवक ने लेखक को क्या बताया?
(क) कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं
(ख) चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवकों में कम-से-कम सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं
(ग) उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्ज़ियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी
प्रश्न 4 – घाट पर बहुत-से लोग क्यों एकत्रित थे?
(क) उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए
(ख) उगते सूर्य को देखने के लिए
(ग) डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए
(घ) डूबते सूर्य को देखने के लिए
उत्तर – (क) उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए
प्रश्न 5 – यात्री लोग कौन से दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे?
(क) मालाओं का मोल तोल और सूर्यास्त के दर्शन
(ख) अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन और चाय की चुस्की
(ग) मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन
(घ) मालाओं का मोल तोल और चाय की चुस्की
उत्तर – (ग) मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन
Top
Class 9 Hindi Ganga Lesson 5 Aakhri Chattan Tak Multiple Choice Questions (बहुविकल्पीय प्रश्न)
प्रश्न 1 – आखिरी चट्टान तक’ किस विधा की रचना है?
(क) आत्मकथा
(ख) यात्रा वृत्तान्त
(ग) कथा
(घ) नाटक
उत्तर – (ख) यात्रा वृत्तान्त
प्रश्न 2 – ‘आखिरी चट्टान तक’ के लेखक कौन हैं ?
(क) राकेश नंदा
(ख) मोहन शर्मा
(ग) मोहन राकेश
(घ) राकेश मोहन
उत्तर – (ग) मोहन राकेश
प्रश्न 3 – अपनी आँखों में क्या समेटता हुआ लेखक कुछ देर यह भी भूला रहा कि वह एक जीवित व्यक्ति है?
(क) तीनों ओर के क्षितिज को
(ख) कन्याकुमारी की सुंदरता को
(ग) समुद्र की लहरों को
(घ) समुद्र में होने वाले सूर्यास्त को
उत्तर – (क) तीनों ओर के क्षितिज को
प्रश्न 4 – पूरे कैनवस रूपी वातावरण में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह कौन लग रही थी?
(क) कुछ पत्तियां जो हवा के कारण आँगन में फैल गई थी
(ख) कुछ युवतियाँ उस सैंड हिल पर आकर थकी हुई सी एक तरफ बैठ गईं थी
(ग) कुछ झुरमुट जो तेज हवाओं के कारण अपनी टहनियों को जोर-जोर से हिला रहे थे
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (ख) कुछ युवतियाँ उस सैंड हिल पर आकर थकी हुई सी एक तरफ बैठ गईं थी
प्रश्न 5 – पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित पीले रेत के टीले का क्या नाम था ?
(क) सैंड हिल
(ख) विवेकानंद चट्टान
(ग) सी हील
(घ) येलो हील
उत्तर – (क) सैंड हिल
प्रश्न 6 – सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो लेखक को दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर के विस्तार को कौन रोक कर खड़ा था?
(क) अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला
(ख) हिंदमहासागर की तरफ एक और ऊँचा टीला
(ग) बंगाल की खाड़ी की तरफ एक और ऊँचा टीला
(घ) सैंड हिल की तरफ एक और ऊँचा टीला
उत्तर – (क) अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला
प्रश्न 7 – लेखक को किन पेड़ों के झुरमुट दिखाई दिए ?
(क) पपीते के पेड़ों के
(ख) खजूर के पेड़ों के
(ग) नारियल के पेड़ों के
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (ग) नारियल के पेड़ों के
प्रश्न 8 – ग्रेजुएट नवयुवक के अनुसार कन्याकुमारी में कितने शिक्षित नवयुवक बेराजगार थे ?
(क) चार-पाँच सौ
(ख) दो-तीन सौ
(ग) सात-आठ सौ
(घ) पाँच-छः सौ
उत्तर – (क) चार-पाँच सौ
प्रश्न 9 – लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार से पृष्ठभूमि पर देख सके, इसके लिए उसने क्या किया ?
(क) वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था
(ख) वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे आखरी चट्टान की तरफ चल पड़ा
(ग) वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे विवेकानंद चट्टान की तरफ चल पड़ा
(घ) वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे होटल की तरफ चल पड़ा क्योंकि वह ऊंचाई पर बना था
उत्तर – (क) वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था
प्रश्न 10 – ग्रेजुएट नवयुवक क्या बेचता था ?
(क) कार्ड-बोर्ड
(ख) मालाएँ
(ग) सीपियाँ
(घ) फोटो-एलबम
उत्तर – (घ) फोटो-एलबम
प्रश्न 11 – लेखक किसकी कल्पना कर रहा था?
