आखिरी चट्टान तक पाठ सार
CBSE Class 9 Hindi Chapter 5 “Aakhri Chattan Tak ”, Line by Line Explanation along with Difficult Word Meanings from Ganga Book
प्रस्तुत पाठ कक्षा 9 की पुस्तक गंगा से लिया गया है। ‘आखिरी चट्टान तक’ एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त किया है। यात्रा-वृत्तांत में बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर के मिलन-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन सजीव ढंग से किया गया है। लेखक ने प्रकृति की भव्यता और मानव-मन की गहन अनुभूतियों को इस यात्रा-वृत्तांत में एक साथ उजागर किया है।
आखिरी चट्टान तक का संक्षिप्त अवलोकन (Aakhri Chattan Tak Quick Overview)
| विवरण | जानकारी |
| पाठ शीर्षक | आखिरी चट्टान तक |
| लेखक | मोहन राकेश |
| किताब | गंगा (सीबीएसई कक्षा 9 हिंदी) |
| पाठ नं. | 5 |
| कथावाचक | लेखक |
| सेटिंग | यात्रा-वृत्तांत |
| विषय | लेखक द्वारा कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त करना |
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आखिरी चट्टान तक पाठ सार Aakhri Chattan Tak Summary
प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ का सारांश अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
कक्षा 9 हिंदी गंगा पुस्तक पाठ 5 ‘आखिरी चट्टान तक’ का पाठ सार लिखिए।
‘आखिरी चट्टान तक’ एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त किया है। यात्रा-वृत्तांत में बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर के मिलन-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन सजीव ढंग से किया गया है। कन्याकुमारी के समुद्री तट के जीवन से साक्षात्कार होने पर लेखक केवल वहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक सुंदरता का ही वर्णन नहीं करता बल्कि अपने मन में उठने वाली भावनाओं, विस्मय, रोमांच, शांति और आत्मिक खोज को भी व्यक्त करता है। यात्रा- वृत्तांत की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और चित्रात्मक है जो पाठक के मन में दृश्यों को ऐसे जीवंत कर देती है कि पाठक को लगता है कि वह भी लेखक के साथ ही यात्रा कर रहा है। प्रकृति की भव्यता और मानव-मन की गहन अनुभूतियों को यह यात्रा-वृत्तांत एक साथ उजागर करता है।
- आखरी चट्टान – लेखक कन्याकुमारी को सुनहरे सूर्योदय और स्वर्णिम सूर्यास्त की भूमि कहता है। लेखक केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से थोड़ी ऊपर उठी हुई काली चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर काफी देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देख रहा था। पीछे की भूमि पर कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। वह आखरी चट्टान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के समागम या मिलान का स्थान जैसी प्रतीत हो रही थी। जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने तपस्या की थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हर तरफ से पानी की मार सहती हुई वह स्वयं भी तपस्या में लीन हो गई थी।
- शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति – हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें लेखक के आस-पास की काली चट्टानों से टकरा रही थीं। लहराती हुई लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिसके कारण उनके ऊपर छोटी-छोटी बूँदों की जालियाँ सी बन जाती थीं। लेखक देख रहा था और अपने पूरे होश से शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति को महसूस कर रहा था। जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। उसे देखकर लेखक को ऐसा लग रहा था कि उसके दूसरी और कोई छोर ही न हो। तीनों ओर के क्षितिज को अपनी आँखों में समेटता हुआ लेखक कुछ देर यह भी भूला रहा कि वह एक जीवित व्यक्ति है , जो दूर से कन्याकुमारी की यात्रा करने आया यात्री है , एक दर्शक है। उस दृश्य के बीच में लेखक जैसे उसी दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा। जैसे मानो वह बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान हो।
- सैंड हिल – लेखक को दूर पश्चिमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। लेखक ने सोचा कि उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखेगा। वहां आए हुए यात्रियों के न जाने कितने समूह उस दिशा में जा रहे थे। लेखक और वे लोग टीले पर पहुँच गए। वह टीला ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा लेखक कन्याकुमारी पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे जिनमें आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति थे। वे भी शायद वहां सूर्यास्त देख रहे थे।
