ताई, मिट्ठू और जगन मास्टर का चरित्र-चित्रण | Character Sketch of Tai, Mitthu and Jagan Master from CBSE Class 9 Hindi Ganga Book Chapter 3 संवादहीन
- Questions related to Character of Tai
- Questions related to Character of Mitthu
- Questions related to Character of Jagan Master
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ताई के चरित्र-चित्रण सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of Tai)
प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 3 – संवादहीन पाठ के पात्र ताई का चरित्र-चित्रण लिखिए।
उत्तर – ‘संवादहीन’ पाठ के मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। ताई का स्वभाव बहुत ही ममतामयी है। ताई अपनी सारी ममता मिट्ठू पर लुटाती हैं। पाठ में ताई के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई गई हैं –
- अकेलेपन का शिकार – ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। उनके इस बड़े घर में भी पुत्र – परिवार, बहू- -बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय – डंगर, सभी थे। परन्तु समय के साथ देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। बहू-बेटे गाँव का प्रेम छोड़कर शहरों में जा कर बस गए। बेटियाँ शादी करके अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गईं, गाँव में बसा कारबार किसके भरोसे संभलता। अर्थात गाँव के कारोबार को देखने वाला या संभालने वाला कोई नहीं रहा। और ताई गाँव के बड़े में अकेले ही रह गई।
- ममतामयी – ताई के अकेलेपन को सहारा देने के लिए गनपत न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता अब उस मिट्ठू तोते पर बरस पड़ी थी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही परेशान रहने लगीं थी। जो ताई अपनी लिए चूल्हा जलाने में आलस कर जाती थीं, वही अब बिना आलस किए पूरे नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं थी। साथ ही साथ मिट्टू की वक्त-बेवक्त की आवश्यकता या इच्छा के लिए रोटी भी बचाकर रख लेती थी।
- ताई का मिट्ठू से अनोखा संबंध – तेज़ दिमाग वाले बच्चे की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए गए पाठ को न केवल ताई की ही तरह जैसे का तैसा दुहरा देता था बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और जब भी मौका मिलता ताई के सवालों का बिलकुल सही उत्तर दे देता था। कहने का अभिप्राय यह है कि ताई मिट्ठू को अपने अकेलेपन का सहारा समझती थी और कभी-कभी उससे अपनी पुरानी यादों को भी ताज़ा क्र लिया करती थी।
- निस्वार्थ भाव – कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!” फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
- माँ की तरह चिंता – ताई किसी भी हाल में मिट्ठू से दूर नहीं रहना चाहती थी। लेकिन एक ऐसी स्थिति आ पड़ी कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस संसार में ताई ने बहुत अच्छे-बुरे दिन देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी ताई के मन में घर कर जाती थी। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, ताई का भी उनके साथ अच्छा साथ बन रहा था। एक ओर तो प्रयाग में कुंभ-स्नान का लालच ताई को अपनी ओर खींच रहा था, वहीं दूसरी ओर मिट्ठू की चिंता उन्हें अपनी ओर खींच रही थी।
- भोलापन – कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे अपने बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पर पहुँच गई। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, और पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ पिंजरे में मिट्ठू की जगह बैठे दूसरे मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर देखता रहा। ताई अपने मिट्ठू को पुकार-कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन उद्यानों में घूम रहा होगा। अर्थात ताई तो उस दूसरे मिट्ठू को अपना मिट्ठू समझकर पुकार रही थी परन्तु उनका अपना मिट्ठू तो न जाने कहाँ उड़ गया था। जिसका उन्हें आभास भी नहीं था।
प्रश्न – ताई अकेलेपन का शिकार क्यों हो गई थी ?
उत्तर – ताई ने अपने जीवन में अच्छे दिन भी देखे थे। उनके इस बड़े घर में भी पुत्र – परिवार, बहू- -बेटियाँ, नौकर-चाकर, गाय – डंगर, सभी थे। परन्तु समय के साथ देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। बहू-बेटे गाँव का प्रेम छोड़कर शहरों में जा कर बस गए। बेटियाँ शादी करके अपनी-अपनी गृहस्थी में व्यस्त हो गईं, गाँव में बसा कारबार किसके भरोसे संभलता। अर्थात गाँव के कारोबार को देखने वाला या संभालने वाला कोई नहीं रहा। और ताई गाँव के बड़े में अकेले ही रह गई।
प्रश्न – ताई ने किस तरह मिट्ठू पर अपनी ममता बरसा दी थी ?