(क) अद्धभुत नजारों की
(ख) खुले आसमान की
(ग) खुला विस्तार सामने देखने की
(घ) सर्यास्त – सूर्योदय देखने की
उत्तर – (ग) खुला विस्तार सामने देखने की
प्रश्न 12 – पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक कतार दूर तक दिखाई दे रही थी। सामने फैली रेत के कारण वह कैसी लग रही थी ?
(क) बहुत रूखी
(ख) वीरान
(ग) ऊँची-नीची
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी
प्रश्न 13 – लोग उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के लिए कहाँ एकत्रित थे?
(क) घाट पर
(ख) चट्टान पर
(ग) टीले पर
(घ) होटल में
उत्तर – (क) घाट पर
प्रश्न 14 – कन्याकुमारी की आबादी कितनी थी ?
(क) पांच हजार
(ख) सात हजार
(ग) आठ हजार
(घ) पंद्रह हजार
उत्तर – (ग) आठ हजार
प्रश्न 15 – लेखक के मन में क्या डर समाने लगा ?
(क) कि अँधेरा होने से पहले वह होटल पहुँच सकता है
(ख) कि अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार करके जा सकता है
(ग) कि अँधेरा होने से पहले वह तट को पार करके जा सकता है
(घ) कि अँधेरा होने से पहले वह अपने साथियों तक पहुँच सकता है
उत्तर – (ख) कि अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार करके जा सकता है
प्रश्न 16 – लेखक ने क्यों सोचा कि बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाए ?
(क) क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा
(ख) क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से उसे टीलों से बाहर निकाल लेगा
(ग) क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से उसे समुद्र में सर्यास्त का अद्धभुत नजारा दिखाएगा
(घ) क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से उसे विवेकानंद चट्टान तक पहुंचा देगा
उत्तर – (क) क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा
प्रश्न 17 – लेखक के अनुसार नाव बस नाम की नाव क्यों थी ?
(क) क्योंकि वह बस नारियल पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ कर बनाई गई थी
(ख) क्योंकि वह बस केले के पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ कर बनाई गई थी
(ग) क्योंकि वह बस रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ कर बनाई गई थी
(घ) क्योंकि वह बस खजूर के पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ कर बनाई गई थी
उत्तर – (ग) क्योंकि वह बस रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ कर बनाई गई थी
प्रश्न 18 – कन्याकुमारी ने सूर्य कैसे उदित हो रहा था?
(क) छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से
(ख) छोटे-छोटे द्वीपों की आड़ से
(ग) समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से
(घ) छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी सीपियों की आड़ से
उत्तर – (क) छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से
प्रश्न 19 – दो स्थानीय नवयुवतियाँ यात्रियों को अपनी टोकरियों से क्या दिखा रही थीं ?
(क) सीपियाँ और मालाएँ
(ख) शंख और सीपियाँ
(ग) शंख और मालाएँ
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर – (ग) शंख और मालाएँ
प्रश्न 20 – लेखक की नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में एक सामान क्या चमक रहे थे?
(क) कई नावों के पाल
(ख) कडल-काकों के पंख
(ग) कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख
(घ) इनमें से कोई नहीं
उत्तर – (ग) कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख
Top
Aakhri Chattan Tak Extra Question Answers (अतिरिक्त प्रश्न उत्तर)
प्रश्न 1 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक आखरी चट्टान के बारे क्या बताता है ?
उत्तर – लेखक केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से थोड़ी ऊपर उठी हुई काली चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर काफी देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देख रहा था। उसके पीछे की भूमि पर कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। वह आखरी चट्टान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के समागम या मिलान का स्थान जैसी प्रतीत हो रही थी। जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने तपस्या की थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हर तरफ से पानी की मार सहती हुई वह स्वयं भी तपस्या में लीन हो गई थी।
प्रश्न 2 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक का शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति से क्या आशय है ?
उत्तर – हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें लेखक के आस-पास की काली चट्टानों से टकरा रही थीं। लहराती हुई लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिसके कारण उनके ऊपर छोटी-छोटी बूँदों की जालियाँ सी बन जाती थीं। लेखक देख रहा था और अपने पूरे होश से शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति को महसूस कर रहा था। जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। उसे देखकर लेखक को ऐसा लग रहा था कि उसके दूसरी और कोई छोर ही न हो।
प्रश्न 3 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में ‘सैंड हिल’ का वर्णन किस प्रकार किया गया है ?