- टीलों का सफ़र – लेखक कन्याकुमारी के सूर्यास्त का दृश्य देखते हुए बताता है कि पश्चिमी सीमा में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था अर्थात सूर्यास्त हो रहा था। लेखक सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो लेखक को दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो अरब सागर के विस्तार को रोक कर खड़ा था। लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार से पृष्ठभूमि पर देख सके, इसके लिए वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था। वह रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता हुआ वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए लेखक ने एक के बाद एक कई टीले पार किए। हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी कल्पना लेखक कर रहा था।
- कन्याकुमारी के सूर्यास्त – जब लेखक टीले पर पहुंचा तब सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपनी कोशिश की सफलता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर इस तरह बैठ गया था जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और सिर्फ लेखक ने, उस चोटी पर पहली बार विजय हासिल की हो। उसके पीछे दाईं तरफ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उगे नारियलों के समूह नजर आ रहे थे। तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं और गूँजती हुई आवाज कर रही थी। पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक कतार दूर तक दिखाई दे रही थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, ऊँची-नीची और वीरान लग रही थी। जब सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया, तब ऐसा लग रहा था जैसे सुनहरी किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेल दिया गया हो।
- अनाम रंग – लेखक सूर्यास्त का वर्णन करते हुए कहता है कि सूर्य अस्त होते हुए समुद्र के पानी की सतह से छू गया था। ऐसा लग रहा था कि समुद्र के पानी पर दूर-दूर तक सोना ही सोना फैल गया हो। परन्तु वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे कोई एक नाम दे पाना असंभव लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्य जैसे किसी मजबूरी में लाल रंग के लावे रूपी पानी में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ पलों में पहले जहाँ सोना बहता प्रतीत हो रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा था। कुछ और पल बीतने पर वह लहू की तरह लाल रंग भी धीरे-धीरे बैंगनी और फिर बैंगनी से काला पड़ गया था।
- खतरे का आभास – अचानक लेखक को खयाल आया कि उसे वहाँ से लौटकर भी वापिस जाना है। इस खयाल से ही लेखक का शरीर कँपकँपी से भर गया। लेखक ने दूर सैंड हिल की तरफ देखा। ऐसा लगा जैसे वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते हुए नजर आ रहे हो। लेखक ने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर पाना भी संभव नहीं था। लेखक और उन रंगों के बीच अब काली पड़ती रेत के न जाने कितने टीले थे। अब लेखक के मन में डर समाने लगा कि अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार करके जा सकता है! कुछ कदम उस तरफ बढ़ा कर भी जाने लगा परन्तु फिर लेखक को लगा कि वह अँधेरा होने से पहले नहीं पहुँच सकेगा। लेखक ने सोचा कि यदि वह उस रास्ते से गया, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाएगा। इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाए क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा।
- रंगीन रेत – ऐसे तो पहले भी समुद्र-तट पर लेखक को कई-कई रंगों की रेत देखी थी जैसे सोने के रंग की, खाकी रंग की, पीली और लाल रंग की। मगर जैसे रंग उस समय उस रेत में थे, वैसे लेखक ने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। वे न जाने कितने ही ऐसे रंग थे जिनका लेखक को नाम भी नहीं पता था। एक-एक इंच पर ही एक-दूसरे से बिलकुल अलग रंग और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए लग रहा था। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ मौजूद थे। और उसके अलावा भी बहुत-से रंग वहाँ थे। लेखक ने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर उसे नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को लेखक हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। लेखक का मन कर रहा था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत वह अपने पास रख ले।
- ‘विवेकानंद चट्टान’ व् सूर्योदय – लेखक के साथ आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। जब नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो उतनी देर में लेखक ने आसमान की तरफ देखते हुए अपनी चेतना को ढहराव देने की कोशिश की थी, लेखक अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढकना चाहा रहा था। परन्तु जब वे लोग चट्टान पर पहुँच गए, तो डर लेखक की टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ नाव पर बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थी। पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिल कर रहे थे, और छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से सूर्य उदित हो रहा था। कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। लेखक की नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख एक सामान ही चमक रहे थे। लेखक अब भी अपनी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम-टेबल दोहरा रहा था। जैसे तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी….वगैरा-वगैरा……..