उत्तर – ताई के अकेलेपन को सहारा देने के लिए गनपत न जाने कहाँ से एक प्यारा-सा पहाड़ी तोता ले आया था। ताई की सारी ममता अब उस मिट्ठू तोते पर बरस पड़ी थी। वह रात-दिन मिट्ठू को लेकर ही परेशान रहने लगीं थी। जो ताई अपनी लिए चूल्हा जलाने में आलस कर जाती थीं, वही अब बिना आलस किए पूरे नियमपूर्वक मिट्ठू के लिए दाल-भात बनातीं थी। साथ ही साथ मिट्टू की वक्त-बेवक्त की आवश्यकता या इच्छा के लिए रोटी भी बचाकर रख लेती थी।
प्रश्न – ताई का मिट्ठू से किस प्रकार का अनोखा संबंध था ?
उत्तर – तेज़ दिमाग वाले बच्चे की तरह मिट्ठू ताई के पढ़ाए गए पाठ को न केवल ताई की ही तरह जैसे का तैसा दुहरा देता था बल्कि एक-दो बार सुनकर याद भी रख लेता था और जब भी मौका मिलता ताई के सवालों का बिलकुल सही उत्तर दे देता था। कहने का अभिप्राय यह है कि ताई मिट्ठू को अपने अकेलेपन का सहारा समझती थी और कभी-कभी उससे अपनी पुरानी यादों को भी ताज़ा कर लिया करती थी।
प्रश्न – ताई का मिट्ठू के प्रति कैसा निस्वार्थ भाव था ?
उत्तर – कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!” फिर मान-मनौवल का दौर चलता और ताई और मिट्ठू की दुनिया पहले की तरह प्रेम से चलने लगती।
प्रश्न – ताई मिट्ठू की माँ की तरह चिंता करती थी। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – ताई किसी भी हाल में मिट्ठू से दूर नहीं रहना चाहती थी। लेकिन एक ऐसी स्थिति आ पड़ी कि ताई धर्म-संकट में पड़ गईं। इस संसार में ताई ने बहुत अच्छे-बुरे दिन देख लिए थे, अब कभी-कभी परलोक की चिंता भी ताई के मन में घर कर जाती थी। गाँव के कई लोग कुंभ-स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, ताई का भी उनके साथ अच्छा साथ बन रहा था। एक ओर तो प्रयाग में कुंभ-स्नान का लालच ताई को अपनी ओर खींच रहा था, वहीं दूसरी ओर मिट्ठू की चिंता उन्हें अपनी ओर खींच रही थी।
प्रश्न – ताई के भोलापन का प्रमाण दीजिए।
उत्तर – कुंभ-स्नान से लौटकर सभी तीर्थयात्री अपने-अपने घरों की ओर चल दिए लेकिन ताई सीधे अपने बड़े घर की ओर न जाकर जगन मास्टर के दरवाजे पर पहुँच गई। ताई सोच रही थीं कि उन्हें देखते ही मिट्ठू ‘राम राम सीताराम’ की रट लगाकर आसमान सिर पर उठा लेगा, और पिंजड़े में कूद-फाँद मचाकर तूफान खड़ा कर देगा, लेकिन वहाँ पिंजरे में मिट्ठू की जगह बैठे दूसरे मिट्ठू ने उन्हें देखकर कोई हरकत नहीं की, वह केवल इधर-उधर देखता रहा। ताई अपने मिट्ठू को पुकार-कर थक गईं लेकिन उनके सूनेपन का साथी न जाने किन उद्यानों में घूम रहा होगा। अर्थात ताई तो उस दूसरे मिट्ठू को अपना मिट्ठू समझकर पुकार रही थी परन्तु उनका अपना मिट्ठू तो न जाने कहाँ उड़ गया था। जिसका उन्हें आभास भी नहीं था।
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मिट्ठू के चरित्र-चित्रण सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of Mitthu)
प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 3 – संवादहीन पाठ के पात्र मिट्ठू का चरित्र-चित्रण लिखिए।