उत्तर – कन्याकुमारी के पश्चिमी सीमा में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था अर्थात सूर्यास्त हो रहा था। लेखक सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। लेखक को दूर पश्चिमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। लेखक ने सोचा कि उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखेगा। वहां आए हुए यात्रियों के न जाने कितने समूह उस दिशा में जा रहे थे। लेखक और वे लोग टीले पर पहुँच गए। वह टीला ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा लेखक कन्याकुमारी पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था।
प्रश्न 4 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में सैंड हिल पर सूर्यास्त देखने का कैसा माहौल था ?
उत्तर – सैंड हिल पर बहुत से लोग थे जिनमें आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति थे। वे भी वहां सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे (कर्मचारी) उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी क्योंकि कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। जिस तरह समुद्र में लहरें उठती हैं उसी तरह हवा उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ उस सैंड हिल पर आकर थकी हुई सी एक तरफ बैठ गईं थी जो उस पूरे कैनवस रूपी वातावरण में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह लग रही थी।
प्रश्न 5 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक ने सैंड हिल पर से ही सूर्यास्त देखने का निर्णय क्यों छोड़ दिया ?
उत्तर – सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो लेखक को दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो अरब सागर के विस्तार को रोक कर खड़ा था। लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार से पृष्ठभूमि पर देख सके, इसके लिए वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था।
प्रश्न 6 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक को आखरी टीले पर पहुँच कर संतुष्टि का अनुभव क्यों हुआ ?
उत्तर – लेखक रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता हुआ उस टीले तक पहुँचा जो उसने सैंड हील से देखा था, परन्तु वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए लेखक ने एक के बाद एक कई टीले पार किए। लेखक की टाँगें थक रही थीं परन्तु मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी कल्पना लेखक कर रहा था। उस टीले से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह उस टीले से समुद्र में उतरने का कोई रास्ता हो। जब लेखक टीले पर पहुंचा तब सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपनी कोशिश की सफलता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर इस तरह बैठ गया था जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और सिर्फ लेखक ने, उस चोटी पर पहली बार विजय हासिल की हो।
प्रश्न 7 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक को जो नजारा आखरी टीले से दिखा उसका वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर – उस टीले से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह उस टीले से समुद्र में उतरने का कोई रास्ता हो। उसके पीछे दाईं तरफ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उगे नारियलों के समूह नजर आ रहे थे। तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं और गूँजती हुई आवाज कर रही थी। पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक कतार दूर तक दिखाई दे रही थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, ऊँची-नीची और वीरान लग रही थी। जब सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया, तब ऐसा लग रहा था जैसे सुनहरी किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेल दिया गया हो।
प्रश्न 8 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी वर्णन किया है। अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर – लेखक बताता है कि सूर्यास्त होते हुए सूर्य समुद्र के पानी की सतह से छू गया था। ऐसा लग रहा था कि समुद्र के पानी पर दूर-दूर तक सोना ही सोना फैल गया हो। परन्तु वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे कोई एक नाम दे पाना असंभव लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्य जैसे किसी मजबूरी में लाल रंग के लावे रूपी पानी में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ पलों में पहले जहाँ सोना बहता प्रतीत हो रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा था। कुछ और पल बीतने पर वह लहू की तरह लाल रंग भी धीरे-धीरे बैंगनी और फिर बैंगनी से काला पड़ गया था। लेखक ने फिर एक बार मुड़कर दाईं तरफ पीछे देखा तो नारियलों की टहनियाँ पहले की ही तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दृश्यपट पर स्याही फैल गई थी। अर्थात जहाँ तक भी लेखक देख पा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे है जगह स्याही फैल गई हो।
प्रश्न 9 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक वापिस आने के ख़याल से क्यों काँप गया ?
उत्तर – सूर्यस्त होने के बाद अचानक लेखक को खयाल आया कि उसे वहाँ से लौटकर भी वापिस जाना है। इस खयाल से ही लेखक का शरीर कँपकँपी से भर गया। लेखक ने दूर सैंड हिल की तरफ देखा। ऐसा लगा जैसे वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते हुए नजर आ रहे हो। लेखक ने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर पाना भी संभव नहीं था। लेखक और उन रंगों के बीच अब काली पड़ती रेत के न जाने कितने टीले थे। अब लेखक के मन में डर समाने लगा कि अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार करके जा सकता है! कुछ कदम उस तरफ बढ़ा कर भी जाने लगा परन्तु फिर लेखक को लगा कि वह अँधेरा होने से पहले नहीं पहुँच सकेगा। लेखक ने सोचा कि यदि वह उस रास्ते से गया, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाएगा। इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाए क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा।
प्रश्न 10 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक ने रेत में ऐसा क्या देखा कि वह बढ़ते अँधेरे की बात भूल गया ?