आखिरी चट्टान तक पाठ व्याख्या Aakhri Chattan Tak Lesson Explanation
प्रश्न – लेखक के मन में कन्याकुमारी की आखरी चटान को देखकर कैसी भावना उत्पन्न हो रही थी?
पाठ – कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि।
केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से उभरी स्याह चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा । पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के संगम-स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगायी थी, हर तरफ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था— शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा- बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया । मैंने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।
शब्दार्थ –
सुनहले – सुनहरा, स्वर्ण, स्वर्णिम
स्याह/सियाह – काला, श्याम
चट्टान – शिला
पृष्ठभूमि – पहले की बातें, पीछे की भूमि या पीछे का दृश्य
संगम- मिलाप , संमेलन , संयोग , समागम , मेल
समाधिस्थ / समाधि – समाधि में स्थित, मनोयोग, तपस्या
चेतना – बुद्धि-विवेक से काम लेना, सावधान होना, होश में आना
क्षितिज – वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं, दृष्टि – सीमा
अपेक्षया – किसी की अपेक्षा या तुलना में
सिहरन – कंपन, सिहरने की क्रिया
उत्तर / व्याख्या – लेखक कन्याकुमारी के बारे में बताता है कि कन्याकुमारी सुनहरे सूर्योदय और स्वर्णिम सूर्यास्त की भूमि कही जाती है। लेखक केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से थोड़ी ऊपर उठी हुई काली चट्टानों में से एक चट्टान पर खड़ा होकर काफी देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देख रहा था। पीछे की भूमि पर कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। वह आखरी चट्टान अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी – इन तीनों के समागम या मिलान का स्थान जैसी प्रतीत हो रही थी। जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने तपस्या की थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हर तरफ से पानी की मार सहती हुई वह स्वयं भी तपस्या में लीन हो गई थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें लेखक के आस-पास की काली चट्टानों से टकरा रही थीं। लहराती हुई लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिसके कारण उनके ऊपर छोटी-छोटी बूँदों की जालियाँ सी बन जाती थीं। लेखक देख रहा था और अपने पूरे होश से शक्ति का विस्तार अथवा विस्तार की शक्ति को महसूस कर रहा था। जहाँ तक लेखक देख पा रहा था वहां तक तीनों तरफ से पानी-ही-पानी दिखाई दे रहा था, परन्तु फिर भी लेखक को सामने हिंद महासागर का भाग दूसरों की तुलना में अधिक दूर और अधिक गहरा ज्ञात हो रहा था। उसे देखकर लेखक को ऐसा लग रहा था कि उसके दूसरी और कोई छोर ही न हो। तीनों ओर के क्षितिज को अपनी आँखों में समेटता हुआ लेखक कुछ देर यह भी भूला रहा कि वह एक जीवित व्यक्ति है, जो दूर से कन्याकुमारी की यात्रा करने आया यात्री है , एक दर्शक है। उस दृश्य के बीच में लेखक जैसे उसी दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा। जैसे मानो वह बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान हो। जब लेखक अपने होश में आया, तो उसने देखा कि जिस चट्टान पर वह खड़ा था वह भी बढ़ते पानी में काफी घिर गई थी। लेखक के पूरे शरीर में कम्पन हो गई। लेखक ने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली अर्थात सामने के बढ़ते हुए समुद्र पर एक नजर डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।
प्रश्न – लेखक ने कन्याकुमारी में सूर्यास्त देखने के लिए क्या कोशिशे की ?