उत्तर – ‘संवादहीन’ पाठ के मुख्य पात्र ताई और मिट्ठू हैं। मिट्ठू न केवल एक पक्षी है बल्कि वह ताई के अकेलेपन का साथी भी है। पाठ में मिट्ठू के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई गई हैं –
- ताई के अकेलेपन का सहारा – जब ताई के बहू-बेटे शहर में बस गए और ताई की बेटियां अपनी गृहस्थी में रम गई तब ताई बिलकुल अकेली पड़ गई थी। उस अकेलेपन में मिट्ठू ताई का सहारा बन गया। मिट्ठू का ताई की बातों को सुनना और कभी-कभी जवाब भी देना, ताई के अलेकेपन को समाप्त कर देता था।
- ताई से मिट्ठू का अनोखा संबंध – सुबह के समय जैसे ही प्रकाश फैलने लगता था, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं थी तो मिट्ठू भी जैसे ताई को सुबह की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ हर हर गंगे ! हर हर गंगे !! सीताराम बोल ! सीताराम बोल !! मिट्ठू राम राम! मिट्ठू राम राम !! शुरू कर देते थे। मिट्ठू की आवाज सुनकर ताई चौंककर उठ बैठतीं थी। प्यार से मिट्ठू को देखकर आशीर्वाद देते हुए कहती थी कि जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ और मिट्ठू भी बदले में अपने आप को ताई की तरह बुजुर्ग दिखाते हुए ताई को आशीर्वाद देता था खुश रहो! खुश रहो!!
- किसी नटखट बच्चे की तरह व्यवहार – कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!”
- आज्ञाकारी व् समझदार – जब ताई का कुम्भ-स्नान जाने का समय आया तो उस दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुक रही थी। बार-बार वह मिट्ठू को प्यार-दुलार कर रही थी, जल्दी लौट आने की सांत्वना देती जा रही थी। और मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में ‘हर हर गंगे’, ‘राम राम सीताराम’ कहकर मानो उन्हें भरोसा दे रहा था कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेगा।
प्रश्न – मिट्ठू किस तरह ताई के अकेलेपन का सहारा बना ?
उत्तर – जब ताई के बहू-बेटे शहर में बस गए और ताई की बेटियां अपनी गृहस्थी में रम गई तब ताई बिलकुल अकेली पड़ गई थी। उस अकेलेपन में मिट्ठू ताई का सहारा बन गया। मिट्ठू का ताई की बातों को सुनना और कभी-कभी जवाब भी देना, ताई के अलेकेपन को समाप्त कर देता था।
प्रश्न – ताई से मिट्ठू का कैसा संबंध था ?
उत्तर – सुबह के समय जैसे ही प्रकाश फैलने लगता था, पेड़ों में चिड़ियाँ चहचहातीं थी तो मिट्ठू भी जैसे ताई को सुबह की झपकी से जगाने के लिए ही अपना पाठ हर हर गंगे ! हर हर गंगे !! सीताराम बोल ! सीताराम बोल !! मिट्ठू राम राम! मिट्ठू राम राम !! शुरू कर देते थे। मिट्ठू की आवाज सुनकर ताई चौंककर उठ बैठतीं थी। प्यार से मिट्ठू को देखकर आशीर्वाद देते हुए कहती थी कि जीते रहो बेटा, जुग जुग जिओ और मिट्ठू भी बदले में अपने आप को ताई की तरह बुजुर्ग दिखाते हुए ताई को आशीर्वाद देता था खुश रहो! खुश रहो!!
प्रश्न – मिट्ठू के नटखट व्यवहार का उदाहरण दीजिए।
उत्तर – कभी-कभी ताई थकी-माँदी लेटी होतीं और अपनी किसी जिद को मनवाने के लिए मिट्टू पिंजड़े में तूफान खड़ा कर देते। पानी और दाने की कटोरियों को जान-बूझकर उलटा देते, तो खीझकर ताई कोसतीं, “मेरी जान खाने को आ गया है, मर जा!” और मिट्ठू भी उतनी ही खीझ के साथ हमला बोल देते, “मर जा ! मर जा ! मर जा!”