उत्तर – नीचे समुद्र तट पर पहुँचकर लेखक कुछ पल बढ़ते अँधेरे की बात भूल गया। इसका कारण था तट की रेत। ऐसे तो पहले भी समुद्र-तट पर लेखक को कई-कई रंगों की रेत देखी थी जैसे सोने के रंग की, खाकी रंग की, पीली और लाल रंग की। मगर जैसे रंग उस समय उस रेत में थे, वैसे लेखक ने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। वे न जाने कितने ही ऐसे रंग थे जिनका लेखक को नाम भी नहीं पता था। एक-एक इंच पर ही एक-दूसरे से बिलकुल अलग रंग और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए लग रहा था। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ मौजूद थे। और उसके अलावा भी बहुत-से रंग वहाँ थे। लेखक ने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर उसे नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को लेखक हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। लेखक का मन कर रहा था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत वह अपने पास रख ले। पर उसके पास ऐसा करने का कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को इकठ्ठा करेगा, वह उदास मन से वहाँ से आगे चल पड़ा।
प्रश्न 11 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में खतरे का एहसास होने पर लेखक ने किस तरह हिम्मत से काम लिया ?
उत्तर – समुद्र में पानी बढ़ता जा रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। जैसे ही एक लहर लेखक के पैरों को भिगो गई, वैसे ही लेखक को खतरे का एहसास हुआ। वह जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा ही पानी से बाहर था। ऐसा लग रहा था कि जल्दी ही पानी उस बचे हुए हिस्से को भी अपने अंदर समा लेगा। लेखक के मन में खतरा बढ़ गया। वह दौड़ने लगा। एक-दो और लहरें लेखक के पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। लेखक ने अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिए। एक ऊँची लहर से बचकर वह इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच लहर उसे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। पानी बड़ जाने के कारण चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी। उस चट्टान से बचकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। परन्तु उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का लेखक को साहस नहीं हुआ। वह चट्टान की नोकों पर पैर रखता हुआ किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। चट्टान के उस तरफ तट का लगभग सौ फुट का खुला फैलाव था। बहुत सारे लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। अब लेखक के मन से डर निकल जाने पर उसे काफी हल्का लगा और वह चट्टान से नीचे कूद गया।
प्रश्न 12 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक सूर्योदय देखने ‘विवेकानंद चट्टान’ पर किस कठिनाई से पहुंचे ?
उत्तर – लेखक के साथ आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। वह चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर वहाँ स्थित है जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। लेखक के अलावा वहाँ कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक नवयुवक ग्रेजुएट था। वहाँ चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में उन लोगों को वहाँ लाए थे। लेखक के अनुसार वह नाव बस नाम की नाव थी, उसके लिए बस रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था। जब नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो उतनी देर में लेखक ने आसमान की तरफ देखते हुए अपनी चेतना को ढहराव देने की कोशिश की थी, लेखक अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढकना चाहा रहा था। परन्तु जब वे लोग चट्टान पर पहुँच गए, तो डर लेखक की टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ नाव पर बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थी।
प्रश्न 13 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में ग्रेजुएट नवयुवक ने लेखक को क्या बातें बताई ?
उत्तर – ग्रेजुएट नवयुवक ने लेखक को बताया कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी है और उनमें कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य काम नौकरियों के लिए आवेदन देना और आपस में बैठकर बहस करना है। वह नवयुवक खुद भी ग्रेजुएट होते हुए वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। उसने लेखक को बताया कि वे लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं। उस विवेकानंद चट्टान से इतनी प्रेरणा तो उन्हें मिलती ही है।
प्रश्न 14 – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ में लेखक ने सूर्योदय का वर्णन किस प्रकार किया है ?
उत्तर – लेखक बताता है कि पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिल कर रहे थे, और छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को प्रणाम करने के लिए इकट्ठे हो रहे थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। वहां की दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखा रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे, महिलाओं से मालाओं का मोल तोल भी कर रहे थे और अपनी दूरबीन से सूर्य के दर्शन भी कर रहे थे। कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। लेखक की नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख एक सामान ही चमक रहे थे।
Top