पाठ – पच्छिमी क्षितिज में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। मैं सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। दूर पच्छिमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। सोचा उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखूँगा।
यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। हम लोग टीले पर पहुँच गए। यह वह ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा मैं वहाँ पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे। आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति। वे शायद सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी । कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ बैठ गईं— उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह। उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के
विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पच्छिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया – वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो । सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया- ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो।
पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर उगे नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। गूँजती हुई तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं। पच्छिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक श्रृंखला दूर तक चली गई थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी। सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया था। सुनहली किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेला गया हो। मैंने उस रेत पर दूर तक बने अपने पैरों के निशानों को देखा। लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक सिहरन भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई ।
शब्दार्थ –
पच्छिमी क्षितिज – पश्चिम की सीमा
टोलियाँ – समूह
सैंड हिल – बालू का टीला
कैनवस – एक प्रकार का कपड़ा जो मोटा और चिकना होता है, चित्रकारी करने के लिए प्रयोग किया जाने वाला कपड़ा
ओट – आड़, रोक, शरण, परदे के लिए बनाई गई दीवार
प्रयत्न – कोशिश
सार्थकता – सफलता
झुरमुट – समूह, मंडली, पास-पास उगे पेड़ या झाड़ जिनकी डालियाँ मिलकर कुंज-सा बना रही हों
श्रृंखला – श्रेणी, कतार
बीहड़ – ऊबड़-खाबड़, विकट, विभक्त
उत्तर / व्याख्या – लेखक कन्याकुमारी के सूर्यास्त का दृश्य देखते हुए बताता है कि पश्चिमी सीमा में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था अर्थात सूर्यास्त हो रहा था। लेखक सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। लेखक को दूर पश्चिमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। लेखक ने सोचा कि उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखेगा। वहां आए हुए यात्रियों के न जाने कितने समूह उस दिशा में जा रहे थे। लेखक और वे लोग टीले पर पहुँच गए। वह टीला ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा लेखक कन्याकुमारी पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे जिनमें आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति थे। वे भी शायद वहां सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे (कर्मचारी) उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी क्योंकि कन्याकुमारी का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। जिस तरह समुद्र में लहरें उठती हैं उसी तरह हवा उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ उस सैंड हिल पर आकर थकी हुई सी एक तरफ बैठ गईं थी जो उस पूरे कैनवस रूपी वातावरण में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह लग रही थी। उन युवतियाँ से कुछ दूर पर लेखक अपने आप को एक रंगहीन बिंदु की तरह बताता है, और कहता है कि वह ज्यादा देर तक अपनी जगह पर स्थिर नहीं रह सका था। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो लेखक को दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो अरब सागर के विस्तार को रोक कर खड़ा था। लेखक सूर्यास्त को पूरे विस्तार से पृष्ठभूमि पर देख सके, इसके लिए वह कुछ देर सैंड हिल पर रुका परन्तु फिर आगे उस टीले की तरफ चल पड़ा जो लेखक ने सैंड हिल से कुछ दुरी पर देखा था। वह रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता हुआ वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए लेखक ने एक के बाद एक कई टीले पार किए। लेखक की टाँगें थक रही थीं परन्तु मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर ऐसा लगता था कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पश्चिमी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आ जाएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया जिसकी कल्पना लेखक कर रहा था। उस टीले से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह उस टीले से समुद्र में उतरने का कोई रास्ता हो। जब लेखक टीले पर पहुंचा तब सूर्य पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपनी कोशिश की सफलता से संतुष्ट होकर लेखक टीले पर इस तरह बैठ गया था जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और सिर्फ लेखक ने, उस चोटी पर पहली बार विजय हासिल की हो।
उसके पीछे दाईं तरफ थोड़ी-थोड़ी दूरी पर उगे नारियलों के समूह नजर आ रहे थे। तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं और गूँजती हुई आवाज कर रही थी। पश्चिमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक कतार दूर तक दिखाई दे रही थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, ऊँची-नीची और वीरान लग रही थी। जब सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया, तब ऐसा लग रहा था जैसे सुनहरी किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़ेल दिया गया हो। लेखक ने उस रेत पर दूर तक बने अपने पैरों के निशानों को देखा। उसे लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे लेखक के मन में एक कम्पन भी हुई, और हल्की उदासी भी घिर आई।
प्रश्न – रेत के बदलते हुए रंगों को देखकर लेखक कैसा अनुभव कर रहा था ?