प्रश्न – मिट्ठू बहुत समझदार था। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – जब ताई का कुम्भ-स्नान जाने का समय आया तो उस दिन ताई की आँसुओं की धार रुके नहीं रुक रही थी। बार-बार वह मिट्ठू को प्यार-दुलार कर रही थी, जल्दी लौट आने की सांत्वना देती जा रही थी। और मिट्ठू भी उनकी बातों के उत्तर में ‘हर हर गंगे’, ‘राम राम सीताराम’ कहकर मानो उन्हें भरोसा दे रहा था कि वह जगन मास्टर की घरवाली के साथ प्रेम से रह लेगा।
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जगन मास्टर के चरित्र-चित्रण सम्बंधित प्रश्न (Questions related to Character of Jagan Master)
प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी ‘गंगा’ पाठ 3 – संवादहीन पाठ के पात्र जगन मास्टर का चरित्र-चित्रण लिखिए।
उत्तर – ‘संवादहीन’ पाठ के पात्र जगन मास्टर के चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ बताई गई हैं –
- नियम-सिद्धांत वाले व्यक्ति – जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे।
- स्वतंत्रता प्रेमी – जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती। जब-जब मिट्टू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।
- भावुक – जगन मास्टर के लिए जब मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्टू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें।
- अपनी धुन के पक्के – मिट्टू पिंजरे में रहने का इतना आदी हो चूका था कि वह बाहर आने की कोई इच्छा प्रकट नहीं कर रहा था। जगन मास्टर भी अपनी धुन के पक्के थे। निकट ही अनाज का थैला पड़ा हुआ था। उन्होंने मुट्ठी में थोड़ा अनाज लेकर पिंजरे के दरवाजे से लेकर बाहर तक बिखेर दिया और स्वयं अलग हटकर उसे देखते रहे। मिट्ठू धीरे-धीरे दाना चुगते हुए बाहर आ गए तो जगन मास्टर ने संतोष की साँस ली।
- कर्तव्यनिष्ठ – मिट्ठू के खो जाने के बाद मिट्ठू की तरह दिखने वाले तोते के साथ जगन मास्टर की जिंदगी का एक नया दौर शुरू हो गया था। वह तोते को पिंजरे में रखकर पाठ पढ़ाने लगे, ताकि जब तक ताई आए तब तक वह भी मिट्ठू की तरह दो अक्षर बोलना सीख ले। यह एक संयोग ही है कि जगन मास्टर ने अंतिम दिन ताई के मिट्ठू को गीता के दो-चार श्लोक रटाने की कल्पना की थी, ताकि जब ताई गंगा-स्नान का पुण्य कमाकर लौट आए तो अपने मिट्ठू के मुँह से गीता सुन सकें, लेकिन मिट्टू के उड़ जाने वाली असंभव घटना घट गई और अब जगन मास्टर ने इस बात की फिक्र के मारे खाना-पीना छोड़ दिया था। जगन मास्टर अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे थे कि वह दूसरा तोता भी मिट्ठू की तरह कुछ बोलना सीख ले ताकि ताई को कुछ पता न चले।
प्रश्न – जगन मास्टर कैसे व्यक्ति थे ?
उत्तर – जगन मास्टर दूसरे मिजाज के आदमी थे। उन्होंने अपने कुछ नियम-सिद्धांत बना रखे थे और भरसक कोशिश करते थे कि उनके कारण किसी को कोई कष्ट न पहुँचे।
प्रश्न – जगन मास्टर को हर किसी की स्वतंत्रता प्रिय थी। सपशय कीजिए।
उत्तर – जगन मास्टर स्वतंत्र विचारों के आदमी थे। दूसरों की स्वतंत्रता पर बाधा नहीं डालना चाहते थे। पिंजड़े में बंद मिट्ठू को देखकर उन्हें बेचैनी होने लगती थी। जब-जब मिट्टू को देखते, अपनी पत्नी की बुद्धि पर तरस खाते और अपने आप को भी दोषी अनुभव करते।
प्रश्न – स्पष्ट कीजिए कि जगन मास्टर एक भावुक व्यक्ति थे।
उत्तर – जगन मास्टर के लिए जब मिट्ठू की यातना असह्य हो गई, तो उन्होंने एक दिन कमरा बंदकर मिट्टू के पिंजरे को जमीन पर रखा और उसका दरवाजा खोल दिया, ताकि उसे कुछ देर के लिए ही सही, खुली हवा में आने का मौका देकर अपने पाप का थोड़ा प्रायश्चित कर लें।