पाठ – सूर्य का गोला पानी की सतह से छू गया। पानी पर दूर तक सोना ही सोना ढुल आया। पर वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे एक नाम दे सकना असंभव था। सूर्य का गोला जैसे एक बेबसी में पानी के लावे में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा। कुछ और क्षण बीतने पर वह लहू भी धीरे-धीरे बैज़नी और बैज़नी से काला पड़ गया। मैंने फिर एक बार मुड़कर दाईं तरफ पीछे देख लिया। नारियलों की टहनियाँ उसी तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दृश्यपट पर स्याही फैल गई थी। एक-दूसरे से दूर खड़े झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर धुन रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। मैं अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी मुट्ठियाँ भींचता-खोलता कभी उस तरफ और कभी समुद्र की तरफ देखता रहा ।
अचानक खयाल आया कि मुझे वहाँ से लौटकर भी जाना है। इस खयाल से ही शरीर में कँपकँपी भर गई। दूर सैंड हिल की तरफ देखा । वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते नजर आ रहे थे। मैंने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर सकना संभव नहीं था। मेरे और उन रंगों के बीच स्याह पड़ती रेत के कितने ही टीले थे। मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले मैं उन सब टीलों को पार करके जा सकूँगा? कुछ कदम उस तरफ बढ़ा भी पर लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाऊँगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाऊँगा । इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाऊँ- तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात भूला रहा। कारण था तट की रेत । यूँ पहले भी समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत देखी थी— सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे मैंने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग…. और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ थे— और उनके अतिरिक्त भी बहुत-से रंग थे। मैंने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। मन था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत अपने पास रख लूँ। पर उसका कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को बटोरूँगा, मैं उदास मन से वहाँ से आगे चल दिया।
शब्दार्थ –
ढुलना – फैलना
बेबसी – मजबूरी
बैज़नी – बैंगनी
सुरमई – हल्का नीला, सुरमे के रंग का
अनाम – बिना नाम के
सम्मिश्रण – मिले जुले
उत्तर / व्याख्या – लेखक सूर्यास्त का वर्णन करते हुए कहता है कि सूर्य अस्त होते हुए समुद्र के पानी की सतह से छू गया था। ऐसा लग रहा था कि समुद्र के पानी पर दूर-दूर तक सोना ही सोना फैल गया हो। परन्तु वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे कोई एक नाम दे पाना असंभव लग रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि सूर्य जैसे किसी मजबूरी में लाल रंग के लावे रूपी पानी में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ पलों में पहले जहाँ सोना बहता प्रतीत हो रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा था। कुछ और पल बीतने पर वह लहू की तरह लाल रंग भी धीरे-धीरे बैंगनी और फिर बैंगनी से काला पड़ गया था। लेखक ने फिर एक बार मुड़कर दाईं तरफ पीछे देखा तो नारियलों की टहनियाँ पहले की ही तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दृश्यपट पर स्याही फैल गई थी। अर्थात जहाँ तक भी लेखक देख पा रहा था ऐसा लग रहा था जैसे है जगह स्याही फैल गई हो। नारियलों के झुरमुट देखकर ऐसा लग रहा था जैसे एक-दूसरे से दूर खड़े नारियलों के झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर हिला रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। लेखक अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी मुट्ठियाँ कभी बंद और कभी खोलते हुए कभी नारियलों के झुरमुट की तरफ और कभी समुद्र की तरफ देखता रहा।
अचानक लेखक को खयाल आया कि उसे वहाँ से लौटकर भी वापिस जाना है। इस खयाल से ही लेखक का शरीर कँपकँपी से भर गया। लेखक ने दूर सैंड हिल की तरफ देखा। ऐसा लगा जैसे वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते हुए नजर आ रहे हो। लेखक ने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर पाना भी संभव नहीं था। लेखक और उन रंगों के बीच अब काली पड़ती रेत के न जाने कितने टीले थे। अब लेखक के मन में डर समाने लगा कि अँधेरा होने से पहले वह उन सब टीलों को पार करके जा सकता है! कुछ कदम उस तरफ बढ़ा कर भी जाने लगा परन्तु फिर लेखक को लगा कि वह अँधेरा होने से पहले नहीं पहुँच सकेगा। लेखक ने सोचा कि यदि वह उस रास्ते से गया, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाएगा। इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाए क्योंकि उसे विश्वास था कि तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। लेखक को निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे वह रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ पल बढ़ते अँधेरे की बात भूल गया। इसका कारण था तट की रेत। ऐसे तो पहले भी समुद्र-तट पर लेखक को कई-कई रंगों की रेत देखी थी जैसे सोने के रंग की, खाकी रंग की, पीली और लाल रंग की। मगर जैसे रंग उस समय उस रेत में थे, वैसे लेखक ने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। वे न जाने कितने ही ऐसे रंग थे जिनका लेखक को नाम भी नहीं पता था। एक-एक इंच पर ही एक-दूसरे से बिलकुल अलग रंग और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए लग रहा था। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ मौजूद थे। और उसके अलावा भी बहुत-से रंग वहाँ थे। लेखक ने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर उसे नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को लेखक हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। लेखक का मन कर रहा था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत वह अपने पास रख ले। पर उसके पास ऐसा करने का कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को इकठ्ठा करेगा, वह उदास मन से वहाँ से आगे चल पड़ा।
प्रश्न – लेखक को खतरे का एहसास क्यों हुआ और लेखक ने किस तरह वापिस जाने की कोशिश की ?
पाठ – समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा पानी से बाहर था। लग रहा था कि जल्दी ही पानी उसे भी अपने अंदर समा लेगा। एक बार सोचा कि खड़ी रेत से होकर फिर ऊपर चला जाऊँ। पर वह स्याह पड़ती रेत इस तरह दीवार की तरह उठी थी कि उस रास्ते ऊपर जाने की कोशिश करना ही बेकार था। मेरे मन में खतरा बढ़ गया। मैं दौड़ने लगा। दो-एक और लहरें पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। मैंने जूता उतारकर हाथ में ले लिया। एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। सामने एक ऊँची चट्टान थी। वक्त पर अपने को संभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं लगी। चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी- उसे बचाकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। पर उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का मेरा साहस नहीं हुआ। मैं चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। सोचा नीचे खड़े रहने की अपेक्षा वह अधिक सुरक्षित होगा। पर ऊपर पहुँचकर लगा जैसे मेरे साथ एक मजाक किया गया हो। चट्टान के उस तरफ तट का खुला फैलाव था— लगभग सौ फुट का। कितने ही लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया।
रात केप होटल का लॉन । अँधेरे में हिंद महासागर को काटती कुछ स्याह लकीरें – एक पौधे की टहनियाँ। नीचे सड़क पर टार्च जलाता-बुझाता एक आदमी। दक्षिण-पूर्व के क्षितिज में एक जहाज की मद्धिम-सी रोशनी ।
शब्दार्थ –
सहसा – अचानक
मद्धिम / मद्धम – मध्यम, कम अच्छा, मंदा
उत्तर / व्याख्या – लेखक बताता है कि समुद्र में पानी बढ़ता जा रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। जैसे ही एक लहर लेखक के पैरों को भिगो गई, वैसे ही लेखक को खतरे का एहसास हुआ। वह जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा ही पानी से बाहर था। ऐसा लग रहा था कि जल्दी ही पानी उस बचे हुए हिस्से को भी अपने अंदर समा लेगा। लेखक ने एक बार सोचा कि जिस खड़ी रेत से होकर वह निचे उतरा था, फिर से उसी पर चढ़ कर ऊपर चला जाए। परन्तु वह काली पड़ती रेत इस तरह दीवार की तरह उठी हुई थी कि उस रास्ते ऊपर जाने की कोशिश करना ही बेकार था। लेखक के मन में खतरा बढ़ गया। वह दौड़ने लगा। एक-दो और लहरें लेखक के पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। लेखक ने अपने जूते उतारकर हाथ में ले लिए। एक ऊँची लहर से बचकर वह इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच लहर उसे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। सामने एक ऊँची चट्टान थी। लेखक ने वक्त पर अपने आपको संभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। उसकी बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं लगी। पानी बड़ जाने के कारण चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी। उस चट्टान से बचकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। परन्तु उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का लेखक को साहस नहीं हुआ। वह चट्टान की नोकों पर पैर रखता हुआ किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। उसने सोचा नीचे खड़े रहने बजाए वह चट्टान के ऊपर अधिक सुरक्षित होगा। पर ऊपर पहुँचकर उसे लगा जैसे उसके साथ एक मजाक किया गया हो। चट्टान के उस तरफ तट का लगभग सौ फुट का खुला फैलाव था। बहुत सारे लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। अब लेखक के मन से डर निकल जाने पर उसे काफी हल्का लगा और वह चट्टान से नीचे कूद गया।
लेखक रात के दृश्यों का वर्णन करता हुआ कहता है कि रात में केप होटल का लॉन और अँधेरे में हिंद महासागर को काटती कुछ काली लकीरें अद्धभुत नज़ारा दिखा रही थी। पौधों की टहनियाँ, नीचे सड़क पर टार्च जलाता-बुझाता एक आदमी व् दक्षिण-पूर्व के क्षितिज में एक जहाज की मध्यम सी रोशनी अनोखा अनुभव करा रही थी।
प्रश्न – ग्रेजुएट नवयुवक ने लेखक को कन्याकुमारी की किस समस्या से अवगत करवाया ?
पाठ – सूर्योदय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है- वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक ग्रेजुएट था। चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस । नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। पर जब चट्टानं पर पहुँच गए, तो डर मेरी टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थीं।
ग्रेजुएट नवयुवक मुझे बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्ज़ियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना। वह खुद वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। “हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”, वह कह रहा था। “इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।” मुझे दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया।
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए एकत्रित थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखला रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे– मालाओं का मोल तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य-दर्शन। मेरा साथी अब मुहल्ले – मुहल्ले के हिसाब से मुझे बेकारी के आँकड़े बता रहा था। बहुत-से कडल-काक हमारे आस-पास तैर रहे थे — वहाँ की बेकारी की समस्या और सूर्योदय की विशेषता, इन दोनों से बे-लाग ।
कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। हमारी नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख एक-से चमक रहे थे। मैं अब भी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम-टेबल दोहरा रहा था। तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी….।
शब्दार्थ –
मल्लाह – एक जाति जो नाव खेने का काम करती है
मछुआ – महुआ / महुवा – एक प्रसिद्ध पेड़ जिसके फूल, फल खाने और लकड़ी ईंधन तथा इमारती काम में आती है
सीपियाँ / सीपी / सीप – शंख, घोंघे आदि की जाति का एक जलचर प्राणी जिसका शरीर किश्तीनुमा दोहरे खोल के भीतर छिपा होता है और जिसके समुद्र में पाए जाने वाले प्रकार के अंदर मोती पैदा होता है, कड़ा खोल जिसके बटन आदि बनाते हैं।
दार्शनिक – दर्शनशास्त्र का जानकार, तत्ववेत्ता
अर्ध्य – पूजनीय, पूजा में देने योग्य वस्तु, एक प्रकार का मधु
कडल-काक – पक्षियों की एक प्रजाति
बाइनाक्यूलर्ज / बाइनाक्यूलर – दूरबीन, द्वनेत्री
बे-लाग – खरा, दो टूक (बात)
उत्तर / व्याख्या – लेखक कन्याकुमारी के सूर्योदय का वर्णन कर रहा है। लेखक के साथ आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। वह चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर वहाँ स्थित है जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। लेखक के अलावा वहाँ कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक नवयुवक ग्रेजुएट था। वहाँ चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में उन लोगों को वहाँ लाए थे। लेखक के अनुसार वह नाव बस नाम की नाव थी, उसके लिए बस रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था। जब नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो उतनी देर में लेखक ने आसमान की तरफ देखते हुए अपनी चेतना को ढहराव देने की कोशिश की थी, लेखक अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढकना चाहा रहा था। परन्तु जब वे लोग चट्टान पर पहुँच गए, तो डर लेखक की टाँगों में उतर गया क्योंकि वहाँ नाव पर बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थी।
ग्रेजुएट नवयुवक लेखक को बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी है और उनमें कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग ग्रेजुएट हैं। उनका मुख्य काम नौकरियों के लिए आवेदन देना और आपस में बैठकर बहस करना है। वह नवयुवक खुद भी ग्रेजुएट होते हुए वहाँ फोटो एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। उसने लेखक को बताया कि वे लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं। उस विवेकानंद चट्टान से इतनी प्रेरणा तो उन्हें मिलती ही है। लेखक को दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया।
पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिल कर रहे थे, और छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी काली चट्टानों की आड़ से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को प्रणाम करने के लिए इकट्ठे हो रहे थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। वहां की दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखा रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे, महिलाओं से मालाओं का मोल तोल भी कर रहे थे और अपनी दूरबीन से सूर्य के दर्शन भी कर रहे थे। लेखक का साथी अब वहां के मुहल्ले – मुहल्ले के हिसाब से लेखक को वहां की बेकारी के आँकड़े बता रहा था। बहुत-से कडल-काक (एक प्रकार का पक्षी) उनके आस-पास तैर रहे थे। वे पक्षी वहाँ की बेकारी की समस्या और सूर्योदय की विशेषता, इन दोनों से ही मनो दो-टुक बात कर रहे हो।
कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट हाउस की तरफ लौट रहे थे। लेखक की नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कडल-काकों के पंख एक सामान ही चमक रहे थे। लेखक अब भी अपनी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम-टेबल दोहरा रहा था। जैसे तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी….वगैरा-वगैरा……..
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Aakhiri Chattan Tak FAQs
प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ के लेखक कौन हैं?
उत्तर- कक्षा 9 की पुस्तक क्षितिज के पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ के लेखक मोहन राकेश हैं।
प्रश्न: कक्षा 9 की पुस्तक गंगा के पाठ ‘आखिरी चट्टान तक’ का विषय क्या है?
उत्तर- ‘आखिरी चट्टान तक’ एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त किया है। यात्रा-वृत्तांत में बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर के मिलन-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन सजीव ढंग से किया गया है।
प्रश्न: ”आखिरी चट्टान तक” पाठ में लेखक ने कन्याकुमारी के बारे में क्या बताया गया है?
उत्तर- लेखक कन्याकुमारी को सुनहरे सूर्योदय और स्वर्णिम सूर्यास्त की भूमि कहता है। कन्याकुमारी के समुद्री तट के जीवन से साक्षात्कार होने पर लेखक केवल वहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक सुंदरता का ही वर्णन नहीं करता बल्कि अपने मन में उठने वाली भावनाओं, विस्मय, रोमांच, शांति और आत्मिक खोज को भी व्यक्त करता है। लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में बताया कि वहाँ आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं और वे रोज़ नौकरियों के लिए अर्जियाँ देते रहते हैं। वे अपना गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम जैसे-फोटो-एल्बम बेचना, बाइनाक्यूलर्ज से सूर्य दर्शन कराना इत्यादि करते हैं। वहाँ की स्थानीय युवतियाँ टोकरियों में रखकर शंख और मालाएँ बेचती हैं।
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Conclusion
‘आखिरी चट्टान तक’ एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त किया है। यात्रा-वृत्तांत में बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर के मिलन-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन सजीव ढंग से किया गया है। इस लेख में पाठ सार, पाठ व्याख्या, शब्दार्थ, पाठ्यपुस्तक अभ्यास, अन्य प्रश्न, पठित गद्यांश व् बहुविकल्पात्मक प्रश्न दिए गए हैं। जो विद्यार्थियों के लिए परीक्षा सम्बंधित महत्वपूर्ण है।